Child Psychologist Tips

 

 

असामान्यता अथवा एब्नॉर्मिलिटी किसी भी बच्चे के विकास के स्तर की अक्षमता को कहते हैं. जिन बच्चों में सामान्य से कम बौद्विक क्षमता होती है, जिनके शरीर में कोई विकार होता है तथा जो अपनी मूल आवश्यकताओं को ठीक से नहीं समझ पाते, उन्हें बोलचाल की भाषा में एब्नॉर्मल बच्चा कहते हैं. यह असामान्यता शारीरिक और मानसिक दोनों हो सकती है. कुछ बच्चों में तो यह असामान्यता जन्म के समय ही पकड़ में आ जाती है तथा कुछ बच्चों में जन्म के कुछ समय बाद उसकी विकास की अवस्था में धीरे-धीरे दिखने लगती है.

 

कैसे जानें कि बच्चा सामान्य नहीं है?
– यदि बच्चा शारीरिक रूप से ठीक है, किन्तु उसके विकास के लक्षण अन्य बच्चों से धीरे-धीरे प्रकट हो रहे हैं तो माता-पिता को सतर्क हो जाना चाहिए, मसलन- सालभर का होने पर भी बच्चा खड़ा न हो पाए, बोल न पाए अथवा आवाज़ होने पर उस तरफ़ सिर घुमा कर न देखे इत्यादि.
– थोड़ा और बड़ा होने पर इनमें कुछ और लक्षण उभर कर आने लगते हैं, जैसे- बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा करना, अपने आपको चोट पहुंचाना तथा व्यक्तित्व का जल्दी-जल्दी परिवर्तित होना.

क्या कारण होते हैं बच्चे की असामान्यता के?
इस संबध में तमाम मेडिकल रिसर्च के बावजूद अभी तक एक तिहाई कारणों का पता नहीं चल पाया है. अनुवांशिक, हाइडोसिफेलस, हाइपरथॉयराइड़िज़्मसमस्या, गर्भावस्था के दौरान मां द्वारा शराब, धूम्रपान, नशा करना व दिमाग़ी बीमारियों की दवाइयां लेना इत्यादि अनेक कारणों से बच्चे में मानसिक अथवा शारीरिक विकार की संभावना बढ़ जाती है. मां के ब्लड प्रेशर बढ़ने अथवा उसे ब्लड पॉयजनिंग से इऩ्फेक्शन होने से भी गर्भस्थ शिशु का नर्वस सिस्टम क्षतिग्रस्त हो जाता है, जिससे उसमें कई कमियां आ जाती हैं.

