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बच्चों के मानसिक विकास के लिए एक्सरसाइज़ ज़रुरी (Now Physical Exercise Can Develop Your Child’s Intellect)

Physical Exercise

अगर आपको लगता है कि बच्चे (Child) को पढ़ाई में अव्वल आने के लिए स़िर्फ किताबें रटवाना ज़रूरी है तो आप पूरी तरह ग़लत हैं. शैक्षिक प्रदर्शन और क्लास में बढ़िया ग्रेड्स लाने के लिए बच्चे की मानसिक क्षमता व बुद्धि सहित अन्य बहुत सी चीज़ें जिम्मेदार हैं. इसके लिए बच्चे की शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health) को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

शारीरिक सक्रियता और स्वास्थ्य व्यक्ति के सीखने की क्षमता को बढ़ाते हैं. नैशनल एकैडमी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, व्यायाम करने से बच्चे का स्वास्थ्य तो अच्छा रहता ही है, उसके सीखने की क्षमता और एकैडमिक परफॉर्मेंंस भी बेहतर होती है.

बच्चे के शैक्षिक योग्यता को प्रभावित करनेवाली चीज़ें

बच्चे की शिक्षा में आईक्यू लेवल के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यक्तिगत पहलू और आस-पास का माहौल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इन सभी चीज़ें का प्रभाव अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होता है. बच्चे की शिक्षा को प्रभावित करनेवाली ऐसी ही कुछ चीज़ें हैं-

* टीचर का सहयोग और पढ़ाने का तरीक़ा

* बच्चों के मानसिक  विकास के लिए एक्सरसाइज़ ज़रुरी मानसिक स्वास्थ्य

* दोस्तों का व्यवहार

* परिवार का एजुकेशनल बैकग्राउंड

* माता-पिता का सहयोग

* सामाजिक-आर्थिक तत्व

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एक्सरसाइज़ का पढ़ाई पर असर

बहुत से शोधों से यह सिद्ध हुआ है कि जो बच्चे रोज़ाना एक्सरसाइज़ करते हैं और शारीरिक रूप से ज़्यादा सक्रिय रहते हैं, उनमें ऐसा न करनेवाले बच्चों की तुलना में निम्न गुण पाए जाते हैं.

* वे ज़्यादा एकाग्र होते हैं.

* उनकी याद्दाश्त तेज़ होती हैं.

* उनकी कार्डियोवैस्कुलर फंक्शनिंग भी बेहतर होती है.

* फिटनेस लेवल अच्छी होती है.

* उनका मेटाबॉलिक फंक्शन बेहतर होता है.

* हड्डियां मज़बूत होती हैं.

* समस्या समाधान की क्षमता बेहतर होती है.

* एकैडमिक टेस्ट में बेहतर प्रदर्शन करते हैं.

* एकैडमिक परफॉर्मेंस भी धीरे-धीरे बेहतर होती जाती है.

* क्रिएटिव थिंकिंग और रिएक्शन टाइम भी अच्छी होती है.

* मूड सकारात्मक रहता है.

एक्सरसाइज़ का दिमाग़ पर असर

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया में हुए शोध के अनुसार, नियमित रूप से एरोबिक एक्सरसाइज़ करने से मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस एरिया की फंक्शनिंग बेहतर होती है. यह एरिया लर्निंग और वर्बल मेमोरी में मदद करता है, जबकि अन्य तरह के एक्सरसाइज़, जैसे- बैलेंस एक्सरसाइज़ेज़, मसल्स टोनिंग एक्सरसाइज़ेज़ और रेसिस्टेंस ट्रेनिंग मस्तिष्क को अपेक्षाकृत कम प्रभावित करते हैं. यहां तक कि जो लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करते हैं, उनका प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स और मेडिकल कोर्टेक्स भी स्वस्थ रहता है. ग़ौरतलब है कि मस्तिष्क का यह हिस्सा सोचने की क्षमता और याद्दाश्त को प्रभावित करता है.

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कितनी देर एक्सरसाइज़ करना चाहिए?

