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पिछले कुछ वर्षों में हम लोगों ने चेचक, पोलियो और स्पेनिश फ्लू जैसी कई महामारियों को देखा है और प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यूनिटी सिस्टम द्वारा इन बीमारियों से ख़ुद को बचाने के लिए उपाय भी किए. कोरोना वायरस नया वायरस है, जिसने लोगों के मन में कई सवाल खड़े किए. इससे लड़ने के लिए इम्यूनिटी का मज़बूत होना बेहद ज़रूरी माना गया.
इम्यूनिटी सिस्टम कोशिकाओं और प्रोटीन का एक जटिल नेटवर्क है, जो शरीर को संक्रमण से बचाता है. रही बात शिशु की, तो वे विभिन्न बीमारियों और संक्रमणों के लिए अतिसंवेदनशील होते हैं, इसलिए पैरेंट्स के लिए यह समझना ज़रूरी है कि कैसे शिशु को मां से इम्यूनिटी ट्रांसफर होती है. साथ ही इसके प्रारंभिक चरणों के दौरान शिशु की इम्यूनिटी को बढ़ाने का महत्व क्या है. इस विषय पर एड्रोइट बायोमेड लिमिटेड के डॉ. अनीश देसाई और डॉ. सुनैना आनंद ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं.
एंटीबॉडी, जो रक्षा कोशिकाएं होती हैं, गर्भावस्था के दौरान नाल के माध्यम से मां से शिशु में पारित हो जाती हैं. इससे शिशु को जन्म के शुरुआती दिनों में कुछ सुरक्षा मिलती है. शिशु को मिले एंटीबॉडी का प्रकार और मात्रा मां की इम्यूनिटी के अपने स्तर पर निर्भर है. जन्म के बाद, एंटीबॉडी मां के दूध के माध्यम से शिशु को मिलता है. हालांकि, शिशु की इम्यूनिटी सिस्टम अभी भी विकसित हो रही है, इसलिए उसे अपेक्षित आधार की आवश्यकता होती है.

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अक्सर मांओं का यह सवाल रहता है कि वे अपने शिशु की इम्यूनिटी को कैसे बढ़ाएं? ऐसे में माता-पिता के लिए यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि वे अपने शिशु की इम्यूनिटी प्रणाली की निरंतर जांच करते रहें, ताकि वे स्वस्थ रहें.

शिशु की इम्यूनिटी के बढ़ने में मदद करने के लिए स्तनपान यानी ब्रेस्ट फीडिंग सबसे अच्छा तरीक़ा है. मां के दूध में ऐसे कई उपयोगी तत्व होते हैं, जो शिशु की इम्यूनिटी के लिए महत्वपूर्ण हैं, जैसे- प्रोटीन, वसा, शर्करा, एंटीबॉडी, प्रोबायोटिक्स. ये महत्वपूर्ण तत्व मां के एंटीबॉडी से शिशु को ब्रेस्ट फीडिंग द्वारा मिलता है.

टीकाकरण- मानक दिशानिर्देशों के अनुसार टीकाकरण यानी वैक्सीन देने से बच्चे को कई गंभीर बीमारियों से प्रभावी और सुरक्षित ढंग से बचाया जा सकता है.

साफ़-सफ़ाई का ख़ास ख़्याल रखें. फ़र्श पर पडी वस्तुओं या चीज़ों को छूने से बचाने के लिए शिशु पर बराबर ध्यान देते रहना ज़रूरी है, क्योंकि वे ख़तरनाक संक्रमण प्रसारित कर सकते हैं. हाथों को बार-बार धोने की आदत डालें, ख़ासकर भोजन से पहले और बाद में.

Baby’s Immunity

भरपूर नींद शिशु की इम्यूनिटी को बढ़ाने में मदद करती है. अपर्याप्त नींद शरीर में साइटोकिन्स नामक प्रोटीन के उत्पादन करने की क्षमता को सीमित कर देती है, जो संक्रमण से लड़ने और सूजन को कम करने में मदद करती है. बच्चों को एक दिन में कम से कम 8-10 घंटे की नींद ज़रूर लेनी चाहिए.

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शिशु की इम्यूनिटी प्रणाली लगातार बदल रही है. यह बाहरी ट्रिगर्स के मुक़ाबले अनुकूल और मज़बूत है. खाने की आदतों से उन्हें प्राकृतिक सुरक्षा बढ़ाने और संक्रमण से लड़ने में सक्षम बनाने में मदद मिलती है. पोषण संबंधी कमियों से उनकी इम्यूनिटी की प्रतिक्रिया में परिवर्तन होता है, जिससे संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है. इसलिए संतुलित पोषण और सही आहार शिशु को संक्रमण से दूर रखने में मदद करते हैं.

नीचे कुछ पोषक तत्व दिए गए हैं, जो आपके शिशु की इम्यूनिटी को बढ़ाने में मदद करेंगे-
एस्कॉर्बिक एसिड के रूप में जाना जानेवाला विटामिन सी खट्टे फल, जामुन, आलू और मिर्च में पाया जाता है. यह टमाटर, मिर्च और ब्रोकोली सहित प्लांट स्रोतों में भी पाया जाता है. विटामिन सी एंटीबॉडी के गठन को उत्तेजित करके इम्यूनिटी सिस्टम को मज़बूत करता है.
विटामिन ई एक एंटीऑक्सिडेंट के रूप में काम करता है और इम्यूनिटी बढ़ाता है. फोर्टिफाइड अनाज, सूरजमुखी के बीज, बादाम, तेल (जैसे सूरजमुखी या कुसुम तेल), हेज़ल नट्स और पीनट बटर के साथ अपने शिशु के आहार में विटामिन ई जोड़ने से प्रतिरक्षा को बढ़ावा देने में मदद मिलती है.

Baby’s Immunity

ज़िंक प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावी ढंग से काम करने में सहायता करता है. यह घाव भरने में भी मदद करता है. शिशु के लिए ज़िंक के स्रोत मीट, पोल्ट्री, समुद्री भोजन, दूध, साबुत अनाज, बीज और नट्स हैं.
प्रोटीन बच्चों की इम्यूनिटी के निर्माण खंड हैं, विशेष रूप से इलाज के लिए. समुद्री भोजन, लीन मीट, पोल्ट्री, अंडे, बीन्स और मटर, सोया उत्पाद और अनसाल्टेड नट्स और बीज जैसे प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थों को जोड़ना इम्यूनिटी को बढ़ाने में मददगार होगा.
प्रोबायोटिक्स ऐसे जीवित सूक्ष्मजीव हैं, जो प्राकृतिक रूप से दही, किमची, सौकरकूट, मिसो जैसे खाद्य पदार्थों में पाए जाते हैं. इन सूक्ष्मजीवों को अच्छा या अनुकूल बैक्टीरिया के रूप में जाना जाता है, क्योंकि वे हानिकारक बैक्टीरिया को दूर रखते हैं और उन्हें आंत में बसने से रोकते हैं.

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विटामिन ए, डी, बी 6, बी 12, तांबा, फोलेट, सेलेनियम और आयरनसहित अन्य पोषक तत्व भी इम्यूनिटी प्रक्रिया को मज़बूत करते हैं और आपके शिशु को इम्यूनिटी को बढ़ाने में मदद करते हैं.
इम्यूनिटी शिशु की सेहत में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ये बचपन से लेकर बड़े होने तक शिशु को विकसित होने और बढ़ने में मदद करते हैं.
ध्यान रहे जन्म से उपरोक्त सभी बातों पर ध्यान दिया जाए, शिशु के सही विकास और सेहतमंद रहने में मदद मिलती है. साथ ही यह वर्तमान कोविड-19 के इस वातावरण में बेहद ज़रूरी भी हो जाता है. इसलिए शिशु की सही देखभाल के साथ-साथ उसकी इम्यूनिटी को भी बढ़ाते रहें.

– ऊषा गुप्ता

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Smart Tips To Protect Baby Infection

नई मांएं जहां अपने नन्हे शिशु को लेकर उत्साहित रहती हैं, वहीं शिशु की देखभाल को लेकर सचेत भी रहती हैं. आज जब कोरोना के समय संक्रमण यानी इन्फेक्शन में वृद्धि हो रही है, तो ऐसे में नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों को लेकर अधिक सावधानी बरतने की ज़रूरत है, जैसे- आसपास स्वच्छता रखना, शिशु के लिए इस्तेमाल होनेवाली चीज़ो को सही तरीक़े से धोना व साफ़ करना आदि.
शिशु की इम्यूनिटी जन्म के कुछ समय बाद तक इतनी विकसित नहीं हुई होती कि जिससे उसको इन्फेक्शन या एयरबोर्न डिज़ीज़ से लड़ने की ताकत हो, ऐसे में पैरेंट्स को ख़ास ध्यान रखना चाहिए की शिशु के आसपास का वातावरण सुरक्षित रहे.
जब शिशु चलने या खेलने योग्य हो जाता हैं, तो वह सतहों को छूता है और लगभग हर चीज़ को अपने मुंह में डालता हैं, जिससे उसको संक्रमण एवं रोगों का ख़तरा बढ़ जाता है. ऐसे में शिशु के लिए पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आर्ट्सना इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के चीफ एक्जीक्युटिव राजेश वोहरा ने कई उपयोगी उपाय बताएं. ऐसे ही कुछ सुझाव हैं, जो माता-पिता को अपने शिशु को स्वस्थ एवं सुरक्षित रखने मे मदद करेंगे.

