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क्या आपके शरीर में आयरन की कमी है? (Signs and Symptoms of Iron Deficiency)

मिनरल्स, विटामिन व प्रोटीन जैसे पोषक तत्व हमारे शरीर को स्वस्थ बनाए रखते हैं. इनकी कमी होने पर व्यक्ति को कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. आयरन भी शरीर के लिए बेहद ज़रूरी है. आयरन शरीर को स्वस्थ रखने, लाल रक्त कोशिकाओं को बनाने और मांसपेशियो को
प्रोटीन पहुंचाने का काम करता है. शरीर में इसकी मात्रा कम होने पर ख़ून की कमी होने लगती हैं, जिसके कारण किडनी, कैंसर, कुपोषण व एनीमिया जैसी कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं व बीमारियां होती हैं. पौष्टिक आहार न लेनेे या किसी बीमारी के कारण शरीर में आयरन की कमी हो सकती है. हम आपको आयरन की कमी के कुछ प्रमुख संकेत बता रहे हैं.

Signs and Symptoms of Iron Deficiency
अत्यधिक थकानः थकान आयरन की कमी का प्रमुख संकेत है. शरीर में आयरन की कमी होने पर लाल रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन का उत्पादन कम हो जाता है. हीमोग्लोबिन फेफड़ों व शरीर के अन्य अंगों तक ऑक्सिजन पहुंचाने का काम करता है. जब शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी होती है तो मांसपेशियों और अन्य कोशिकाओं तक ऑक्सिज़न नहीं पहुंच पाता, नतीज़तन थकान महसूस होती है. थकान एक आम समस्या है इसलिए यह पता लगा पाना मुश्क़िल होता है कि थकान आयरन की कमी से हो रही है या फिर अन्य कारण से. यदि थकान के साथ कमज़ोरी, ऊर्जा की कमी, एकग्रता की कमी जैसी समस्याएं हों तो यह आयरन की कमी का संकेत है.

मुरझाई त्वचाः रक्त कोशिकाओं में मौजूद हीमोग्लोबिन हमारी त्वचा को सेहतमंद और लाल बनाए रखने में मदद करता है. आयरन की कमी होने पर हमारा शरीर रक्त कोशिकाओं में पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता, जिसके कारण त्वचा मुरझाई व बुझी हुई दिखती है. चाहे आपकी रंगत कैसी भी हो, अगर आपके होंठ, मसूढ़े, नाख़ून और आंखों का अंदरूनी हिस्सा सामान्य से कम लाल दिखाई दे तो इसका अर्थ हुआ कि आपके शरीर में आयरन की कमी है.

सांस चढ़ना या सीने में दर्दः कोई शारीरिक ऐक्टिविटी करने पर सांस चढ़ने लगे या सीने में दर्द हो तो यह आयरन की कमी का संकेत है. लाल रक्त कोशिकाओं में सीमित मात्रा में हीमोग्लोबिन होने के कारण शरीर के दूसरे अंगों तक ऑक्सिज़न की सप्लाई भी सीमित हो जाती है, जिससे अन्य अंगों तक ऑक्सिज़न पहुंचाने के लिए शरीर को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इसके कारण सांस फूलने या सीने में दर्द की समस्या होती है.

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सिरदर्दः शरीर में आयरन की कमी होने पर सिरदर्द या माइग्रेन की समस्या हो सकती है. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मस्तिष्क को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सिज़न नहीं मिलता, जिसके कारण रक्त कोशिकाएं सूज जाती हैं, नतीज़तन मस्तिष्क पर ज़्यादा दबाव पड़ता है और सिरदर्द शुरू हो जाता है. इसके अलावा आयरन की कमी होने पर चक्कर भी आता है. जब शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर अचानक कम हो जाता है या लगातार बहुत दिनों तक कम रहता है तो शरीर ऑक्सिज़न प्राप्त करने के लिए बैचेन हो जाता है, जिसके कारण चक्कर आता है.

बार-बार इंफेक्शन होनाः आयरन हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाने में मदद करता है. यही वजह है कि शरीर में आयरन की कमी होने पर बार-बार इंफेक्शन होता है. लाल रक्त कोशिकाएं शरीर में मौजूद लसीकाओं तक ऑक्सिज़न पहुंचाने का काम करती हैं. इन लसीकाओं में इंफेक्शन से लड़ने वाले व्हाइट ब्लड सेल्स होते हैं. जब किसी के शरीर में आयरन की कमी होती है, तो व्हाइट ब्लड सेल्स पर्याप्त मात्रा में नहीं बन पाते हैं और ऑक्सिज़न न मिल पाने के कारण वे स्ट्रॉन्ग नहीं रह पाते. नतीज़तन जल्दी इंफेक्शन पकड़ लेता है.

