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अपने पैरों पर खड़े होने तक तो ठीक है, लेकिन औरत यदि पुरुष से दो क़दम आगे निकल जाए तो उन्हें ये बर्दाश्त नहीं होता. क्या आज भी इस सोच में बदलाव नहीं आया है? क्या अब भी बीवी की क़ामयाबी से जलते हैं पुरुष?

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हम स्त्री-पुरुष की समानता की चाहे कितनी ही दुहाई दे दें, लेकिन आज भी यदि कोई महिला अपने पति से ज़्यादा कमाती है, तो उनके रिश्ते में खटास आनी शुरू हो जाती है. कई केसेस में ऐसा भी होता है कि पति-पत्नी को इस बात से कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन परिवार के लोग बात-बात में उन्हें इस बात का एहसास कराते रहते हैं.

बदलाव आया है, लेकिन…
सपना कहती हैं, स्वाति मैंने और मेरे पति सुयश ने एक साथ पढ़ाई की और एक साथ करियर की शुरुआत भी की. साथ पढ़ते दोनों में प्यार हुआ और करियर में सेटल होते ही हमने शादी कर ली. शादी के बाद मुझे करियर में अच्छी अपॉर्चुनिटीज़ और प्रमोशन मिलते गए, जिससे शादी के दो साल बाद ही मेरी सैलरी सुयश से ज़्यादा हो गई. इससे हम दानों को तो कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, लेकिन मेरे सास-ससुर को लगने लगा कि बहू यदि ज़्यादा कमाएगी तो कहीं बेटे और परिवार पर हुकुम न चलाने लगे, इसलिए पहले उन्होंने मुझ पर फैमिली प्लान करने का प्रेशर डाला और मां बनते ही जॉब छोड़ देने की ज़िद करने लगे. कई बार उन्होंने सुयश के भी कान भरने की कोशिश की, लेकिन सुयश समझदार हैं, उन्होंने मेरा साथ दिया इसलिए मैं आसानी से जॉब कर पा रही हूं. ज़रूरी नहीं कि मेरे जैसी सभी महिलाओं को पति का सपोर्ट मिलता होगा, कई पुरुषों को बीवी का उनसे ज़्यादा कमाना पसंद नहीं होता, ऐसे में औरत की काबिलियत ही उसकी कमज़ोरी बन जाती है. समाज में अभी भी बहुत बदलाव की ज़रूरत है.

अभी दिल्ली दूर है…
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ के अनुसार, महिलाओं की कमाई हमारे देश में आज भी एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर बहस ख़त्म होने का नाम नहीं लेती. महिलाओं की कमाई यदि पुरुष से ज़्यादा हो, तो इसका असर उनके रिश्ते पर पड़ने लगता है. पुरुषों को कमाऊ पत्नी तो चाहिए, लेकिन उसे वे ख़ुद से ऊपर उठता नहीं देख सकते. पत्नी के सामने अपना रुतबा कम होता देख पुरुषों के अहम् को ठेस पहुंचती है और यही ठेस उनकी शादीशुदा ज़िंदगी में दरार डाल देती है. कई महिलाएं तो परिवार में क्लेश होने से बचने के लिए घर में अपनी सैलरी कम बताती हैं. ऑफिस में जब उन्हें अच्छे परफॉर्मेंस के लिए प्रमोशन या पुरस्कार मिलता है, तो वो अपनी ख़ुशी जाहिर करने के बजाय ये कहकर बात को टाल देती हैं कि ये प्रमोशन अकेले मुझे ही नहीं मिला है, बहुत लोगों को मिला है, इसमें कोई बड़ी बात नहीं है.

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महिलाएं भी हैं ज़िम्मेदार
हमारे देश में महिलाओं की कमाई को हमेशा दूसरे पायदान पर रखा जाता है और ज़्यादातर महिलाएं भी ऐसा ही सोचती है. कई महिलाएं अपनी कमाई को स़िर्फ अपने जेबख़र्च और ऐशो-आराम तक ही सीमित रखती हैं. उन्हें लगता है कि घर की आर्थिक ज़िम्मेदारी स़िर्फ पति की है, उनकी नहीं. ऐसे में जब कभी उन्हें घर के लिए ख़र्च करना पड़ता है, तो उन्हें ये अच्छा नहीं लगता. जब महिलाएं ही अपनी कमाई को ज़रूरी नहीं समझती, तो परिवार में उनकी कमाई को कैसे महत्व मिल सकता है. महिलाओं को स़िर्फ अपने शौक के लिए नहीं, बल्कि परिवार का आर्थिक स्तर मज़बूत करने के लिए कमाना चाहिए, तभी उनकी कमाई को महत्व दिया जाएगा.