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अपने हाथों और अपने शिशु के हाथों को नियमित रूप से धोना कीटाणुओं को फैलने से रोकने का सबसे अच्छा एवं सरल तरीक़ा है. इसलिए घर पर हर कोई अपने हाथों को निरंतर धोता और सैनिटाइज़ करता रहे, जैसे- शिशु को छूने से पहले, खाना बनाने या खिलाने से पहले, बाथरूम का उपयोग करने के बाद या डायपर बदलने के बाद, बाहर से आने के बाद, साथ खेलने के बाद या पालतू जानवरों की देखभाल करने के दौरान, किसी ऐसे व्यक्ति की देखभाल करना जो घर पर बीमार हो आदि.

Smart Tips To Protect Baby Infection

साबुन, हैंड सैनिटाइज़र और साफ़ तौलिए घर में हमेशा उपलब्ध रहें, इसका ध्यान रखें.
शिशु के हाथों को पोंछते समय, त्वचा पर किसी भी प्रकार की कठोरता से बचने के लिए हल्के कपड़े या नरम रुई का इस्तेमाल करें.
किचन एक ऐसी जगह है, जहां शिशु के खाने की बहुत सारी तैयारी होती है, इसलिए इसे साफ़ और अच्छी तरह से व्यवस्थित करना सबसे ज़रूरी है. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि किचन के शेल्फ, अन्य सतहों और फ़र्श को कीटाणुओं और इस तरह के संक्रमण से बचाने के लिए साबुन और पानी या डिसइंफेक्टेंट क्लीनर स्प्रे से अच्छी तरह से साफ़ रखें.
शिशु के साथ की दिनचर्या में व्यस्त होने के कारण पैरेंट्स अक्सर उनकी वस्तुओं को, जैसे- दूध की बोतल, टीथर, खिलौने, खाने के बर्तन इत्यादि सैनिटाइज़ करना भूल सकते हैं. ये चीज़ें शिशु के छोटे से वातावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उन्हें पूरी तरह से स्वच्छ एवं बैक्टीरियारहित रखना बहुत ज़रूरी है.

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इनमें से लगभग सभी उत्पादों का प्रयोग शिशु के लिए होता है. वह अक्सर खिलौने अपने मुंह में डालते हैं और अगर ये चीज़ें ठीक से साफ़ नहीं हो या कीटाणुरहित नहीं हो, तो वे बीमार हो सकते हैं. इसलिए माता-पिता को अपने शिशु को किसी भी माइक्रोबियल परिशोधन से बचाने के लिए शिशु को खिलानेवाली, जैसे- बोतल, चम्मच, बर्तन आदि को उपयोग के बाद अच्छी तरह से धोना और कीटाणुरहित करना चाहिए.
पैरेंट्स को शिशु के सामान, फलों और सब्ज़ियों को स्वच्छ रखने के लिए विशेष रूप से बनाया गया डिसइन्फेक्टेंट ही उपयोग करना चाहिए. आजकल इन सब को मात्र पानी से धोना काफ़ी नहीं है. बैक्टीरिया और कीटाणुओं को ख़त्म करने के लिए एक अच्छे डिसइंफेक्टेंट का इस्तेमाल करना चाहिए. इसे ख़रीदते समय अभिभावकों को एक ऐसे डिसइंफेक्टेंट का चुनाव करना चाहिए, जो विशेष रूप से शिशु की वस्तुओं के लिए बनाया गया हो और एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुणों से युक्त हो.

Smart Tips To Protect Baby Infection

शिशु अपना समय रात में ज़्यादातर बिस्तर या पालने में बिताता है, इसलिए उनके आसपास की जगह को साफ़ एवं सुरक्षित रखना ज़रूरी है. सप्ताह में दो बार क्रिब शीट्स को बदलना एवं गर्म पानी में धोना चाहिए.
बच्चों के कपड़ो को विशेष रूप से शिशु के कपड़ों के लिए बनाए गए लांड्री डिटर्जेंट से ही धोएं. खेलते समय बच्चे विभिन्न वस्तुओं और सतहों को छूते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके कपड़े पर धूल और कीटाणु को जम जाते हैं, इसलिए केवल शिशु के कपड़ों के लिए बनाए गए लांड्री डिटर्जेंट का ही उपयोग करें, तो बेहतर है. ये ज़िद्दी दाग़ व गंध हटाने में कारगर होते हैं. इसके साथ-साथ डिटर्जेंट में कम-से-कम 99 % रोगाणुओं का नाश करने की क्षमता होनी चाहिए, इसका भी ख़्याल रखें. शिशु की त्वचा कोमल होती है, इसलिए शिशु के कपड़ों को डर्मटोलॉजिकली टेस्टेड अथवा केमिकलरहित डिटर्जेंट से ही धोना चाहिए.
जिस कमरे में शिशु सोता है या खेलता है, वहां हवा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए घर में एक ह्यूमिडिफायर रखें. सूखी हवा शिशु के स्वास्थ्य के लिए समस्याओं का प्रमुख कारण है. नाक के संक्रमण से लेकर गले में खराश तक, जो वे आपको बता भी नहीं सकते हैं और रूखी त्वचा और फटे होंठों से लेकर कुछ मामलों में सांस लेने तक की समस्या उत्पन्न हो सकती है. इन चिंताओं का निवारण करने के लिए, वातावरण में सही ह्यूमिडिटी होना बहुत आवश्यक है, क्योंकि यह नाक और रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट के प्राकृतिक सुरक्षात्मक कार्यों को बनाए रखने में मदद करता है. एक ह्यूमिडिफ़ायर हवा में बहुत आवश्यक नमी जोड़ता है. शिशु को कम्फर्ट देता है. उनकी हेल्थ के अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है, जिससे शिशु को सांस लेने और आराम से सोने में मदद मिलती है. साथ ही उसे खांसी और सर्दी जैसे लक्षणों से भी राहत मिलती है.

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अपने शिशु की सुरक्षा एवं स्वास्थय के लिए अपने घर में धूल को जमा न होने दें. धूल और एलर्जी एक साथ आती है, इसलिए घर को यथासंभव साफ़ रखना महत्वपूर्ण है. एक लंबा डस्टर आपको उन कोनों में जाने में सहायता करेगा, जहां रोज़ सफ़ाई नहीं हो पाती है, जबकि एक छोटा कपड़ा सतहों को धूलमुक्त रखने के लिए एकदम सही है.
कमरे को अच्छी तरह से हवादार रखने से वायु की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिल सकती है, जो विशेष रूप से शिशु सके लिए महत्वपूर्ण है. आपका घर साफ़ ज़रूर होगा, पर हवा तब तक ताज़ा महसूस नहीं हो सकती है, जब तक कि बाहर से सुबह की हवा घर में ना आए. ऐसे में कमरे की खिड़कियां खोलने से सुबह की हवा व धूप कमरे में एक अच्छा वातावरण देती है, जो शिशु के लिए लाभदायक है.

– ऊषा गुप्ता

अधिकतर बच्चों को होनेवाली संक्रामक बीमारियों में से काली खांसी एक गंभीर बीमारी है. इसका छोटे बच्चों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. इस बीमारी की शुरुआत सामान्य खांसी से होती है. साथ ही अक्सर बच्चे की नाक बहती रहती है. इस बीमारी में खांसी एकाएक आरंभ हो जाती है और बच्चे को उठाते ही खांसी बढ़ जाती है. बच्चे को सांस लेने में कठिनाई होती है. ये सभी काली खांसी के लक्षण है. इसमें खांसी के साथ प्रायः उल्टी भी होती है. इसके अलावा निमोनिया और कान का संक्रमण इस बीमारी में ख़ास परेशान करता है. काली खांसी को कुक्कुर खांसी भी कहते हैं.

Child Care Tips

 

* तीन-चार बादाम रातभर पानी में भिगोकर रख दें. सुबह बादाम के छिलके निकालकर इसमें लहसुन की एक कली व थोड़ा-सा मिश्री मिलाकर बारीक़ पीस लें. अब इसकी छोटी-छोटी गोलियां बना लें. बच्चे को ये गोलियां खिलाएं. इससे काली खांसी में काफ़ी राहत मिलेगी.

* पांच-छह लहसुन की कलियों को छीलकर बारीक़ काटकर पानी में अच्छी तरह से उबाल लें. इस पानी से भाप लें. प्रतिदिन इसी तरह से करते रहने से सात-आठ दिन में काली खांसी जड़ से दूर हो जाएगी.

* शुद्ध किया हुआ नारियल का तेल दिनभर में तीन बार आधा टीस्पून पिलाने से भी काली खांसी में शीघ्र लाभ होता है.

* अनार का छिलका सुखाकर उसे पीसकर चूर्ण बनाएं. 2 ग्राम चूर्ण को पानी में उबालकर छान लें. ठंडा होने पर 1-2 चम्मच की मात्रा में दिन में तीन-चार बार पिलाएं. इससे तीन दिन में ही काली खांसी दूर हो जाएगी.

