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प्यार, सेक्स, कमिटमेंट… कितना बदला रिश्ता! (Love, Sex, Commitment- Changing Concepts Of Relationship)

एक लफ़्ज़, जिसकी पाकीज़गी को शिद्दत से महसूस किया जाता था… प्यार! एक एहसास, जिसे मुहब्बत के ख़ूबसूरत स्वरूप के रूप में साकार किया जाता था… सेक्स! एक अनकहा साथ, जिसे ताउम्र ही नहीं, सात जन्मों का बंधन कहा जाता था… कमिटमेंट! लेकिन समय के साथ और बदलते परिवेश ने इन तमाम शब्दों की परिकल्पना और हक़ीक़त को पूरी तरह से बदल डाला है. आज के संदर्भ में प्यार का मतलब आकर्षण! आज की तारीख़ में सेक्स का मतलब शारीरिक भूख! आज के युग में कमिटमेंट का मतलबमहज़ बेव़कूफ़ी!

Relationship

बदलते समाज की बदलती तस्वीर...

जी हां, यही सच्चाई है कि रिश्तों को सार्थक व पूर्ण करते इन तीनों शब्दों का अर्थ आज पूरी तरह बदल चुका है. बीते व़क्त की बात करें, तो काफ़ी कुछ सहज था. सबके काम व ज़िम्मेदारियां भी बंटी हुई थीं. रिश्तों को लेकर भी मर्यादा व अनुशासन था. प्यार को पवित्र अर्थों में देखा जाता था. जिससे प्यार किया, उसके साथ ही सेक्स करने की बात सोची जाती थी और उसी के साथ शादी के बंधन में बंधकर ज़िंदगीभर उस रिश्ते को प्यार से निभाने का संकल्प भी लिया जाता था.

लेकिन आज ऐसा नहीं है. प्यार को लोग महज़ आकर्षण समझते हैं, जो तब तक ही निभाया जाता है, जब तक कि यह आकर्षण एक-दूसरे के प्रति बरक़रार रहता है. सेक्स के लिए भी अब कमिटेड रिश्ते में बंधने की ज़रूरत नहीं है. सेक्स तो शरीर की डिमांड है, जब ज़रूरत हो, तब कर लो. अगर पार्टनर साथ नहीं है, तो जो मन को भा जाए, उसके साथ कर लो. यही हाल कमिटमेंट का है कि रिश्ते तो बनाते हैं लोग, पर नो गारंटीवाले रिश्ते. कब तक चलेंगे, कह नहीं सकते.

इन रिश्तों और शब्दों के मायने बदलने के कई कारण हैं…

–     हमारा समाज बदल चुका है और उसी के साथ लोगों की सोच भी.

–     अब लोग कमिटमेंट करना ही नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें ख़ुद नहीं पता होता कि रिश्ता कब तक चलेगा और कितना टिकेगा.

–     लाइफ फास्ट हो गई है और इस बदलती लाइफस्टाइल का सबसे ज़्यादा असर हमारे रिश्तों पर ही पड़ रहा है.

–     पहले एक-दूसरे के लिए पार्टनर्स एडजेस्टमेंट्स करते थे, अपनी चाहतों को छोड़कर पार्टनर की ख़्वाहिश को पूरा करने की कोशिशें करते थे. उसके सपनों में ही अपने ख़्वाबों को साकार होता देखते थे… और यह सब वो ख़ुशी-ख़ुशी करते थे.

–     वहीं अब सभी लोग सेल्फ सेंटर्ड होते जा रहे हैं. अपनी ख़ुशी, अपने सपने, अपनी ख़्वाहिशें… भले ही वो रिश्ते में भी हों, पर वहां भी अपनी-अपनी अलग ज़िंदगी ही जी रहे होते हैं.

–     स्पेस के नाम पर एक तय दूरी बनाए रखते हैं. कोई किसी के फोन को, ईमेल को या लैपटॉप को खोल नहीं सकता.

–     एक-दूसरे के पासवर्ड्स नहीं पता होते. एक-दूसरे के सोशल मीडिया अकाउंट्स के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं पता होता.

–     ऐसे में कमिटमेंट और प्यार की जगह ही कहां बचती है.

–     रही सेक्स की बात, तो अब सेक्स को लेकर भी बहुत कैज़ुअल हो गए हैं. आजकल ज़रूरी नहीं कि पार्टनर के साथ ही सेक्स हो.