पुरुषों को सोच बदलनी चाहिए
आज भी युवाओं को पत्नी वर्किंग तो चाहिए, लेकिन अपनी शर्तों पर, यानी पत्नी की सैलरी और ओहदा उनसे ऊंचा न हो, यदि ऐसा हो जाए तो उनके अहम् को ठेस पहुंच जाती है. पत्नी यदि ज़्यादा कमाती है, तो पति उसकी हर बात को उसका अहंकार समझने लगता है, पत्नी का ज़्यादा कमाना वो सहन नहीं कर पाता. ऐसे में पत्नी को बात-बात पर ताने देना, बिना बात के झगड़ा बढ़ाकर उसे दोषी ठहराना जैसी बातें पति की फितरत बन जाती है और धीरे-धीरे उनके रिश्ते में खटास बढ़ने लगती है. ऐसे में अपनी क़ामयाबी ही महिलाओं को कुंठित कर देती है.

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औरत की कमाई पर सवाल
आज भी कई घरों में औरत की कमाई को सही नहीं माना जाता, उन्हें लगता है कि औरतों को तभी कमाना चाहिए जब घर में पैसे की कमी हो. यदि परिवार संपन्न है, तो महिला चाहे कितनी ही पढ़ी-लिखी और क़ाबिल क्यों न हो, उसे काम नहीं करना चाहिए. सपना कहती हैं, मैं शादी से पहले जॉब करती थी, लेकिन शादी के बाद मेरे ससुराल वालों ने ये कहकर मुझे जॉब करने से मना कर दिया कि हमारे घर की बहू-बेटियां नौकरी नहीं करती. उनके कहने पर मैंने जॉब छोड़ दी और अपना पूरा ध्यान घर-गृहस्थी पर लगा दिया. फिर मेरे बेटे के जन्म के कुछ समय बाद मेरे पति की नौकरी छूट गई. काफी समय तक जब उन्हें नौकरी नहीं मिली और घर में पैसों की किल्लत होने लगी, तो मेरे ससुराल वालों ने मुझे फिर से नौकरी करने को कहा. उस व़क्त मैं बच्चे को छोड़कर जॉब नहीं करना चाहती थी, लेकिन घर वालों ने मुझ पर इतना दबाव डाला कि मजबूरन मुझे नौकरी करनी पड़ी. कुछ समय बाद मेरे पति को भी जॉब मिल गई. अब हम दोनों जॉब गर रहे थे, घर में किसी को कोई शिकायत नहीं थी. समस्या तब शुरू हुई जब मेरी सैलरी पति से ज़्यादा हो गई. परिवार वालों ने एक बार फिर मुझ पर जॉब छोड़ने का दबाव डालना शुरू कर दिया, लेकिन इस बार मैंने उनकी बात नहीं मानी और अपना जॉब जारी रखा. जब मैं अपने दूध पीते बच्चे के साथ घर में रहना चाहती थी, तब परिवार में किसी ने मेरी नहीं सुनी और आज जब मैं अपने जॉब में अच्छी तरह सेटल हो गई हूं तो मुझ पर स़िर्फ इसलिए जॉब छोड़ने का दबाव डाला जा रहा है, क्योंकि मैं अपने पति से ज़्यादा कमाने लगी हूं. सिचुएशन देखकर इन लोगों के नियम-कायदे बदल जाते हैं, ऐसे में कब तक मैं अपने करियर के साथ खिलवाड़ करती रहूं. न मैंने कभी परिवार को अपनी कमाई का रौब दिखाया, न ही कभी अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे हटी, फिर बार-बार मुझे ही त्याग करने को क्यों कहा जाता है?