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* केले के सूखे पत्तों को जलाकर भस्म (राख) बनाएं. इस भस्म को शहद में मिलाकर बच्चे को 125 मि.ग्रा. की मात्रा में दिन में तीन-चार बार चटाएं.

* बच्चे को अधिक से अधिक तरल पदार्थ दें, जैसे- जूस, सूप, पानी आदि. भोजन भी हल्का ही दें.

* 250 मि.ग्रा. भुनी हुई फिटकरी सममात्रा में शक्कर में मिलाकर दिन में दो बार देने से काली खांसी दूर हो जाती है.

* मुलहठी और अनार का छिलका जलाकर कपड़छान चूर्ण बनाएं. इस चूर्ण को आधा टीस्पून की मात्रा में शहद में मिलाकर बच्चे को चटाएं. इससे राहत मिलेगी और कुछ दिनों में काली खांसी दूर हो जाएगी.

* तुलसी के पत्ते और कालीमिर्च समभाग में लेकर उसे पीस लें. फिर मूंग के बराबर गोलियां बनाकर 1-1 गोली चार बार बच्चे को दे. दें. कुछ दिनों में काली खांसी अवश्य दूर हो जाएगी.

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* अनार के छिलके, कालीमिर्च, सेंधा नमक- सभी को सममात्रा में लेकर महीन पीसकर पाउडर बना लें. आधा टीस्पून पान के रस के साथ मिलाकर बच्चे को तीन बार चटाएं. यदि आप चाहें, तो पान के रस की बजाय तुलसी का रस भी ले सकते हैं.

* एक छोटा चम्मच मां का दूध या बकरी का दूध लेकर उसमें आधा चम्मच शहद मिलाकर दिन में चार-पांच बार बच्चे को चटाएं. इससे भयंकर से भयंकर खांसी भी दूर हो जाएगी. यह काली खांसी का अचूक इलाज है.

* लौंग को आग में भूनकर और बारीक़ चूर्ण बनाकर शहद के साथ दिन में तीन बार चटाने से काली खांसी से राहत मिलती है.

सुपर टिप

चने के दाल के बराबर पिसी हुई फिटकरी पानी में मिलाकर दिन में दो बार पिलाने से काली खांसी में लाभ होता है.

– मूरत पन्नालाल गुप्ता

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आज हम जिस युग में और जिस तरह की लाइफस्टाइल जी रहे हैं, उसमें हर चीज़ में केमिकल्स (Chemicals) की भरमार है. ऐसे में बेहद मुश्किल है ख़ुद को और अपने बच्चों (Children) को भी इनसे बचाना, लेकिन कुछ कोशिश करके केमिकल्स से बचा भी जा सकता है और उन्हें हेल्दी व सेफ भी रखा जा सकता है.

 How To Protect Your Children

केमिकल्स से बचने के लिए ज़रूरी नहीं कि हर चीज़ ऑर्गैनिक ही ख़रीदें: यह संभव भी नहीं कि हर चीज़ ऑर्गैनिक हो, लेकिन आप अपनी लाइफस्टाइल में थोड़ा-सा बदलाव करके केमिकल्स की चपेट से बच सकते हैं. अपने घर को व बच्चों को ज़हरीले तत्वों के संपर्क में आने से बचा सकते हैं.

नेचुरल हवा आने दें: खिड़की, दरवाज़ों से जितना संभव हो नेचुरल लाइट व हवा आने दें, ताकि अंदर मौजूद प्रदूषण भी बाहर निकल सके. क्रॉस वेंटिलेशन ज़रूरी है.

पर्सनल केयर व क्लीनिंग प्रोडक्ट्स के लेबल्स ज़रूर पढ़ें: ऐसे ब्रान्ड्स लें, जिनमें पैराबेन्स, ऑक्सिबेनज़ोन, पैथालेट्स न हों, क्योंकि ये केमिकल्स एंडोक्राइन सिस्टम में गड़बड़ी पैदा करते हैं. फ्रेग्रेंस फ्री प्रोडक्ट्स बेहतर होते हैं, लेकिन कुछ फ्रेग्रेंसवाले भी ऐसे होते हैं, जो ज़्यादा केमिकल्स यूज़ नहीं करते. एक उपाय यह भी है कि आप घर पर ही केमिकल फ्री सोल्यूशन बनाएं- विनेगर और पानी को समान मात्रा में मिलाएं, साथ ही थोड़ा-सा नींबू का रस भी मिक्स कर लें.

फुटवेयर को कमरे के अंदर न लाएं: आपको अंदाज़ा भी नहीं कि आपके जूते-चप्पल न जाने कितने तरह के ज़हरीले केमिकल्स अपने साथ लाते हैं. बेहतर होगा उन्हें घर या कमरे के बाहर ही रखें.

प्लास्टिक का इस्तेमाल सीमित कर दें: बच्चों को अक्सर आप खाना-पानी प्लास्टिक के टिफिन व बोतल में देती होंगी. इसके अलावा घर पर भी प्लास्टिक का इस्तेमाल होता ही होगा. बेहतर होगा प्लास्टिक की जगह स्टील या कांच का उपयोग बढ़ा दें. प्लास्टिक को माइक्रोवेव में गर्म न करें, न ही प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म खाना परोसें. इसके ज़रिए ज़हरीले केमिकल्स आसानी से शरीर में पहुंच जाते हैं.

खिलौनों को समय-समय पर क्लीन करें: खिलौनों को बच्चे मुंह में ले जाते हैं, कभी-कभी रबर के बने खिलौनों को चबाने लगते हैं, इसी तरह प्लास्टिक के खिलौने भी बच्चों के पास होते हैं. बेहतर होगा खिलौनों की क्वालिटी पर ध्यान दें, साथ ही उनकी साफ़-सफ़ाई पर भी. इनके ज़रिए धूल-मिट्टी व कई तरह के केमिकल्स बच्चों के शरीर में पहुंच सकते हैं.

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बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखें: बच्चे खेल-खेल में क्लीनिंग प्रोडक्ट्स व सोल्यूशन्स की तरफ़ चले जाते हैं और यदि आपका ध्यान न हो, तो वो उन्हें मुंह में भी ले जाते हैं. बच्चों की इस तरह की गतिविधियों पर ध्यान दें और इन प्रोडक्ट्स को उनकी पहुंच से दूर रखें. इन प्रोडक्ट्स को ऊपर शेल्व्स में रखें, जहां तक बच्चे पहुंच न पाएं. बच्चों के सामने भी इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल न करें. लापरवाही में इन्हें खुला न छोड़ दें.

हाइजीन की आदत डलवाएं: बच्चों को साबुन से हाथ धोने का महत्व व कब-कब हाथ धोना ज़रूरी हैं, यह भी बताएं. इससे वो बहुत-से हानिकारक केमिकल्स से बच सकते हैं.

किस तरह के केमिकल्स किस रूप में हो सकते हैं?

लेड: बच्चों का पालना, घर का पेंट, कुर्सी, पेंटेड टॉयज़ आदि यदि बहुत पुराने हो चुके हैं या पहले के बने व पेंट किए हुए हैं, तो बहुत हद तक संभव है कि इनमें लेड की मौजूदगी हो. इनका इस्तेमाल न करें.

रैट पॉयज़न, पेस्टिसाइड्स, स्प्रेज़: इन सबको खुले में न छोड़ें, जो बच्चों के हाथ लग जाएं. न ही इस तरह के ज़हरीले स्प्रेज़ का इस्तेमाल मैट, मैट्रेस, चादर आदि पर करें, जिससे बच्चे प्रभावित हो सकें.

बीपीए: यह एक तरह का इंडस्ट्रियल केमिकल होता है, जो कुछ तरह के प्लास्टिक्स बनाने के काम आता है. इस तरह से यह बच्चों तक पहुंच सकता है.

मेडिसिन्स: किसी भी तरह की मेडिसिन्स बच्चों की पहुंच से दूर रखें. ग़लती से वो उन्हें खा सकते हैं. मेडिसिन्स में भी कई तरह के ख़तरनाक केमिकल्स होते हैं, इसलिए कोशिश करें कि बच्चों को इनसे दूर रखें.

अल्कोहल: बच्चों के सामने पार्टीज़ में या कैज़ुअली भी अल्कोहल का सेवन अवॉइड करें और घर पर अल्कोहल रखते हों, तो कोशिश करें कि बच्चों की पहुंच से दूर हों.

फूड एक्स्ट्रैक्ट्स: वेनीला या आल्मंड जैसे फूड एक्स्ट्रैक्ट्स में अल्कोहल हो सकता है, जो बच्चों के लिए काफ़ी हानिकारक हो सकता है. इसी तरह से माउथवॉश भी बच्चों को यूज़ न करने दें, क्योंकि इनमें भी अल्कोहल हो सकता है.

कॉस्मैटिक्स और टॉयलेट्रीज़: बच्चे कॉस्मैटिक्स के प्रति बहुत आकर्षित होते हैं, लेकिन आपकी लिपस्टिक से लेकर परफ्यूम, हेयर डाय, आईलाइनर, नेलपॉलिश आदि तक केमिकल्स से भरपूर होते हैं. इसी तरह से शू पॉलिश, टॉयलेट क्लीनर्स, फर्नीचर पॉलिश, डिश क्लीनर्स, फेस वॉश, सोप्स, हैंड सैनिटाइज़र्स आदि में भी काफ़ी केमिकल्स होते हैं, इन्हें बच्चों की पहुंच से दूर ही रखें. ये उनकी सेहत को प्रभावित कर सकते हैं.