–     ज़रूरी नहीं कि शादी के बाद ही सेक्स हो.

–     क्योंकि शादी तक कौन इंतज़ार करे और क्या पता शादी कब और किससे हो?

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Couple Goals

–     ऐसे में सेक्स के एहसास से अछूता क्यों रहा जाए?

–     एक्सपोज़र इतना बढ़ गया है कि आजकल सब कुछ आसानी से उपलब्ध है.

–     बच्चों की परवरिश के तौर-तरी़के भी बदल गए हैं.

–     पैरेंट्स की सोच बदल गई है, तो भला संस्कार भी पहले जैसे कैसे रहेंगे, उनमें भी बदलाव लाज़िमी है.

–     फ्री सेक्स का कॉन्सेप्ट आज की जेनरेशन को ज़्यादा सुविधाजनक लगता है, जिसमें न प्यार की भावनाओं का पहरा और न ही कमिटमेंट का बंधन.

–     भावनाएं और कमिटमेंट में बहनेवालों को आज की तारीख़ में बेव़कूफ़ समझा जाता है और इनसे परे जो लोग हैं, उन्हें स्मार्ट कहा जाता है.

–     ऐसा नहीं है कि स़िर्फ लड़के ही ऐसी सोच रखते हैं, लड़कियां भी इसी तरह की सोच को तवज्जो देती हैं.

–     वो भी प्रैक्टिकल होने और लाइफ के प्रति प्रैक्टिकल अप्रोच रखने में ही ज़्यादा विश्‍वास करती हैं.

–     उनके लिए भी करियर और पैसा, प्यार और कमिटमेंट से ज़्यादा महत्वपूर्ण है. वो रिश्तों में भी भावनाएं नहीं अपनी सुविधाएं ढूंढ़ती हैं.

–     अपनी मर्ज़ी से जीने का शग़ल, न कोई कमिटमेंट, न कोई स्ट्रगल… हां, स्ट्रगल अगर करियर और पैसों के लिए हो, तो कोई बात नहीं, पर रिश्तों के लिए यह वेस्ट ऑफ टाइम है.

–     रिश्ता निभे तो ठीक, वरना उसे लंबे समय तक ढोना समझदारी नहीं.

–     पर रिश्ता निभाने के लिए दोनों ही तरफ़ से कोई अतिरिक्त प्रयास की गुंजाइश आज नहीं है.

–     पहले लड़कियां यह प्रयास करती थीं और आज भी कुछ लोग हैं, जो पूरी तरह प्रैक्टिकल नहीं हुए हैं, पर अब जब लड़कियों के भी प्रयास कम हो गए, तो रिश्तों से प्यार और कमिटमेंट गायब हो गया.

–     लड़कों की ओर से न पहले प्रयास होते थे और न आज ही कोशिशें होती हैं.

–     तो प्यार और कमिटमेंट के बिना अब स़िर्फ सेक्स ही रह गया है, वो भी जब मूड हो और जिसके साथ मूड हो.

–     एक ही पार्टनर के साथ अब सेक्स उबाऊ लगने लगा है. लोग अपनी लाइफ में स्पाइस ऐड करने के लिए शादी के बाहर भी सेक्स करने से परहेज़ नहीं करते.

–     शादी में तो वैसे भी एक्साइटमेंट नहीं रह गया. कुछ समय बाद सब कुछ रूटीन लगने लगता है और फिर उस पर डबल इंकम नो सेक्स का बढ़ता कॉन्सेप्ट, क्योंकि पार्टनर के साथ सेक्स के लिए न टाइम है, न एनर्जी.

–     ऐसे में जब सेक्स का मन हो, तो जो मिले उसके साथ कर लो.

–     ऐसा भी है कि पहले समाज का एक डर और परिवार का बंधन भी था, जो लोगों को मनमानी से रोकता था. यही अनुशासन कहलाता था.

–     पर आज यह डर भी ख़त्म होता जा रहा है, क्योंकि घर, परिवार, पैरेंट्स और समाज ने भी इस बदलाव को कुछ हद तक स्वीकार कर लिया है.

–     यूं भी हर कोई आत्मनिर्भर है, तो वो किसी भी रोक-टोक को अनुशासन न समझकर अपनी निजी ज़िंदगी में दख़लअंदाज़ी मानते हैं.