ये तस्वीर बदलनी चाहिए
कुछ समय पहले करीना कपूर और अर्जुन कपूर अभिनित एक फिल्म की और का काफ़ी चर्चा में रही. इसकी वजह थी फिल्म की कहानी, जिसमें पति-पत्नी दोनों अपनी मर्ज़ी से अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियां निर्धारित करते हैं. पत्नी घर की आर्थिक ज़िम्मेदारी संभालती है यानी नौकरी करती है और पति घर संभालता है. हमारे देश में ऐसी कहानी चौंका देने वाली हो सकती है, लेकिन यूरोपीय देशों में हाउस हसबैंड का कॉन्सेप्ट बहुत पहले से मान्य है. वहां पर कई पुरुष घर पर रहकर परिवार व बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी उठाते हैं और महिलाएं आर्थिक मोर्चा संभालती हैं, लेकिन हमारे देश में इस तरह के कॉन्सेप्ट को समाज पचा नहीं पाता.

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भारतीय महिलाएं हैं अवसाद की शिकार
शिकागों की एक शोधकर्ता ने 10 साल तक भारतीय महिलाओं पर शोध के बाद ये नतीजा निकाला कि लगभग 72 फीसदी भारतीय महिलाएं गहरे अवसाद की शिकार हो रही हैं. शोधकर्ता के मुुताबिक, महिलाओं के तनाव का सबसे बड़ा कारण ख़ुद उनका परिवार है.

– कमला बडोनी

तुम मुझे अब पहले की तरह प्यार नहीं करते, तुम्हें अब मेरी परवाह कहां रहती है, तुम्हें तो मुझमें सिर्फ कमियां ही नज़र आती हैं… जैसे उलाहने देना पति-पत्नी के बीच आम बात है. क्या होती हैं पति-पत्नी की शिकायतें और प्यार में क्या चाहते हैं स्री-पुरुष? आइए जानते हैं.

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1) ख़ूबियां क्यों खामियों में बदल जाती हैं?
शादी के शुरुआती सालों में तो सब कुछ अच्छा लगता है, लेकिन साल-दो साल में ही मुहब्बत की स्क्रिप्ट कमज़ोर पड़ने लगती है. दूसरे शब्दों में कहें तो तुम्हारे दीदार से सुबह की शुरुआत हो, तुम्हारे पहलू में ही हर शाम ढले… के दावे धीरे-धीरे दम तोड़ने लगते हैं. शादी के बाद घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों के बोझ तले मुहब्बत अपना असर खोने लगती है और एक-दूसरे में सिर्फ ख़ूबियां ढूढ़ने वाले शख्स बात-बात पर एक-दूसरे की खामियां गिनाने लगते हैं.

2) क्यों टूटती हैं उम्मीदें?
एक-दूसरे पर दोषारोपण की एक ख़ास वजह होती है एक-दूसरे से ज़रूरत से ़ज़्यादा उम्मीदें, जिसमें महिलाएं पुरुषों से कहीं आगे होती हैं. पुरुष पत्नी के साथ वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा उसने अपने पिता का मां के प्रति देखा था, लेकिन पत्नी उसे एक अच्छे दोस्त, बहुत प्यार करने वाले प्रेमी, जिम्मेदार पिता के रूप में देखना चाहती है. पत्नी अगर कामकाजी हो, तो वो उम्मीद करती है कि पति घरेलू जिम्मेदारियों में भी उसका साथ दे. यदि वो ऑफिस से आकर खुद को बहुत थका हुआ महसूस कर रही है, तो पति किचन के कामों में उसकी मदद करे, बच्चे के स्कूल की पैरेंट्स-टीचर मीटिंग के लिए समय निकाले, ज़रूरत पड़े तो अपने कपड़े खुद प्रेस कर ले… लेकिन ़ज़्यादातर पुरुष इन तमाम ज़िम्मेदारियों को बांटना नहीं चाहते, उन्हें लगता है कि घरेलू काम सिर्फ पत्नी की ज़िम्मेदारी है.

