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लोग क्या कहेंगे का डर क्यों नहीं निकलता जीवन से? (Stop Caring What Others Think)

Others Think
लोग क्या कहेंगे का डर क्यों नहीं निकलता जीवन से? (Stop Caring What Others Think)

–    अरे, ये क्या पहना है? लोग देखेंगे, तो क्या कहेंगे…?

–    रीना, तुम लड़की होकर इतनी ज़ोर-ज़ोर से हंसती हो, तमीज़ नहीं है क्या, लोग क्या कहेंगे?

–    शांतनु, तुम दिनभर क्लासिकल डांस की प्रैक्टिस में लगे रहते हो, लोग क्या कहेंगे कि शर्माजी का बेटा लड़कियोंवाले काम करता है…

–    गुप्ताजी के दोनों बच्चे डॉक्टरी कर रहे हैं, तुम दोनों को भी इसी फील्ड में जाना होगा, जमकर पढ़ाई करो…

…इस तरह की बातें हम अक्सर सुनते और ख़ुद भी कहते आए हैं, क्योंकि हम समाज में रहते हैं और ऐसे समाज में रहते हैं, जहां दूसरे क्या सोचेंगे, यह बात ज़्यादा मायने रखती है, बजाय इसके कि हम ख़ुद क्या चाहते हैं. हम ‘लोग क्या कहेंगे’ की चिंता में इतने डूबे रहते हैं कि अपने अस्तित्व को ही भूल जाते हैं. कपड़ों से लेकर खान-पान, करियर व शादी-ब्याह जैसे निर्णय भी दूसरे ही हमारे लिए अधिक लेते हैं.

दूसरे इतने अपने क्यों?

–    “रिंकू, तुम्हारी अधिकतर सहेलियों की शादी हो गई है, तुम कब तक कुंआरी रहोगी? अक्सर सोशल गैदरिंग में सब पूछते रहते हैं कि बेटी की शादी कब करोगे… हम क्या जवाब दें उन्हें?”

“मॉम, आप तो जानती हैं कि मैं अभी अपने करियर पर फोकस करना चाहती हूं, शादी के बारे में सोचा भी नहीं… दूसरों का क्या है, वो तो कुछ भी पूछते रहते हैं…” रिंकू ने मम्मी को समझाने की कोशिश की.

–    “मिसेज़ वर्मा बता रही थीं कि उनकी बेटी ने इतनी डिग्रियां ले लीं कि अब उसके लिए उसके स्तर का लड़का ढूंढ़ना मुश्किल हो गया है. सोनल, तू भी पीएचडी शादी के बाद ही करना, क्योंकि ज़्यादा पढ़-लिख  जाओगी,  तो  लड़के  मिलने  मुश्किल हो जाएंगे…”

“लेकिन मम्मी, पढ़ाई करना ग़लत बात थोड़ी है, स़िर्फ शादी को ध्यान में रखते हुए तो हम ज़िंदगी के निर्णय नहीं ले सकते. वैसे भी मैं तो शादी ही नहीं करना चाहती. इसमें दूसरों को क्यों एतराज़ है? ये मेरी ज़िंदगी है, जैसे चाहे, वैसे जीऊंगी…” सोनल ने भी अपनी मम्मी को समझाने की कोशिश की…

शर्माजी के बेटे ने भी घरवालों को समझाने की कोशिश की कि क्लासिकल डांस स़िर्फ लड़कियां ही नहीं, लड़के भी कर सकते हैं और वो इसी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता है, लेकिन उसके पैरेंट्स यह समझने को तैयार ही नहीं थे. उन्हें अपने बेटे के सपने पूरे करने में उसका साथ देने की जगह लोक-लाज की फ़िक़्र थी कि लोग क्या कहेंगे… दूसरे उनका मज़ाक उड़ाएंगे… आदि… लेकिन इन सभी पैरेंट्स को इस बात की अधिक चिंता थी कि लोग क्या कहेंगे… बच्चों ने उन्हें समाज से नज़रें मिलाने के काबिल नहीं छोड़ा… दरअसल, हम समाज की और दूसरों की इतनी ज़्यादा परवाह करते हैं कि हमारी ज़िंदगी में हस्तक्षेप करना वो अपना अधिकार समझने लगते हैं. अक्सर हमारे निर्णय दूसरों की सोच को ध्यान में रखते हुए ही होते हैं.