–     सभी का यही कहना होता है कि यह उनकी ज़िंदगी है, चाहे जैसे जीएं.

–     सोशल मीडिया ने भी बहुत हद तक इन रिश्तों और शब्दों के मायनों को बदलने में भूमिका निभाई है. लोग ऑफिस के बाद अब सबसे ज़्यादा यहीं बिज़ी रहते हैं और यहीं सुकून तलाशते हैं. जहां डिजिटल वर्ल्ड और फेक रिश्ते उन्हें ज़्यादा आकर्षित करते हैं. ऐसे में रियल वर्ल्ड के रिश्ते बोरिंग लगने लगते हैं और वहां प्यार और कमिटमेंट की जगह कम ही रह जाती है.

–     ऐसे में प्यार, सेक्स और कमिटमेंट का यह बदलता स्वरूप कुछ समय तक तो यूं ही रहनेवाला है.

यह स्वरूप अब भले ही सुविधाजनक लग रहा होगा, पर भविष्य में इसका ख़ामियाज़ा तो सभी को भुगतना पड़ेगा. जहां कहने को अपना कोई नहीं होगा, ऐसा कोई शख़्स कहीं नज़र नहीं आएगा, जिसके कंधे पर सुकून से सिर रखकर अपने ग़म भुला सकें. व्यावसायिक और ज़िंदगी की चुनौतियों के बीच कभी न कभी तो यह एहसास होगा ही कि कोई ऐसा हो, जिसे अपना कह सकें. जिसके साथ प्यार भी हो, कमिटमेंट भी और सेक्स भी उसी के साथ हो, क्योंकि प्यार और रिश्ते का सही मायनों में भी यही अर्थ होता है, बाकी सब व्यर्थ और अनर्थ ही है.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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बदल गए हैं वैवाहिक जीवन के नियम (The Changing Meaning Of Marriage)

Changing Meaning Of Marriage

कहने को तो आज भी कहा यही जाता है कि Marriage यानी शादी जन्म-जन्मांतर का साथ है, लेकिन सच्चाई यही है कि व़क्त के साथ इस सोच में बदलाव (Changing Meaning Of Marriage) ज़रूर आया है. अब जन्मों की बातें लोग नहीं सोचते, कोशिश यही होती है कि इस जन्म में सच्चे दोस्त व समझदार साथी के रूप में हंसी-ख़ुशी जीवन बीते. मॉडर्न होते समाज में अब विवाह व वैवाहिक जीवन के नियमों को भी काफ़ी हद तक बदल दिया है. कैसे? आइए जानें-

Changing Meaning Of Marriage
– पारंपरिक सोच यह होती थी कि लड़के की बजाय लड़के के घर व खानदान को देखा जाता था. लड़का अगर नौकरी नहीं भी कर रहा, तो उसके खानदान व घर को देखकर शादी तय कर दी जाती थी, लेकिन आज सबसे पहले लड़के का काबिलीयत देखी जाती है.

– लड़का अच्छी नौकरी पर है कि नहीं, पढ़ा-लिखा व समझदार है, तो भले ही घर से उतना संपन्न नहीं है, तब भी बेझिझक शादी तय हो जाती है.

– पैरेंट्स की बजाय लड़के-लड़कियों की मर्ज़ी व पसंद-नापसंद का ख़्याल अब रखा जाता है.

– लड़कियां भी अब खुलकर अपनी सोच व पसंद रखने लगी हैं.

– शादी के बाद अब ज़िम्मेदारियां व काम का बंटवारा समान रूप से किया जाता है.

– अगर कुछ ग़लत है, तो बहुएं अपने हक़ के लिए आवाज़ भी उठाती हैं और संघर्ष भी करती हैं.

– आज कपल्स विवाह को भावनात्मक पूर्ति का साधन अधिक मानते हैं, बजाय परंपरा या शारीरिक पूर्ति का ज़रिया समझने के.

– शादी में अब किसी एक पार्टनर का आधिपत्य नहीं रह गया है, दोनों समान रूप से अपनी अहमियत दर्शाते व समझते हैं.

– शादी में भी पर्सनल स्पेस को अब महत्व दिया जाता है. कपल्स भी समझते हैं कि दो जिस्म एक जान का कॉन्सेप्ट अब पुराना हो गया. दो जिस्म हैं, तो दो जानें और दो अलग-अलग सोच भी होगी. ऐसे में पर्सनल स्पेस दोनों ही के लिए कितना ज़रूरी है यह सभी जानते हैं और उसका सम्मान करते हैं.