3) क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सीमा हिंगोरानी के अनुसार- स्त्री-पुरुष को प्रकृति ने एक-दूसरे से बिल्कुल अलग बनाया है. स्त्रियां अपनी भावनाओं को आसानी से अभिव्यक्त कर लेती हैं, लेकिन पुरुषों के लिए ये इतना आसान नहीं होता. दूसरा फर्क़ ये भी है कि महिलाएं इमोशनल और ड्रीमी होती हैं, जबकि पुरुष पैक्टिकल होते हैं. पुरुष प्यार तो करता है, लेकिन बात-बात में उसे ज़ाहिर करना ज़रूरी नहीं समझता. हमारे पास ऐसे कई केस आते हैं जहां बीवी की शिकायत होती है कि पति उसका हाथ नहीं पकड़ते, ऑफिस जाते समय उसे किस नहीं करते. जबकि पुरुष की शिकायत होती है कि बीवी ज़रूरत से ़ज़्यादा उम्मीदें रखती है. एक केस तो ऐसा भी आया, जिसमें पत्नी को पति से ये शिकायत थी कि पति ने उसे एनिवर्सरी ग़िफ़्ट देने के बजाय पैसे थमा कर कह दिया कि अपने लिए ग़िफ़्ट ख़रीद लेना. वहीं पति महोदय की शिकायत थी कि पत्नी को उनके लाए तोहफे कभी पसंद नहीं आते, इसलिए उन्होंने पत्नी से ख़रीद लाने को कहा. यदि वह चाहती तो मैं उसके साथ चल सकता था. दरअसल, स्त्री-पुरुष के ब्रेन की वायरिंग ही अलग-अलग होती है. पत्नी चाहती है कि पति उसे दिन में 2-3 बार फोन करे, एसएमएस करे, जबकि पति को लगता है कि जब शाम को घर ही जाना है तो फ़ोन या एसएमएस की ज़रूरत क्या है.

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4) नज़रिया अपना-अपना

  • बैंक कर्मचारी सागरिका शर्मा कहती हैं, बहुत खीज होती है जब ऑफिस टाइम पर पहुंचने के लिए सुबह जल्दी उठकर घर के सारे काम निपटाने पड़ते हैं और पति महोदय को बिस्तर पर चाय चाहिए होती है. उस पर उनके कपड़े, लंच बॉक्स, टाई, पेन सब कुछ हाथ में थमाने पड़ते हैं. कई बार इस बात को लेकर अनबन भी होती है, लेकिन इन पर तो कोई असर ही नहीं होता. आखिर थक-हारकर मुझे ही सारा कुछ करना पड़ता है. बच्चों का होमवर्क कराना भी इन्हें बोझ लगता है.
  • एक प्राइवेट फर्म में मार्केटिंग मैनेजर के पद पर कार्यरत सार्थक मेहरा कहते हैं, औरतें वंडरलैंड से बाहर निकलना ही नहीं चाहतीं, उन्हें लगता है कि पति ज़िंदगीभर उनसे चांद-तारे तोड़ लाने की खयाली बातें करता रहे या फिर उनकी ख़ूबसूरती के कलमे पढ़े. हर दूसरे-तीसरे दिन पत्नी की शिकायत शुरू हो जाती है कि कितने दिन से कहीं घूमने नहीं गये, आप अब पहले की तरह बाय करके ऑफ़िस नहीं जाते, कभी डिनर पर ले जाने का नाम नहीं लेते… इन तमाम शिकायतों से बचने के लिए मैं जान बूझकर काम का बहाना बनाकर देर से घर लौटता हूं. ठीक है, शादी के शुरुआती दिनों में पति कुछ ज्यादा ही दरियादिली दिखा देते हैं, लेकिन ऐसा उम्रभर तो नहीं हो सकता, पर ये सब इन बीवियों को कौन समझाए.
  • ऐड एजेंसी में कार्यरत मेघना पुरी कहती हैं, पुरुषों की शिकायत होती है कि पत्नी को हमेशा उनसे शिकायत रहती है, लेकिन इसके पीछे वजह भी तो साफ है, क्योंकि तकलीफ़ भी उन्हीं को ज़्यादा होती है. आज ज़्यादातर घरों में औरतें फाइनेंशियल, इमोशनल, सारे काम संभाल रही हैं, इसके बावजूद उनकी स्थिति पहले जैसी, बल्कि पहले से बदतर हो गई है. उसकी एडिशनल ज़िम्मेदारियों को तो पति एक्सेप्ट कर लेते हैं, बाहरी दुनिया में उससे मॉर्डन अप्रोच भी रखते हैं, लेकिन जहां घर की बात आती है तो उन्हें बिल्कुल पारंपरिक पत्नी चाहिए होती है.
  • एक प्राइवेट फर्म में कार्यरत प्रणव मुखर्जी कहते हैं, जहां तक फ्रीडम की बात है, तो मुझे इसमें किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं. मैं प्राची (पत्नी) के पर्सनल मैटर में ख़ुद भी हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन जब वो इतनी स्मोकिंग क्यों करते हो, तुम्हारा यूं रात-रात तक दोस्तों में घिरे रहना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं, तुम्हारे ऑफिस की लड़कियां इतनी रात गये क्यों फोन करती हैं, इतना वल्गर एसएमएस किसने भेजा… ऐसी बेहूदा शिकायतें करती है तो मैं चिढ़ जाता हूं. भई मैं क्यों किसी के लिए अपनी ख़ुशी को दांव पर लगाऊं, फिर चाहे वो मेरी पत्नी ही क्यों न हो.

