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महिलाएं बन रही हैं घर की मुख्य कमाऊ सदस्य (Women Are Becoming Family Breadwinners)

 

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महिलाएं बन रही हैं घर की मुख्य कमाऊ सदस्य (Women Are Becoming Family Breadwinners)

काम (Work) के आधार पर वर्गभेद और लिंग के आधार पर काम का बंटवारा… यह हमारे समाज का चलन था. पुरुषों (Men) का काम होता था पैसे कमाकर लाना, बाहर के सारे काम व ज़िम्मेदारियों को निभाना, जबकि महिलाओं (Women) का काम होता था घर संभालना. बाहर से देखने में सब कुछ ठीक-ठाक ही था. एक अनुशासन और संतुलन बना हुआ था समाज व परिवार में. लेकिन कहीं न कहीं बहुत कुछ ठीक नहीं था, क्योंकि पैसा कमाकर लानेवाला ख़ुद को शासक समझ बैठा था और घर संभालनेवाली को अपना ग़ुलाम. यही वजह थी कि महिलाओं ने इस प्रथा को तोड़ने में ही अपनी भलाई समझी और नतीजा सामने है.

आज महिलाएं पढ़ती-लिखती हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हैं. लेकिन यहां पिछले कुछ समय से एक और परिवर्तन देखने को मिल रहा है. शुरुआत में जहां महिलाएं एक सपोर्टिव अर्निंग मेंबर के रूप में देखी जाती थीं, वहीं अब वो घर की मुख्य कमाऊ सदस्य बनती जा रही हैं.

किस तरह से बदला है परिदृश्य?

–    आज महिलाएं अपनी पढ़ाई और करियर को भी उतना ही महत्व देती हैं, जितना शादी को.

–    मात्र पैसा कमाना ही उद्देश्य नहीं है अब महिलाओं का, वो करियर प्लानिंग करती हैं. करियर में आगे बढ़ने का सपना देखती हैं.

–    अब कॉम्प्रोमाइज़ कम करती हैं.

–    पैसा कमाने की अहमियत समझती हैं.

–    अपने लिए सम्मान चाहती हैं.

–    घर ही नहीं, अब बाहर की ज़िम्मेदारियां भी निभाती हैं.

–   पहले बेटा ही बुढ़ापे की लाठी माना जाता था, अब बेटियां भी वो भूमिका निभा रही हैं और उनसे उम्मीदें भी बढ़ी हैं.

–    कई बार तो पैरेंट्स की देखरेख के लिए शादी न करने का निर्णय भी लेती हैं.

–    शादी से कहीं ज़्यादा तवज्जो अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी जीने को देने लगी हैं.

–    शादी के बाद ससुराल में भी सपोर्ट करती हैं.

–    घर का लोन हो या बच्चों की पढ़ाई, सभी में बराबर की ज़िम्मेदारी लेती हैं.

–    लेकिन इसका ख़ामियाज़ा भी भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि पुरुष थोड़े लापरवाह होते जा रहे हैं.

–   वो अपनी ज़िम्मेदारियां भी अपनी कमाऊ पत्नी पर ही डालते जा रहे हैं.

–   अपने करियर को लेकर थोड़े कैज़ुअल हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि पत्नी अच्छा कमा रही है.

–    कहीं-कहीं पत्नी का अच्छा कमाना और बेहतर करियर रिश्तों को तोड़ भी रहा है. कुछ पुरुषों का अहम् इतना बड़ा होता है कि वो पत्नी की कामयाबी बर्दाश्त नहीं कर पाते.

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Working Women

महिलाओं पर दबाव बढ़ गया है…

–    इस बदलते परिदृश्य में महिलाओं पर दबाव व ज़िम्मेदारियां बढ़ रही हैं.

–    भले ही वो घर की मुख्य कमाऊ सदस्य ही क्यों न हों, घर के काम की ज़िम्मेदारी अब भी उन्हीं की है.

–    बच्चों की परवरिश से लेकर रिश्ते निभाने का दायित्व उन्हीं पर है.

