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आज के पढ़े-लिखे मॉडर्न पैरेंट्स भले ही अपने बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखने का दावा करें, लेकिन सेक्स जैसे मुद्दे पर बच्चों के साथ बात करते हुए उनकी ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है. बच्चे के सेक्स से जुड़े किसी भी सवाल का जवाब देने में वो आज भी हिचकिचाते हैं. सेक्स जैसे ज़रूरी मुद्दे पर अपने बच्चों से बात करते हुए क्यों झिझकते हैं पैरेंट्स? 

टैबू है सेक्स

मॉडर्न होने का दंभ भरने वाले आज के शिक्षित अभिभावक भी बच्चों के मुंह से सेक्स शब्द सुनकर झेप जाते हैं. एक जानी मानी मीडिया ग्रुप से जुड़ी कविता कहती हैं, “मेरे 10 साल के बेटे ने जब अखबार में छपे सेक्स शब्द को देखकर पूछा ‘मम्मा, SEX का क्या मतलब है?’ तो मैं सन्न रह गई. मुझे समझ नहीं आया कि उसके सवाल का मैं क्या जवाब दूं.” हमारे देश में ज़्यादातर पैरेंट्स का हाल कविता जैसा ही है, वो अपने बच्चे के साथ दोस्ताना व्यवहार तो रखते हैं, लेकिन जब बात सेक्स की आती है, तो बच्चे को समझाने की बजाय उसके सवाल को टाल जाते हैं. ऐसे में वो इंटरनेट व दोस्तों के ज़रिए अपनी जिज्ञासा शांत करने की कोशिश करता है, जिसका ज़्यादातर नकारात्मक असर ही देखने को मिलता है, क्योंकि इन स्रोतों से सही व पूरी नहीं, बल्कि अधकचरी जानकारी ही मिलती है.
अपनी सेक्स जिज्ञासा को शांत करने के लिए टीनएजर्स बेझिझक यौन संबंध बना रहे हैं, जिससे न स़िर्फ उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि करियर भी प्रभावित होता है. साइकोलॉजिस्ट कीर्ति बक्षी के मुताबिक, “सेक्स को टैबू की बजाय नैचुरल चीज़ की तरह पेश करके, सहजता से बात करके, रियल-अनरियल सेक्स यानी नैचुरल सेक्स और पोर्नोग्राफ़ी का फ़र्क समझाकर बच्चों को अपराध की राह पर चलने से रोका जा सकता है.”

क्यों झेंपते हैं पैरेंट्स?
साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् पैरेंट्स की झिझक की वजह उनकी सोच को मानती हैं. उनके मुताबिक, “सोच के अलावा डर, शर्मिंदगी का एहसास, नैतिक मूल्य और संस्कार भी खुले तौर पर पैरेंट्स को बच्चों से सेक्स संबंधी मुद्दे पर बात करने से रोकते हैं.फफ दरअसल, हमारा समाज और परवरिश का माहौल ही ऐसा है जहां सेक्स जैसे शब्द को हमेशा परदे के पीछे रखा गया है. यही वजह है कि पैरेंट्स चाहते हुए भी इस मुद्दे पर बच्चे से खुलकर बात नहीं कर पाते.”
सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजीव आनंद की भी कुछ ऐसी ही राय है. उनके अनुसार, “पैरेंट्स जिस माहौल में पले-बढ़े और शिक्षित हुए हैं, वहां सेक्स को हमेशा एक बुरी चीज़ के रूप में पेश किया गया है. सेक्स का मतलब स्त्री और पुरुष के बीच का अंतरंग संबंध… इसी सोच के चलते अभिभावक बच्चों के साथ इस बारे में बात करने में असहज महसूस करते हैं.”

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समय की मांग है सही सेक्स एज्युकेशन
दिनोंदिन सेक्स संबंधी अपराधों में बच्चों, ख़ासकर टीनएजर्स की बढ़ती भागीदारी न स़िर्फ पैरेंट्स, बल्कि पूरे समाज के लिए ख़तरे की घंटी है. ऐसे में सेक्स एज्युकेशन के ज़रिए ही बच्चों को सही-ग़लत का फ़र्क समझाया जा सकता है. डॉ. आनंद कहते हैं, “आज के दौर में जहां एक्सपोज़र और ऑपोज़िट सेक्स के साथ इंटरेक्शन बहुत ज़्यादा बढ़ गया है, ऐसे में टीनएजर्स को सेक्स के बारे में सही जानकारी होनी ज़रूरी है. बढ़ती उम्र के साथ टीनएजर्स की उत्तेजना और फैंटेसी भी बढ़ने लगती है, लेकिन उन्हें इस पर क़ाबू रखना नहीं आता, जो सेक्स एज्युकेशन से ही संभव है. सेक्स एज्युकेशन को स़िर्फ अंतरंग संबंधों से जोड़कर ही नहीं देखा जाना चाहिए.”