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5) प्यार को प्यार ही रहने दो
प्यार जताने या एक-दूसरे पर दोषारोपण करने का सभी कपल्स का तरीक़ा भले ही अलग-अलग हो, लेकिन ये बात तो तय है कि जब भी पार्टनर ज़रूरत से ज़्यादा उम्मीद की जाती है, तब रिश्ते में कड़ुवाहट का सिलसिला शुरू हो जाता है. प्यार के इतिहास, भूगोल पर टीका-टिप्पणी किये बिना यदि प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो की तर्ज़ पर स़िर्फ महसूस किया जाए या निभाया जाए, तो शायद हम प्यार के इस ख़ूबसूरत रिश्ते का उम्रभर लुत्फ़ उठा सकते हैं.

6) कंसास यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की है कि महिलाओं को अपनी प्रशंसा सुनना अच्छा लगता है. कॉम्प्लिमेंट्स या फ्लैटरिंग (प्रशंसा या चापलूसी) से महिलाओं में आत्मविश्वाछस बढ़ता है और वे अपने शरीर को लेकर हीनभावना की शिकार नहीं होतीं. शायद ये भी एक बड़ी वजह है पत्नी की पति से अपनी तारीफ़ की चाह रखने की.

7) ये है प्यार का केमिकल लोचा
रॉबर्ट फ्रेयर द्वारा किये गए प्रयोगों के अनुसार, जब किसी को प्यार हो जाता है, तो एक ख़ास तरह के न्यूरो केमिकल फिनाइल इथाइल अमीन की वजह से उसे प्रेमी/प्रेमिका में खामियां नज़र आना बंद हो जाता है. लेकिन यह रसायन हमेशा एक ही स्तर पर नहीं रहता. एक-दो साल बाद इसका स्तर शरीर में कम होता जाता है और चार-पांच साल बाद इसका प्रभाव शरीर पर बिल्कुल बंद हो जाता है. अतः इसके उतार-चढ़ाव का प्रभाव प्रेमियों के स्वभाव में भी साफ़ नज़र आता है. यानी जब प्रेम का उफान कम होने लगता है, तो एक-दूसरे की ख़ूबियां खामियों में बदलने लग जाती हैं.

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8) प्यार बढ़ाने के असरदार फॉर्मूले

  • ज़रूरत से ज़्यादा अपेक्षाओं से बचें.
  • प्यार करें, अधिकार जताएं, पर हकूमत न करें.
  • पति-पत्नी के परंपरागत फ्रेम से बाहर निकलकर अच्छे दोस्त बनें.
  • पज़ेसिव होने से बचें.
  • करीब रहें, पर इतना भी नहीं कि सांस लेना मुश्किल लगने लगे. रिश्तों के स्पेस को समझें.
    – कमला बडोनी

हमारे समाज में शादी (Wedding) को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है, लेकिन शादी को लेकर ज़रूरी बातें, सतर्कता व रिश्तों (Relationships) की मज़बूती के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लेने की सीख को ज़रा भी महत्व नहीं दिया जाता, क्योंकि हम शादी का अर्थ शायद अब तक समझ ही नहीं पाए. पैरेंट्स को लगता है कि बस ‘किसी तरह’ बच्चों की शादी हो जाए… ये जो ‘किसी तरह’ वाली सोच है, यही समस्या की जड़ है. किसी तरह… जैसे-तैसे… ये तमाम भाव निपटानेवाले हैं, इनमें गंभीरता कहां है?