अनहेल्दी खाना व केमिकल से पके फल/सब्ज़ियां: कैन्ड फूड, प्रिज़र्वेटिव्स से भरपूर फूड, एरिएटेड ड्रिंक्स, नकली पके फल-सब्ज़ियों से भी बच्चों को बचाना ज़रूरी है. बेहतर होगा फल-सब्ज़ियों को अच्छी तरह से धोकर और यदि संभव हो, तो छीलकर खाएं, इससे केमिकल का असर कम होगा.

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कैसे बचाव करें?

* घर को पूरी तरह से केमिकल फ्री करना तो संभव नहीं, लेकिन कुछ प्रयास कर सकते हैं.

* कभी भी वॉशिंग पाउडर, सोडा, फिनाइल जैसी चीज़ें खाली फूड कंटेनर्स में भरकर न रखें. बच्चा ग़लती से इन्हें खाने की चीज़ समझ सकता है.

* बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखें. बहुत ज़्यादा मोबाइल/कंप्यूटर आदि पर न खेलने दें, उनमें से भी केमिकल व हानिकारक वेव्स व रेज़ निकलती हैं.

* हेल्दी ईटिंग हैबिट्स और हाइजीन की आदत डालें. टॉयलेट यूज़ करने के बाद, खाना खाने से पहले, खाना खाने के बाद, बाहर से खेलकर आने पर, पब्लिक प्लेस से आने के बाद, डोर के हैंडल्स, लैचेस आदि यूज़ करने के बाद साबुन से हाथ धोने की आदत डलवाएं. रिसर्च बताते हैं कि इन हेल्दी हैबिट्स से बच्चे फ्लू, डायरिया, टायफॉइड व अन्य कई तरह की बीमारियों से काफ़ी हद तक बच सकते हैं व स्कूल में भी उनकी अनुपस्थिति में कमी आने लगती है.

* खिलौने ख़रीदते व़क्त ध्यान रखें कि अच्छे ब्रांड के ही लें. सस्ते प्लास्टिक से बने खिलौने अवॉइड करें. बच्चे इन्हें मुंह में डालते हैं, जिससे उन्हें नुक़सान हो सकता है.

– ब्रह्मानंद शर्मा

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide

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बच्चे माता-पिता ही नहीं, पूरे परिवार की जान होते हैं. इसीलिए उनके बीमार होने से पूरा परिवार परेशान हो उठता है. आजकल बच्चों के पेट में परजीवी कीड़े पड़ने की बात अक्सर सुनने को मिलती है. ये कीड़े बच्चे के आहार से पौष्टिक तत्व ही नहीं, उनका ख़ून भी चूसते हैं और उन्हें बीमार कर देते हैं. इसीलिए विश्‍व स्वास्थ्य संगठन इन कीड़ों के संक्रमण को रोकने के लिए डी-वॉर्मिंग को प्रमोट कर रही है.

अगर आपका बच्चा अक्सर पेटदर्द, मितली, एनस में खुजली की शिकायत करता है, रात में उठकर चिल्लाता है, खाने-पीने के बावजूद कमज़ोर है या उसे बार-बार खांसी आती है, तो एक बार उसे डॉक्टर को दिखाकर जांच कराएं. हो सकता है उसके पेट में परजीवी कीड़े हों.

क्यों होते हैं पेट में कीड़े?
बच्चों के पेट और अंतड़ियों में कई तरह के विकार होते हैं. कृमि रोग भी पेट या अंतड़ियों में पैदा होता है और पूरे शरीर में फैल जाता है. दुनिया भर में अब तक कृमि की क़रीब 20 प्रजातियों का पता चल चुका है. दरअसल, कृमि पेट में हवा की मात्रा बढ़ा देते हैं. इससे दिल की धड़कन बढ़ जाती है. कई बार बच्चे को उबकाई आती है और उसकी भोजन में दिलचस्पी ख़त्म हो जाती है. कृमि अंतड़ियों में घाव पैदा कर देते हैं, जिससे बच्चा बेचैन होकर रोने लगता है. बच्चे को चक्कर आने लगते हैं और प्यास अधिक लगती है.

कारण
मांस, मछली, गुड़, दही, सिरका, दूषित भोजन, मिट्टी खाने से या गंदे कपड़े पहनने व शरीर की उचित सफ़ाई न करने से पेट में किड़े हो जाते हैं. यह गंदगी के कारण होनेवाला रोग है. मक्खियां इस रोग की वाहक होती हैं. वे पहले गंदी चीज़ों पर फिर भोजन पर बैठती हैं, जिससे भोजन गंदा और दूषित हो जाता है. दूषित जल से इसका प्रसार तेज़ी से होता है. बच्चे की आंत से कृमि के अंडे शौच के साथ बाहर निकलकर फैल जाते हैं. ये लार्वा बड़े होकर ज़मीन या घास पर पैदल चलनेवाले के पांव में चिपक जाते हैं और उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं.

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नई डी-वॉर्मिंग योजना की शुरुआत
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय डी-वॉर्मिंग पहल की शुरुआत की. इंसान और पशुओं को राउंड वॉर्म, हुक वॉर्म, फ्लूक वॉर्म और टेप वॉर्म जैसे परजीवी कीड़ों से बचाने के लिए एक एंटी हेलमिंटिक दवा दी जाती है. बच्चों का उपचार मेबेनडेजॉल और एलबेनडेजॉल जैसी दवाओं से कर सकते हैं. एलबेनडेजॉल की एक गोली से बच्चे को इन परजीवी कीड़ों से बचाया जा सकता है. यह दवा संक्रमित और गैर संक्रमित बच्चों के लिए सुरक्षित है. सबसे बड़ी बात यह दवा स्वादिष्ट भी है.

डब्ल्यूएचओ की सलाह
डी-वॉर्मिंग उपचार कठिन और महंगा नहीं है. इसका प्रचार स्कूलों के ज़रिए आसानी से किया जा सकता है. इस उपचार से बच्चों को बहुत फ़ायदा होता है. पूरी दुनिया में अभी भी हज़ारों, लाखों बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें कृमि संक्रमण का जोख़िम है. इनके उपचार के लिए स्कूल आधारित डी-वॉर्मिंग उपचार की नीति बनाई जानी चाहिए, ताकि स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास में तेज़ी आ सके. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन ने परजीवी कीड़ों के संक्रमण को कम करने के लिए महामारी क्षेत्रों में रहनेवाले स्कूली बच्चों के इलाज के लिए इस दवा को देने की सिफ़ारिश की है. ज़्यादातर कीड़े मुंह से लेनेवाली दवा से ही मर जाते हैं. यह दवा सस्ती है और उसकी एक ही डोज़ दी जाती है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़, दुनिया में संक्रमित स्कूली बच्चों की संख्या 60 करोड़ है. अगर डी-वॉर्मिंग का विस्तार किया गया, तो बच्चों की सेहत ठीक रहेगी और वे सक्रिय रहेंगे.

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पेट के कीड़े दूर करने के टिप्स
* पेट में कीड़े होने पर सात दिन तक पपीते के 11-12 बीज रोज़ खाली पेट खाने चाहिए. छोटे बच्चों को कम बीज दें. गर्भवती महिलाओ को पपीते के बीज नहीं खिलाने चाहिए, इसका उन पर प्रतिकूल असर हो सकता है.
* दो चम्मच अनार का जूस पीने से पेट में पनप रहे कीड़े मर जाते हैं.
* करेले के पत्तों का जूस भी पेट के कीड़े मारने के लिए बेहतर दवा है. करेले का जूस निकालकर उसे गुनगुने पानी के साथ पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं. करेले का स्वाद कड़वा होने से अक्सर बच्चे इसे पीना पसंद नहीं करते.
* दस ग्राम नीम की पत्तियों का रस और दस ग्राम शहद लेकर दोनों को अच्छी तरह मिला लें. इस मिश्रण को दिन में तीन से चार बार पिलाएं. इसे पीने के बाद बच्चे के पेट के कीड़े मर जाएंगे और राहत महसूस होगी.
* अजवायन पाउडर व गुड़ को समान मात्रा में एक साथ मिलाकर उसकी एक-एक ग्राम की गोली बना लें. इसे एक साफ़ जार में भर के रख दें. तीन से पांच साल के बच्चे को रोज़ाना दिन में तीन बार एक-एक गोली खिलाएं. इससे पेट के कीड़े मर जाएंगे.
* एक चम्मच करेले का रस, एक चम्मच नीम की पत्तियों का रस, एक चम्मच पालक का रस और जरा-सा सेंधा नमक मिलाकर दो ख़ुराक बनाएं. सुबह-शाम भोजन के बाद इस रस का सेवन करने से कीड़े मरकर शौच के साथ बाहर निकल जाएंगे.