बदलाव की ज़रूरत
आमतौर पर पैरेंट्स ये तो चाहते हैं कि उनके बच्चे को सेक्स के बारे में सही जानकारी मिले, लेकिन ख़ुद इस मुद्दे पर वे बात नहीं करते. ज़्यादातर पैरेंट्स सेक्स को शादी के बाद वाली चीज़ के रूप में देखते हैं, लेकिन उन्हें अपनी इस सोच में बदलाव लाना होगा और कपड़ों के साथ ही अपने विचारों को भी मॉडर्न बनाकर एक दोस्त की तरह बच्चे को उसके शारीरिक अंगों और उनके विकास के बारे में जानकारी देनी होगी. इतना ही नहीं, उन्हेें ये भी बताएं कि कोई यदि उन्हें ग़लत तरी़के से छूता है, तो उसका विरोध करें या तुरंत स्कूल/घर में उसकी शिकायत करें. आजकल न स़िर्फ बाहर, बल्कि घर की चहारदीवारी में भी रिश्तेदारों द्वारा बच्चों के शोषण के कई मामले सामने आए हैं. बहुत- से मामलों में तो बच्चे समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ कुछ ग़लत हो रहा है.

मीडिया एक्सपोज़र से बहकते क़दम
डॉ. आनंद के मुताबिक, “टीवी सीरियल, फ़िल्में, मैगज़ीन, फैशन शो आदि में जिस तरह खुलेआम अश्‍लीलता परोसी जा रही है, बच्चों का उनसे प्रभावित होना लाज़मी है. इन सब माध्यमों की वजह से वे उम्र से पहले ही बहुत कुछ जान लेते हैं और परदे पर दिखाई गई चीज़ों को असल ज़िंदगी में करने की कोशिश में ग़लत राह पर चल पड़ते हैं. इसके लिए बहुत हद तक पैरेंट्स भी ज़िम्मेदार हैं, उनके द्वारा इस मुद्दे पर बात न किए जाने के कारण बच्चे उत्सुकतावश या उतावलेपन में सेक्स अपराधों में लिप्त हो जाते हैं.”

सेक्सुअली एक्टिव होते बच्चे
कई अध्ययनों से ये बात साबित हो चुकी है कि आजकल 10-11 साल की उम्र में ही बच्चों में प्युबर्टी पीरियड शुरू हो जाता है. साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् कहती हैं, “बदलती लाइफ़स्टाइल के कारण बच्चे वक़्त से पहले बड़े हो रहे हैं और इस दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव उन्हें सेक्स के प्रति उत्तेजित कर देते हैं. ऐसे में सही जानकारी के अभाव में और पैरेंट्स द्वारा नज़रअंदाज़ किए जाने पर बच्चे अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए इंटरनेट, सोशल साइट्स, पब, फ़िल्म व दोस्तों का सहारा लेते हैं, जिसका नतीजा सेक्सुअल एक्सपेरिमेंट्स के रूप में सामने आता है.”

कैसे करें बात?
ये सच है कि भारतीय पैरेंट्स के लिए बच्चों से सेक्स संबंधी मुद्दे पर बात करना आसान नहीं, लेकिन आप अगर अपने बच्चे की भलाई चाहते हैं, तो झिझक व संकोच छोड़कर आपको इस मामले पर बात करनी ही होगी. साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् कहती हैं, “पैरेंट्स को अपने और बच्चों के बीच के संवाद के पुल को मज़बूत बनाए रखना चाहिए और जब बच्चा सेक्स से जुड़े सवाल करने लगे, तो टालकर उसकी उत्सुकता बढ़ाने की बजाय सहजता से उसके सवालों का जवाब दें. बच्चे से नज़रें मिलाकर बात करें और ज़रूरत पड़े तो उसे सेक्स से जुड़ी कुछ अच्छी किताबें लाकर दें, ताकि उसे सही जानकारी मिले. सेक्स एज्युकेशन से बच्चों को न स़िर्फ अपने शारीरिक विकास के बारे में पता चलेगा, बल्कि सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ और अनवांटेड प्रेग्नेंसी (अनचाहा गर्भ) के बारे में भी पता चलेगा, जो उन्हें ग़लत रास्ते पर जाने से रोकेगी. वैसे कई स्कूलों में सेक्स एज्युकेशन का टॉपिक कवर किया गया है, लेकिन प्युबर्टी और सेक्सुअल डेवलपमेंट के बारे में बच्चों को बताने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की ही है.”

डॉ. राजीव आनंद कहते हैं, “पैरेंट्स को बच्चों के सामने स्त्री/परुष के शारीरिक अंगों के बारे में गंदे और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और न ही उसे मज़ाक या उत्सुकता का विषय बनाना चाहिए. बच्चे को उसकी उम्र और समझ के मुताबिक बॉडी पार्ट्स और उनकी अहमियत समझानी चाहिए. साथ ही अभिभावकों को ये भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे को कब, क्या और कितना बताना है.”
बहरहाल, ये साफ़ है कि आज के दौर में अपने बच्चे की बेहतरी के लिए पैरेंट्स को झिझक छोड़कर सेक्स एज्युकेशन के लिए पहल करनी ही होगी.

 

– कंचन सिंह

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मासूम बचपन….. निश्छल मन में न जाने कितनी सही-ग़लत बातें घर कर जाती हैं. लेकिन जागरुक अभिभावकों के कारण कुछ बच्चे आगे निकल जाते हैं. वहीं ध्यान न देने पर कुछ शर्म-संकोच में उलझ कर रह जाते हैं. अतः बच्चों के बहुमुखी विकास के लिए उनका शर्म-संकोच से उबरना बेहद ज़रूरी है.