–    इन सबके बीच उनकी शारीरिक ही नहीं, मानसिक हेल्थ पर भी प्रभाव पड़ रहा है.

–   चूंकि अब वो कमाती हैं, तो पति भी आर्थिक ज़िम्मेदारियां नहीं निभाते, जिसका बोझ इन्हीं के कंधों पर आ जाता है.

स़िर्फ नौकरी ही नहीं, बिज़नेस में भी हाथ आज़मा रही हैं महिलाएं…

–    महिलाओं के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए अब अधिकांश बैंक, सरकारी योजनाएं और यहां तक कि ग़ैरसरकारी वित्तीय संस्थान भी उनकी मदद के लिए आगे आ रहे हैं.

–    फुलर्टन इंडिया क्रेडिट कंपनी में रूरल बिज़नेस के प्रमुख विशाल वाधवा का कहना है कि समाज में अब बड़े पैमाने पर बदलाव आया है. आज के दौर में महिलाएं घर की मुखिया बन रही हैं. वो न स़िर्फ आर्थिक तौर पर घर संभालती हैं, बल्कि फाइनेंस से लेकर कई बड़े मसलों पर निर्णय भी लेती हैं.

–    महिलाओं को आगे बढ़ाने व आत्मनिर्भर होने के लिए कई स्कीम्स व योजनाएं हैं, क्योंकि अब लोग उनकी आत्मनिर्भरता को गंभीरता से लेने लगे हैं.

–    स़िर्फ शहरों में ही नहीं, अब गांवों में भी महिलाएं आर्थिक आत्मनिर्भरता के महत्व को समझ रही हैं.

–    यही वजह है कि अब कई वित्तीय संस्थान भी महिलाओं को सशक्त बनाने में पूरा सहयोग दे रहे हैं.

–    इस सहयोग में होम लोन्स पर विशेष ऑफर्स, बिज़नेस लोन पर कम ब्याज दर, ग्रुप लोन, पर्सनल लोन, नए बिज़नेस के लिए आर्थिक सहायता या बिज़नेस एक्सपैंशन के लिए किसी तरह की मदद आदि शामिल है.

–    इन सबके अलावा प्रोफेशनल ट्रेनिंग, कोर्सेस, अवेयरनेस प्रोग्राम्स, मनी मैनेजमेंट आदि संबंधी प्रशिक्षण भी संस्थाएं ग्रामीण इलाकों में देती हैं, क्योंकि आज महिलाओं की कमाई व आर्थिक आत्मनिर्भरता भी परिवार के लिए बहुत मायने रखती है.

–    पारंपरिक नियमों को तोड़कर आज महिलाएं अपने परिवार की आजीविका बेहतर करने का ज़िम्मा ले रही हैं, क्योंकि अब वो अपनी स्थिति में बदलाव चाहती हैं.

–   एक मशहूर लेखक व दर्शनशास्त्री ने कहा है कि सवाल यह नहीं कि कौन मुझे करने दे रहा है, सवाल यह है कि कौन मुझे रोक रहा है.

–   तो अब समाज बदल रहा है, महिलाओं की ही नहीं, महिलाओं को लेकर परिवार की भी सोच बदल रही है. ऐसे में अपनी स्थिति को बेहतर बनाने का ज़िम्मा भी महिलाओं का ही है.

–   अब वो मजबूर नहीं रहना चाहतीं. कठोर निर्णय लेने से भी पीछे नहीं हटतीं. लेकिन इस आर्थिक आत्मनिर्भरता और सपोर्टिव अर्निंग मेंबर से होकर मुख्य कमाऊ सदस्य बनने तक की लड़ाई में उन्हें बहुत कुछ खोना भी पड़ा है, क्योंकि आज भी परिवार व समाज से उस तरह का सहयोग नहीं मिल पा रहा, जैसा अपेक्षित था.

–    महिलाओं को इस मुक़ाम को पाने की बड़ी क़ीमत अदा करनी पड़ती है, क्योंकि पुरुषों के मुक़ाबले उनसे अपेक्षाएं ज़्यादा हैं. उन्हें सहयोग कम मिलता है, उनका संघर्ष बढ़ जाता है.