हमारी पहली सोच यह होती है कि रिश्तेदार और आस-पड़ोसवाले इन बातों पर कैसे रिएक्ट करेंगे…

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Office Gossip

इतना डर क्यों लोगों का?

–    हमारी सामाजिक संरचना शुरू से ही ऐसी रही है और इसी संरचना में हम भी

पले-बढ़े हैं, जिससे अंजाने में ही यह डर हमारी सोच का हिस्सा बन जाता है.

–    हर बात को हम अपनी इज़्ज़त और खानदान से जोड़कर देखते हैं, यही वजह है कि अधिकतर निर्णय हम सच जानते हुए भी नहीं ले पाते, क्योंकि हममें इतनी हिम्मत ही नहीं होती.

–    बेटी की सगाई तो कर दी, पर शादी की तैयारियों के बीच यह पता लगा कि जहां शादी होनेवाली है, वो लोग लालची हैं. ऐसे में पैरेंट्स उनकी डिमांड पूरी करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देते हैं और यहां तक कि लड़कियां भी सब कुछ जानते हुए निर्णय लेने से कतराती हैं, क्यों? …क्योंकि सगाई टूट गई, तो लोग क्या कहेंगे? समाज में बदनामी हो जाएगी, बेटी को कोई दूसरा लड़का नहीं मिलेगा… आदि… इत्यादि…!

–    इसी डर की वजह से लड़कियां असफल शादियों को भी निभाती हैं, क्योंकि हमारा समाज आज भी तलाक़शुदा महिलाओं को अच्छी नज़र से नहीं देखता.

–    हम पर सोशल प्रेशर इतना ज़्यादा हावी रहता है कि हम उसे ही पैमाना मानते हैं और फिर ज़िंदगी से जुड़े अत्यधिक निजी ़फैसले भी उसी के अनुसार लेते हैं.

–    हमें यह सब सामान्य लगता है, क्योंकि हम शुरू से यही करते व देखते आए हैं. पर दरअसल, यह बेहद ख़तरनाक है.

–    समाज की मानसिकता भी इस डर को और बढ़ाती है. देश में खाप पंचायतों के कई निर्णयों ने भी यह दिखा दिया है कि किस तरह से पुलिस-प्रशासन भी बेबस नज़र आता है सामाजिक दबाव के चलते.

–    इस तरह की घटनाएं आम लोगों के मन में और भी दबाव व डर को बढ़ाती हैं, जिससे उन्हें भी यही लगता है कि हर छोटे-बड़े निर्णयों में समाज की सोच का भी ख़्याल रखना ज़रूरी है.

–    कॉलेजेज़ से लेकर कई नेताओं तक ने लड़कियों के जींस पहनने व मोबाइल फोन रखने को उनके बलात्कार का कारण मानकर इन पर रोक लगाने की बात कई बार कही है.

–    लड़कियों के पहनावे पर कई तरह की बातें अभी भी होती हैं, जबकि हम ख़ुद को एडवांस सोसायटी मानने लगे हैं.

–    ये बातें हमारे मन में भी इतनी हावी हो जाती हैं कि हमें भी लगता है कि बच्चियों को सुरक्षित रखने का बेहतर तरीक़ा यही है कि जो समाज सोचे, वही हम भी करें.

inquisitive

कैसे निकलेगा यह डर?

–    सीधी-सरल बात है कि अपनी सोच बदलिए, समाज की सोच भी बदलती जाएगी.

–    जहां जवाब देना सही लगे, वहां बोलने से हिचकिचाएं नहीं.

–    समाज की सोच के विपरीत बोलना मुश्किल ज़रूर होता है, पर यह नामुमकिन नहीं है.

–    बात जहां सही-ग़लत की हो, तो लोग भले ही कुछ भी सोचें, हमेशा सही रास्ता ही सही होता है.

–    समाज आपकी ज़िंदगी की मुश्किलों को आसान करने कभी नहीं आएगा. वो मात्र दबाव बना सकता है, हमें उनके अनुसार निर्णय लेने के लिए बाध्य करने की कोशिश कर सकता है, हम पर हंस सकता है, हमारी निंदा कर सकता है. लेकिन इन बातों से इतना प्रभावित नहीं होना चाहिए कि अपनी ज़िंदगी से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय भी हम उन्हीं के अनुसार लें.

–    लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर हम अपनी या अपने बच्चों की ख़ुशियां, उनके सपनों को छोड़ नहीं सकते, वरना यह डर हमारे बाद हमारे बच्चों के दिलों में भी घर कर जाएगा और यह सिलसिला चलता ही रहेगा.