6 से 17 वर्ष की आयुवाले बच्चों को रोज़ाना 1 घंटे व 18 से 64 वर्ष से वयस्कों को आधे घंटे शारीरिक रूप से सक्रिय रहना चाहिए. ऐसा माना जाता है कि एक्सरसाइज़ करने से एक्स्ट्रा क्लास से ज़्यादा फ़ायदा मिलता है. एक्सपर्ट्स के अनुसार, फिज़िकल एजुकेशन की क्लास सुबह के समय रखना ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है. बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय बनाने के लिए स्कूल को फिज़िकल एजुकेशन क्लासेज़, स्कूल स्पोर्ट्स इत्यादि को बढ़ावा देना चाहिए

क्या कॉलेज स्टूडेंट्स को एक्सरसाइज़ से फ़ायदा मिलता है?

एक्सरसाइज़ से स़िर्फ स्कूल जानेवाले बच्चों को ही नहीं, कॉलेज स्टूडेंट को भी मदद मिल सकती है. हालांकि भारत के ज़्यादातर कॉलेज़ व यूनिवर्सिटी में फिज़िकल एजुकेशन पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होता, लेकिन कुछ कॉलेज इस दिशा में काम कर रहे हैं.

– शिल्पी शर्मा

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बच्चों में एकाग्रता बढ़ाने के लिए स्मार्ट एक्टिविटीज़ (Smart Activities To Improve Child Concentration)

 

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बच्चों की मासूमियत और चंचलता हम सभी को लुभाती है, लेकिन ऐसा भी न हो कि बच्चों की चंचलता इतनी भी न बढ़ जाए कि पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान ही न दे पाएं. सभी पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई में सबसे आगे रहे, जिसके लिए बहुत ज़रूरी है कि बच्चा पूरी तरह एकाग्र होकर पढ़ाई करे, क्योंकि एकाग्र हुए बिना अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता. सफलता के लिए एकाग्रता आवश्यक है.

 

आजकल के टेक्नोसेवी युग में टीवी, मोबाइल, वीडियो गेम्स जैसे डिवाइस आ गए हैं, जो बच्चे को विचलित करने के लिए काफ़ी हैं. इससे उनका ध्यान एक जगह नहीं टिक पाता. कई बार बच्चे के तंग करने पर हम ही उन्हें ये चीज़ें पकड़ा देते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि बच्चे में ना तो धैर्य है और ना ही एकाग्र होने की क्षमता.
जब बच्चा 1 से 3 साल का होता है, तो उसके कौशल सीमित होते हैं. उसे दिखनेवाली हर चीज़ नई प्रतीत होती है. इससे उसका ध्यान एक साथ अनेक चीज़ों पर होता है. वह इन चीज़ों और आसपास के वातावरण को समझने की कोशिश करता रहता है. इसलिए उसका ध्यान अलग-अलग चीज़ों में बंटने लगता है.
3 से 7 साल के बच्चे में एकाग्रता बढ़ने लगती है. वह अपनी पसंद की चीज़ों पर ध्यान लगाना और नापसंद चीज़ों को इग्नोर करना सीख जाता है. यही वह समय है, जब नीचे बताई गई कुछ एक्टिविटीज़ करके खेल-खेल में ही बच्चे की समझने की क्षमता बढ़ाकर उसकी एकाग्रता बढ़ाई जा सकती है.

1. मेमरी गेम
* इस गेम को खेलने के लिए बच्चों को चीज़ों, फलों, सब्ज़ियों आदि के नाम पता होने चाहिए, तभी वे यह गेम खेल सकते हैं. इस गेम के लिए टेबल पर कुछ चीज़ें- पेन, पेंसिल, कॉपी, बुक या अन्य कोई भी चीज़ रखें. बच्चे को 30 सेकंड तक ध्यान से देखने के लिए कहें. बाद में वे चीज़ें हटा दें या उन्हें कपड़े से ढंक दें. अब बच्चे से उन चीज़ों के नाम पूछें.
* यदि ज़्यादा बच्चे खेल रहे हों, तो जो बच्चा पूरे नाम या ज़्यादा से ज़्यादा नाम बताए, उसे इनाम दें.
* इसमें बदल-बदलकर कभी फल, सब्ज़ियां, खिलौनेवाले पक्षी, जानवर या घर की चीज़ें रखी जा सकती हैं, ताकि खेल में नवीनता रहे.
फ़ायदा- इस गेम को खेलने से बच्चे में याद रखने और फोकस करने की क्षमता बढ़ती है.