सरकार की पहल
देश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत स्कूलों में स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इसमें यह प्रावधान किया गया है कि साल में दो बार निर्धारित अवधि में राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के मुताबिक़ डी-वॉर्मिंग की जाएगी. बिहार में विश्‍व की सबसे बड़ी स्कूल आधारित डी-वॉर्मिंग पहल की शुरुआत की गई थी. दिल्ली सरकार भी इसी तरह का अभियान चला रही है. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, एक से 14 वर्ष के क़रीब 24 करोड़ बच्चे आंतों में पलनेवाले परजीवी कीड़ों से प्रभावित होने के ख़तरे में हैं. इस पहल के लिए ज़रूरी है कि इसके साथ स्वच्छता में सुधार किया जाए और सुरक्षित पेय जल को उपलब्ध कराया जाए, ताकि परजीवी कीड़ों का जोख़िम न्यूनतम हो सके. इसके लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय की सक्रिय भागीदारी और साझेदारी ज़रूरी है.

 

– श्रद्धा संगीता

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बच्चों के पेट से कीड़े हटाने के 5 घरेलू उपाय, देखें वीडियो: 

 

 

Home Remedies For Children's Common illnesses

जन्म के बाद से 5 वर्ष की उम्र बच्चे की परवरिश की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं. इस काल में शरीर में रक्त, मांस, सभी अवयव और मस्तिष्क आदि का विकास होता है. ऐसे समय में थोड़ी-सी लापरवाही या उनसे होने वाले रोग उनके शारीरिक या मानसिक विकास को रोक सकते हैं. इस उम्र में बच्चों को होने वाली छोटी-मोटी बीमारियों का घरेलू इलाज प्रस्तुत है.

नैपकिन रैश
प्रायः जन्म के बाद एक साल तक यह रोग पाया जाता है. मां के दूध में खराबी होने, टट्टी-पेशाब के बाद गुदा की उचित रूप से सफाई न करने या स्नान के बाद इस स्थान को अच्छी तरह न सुखाने से गुदा में फुंसियां निकल आती हैं. उनमें जलन व खुजली होती है और खुजलाते-खुजलाते उसमें घाव हो जाता है.
* लहसुन की 8-10 कलियों का रस निकाल कर 4 गुना जल में मिलाकर उससे रोगग्रस्त स्थान को धोएं.
* तुलसी के पत्तों का रस निकालकर या उसके पत्तों को पीसकर उसका लेप लगाने से नैपकिन रैश से राहत मिलती है.
* मक्खन में हल्दी मिलाकर उसका लेप लगाने से लाभ होता है.
* हरी दूब को अच्छी तरह पीस कर लेप लगाने से भी बच्चों को नैपकिन रैश से आराम मिलता है.

गैस
वायु के अवरोध से कभी-कभी बच्चे का पेट फूल जाता है. पेट में गुड़गुड़ आवाज होती है, दर्द होता है, कभी-कभी बच्चा तेज रोता है और बेचैन हो जाता है. ऐसे में निम्न नुस्ख़े कारगर सिद्ध होते हैं.
* एक चम्मच लहसुन के रस में आधा चम्मच घी मिलाकर पिलाएं. तुरंत गैस से राहत मिलेगी.
* सरसों भर सेंकी हुई हींग का चूर्ण घी में मिलाकर पिलाने से गैस से बच्चे को आराम मिलता है.
* जीरा या अजवायन को पीसकर पेट पर लेप करने से वायु का अवरोध दूर होता है और बच्चा राहत महसूस करता है.
* हींग को भूनकर उसे पानी में घिसकर नाभि के चारों ओर लेप करें. गैस का शमन होगा और बच्चा चैन की सांस लेगा.

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खांसी-जुकाम
बच्चों को अक्सर खांसी, जुकाम हो जाता है, इससे घबराएं नहीं. जिस कारण से यह रोग हुआ हो, उन खाद्य-पेयों से बच्चे को दूर रखें. गरम पानी पीने को दें. गर्म कपड़े पहनाकर रखें.
* आधा चम्मच तुलसी के रस में आधा चम्मच मधु मिलाकर दिन में तीन बार बच्चे को पिलाएं. इससे सर्दी-खांसी से तुरंत राहत मिलेगी.
* शिशु को खांसी-जुकाम हो तो थोड़ा-सा सरसों का तेल प्रतिदिन उसकी छाती पर मलें और गुदा में लगाएं, शीघ्र ही आराम होगा.
* थोड़ा-सा सोंठ का चूर्ण गुड़ व घी के साथ मिलाकर चटाने से बच्चे की खांसी-जुकाम ठीक होती है.
* आधा इंच अदरक व तेजपत्ता (1 ग्राम) को एक कप पानी में भिगोकर काढ़ा बनाएं. इसमें एक चम्मच मिश्री मिलाकर 1-1 चम्मच की मात्रा में तीन बार पिलाएं. खांसी-जुकाम दो दिन में ठीक हो जाएगा.

बुखार
बच्चे को हल्का बुखार होने पर निम्न नुस्ख़ों का प्रयोग करें. अवश्य लाभ होगा.
* कालीमिर्च का चूर्ण 125 मि.ग्रा. तुलसी के रस व शहद में मिलाकर दिन में तीन बार दें. बच्चे को बुखार से राहत मिलेगी.
* बुखार तेज हो तो प्याज को बारीक काटकर पेट व सिर पर रखें. बुखार कम होने लगेगा.
* बुखार में सिरदर्द हो तो गर्म जल या दूध में सोंठ का चूर्ण मिलाकर सिर पर लेप करें या जायफल पानी में पीसकर लगाएं.
* बुखार में पसीना अधिक हो, हाथ-पैरों में ठंड लगे तो सोंठ के चूर्ण को हल्के हाथों से लगाएं. लाभ होगा.

मतली
बच्चों की पाचन क्रिया ठीक न होने से कभी-कभी खट्टी, दुर्गंधयुक्त मतली आती है. दांत निकलते वक़्त भी मतली छूटती है.
* अदरक का रस एक चम्मच, नींबू का रस एक चम्मच और शहद एक चम्मच मिलाकर चटाएं.
* अजवायन और लौंग का चूर्ण 1-1 चुटकी लेकर शहद के साथ चटाएं.
* छोटी इलायची को भूनकर उसका कपड़छान चूर्ण बनाएं. चुटकी भर चूर्ण आधा चम्मच नींबू के रस में मिलाकर खिलाएं.
* हरी दूब का रस एक चम्मच लेकर सममात्रा में चावल के धोवन या मिश्री के साथ पिला दें.

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बच्चों की हिचकी
बच्चों को प्रायः हिचकी आती रहती है. वैसे यह लाभदायक है, क्योंकि यह शरीर के विकास की निशानी मानी जाती है. हिचकी से आंतें बढ़ती हैं और स्वस्थ रहती हैं. फिर भी यदि हिचकी बार-बार आती है और बच्चे को कष्ट होता हो तो निम्न नुस्खा प्रयोग करें.
* अदरक के रस में (4-5 बूंद) आधी चुटकी भर पीसी हुई सोंठ, काली मिर्च और दो बूंद नींबू का रस मिलाकर बच्चे को चटाएं. तुरंत
लाभ होगा.
* नारियल की जटा जलाकर उसकी थोड़ी-सी राख तीन चम्मच पानी में घोलकर और उसे छानकर बच्चे को पिलाने से हिचकी बंद हो
जाती है.

बच्चों में कब्ज़ की शिकायत
माता के अनुचित आहार-विहार के कारण उसका दूध दूषित हो जाता है, जिसकी वजह से बच्चे की पाचन शक्ति खराब होकर उसे वायु विकार हो जाता है और मल का सूख जाना, मल त्याग का अभाव, पेट में दर्द, गुड़गुड़ाहट, उल्टी आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं और बच्चा रोते-रोते बेहाल हो जाता है.
* नीम के तेल का फाहा गुदा मार्ग में लगाने से कब्ज दूर होता है.
* रात को बीज निकाला हुआ छुहारा पानी में भिगो दें. सुबह उसे हाथ से मसलकर निचोड़ लें और छुहारे के गूदे को फेंक दें. छुहारे के इस पानी को बच्चे को आवश्यकतानुसार 3-4 बार पिलाएं. इससे कब्ज की शिकायत दूर होगी.
* बड़ी हरड़ को पानी के साथ घिसकर उसमें मूंग के दाने के बराबर काला नमक मिलाएं. इसे कुछ गुनगुना गर्म करके आवश्यकतानुसार दिन में 2-3 बार दें. अवश्य लाभ होगा.

मुंह में छाले
बच्चों के लिए यह रोग भी बहुत कष्टदायक होता है. मुख में तथा जीभ पर लाल-लाल छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं. मुंह से लार टपकना, मुंह में पीड़ा व जलन आदि लक्षण मिलते हैं.
* सुहागे की खील को बारीक पीसकर शहद या ग्लिसरीन में मिलाकर छालों पर लगाने से शीघ्र लाभ होता है.
* पीपल की छाल तथा पीपल के पत्तों को पीसकर छालों पर लगाने से छाले नष्ट हो जाते हैं.
* आंवलों का रस निकालकर छालों पर मुलायम हाथों से लगाएं और राल बहने दें. तीन बार यह प्रयोग करने से छाले ठीक हो जाते हैं.