–    बेहतर होगा अपनी सोच व अपने निर्णयों पर दूसरों को हम इतना हावी न होने दें कि हमारा ख़ुद का अस्तित्व ही न रहे.

–    हमें क्या करना है, कैसे करना है यह हमें ही तय करना है. हां, दूसरों की सहायता ज़रूर ली जा सकती है. अगर कहीं कोई कंफ्यूज़न है तो… लेकिन अंतत: हमें ही रास्ता निकालना है.

– गीता शर्मा

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हेल्दी टिफिन आइडियाज़ (Healthy Tiffin Ideas)

Healthy Tiffin Ideas

हेल्दी टिफिन आइडियाज़ (Healthy Tiffin Ideas)

बच्चों को खाना खिलाना किसी चैलेंज से कम नहीं, क्योंकि बच्चों को रोज़ एक जैसा खाना पसंद नहीं आता. बच्चों को टिफिन में क्या दें, जो हेल्दी भी हो और टेस्टी भी, इस बात को लेकर लगभग सभी माएं परेशान रहती हैं. आपकी इस मुश्किल को सुलझाने के लिए हमने जुटाए हैं हेल्दी टिफिन आइडियाज़.

–    बच्चे के टिफिन के लिए यदि परांठे बना रही हैं, तो आटे को पानी की बजाय पकी हुई पीली दाल में गूंधें. चाहें तो इसमें कटा हुआ प्याज़, हरा धनिया, अदरक-लहसुन का पेस्ट, नींबू का रस भी मिला सकती हैं, फिर इसके परांठे बना लें.

–    ज्वार, बाजरा, रागी, नाचनी आदि का आटा मिक्स करके उसमें सब्ज़ियां स्टफ़ करके बच्चों के लिए हेल्दी परांठे बनाएं.

–    बच्चों के फेवरेट नूडल्स में ढेर सारी सब्ज़ियां डालकर उसे हेल्दी बनाएं.

–    पास्ता बनाते समय उसमें भी ख़ूब सारी सब्ज़ियां डाल दें.

–    यदि ढोकला बना रही हैं, तो दो ढोकले के बीच में एक पनीर या चीज़ की लेयर रख दें.

–    टिफिन के लिए यदि सूजी का उपमा बना रही हैं, तो उसमें बारीक़ कटी हरी सब्ज़ियां डाल दें.

–    सूजी की बजाय आप दलिया का उपमा भी बना सकती हैं और इसमें भी कटी हुई सब्ज़ियां डाल सकती हैं.

–   इसी तरह पोहा बनाते समय उसमें कटी हुई सब्ज़ियां, कॉर्न, पनीर आदि मिला सकती हैं.

–    आलू टिक्की बना रही हैं, तो उसमें उबला व पीसा हुआ राजमा मिला दें.

–    इडली बनाते समय भी उसमें कटी हुई सब्ज़ियां या सब्ज़ियों को पीसकर डाल दें.

–    पाव भाजी बना रही हैं, तो सब्ज़ी बनाते समय उसमें कॉर्न, पनीर आदि भी मिक्स करें.

–    सैंडविच में मिक्स वेजीटेबल्स भी स्टफ़ कर सकती हैं.

–    ऑमलेट बना रही हैं. तो उसमें शिमला मिर्च, प्याज़, टमाटर आदि काटकर डाल दें. इससे टिफिन और हेल्दी बन जाएगा.

–    बच्चों के टिफिन के लिए डोसा बनाते समय उसे मैक्सिकन स्टाइल में बनाएं. इसके लिए उसमें आलू स्टफ करने की बजाय लंबाई में पतली-पतली कटी सब्ज़ियां स्टफ कर लें.

–   हरी मूंगदाल के चीले भी बेस्ट ऑप्शन हैं. इसके लिए हरी मूंगदाल को रातभर पानी में भिगोकर रखें. सुबह पीसकर उसमें नमक, हरी मिर्च, अदरक-लहसुन का पेस्ट, कटा हुआ प्याज़, नींबू का रस आदि मिलाकर चटपटे और हेल्दी चीले बनाएं.

–    आटे में बारीक़ कटी या पीसी हुई सब्ज़ियां मिलाकर भी चीले बनाए जा सकते हैं.

–    यदि बच्चा चाट या भेल की फ़रमाइश करे, तो उसमें उबले कॉर्न, राजमा, चना, सोया आदि डाल दें.