2. मिसिंग लेटर/वर्ड
* बच्चे के सामने चित्रवाली या स्पेलिंगवाली क़िताब रखें. क़िताब में उसे कोई 1 चित्र या स्पेलिंग या कोई लेटर अथवा वर्ड ढूंढ़ने के लिए कहें. 30 सेकंड या चाहें, तो उससे कम समय दें.
* इसे दूसरी तरह से भी खेला जा सकता है. कुछ चीज़ों की स्पेलिंग लिखें और जान-बूझकर एक शब्द ना लिखें. बच्चे से वही मिसिंग वर्ड लिखने के लिए कहें. हां, समय अवश्य निर्धारित कर दें.
* आजकल मार्केट में ऐसे गेम्स की क़िताबें उपलब्ध हैं. इस एक्टिविटी को घर बैठे ही आसानी से करवाया जा सकता है.
फ़ायदा- मिसिंग चीज़ें/लेटर ढूंढ़ने के लिए, कम समय देने से बच्चे ज़्यादा ध्यान से ढूंढ़ते हैं. इससे उनका कान्संट्रेशन बढ़ता है.

3. अंताक्षरी
* गानों की अंताक्षरी तो सभी खेलते हैं, बच्चों के लिए अलग तरह की खेलें. अंताक्षरी किसी जानवर के नाम से शुरू करें. नाम के अंतिम अक्षर को बोलें. दूसरा बच्चा उस अक्षर से नाम कहे, फिर उसके अंतिम अक्षर को चुनकर तीसरा बच्चा कोई नाम कहे, जैसे-डॉग, गोरिल्ला, लोमड़ी आदि.
* बच्चों को अंताक्षरी का अभ्यास होने के बाद, अंताक्षरी का टाइप चुनें. कभी जानवरों की, कभी पक्षियों की, कभी फल-सब्ज़ियों, कभी लोगों के नामों की अंताक्षरी खेलें. बच्चे बहुत एंजॉय करेंगे.
फ़ायदा- इस गेम में बच्चों को बहुत मज़ा आता है. चूंकि यह बहुत तेज़ी से फटाफट खेला जाता है, अतः यह बच्चे के मस्तिष्क को उत्तेजित और प्रोत्साहित करने का कार्य करता है.

4. मिसिंग नंबर्स
* इस गेम में नंबर्स (संख्याएं) बोले जाते हैं, जिसमें जान-बूझकर एक-दो नंबर छोड़ दिए जाते हैं. इसे ही बच्चे को पहचानना है, जैसे- 3, 4, 5, 7, 9. इसमें 6 और 8 मिसिंग है. यदि बच्चा नहीं पहचान पाता, तो फिर से शुरू करें.
* अभ्यास होने पर 2 संख्याओं 12 से 19 तक मिसिंग नंबर्स खेलें. इसके बाद पहाड़ों (टेबल्स) 2, 4, 6, 8 से अभ्यास करवाएं.
फ़ायदा- इससे सोचने, याद रखने और फोकस करने की शक्ति बढ़ती है. बच्चों को तेज़ी से पहाड़े सिखाने का यह बहुत अच्छा तरीक़ा है.

5. मिसिंग थिंग्स
* बच्चे को कमरे की चीज़ें दिखाकर याद रखने के लिए कहें और उसे बाहर भेज दें. अब 1-2 चीज़ें हटा दें और उसे पहचानने के लिए कहें.
फ़ायदा- इस गेम को खेलने से, घर में या बच्चे के स्कूल बैग में एक भी चीज़ मिसिंग हो जाए, तो बच्चे को पता चल जाता है. इससे याद रखने की क्षमता बढ़ती है.

6. टंग ट्विस्टर
* पहले सरल टंग ट्विस्टर, ‘कच्चा पापड़, पक्का पापड़’ बोलने को कहें. जब बच्चे की ज़ुबान पलटने लगे, तो कठिन, ‘चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चांदनी रात में चांदी की चम्मच से चटनी चटाई.’ इसी तरह अंग्रेज़ी टंग ट्विस्टर की प्रैक्टिस करवाएं ‘she sells sea shells on the sea shore’. इस तरह के बहुत से टंग ट्विस्टर आपको मिल जाएंगे.
फ़ायदा- यह बहुत तेज़ी से कहना होता है. ग़लतियां होंगी, तो भी आपका बच्चा आनंद उठाएगा और सही कहने की पूरी कोशिश से ध्यान लगाएगा. इससे एकाग्रता के
साथ-साथ उसका शब्द भंडार भी बढ़ेगा.