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नींद में डरना
आमाशय का दूषित प्रभाव मस्तिष्क में पहुंच जाने से बच्चा सोते समय नींद में डरावने सपने देखकर डरने लगता है और नींद से जाग उठता है. वह जोर-जोर से रोने लगता है. नींद में उसकी सांस घुटने लगती है और बच्चा चीख मारकर उठ बैठता है.
* रात को सोने से दो घंटा पहले बच्चे को खिला दिया करें, ताकि खाना भलीभांति पच जाए.
* सर्दी के मौसम में एक से दो ग्राम सौंफ पानी में उबालकर उसे छान लें. इसे रात को सोने से पहले बच्चे को पिला दें. इससे नींद में डरने की शिकायत दूर होगी.
* गर्मी के मौसम में छोटी इलायची का एक ग्राम अर्क सौंफ के उबले हुए पानी के साथ पिलाएं. नींद में डरने की आदत छूट जाएगी.

– रीटा गुप्ता

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Health Tips For Cough in Babies

जाड़े के मौसम अथवा बदलते मौसम के कारण अक्सर बच्चों को खांसी की शिकायत हो जाती है. सर्दी-जुकाम, ठंडा वातावरण भी खासी के प्रमुख कारणों में से एक है. धूल भरे वातावरण में रहना, गंदी जगह और भीड़वाले इलाके, औद्योगिक क्षेत्र, धुओं की तरह अन्य प्रदूषणों के कारण भी खांसी के जन्मदाता हैं. खांसी से बचने के लिए उपरोक्त कारणों से बचने की भरसक कोशिश करनी चाहिए. ठंडी के दिनों में गर्म कपड़ों का प्रयोग करना चाहिए. बच्चे और बूढ़े सर्दी से अधिक प्रभावित होते हैं. अतः इनका विशेष ध्यान रखना चाहिए. खांसी होने पर निम्न घरेलू उपाय करें.

* एक चम्मच तुलसी का रस, एक चम्मच अदरक का रस और एक चम्मच शहद मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से कफ तथा खांसी से राहत मिलती है.
* अंजीर खाने से छाती में जमा बलगम निकल जाता है और खांसी से छुटकारा मिलता है.
* बड़ी इलायची का चूर्ण दो-दो ग्राम दिन में तीन बार पानी के साथ लेने से सभी प्रकार की खांसी से आराम मिलता है.
* काली खांसी होने पर कपूर की धूनी सूंघने से लाभ होता है.
* खांसी को कम करने के लिए मिश्री के साथ अदरक का एक छोटा-सा टुकड़ा मुंह में रखकर चबाइए. इससे खांसी से शीघ्र आराम मिलेगा.
* अदरक का रस शहद के साथ रात को सोते समय चाटें. इसके बाद पानी न पीएं. इससे खांसी में राहत पहुंचेगी.

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* कालीमिर्च तथा मिश्री या मुलहठी को मुख में रखकर चूसें. इससे सूखी खांसी में आराम मिलता है.
* तवे पर फिटकरी भून लें और उसका चूर्ण बनाकर मिश्री या शहद के साथ सेवन करें. सूखी खांसी से राहत मिलेगी.
* एक चम्मच सोंठ का चूर्ण (भूना हुआ), थोड़ा-सा गुड़ और एक चुटकी अजवाइन इन तीनों को एक साथ मिलाकर खाएं और ऊपर से गर्म दूध पीकर कम्बल ओढ़कर सो जाएं. खांसी से छुटकारा मिलेगा.
* काली खांसी को खत्म करने के लिए काले बांस को जलाकर राख बना लें. इसे शहद के साथ मिलाकर चाटें.
* एक तोला मुलहठी, चौथाई तोला काली मिर्च, आधा तोला सोंठ, आधा तोला अदरक- इन सबको बारीक पीसकर छान लें और दो तोले गुड़ में मिलाकर बेर के बराबर गोलियां बना लें. 1-1 गोली सुबह-शाम गर्म पानी के साथ सेवन करें. इससे काली खांसी खत्म हो जाएगी.
* बादाम की 5 गिरी, 5 मुनक्का और 5 काली मिर्च- इन्हें मिश्री के साथ पीसकर गोली बना लें. चार-चार घंटे पर एक गोली चूसें. इससे खांसी दूर हो जाएगी.
* खांसी में थोड़े-से नमक में बराबर मात्रा में हल्दी मिलाकर फांक लें और ऊपर से एक कप गुनगुना दूध पी लें.
* चाय के पानी में चुटकीभर नमक मिलाकर सोते समय गरारे करने से भी खांसी में लाभ होता है.
* खांसी आने पर अरवी की सब्जी खाएं. इससे खांसी तुरंत ठीक हो जाएगी.
* अकरकरा और गुड़ की गोली बनाकर चूसने से खांसी तुरंत ठीक हो जाती है.

– भावना वर्मा

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Yelling On Your Child Can Make Him/Her Fall Sick

अगर पैरेंट्स चाहते हैं कि बच्चे की सेहत दुरुस्त रहे, तो उसे डांटें कतई मत. अगर आप बच्चे को डांटेंगे, तो उसकी सेहत ख़राब हो जाएगी और बड़ा होने पर भी वह बीमार रहेगा. यानी बच्चे को तंदुरुस्त देखने के अभिलाषी माता-पिता को उसके साथ बहुत अच्छा व्यवहार करना होगा. जब पैरेंट्स बच्चे के साथ हमेशा अच्छी तरह पेश आएंगे और उसके साथ मधुर संबंध कायम करेंगे, तो यक़ीन मानिए, बच्चा ख़ुश और तंदुरुस्त होगा.

बच्चों का स्वास्थ्य हर पैरेंट्स के लिए हमेशा से चिंता का विषय रहा है, इसीलिए हर कोई चाहता है और पूरी कोशिश करता है कि उसका बच्चा हरदम तंदुरुस्त रहे. इसके लिए बच्चे को खाने के लिए पौष्टिक भोजन और पीने के लिए टॉनिक दिया जाता है. लेकिन कभी-कभी बच्चा पौष्टिक भोजन और टॉनिक से भी स्वस्थ नहीं हो पाता. इससे अमूमन हर दंपति परेशान रहते हैं.

* बच्चों की सेहत से जुड़ी इस पहेली को सुलझाया है अमेरिका में हुए रिसर्च ने. अमेरिका के टेक्सास में बायलोर यूनिवर्सिटी में हुए रिसर्च में कहा गया है कि माता-पिता के व्यवहार का असर बच्चों की सेहत पर होता है. रिसर्च में शामिल लोगों ने कहा है कि अगर माता-पिता का व्यवहार बच्चे के साथ बहुत अच्छा है, तो बच्चा स्वस्थ रहता है और बड़ा होकर भी वह तंदुरुस्त ही रहता है.
* बायलोर यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर और रिसर्चर मैथ्यू एंडरसन ने कहा कि माता-पिता से बच्चों के अच्छे संबंध बच्चे के खाने, सोने और उसके दैनिक गतिविधि को प्रेरित करने के लिए ज़रूरी हो सकते हैं. इसलिए शोध में शामिल लोगों को सलाह दी गई है कि अपने बच्चे के साथ हमेशा बहुत बढ़िया संबंध बनाकर रखें.
* इस अध्ययन में पता चला है कि अगर माता-पिता से बच्चे का संबंध तनावपूर्ण अथवा अपमानजनक हैं, तो इसका प्रतिकूल असर बच्चे की खाने-पीने की आदतों पर पड़ता है और बच्चे का भोजन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता.
* यहीं से बच्चे की सेहत ख़राब होनी शुरू हो जाती है. ऐसे में बच्चे पौष्टिक आहार लेने की बजाय ज़्यादा शुगर या ज़्यादा ऑयली डिश खाने लगते हैं और धीरे-धीरे अनहाइजेनिक फूड खाने की उनकी आदत पड़ जाती है.

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* ज़्यादा शुगर या तेल खानेवाले बच्चों की आदत ही ख़राब हो जाती है. इसके चलते उनकी रोज़मर्रा की दूसरी गतिविधियां भी अनियमित हो जाती हैं.
* बच्चों में स्वस्थ जीवनशैली और सामाजिक, भावनात्मक विकास का होना उसकी लंबी आयु के लिए बहुत ज़रूरी है.
* आर्थिक रूप से कमज़ोर घरों में माता-पिता बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर पाते. माता-पिता और बच्चे के बीच इस तरह के व्यवहार का असर बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ता है.
* अंततः इसका असर बच्चे की बढ़ती उम्र के साथ उसके सामाजिक-आर्थिक स्तर पर दिखता है और बच्चा बीमार और नकारात्मक प्रवृत्ति का हो जाता है.
* इसी तरह कम शिक्षित और कमज़ोर आर्थिक स्थितिवाले माता-पिता बच्चों को धमकी देने या ज़बरदस्ती आज्ञा मनवाने की बजाय रचनात्मक बातचीत की सहायता लेते हैं, इससे उनके रिश्तों में गर्माहट बढ़ती है.
* अच्छे घर में और अच्छे माता-पिता के बच्चे बड़े होने का असर उसके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद होता है.
* रिसर्च में यह भी कहा गया है कि अगर पैरेंट्स का अपने बच्चे से संबंध अच्छा नहीं है, तो इसका असर बच्चे की सेहत पर पड़ता है. इतना ही नहीं, ऐसे माहौल में पलनेवाले बच्चे का स्वास्थ्य बड़े होने पर भी ठीक नहीं रहता है.