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मनी मैटर – बच्चों से डिस्कस करते समय न करें ये ग़लतियां (Money Matters: Do not discuss these points to children)

परवरिश

परवरिश

दिनोंदिन बढ़ती महंगाई के इस दौर में बच्चों को भी पैसों की अहमियत समझाना बेहद ज़रूरी है ताकि आगे चलकर उन्हें फायनांशियल मामलों में परेशानी न हो और वो संभालकर ख़र्च करें. यदि आप बच्चों को पैसों की अहमियत समझाना चाहती हैं, तो बचें इन ग़लतियों से.

अच्छे मार्क्स लाने पर गिफ्ट/पैसे देने का लालच
राहुल इस बार अगर तुम 90% मार्क्स लाओगे मैं तुम्हें साइकिल लाकर दूंगी या तुम जो चाहोगे तुम्हें मिल जाएगा. अक्सर माता-पिता बच्चों से ऐसे ही वादे करते हैं, उन्हें लगता है ऐसा करने से उनका बच्चा पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित होता है, मगर आपका ये रवैया बच्चे के भविष्य के लिए सही नहीं है. उन्हें लालच देने की बजाय पढ़ाई की अहमियत समझाएं और बताएं कि ऐसा न करने पर भविष्य में उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करना अच्छा है, लालच देकर ऐसा करना सही नहीं है. बच्चे को समझ आना चाहिए कि वो अपने भले के लिए पढ़ाई कर रहे हैं न कि कोई चीज़ पाने के लिए.

घर के काम करने पर पैसे देना
पूजा बेटा ज़रा दुकान से नमक का पैकेट तो ले आना और ये तो 10 रुपए अपने लिए फ्रूटी ले लेना. क्या आप भी घर का कोई काम करवाने के लिए बच्चे को ऐसे ही रिश्‍वत देती हैं. पैरेंट्स का ये तरीक़ा सही नहीं है. इससे बड़े होने पर भी बच्चे घर के काम को अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझेंगे, वो यही उम्मीद करेंगे कि हर काम के लिए उन्हें गिफ्ट या पैसे मिले. इस तरह से न तो वह अपनी ज़िम्मेदारी समझेंगे और न ही पैसों की अहमियत.

बेटे-बेटियों में फर्क़ करना
आज भी कुछ घरों में बेटे-बेटियों में फर्क़ किया जाता है. कुछ पैरेंट्स स़िर्फ बेटे के साथ ही पैसों से जुड़े मामलें पर बात करते हैं, स़िर्फ उन्हें ही समझाते हैं कि पैसे कैसे ख़र्च करने चाहिए, कैसे बचत करनी चाहिए आदि. पैरेंट्स का ये रवैया ग़लत है चूकि आज लड़ियां भी पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर/देश जाती हैं. ऐसे में उनके लिए भी फायनांशियल एज्युकेशन उतनी ही ज़रूरी है जितनी लड़कों के लिए.

बच्चों के सामने फिज़ूलख़र्च करना
बेटा आपको रोज़-रोज़ नए खिलौने नहीं मिल सकते. पैसे बहुत मेहनत से आते हैं उन्हें बस खिलौनों और बेकार की चीज़ों पर ख़र्च नहीं करना चाहिए. आपने अपने बच्चे को तो नसीहत दे दी, मगर ख़ुद 4 जोड़ी नए जूते ले आए, ऐसे में ज़ाहिर है बच्चा आपकी फिज़ूलख़र्च की परिभाषा समझ नहीं पाएगा. उसके लिए दो विडियो गेम अगर फिज़ूलख़र्च है तो एकसाथ ख़रीदे गए आपके 4 जोड़ी जूते भी उसी कैटेगरी में आएंगे. अतः बच्चे को नसीहत देने से पहले ख़ुद अपने आप को सुधारें. क्योंकि वो वही करते और समझते हैं जैसा पैरेंट्स को करते देखते हैं.