संकेत के माता-पिता उसे अनेक बार समझा चुके हैं कि जो प्रश्‍न या विषय क्लास में समझ में नहीं आता, उसे टीचर से दोबारा पूछ लेना चाहिए. चाहता तो संकेत भी यही है, लेकिन वो समझता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सारे बच्चे समझ गए और एक वो ही नहीं समझा है. हो सकता है, अगर वो टीचर से दोबारा समझाने के लिए कहे तो अन्य बच्चे उसे बेवकूफ़ समझने लगें. दुविधा व चिंता से उसका मन टूटने लगता है और उस विषय से मन हटने लगता है. साथ ही तनाव की स्थिति पीछा नहीं छोड़ती.

वार्षिक उत्सव में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए बच्चों का चयन हो रहा था. लगभग सभी बच्चे उत्साह से हर कार्यक्रम में भाग लेने के लिए उतावले हो रहे थे. सुकिता का मन भी हो रहा था, लेकिन संकोच के कारण बोल नहीं पाई. घर पर मां से अपने मन की बात कही. दूसरे दिन मां ने टीचर से बात की. टीचर ने उसे एक नाटक के रोल के लिए चुन लिया और फिर पूछा कि तुमने कल मुझसे क्यों नहीं कहा? इसका उत्तर सुचिता के पास नहीं था, बल्कि टीचर के इस प्रश्‍न से उसके चेहरे पर डर के भाव थे.

बच्चों के साथ अक्सर ऐसा हो जाता है, वे शर्म व संकोच के कारण कई बार पीछे रह जाते हैं. बाद में उन्हें पछतावा होता है, पर हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. फिर पिछड़ने लगते हैं, जिससे उनका आत्मविश्‍वास भी खोने लगता है. संकोची या शर्मीला व्यक्ति लोगों का नुक़सान कम ही करता है, लेकिन कभी-कभी अपना काफ़ी नुक़सान कर बैठता है. डॉ. अजीत दांडेकर कहते हैं, ङ्गङ्घमाता-पिता भी बच्चे के संकोच की तह में छिपी समस्याओं का अंदाज़ा नहीं लगा पाते हैं. शर्म एक भय है. सामाजिक व पारिवारिक स्थितियों से एक दूरी है. कोई भी नहीं चाहता कि वो ऐसी स्थिति से गुज़रे, फिर भी यह हो जाता है और इसकी वजह से ज़िंदगी के अनेक मौ़के हाथ से निकल जाते हैं.फफ कई बच्चे काफ़ी संवेदनशील होते हैं. शर्म व संकोच की भावना के साथ अंदर-ही-अंदर घुटन व पीड़ा झेलते हैं और जिसका नकारात्मक असर मनोवैज्ञानिक समस्याओं को जन्म देता है. शर्म या संकोच की भावना क्यों होती है? मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इसके कुछ सामान्य कारण हैं, जैसे- वंशानुगत. अध्ययनों के अनुसार यह स्वभाव वंशानुगत भी हो सकता है. संकोची स्वभाव के माता-पिता के बच्चे भी संकोची होते हैं. हालांकि अपवाद भी हो सकते हैं.

अधिक सुरक्षा देने वाले अभिभावकः जिन बच्चों को माता-पिता अपनी छत्र-छाया से ज़रा भी अलग नहीं होने देते, स्वतंत्र तौर पर कुछ भी नहीं करने देते, ऐसे बच्चे संकोची होते हैं.

आलोचनाः अधिक आलोचना भी बच्चे में संकोची भाव उत्पन्न करती है. उन्हें हर व़क़्त यही डर रहता है कि उनसे कोई ग़लती न हो जाए. ऐसे बच्चों में नकारात्मक भावना घर कर लेती है. अतः बच्चों को हर समय डराना-धमकाना या चिढ़ाना उचित नहीं है.
अभ्यास व अनुभव की कमीः पढ़ाई हो या कोई अन्य काम, अभ्यास व अनुभव की कमी बच्चों में आत्मविश्‍वास कम करती है, लिहाज़ा संकोच होने लगता है.

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संकोच व शर्म के कारण बच्चों को नई प्रकार की द़िक़्क़तों का सामना करना पड़ सकता है.

* प्रायः इन बच्चों के लिए दोस्ती निभा पाना मुश्किल होता है. ऐसे बच्चों के मन की बात मुश्किल से जानी जा सकती है. भावनाओं को व्यक्त करना  कठिन होता है.

* प्रभावशाली यानी, इफेक्टिव कम्युनिकेशन में इन बच्चों को कठिनाई होती है. सामाजिक स्थितियों का सामना करने से घबराते हैं.

* चूंकि स्वयं को भलीभांति व्यक्त नहीं कर पाते, अतः अक्सर ही मूर्ख व बेवकूफ़ माने जाते हैं, जो इनके आत्मविश्‍वास को कम करता है.
* स्कूल के माहौल में भी अपने से बेहतर बच्चों या टीचर के सामने बोलने से कतराते हैं. कक्षा में प्रश्‍न पूछने या प्रश्‍न का उत्तर मालूम होने के बावजूद  भी नहीं बोल पाते हैं. इस वजह से इनकी ओर शिक्षक का ध्यान कम हो जाता है. उपेक्षित महसूस करते हैं. कभी-कभी पढ़ाई में भी पिछड़ जाते हैं.

