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प्यार, सेक्स और कमिटमेंट… कितना बदला रिश्ता? (Why Our Relationship Changes Over Time?)

Why Our Relationship Changes Over Time

समाज जितनी तेज़ी से बदल रहा है, उतनी ही तेज़ी से प्यार, सेक्स और कमिटमेंट की परिभाषा व अहमियत भी बदल रही है. नई पीढ़ी संबंधों के अर्थ को पुनः परिभाषित कर रही है. इस दौर में जब इंस्टेंट कॉफी, फास्ट फूड, फेसबुक, ट्विटर और नेट चैट एक ट्रेंड व इन-थिंग बन गया है, प्यार का अर्थ बदला है और उसके साथ ही सेक्स व कमिटमेंट को लेकर भी धारणाएं बदली हैं.  सेक्स को प्यार माना जा रहा है और कमिटमेंट को बंधन. विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण बरक़रार है, पर आज का युगल कमिटमेंट से डरता है. आज प्यार में सेक्स घुल गया है और जब रिश्तों में प्यार न हो, तो कमिटमेंट का सवाल ही नहीं उठता है. प्यार शॉर्ट एंड स्वीट और लिव-इन के चारों ओर चक्कर लगा रहा है.

आज सामाजिक संबंधों के साथ-साथ परिवार के आत्मीय रिश्तों से जुड़े सरोकार भी बहुत कमज़ोर पड़ रहे हैं. हर जगह स्वार्थ पसर गया है. परिवार के आत्मीय संबंधों पर चोट करनेवाली तमाम घटनाएं आज देखने में आ रही हैं.

Why Our Relationship Changes Over Time
शॉर्टकट रिश्तों में भी

प्यार, रिश्ते और अपनापन जैसी भावनाओं पर स्वार्थ और शारीरिक आकर्षण हावी हो गया है. कमिटमेंट अब लोगों को बंधन लगता है, ऐसे में ज़िम्मेदारियां निभाना भी बोझ लगता है. हर कोई अपनी तरह से जीने का नारा लगाता हुआ लगता है. रिश्तों में भी शॉर्टकट अपनाया जाने लगा है. मिलो, बैठो कुछ पल और फिर एक दूरी बना लो. हर कोई अपनी एक स्पेस की चाह में अपनों से ही दूर होता जा रहा है. आज रिश्ता चीन के उस उत्पाद की तरह हो गया है, जो सस्ता तो है, पर टिकाऊ है या नहीं, इसका पता नहीं.

वर्तमान समय में रिश्तों की अहमियत इतनी बदल चुकी है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे अपनी व्यस्तता के कारण हो या निजी स्वार्थवश, बस रिश्तों को निभाने की बजाय उसे ढो रहा है.

समाजशास्त्री नेहा बजाज मानती हैं कि यह बबलगम प्यार का दौर है और इसमें युवा लड़का और लड़की दोनों ही की सोच एक जैसी है. जिस तरह आप बबलगम चबाते रहते हैं और जब मन भर जाता है, तब उसे थूक देते हैं, उसी तरह प्यार भी हो गया है. इसलिए आज के युग में कमिटमेंट का स़िर्फयही मतलब रह गया है कि फिल्में जाओ, पब और पार्टी में जाओ और अच्छे दोस्तों की तरह चिलआउट करो. इस बदलते दृष्टिकोण या व्यवहार का मुख्य कारण व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, क्योंकि कोई भी अपनी आज़ादी नहीं खोना चाहता.

कमिटमेंट से डरने लगे हैं लोग

रिश्ते बनाना तो आसान है, मगर निभाना मुश्किल है, क्योंकि निभाने के लिए चाहिए होता है कमिटमेंट. पर आजकल लोग रिश्तों को स़िर्फ सोशल मीडिया से ही निभा रहे हैं.