–    लेकिन कभी मजबूरी में, तो कभी अपनी ख़ुशी से वो इस रास्ते को अपनाती हैं और बदले में यदि थोड़ा-सा सम्मान चाहती हैं, तो इतना तो हक़ बनता ही है. परिवार और समाज से उनकी यह अपेक्षा कुछ ज़्यादा नहीं है.

– कमलेश शर्मा

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संकोची होते मर्द, बिंदास होतीं महिलाएं

कुछ रस्में अब न निभाएं तो अच्छा है, थोड़े-से अपने रूल्स बनाएं तो अच्छा है… कभी बचपने में खो जाएं तो अच्छा है, कभी एकदम से बड़े हो जाएं तो अच्छा है… टुकड़ों में जीना अब छोड़ दिया है… परंपराओं को अब अपने हिसाब से मोड़ दिया है… छोड़ो ये शर्म-संकोच, कुछ पल अपने लिए भी चुराओ… जी लो खुलकर ज़रा अब, थोड़े बिंदास और बोल्ड हो जाओ.

लाज, हया, शर्म, संकोच, नज़ाकत, नफ़ासत… और भी न जाने किन-किन अलंकारों से महिलाओं को अब तक अलंकृत किया जाता रहा है. ख़ासतौर से भारत जैसे देश में- ‘शर्म तो स्त्री का गहना है…’ इस तरह के जुमले आम हैं. ऐसे में तमाम पारंपरिक दायरों और सदियों से चली आ रही सो कॉल्ड परंपराओं के ढांचे को तोड़कर, बोल्ड-बिंदास महिलाएं जब सामने आती हैं, तो उन पर कई तरह के प्रश्‍नचिह्न भी लगा दिए जाते हैं. लेकिन चूंकि अब व़क्त बदल चुका है, तो महिलाओं की भूमिका और अंदाज़ भी बदल गए हैं. यही वजह है कि आज आपको हर दूसरी महिला बिंदास नज़र आएगी. वहीं दूसरी ओर पुरुष शायद भूमिकाओं के इस बदलते दौर में ख़ुद को एडजस्ट करने के प्रयास में थोड़े संकोची हो रहे हैं.

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क्यों महिलाएं हो रही हैं बिंदास?

–  सबसे बड़ी वजह है कि वो पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं. इससे उनमें आत्मविश्‍वास और ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का एहसास बढ़ा है.
“अगर स्त्री-पुरुष एक समान हैं, तो स्त्रियों को संकोची होने की ज़रूरत ही क्या है?” यह कहना है 19 वर्षीया मुंबई की एक कॉलेज स्टूडेंट दिव्या का. दिव्या के अनुसार, “महिलाएं अपने हक़ के लिए लड़ना सीख गई हैं. वो आर्थिक रूप से सक्षम हो रही हैं. अपनी ज़िम्मेदारी ख़ुद उठाना चाहती हैं और अपनी ज़िंदगी से जुड़े बड़े-बड़े फैसले भी आसानी से लेती हैं. यह सकारात्मक बदलाव है, जिसका सबको स्वागत करना चाहिए.”

– एक सर्वे से यह बात सामने आई है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं अधिक एडल्ट जोक्स अपने पुरुष दोस्तों के साथ मैसेजेस के ज़रिए शेयर करती हैं. उनका मानना है कि एक मैसेज या जोक ही तो है, उसे शेयर करने में हर्ज़ ही क्या है? आजकल महिलाएं न स़िर्फ अपने निजी रिश्तों पर, बल्कि अपने अफेयर्स पर भी बात करने से नहीं हिचकिचातीं. अपने बॉयफ्रेंड्स और ब्रेकअप्स के बारे में बात करने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. इस संदर्भ में 28 वर्षीया शीतल का कहना है, “अब वो ज़माना नहीं रहा कि लोग आपको इन चीज़ों पर परखकर आपके चरित्र पर उंगली उठाएंगे. आख़िर हम भी इंसान हैं. इंसानी कमज़ोरियां व ख़ूबियां हम में भी हैं, तो भला दुनिया हमें क्यों जज करे? और दूसरी तरफ़ अगर कोई हम पर उंगली भी उठाए, तो हमें परवाह नहीं.”