– अटलजी

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बच्चे का अचानक या अकारण रोना पैरेंट्स या परिवार के लिए बेहद चिन्ता का विषय बन जाता है. कभी-कभी तो कारण समझ में नहीं आता कि आख़िर बच्चा रो क्यों रहा है? बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. इसी कारण उन्हें बीमारियां जल्दी घेरती हैं. ऐसे में पैरेंट्स का चिन्तित होना स्वाभाविक है. यदि घर में कोई बड़ा या बुज़ुर्ग है, तो सलाह मिल जाती है, अन्यथा करें भी तो क्या? उन्हें तो खांसी-ज़ुकाम, उल्टी, दस्त, कब्ज़, गैस जैसी तकलीफ़ या दांत निकलने के दौरान होनेवाली परेशानियों के लिए भी डॉक्टर की सलाह लेनी ही पड़ेगी. वैसे ऐसे छोटे-मोटे रोगों के लिए कुछ एक घरेलू नुस्ख़े अपनाएं जा सकते हैं.

 

* बदन पर छोटी-छोटी फुंसियां हो जाएं, तो चंदन का लेप लगाने से आराम आ जाता है.
* खांसी होने पर एक चम्मच तुलसी रस, एक चम्मच अदरक का रस और एक चम्मच शहद मिलाकर दिन में तीन-चार बार चटाने से लाभ होगा.
* अंजीर चूसने से छाती में जमा बलगम साफ़ हो जाता है.
* हल्दी, गुड़ व घी का मिश्रण चटाने से भी खांसी से राहत मिलती है.
* सोते समय अजवाइन का तेल बनाकर (सरसों के तेल में अजवाइन पकाकर छान लें) छाती व गले पर लगाएं. ठंड के कारण हुई खांसी में लाभ होगा. इसी प्रकार गाय का घी भी लगाया जा सकता है.
* काली खांसी को खत्म करने के लिए बांस को जलाकर राख बना लें और शहद मिलाकर चटाएं, लाभ होगा.
* नवजात शिशु को शहद चटाने से जल्दी ठंड नहीं लगती है.
* बच्चे के आस-पास कुचली हुई प्याज़ की पोटली रख देने से भी सर्दी का प्रभाव जल्दी नहीं पड़ता.
* रात को सोते समय तुलसी का रस उसके नाक, कान और माथे पर मलें. तुलसी के रस का सेवन सर्दी से बचाव का अच्छा साधन है. इसमें शहद मिला कर भी चटाया जा सकता है.
* जायफल को पत्थर पर घिस कर चटाना भी सर्दी का अच्छा उपाय है.
* दांत निकलते समय बच्चों को काफ़ी तकलीफ़ होती है. वे बेवजह ही रोते दिखाई देते हैं. ऐसे में दस्त, कब्ज़, बुखार जैसे विकार सामने आने लगते हैं. दांत निकलने के दौरान भुना सुहागा व मुलहठी पीसकर बच्चों के मसूड़ों पर मलने से दांत आसानी से निकल आते हैं.

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* शहद और सुहागा पाउडर मसूड़ों पर मलने से भी दांत बिना कष्ट के निकल आते हैं.
* कच्चे आंवले व कच्ची हल्दी का रस मसूड़ों पर मलने से दांत आसानी से निकल आते हैं.
* अनार के रस में तुलसी का रस मिलाकर बच्चों को चटाने से उनके दांत सुगमता से निकल आते हैं और दस्त नहीं लगती.
* सुहागे की खील 125 ग्राम की मात्रा में मां के दूध में मिलाकर बच्चे को सुबह-शाम चटाएं. साथ ही इसे शहद में मिलाकर मसूड़ों पर मलें. बच्चे को इस दौरान तकलीफ़ नहीं होने पाएगी.
* अक्सर दांत निकलने के दौरान मतली या उल्टी होने लगती है. ऐसे में अदरक, नींबू व शहद समान मात्रा में मिलाकर चटाएं, आराम आ जाएगा.
* इलायची के छिलकों को जलाकर उसकी भस्म चटाने से भी मतली में लाभ होता है.
* अजवाइन और लौंग पाउडर की एक-एक चुटकी लेकर शहद में मिलाकर चटाएं.
* बच्चे को नैपी रैश हो जाने पर मक्खन में हल्दी मिलाकर उसका लेप लगाने से लाभ होता है.
* बच्चे को गैस की तकलीफ़ हो तो एक चम्मच लहसुन के रस में आधा चम्मच घी मिलाकर पिलाएं, गैस से तुरन्त राहत मिलेगी.
* हींग को भूनकर उसमें पानी मिलाकर नाभि के चारों ओर लेप करें, आराम आ जाएगा.
* कच्ची हींग व थोड़ा-सा बेसन मिलाकर हल्के हाथ से पेट पर मलें, गैस निकल जाएगी.
* अजवाइन पाउडर का लेप करने से भी राहत मिलती है.
* यदि बच्चे को कब्ज़ की शिकायत हो, तो चार मुनक्का रात को पानी में भिगो दें. सुबह उसे मसल कर उसका रस छान कर बच्चे को पिलाएं.
* बड़ी हरड़ को पानी के साथ घिसें. इसमें ज़रा-सा काला नमक मिलाकर हल्का-सा गर्म करके दिन में 2-3 बार पिलाएं, अवश्य लाभ होगा.
* यदि बच्चे के पेट में कीड़े हो गए हों तो शहद में काले जीरे का चूर्ण मिलाकर चटाएं.
* सौंफ का कपड़छान चूर्ण 1/4 चम्मच भर शहद के साथ सुबह-शाम चटाएं.

* नवजात शिशुओं को सर्दी के प्रभाव से बचाए रखने के लिए आप उन्हें खूब हंसाएं या फिर रोते समय कुछ पल उन्हें रोने दें. सर्दी से बचाव का यह कुदरती प्राणायाम है. इससे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.

– प्रसून भार्गव
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Jab Bachcha Pahli Baar School Jaye

घर की सुरक्षित चारदीवारी के बाद बच्चे का पहला क़दम उठता है स्कूल की ओर. सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा स्कूल से डरे या घबराए नहीं. शर्म या संकोच के कारण औरों से पीछे न रह जाए, बल्कि आत्मविश्‍वास से भरा सफल व क़ामयाब विद्यार्थी बने. वैसे तो हर बच्चे का एक व्यक्तिगत स्वभाव होता है, किंतु कुछ कोशिश तो इस दिशा में पैरेंट्स भी कर ही सकते हैं, ताकि बच्चे का स्कूली जीवन आत्मविश्‍वास व उत्साह से परिपूर्ण रहे.
* छोटे बच्चे अक्सर स्कूल जाने के नाम से ही घबराने लगते हैं. उनकी इस घबराहट या डर को दूर करना पैरेंट्स का काम है.
* हो सकता है बच्चा आपसे देर तक दूर रहने का डर महसूस करता है, इसलिए उसे कितनी देर दूर रहना होगा यह कहने की बजाय उसके कार्यक्रम को वर्णित करें, जैसे- पहले प्रार्थना होगी, फिर टीचर कुछ खेल खेलाएंगी. फिर ये होगा, वो होगा और जैसे ही म्यूज़िक होगा, इसके बाद आप घर आ जाओगे.
* बच्चा स्कूल बस में अकेले जाने से डर सकता है. अतः उसे ड्राइवर या कंडक्टर के साथ बातचीत करना सिखाइए. बस स्टॉप पर साथ जानेवाले बच्चों से भी उसका परिचय कराइए.
* बच्चों के मन में टीचर के प्रति भी एक डर का एहसास होता है. उन्हें बताइए कि टीचर वहां आपकी मदद के लिए होते हैं.
* उन्हें समझाएं कि स्कूल में स़िर्फ पढ़ाई या खेल नहीं होते हैं, बल्कि बहुत-सी अन्य बातें भी सीखते हैं.
* ‘मैं खो जाऊंगा’, रास्ता भूल जाऊंगा’ जैसे ख़्याल भी उन्हें आते हैं, अतः रास्तों का परिचय, दाएं-बाएं की दिशा बताते हुए ये भी बताएं कि यदि रास्ता भूल जाएं तो क्या करें?
* नए बच्चों के लिए भी व अन्य बच्चों को भी उत्साहित करने के लिए तैयारी ऐसी हो कि बच्चे स्कूल खुलने का इंतज़ार करें.
* बच्चों के साथ स्कूल-स्कूल खेलें. कभी आप टीचर बनें, कभी उसे टीचर बनाएं, ताकि उसे थोड़ा-बहुत स्कूली माहौल समझ में आ सके व वो स्कूल का कार्य समझ सके.
* बच्चों को मानसिक रूप से स्कूल के लिए तैयार करें. उनकी दिनचर्या से हफ़्तेभर पहले से कुछ ऐसा शामिल करें, जिससे वो स्कूल जाने का इंतज़ार करने लगें.
* जूते, बैग, बॉटल जैसी चीज़ें स्कूल खुलने के दो दिन पहले ही ख़रीदें, ताकि इस्तेमाल के लिए वो उत्सुक होने लगें.
* टिफिन में क्या देना है पहले दिन से सोकर तैयारी कर लें. बेहतर होगा कि पूरे हफ़्ते का प्लान बना लें और बच्चे को बता दें टिफिन में क्या होगा? टिफिन की वेरायटी के बारे में सोचकर ही बच्चे उत्साहित हो जाते हैं.
* कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि स्कूल के पहले दिन स्कूल गेट पर बच्चे की फोटो खींचकर लगाने से बच्चा स्कूल को भी अपनी ख़ास जगह समझने लगता है.
* स्कूल में बच्चे का आत्मविश्‍वास व आत्मसम्मान बना रहे, इसके लिए कपड़ों व उसकी अन्य वस्तुओं का चुनाव भी महत्वपूर्ण है.