7. अपोज़िट्स (विरुद्धार्थी)
* इस गेम में बच्चे को अपोज़िट्स कहना होता है, जैसे- मोटा-पतला, हैपी-सैड आदि. इसे खेलने के लिए आपके बच्चे को अपोज़िट्स पहले से पता होने चाहिए.
फ़ायदा- इससे एकाग्रता बढ़ने के साथ-साथ शब्दों की समझ भी बढ़ती है.

8. माइंड-बॉडी समन्वय
* बच्चों द्वारा खेला जानेवाला गेम ‘स्टेच्यू और ओवर’ बेहद फ़ायदेमंद है, जिसमें ‘स्टेच्यू’ में 1 ही स्थिति में लंबे समय तक बिना
हिले-डुले खड़ा होना होता है.
फ़ायदा- इस गेम में बॉडी और माइंड यानी शरीर और मस्तिष्क दोनों को एक साथ काम करना होता है. इससे ‘सेल्फ कंट्रोल’ बढ़ता है.
यह एक्टिविटी बॉडी और ब्रेन के बीच के नर्व (नाड़ी) संबंधों को मज़बूत करती है. इससे फोकस बढ़ता है.

9. कॉइन गेम
* इस गेम में अलग-अलग सिक्कों का ढेर बनाएं- 1, 2 या 5 के सिक्के, जिसमें से 5 सिक्के अलग निकालकर एक निश्‍चित क्रम में (1,2,5) एक के ऊपर एक रखें. बच्चे से इसी क्रम में सिक्के रखने को कहें. आप देखेंगे कि अभ्यास के बाद बहुत कम समय में वह गेम पूरा कर लेगा.
फ़ायदा- इससे बच्चे की सोचने की शक्ति, याद रखने की क्षमता और ध्यान (अटेंशन) बढ़ता है. बच्चा जितना ज़्यादा खेलेगा, उसकी स्मरणशक्ति और फोकस उतना ही बढ़ेगा.

10. उल्टा-पुल्टा
* इस खेल में बच्चे को हफ़्ते के दिन, साल के महीने, नंबर्स, इंद्रधनुष के रंग उल्टे-पुल्टे बताएं. अब उन्हें सही क्रम में बताने को कहें.
फ़ायदा- इससे याद रखने की क्षमता व एकाग्रता बढ़ती है.

11. पहेलियां (पज़ल्स)
* शुरुआत सरल पहेली से करें. बच्चे को पहेली में कोई संकेत दें और पहचानने के लिए कहें, जैसे- मैं स़फेद हूं, तुम मुझे पी सकते हो (दूध). इसी तरह सरल से कठिन पहेलियां बूझने दें.
फ़ायदा- इससे बच्चे की क्रिएटिविटी व एकाग्रता बढ़ेगी.

12. आवाज़ पहचानना
* यह छोटे बच्चों के लिए बेहतर है. बच्चे को आंख बंद करने के लिए कहें. अब पक्षियों या जानवरों की आवाज़ निकालें. इस तरह के कैसेट भी मार्केट में मिलते हैं. अब बच्चे को आवाज़ पहचानने के लिए कहें.
फ़ायदा- चूंकि इस गेम में आंखें बंद होती हैं और ध्यान पूरी तरह से आवाज़ पर होता है, तो इससे एकाग्रता बढ़ती है.

ध्यान दें…

* बच्चों से एक्टिविटीज़ करवाते समय आसपास शोर ना हो, न तो म्यूज़िक बज रहा हो, ना ही टेलीविज़न चल रहा हो.
* हमेशा शुरुआत छोटे व सरल गेम से करें, धीरे-धीरे उसे लंबा और कठिन बनाते जाएं.
* अकेले बच्चे से एक्टिविटीज़ करवाने की बजाय 1-2 बच्चे और बुला लें. आपस में स्पर्धा से बच्चे और अच्छा करने की कोशिश करेंगे और दोस्तों के होने से एंजॉय भी करेंगे.

– डॉ. सुषमा श्रीराव
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बच्चों को ज़रूर सिखाएं ये बातें (8 Things Parents Must Teach Their Children)

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बच्चों की अच्छी परवरिश में पैरेंट्स की भूमिका अहम् होती है. कहते हैं बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जिस तरह से ढाला जाए, वे उसी तरह से ढल जाते हैं. इसलिए उन्हें बचपन से ही ऐसी छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण बातों के बारे में बताना बेहद ज़रूरी है, जो उनके स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक हो.