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छोटी उम्र से बात न करना
जब बच्चा थोड़ा समझने लगे तो उसे पिग्गी बैंक लाकर दें और उसमें पैसा जमा करना सिखाए इससे बच्चे को बचत की आदत पड़ेगी. उनकी हर डिमांड तुरंत पूरी करने की ग़लती न करें वरना वो पैसों की क़द्र कभी नहीं कर पाएंगे. यदि आप बच्चे को पॉकेट मनी देती हैं, तो उसका भी हिसाब रखें. ज़रूरत से ज़्यादा पैसे न दें. आज के दौर में जहां कपड़े, जूतों से लेकर खाने-पीने की हर चीज़ की ब्रांडिग हो गई है बच्चे भी अमुक ब्रांड की चॉकलेट और चीज़ पहचानने लगे हैं ऐसे में यदि शुरुआत से ही उन्हें पैसों की अहमियत नहीं समझाई गई, तो आगे चलकर उन्हें समस्या आएगी. अतः जैसे-जैसे बच्चे की उम्र बढ़ती जाए उन्हें एक-एक करके बचत और ख़र्च का सही तरीक़ा समझाएं.

रखें इन बातों का ख़्याल
* यदि आप बच्चे को पॉकेट मनी देती हैं, तो उसमें ख़र्च का हिसाब लिखने की आदत भी डालें. इससे उसे पता चलेगा कि उसने कितना ख़र्च किया है.
* बच्चे ने पैसे मांगे नहीं कि कुछ पैरेंट्स तुरंत उनकी डिमांड पूरी कर देते हैं बिना ये पूछे कि उन्हें पैसे क्यों चाहिए. आप ऐसी ग़लती न करें. यदि बच्चा आपसे पैसे मांगता है तो सबसे पहले उससे पूछे कि उसे पैसे क्यों चाहिए. बिना पूछे हमेशा उनकी मांग पूरी करने से वो पैसों की अहमियत नहीं समझेगा.
* बच्चे को पैसों की शेयरिंग भी सिखाएं. उसे कहे कि वो अपने भाई-बहन के लिए अपने पैसों से गिफ्ट ख़रीदें.
* पिग्गी बैंक में पैसे जमा करने की आदत डालें और जब वो भर जाए तो उन पैसों से उसे अपनी पसंद की चीज़ ख़रीदने के लिए कहें.
* जब बच्चा थोड़ा समझदार हो जाए तो उसे अपनी आर्थिक स्थिति से अवगत कराएं ताकि वो अपने दोस्तों की देखा-देखी हर चीज़ की डिमांड न करें. उसे समझ आना चाहिए की हर किसी का आर्थिक स्तर अलग होता है और उसे उसी के हिसाब से ख़र्च करना चाहिए.

कंचन सिंह

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बच्चों में बढ़ता निमोनिया का ख़तरा (Pneumonia: Symptoms & cause)

निमोनिया

निमोनिया

निमोनिया वैसे तो हर उम्र के लोगों के लिए ख़तरा होती है लेकिन इसका आक्रमण छोटे बच्चों, ख़ासकर नवजात शिशु से लेकर पांच साल के बच्चों को सबसे ज़्यादा होता है. यह बीमारी क़रीब-क़रीब हर मिनट देश के एक भविष्य को मौत की नींद सुला देती है. सबसे अहम् निमोनिया भारत में सर्दियों में विकराल रूप धारण कर लेती है. लिहाज़ा, ज़रूरत है वक़्त रहते चौकस होने की ताकि ढेर सारे नौनिहालों को इसकी भेंट चढ़ने से बचाया जा सके.

कैसे होता है निमोनिया ?
दरअसल, निमोनिया एक संक्रमण बीमारी है. हवा में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस सांस के ज़रिए फेफड़ों में पहुंच कर उसे संक्रमित कर देते हैं. कई बार फंफूद की वजह से भी संक्रमण हो जाता है. लंग डिसीज़ या हार्ट डिसीज़ से पीड़ित व्यक्तियों को सीवियर निमोनिया होने का खतरा हमेशा रहता है. अब इसका इलाज संभव हो गया है. किसी क्वालिफाइड डॉक्टर से एंटीबॉयोटिक दवा लेकर निमोनिया से पूरी तरह मुक्त हुआ जा सकता है. आमतौर पर बैक्टीरिया जनित निमोनिया से पीड़ित मरीज़ दो से चार सप्ताह में ठीक हो जाता है. मगर वायरल जनित निमोनिया से पीड़ित मरीज़ के ठीक होने में ज़्यादा वक़्त लगता है. मरीज़ को तेल, मसालेदार और बाहर के खाने का परहेज करना चाहिए. पानी खूब पीना चाहिए.