आज बिना किसी ज़िम्मेदारीवाले संबंध आसान और आरामदायक होते जा रहे हैं. दीर्घकालीन संबंध बोरिंग लगने लगे हैं. विडंबना तो यह है कि आज रिश्तों में न तो कोई उम्मीद रख रहा है, न ही आश्‍वस्त कर पा रहा है कि हम हैं तुम्हारे साथ. कमिटमेंट बदलते हैं, लोग बदल जाते हैं और किसी को भी इससे शिकायत नहीं होती. दीर्घकालीन संबंध तेज़ी से इतिहास का हिस्सा बनते जा रहे हैं. युवा कमिटमेंट से बहुत अधिक डरे और सहमे हुए हैं और जब अफेयर गंभीर होने लगे, तो उन्हें परेशानी होने लगती है. उन्हें लगता है कि परंपरागत और ओल्ड फैशंड अफेयर का मतलब ग़ुलामी और स्वतंत्रता खो देना है.

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हालांकि अभी भी ऐसा वर्ग है, जो प्यार को महत्वपूर्ण मानता है और सेक्स को मर्यादित दृष्टि से देखता है व कमिटमेंट करने को भी तत्पर है. सारे रिश्ते बबलगम की तरह नहीं हो गए हैं. आज भी लोग प्रेम को गंभीरता से लेते हैं. उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है सही साथी की तलाश. और तलाश ख़त्म होने पर जब उनका आपसी तालमेल बैठता जाता है, तो फिर पीछे मुड़कर देखने की कोई आवश्यकता नहीं होती.

Why Our Relationship Changes Over Time

निजी स्वार्थ बढ़ रहा है

वर्तमान की इस तेज़ी से भागती ज़िंदगी के मद्देनज़र अब यह बहस चल पड़ी है कि क्या सामाजिक रिश्तों में अभी और कड़वाहट बढ़ेगी? क्या भविष्य में विवाह और परिवार का सामाजिक-वैधानिक ढांचा बच पाएगा? क्या बच्चों को परिवार का वात्सल्य, संवेदनाओं का एहसास, मूल्यों तथा संस्कारों की सीख मिल पाएगी? क्या भविष्य के भारतीय समाज में एकल परिवार के साथ में लिव-इन जैसे संबंध ही जीवन की सच्चाई बनकर उभरेंगे?

छोटे-छोटे निजी स्वार्थों को लेकर रिश्तों में व्यापक बदलाव देखने को मिल रहा है. आज हर रिश्ता एक तनाव के दौर से गुज़र रहा है. वह चाहे माता-पिता का हो या पति-पत्नी का, भाई-बहन, दोस्त या अधिकारी व कर्मचारी का. इन सभी रिश्तों के बीच ठंडापन पनप रहा है.

संवादहीनता और व्यस्तता की वजह से प्यार रिश्तों के बीच से सरक रहा है और सेक्स मात्र रूटीन बनकर रह गया है. स्त्री-पुरुष दोनों आर्थिक रूप से सक्षम हैं, इसलिए अपनी-अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करते हुए कमिटमेंट से बचना चाहते हैं. अपने साथी से पहले जो भी बात कहनी होती थी, वह या तो साथ बैठकर एक-दूसरे से कही जाती थी या फोन पर बातचीत करके. आज इसकी जगह ले ली है व्हाट्सऐप ने. आप मैसेज छोड़ देते हैं. कई बार सामनेवाला पढ़ नहीं पाता और फिर झगड़ा होना तय होता है. कहीं से घूमकर आने के बाद पहले जहां मिल-जुलकर फोटो देखने का मज़ा लेते थे, वहीं आज फेसबुक पर एक-दूसरे की फोटो देखी जाती है.

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रिलेशनशिप में प्यार कम, लस्ट (वासना) ज़्यादा होता है. अगर आपका रिश्ता प्यार पर नहीं, वासना पर टिका है, तो वह रिश्ता ज़्यादा दिनों तक नहीं रहता. आमतौर पर रिश्ते टूटने की वजह भी यही बन रहा है. रिश्ते में फिज़िकल कनेक्शन ज़रूर बनता है, लेकिन भावनात्मक रूप से जुड़ाव देखने को नहीं मिलता. तो किस तरह का रिश्ता है यह? केवल आकर्षण या प्यार या फिर केवल लस्ट?