* अन्य क्रियाएं जैसे खेल-कूद या दूसरे कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं ले पाते हैं.

इसके लिए ज़रूरी है बच्चे को संकोच या शर्म से बाहर निकाला जाए. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यदि बच्चा अपने संकोच को खुलकर स्वीकार करता है तो संभवतः दूसरे लोग उसकी मदद कर सकते हैं. बच्चों को हर किसी के साथ बातचीत करने के लिए उत्साहित कीजिए. लेकिन हां, सही भाषा व सही शैली के लिए टोकते रहें, इससे उसमें आत्मविश्‍वास बढ़ेगा और संकोच कम होगा, इस प्रकार की शुरुआत बच्चे की आरंभिक अवस्था से ही शुरू कर देनी चाहिए. सही सामाजिक व्यवहार को विकसित कर उचित कार्यों के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए.
कभी भी सबके सामने उनसे ऐसे वाक्य जैसे, ङ्गङ्घक्यों शर्मा रहे होफफ आदि न कहें. ऐसे वाक्य सुन बच्चे और भी संकोची हो उठते हैं. ना ही दूसरों के सामने यह कहें कि बच्चा संकोची है. यदि कहना ही है तो इस तरह कह सकते हैं, “इसे सबके साथ मिक्स होने में थोड़ा व़क़्त लगता है.” कभी भी बच्चे की ड्रेस, हेयर स्टाइल या आदत का मज़ाक न बनाएं.

उसके साथ विश्‍वास का रिश्ता बनाएं. ईमानदारी व खुलापन रिश्तों को प्रगाढ़ बनाता है. जिन बच्चों को माता-पिता का विश्‍वास प्राप्त है, वो कम संकोची होते हैं. माता-पिता की आंखों में प्यार व स्नेह की भावना उनका आत्मविश्‍वास बढ़ाती है, सुरक्षा प्रदान करती है.
यह बहुत ज़रूरी है कि बच्चों को प्रभावशाली बातचीत का तरीक़ा सिखाया जाए. क्रोध व प्रशंसा को व्यक्त करने का सही ढंग सिखाया जाए. सही तरी़के से बातचीत करना एक सोशल स्किल है, जो सफलता के हर क़दम का अहम् हिस्सा है. सही भाषा व शब्दों का प्रयोग आवाज़ का उचित उतार-चढ़ाव, व्यवहार व आचरण संबंधी शब्द ये सभी बच्चों में सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं.
अमूमन बच्चों के विकास में अभिभावकों का व्यवहार महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. बच्चे अपने माता-पिता का अनुकरण करते हैं, इसलिए बच्चों की हर ख़ूबी या कमी के लिए माता-पिता ही ज़िम्मेदार हैं. वे ही उनके सामने सही या ग़लत उदाहरण पेश कर सकते हैं.

– प्रसून भार्गव

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नेशनल गर्ल चाइल्ड डे: बेटी है, तो अरमान है… बेटियों से रोशन ये जहान है… 

  • नेशनल गर्ल चाइल्ड डे (National Girl child Day) 24 जनवरी को मनाया जाता है.
  • इस मौ़के पर सोशल मीडिया पर सभी दिग्गज हस्तियां अपने विचार रख रही हैं और तमाम लोग जन जागृति के प्रयास में भी जुटे हैं.

क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय बालिका दिवस?

  • भारत में लड़कियों के साथ जिस तरह का भेदभाव होता रहा है, चाहे वो उनके खान-पान से संबंधित हो या फिर पढ़ाई-लिखाई व आगे बढ़ने के अवसरों से संबंधित हो, उसके प्रति लोगों को जगाने व बेटियों को समान अवसर दिलाने की कोशिश में यह मनाया जाता है.
  • सरकार की तरफ़ से इस दिन कई तरह के अभियान चलाए जाते हैं. बेटियों को आगे बढ़ाने के कई अवसरों के बारे में लोगों को बताया जाता है.
  • बेटियों को सम्मान व समान अवसर की दिशा में भी कई तरह के प्रयास किए जाते हैं.
  • टीवी के माध्यम से, सोशल मीडिया के ज़रिए या फिर प्रशासनिक व व्यक्तिगत स्तर पर भी जन जागृति की जाती है, ताकि बेटे व बेटी के बीच के फ़र्क़ को मिटाया जा सके और बेटियों को भी वही प्यार व सम्मान मिले, जिसकी वो हक़दार हैं.
  • कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराइयां इस समाज से मिट सकें व बेटियों को बेहतर अवसर मिल सकें, यही इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य है.
  • ट्विटर पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अन्य तमाम बड़ी हस्तियों ने नेशनल गर्ल चाइल्ड डे पर अपने विचार इस तरह से रखे-

 

 

– गीता शर्मा

सदियां बदल रही हैं, लेकिन बेटियों को लेकर हमारी सोच अब तक नहीं बदली. तकनीकी विकास हुआ और उस विकास का प्रयोग (दुरुपयोग) भी हमने गर्भ में पल रही बेटी की हत्या के लिए ही करना बेहतर समझा. अगर नारी विहीन समाज की चाह है, तो परिवार व शादी जैसी प्रथाएं बंद ही कर दें. मात्र बेटे की चाह तो इसी ओर इशारा करती है.