जीभ और मुंह में सूजनः मूंह देखकर बहुत से रोगों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, आयरन की कमी उनमें से एक है. उदाहरण के लिए यदि आपकी जीभ सूजी हुई है और उसका रंग बदला हुआ दिखाई दे तो इसका अर्थ हुआ कि आपके शरीर में आयरन की कमी है. जीभ की मासंपेशियों में मायग्लोबिन नामक प्रोटीन पाया जाता है. मायग्लोबिन का स्तर कम होने पर जीभ सूजी व फूली हुई नज़र आती है. आयरन की कमी होने से मुंह सूखने और फटने की समस्या भी होती है.

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World TB Day: जानें क्षय रोग (टीबी) के लक्षण और उससे बचने के उपाय(Tuberculosis Causes, Vaccine, Symptoms & Treatment)

Tuberculosis, Causes, Vaccine, Symptoms, Treatment

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विश्व क्षय रोग दिवस (World TB Day) पूरे विश्व में आज यानी 24 मार्च को मनाया जाता है और इसका ध्येय है लोगों को इस बीमारी के विषय में जागरूक करना और टीबी की रोकथाम के लिए कदम उठाना है.  भारत में टीबी के फैलने का एक मुख्य कारण इस बीमारी के लिए लोगों सचेत ना होना और इसे शुरुआती दौर में गंभीरता से न लेना. टी.बी किसी को भी हो सकता है, इससे बचने के लिए कुछ सामान्य उपाय भी अपनाये जा सकते हैं. इसी बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए हमने बात की डॉ. लविना मीरचंदानी, हेड ऑफ रेस्पिरेटरी डिपार्टमेंट, के.जी सोमैया हॉस्पिटल, मुंबई से.

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टीबी क्या है?

टीबी अर्थात ट्यूबरक्लोसिस एक संक्रामक रोग होता है, जो बैक्टीरिया की वजह से होता है. यह बैक्टीरिया शरीर के सभी अंगों में प्रवेश कर जाता है. हालांकि ये ज्यादातर फेफड़ों में ही पाया जाता है. मगर इसके अलावा आंतों, मस्तिष्क, हड्डियों, जोड़ों, गुर्दे, त्वचा तथा हृदय भी टीबी से ग्रसित हो सकते हैं.

टीबी के लक्षण

  • तीन हफ़्ते से ज़्यादा खांसी
  • बुखार (जो शाम को बढ़ जाता है)
  • छाती में तेज दर्द
  • वजन का अचानक घटना
  • भूख में कमी आना
  • बलगम के साथ खून का आना
  • बहुत ज्यादा फेफड़ों का इंफेक्शन

    ऐसे होता है टीबी का संक्रमण

    टीबी से संक्रमित रोगियों के कफ से, छींकने, खांसने, थूकने और उनके द्वारा छोड़ी गई सांस से वायु में बैक्टीरिया फैल जाते हैं, जोकि कई घंटों तक वायु में रह सकते हैं. जिस कारण स्वस्थ व्यक्ति भी आसानी से इसका शिकार बन सकता है. हालांकि संक्रमित व्यक्ति के कपड़े छूने या उससे हाथ मिलाने से टीबी नहीं फैलता. जब टीबी बैक्टीरिया सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंचता है तो वह कई गुना बढ़ जाता है और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है. हालांकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता इसे बढ़ने से रोकती है, लेकिन जैसे-जैसे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है, टीबी के संक्रमण की आशंका बढ़ती जाती है.

    जांच के तरीक़े

    टीबी की जांच करने के कई माध्यम होते हैं, जैसे छाती का एक्स रे, बलगम की जांच, स्किन टेस्ट आदि. इसके अलावा आधुनिक तकनीक के माध्यम से आईजीएम हीमोग्लोबिन जांच कर भी टीबी का पता लगाया जा सकता है. अच्छी बात तो यह है कि इससे संबंधित जांच सरकार द्वारा निशुल्क करवाई जाती हैं.