– अगर दो अलग-अलग माहौल में पले-बढ़े लोग एक साथ जीवन गुज़ारेंगे, तो ज़ाहिर है झगड़े व विवाद भी होंगे. इसे अब कपल्स समझदारी से लेते हैं. वे जानते हैं कि ये वैवाहिक जीवन का हिस्सा है.

– इन विवादों को निपटाने के लिए वो परिपक्व सोच रखते हैं.

– शोषण के ख़िलाफ़ ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ पॉलिसी अपनाते हैं, फिर चाहे वो शारीरिक शोषण हो, भावनात्मक हो, मानसिक हो या सेक्सुअल.

– सेक्सुअल इंटिमेसी को भी महत्व देते हैं. अपनी इच्छाओं को अब लड़कियां भी दबाती नहीं हैं. सेक्स पर खुलकर बात करती हैं. पार्टनर को बताती हैं कि वो क्या चाहती हैं. पुरुष भी इसे अब ग़लत नहीं मानते. वो भी पत्नी का पूरा सहयोग चाहते हैं.

– कम्यूनिकेशन को महत्व देते हैं. बात मन में दबाकर रखने की बजाय बोल देने को ज़्यादा ज़रूरी मानते हैं.

– अलग-अलग छुट्टियां मनाने को ग़लत नहीं मानते. अगर कपल्स हनीमून पर नहीं हैं, तो उन्हें कोई समस्या नहीं कि दोनों पार्टनर अपने दोस्तों या अन्य रिश्तेदारों के साथ अलग-अलग हॉलीडे, शॉपिंग, डिनर या मूवी प्लान करे.

– हाल ही में एक शोध से यह बात सामने आई है कि जॉइंट बैंक अकाउंट के बदले अब वर्किंग अलग-अलग अकाउंट्स रखना कपल्स अधिक पसंद करते हैं. ऐसा नहीं है कि उन्हें एक-दूसरे पर भरोसा नहीं, बल्कि आर्थिक मामलों में अब कपल्स स्वतंत्र रहना पसंद करते हैं, उनके निर्णय भी स्वतंत्र होते हैं और बेवजह का हस्तक्षेप नहीं करते.

– अगर रिलेशनशिप में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा हो, तो प्रोफेशनल्स व एक्सपर्ट्स की मदद लेने से पीछे नहीं हटते.

– दोनों ही इस बात को जानते-समझते हैं कि डिवोर्स एक ज़ायज़ तरी़के ज़रूर है, लेकिन वो सबसे आख़िरी ऑप्शन होना चाहिए.

ये बातें बेटी को ज़रूर सिखाएं
  • ससुराल के प्रति कर्त्तव्य व अधिकार दोनों ही बताएं.
  • आर्थिक आत्मनिर्भरता का अर्थ ईगो बढ़ा लेना नहीं है. ये बात समझाएं.
  • बेटी को कहें कि स्वाभिमानी बने, लेकिन अभिमानी नहीं.
  • यदि अन्याय हो रहा हो, तो बेझिझक आवाज़ उठाए. अन्याय सहते रहना भी गुनाह है.
  • सास-ससुर को भी अपने पैरेंट्स जैसा ही सम्मान देना ज़रूरी है.
  • ख़ुद पहल करने से रिश्ते मधुर और बेहतर बनते हैं, इसलिए किसी भी मामले में पहल करने से पीछे न हटे.
  • अपनी कमाई का कुछ हिस्सा सास-ससुर को भी दे, क्योंकि इससे वो सम्मानित महसूस करते हैं.
  • बहुत ज़्यादा उम्मीदें पालकर ससुराल न जाए. प्रैक्टिकल अप्रोच रखे.
  • ससुरालवालों की भी उम्मीदें इतनी न बढ़ा दे कि बाद में भारी पड़ने लगे यानी हर काम, हर ज़िम्मेदारी का बोझ ख़ुद पर न डाले.
  • परफेक्ट बहू बनने की बजाय बेहतर बहू बनने की कोशिश करे.
  • पति से भी इतनी अपेक्षाएं न रखे कि वो पूरी न हो सके. सपनों के राजकुमार की बजाय पति में सच्चा हमसफ़र या बेहतर दोस्त ढूंढ़े.

