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बच्चों से जुड़ी मनोवैज्ञानिक समस्याएं (Psychological Problems Associated With Children)

Bachcho se judi manovgyani samsaye

‘चाइल्ड इज़ द फादर ऑफ मैन’ यानी एक बच्चे के मन के भीतर एक पूरा का पूरा इंसान छिपा होता है. यदि हम एक शांत व विकासशील समाज की चाह रखते हैं, तो बच्चों के मन को अशांत होने से बचाना हमारी ज़िम्मेदारी बन जाती है. मनोवैज्ञानिकों द्वारा कराए गए एक सर्वे में पाया गया कि अपने बच्चों को बुरी तरह से प्रताड़ित करनेवाले अधिकतर अभिभावक ऐसे थे, जो बचपन में अपने पैरेंट्स द्वारा उपेक्षित व पीड़ित किए गए थे. बच्चों की तमाम मानसिक परेशानियों के बारे में हमने सायकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ से बात की. आइए, संक्षेप में जानते हैं.

बच्चों से जुड़ी कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं हैं, जैसे- एकेडैमिक मेंटल प्रॉब्लम, फिज़िकल मेंटल प्रॉब्लम, शरीर में कोई कमी, एकाग्र न होना, चिड़चिड़ापन आदि. ऐसे में यह देखना चाहिए कि बच्चे में ज़रूरी विटामिन्स जैसे बी12, बी3 पर्याप्त है या नहीं या फिर हीमोग्लोबिन की कमी तो नहीं है. यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो आज बच्चों में मिक्स प्रॉब्लम्स यानी मेंटल, एकेडैमिक, सायकोलॉजिकल, फिज़िकल- सभी का मिला-जुला रूप है.

एकैडेमिक से जुड़ी समस्याएं

पढ़ाई को लेकर बच्चों को होनेवाली समस्याओं, जैसे- तनाव, डर, असफलता की ग्लानि/आत्महत्या की प्रवृत्ति आदि को देखते हुए सरकारी शिक्षा नीति में उल्लेखनीय परिवर्तन किए गए. लेकिन इसके बावजूद छह से बारह साल तक के बच्चों की पढ़ाई को लेकर कुछ मानसिक समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं, ख़ासतौर पर अपने पैरेंट्स और टीचर्स की अपेक्षाओं को पूरा करने की कशमकश.
* 10 से 20% बच्चे कम्पटीशन के चलते इतना ज़्यादा पढ़ते हैं कि उनकी सोशल लाइफ ज़ीरो हो जाती है. इस तरह के बच्चे हमेशा टेेंशन में रहते हैं. अपने परफॉर्मेंस को लेकर, ख़ासकर जो बच्चा कई सालों से फर्स्ट आ रहा हो, तो उस पर इसे मेंटेन करने का दबाव बना रहता है. यह ज़रूरी नहीं कि जो बच्चा पहली-दूसरी कक्षा में फर्स्ट आता रहा है, वो नौंवीं में भी फर्स्ट ही आए. ब्रिलियंट स्टूडेंट्स भी उतार-चढ़ाव से गुज़रते हैं.
* ऐसे बच्चों के पैरेंट्स को उन्हें सोशल होने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. रिश्तेदार-दोस्तों से मिलने-जुलने के लिए प्रेरित करना चाहिए.
* बच्चों को भी पढ़ाई के अलावा दूसरी बातों के लिए थोड़ा स्पेस दें.
* टाइम टेबल बनाना अच्छी बात है, पर उसमें आधा से ज़्यादा समय पढ़ाई और कुछ देर ही मनोरंजन के लिए हो, यह ठीक नहीं है. * बच्चे के लिए पढ़ाई बहुत ज़रूरी है, बस ज़रूरत है बच्चों के दिलो-दिमाग़ में उसके प्रति दिलचस्पी और लगाव पैदा किया जाए.
* कई स्कूलों में बिहेवियर प्रॉब्लम्स, एकेडैमिक प्रॉब्लम्स, स्लो लर्नर आदि समस्याओं से जुड़े बच्चों के लिए क्लासेस व प्रोग्राम कराए जाते हैं.