–  एक अन्य सर्वे के मुताबिक़, पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं कमिटमेंट से ज़्यादा डरती हैं यानी रिलेशनशिप में अब वो बहुत जल्दी भावुक होकर शादी के लिए तैयार नहीं होतीं. डेटिंग के बाद भी वो पुरुषों की अपेक्षा शादी के लिए या तो मना कर देती हैं या फिर अधिक समय लेती हैं निर्णय लेने में.

– महिलाओं के बिंदास होने की एक और बड़ी मिसाल है कि आजकल लड़कियां शादी के मंडप में भी दहेज के विरोध में उठ खड़ी होने का साहस दिखाने लगी हैं. उन्हें अब यह डर नहीं रहा कि कल को कोई उनसे शादी के लिए तैयार होगा या नहीं, पर वो अपने व अपने परिवार के स्वाभिमान की ख़ातिर क़दम उठाने में संकोच नहीं करतीं.

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क्या मर्द संकोची हो रहे हैं?

कई महिलाओं का यह भी मानना है कि भारतीय पुरुषों में आत्मविश्‍वास की कमी है और उन्हें ग्रूमिंग की ज़रूरत है. उन्हें यह भी नहीं पता कि महिलाओं के साथ किस तरह से व्यवहार करना चाहिए. इस संदर्भ में अधिक जानकारी के लिए हमने बात की सायकोथेरेपिस्ट डॉ. चित्रा मुंशी से-

–  दरअसल महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता बढ़ी है. इसे आप उनका बिंदास होना कहें या फिर अपने लिए ज़मीन तलाशने की कोशिश की सफलता की शुरुआत. जहां तक संकोच की बात है, तो संकोच दोनों में ही होता है और यह कोई नकारात्मक भाव नहीं है, जब तक कि वो आपके रिश्ते या प्रोफेशन को प्रभावित नहीं कर रहा. संकोच या लिहाज़ के कारण ही हम मर्यादा व अनुशासन में रहने की कोशिश करते हैं और अपनी सीमाएं बहुत जल्द नहीं लांघ पाते.

– पुरुषों को संकोची कहना यहां सही नहीं होगा, क्योंकि वो संकोची नज़र आ रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि उनमें शेयरिंग की आदत नहीं होती, अपने सीक्रेट्स से लेकर तमाम बातें वो दिल में ही रखते हैं. दरअसल, पुरुषों की तार्किक शक्ति काफ़ी अच्छी होती है, उनके लिए 2+2=4 ही होगा, लेकिन महिलाएं भावुक होती हैं. वो हर बात को भावनाओं से जोड़कर देखती हैं. जबकि पुरुषों को लगता है कि अगर कोई बात नहीं भी बताई या शेयर नहीं की, तो भी क्या फ़र्क़ पड़ता है. ऐसे में उनके लिए कहीं-कहीं संकोच एक बचाव का काम करता है.

– मेरे पास कुछ ऐसे पुरुष भी आते हैं, जो यह तर्क भी देते हैं कि मैं छिपा नहीं रहा, बस, मैं बता नहीं रहा यानी मैंने झूठ नहीं बोला, बल्कि मैंने तथ्य (फैक्ट्स) नहीं बताया.

– पुरुष ज़िंदगी का 80% समय ऑफिस व अपने काम में बिताते हैं, इसलिए वो घरवालों से भी उसी तरह डील करने लगते हैं, जैसे अपने कलीग्स या सबऑर्डिनेट्स से.

– दूसरी ओर लड़कियों को हमारे समाज व परिवार में पारंपरिक व सांस्कृतिक तौर पर ही प्रशिक्षित किया जाता है, ऐसे में जब आज की लड़कियां आत्मनिर्भर व आत्मविश्‍वासी हो रही हैं, तो वो पुरुषों की तरह सोचना चाहती हैं. चाहे ज़िंदगी हो या रिश्ते- हर स्तर पर पुरुषों से ही मुक़ाबला कर रही हैं, क्योंकि मुख्य रूप से वो बराबरी की तलाश में हैं. ऐसे में वो सबसे पहले उन बंदिशों को अपनी ज़िंदगी से हटाना चाहती हैं, जो अब तक उन्हें बराबरी की तलाश से रोक रही थीं.