 

हाइजीन की बातें: बच्चों को बचपन से ही बेसिक हाइजीन की बातें बताना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अच्छी पर्सनल हाइजीन की आदतें न केवल बच्चों को स्वस्थ रखती हैं, बल्कि उन्हें संक्रामक बीमारियों (जैसे- हैजा, डायरिया, टायफॉइड आदि) से भी बचाती हैं और बच्चों में स्वस्थ शरीर और स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण करने में मदद करती हैं. बच्चों को यह समझाना बहुत ज़रूरी है कि गंदगी से होनेवाली बीमारियों से उनकी ज़िंदगी को ख़तरा हो सकता है, इसलिए उन्हें ओरल हाइजीन, फुट एंड हैंड हाइजीन, स्किन एंड हेयर केयर, टॉयलेट हाइजीन और होम हाइजीन के बारे में बताएं.

टाइम मैनेजमेंट: इस टेकनीक को सिखाकर पैरेंट्स अपने बच्चे को स्मार्ट बना सकते हैं. पढ़ाई के बढ़ते प्रेशर को देखते हुए अब तो अनेक स्कूलों में भी बच्चों को टाइम मैनेजमेंट टेकनीक सिखाई जाने लगी है. टाइम मैनेजमेंट को सीखने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह टेकनीक उनके स्कूल लाइफ में ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी बहुत फ़ायदेमंद है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि उन्हें बचपन से ही टाइम मैनेज करना सिखाएं, जैसे-
* सबसे पहले महत्वपूर्ण काम/होमवर्क की लिस्ट बनाएं.
* किस तरह से काम/होमवर्क को कम समय में निपटाएं?
* अन्य क्लासेस/गतिविधियों के लिए समय निकालें.
* किस तरह से सेल्फ डिसिप्लिन में रहें?
* सोने, खाने-पीने और खेलने का समय तय करें.

मनी मैनेजमेंट: बच्चों को मनी मैनेजमेंट के बारे में समझाना बेहद ज़रूरी है, जिससे उन्हें बचपन से ही सेविंग व फ़िज़ूलख़र्ची का अंतर समझ में आ सके और वे भविष्य में फ़िज़ूलख़र्च करने से बचें. बचपन से ही उन्हें सिखाएं कि कहां और कैसे बचत और ख़र्च करना है?, उन्हें शॉर्ट टर्म इंवेस्टमेंट करना सिखाएं. इसी तरह से उनमें धीरे-धीरे कंप्यूटर, लैपटॉप आदि ख़रीदने के लिए लॉन्ग टर्म इंवेस्टमेंट करने की आदत भी डालें.

पीयर प्रेशर हैंडल करना: मनोचिकित्सकों का मानना है कि बच्चों में बचपन से ही पीयर प्रेशर का असर दिखना शुरू हो जाता है. आमतौर पर 11-15 साल तक के बच्चों पर दोस्तों का दबाव अधिक होता है, पर पैरेंट्स इस प्रेशर को समझ नहीं पाते. आज के बदलते माहौल में पीयर प्रेशर का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि इस स्थिति में-
* बच्चों का मार्गदर्शन करें, जिससे उन्हें मानसिक सपोर्ट मिलेगा.
* उनमें सकारात्मक सोच विकसित करें.
* बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करें, ताकि अपनी हर बात वे आपके साथ शेयर करें.
* ग़लती होने पर प्यार से समझाएं.
* यदि बच्चा प्रेशर हैंडल नहीं कर पा रहा है या बच्चे के व्यवहार में किसी तरह का बदलाव महसूस हो, तो पैरेंट्स तुरंत उसके टीचर्स व दोस्तों से मिलें और विस्तार से जानकारी हासिल करें.