 

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एबॉर्शन सेंटर्स के बाहर इस तरह के विज्ञापन चौंका देते हैं- 500 ख़र्च करो और 50,000 बचाओ… जिसका अर्थ है कि गर्भ में कन्या है, तो 500 में गर्भपात करवा लो और उसके दहेज के 50,000 बचा लो.

* जहां तक गर्भपात की बात है, तो गर्भपात ग़ैरक़ानूनी नहीं है, लेकिन सेक्स सिलेक्टिव एबॉर्शन अपराध है.

* मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 में बनाया गया और 2003 में यह सोचकर इसमें संशोधन किया गया कि महिलाओं की सेहत पर  नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा और अनसेफ एबॉर्शन्स की संख्या भी कम होगी. लेकिन आज भी हक़ीक़त यही है कि अनसेफ एबॉर्शन्स की संख्या घट  नहीं रही.

* हैरानी की बात यह है कि कन्या भ्रूण हत्या उन राज्यों और शहरों के उन हिस्सों में सबसे अधिक होती है, जहां आर्थिक रूप से अधिक संपन्न व सो  कॉल्ड पढ़े-लिखे लोग यानी एलीट क्लास के लोग रहते हैं.

* इंडियन पीनल कोड के अंतर्गत एबॉर्शन करवाना, यहां तक कि ख़ुद महिला द्वारा अपनी मर्ज़ी से भी एबॉर्शन करवाना अपराध है, यदि वो महिला की  जान को बचाने के लिए न किया गया हो.

* इसमें तीन साल तक की कैद या जुर्माना या फिर दोनों ही हो सकता है.

* इसी तरह गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण भी अपराध है, जब तक कि डॉक्टर निश्‍चित न हो कि महिला के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य के  मद्देनज़र गर्भपात ज़रूरी है.

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कहां है रौशनी की किरण?

* लोगों को जागरूक करने के लिए सरकार द्वारा ङ्गबेटी बचाओफ अभियान चलाया गया, जिसमें पेंटिंग्स, विज्ञापनों, पोस्टर्स, एनिमेशन और वीडियोज़ द्वारा कोशिशें की गईं. इस अभियान को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के साथ-साथ कई मेडिकल संस्थाओं ने समर्थन व सहयोग दिया.

* इस अभियान का असर कहीं-कहीं नज़र भी आया. गुजरात में वर्ष 2009 में 1000 लड़कों के मुक़ाबले लड़कियों की जन्म संख्या 802 से बढ़कर 882  हो गई थी.

* इन सबके बावजूद हालात ये हैं कि जब महिलाओं से इस विषय में पूछा जाता है, तो वो झल्लाकर यही कहती हैं कि कैसा क़ानून और किस तरह का  समाज… सच्चाई तो यह है कि जब हम बेटियों को जन्म देती हैं, तो यही समाज हमें हिकारत की नज़रों से देखकर ताने देता है. हमें हर जगह कमतर  बताया जाता है. रिश्तेदारों से लेकर पति तक तानों से छलनी कर देते हैं. फिर हम क्यों बेटियों को जन्म दें, ताकि वो भी हमारी ही जैसी ज़िंदगी जीने  को मजबूर हों?

* महिलाओं द्वारा उठाए ये तमाम सवाल दरअसल हमारे सामाजिक ढांचे पर तमाचा हैं, जिसमें महिलाओं को दोयम दर्जे का ही माना जाता है. अगर  बीवी कमाती है, तो उसे एक्स्ट्रा इन्कम माना जाता है, पढ़ी-लिखी लड़कियां इसलिए डिमांड में हैं कि वो पति के स्टेटस को मैच करने के साथ-साथ  बच्चों की परवरिश बेहतर कर पाएंगी, उनका होमवर्क करवा पाएंगी आदि.

* दूसरी तरफ़ पढ़ी-लिखी लड़कियों के साथ यह भी समस्या आती है कि दहेज अधिक देना पड़ता है, क्योंकि उनके लिए लड़के भी अधिक पढ़े-लिखे  ढूंढ़ने होते हैं.

* अख़बारों के मैट्रिमोनियल कॉलम में भी आसानी से ऐसी दोहरी मानसिकता के दर्शन हो सकते हैं, जिसमें लिखा होता है- चाहिए गोरी, सुंदर, लंबी,  पढ़ी-लिखी, घरेलू व संस्कारी लड़की. यानी घरेलू व संस्कारी लड़की वो, जो घर के सारे काम भी करे और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ भी न उठाए.

* जब इस तरह की मानसिकता वाले समाज में हम जी रहे हैं, तो पैरेंट्स को यही लगता है कि लड़की का जन्म यानी ढेर सारा ख़र्च और मुसीबत.