प्रोफेशनल होते रिश्ते

आजकल उन रिश्तों को ज़्यादा अहमियत दी जाती है, जो प्रोफेशनल होते हैं, क्योंकि वो हमारे फ़ायदे के होते हैं. रिश्तों में भी अब हम फ़ायदा-नुक़सान ही देखते हैं. जो कामयाब है, रसूखवाले हैं, पैसेवाले हैं, उनसे संबंध रखने में ही फ़ायदा है. इसके चलते कुछ रिश्ते ऐसे ही ख़त्म हो जाते हैं. हम अब उन रिश्तों को ही अहमियत देते हैं, जिनसे बिज़नेस में और लाइफ में भी ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा हो. युवापीढ़ी प्रैक्टिकल और कैलकुलेटिव हो गई है. ऐसे में रिश्तों की अहमियत घटना स्वाभाविक ही है.

कमिटमेंट करने के लिए या प्यार निभाने के लिए सच्चाई व ईमानदारी की ज़रूरत होती है. अपने साथी की भावनाओं को समझने की ज़रूरत होती है. सेक्स को प्यार के साथ जोड़ने और रिश्ते में कमिटमेंट के जुड़ने से रिश्ता टिका रहता है. प्लास्टिक के फूलों की ख़ुशबू के साथ कृत्रिम ज़िंदगी जीने से अच्छा है कि प्यार और विश्‍वास के ताज़ा फूलों से रिश्तों को सजा लिया जाए.

– सुमन बाजपेयी

पहचानें रिश्तों की लक्ष्मण रेखा (Earn to respect relationship and commitment)

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इंसानी ज़िंदगी में रिश्तों (Earn to respect relationship and commitment) की अहमियत से हम सभी वाक़िफ़ हैं, लेकिन शायद हम इस बात को कम ही समझते हैं कि हर रिश्ते की एक मर्यादा, एक लक्ष्मण रेखा होती है. इस लक्ष्मण रेखा को पार करते ही रिश्तों में दरारें आने का ख़तरा बनने लगता है, लेकिन दूसरी तरफ़ यदि इस रेखा को हम दीवार बनाने की भूल करते हैं, तो भी रिश्तों का बचना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि कैसे पहचानें अपने रिश्तों की लक्ष्मण रेखा को?

Earn to respect relationship and commitment

सम्मान: किसी भी रिश्ते के गहरे होने की पहली शर्त होती है सम्मान. स़िर्फ पति-पत्नी ही नहीं, तमाम रिश्तों से लेकर यारी-दोस्ती तक में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बेहद अहम् है. हंसी-मज़ाक के दौरान भी यदि हम हद से आगे बढ़ जाते हैं, तो सामनेवाले को ठेस पहुंचती है. ऐसे में यह बात समझना ज़रूरी है कि हर चीज़ की हद होती है. अपने दायरों को लांघते ही जैसे ही हम हदों को पार कर जाते हैं, तो वहां सम्मान ख़त्म हो जाता है और रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

अपनी सीमा ख़ुद निर्धारित करें: हम स्वयं इस बात को बेहतर समझते और जानते हैं कि किस रिश्ते की सीमा क्या है और कहां आकर हमें रुकना है. जिस वक़्त हम ये जानकर भी अपनी सीमा रेखा लांघते हैं, तब समस्या शुरू हो जाती है. अगर पति-पत्नी भी एक-दूसरे को हर बात पर टोकें और मज़ाक उड़ाएं, तो एक स्टेज पर आकर उन्हें एक-दूसरे से खीझ होने लगेगी और वो शिकायत करने लगेंगे कि अब उनके बीच वो सम्मान नहीं रहा.

मज़ाक करने और मज़ाक उड़ाने के बीच के अंतर को समझें: बहुत-से लोगों की आदत होती है कि वो बात-बात पर ताने मारते हैं और फिर कहते हैं कि हम मज़ाक कर रहे थे, पर जब यही मज़ाक कोई दूसरा उनके साथ करे, तो उन्हें बुरा लग जाता है. मज़ाक करने का अर्थ होता है कि दूसरों के चेहरे पर हंसी-मुस्कुराहट आए, न कि उन्हें आहत किया जाए. अक्सर यार-दोस्तों की महफ़िल में लोग एक-दूसरे से शरारत करते हैं, पर इस शरारत में यह ध्यान ज़रूर रखें कि कहीं किसी का दिल न दुखा दें आप.