शारीरिक समस्याओं को नज़रअंदाज़ न करें

जो बच्चे पढ़ने में कमज़ोर होते हैं, उन्हें पैरेंट्स के ताने-उलाहने सुनने पड़ते हैं, जिससे वे तनाव और हीनभावना से भी ग्रस्त हो जाते हैं. हो सकता है बच्चे को लर्निंग डिसएबिलिटी की समस्या हो या फिर एडीएचडी (अटेंशन डिफिट हायपरएक्टविटी डिसऑर्डर) या एडीडी (अटेंशन डिफिट डिसऑर्डर) की समस्या हो. पैरेंट्स-टीचर्स को बच्चे की इस समस्या को समझने की कोशिश करनी चाहिए.
* ऑटिज़्म बीमारी भी दिमाग़ी तंत्र से जुड़ी है. इससे ग्रस्त बच्चे का संवेदी तंत्र अव्यवस्थित होता है, जिससे वो सामान्य बच्चों की तरह नहीं रहता. इन बच्चों को भी विशेष देखभाल, प्यार और प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है.
* एसपर्जर, यह ऑटिज़्म का ही माइनर प्रॉब्लम है. इसमें बच्चा आई कॉन्टेक्ट कम रखता है, कम बोलता व सुनता है. केवल हां-ना में ही अधिक बात करता है. कभी-कभी तो ज़िंदगीभर इसका पता ही नहीं चलता है, जिसकी वजह से पैरेंट्स कोई ट्रीटमेंट भी नहीं करवा पाते हैं. लेकिन समय रहते मालूम होने पर इसका इलाज संभव है. फिर भी इस समस्या को बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं.
* व़क्त के साथ लड़कियों के प्यूबर्टी पीरियड में बदलाव आया है. अब 6-7 कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते लड़कियों को पीरियड होने लगते हैं. ऐसे में पैरेंट्स के लिए इसे डील करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है. लड़कियां भी अपने शरीर के इस बदलाव को लेकर कई बार तनावग्रस्त और हताश-परेशान हो जाती हैं.
* बेटियों के पैरेंट्स ख़ासकर मांएं बेसिक हार्मोंनल चेंजेस, पीरियड्स होने के कारण और केयर, सुरक्षित रख-रखाव आदि के बारे में उन्हें बताएं और समझाएं. बेटियों किो समझाएं कि इन बातों को वे जितनी सहजता से लेंगी, उतना ही रिलैक्स और तनावमुक्त रहेंगी.

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बिहेवियर प्रॉब्लम्स

आज बच्चों के बीच बिहेवियर इश्यू सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक समस्या बन गई है. एक ज़माना था, जब कई बच्चे होते थे और छोटों के लिए उनके बड़े भाई-बहन भी रोल मॉडल हुआ करते थे, पर अब एकल परिवार और एक ही बच्चा पालने की प्रवृत्ति ने बहुत कुछ बदल दिया है.

बच्चों का आक्रामक होनाः बच्चों के लिए आक्रामक व्यवहार उनकी इच्छापूर्ति का साधन होता है. उनमें धैर्य की कमी होती है. बच्चे को अपने आवेश पर नियंत्रण करना सिखाएं और उसे अपनी भावनाओं को शारीरिक माध्यम के स्थान पर शब्दों में अभिव्यक्त करने के लिए समझाएं. उसे समझाएं कि इस प्रकार उसके मित्र भी अधिक बनेंगे.
* बच्चे से धैर्य से बात करें और उसके असामान्य व्यवहार के कारणों को जानने की कोशिश करें. हो सकता है वो ख़ुद को असुरक्षित अनुभव कर रहा हो. आपका प्यार-दुलार उसकी मानसिक पीड़ा को शांत करेगा.
* हाइपर चाइल्ड है, तो हर रोज़ घर से बाहर, बगीचे या खेल के मैदान में ले जाएं. जहां वह पूरी आज़ादी से खेल सके, भागदौड़ सके.

ज़िद करनाः बच्चों को अपनी परिस्थिति से अवगत कराएं. उन्हें मॉरल वैल्यू के बारे में शुरू से समझाएं, क्योंकि इसी से अच्छे व्यक्तित्व की नींव बनती है. जब बच्चे बहुत छोटे होते हैं, तब शौक़ और ख़ुशी के चलते अभिभावक बच्चों की हर सही-ग़लत मांग पूरी करते जाते हैं, ऐसा न करें. इसी से थोड़ा बड़ा होने पर उसे शह मिलती है और वो अपनी बात को मनवाने के लिए ज़िद का सहारा लेने लगता है.