निमोनिया के लक्षण

  • बुख़ार 103 या 104 डिग्री फारेनहाइट पहुंचना.
  • तेज़ सर्दी लगना और शरीर का ठंडा पड़ जाना.
  • खांसी के दौरान ललाई युक्तन कफ निकलना.
  • सीने में तेज़ दर्द व सांस लेने में भी कठिनाई.
  • त्वचा नीला पड़ना व मितली जैसा महसूस होना.
  • भूख न लगना, जोड़ों व टिश्यूज़ में दर्द होना.

अगर आपके बच्चे को 103 या 104 डिग्री फारेनहाइट तक बुख़ार है? उसे सर्दी भी लग रही है. शरीर भी ठंडा पड़ रहा है? उसे खांसी के साथ भी है, सीने में दर्द भी है. वह सांस लेने में कठिनाई महसूस कर रहा है? तो उसे शर्तिया निमोनिया बुख़ार है, क्योंकि ये तमाम लक्षण निमोनिया के ही हैं. ज़रूरत है फ़ौरन अलर्ट होने की, क्योंकि अपने देश में 4.30 करोड़ लोग निमोनिया से ग्रस्त हैं. 

हर घंटे 45 बच्चे तोड़ते हैं दम
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन की रिपोर्ट के
मुताबिक़ भारत में निमोनिया से हर
घंटे 45 से ज़्यादा बच्चों की
मौत हो जाती है.

निमोनिया के कारण

  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की छवि में निमोनिया का आम कारण बैक्टीरियम स्ट्रेप्टोकॉकस निमोनिया.
  • निमोनिया मुख्य रूप से बैक्टीरिया या वायरस द्वारा और कम आमतौर पर फफूंद और परजीवियों द्वारा होता है. हालांकि संक्रामक एजेंटों के 100 से ज़्यादा उपभेदों की पहचान हुई है लेकिन अधिकांश मामलों के लिये इनमें केवल कुछ ही ज़िम्मेदार हैं.
  • वायरस व बैक्टीरिया के मिश्रित कारण वाले संक्रमण बच्चों के संक्रमणों के मामलों में 45 फ़ीसदी तक और वयस्कों में 15 फ़ीसदी तक ज़िम्मेदार होते हैं. सावधानी के साथ किए गए टेस्ट के बावजूद क़रीब आधे मामलों में कारक एजेंट अलग नहीं किए जा सकते.
  • निमोनिया होने की संभावना को बढ़ाने वाले हालात और जोखिम कारकों में धूम्रपान, कमज़ोर इम्यूनिटी और तथा शराब की लत, सीरियस लंग डिसीज़, किडनी डिसीज़ और लिवर डिसीज़ शामिल हैं. एसिडिटी दबाने वाली दवाओं जैसे प्रोटॉन-पंप इन्हिबटर्स या एचटू ब्लॉकर्स का उपयोग निमोनिया के बढ़े जोखिम से संबंधित है.
  • उम्र का अधिक होना निमोनिया के होने को बढ़ावा देता है.

टीका, उचित पौष्टिक आहार
और पर्यावरण की स्वच्छता
के ज़रिए निमोनिया की
रोकाथाम संभव है.

धोनी की अपील- धूप में जलने दें बच्चों को, तभी ओलिंपिक में आएगा मेडल (Let them Play out, then only we’ll get more medal in Olympic games: dhoni)

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वनडे क्रिकेट टीम के कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी हर व़क्त देश के लिए सोचते हैं. कैसे देश का नाम रोशन किया जाए, इसके बारे में दिन हो या रात हर पल उनका दिमाग़ दौड़ता रहता है. टीम का मनोबल बढ़ानेवाले धोनी इस बार बच्चों और उनके पैरेंट्स का मनोबल बढ़ाने वाली बात कह गए. धोनी ने देश के सभी पैरेंट्स से कहा कि देश में खेल के प्रति वो भी अपना योगदान दें. आख़िर क्या कहा धोनी ने? आइए, जानते हैं.

धूप में जलने दें… तभी ओलिंपिक में आएगा मेडल
ओलिंपिक खेलों में ज़्यादा से ज़्यादा मेडल देश की झोली में आएं, इसके लिए धोनी ने देश के सभी पैरेंट्स से अपील की है कि वो अपने बच्चों को महंगे गैजट्स देने की बजाय उन्हें घर के बाहर खेलने के लिए प्रेरित करें. बच्चों को धूप में जाने दें, उन्हें थोड़ा तपने दें, उनके पसंद का खेल खेलने दें, पसीना बहने दें, तभी देश के खाते में ज़्यादा से ज़्यादा मेडल आएंगे.