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इनकी परवरिश कैसे करें?
* कुछ तरह की एबनॉर्मिलिटी का तो कुछ हद तक इलाज संभव है, जैसे- हायपर थॉयराइड़िज़्म की वजह से उपजी असामान्यता अथवा दिमाग़ में पानी भर जाने की वजह से बच्चे में विकार आ जाना.
* किन्तु अधिकतर केसेस में किसी भी इलाज से किसी भी बच्चे की बौद्विक अक्षमता को बदलना मुश्किल साबित होता है.
* ऐसे बच्चों के माता-पिता को बहुत त्याग, धैर्य और सावधानी से उनकी देखभाल करनी पड़ती है.
* सबसे पहले अभिभावकों को यह पता होना बेहद ज़रूरी है कि उनके बच्चे की असामान्यता किस श्रेणी में आती है. थोड़ी आसान और सुधारने योग्य है अथवा जटिल है. उसी के अनुसार उन्हें अपने बच्चे की देखभाल करनी चाहिए.
* यूं तो मनोविज्ञान भी कहता है कि माता-पिता अपने उसी बच्चे को अधिक प्यार करते हैं, जो सबसे कमज़ोर होता है. (यह कमज़ोरी शारीरिक, मानसिक अथवा भौतिक भी हो सकती है).
* किन्तु मनोवैज्ञानिक डॉ. प्रभात सिठोले के अनुसार, असामान्य बच्चे को स़िर्फ प्यार द्वारा ही हैंडल नहीं किया जा सकता है. कई बार बच्चों के साथ कठोर अनुशासन की भी ज़रूरत पड़ती है.
* केवल प्यार और सहानुभूति से बच्चे अपनी दिनचर्या की सामान्य बातें सीखने की कोशिश भी छोड़ देते हैं.
* असामान्य बच्चों की देखभाल में माता-पिता तो पूरी तरह से समर्पित होते ही हैं, साथ ही घर के अन्य सदस्यों को भी उनके सहयोग देना चाहिए.
* बाहर से आनेवाले परिचितों अथवा रिश्तेदारों को भी ऐसे बच्चे की नज़ाकत को समझते हुए ही उनके साथ व्यवहार करना चाहिए.
* बच्चे को बेचारा समझकर अधिक सहानुभूति नहीं जतानी चाहिए.
* यूं तो ऐसे बच्चों की परवरिश अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है, लेकिन सौभाग्यवश हमारे देश में ऐसी अनेक संस्थाएं अथवा स्कूल्स खुल गए हैं, जहां इस तरह के बच्चों की पूरी तरह देखभाल करने के साथ-साथ उन्हें सुधारने की कोशिश भी की जाती है.
* संस्थाओं द्वारा फैमिली थेरेपी का कोर्स भी चलाया जाता है, जिसका उद्वेश्य होता है परिवार के सभी सदस्यों को मानसिक अथवा शारीरिक विकलांगता के बारे में बताना तथा उसकी संवेदनशीलता से लोगों को अवगत कराना.
* कुछ अभिभावकों का धैर्य कुछ दिनों बाद जवाब देने लगता है, क्योंकि ऐसा बच्चा अधिक समय और ध्यान की मांग करता है. अतः ऐसे अभिभावकों के लिए इन स्कूलों में मनोवैज्ञानिकों द्वारा काउंसलिंग की भी व्यवस्था है.
* इसमें बताया जाता है कि किस तरह वे अपने बच्चे की देखभाल बिना किसी ग़ुस्से, चिढ़ अथवा अपराधबोध के धैर्य और संतुलन के साथ करें.

– गीता सिंह

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दिन ब दिन समाज में बढ़ते अपराध और हिंसा से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं मासूम बच्चे. इससे न स़िर्फ उनकी मानसिकता प्रभावित हो रही है, बल्कि उनके स्वाभाविक विकास पर भी बुरा असर पड़ रहा है. इसके पहले कि इनका जीवन ख़तरे में पड़ जाए, पैरेंट्स को सचेत हो जाना चाहिए.

मासूम बचपन को चाहिए मखमल-सी हरी-भरी धरती, उड़ने को खुला आसमान, आंखों में रंगीन इंद्रधनुष और सुरक्षित माहौल… लेकिन कहां हैं ये सब? पैरेंट्स के नज़रिए से देखें, तो देश की सुरक्षात्मक प्रगति के बावजूद बच्चे असुरक्षित वातावरण में पल रहे हैं, हिंसा और आतंक का नज़ारा देख रहे हैं. अभिभावक चिंतित, परेशान व अनिश्‍चित हैं, साथ ही विवश भी कि उन्हें कैसे सुरक्षा दें?
ज़बरदस्ती से बंद कराई जा रही दुकानें, लाठीचार्ज, तोड़-फोड़, गाड़ियों पर बरसते पत्थर, ट्रेन के बम धमाके, स्कूल ट्रिप की बस से नदी में गिरते, बहते, मरते बच्चे… ऐसी अनन्त घटनाएं, ऐसे अनेक हृदयविदारक दृश्य, ख़बरों का सिलसिला मासूम मन को इस कदर प्रभावित कर देता है कि या तो वो प्रश्‍नों की झड़ी लगाकर भय के प्रति आश्‍वस्त होना चाहते हैं कि उनके साथ या उनके परिवार के साथ तो ऐसा कुछ नहीं हो जाएगा या फिर अन्दर ही अन्दर सहम जाते हैं. यदि बच्चा प्रश्‍न पूछता है, तो उसे आश्‍वासन भरा उत्तर देना कठिन है. यदि वह चुप रहता है, तो उसकी मानसिक व शारीरिक प्रतिक्रिया रोग का रूप ले सकती है.

क्या करें और हालात से कैसे निबटें?

ऐसा नहीं है कि दुनिया में अच्छे लोग नहीं हैं, बुरे हैं तो अच्छे भी हैं. कहां से लाएं ऐसा वातावरण कि बच्चों का सुरक्षित विकास हो. हालांकि आज के शिक्षित पैरेंट्स यहां भी अपने बच्चे को सही दिशा दिखलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं.
हम भी सिखाते हैं-
* अनजान व्यक्ति से बात मत करना.
* ज़रूरत हो तो पुलिस से बात करना.
* किसी अनहोनी की स्थिति में पुलिस से सम्पर्क करना.

लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि अपने बच्चे की सुरक्षा स़िर्फ हमें देखनी है. जब हम बच्चों को सच्चाई और ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं, अच्छा इंसान या नागरिक बनने के लिए प्रेरित करते हैं, तब भी हमारा मन शंकित होता है कि क्या वाकई चंट-चालाक या हिंसक माहौल में वह ऐसा बन पाएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि आदर्शों का पालन करते हुए मेरा बच्चा अन्याय ही सहता रह जाए?

इसके लिए पैरेंट्स बाल मनोवैज्ञानिक व मनोचिकित्सक डॉ. माधवी सेठ द्वारा बताए गए कुछ महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान दें-
* दोषारोपण बहुत आसान है, किन्तु क्या हम पूरी तरह से निर्दोष हैं?
* हिंसा का भय बच्चों में बढ़ रहा है, किन्तु आज कोई भी पैरेंट्स इस विषय से अनजान नहीं हैं.
* क्यों पैरेंट्स दिनभर टीवी देखते हैं. मीडिया से तो ओवर एक्पोज़र मिलता है.
* यदि हमें अपने बच्चों को बचाना है, तो टीवी देखना कम करें.
* ख़ासकर ऐसे दृश्य, जिनसे बाल मन प्रभावित होता है.
* न्यूज़ ज़रूर देखें, लेकिन ऐसी घटनाओं की पल-पल की ख़बर बच्चों के साथ तो न देखें या मित्र-परिवार के साथ उनकी ज़्यादा चर्चा न करें. न्यूज़ में और भी बहुत कुछ आता है.
* प्रश्‍न पूछे जाने पर आप जवाब इस तरह दें कि उनका मन भयभीत न हो.
* अपनों की चिन्ता बड़ों की तरह ही बच्चों को भी होती है, अत: जवाब ऐसा हो कि उनका मन आश्‍वस्त हो जाए और वो दूसरी ओर मन लगा सकें.
* हिंसा, तोड़-फोड़ या ब्लास्ट जैसे माहौल में दूसरी बातें करें, जो बालमन के अनुकूल हों.
* जवाब सरल और सुलझा हुआ दें, ताकि उसका मन भी हल्का रहे.
* जवाब देते समय बात प्रासंगिक है या अप्रासंगिक इस बात को भी ध्यान में रखें.
* बच्चे अक्सर अपने पिता, भाई या बहन के प्रति सबसे पहले शंकित होते हैं, वो आ जाएंगे ना? उन्हें तो कुछ नहीं होगा ना? आदि प्रश्‍नों का उत्तर सकारात्मक होना चाहिए.
* यदि बच्चा थोड़ा बड़ा है, तो उसे आत्म अनुभव करा दीजिए.
* जब वह देखेगा कि घर के बाहर भी सब कुछ सामान्य है, तो उनका डर अपने आप ही निकल जाता है.
* थोड़ा-बहुत डर तो हर बच्चे में होता है. चिन्ता तब होती है, जब यह सीमा से परे हो जाता है.
* बड़े बच्चों से तो आतंकवाद या सुरक्षा जैसी समस्याओं पर भी स्वस्थ दृष्टिकोण से विचार-विमर्श किया जा सकता है.
* मीडिया की हर बात को यथा स्वरूप नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वहां ज़रूरत से ज़्यादा ही चर्चा हो जाती है.
* बार-बार वही बातें दोहराई जाती हैं. ऐसे में बच्चे समझने लगते हैं कि यह घटना चार दिन तक घटती रही है.
* हम बाहर की दुनिया को नहीं रोक सकते, किन्तु उन घटनाओं या स्थितियों के प्रति सही दृष्टिकोण को सामने ज़रूर ला सकते हैं और बच्चों को आत्म सुरक्षा का पाठ भी ज़रूर पढ़ा सकते हैं.
* साथ ही एक स्वस्थ सोच और सकारात्मक माहौल बनाने का प्रयास भी ज़रूर कर सकते हैं. आख़िर बच्चे हमारी निधि हैं, हमारा भविष्य हैं.

-प्रसून भार्गव