झूठ बोलनाः बच्चे के टीचर्स से मिलकर उसकी झूठ बोलने की आदत के बारे में बात करें. कहीं पैरेंट्स या टीचर्स की सख़्ती और मार के डर से तो बच्चा झूठ नहीं बोल रहा. बच्चे के झूठ बोलने पर सज़ा देने की बजाय प्यार से झूठ बोलने के कारणों के बारे में जानने की कोशिश करें. यदि पैरेंट्स बच्चों को खुला और स्वस्थ माहौल दें, तो बच्चे शायद ही झूठ बोलें.

डरपोक और दब्बू होनाः अक्सर पैरेंट्स द्वारा बचपन में बच्चों को भूत-अंधेरे आदि का डर दिखाया जाता है. ये सभी बातें उनके अंतर्मन में कहीं न कहीं गहराई तक पैठ जाती हैं. वे नहीं जानते कि ऐसा करके जाने-अनजाने में वे अपने बच्चे का आत्मविश्‍वास कमज़ोर कर रहे हैं. ऐसा न करें. बेहतर होगा कि पैरेंट्स बच्चों के साथ एडवेंचर्स से भरपूर गेम्स खेलें. बहादुर और प्रेरणास्त्रोत महान लोगों की क़िस्से-कहानियां सुनाएं. यदि ज़रूरत हो, तो पर्सनैलिटी इम्प्रूवमेंट क्लास या फिर काउंसलर की मदद लेने से भी न हिचकें.

चोरी करना या चीज़ों को बिना बताए उठानाः चीज़ों को बिना पूछे उठा लेना यानी अप्रत्यक्ष रूप से चोरी करना आदि. कई बच्चे अनजाने में ऐसा करते हैं. इसे क्लेटो मेनिया कहते हैं. इसमें ज़रूरी नहीं कि बच्चा क़ीमती चीज़ें ही उठाए, वो ढेर सारे पेन-पेंसिल आदि भी उठा सकता है.
जब बच्चा पहली बार चोरी करे, तो शांत रहें. आकलन करें और चोरी का कारण ढूंढ़ें. बच्चे की मानसिक अवस्था को समझते हुए अच्छे उदाहरणों और प्यार से हैंडल करने पर बच्चा अपनी ग़लतियों में ज़रूर सुधार करेगा.
आईएमसी लेडीज़ विंग की प्रेसिडेंट लीना वैद्य का मानना है कि आज के दौर में बच्चे असुरक्षित माहौल, ज़िंदगी से अधिक महत्वाकाक्षांओं की उड़ान, थकान, तनाव आदि के साथ पल-बढ़ रहे हैं. नए-नए वीडियो गेम्स, प्ले स्टेशन ने उनकी आउटडोर एक्टिविटी़ज़, आउटडोर गेम्स आदि को भी कम कर दिया है. उस पर पढ़ाई व उनके पर्सनैलिटी से जुड़े अलग-अलग क्लासेस में भी वे उलझे रहते हैं. ऐसे में बच्चे सहजता से जीना नहीं सीख पाते, बल्कि हर समय प्रतिद्वंद्विता, पाने और आगे बढ़ने की होड़ के लिए ट्रेन्ड होते रहते हैं. इन सभी से बच्चे के अधिक दोस्त नहीं बन पाते और वे अकेलेपन से जूझते रहते हैं. इस तरह मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो ऐसे बच्चे दूसरों के साथ सहनशील होना और सामंजस्य बैठाना नहीं सीख पाते हैं. यदि पैरेंट्स अपने एटिट्यूड में थोड़ा-सा बदलाव लाएं, तो इसमें काफ़ी मदद मिल सकती है. पैरेंट्स अपने बच्चे की अन्य बच्चे से तुलना करने की बजाय उसमें मौजूद गुणों को प्रोत्साहित करें, बिना शर्त अपना प्यार-स्नेह लुटाएं, तो यक़ीनन बच्चे आत्मविश्‍वासी बनेंगे और ज़िंदगी की हर चुनौती का डटकर सामना करेंगे. साथ ही फिज़िकली, मेंटली और इमोशनली ख़ुशमिज़ाज इंसान भी बन सकेंगे.