    बचने के उपाय

    •    दो हफ्तों से अधिक समय तक खांसी रहती है, तो डॉक्टर को दिखाएं.
    •    बीमार व्यक्ति से दूर रहें.
    •    आपके आस-पास कोई बहुत देर तक खांस रहा है, तो उससे दूर रहें.
    •    अगर आप किसी बीमार व्याक्ति से मिलने जा रहे हैं, तो अपने हाथों को ज़रूर धोलें.
    •    पौष्टिक आहार लें जिसमें पर्याप्त  मात्रा में विटामिन्स , मिनेरल्स , कैल्शियम , प्रोटीन और फाइबर हों क्योंोकि पौष्टिक आहार हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है.
    •   अगर आपको अधिक समय से खांसी है, तो बलगम की जांच ज़रूर करा लें.

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कोलेस्ट्रॉल को कैसे करें कंट्रोल: कारण, लक्षण और उपचार (How to Control High Cholesterol: Causes, Symptoms, Treatments)

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हाई कोलेस्ट्रॉल हेल्थ व लाइफ दोनों को ही ख़तरा व नुक़सान पहुंचा सकता है, क्योंकि रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कोरोनरी धमनियों में अवरोध पैदा करके हार्ट प्रॉब्लम व हार्ट अटैक जैसी घातक स्थिति को जन्म देता है. इसलिए ज़रूरी है इसे कंट्रोल में रखना.

कोलेस्ट्रॉल रक्त में पाया जानेवाला वसा (फैट) है. स्वस्थ जीवन के लिए यह बहुत ज़रूरी हैे, परंतु जब रक्त में इसकी मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है, तो रक्त में थक्के जम जाते हैं, जो हृदय के लिए घातक होता है. डॉक्टर्स के अनुसार, किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष में कोलेस्ट्रॉल का स्तर 200 एमजी/डीएल से कम ही रहना चाहिए.

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कोलेस्ट्रॉल क्यों ज़रूरी है?

कोलेस्ट्रॉल शरीर के क्रियाकलाप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. यह कोशिकाओं की दीवारों का निर्माण करने और विभिन्न हार्मोंस को बैलेंस करने के लिए भी ज़रूरी होता है. इनमें एचडीएल को अच्छा कोलेस्ट्रॉल तथा एलडीएल को बुरा कोलेस्ट्रॉल कहते हैं.
एलडीएल को बुरा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह कोरोनरी धमनियों में अवरोध उत्पन्न करता है, जिससे रक्त संचार में बाधा होती है और हार्ट अटैक की स्थिति पैदा होती है. एचडीएल कोलेस्ट्रॉल इसलिए अच्छा है, क्योंकि यह धमनियों में अवरोध बनने से रोकता है.

कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स

प हाई कोलेस्ट्रॉल से ग्रस्त लोगों में कोई लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते, जब तक कोलेस्ट्रॉल दिल व दिमाग़ की तरफ़ जानेवाली धमनियों को काफ़ी संकरा नहीं कर देता है. इसके परिणामस्वरूप सीने में दर्द होता है.
प रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाने से पथरी रोग, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और गुर्दे की बीमारी हो सकती है.
प हाई कोलेस्ट्रॉल होने पर ये बढ़ते-बढ़ते नसों में उतर आता है, जिससे चलना-फिरना कठिन हो जाता है.
प हार्ट अटैक, किडनी डिसऑर्डर, थायरॉयड, लकवा जैसे रोग कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने से हो सकते हैं. इनसे बचने के लिए दवा के साथ-साथ अपने खानपान पर ध्यान देना भी ज़रूरी है. कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करके हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों की वजह से होनेवाली अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है.

कोलेस्ट्रॉल के कारण और लक्षण

रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के कारणों को तीन भागों में बांटा गया है.
– कोलेस्ट्रॉल बढ़ानेवाले आहार यानी वसायुक्त खाद्य पदार्थ का अधिक मात्रा में लगातार सेवन करना.
– मेटाबॉलिक सिस्टम जब एलडीएल की मात्रा को पर्याप्त रूप में रक्त से बाहर नहीं कर पाता, तो रक्त में एलडीएल का स्तर बढ़ जाता है.
– तीसरी स्थिति वह होती है, जब लिवर कोलेस्ट्रॉल को अधिक मात्रा में बनाने लगता है.
उपरोक्त कारणों को यदि नियंत्रण में रखा जाए, तो हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी.
जहां तक लक्षणों की बात है, तो थकान, कमज़ोरी, सांस लेने में तकलीफ़, अधिक पसीना आना, सीने में दर्द, बेचैनी-सी महसूस होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.

कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के लिए क्या खाएं?