मर्यादा बनाए रखने का यह मतलब नहीं कि कम्यूनिकेट ही न करें: अगर हमें बार-बार अपनी टोकने की आदत के बारे में कोई एहसास करवाए, तो हम अक्सर उस आदत को बदलने की बजाय यह तर्क देते हैं कि अगर तुम्हें मेरी बातें पसंद नहीं, तो बेहतर है हम बात ही न करें. यह अप्रोच बेहद ग़लत व नकारात्मक है. इससे रिश्तों में दीवारें पैदा होती हैं. अच्छा होगा कि आप बातचीत बंद न करें, बल्कि आपसी बातचीत को हेल्दी और पॉज़ीटिव बनाएं.

शब्दों का चयन सही करें: अपनों से बात करते वक़्त हम अक्सर अपने शब्दों के चयन पर ध्यान नहीं देते. हम यह सोचते हैं कि अपनों के साथ क्या औपचारिकता करना और इसी सोच के चलते हम अक्सर लक्ष्मण रेखा भूल जाते हैं. चाहे अपने हों या अन्य लोग, तमीज़ से, प्यार से बात करेंगे, तो सभी को अच्छा ही लगेगा. अपनों के साथ तो और भी सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि हमारे द्वारा कहा गया कोई भी कटु शब्द उन्हें ज़्यादा हर्ट कर सकता है, जिससे मन-मुटाव हो सकता है.

अपने निर्णय सब पर न थोपें: अगर आपने कोई निर्णय लिया है, तो सबकी राय और सहमति भी ले लें. अपना निर्णय सुना देना या अपनी ही मर्ज़ी सब पर थोपना भी रिश्तों की मर्यादा का उल्लंघन करना ही है. जिस बात से सब लोग सहमत न हों, उस पर दोबारा विचार करें या फिर सबको अपनी निर्णय की वजह बताकर कोशिश करें कि उन्हें आपके निर्णय से कोई आपत्ति न हो.

हर बात, हर चीज़ पर हक़ न जमाएं: बच्चे हैं, तो माता-पिता की हर चीज़ पर हक़ समझते हैं, भाई-बहन भी यही सोचते हैं कि हम एक-दूसरे की सारी चीज़ पर हक़ जमा सकते हैं और पति-पत्नी तो यह मानकर ही चलते हैं कि हमारी कोई चीज़ पर्सनल नहीं हो सकती. ऐसे में पर्सनल स्पेस खो जाती है और एक समय ऐसा आता ही है, जब हमें लगता है कि सामनेवाला अपनी सीमा रेखा लांघ रहा है. हर रिश्ते में स्पेस की ज़रूरत होती ही है और जब वो नहीं मिलती, तो घुटन होने लगती है और रिश्तों में दरार आने का डर बन जाता है.

किसी के निजी जीवन में बेवजह दख़लअंदाज़ी न करें: हम जब एक साथ रहते हैं, तो किसी का भी लेटर हो, ईमेल हो या फोन पर मैसेज हो, तो उसकी ग़ैरहाज़िरी में भी फौरन पढ़ने लगते हैं. यह व्यवहार ग़लत है. शिष्टता के चलते हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, बल्कि सामनेवाले के आने का इंतज़ार करना चाहिए. उसके बाद वो ख़ुद-ब-ख़ुद बता ही देगा कि किसका पत्र या मेल है. अगर न भी बताए, तो इसका यह अर्थ नहीं कि आप उसे शक़ की निगाह से देखें. सबका निजी जीवन होता है, कुछ बातें ऐसी होती ही हैं, जो वो शायद इस वक़्त किसी से शेयर नहीं करना चाहता और आगे चलकर सही वक़्त आने पर करे. हर बात आपको जाननी ही है और सामनेवाला आपको बताए ही, यह कोई ज़रूरी नहीं.

अपने मन मुताबिक़ किसी को बदलने या व्यवहार करने को न कहें: आप अगर घर के मुखिया भी हैं, तो भी अपनी इच्छानुसार सबको व्यवहार करने की ज़िद न करें. हां, अगर कोई ग़लती कर रहा है, तो आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप उसे सही रास्ता दिखाएं, लेकिन तानाशाही रवैया अपनाकर सब पर एक ही नियम लागू करने का अर्थ है कि आप अपनी उम्र, अपने ओहदे और अपने रिश्ते का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे हैं.