एक्सपोज़र से उभरती सेक्सुअल समस्याएं

इन दिनों पांचवीं-छठी क्लास के बच्चों में इंटरनेट पर अश्‍लील चीज़ों को देखने जैसी समस्याएं भी उभरकर आने लगी हैं. माना पढ़ाई और व़क्त की मांग के चलते नेट सर्फिंग करना, कंप्यूटर आदि बच्चों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है, पर इसमें कुछ बच्चे जहां 25 चीज़ें काम की देखते हैं, तो 26 वीं ग़लत व अश्‍लील भी होती है. कई बार पोर्नोग्राफी देख उनमें एक्सपेरिमेंट की चाह बढ़ती है. लर्निंग डिसएबिलिटी पनपती है. ऐसे में सेक्स एजुकेशन ज़रूरी हो जाता है. साथ ही बच्चों को यह भी समझाया जाए कि क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं. काउंसलर्स का कहना है कि उनके यहां तीसरी-चौथी के बच्चों के केस आते हैं, जो स्कूल में टॉयलेट में अधिक जाते हैं, जहां वे अपने प्राइवेट पार्ट्स से खेलते हैं. मास्टरबेशन करते हैं आदि. यदि छह महीने का बच्चा अपने पेनीस से खेलता है, तो यह एक नॉर्मल बात है. लेकिन 7-8 साल का बच्चा करें, तो एब्नॉर्मल समझा जाता है. इसलिए पैरेंट्स अपने बच्चों के बिहेवियर पर भी बारीक़ी से नज़र रखें, क्योंकि ऐसे समय में उन्हें अपनों के सही मार्गदर्शन की सख़्त ज़रूरत होती है, ताकि सेक्स को लेकर भी उनका विकास सामान्य हो, मन में ग़लत बातें व ग्रंथियां न पनपें.

– ऊषा गुप्ता

 

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करें – Parenting Guide 

बच्चों में टेक एडिक्शन के साइड इफेक्ट्स

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बच्चों में बढ़ता मोबाइल और कंप्यूटर का इस्तेमाल उन्हें स्मार्ट तो बना रहा है, लेकिन इसके अत्यधिक इस्तेमाल से कई नुक़सान भी हो सकते हैं. इसलिए ज़रूरी है बच्चों को टेक एडिक्शन से बचाना.
क्या है टेक एडिक्शन?

टेक्नोलॉजी यानी मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट आज हमारी ज़रूरत बन गए हैं और इस टेक्नोलॉजी ने ज़िंदगी को आसान भी बना दिया है. लेकिन जब यही टेक्नोलॉजी ज़िंदगी की ज़रूरत बन जाए, इतनी ज़्यादा ज़रूरी लगने लगे कि इसके बिना कुछ घंटे बिताना भी मुश्किल हो जाए. ज़्यादातर व़क्त बस मोबाइल या सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ही बीतने लगे, इस वजह से परिवार, रिश्तेदार और सोसायटी से भी कटने लगें, तो समझ जाइए कि आप टेक एडिक्शन का शिकार हो गए हैं.

बच्चे ज़्यादा हो रहे हैं शिकार

हालांकि तय गाइडलाइन के अनुसार 15-16 वर्ष के पहले बच्चों को मोबाइल फोन या कंप्यूटर नहीं देना चाहिए, लेकिन आज की बिज़ी लाइफ की मजबूरी कहें या अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता या बच्चों को टेक्नोफ्रेंडली बनाने की चाहत, पैरेंट्स बहुत ही कम उम्र में बच्चों को मोबाइल-लैपटॉप दे देते हैं और एक बार गैजेट्स हाथ में आ जाएं, तो बच्चे इंटरनेट, ऑनलाइन गेम्स, सोशल नेटवर्किंग को ही अपनी दुनिया बना लेते हैं.
हालांकि टेक एडिक्शन कोई मानसिक बीमारी नहीं है, लेकिन इसके कई साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. ये साइड इफेक्ट्स सोशल, बिहेवियरल या हेल्थ से संबंधित हो सकते हैं.