– अपने खानपान में अधिकाधिक मौसमी फल व सब्ज़ियों को शामिल करें.
– इनमें संतरे का जूस प्रमुख है, जिसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है.
– ज़ीरो कोलेस्ट्रॉल वाले पदार्थ, जैसे- ताज़ा फल, सब्ज़ियां और फ़ाइबरयुक्त पदार्थ अपने भोजन में शामिल करें.
– सुबह नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स जैसे आहार फ़ायदेमंद रहते हैं.

ये न खाएं

– रेड मीट का सेवन न करें.
– दूध, बटर, घी, क्रीम यहां तक कि आइस्क्रीम जैसे पदार्थ, जिनमें भारी मात्रा मेें कोलेस्ट्रॉल होता है, खाने से बचें.
– मावा से बनी मिठाइयां स्लो पॉइज़न का काम करती हैं, इनसे दूर ही रहें.
– सिगरेट-शराब का सेवन कम करें.

सावधानियां

– दवा के अलावा कुछ सावधानियों और खानपान में सुधार लाकर भी कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है, क्योंकि खानपान व रहन-सहन के तौर-तरीक़ों में बिगड़ते संतुलन की वजह से ही शहरी लोग विशेष रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) के शिकार हो रहे हैं.
– डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपने खानपान और जीवनशैली में परिवर्तन करें.
– शरीर का वज़न बढ़ने न दें. शरीर की एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करें यानी ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलें.
– नियमित एक्सरसाइज़ इसमें मददगार है. जॉगिंग, स्विमिंग, डांसिंग और एरोबिक्स नियमित रूप से करें.
– बिल्डिंग मेें चढ़ने के लिए लिफ़्ट की बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.
– यदि आपको हार्ट से जुड़ी बीमारी होने का ज़रा भी शक है, तो तुरंत हार्ट स्पेशलिस्ट की सलाह लें.
– जो लोग चिकनाई वाले आहार कम खाते हैं, उनके शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का अनुपात कम होता है.
– खाद्य पदार्थ ख़रीदते समय उनके लेबल गौर से पढ़ लें. ऐसे ही पदार्थ ख़रीदें, जिनमें वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम हो.

कोलेस्ट्रॉल की जांच

– 20 साल की उम्र से अधिक आयुवालों को हर 5 साल में कोलेस्ट्रॉल का टेस्ट ज़रूर करवाना चाहिए.
– टेस्ट में लिपोप्रोटीन टेस्ट करवाना ज़रूरी होता है, जिससे आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल पता चलता है.
– यह भी देखा गया है कि मेनोपॉज़ से पहले एक ही उम्र के स्त्री-पुरुषों में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अलग-अलग होता है. स्त्रियों में पुरुषों के मुक़ाबले कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– लेकिन मेनोपॉज़ के बाद स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा कोलेस्ट्रॉल का स्तर काफ़ी ज़्यादा पाया जाता है.
– ऐसे में मेनोपॉज़ के बाद महिलाओं को अपने कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ख़ास ध्यान देना चाहिए.

हाई कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने की होम रेमेडीज़

– 1 कप गर्म पानी में 1-1 टीस्पून शहद और नींबू का रस मिलाकर रोज़ सुबह पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर प्राकृतिक रूप से कम होता जाता है.
– 1 ग्लास पानी में 2 टेबलस्पून साबूत धनिया उबाल लें. ठंडा होने पर छान लें. इसे दिन में दो बार पीएं.
– प्याज़ का रस न स़िर्फ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है, बल्कि खून साफ़ करके हृदय को भी मज़बूत करता है.
– विटामिन ई से भरपूर डायट लें, जैसे- सूरजमुखी के बीज, सोयाबीन ऑयल, अंकुरित अनाज आदि.
– विटामिन बी 6 भी लें.
– इसके अलावा रोज़ाना लहसुन खाएं. गुग्गुल भी बहुत फ़ायदेमंद है.
– गिलोय और कालीमिर्च पाउडर के मिश्रण को रोज़ाना दिन में दो बार 3 ग्राम की मात्रा में खाएं.
– 1 ग्लास पानी में 1 टीस्पून मेथी पाउडर मिलाकर 1 महीने तक रोज़ खाली पेट पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– मेथीदाने का नियमित सेवन भी काफ़ी फ़ायदेमंद होता है.
– रोज़ाना 1 टेबलस्पून शहद के सेवन से भी कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में रहता है.
– कुकिंग के लिए सनफ्लावर ऑयल का ही इस्तेमाल करें.