रिलेशनशिप मैनेजमेंट: बच्चों के भावनात्मक व सामाजिक विकास में रिलेशनशिप मैनेजमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए पैरेंट्स होने के नाते आपकी ज़िम्मेदारी बनती है कि बच्चे में पॉज़िटिव रिलेशनशिप (रिलेशनशिप मैनेजमेंट) का विकास करने की शुरुआत
करें, जैसे-
* उन्हें अपने फ्रेंड्स और फैमिली मेंबर्स से परिचित कराएं.
* समय-समय पर बच्चों को उनसे मिलवाएं या फोन पर बातचीत कराएं.
* उनके साथ ज़्यादा टाइम बिताने से बच्चों की उनके साथ बॉन्डिंग मज़बूत होगी और रिलेशनशिप भी स्ट्रॉन्ग होगी.
* बच्चों में कम्यूनिकेशन स्किल डेवलप करें, ताकि वे पूरे आत्मविश्‍वास के साथ लोगों से बातचीत कर सकें.
* बच्चों को सोशल एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करें, जिससे वे अधिक से अधिक लोगों के संपर्क में आएं.
* बच्चों को चाइल्ड फ्रेंडली माहौल प्रदान करें, जिससे वे बेहिचक ‘हां’ या ‘ना’ बोल सकें.

सेल्फ कंट्रोल: यह ऐसा टास्क है, जिसकी ट्रेनिंग बचपन से ही ज़रूरी है. सेल्फ कंट्रोल के ज़रिए बच्चे वर्तमान में ही नहीं, भविष्य में भी अनेक पर्सनल व प्रोफेशनल समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. सेल्फ कंट्रोल सिखाने के लिए-
* बच्चों को प्रोत्साहित करनेवाली गतिविधियों में डालें, जिससे उनमें सेल्फ कंट्रोल का निर्माण हो, जैसे- स्पोर्ट्स, म्यूज़िक सुनना आदि.
* उन्हें घर की छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियां सौंपें, जैसे- अपने कमरे की सफ़ाई करना, किड्स पार्टी का होस्ट बनाना, पेट्स की देखभाल की ज़िम्मेदारी आदि.
* उनकी सीमाएं तय करें. यदि बच्चा पैरेंट्स या अपने भाई-बहन के साथ बदतमीज़ी से बात करता है, तो तुरंत टोकें.
* उन्हें अनुशासन में रहना सिखाएं.

सिविक सेंस: बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की होती है. अच्छा
नागरिक बनने के लिए उन्हें बचपन से ही सिविक सेंस सिखाना बेहद ज़रूरी है. सिविक सेंस यानी समाज के प्रति अपने दायित्वों व कर्तव्य के बारे में उन्हें बताएं,
जैसे- घर में नहीं, बाहर भी स्वच्छता का ध्यान रखें, रोड सेफ्टी नियमों का पालन करना, सार्वजनिक जगहों पर धैर्य रखना, लोगों को
आदर-सम्मान देना, महिलाओं की इज़्ज़त करना, देशभक्ति की भावना आदि. पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को अलग-अलग तरीक़ों से सिविक सेंस सिखाएं.

सोशल मीडिया अलर्ट: टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव से बच्चे भी अछूते नहीं हैं, इसलिए पैरेंटस की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों की सोशल मीडिया से जुड़ी एक्टिविटीज़ पर पैनी नज़र रखें. वे क्या ‘पोस्ट’ कर रहे हैं और किससे बातें कर रहे हैं? सोशल साइट्स पर कोई उन्हें परेशान तो नहीं कर रहा? हाल ही में हुए एक अध्ययन से यह साबित हुआ है कि जो बच्चे सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताते हैं, वे न केवल अपने समय का नुक़सान करते हैं, बल्कि इसका उनके मूड पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा स्कूल के टीचर्स का मानना है कि सोशल मीडिया पर वर्तनी और व्याकरण के कोई नियम नहीं होते. सोशल मीडिया पर चैट करते हुए ग़लत वर्तनी और व्याकरण के ग़लत नियमों का असर उनके स्कूली लेखन पर भी पड़ रहा है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि-
* लैपटॉप, स्मार्टफोन और टैबलेट का इस्तेमाल निर्धारित समय सीमा तक ही करने दें.
* स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप को पासवर्ड प्रोटेक्टेड रखें.
* थोड़े-थोड़े समय बाद पासवर्ड बदलते रहें.
* नया पासवर्ड़ बच्चों को न बताएं. आपकी अनुमति के बिना वे इन्हें नहीं खोल पाएंगे.
* फिज़िकल एक्टिविटी के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें.

– पूनम नागेंद्र शर्मा

 

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