हमेशा आप ही सही होते हैं, यह सोच न बना लें: आप जो सोचते हैं, आप जो चाहते हैं और आप जो उम्मीदें रखते हैं, वो ही सही हैं और यदि कोई आपसे अलग सोच रखे, तो वो इंसान ही ग़लत है, ऐसी बात मन में न पालें. हर शख़्स का अपना अलग व्यक्तित्व होता है, उसे स्वीकार करें, उसका सम्मान करें. जिस तरह आप औरों से उम्मीद रखते हैं, दूसरे भी आपसे ठीक वैसे ही व्यवहार की आशा रखते हैं. आप जिस तरह हर्ट होते हैं, दूसरे भी हो सकते हैं. हर किसी की अपनी सोच व राय हो सकती है, जिसका हमें सम्मान करना ही चाहिए, वरना रिश्ते टूटते देर नहीं लगती.

स्वार्थी न बनें: रिश्तों में लक्ष्मण रेखा तभी पार होती है, जब हम स्वार्थी बन जाते हैं. स़िर्फ हम ही हम हैं, दूसरों को अपना जीवन अपनी तरह से जीने का कोई हक़ नहीं, यह अप्रोच नकारात्मक होती है. सबकी मर्ज़ी का ख़्याल करें और सकारात्मक सोच बनाएं, तभी आप अपने रिश्तों को शिद्दत से निभा सकते हैं.

अपनी ग़लती मानें: जब भी आप ग़लत हों, तो फ़ौरन उसे मान लें. ईगो पालकर रिश्तों को ताक पर न रखें. अपनी ग़लती के लिए किसी और को ज़िम्मेदार न ठहराएं. अक्सर हम अपनी ग़लतियां दूसरों पर थोप देते हैं और उन्हें ही इसका कारण बताकर ख़ुद को बचाने की सोचते हैं. जब सामनेवाला अपनी सफ़ाई देता है, तो हम नाराज़ हो जाते हैं कि तुम हमारा साथ नहीं दे रहे या ग़लती क्या स़िर्फ मेरी थी, जैसी बातें करने लगते हैं. यह ग़लत उम्मीद लगाना अपनी लक्ष्मण रेखा न पहचानने जैसा ही है.

Earn to respect relationship and commitment

रिश्तों में सम्मान का अर्थ क्या है?
हम रिश्तों को सम्मान दे रहे हैं या नहीं, इसे इन कसौटी पर परखें-

  •  अगर हम किसी बात पर असहमत हैं, पर हम अपनी ही बात और राय को महत्व देकर सामनेवाले को सुनना ही न चाहें और उससे भी यह उम्मीद रखें कि वो हमारी ही सुने, तो यह उसके सम्मान को आहत करेगा.
  •  अपने रिश्तेदारों या पार्टनर को सामाजिक समारोहों में या अन्य लोगों के सामने डांटते हैं या उनका मज़ाक उड़ाते हैं.
  •  हर बात पर टोकना या बात-बात पर नाराज़ हो जाना.
  •  सामनेवाले की भावनाओं के प्रति असंवेदनशील होकर उन्हें महत्व न देना.
  •  हर वक़्त स़िर्फ अपनी ज़रूरतों के बारे में ही सोचना.
  •  किसी की भी राय को महत्व न देकर मनमानी करना.
  •  अपनी सुविधानुसार नियम बदलना और दूसरों से भी अपनी सुविधानुसार ही व्यवहार करने की उम्मीद करना.
  •  सबसे मज़ाक करना, लेकिन जब कोई आपसे मज़ाक करे, तो बुरा मान जाना.
  •  हर छोटी-छोटी बात पर सफ़ाई मांगना.
  •  सामनेवाले की स्थिति को समझे बग़ैर या समझने की कोशिश किए बिना ही बात-बात पर नाराज़ हो जाना.
  •  सबसे यह उम्मीद रखना कि वो स़िर्फ आपका ही ख़्याल रखे और आपकी हर बात पर हां में हां मिलाए.
  •  विचार अलग होने पर दूसरों के विचारों को ग़लत व महत्वहीन समझना.

– कमलेश शर्मा