 

– ऊषा गुप्ता

 

कोलेस्ट्रॉल लेवल तेज़ी से घटाने के 10+ असरदार व आसान उपाय (10+ Natural Ways to Lower Your Cholesterol Levels)

जानें कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स, ट्राई करें ये होम रेमेडीज़(Risk factors of Cholesterol: Try these home remedies)

Risk factors of Cholesterol

हृदय रोगियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए तक़रीबन हर डॉक्टर मरीज़ों को कोलेस्ट्रॉल से बचने की सलाह देते हैं. दिल के मरीज़ों के लिए कोलेस्ट्रॉल अभिशाप के समान है. आइए, शरीर में पर्याप्त मात्रा में कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के तरीक़ों और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में जानें.

Risk factors of Cholesterol

कोलेस्ट्रॉल रक्त में पाया जानेवाला वसा (फैट) है. स्वस्थ जीवन के लिए यह बहुत ज़रूरी हैे, परंतु जब रक्त में इसकी मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है, तो रक्त में थक्के जम जाते हैं, जो हृदय के लिए घातक होता है. डॉक्टर्स के अनुसार, किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष में कोलेस्ट्रॉल का स्तर 200 एमजी/डीएल से कम ही रहना चाहिए. हाई कोलेस्ट्रॉल व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन दोनों को ही ख़तरा व नुक़सान पहुंचा सकता है, क्योंकि रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कोरोनरी धमनियों में अवरोध पैदा करके हार्ट प्रॉब्लम व हार्ट अटैक जैसी घातक स्थिति को जन्म देता है.

 

कोलेस्ट्रॉल क्यों ज़रूरी है?

कोलेस्ट्रॉल शरीर के क्रियाकलाप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. यह कोशिकाओं की दीवारों का निर्माण करने और विभिन्न हार्मोंस को बैलेंस करने के लिए भी ज़रूरी होता है. इनमें एचडीएल को अच्छा कोलेस्ट्रॉल तथा एलडीएल को बुरा कोलेस्ट्रॉल कहते हैं.
एलडीएल को बुरा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह कोरोनरी धमनियों में अवरोध उत्पन्न करता है, जिससे रक्त संचार में बाधा होती है और हार्ट अटैक की स्थिति पैदा होती है. एचडीएल कोलेस्ट्रॉल इसलिए अच्छा है, क्योंकि यह धमनियों में अवरोध बनने से रोकता है.

 

कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स

– हाई कोलेस्ट्रॉल से ग्रस्त लोगों में कोई लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते, जब तक कोलेस्ट्रॉल दिल व दिमाग़ की तरफ़ जानेवाली धमनियों को काफ़ी संकरा नहीं कर देता है. इसके परिणामस्वरूप सीने में दर्द होता है.
– रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाने से पथरी रोग, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और गुर्दे की बीमारी हो सकती है.
– हाई कोलेस्ट्रॉल होने पर ये बढ़ते-बढ़ते नसों में उतर आता है, जिससे चलना-फिरना कठिन हो जाता है.
– हार्ट अटैक, किडनी डिसऑर्डर, थायरॉयड, लकवा जैसे रोग कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने से हो सकते हैं. इनसे बचने के लिए दवा के साथ-साथ अपने खानपान पर ध्यान देना भी ज़रूरी है. कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करके हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों की वजह से होनेवाली अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है.

कोलेस्ट्रॉल के कारण और लक्षण

रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के कारणों को तीन भागों में बांटा गया है.
– कोलेस्ट्रॉल बढ़ानेवाले आहार यानी वसायुक्त खाद्य पदार्थ का अधिक मात्रा में लगातार
सेवन करना.
– मेटाबॉलिक सिस्टम जब एलडीएल की मात्रा को पर्याप्त रूप में रक्त से बाहर नहीं कर पाता, तो रक्त में एलडीएल का स्तर बढ़ जाता है.
– तीसरी स्थिति वह होती है, जब लिवर कोलेस्ट्रॉल को अधिक मात्रा में बनाने लगता है.
उपरोक्त कारणों को यदि नियंत्रण में रखा जाए, तो हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी.जहां तक लक्षणों की बात है, तो थकान, कमज़ोरी, सांस लेने में तकलीफ़, अधिक पसीना आना, सीने में दर्द, बेचैनी-सी महसूस होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.

कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के लिए क्या खाएं?