* इन समस्त समीकरणों के बीच ख़ुद लड़कियों को ही अपनी रक्षा का बीड़ा उठाना होगा. अपने लक्ष्य बदलने होंगे और उसी से समाज की दशा व दिशा  भी बदलेगी.

* शादी, परिवार और समाज की घिसी-पिटी परंपराओं से ऊपर उठकर अपने अस्तित्व को देखना होगा और सबसे ज़रूरी है कि आवाज़ उठानी होगी.

* कोई ज़बर्दस्ती गर्भपात करवाता है, तो आवाज़ उठाएं, फिर सामने भले ही सास-ससुर, मां-बाप या अपना पति ही क्यों न खड़ा हो. क़ानून बने हैं,  उनका उपयोग नहीं करेंगे, तो व्यवस्था नहीं बदलेगी.

कहां से मिल सकती है मदद?

* इंडियन वुमन वेलफेयर फाउंडेशन (IWWF) वेबसाइट:
www.womenwelfare.org
यहां आपको लीगल असिस्टेंस भी मिलेगा और आप ऑनलाइन अपनी शिकायत भी दर्ज करवा सकती हैं.

* जागृति नामक संस्था भी वुमन एंपावरमेंट के लिए काम करती है. संस्था द्वारा कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ भी काफ़ी अभियान किए गए हैं.
फोन: 0836-2461722
वेबसाइट: www.jagruti.org

* नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (NCPCR), नई दिल्ली- फोन: 011-23478200
फैक्स: 011-23724026
कंप्लेन के लिए: 011-23724030
ईमेल: [email protected],
[email protected]

 

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ज़िंदगी की हर रेस में जीत दर्ज करने के बावजूद उसकी क़ामयाबी तब तक अधूरी रहती है जब तक उसकी गोद न भर जाए. आख़िर बच्चे के जन्म को औरत के अस्तित्व और पूर्णता से जोड़कर क्यों देखा जाता है? क्या बच्चे को जन्म दिए बिना औरत को ख़ुशहाल ज़िंदगी जीने का हक़ नहीं है? क्या उसका अपना कोई वजूद नहीं है? महिलाओं की ज़िंदगी से जुड़े कुछ ऐसे ही संवेदनशील पहलुओं को छूने की कोशिश की है हमने अपनी इस स्पेशल रिपोर्ट में.

शादी और फिर बच्चा, ये दो शब्द ऐसे हैं जिनकी ग़ैर मौजूदगी में किसी भी औरत की ज़िंदगी को पूर्ण नहीं माना जा सकता. भले ही बेटा नकारा, निकम्मा हो और बहू दिनभर मेहनत करके घर का ख़र्च चला रही हो, फिर भी किसी कारणवश यदि वो बच्चे को जन्म देने में समर्थ नहीं है, तो उसे परिवार व समाज की चुभती निगाहों और तानों से रोज़ाना छलनी होना पड़ता है, मगर पुरुष पर कोई उंगली नहीं उठाता. हम आधुनिक और शिक्षित होने का लाख दंभ भरें, लेकिन हमारी कथनी और करनी में बहुत अंतर है. देश के अलग-अलग हिस्सों में कई औरतों को मां न बन पाने का
खामियाज़ा अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है.

क्या हमारा कोई वजूद नहीं?
एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत इंदु गुप्ता (परिवर्तित नाम) कहती हैं, “शादी के 1 साल बाद भी जब मैं प्रेग्नेंट नहीं हुई तो डॉक्टर को दिखाया. फिर दवाइयों का सिलसिला शुरू हो गया. क़रीब 2-3 साल इधर-उधर भटकने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला. एक तरफ़ दवाइयां बेअसर हो रही थीं और दूसरी तरफ़ ससुराल वालों के दबाव और तानों ने मुझे डिप्रेस कर दिया था. मैं इतनी तनावग्रस्त हो गई थी कि देर रात तक पागलों की तरह ऑफिस में ही बैठी रहती, रास्ते पर यूं ही घूमती रहती. घर में न तो किसी को मुझसे कोई लगाव था और न ही मेरी परवाह. हां, इस मुश्किल दौर में पति ने हर मोड़ पर मेरा साथ दिया. तीन साल बाद मैंने आईवीएफ ट्रीटमेंट कराना शुरू किया, मगर लाखों रुपए
फूंकने और पूरे शरीर में सूइयां चुभोने के बावजूद ये सफल न हो सका. सासू मां के ताने ‘हमारे परिवार में आज तक ऐसा नहीं हुआ’ और पार्टी-फंक्शन में लोगों के तीखे सवाल ‘अरे! तेरा हुआ कि नहीं अब तक?’ मेरे दिल को छलनी कर देते हैं, अब तो लोगों के बीच जाने से भी डर लगने लगा है.”
साइकोलॉजिस्ट निमिषा रस्तोगी कहती हैं, “हमारे देश में मां बनने को लेकर लोगों का नज़रिया बहुत संकुचित है, वो इसे महिलाओं की क़ाबिलियत से जोड़कर देखते हैं. इसी सोच के कारण महिलाएं धीरे-धीरे हीन भावना से घिर जाती हैं, जिसका असर उनकी पर्सनल लाइफ के साथ ही प्रोफेशनल लाइफ पर भी पड़ता है. बैंग्लोर की एक शिक्षिका के केस में भी ऐसा ही हुआ. बच्चा न होने के कारण वो महिला इस कदर अवसादग्रस्त हो गई कि धीरे-धीरे उसने बाहर आना-जाना, यहां तक कि नौकरी भी छोड़ दी. पति से भी उसके संबंध अच्छे नहीं रहे.”
महिलाओं के प्रति शिक्षित परिवारों की भी मानसिकता नहीं बदली है. महिलाएं कितनी भी तरक्क़ी क्यों न कर लें, लेकिन मां बने बिना उसकी सारी सफलता बेकार है. आख़िर समाज ये क्यों नहीं समझता कि औरतों का भी अपना वजूद है, उनकी भी भावनाएं हैं, उन्हें भी दर्द होता है, उनमें भी एहसास है. क्यों उसे एक मशीन की तरह ट्रीट किया जाता है?
मैरिज काउंसलर मोना बक्षी कहती हैं, “पढ़ी-लिखी और प्रतिष्ठित पद पर काम करने वाली क़ामयाब महिलाएं भी मां न बन पाने के अपराधबोध से ग्रसित रहती हैं, क्योंकि उन्हें सही मार्गदर्शन और सपोर्ट नहीं मिलता. इस स्थिति से बाहर आने के लिए परिवार, ख़ासकर पति का सपोर्ट बेहद ज़रूरी है.”