* बच्चों में भी संवेदना और दूसरों की नज़रों में प्रशंसा, सम्मान या तिरस्कार जैसे भावों को पहचानने की शक्ति होती है. किसी भी तरह के बुरे व्यवहार से उनकी भावनाएं आहत न हों, इसका ध्यान भी पैरेंट्स को रखना चाहिए.

बच्चे के विकास के लिए पैरेंट्स इन बातों पर भी ध्यान दें-

– बच्चों को कुछ समय अकेले भी खेलने दें. भले ही वो आधा घंटा तक बाल्टी में पानी भरता है और फेंकता है. डॉ. भट्टाचार्य के अनुसार, हर बच्चा स्वभाव से वैज्ञानिक होता है.
– बच्चों को बताएं कि ज़िंदगी में सीखना इतना आसान नहीं होता है, उन्हें जूझने दें. उनकी क्षमता विकसित होने दें. मदद के लिए तुरंत हाथ न बढ़ाएं. उन्हें बताएं कि ग़लतियां जीवन का एक हिस्सा हैं. ग़लतियों से इंसान सीखता है. स्कूल लर्निंग की जगह तो है, लेकिन वहां भी परेशानी महसूस हो सकती है.
– हॉबी विकसित करें. यदि विषय में रुचि है, तो लर्निंग आसान हो जाती है और कक्षा में वो अपनी कला के कारण ख़ास पहचान भी बना सकता है. मेंटल गेम, मेमोरी, पज़ल, क्रॉसवर्ड जैसी मेंटल एक्सरसाइज़ मस्तिष्क को एक्टिव रखती हैं.
– विभिन्न प्रकार की चीज़ों में रुचि उत्पन्न करने के लिए हर दिन कुछ अलग अवसर दीजिए, जैसे- एक दिन कलरिंग, दूसरे दिन क्राफ्ट, पिक्चर कटिंग आदि.
– बच्चों की कल्पनाशक्ति को उभारने के लिए भी पैरेंट्स को शुरू से ही कोशिश करनी चाहिए. छोटे बच्चों को खिलौना दिखाकर छुपा दें, फिर उसे सोचने दें. छुपाई हुई जगह से निकालकर दिखाएं, फिर छिपा दें. दो मिनट बाद बच्चा ढूंढ़ने की कोशिश में लग जाएगा. तरह-तरह की चीज़ें इकट्ठा करना, उन्हें मैच करना आदि बातों से बच्चे की कल्पनाशक्ति व रचनात्मकता दोनों ही बढ़ती है.
– बच्चों को हर समय स्पर्धा करना न सिखाएं, बल्कि लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना सिखाएं. स्कूल मात्र प्रतियोगिता का मैदान नहीं है, बल्कि जीवन के हर पहलू को विकसित करने की पाठशाला है. लक्ष्य तक पहुंचने का ज़रिया है. वैसे भी हर बच्चा अपने आप में अलग है, तो उसके लक्ष्य भी अलग होंगे. क़ामयाबी की सीढ़ियां भी अलग होंगी.

– प्रसून भार्गव

 

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide 

 

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खेल-खेल में बच्चे कई बार अपनी जान से ही खेल जाते हैं. कभी शर्ट की बटन को चॉकलेट समझकर निगल लेते हैं, तो कभी फिनायल को जूस समझकर पीने लगते हैं. अगर आपका बच्चा भी ऐसी हरकत करे, तो घबराने की बजाय क्या करें?

 

बच्चे नादानी में कई बार ऐसी हरकत कर बैठते हैं, जो उनके लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकती है. कई बार तो उनकी जान पर भी बन आती है. ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? आइए, जानते हैं.

यदि नाक में कुछ फंस जाए
कई बार बच्चे खेलते-खेलते अपनी नाक में कोई छोटी-मोटी चीज़, जैसे- पेन कैप, मार्बल, थर्मोकॉल के छोटे बॉल आदि फंसा लेते हैं, जिन्हें हाथ से निकालना मुश्किल होता है.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* बच्चे को नाक की बजाय मुंह से सांस लेने की सलाह दें. नाक से सांस लेने पर फंसी हुई चीज़ और अंदर जा सकती है.
* नाक में फंसी हुई चीज़ को हेयर प्लकर से निकालने की कोशिश न करें, इससे फंसी हुई चीज़ गले में जा सकती है.
* स्वयं निकालने की बजाय इएनटी डॉक्टर से संपर्क करें.

यदि गले में कोई चीज़ फंस जाए
छोटे बच्चे कोई भी चीज़, जैसे- क्वॉइन, मार्बल, छोटे पत्थर, काग़ज़ के टुकड़े आदि उठाकर तुरंत मुंह में डाल लेते हैं, ऐसे में कई बार चीज़ें उनके गले में फंस जाती हैं.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* अपनी हथेली से बच्चे की पीठ ज़ोर-ज़ोर से थपथपाएं. ऐसा करने से कई बार धक्के की वजह से गले में फंसी हुई चीज़ बाहर निकल आती है.
* यदि स्थिति गंभीर लगे, तो बच्चे को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं.

यदि त्वचा पर ज्वलनशील बाम लग जाए
बड़ों को देखकर बच्चे भी बाम लगाने लगते हैं. कई बार वे पूरे शरीर व चेहरे पर बाम लगा लेते हैं. इससे उनकी त्वचा में जलन होने लगती है.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* सबसे पहले प्रभावित जगह को पानी से अच्छी तरह धोकर सूखे कपड़े से पोंछ दें. फिर कोल्ड क्रीम लगाएं. ऐसा करने से जलन से राहत मिलेगी.
* आप चाहें तो प्रभावित स्थान पर बर्फ भी लगा सकती हैं. इससे भी जलन कम होगी.

यदि ग्लू (गम) से उंगली चिपक जाए
यदि आप किसी चीज़ को चिपकाने के लिए ग्लू का इस्तेमाल कर रही हैं, तो इस्तेमाल के तुरंत बाद इसे बच्चों की पहुंच से दूर रख दें, वरना बच्चे इससे खेलने लगेंगे या ग्लू का इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे. इससे उनकी उंगलियां आपस में चिपक सकती हैं.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* चिपकी हुई उंगलियों के बीच में वेजीटेबल ऑयल या घी लगाकर थोड़ी देर के लिए छोड़ दें. जब ग्लू पिघलने लगे तो कपड़े से रगड़कर उंगलियों को धीरे-धीरे छुड़ाएं.
* आप एसीटोन या मेडिसिनल अल्कोहल का इस्तेमाल भी कर सकती है. हां, स्थिति ज़्यादा गंभीर लगे, तो बिना देर किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

यदि कोई जानवर काट ले
बच्चे कुत्ते, बिल्ली जैसे पालतू जानवरों के साथ खेलते-खेलते कई बार उनके मुंह में ख़ुद ही हाथ डाल देते हैं या कभी पालतू जानवर ही चिढ़कर बच्चों को काट लेते हैं.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* सबसे पहले काटी हुई जगह पर साबुन लगाकर पानी से लगातार 5 मिनट तक धोएं, फिर घाव पर एंटीसेप्टिक मेडिसिन लगाएं. इससे इंफेक्शन का ख़तरा कम हो जाता है.
* इसके तुरंत बाद बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएं और सही तरी़के से इलाज करवाएं, वरना आगे चलकर ये घाव गंभीर हो सकता है और तकलीफ़ बढ़ सकती है.

यदि बच्चा फिनायल पी ले
बेहतर होगा कि आप फिनायल, परफ्यूम आदि की बोतलें बच्चों की पहुंच से दूर रखें. ये रंगीन बोतलें और इनकी ख़ुशबू बच्चों को आकर्षित करती है, जिससे वे इन्हें पीने की कोशिश करते हैं.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* यदि बच्चा थोड़ा बड़ा है, तो उसे मुंह में पानी भरकर थूकने के लिए कहें. इससे कम से कम मुंह में लगा विषैला पदार्थ बाहर निकल जाएगा.
* इसके तुरंत बाद बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएं. साथ में उस विषैले पेय पदार्थ की बोतल भी ले जाएं. ऐसा करने से डॉक्टर को इलाज करने में आसानी होगी.

+ इन तरक़ीबों को अपनाकर आप कुछ समय के लिए बच्चे को ख़तरे से बचा सकती हैं, परंतु समस्या से पूरी तरह निपटने के लिए डॉक्टर के पास ज़रूर जाएं.
+ यदि कभी बच्चा ऐसी कोई हरकत कर बैठे, तो घबराएं नहीं, हिम्मत से काम लें, वरना आपके चेहरे पर डर देखकर बच्चा और डर जाएगा व स्थिति ज़्यादा गंभीर हो जाएगी.
– नीलम चौहान