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टेक एडिक्शन के साइड इफेक्ट्स
बच्चे को क्लासरूम में भी अक्सर नींद आती है. वो हर व़क्त उनींदा-सा रहता है.
 अपने असाइनमेंट समय पर पूरे नहीं कर पाता.
खान-पान संबंधी उसकी आदतें भी बदल जाती हैं. अब न उसे खाने का ध्यान रहता है, न सोने का.
दोस्तों से मिलने की बजाय कंप्यूटर या मोबाइल पर समय बिताना ज़्यादा पसंद करता है.
कंप्यूटर या वीडियो गेम के बारे में झूठ भी बोलता है.
सोशल होने से कतराता है. फैमिली गेट टुगेदर या आउटडोर स्पोर्ट्स उसे बोरिंग लगने लगते हैं.
अगर ऑनलाइन न हो, तो अजीब-सी बेचैनी और चिड़चिड़ाहट उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई देती है.
ऑफलाइन रहने पर भी या तो पहले की ऑनलाइन एक्टिविटीज़ के बारे में सोचता रहता है या फिर ऑनलाइन आने पर क्या करेगा, इसकी प्लानिंग करता रहता है. इसके अलावा टेक एडिक्शन से बच्चे को हेल्थ प्रॉब्लम्स भी हो सकती हैं.
वो ओबेसिटी, हाइपरटेंशन या इनसोमनिया का शिकार हो सकता है.
लगातार स्क्रीन पर देखते रहने से आंखों पर स्ट्रेस पड़ता है. इससे उसकी आंखों की रोशनी बहुत कम उम्र में प्रभावित हो सकती है.
बच्चा कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम का शिकार हो सकता है.
लगातार कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के इस्तेमाल से गर्दन और कंधे में दर्द की शिकायत हो सकती है.
ग़लत पोश्‍चर से कम उम्र में ही कमरदर्द या पीठदर्द भी हो सकता है.
लगातार कीपैड यूज़ करने से उंगलियों और कलाई में दर्द की शिकायत हो सकती है.
मोबाइल हो, कंप्यूटर-लैपटॉप या टीवी- बच्चे हेडफोन यूज़ करते ही हैं. हेडफोन के अधिक इस्तेमाल से सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है. इससे एकाग्रता में भी कमी आती है.
एक सर्वे के अनुसार, 9 से 12 साल के उम्र के 60% स्टूडेंट दिन में लगभग 3 घंटे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिताते हैं.   3
तो क्या करें पैरेंट्स?

बच्चे को मोबाइल या कंप्यूटर से पूरी तरह दूर रखना मुश्किल है और ऐसा करना भी नहीं चाहिए. इसलिए पैरेंट्स को कुछ ऐसे तरी़के तलाशने होंगे कि वे मोबाइल या कंप्यूटर यूज़ करने पर कंट्रोल कर सकें. इसके लिए पैरेंट्स ये ट्रिक्स ट्राई कर सकते हैं.

बच्चे को मोबाइल, लैपटॉप या कोई और गैजेट्स देने से पहले ही कुछ नियम बना लें और बच्चे से पहले ही कह दें कि उसे इन नियमों का पालन करना ही होगा.
ध्यान रहे, किसी भी चीज़ के लिए एकदम बैन न लगाएं, बल्कि इन गैजेट्स के इस्तेमाल के संबंध में अपने बच्चे के लिए एक समय सीमा निर्धारित करें. एक गाइडलाइन बनाएं और बच्चे को समझाएं कि उनकी सुरक्षा के लिए ये गाइडलाइन ज़रूरी है.
♦ बच्चों को देर रात तक मोबाइल, कंप्यूटर या इंटरनेट पर रहनेे की इजाज़त न दें.
♦ उनकी ऑनलाइन एक्टीविटीज़ और फ्रेंड्स पर नज़र रखें. बच्चे के पासवर्ड, स्क्रीन नेम और अन्य अकाउंट इंफॉर्मेशन की जानकारी रखें.
♦ आजकल कई ऐसे सॉफ्टवेयर और ऐप्स उपलब्ध हैं, जो विभिन्न साइट्स और उनके कंटेन्ट को फिल्टर करते हैं. इन्हें अपने कंप्यूटर और मोबाइल में इंस्टॉल करवाएं, ताकि आपका बच्चा कोई गैरज़रूरी साइट न ओपन कर सके.
उसे इन टेक्नोलॉजी के अधिक इस्तेमाल से होनेवाले नुक़सान के बारे में भी समझाएं. यक़ीन मानिए एक बार उसे समझ आ जाएगा, तो वो सतर्क रहेगा.
आज जबकि दुनिया हाईटेक हो रही है, तो ऐसे में बच्चों को टेक्नोलॉजी से दूर रखना ना तो मुमकिन है और न ही ऐसा करना समझदारी है. ऐसे में पैरेंट्स को ही गाइडलाइन बनानी होगी, बच्चों को टेक एडिक्शन के साइट इफेक्ट्स के बारे में बताना होगा, ताकि बच्चा टेक्नोफ्रेंडली भी बने और उसे किसी तरह का नुक़सान भी न हो.
                                                           

– श्रेया तिवारी