प्यार व त्याग के बदले अपमान
परिवार के लिए किए उसके सारे त्याग व समझौते क्या बच्चा न होने के कारण ज़ाया हो जाएंगे? ये कहां की नैतिकता है? पराये घर से आने के बावजूद वो आपके घर को, उसके तौर-तरीक़ों को न स़िर्फ अपनाती है, बल्कि उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश में अपनी पूरी ताक़त लगा देती है, मगर इन कोशिशों का उसे क्या सिला मिलता है?
मुंबई की अचला (परिवर्तित नाम) शादी के 13 साल बाद भी मां नहीं बन पाईं. कई साल डॉक्टरों के चक्कर काटने के बाद उन्हें पता चला कि कमी उनके पति में है. कोई पति की मर्दानगी पर सवाल न उठाए और परिवार व समाज के सामने उनका सिर शर्म से न झुक जाए, इसलिए अचला ने पति के बाप न बन पाने वाला राज़ अपने सीने में ही दफ़न कर लिया. अचला ने तो पति से यहां तक कह दिया कि यदि वो चाहे तो बच्चे के लिए दूसरी शादी कर सकता है, उसे कोई दिक्क़त नहीं है, मगर उसके इस त्याग के बदले उसे मिली ज़िल्लत और दर्द. ससुराल वाले उसके पति पर उसे छोड़कर दूसरी शादी का दबाव डालने लगे. जिस पति की कमी को उसने दुनिया से छिपाया, वही पति मां और भाई की बातों में आकर उसे ही प्रताड़ित करने लगा. उस पर किसी और से रिश्ता होने का झूठा आरोप लगाकर हर रोज़ शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान करने लगा. इन सबसे आजीज़ आकर अचला अब अलग रह रही हैं और पति से तलाक़ लेना चाहती हैं, मगर वो उसे आसानी से तलाक़ देने को भी राज़ी नहीं है, क्योंकि तलाक़ की सूरत में उसे मुआवज़ा देना पड़ेगा.
हमारे देश में अचला के पति और ससुराल वालों जैसी ओछी मानसिकता वाले लोगों की कोई कमी नहीं है. बच्चे के लिए बेटे की दूसरी शादी कराने वाले लोग ये जानने की ज़हमत भी नहीं उठाते कि कमी बहू में है या बेटे में. लोगों ने तो जैसे मान ही लिया है कि जो भी बुरा होता है उसके लिए बहू ही ज़िम्मेदार है. मैरिज काउंसलर मोना बक्षी कहती हैं, “कई केसेस में महिलाएं इतनी परेशान व डिप्रेस्ड हो जाती हैं कि वो ख़ुद ही पति से दूसरी शादी करने के लिए कह देती हैं. बच्चा न होने के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानकर वो हमेशा एक अपराधबोध से घिरी रहती हैं.”