– लेकिन जिस तेज़ी से किसी लड़की की सोच बदल रही है, हमारा समाज उस तेज़ी से नहीं बदल रहा, इसलिए अचानक बराबरी कर लेना संभव नहीं. इसमें लंबा व़क्त लगेगा और बराबरी की इस चाह में कोई ग़लत रास्ता चुनना या ज़िंदगी को जीने का ग़लत अंदाज़ चुन लेना भी सही नहीं है. कई बार वो जोश में ऐसे निर्णय भी ले लेती हैं, जो ख़ुद उनके लिए सही नहीं होते और असुरक्षित भी होते हैं. इसलिए सतर्क रहने में कोई बुराई नहीं.

– कई बार न चाहते हुए भी समाज की सोच के अनुरूप व्यवहार करना पड़ता है, स्वयं अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए भी, क्योंकि हम अचानक सबकी सोच व आसपास का माहौल नहीं बदल सकते. संतुलन बेहद ज़रूरी है और हमें अपनी सीमारेखा ख़ुद तय करनी होगी. समाज, परिवार और अनुशासन भी ज़रूरी हैं, क्योंकि हमारी अपनी सुरक्षा भी ज़रूरी है.

– कई बार बात स्त्री-पुरुष की होती ही नहीं, स़िर्फ आसपास के वातावरण, माहौल और परिस्थितियों को जांच-परखकर समझदारी से व्यवहार करने की होती है.

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ऐसे काम जो महिलाओं को और भी बिंदास बनाते हैं-

– बस कंडक्टर से लेकर लोकल ट्रेन और ऑटो ड्राइव करने से भी लड़कियां पीछे नहीं हटतीं. करियर से लेकर अपनी पर्सनल लाइफ में वो एक्सपेरिमेंट करने से अब डरती नहीं. कोई क्या कहेगा या क्या सोचेगा, इससे उन्हें अब अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ता.  इस संदर्भ में 32 वर्षीया मोना शर्मा का कहना है, “मुझे अपनी ज़िंदगी कैसे जीनी है, यह मैं तय करूंगी, कोई और नहीं. मैं अक्सर अपने फ्रेंड्स के साथ वीकेंड पर पब जाती हूं या पार्टी करती हूं. मुझे देखकर लोगों को यह लगता है कि मैं लापरवाह क़िस्म की हूं. मेरी एक बेटी है और मेरे पति भी मुझे कहते हैं कि कुछ व़क्त अपने लिए भी निकालना ज़रूरी है. मेरे परिवार को मेरी लाइफस्टाइल से समस्या नहीं है, इसके बाद भी लोगों की मेरे बारे में कोई अच्छी राय नहीं है. पर मेरी बेटी और पति हमेशा मुझे समझाते हैं कि दूसरों की राय पर अपनी ज़िंदगी के रूल्स मत बनाओ.”

– कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि जहां समाज का एक बड़ा तबका आज भी महिलाओं को लेकर रूढ़िवादी सोच रखता है, वहीं ऐसे लोगों की तादाद बढ़ भी रही है, जो व़क्त के साथ बदलना और ढलना पसंद करते हैं. अब पुरुष भी घर का काम करने में संकोच नहीं करते. अगर पत्नी का करियर अच्छा है, तो अपने करियर को पीछे रखकर उन्हें आगे बढ़ाने का हौसला भी रखने लगे हैं. हालांकि कम हैं ऐसे लोग, लेकिन हैं ज़रूर. इसलिए महिलाएं भी बिंदास हो रही हैं, बिंदास होने में बुराई नहीं, पर संतुलन का नियम तो हर जगह लागू होता है. जहां संकोच की ज़रूरत हो, ज़रूर संकोच करें. ध्यान रहे, समझदारी व परिपक्वता से व्यवहार करना किसी भी बिंदास महिला को आउटडेटेड नहीं बना देगा.

– गीता शर्मा