हम आपको बता दें कि टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेनेवाले धोनी कुछ दिनों के लिए फ्री हैं. ऐसे में वो कई तरह के प्रमोशनल इवेंट्स में हिस्सा ले रहे हैं. धोनी अपने आप में एक हस्ती हैं. बच्चों में उनका बेहद क्रेज़ है. हो सकता है कि धोनी की ये बात बच्चों के दिमाग़ में बैठ जाए और भविष्य में देश के खाते में ज़्यादा से ज़्यादा मेडल आए.

बनें स्पेशल एज्युकेटर (Become special teacher)

डॉक्टर, इंजीनियर से अलग कुछ और बनने की चाह मन में है, तो स्पेशल एज्युकेशन में करियर बनाना आपके लिए बेहतर विकल्प होगा. इसकी डिमांड भी लगातार बढ़ रही है. स्पेशल टीचिंग में आप किस तरह अपना करियर बना सकते हैैंं? जानने के लिए हमने बात की करियर काउंसलर मालिनी शाह से.

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स्पेशल टीचर बनने के लिए आवश्यक गुण
स्पेशल बच्चों को शिक्षित करना आसान काम नहीं है. इस तरह के बच्चों को बहुत ज़्यादा प्यार और समय की ज़रूरत होती है. ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए अच्छा दिमाग़ ही नहीं, दिल भी चाहिए. स्पेशल टीचर बनने के लिए इन चीज़ों की ज़रूरत होती हैः

  • शारीरिक और मानसिक रूप से मज़बूत होना इस प्रोफेशन की पहली प्राथमिकता है.
  • इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए दिमाग़ से ज़्यादा दिल मज़बूत होना चाहिए, क्योंकि स्पेशल चिल्ड्रेन को हैंडल करने के लिए संयम की बहुत आवश्यकता होती है.
  • एक बार भी ग़ुस्से से की गई बात आपको इस क्षेत्र में बहुत पीछे छोड़ सकती है.
  • भावनात्मक रूप से बच्चों के मन पर क़ाबू पाने के बाद ही आप स्पेशल चिल्ड्रेन को पढ़ा सकते हैं.
  • एक-एक बच्चे के साथ आपकी बातचीत व जुड़ाव बेहद ज़रूरी है.
  • यदि आपको बच्चों से प्यार नहीं, तो भूलकर भी इस प्रोफेशन में क़दम न रखें.
  • क्रिएटिव और उत्साह बढ़ाने वाला व्यक्ति ही सफल स्पेशल एज्युकेटर बन सकता है.
  • आपकी याददाश्त बहुत मज़बूत होनी चाहिए, ताकि आप हर बच्चे की प्रोग्रेस रिपोर्ट को ध्यान में रखकर उसके अनुसार काम कर सकें.

शैक्षणिक योग्यता

स्पेशल एज्युकेशन में बीएड.

इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए बारहवीं तक के विषयों में साइकोलॉजी सब्जेक्ट अनिवार्य है.

रिमीडियल एज्युकेशन में ग्रैज्युएशन और पोस्ट-ग्रैज्युएशन डिप्लोमा होना अनिवार्य है.

कम से कम स्पेशल एज्युकेशन टीचिंग प्रोग्राम में ग्रैज्युएशन करना अनिवार्य है.

कई राज्यों में स़िर्फ मास्टर डिग्री से भी काम चल जाता है.

कई राज्यों में बीए के बाद स्पेशल टीचिंग के समतुल्य कुछ कोर्सेस कराए जाते हैं.

अपने आप से पूछें सवाल
इस क्षेत्र में आगे बढ़ने से पहले अपने आप से निम्न सवाल ज़रूर पूछें. अगर इनका उत्तर आपको हां में मिलता है, तो बिना देर किए इस क्षेत्र में आगे बढ़ जाइए.

  • क्या आप बहुत सारा पेपरवर्क करने के लिए तैयार हैं?
  • क्या आप संयमी हैं?
  • क्या आप इन बच्चों के साथ प्यार से समय बिता पाएंगे?
  • क्या आपके पास सही डिग्री है?
  • क्या आपमें इतनी क्षमता है कि इन बच्चों के साथ आप इनकी फैमिली के नकारात्मक विचारों को भी सकारात्मक बना सकें?