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क्यों मंज़ूर नहीं गोद लेने का विकल्प?
21वीं सदी में जब हम आधुनिकता का दंभ भरते हैं ये स्थिति बदलनी बेहद ज़रूरी है. लोगों को ये समझना होगा कि पति और बच्चे से अलग भी महिला का अपना एक अलग अस्तित्व होता है और बच्चा न होने का ये मतलब नहीं कि ज़िंदगी ही ख़त्म हो गई. किसी ग़रीब, बेसहारा अनाथ बच्चे को गोद लेकर न स़िर्फ उसकी ज़िंदगी संवारी जा सकती है, बल्कि ममता के सुख से वंचित महिलाओं की ज़िंदगी के खालीपन को भी भरा जा सकता है. निमिषा कहती हैं, “एडॉप्शन को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं, जैसे- अपना बच्चा या ख़ून का रिश्ता ही सच्चा है, गोद लिए बच्चे को जब सच्चाई का पता चलेगा तो वो हमें छोड़कर चला जाएगा, पता नहीं उसकी रगो में कैसा ख़ून है? आदि. ऐसी सोच के कारण ही ज़्यादातर दंपति बच्चा गोद नहीं लेते, मगर ये सोच बिल्कुल ग़लत है. कुछ साल पहले मेरे पास एक केस आया जिसमें शादी के 12 साल बाद भी मां न बन पाने के कारण वो महिला बहुत ज़्यादा तनावग्रस्त हो गई थी. दो बार आईवीएफ करवाने का भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ. अब वो फोबिया की शिकार हो चुकी थी, उसे इंजेक्शन और डॉक्टर से चिढ़ हो गई थी, वो रिश्तेदारों व अपने कलीग से भी मिलना पसंद नहीं करती थी. जब ये कपल मेरे पास आए, तो कई हफ़्तों तक लगातार सेशन करने के बाद वो बच्चा गोद लेने के लिए राज़ी हो गए. उन्होंने अनाथाश्रम से 1 महीने की बच्ची को गोद लिया. आज अपनी इस प्यारी-सी बच्ची के साथ ये कपल बहुत ख़ुश है. वो मानते हैं कि अपनी पुरानी सोच बदलकर उन्होंने समझदारी का काम किया, तभी तो आज एक ओर जहां उनकी ज़िंदगी की कमी पूरी हो चुकी है, वहीं उस बेसहारा बच्ची को भी परिवार का प्यार और सहारा मिल गया.”
मोना बक्षी कहती हैं, “जो लोग इस डर से कि गोद लिया बच्चा हमसे अटैच हो पाएगा या नहीं, बच्चा एडॉप्ट करने से कतराते हैं, उन्हें ये याद रखना चाहिए कि जब बच्चा पैदा होता है तो उसका मां से भी कोई अटैचमेंट नहीं होता, वो मां से तब जुड़ता है जब वो उसे पहली बार गोद में लेती है और फिर धीरे-धीरे ये रिश्ता गहरा होता है.”

महिलाओं के लिए ज़रूरी है थोड़ी सतर्कता
कई बार महिलाएं करियर या किसी मुक़ाम पर पहुंचने की ख़ातिर मां बनने का फैसला टालती रहती हैं और जब वो बच्चा चाहती हैं, तो उनका शरीर साथ नहीं देता या किसी मेडिकल प्रॉब्लम की वजह से वो कंसीव नहीं कर पातीं. ऐसे में सब कुछ होते हुए भी वो तनाव से घिर जाती हैं और उन्हें अपनी सारी क़ामयाबी बेकार लगने लगती है. अतः करियर और बाक़ी चीज़ों के साथ ही ज़रूरी है कि अपनी ज़िंदगी के इस महत्वपूर्ण फैसले को हल्के में न लें और सही समय पर प्लानिंग कर लें. डॉक्टर किरण कोयले के अनुसार, “30 वर्ष के बाद प्रेग्नेंसी में कई तरह के कॉम्पलीकेशन हो सकते हैं.”

मां बनना ज़िंदगी का हिस्सा है, ज़िंदगी नहीं
अपनी तरफ़ से सावधानी बरतने और हर चीज़ का ख़्याल रखने के बाद भी यदि आप मां नहीं बन पाती हैं, तो इस ग़म को दिल से लगाकर बैठने की बजाय ख़ुद को ख़ुश करने के दूसरे तरी़के निकालिए. समाज और परिवार क्या कहेगा? की चिंता छोड़ दीजिए. यदि आपका दिल कहता है कि बच्चा गोद लेकर आप इस कमी को पूरा कर सकती हैं, तो बेझिझक अपने दिल की सुनिए. हो सकता है, घरवाले इसका विरोध करें, मगर ये ज़िंदगी आपकी है और इसे अपनी मर्ज़ी व ख़ुशी से जीने का आपको पूरा हक़ है. मां बनना किसी भी औरत की ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा है, मगर ये ज़िंदगी नहीं है. क्या पिता न बनने पर पुरुष जीना छोड़ देते हैं? नहीं ना, तो फिर महिलाएं ऐसा क्यों करती हैं? वैसे भी मां बनने के लिए बच्चे पैदा करना ज़रूरी नहीं है. यशोदा ने कृष्ण को जन्म नहीं दिया था, मगर उनकी मां तो वही कहलाती हैं, क्योंकि उन्होंने कृष्ण को दिल से प्यार किया, आप भी ऐसा कर सकती हैं.

एक्सपर्ट स्पीक
यदि हम सोच बदल लें तो आईवीएफ और सरोगेसी की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. किसी बेघर अनाथ को अच्छी ज़िंदगी देकर हम अपने घर और उसकी ज़िंदगी दोनों को रोशन कर सकते हैं.     – मोना बक्षी, साइकोलॉजिस्ट

लोगों की संकुचित मानसिकता के लिए कहीं न कहीं मीडिया भी ज़िम्मेदार है. कई सीरियल्स में वही दकियानूसी सोच दिखती है कि मां न बन पाने पर ज़िंदगी अधूरी है. ये ग़लत है और इसे बदलने की ज़रूरत है.       – निमिषा रस्तोगी

– कंचन सिंह