– विजयलक्ष्मी

शादी फॉरएवर का कॉन्सेप्ट क्यों भूल रहे हैं हम? (Failing to understand the concept of marriage forever)

Marriage forever concept

कुछ रस्में, सात फेरे, सात वचन और एक बंधन, वो भी जन्म-जन्मांतर (Marriage forever concept) का! शादी को लेकर हर किसी की अपनी अपेक्षाएं और उम्मीदें होती हैं, कुछ पूरी होती हैं, तो कुछ नहीं भी. शत-प्रतिशत संतुष्टि तो हमें किसी भी रिश्ते से नहीं मिलती, लेकिन क्या हम उन रिश्तों को तोड़ने का निर्णय इतनी आसानी से लेते हैं, जितनी आसानी से आज हम शादी को तोड़ने का निर्णय लेने लगे हैं? चूंकि इस रिश्ते से बाहर आने का एक विकल्प हमें नज़र आता है तलाक़ के रूप में, तो फिर समस्या चाहे कितनी ही मामूली क्यों न हो, हम समझौता नहीं करते. तलाक़ के मामले दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रहे हैं. यहां हम उन मामलों का ज़िक्र नहीं कर रहे, जहां तलाक़ लेना ही एकमात्र रास्ता रह जाता है, लेकिन जहां शादी को बचाए रखने के कई रास्ते खुले होते हैं, वहां भी अब हमारी कोशिशें कम ही होती हैं उसे बचाने की. पहले माना जाता था कि शादी जन्म-जन्मांतर (Marriage forever concept) का साथ है, लेकिन अब एक जन्म भी निभाना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि शादी फॉरएवर का कॉन्सेप्ट ही हम भूल चुके हैं. क्या वजहें हैं कि ऐसा हो रहा है?

Marriage forever concept

– रिश्ता निभाना या उससे जुड़ी ज़िम्मेदारियां पूरी करना आजकल के कपल्स को बोझ लगता है. उन्हें लगता है कि हम क्यों सामनेवाले के अनुसार अपनी ज़िंदगी जीएं, हम क्यों एडजेस्ट करें… आदि. जब रिश्ते में इस तरह के विचार आने लगते हैं, तो उसे तोड़ने के रास्ते हमें ज़्यादा आसानी से नज़र आने लगते हैं.

– शादी एक बंधन और ज़िम्मेदारी है. कोई चाहे या न चाहे, इसमें त्याग-समर्पण करना ही पड़ता है. लेकिन इस तरह की भावनाएं व बातें आजकल हमें आउटडेटेड लगती हैं. हम अब रिश्तों में भी प्रैक्टिकल होते जा रहे हैं, जिससे भावनाएं गौण और स्वार्थ की भावना महत्वपूर्ण होती जा रही है.

– कपल्स आजकल अपने ईगो को अपने रिश्ते से भी बड़ा मानते हैं. पति-पत्नी दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं होता. आपसी टकराव बढ़ने के साथ-साथ मनमुटाव भी बढ़ता जाता है और नतीजा होता है- रिश्ते का अंत.

– आजकल लोग शादी तो करते हैं, लेकिन कई शर्तों के साथ और जहां कहीं भी उन्हें लगता है कि उनकी आज़ादी या लाइफस्टाइल में उनकी शादी एक बेड़ी या बंधन बन रही है, वहीं उसे तोड़ने का निर्णय आसानी से ले लेते हैं.

Marriage forever concept

और भी हैं वजहें…

– लड़कियां भी आत्मनिर्भर हो रही हैं, जिस वजह से वो कोई भी निर्णय लेने से हिचकिचाती नहीं.

– घरवालों का सपोर्ट भी अब उन्हें मिलता है, पहले जहां उन्हें रिश्ते बनाए रखने की कोशिश करने से संबंधित कई तरह की सीख व नसीहतें दी जाती थीं, वहीं अब समझौता न करने की बात समझाई जाती है. हालांकि जहां बात लड़की या लड़के के स्वाभिमान व अस्तित्व की रक्षा से जुड़ी हो और जहां शोषण हो रहा हो, तो वहां शादी फॉरएवर का कॉन्सेप्ट (Marriage forever concept) भूलना ही पड़ता है, लेकिन यहां हम उन छोटी-छोटी बातों का ज़िक्र कर रहे हैं, जिन्हें बड़ा मुद्दा बनाकर शादी जैसे महत्वपूर्ण बंधन को तोड़ने का सिलसिला बढ़ रहा है.