– अपने खानपान में अधिकाधिक मौसमी फल व सब्ज़ियों को शामिल करें.
– इनमें संतरे का जूस प्रमुख है, जिसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है.
– ज़ीरो कोलेस्ट्रॉल वाले पदार्थ, जैसे- ताज़ा फल, सब्ज़ियां और फ़ाइबरयुक्त पदार्थ अपने भोजन में शामिल करें.
– सुबह नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स जैसे आहार फ़ायदेमंद रहते हैं.

ये न खाएं

– रेड मीट का सेवन न करें.
– दूध, बटर, घी, क्रीम यहां तक कि आइस्क्रीम जैसे पदार्थ, जिनमें भारी मात्रा मेें कोलेस्ट्रॉल होता है, खाने से बचें.
– मावा से बनी मिठाइयां स्लो पॉइज़न का काम करती हैं, इनसे दूर ही रहें.
प सिगरेट-शराब का सेवन कम करें.

सावधानियां

– दवा के अलावा कुछ सावधानियों और खानपान में सुधार लाकर भी कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है, क्योंकि खानपान व रहन-सहन के तौर-तरीक़ों में बिगड़ते संतुलन की वजह से ही शहरी लोग विशेष रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) के शिकार हो रहे हैं.
– डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपने खानपान और जीवनशैली में परिवर्तन करें.
– शरीर का वज़न बढ़ने न दें. शरीर की एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करें यानी ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलें.
– नियमित एक्सरसाइज़ इसमें मददगार है. जॉगिंग, स्विमिंग, डांसिंग और एरोबिक्स नियमित रूप से करें.
– बिल्डिंग मेें चढ़ने के लिए लिफ़्ट की बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.
– यदि आपको हार्ट से जुड़ी बीमारी होने का ज़रा भी शक है, तो तुरंत हार्ट स्पेशलिस्ट की सलाह लें.
– जो लोग चिकनाई वाले आहार कम खाते हैं, उनके शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का अनुपात कम होता है.
– खाद्य पदार्थ ख़रीदते समय उनके लेबल गौर से पढ़ लें. ऐसे ही पदार्थ ख़रीदें, जिनमें वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम हो.

कोलेस्ट्रॉल की जांच

– 20 साल की उम्र से अधिक आयुवालों को हर 5 साल में कोलेस्ट्रॉल का टेस्ट ज़रूर करवाना चाहिए.
– टेस्ट में लिपोप्रोटीन टेस्ट करवाना ज़रूरी होता है, जिससे आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल पता चलता है.
– यह भी देखा गया है कि मेनोपॉज़ से पहले एक ही उम्र के स्त्री-पुरुषों में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अलग-अलग होता है. स्त्रियों में पुरुषों के मुक़ाबले कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– लेकिन मेनोपॉज़ के बाद स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा कोलेस्ट्रॉल का स्तर काफ़ी ज़्यादा पाया जाता है.
– ऐसे में मेनोपॉज़ के बाद महिलाओं को अपने कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ख़ास ध्यान देना चाहिए.

हाई कोलेस्ट्रॉल को कम करने की होम रेमेडीज़

– 1 कप गर्म पानी में 1-1 टीस्पून शहद और नींबू का रस मिलाकर रोज़ सुबह पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर प्राकृतिक रूप से कम होता जाता है.
– 1 ग्लास पानी में 2 टेबलस्पून साबूत धनिया उबाल लें. ठंडा होने पर छान लें. इसे दिन में दो बार पीएं.
– प्याज़ का रस न स़िर्फ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है, बल्कि खून साफ़ करके हृदय को भी मज़बूत करता है.
– विटामिन ई से भरपूर डायट लें, जैसे- सूरजमुखी के बीज, सोयाबीन ऑयल, अंकुरित अनाज आदि.
– विटामिन बी 6 भी लें.
– इसके अलावा रोज़ाना लहसुन खाएं. गुग्गुल भी बहुत फ़ायदेमंद है.
– गिलोय और कालीमिर्च पाउडर के मिश्रण को रोज़ाना दिन में दो बार 3 ग्राम की मात्रा में खाएं.
– 1 ग्लास पानी में 1 टीस्पून मेथी पाउडर मिलाकर 1 महीने तक रोज़ खाली पेट पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– मेथीदाने का नियमित सेवन भी काफ़ी फ़ायदेमंद होता है.
– रोज़ाना 1 टेबलस्पून शहद के सेवन से भी कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में रहता है.
– कुकिंग के लिए सनफ्लावर ऑयल का ही इस्तेमाल करें.

– ऊषा गुप्ता

 

सावधानः रोज़ाना की ये आदतें आपको कर सकती हैं बीमार (Everyday Habits That Can Make You Sick)