स्पेशल चिल्ड्रेन को कैसे करें हैंडल?
स्पेशल चिल्ड्रेन को पढ़ाते समय आप उन्हें स़िर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि बहुत-सी ऐसी बातें भी सिखाते हैं, जो उन्हें पहले से पता नहीं होतीं. ऐसे बच्चों की क्लास में जाने से पहले इन बातों पर ज़रूर ग़ौर करेंः

स्टूडेंट्स के मेंटल हेल्थ के बारे में जानें
आम बच्चों की तरह स्पेशल चिल्ड्रेन क्लास में आसानी से सब कुछ सीखने के लिए तैयार नहीं रहते. ऐसे में कई बार टीचर्स को काफी मेहनत करनी पड़ती है. ऐसे में जब तक आपको बच्चे के मानसिक संतुलन का सही पता नहीं चलेगा, आप उसके साथ न्याय नहीं कर पाएंगे.

बच्चों की क्षमता के अनुसार पढ़ाएं
शारीरिक और मानसिक बीमारियों से ग्रसित स्पेशल बच्चों को अचानक कुछ सिखाने से पहले उनकी क्षमता के बारे में जानना बहुत ज़रूरी है, जैसे- एक घंटे में किसी विषय पर वो कितना ध्यान लगा सकते हैैं, किन बातों में उन्हें ज़्यादा मज़ा आ रहा है, किसी काम को करने में वो कितना समय लेते हैं? ऐसा करने से आपको बच्चों की सही स्थिति का ज्ञान होगा और उन्हें अच्छी शिक्षा देने में आप कामयाब होंगे.

ये न भूलें कि वो भी बच्चे हैं
ग़ुस्से में आकर कोई भी सज़ा देने से पहले इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि वो भी बच्चे हैं. उन्हें आपके सपोर्ट और प्यार की ज़रूरत है. आप पर ही उनके भविष्य की उम्मीद टिकी है.

बच्चों के पैरेंट्स से मिलें
स्पेशल टीचर बनने के लिए आपकी ज़िम्मेदारी स़िर्फ स्कूल तक सीमित नहीं रहती. सही मायने में आप ऐसे बच्चों के कम्प्लीट गाइड होते हैं. इन बच्चों में सुधार तभी संभव है, जब आपको इनकी वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो. अतः जितना संभव हो इनके पैरेंट्स से मिलें और इनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानने की कोशिश करें.

चुनौतियां
शिक्षा से जुड़े दूसरे टीचर्स की अपेक्षा स्पेशल टीचर्स की राह बहुत कठिन है. इसमें हर कोई सफल नहीं हो पाता. क्या हैं वो चुनौतियां? आइए, जानते हैं.

  •  इस क्षेत्र में काम की सराहना बहुत कम मिलती है, जिसके कारण कई लोग इसे जल्दी ही छोड़ देते हैं.
  •  स्पेशल टीचिंग में करियर बनाते व़क्त कई बार अपने ही लोगों का सपोर्ट नहीं मिलता.
  •  डेटा कलेक्शन का काम ज़्यादा होने के कारण कई बार लोग इस जॉब को छोड़ देते हैं.
  •  ज़्यादातर मामलों में बच्चों के पैरेंट्स का सपोर्ट नहीं मिलता. इसके कारण भी कई लोग जॉब छोड़ देते हैं.
  • स्टूडेंट्स की ग्रोथ न होने पर कई बार ख़ुद टीचर्स ही हार जाते हैं और उन्हें ये महसूस होने लगता है कि वे कुछ नहीं कर सकते.

मिशेल (फिल्म ब्लैक में रानी के क़िरदार का नाम) और झिलमिल (फिल्म बर्फी में प्रियंका चोपड़ा द्वारा निभाया गया क़िरदार) जैसे बच्चों को परिवार, समाज और अपने ही माता-पिता से कई बार उपेक्षा झेलनी पड़ती है. अपने ही घर में इनके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है. घर के अन्य सामान्य बच्चों की अपेक्षा इन्हें कम तवज्जो दी जाती है. शिक्षा के माध्यम से ऐसे बच्चों को आम बच्चों की तरह जीवन जीने में मदद की जा सकती है. इसके लिए पढ़ाई का अच्छा माहौल और अच्छी टीचर का होना ज़रूरी है. स्पेशल टीचिंग में करियर बनाकर आप ऐसे बच्चों के जीवन को नई दिशा दे सकते हैं. इससे आपको जॉब सेटिस्फैक्शन के साथ ही समाज के लिए कुछ करने का मौक़ा भी मिलेगा.

– श्वेता सिंह