– छोटी-छोटी तक़रार भी हमें इतनी हर्ट करती है कि हम उसे अपने स्वाभिमान से जोड़ने लगते हैं. सहनशीलता अब लोगों में बहुत कम हो गई है, यह भी एक बड़ी वजह है कि रिश्ते ताउम्र नहीं टिकते और जल्दी टूट जाते हैं.

– वहीं दूसरी ओर रिश्ता बनाए रखने व उसमें बने रहने के लिए सारे समझौते करने की अपेक्षा अब भी स्त्रियों से ही की जाती है. व़क्त व दौर जब बदल रहा है, तो अपेक्षाओं के इस दायरे में पुरुषों को भी लाना ही होगा. रिश्ता बनाए रखने की जितनी ज़िम्मेदारी स्त्रियों की होती है, उतनी ही पुरुषों की भी होती है. इस परिपाटी को अब तक बदलने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास भी नहीं किए गए. इस ओर भी ध्यान देना ज़रूरी है.

– शादी जैसे रिश्तों को आजकल की जनरेशन बहुत कैज़ुअली लेती है. यदि इसके प्रति थोड़ा सम्मान व गंभीरता दिखाएं, तो रिश्ते की मज़बूती बढ़ेगी. समय व समाज में बदलाव के साथ-साथ रिश्तों के समीकरण व मायने भी अब बदल रहे हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं होना चाहिए कि हम रिश्तों को इतने हल्के में लें कि उन्हें आसानी से तोड़(Marriage forever concept) सकें.

Marriage forever concept

क्या किया जा सकता है?

– शादी जैसे रिश्ते के प्रति थोड़ी गंभीरता व सम्मान रखना बेहद ज़रूरी है.

– अपने रिश्ते को और अपने पार्टनर को कैज़ुअली न लें.

– छोटी-छोटी बातों को बड़े झगड़े में न बदलें. सहन करना, एडजस्ट करना हर रिश्ते की मांग होती है. इसे अपने ईगो से जोड़कर न देखें.

– अपने मन-मस्तिष्क में रिश्ता तोड़ने जैसे विचार न लाएं. आपस में बहस के दौरान भी इस तरह की बातें मुंह से न निकालें.

– किन्हीं मुद्दों या बातों पर मनमुटाव हो, तो बातचीत ही पहला रास्ता है विवादों को सुलझाने का.

– पहल करने से कोई भी छोटा नहीं होता. रिश्ते को बचाने में अगर आपकी पहल काम आ सकती है, तो अपने झूठे दंभ की ख़ातिर पहल करने से पीछे न हटें. अलग होने के बाद भी ज़िंदगी आसान नहीं होती, गंभीरता से हर पहलू पर विचार करें.

– माफ़ करना सीखें और सॉरी बोलना भी.

– अपने पार्टनर की कद्र करें. भावनात्मक रूप से यदि आपसे कोई जुड़ा है, तो उसे जितना हो सके, आहत या दुखी करने से बचें. आपस में एक-दूसरे के प्रति सम्मान तो हर रिश्ते की ज़रूरत होती है.

– आजकल छोटी-छोटी बातों पर रिश्ता तोड़ देने का जो ट्रेंड बन गया है, उसके परिणाम बेहद घातक होते हैं. कम उम्र में ही तनाव, अकेलापन, डिप्रेशन व अनहेल्दी लाइफ स्टाइल का शिकार होकर अपनी ही ज़िंदगी को लोग बहुत कठिन बना लेते हैं.

– इस बात का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि रिश्ते व भौतिक चीज़ों में बहुत फ़र्क़ होता है. रिश्तों को कपड़ों या गाड़ियों की तरह बार-बार बदलकर सुकून नहीं मिल सकता. रिश्तों में भावनाएं होती हैं और कोई कितना भी प्रैक्टिकल क्यों न हो जाए, रिश्ता टूटने पर आहत होता ही है. जब भावनाएं आहत होती हैं, तो ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो जाती है.

– विजयलक्ष्मी

नपुंसक बना सकती है आपकी यह आदत ( This Habit Can Make You Impotent)