Things Couple Must Talk Before Getting Married

पैरेंट्स को लगता है कि बात पक्की हो गई है, तो अब शादी होने तक बच्चों को भी ऐसी किसी भी बात से बचना चाहिए, जिससे शादी में अड़चन आए. लेकिन आजकल लोगों की सोच बदल रही है और यह ज़रूरी भी है कि शादी जैसे रिश्ते की गंभीरता को समझकर उससे जुड़े हर पहलू पर विचार किया जाए. यही वजह है कि शादी से पहले ही कुछ बातों पर सहमति अनिवार्य है, ताकि रिश्ते में आगे चलकर समस्या न हो.

1. करियर

दोनों अपने करियर को लेकर क्या सोचते हैं, एक-दूसरे से किस तरह का सहयोग चाहते हैं, किस तरह से शादी के बाद करियर को आगे बढ़ाना है… इन बातों पर आपसी सलाह-मशविरा ज़रूरी है.

2. कंट्रासेप्शन

किस तरह का कंट्रासेप्शन यूज़ करना है, किसे यूज़ करना है, कब तक यूज़ करना है आदि बातें कपल्स पहले ही डिसाइड कर लें, वरना अनचाही प्रेग्नेंसी बहुत से प्लान्स चेंज करवा सकती है.

3. फैमिली प्लानिंग

जैसा कि हमने कहा कि एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी या अनचाहा गर्भ बहुत से अहम् फैसले बदलने को मजबूर कर सकता है, जिसमें करियर से लेकर फाइनेंशियल प्लानिंग तक शामिल है. तो बेहतर होगा कि बच्चा शादी के कितने समय बाद प्लान करना है, इस पर सहमति बना लें.

4. फाइनेंशियल प्लानिंग

आपके जॉइंट अकाउंट्स, इंडिपेंडेंट अकाउंट्स, आपकी सैलरी, सेविंग्स, घर के ख़र्च व ज़िम्मेदारियां किस तरह से पूरी करनी हैं, किसके हिस्से कौन-सी ड्यूटी आएगी, किसको कितना ख़र्च करने के लिए तैयार रहना होगा आदि बातों पर चर्चा करना बेहतर होगा, क्योंकि आगे चलकर यही बातें विवाद का कारण बनती हैं.

5. घर का काम

यदि आप दोनों वर्किंग हैं, तो घर का काम भी मिल-जुलकर करना ज़रूरी है. इससे एक ही व्यक्ति पर ज़्यादा बोझ नहीं पड़ता. इन पहलुओं पर भी चर्चा करें.

6. लड़की अपने मायके की ज़िम्मेदारियों पर बात करे

शादी के बाद भी अपने मायके को किस तरह से आप सपोर्ट करना चाहती हैं और यह कितना ज़रूरी है, यह बात पार्टनर को बताएं, ताकि बाद में कोई विवाद न हो. पार्टनर आपको कितना सहयोग देगा, इस पर भी बात करें.

7. लड़का भी घर की ज़िम्मेदारियों की बात साफ़-साफ़ करे

कोई लोन है या फ्यूचर में आपको लोन लेकर घर या कोई ऑफिस खोलना है, सगे-संबंधियों, भाई-बहनों, माता-पिता से जुड़ी तमाम ज़िम्मेदारियों के बारे में पार्टनर को पहले ही अवगत करा दें, ताकि वो मानसिक रूप से आपका साथ देने को तैयार रहे. ऐसा न हो कि वो फिल्मी सोच के साथ किसी अलग ही दुनिया का सपना संजोकर आए और यथार्थ के धरातल पर आकर उसकी आंखें खुलें.

8. मानसिक-शारीरिक समस्या या बीमारी

यदि आपको किसी तरह की कोई समस्या रही हो या इलाज चल रहा हो, तो इस बात को छिपाएं नहीं. किसी और से पता चलने से विश्‍वास टूट जाता है, बेहतर होगा आप ख़ुद खुलकर बता दें, ताकि आपका पार्टनर निर्णय ले सके कि उसको किस तरह आपका साथ देना है.

9. सेक्स

यह ज़रूरी नहीं कि शादी की पहली रात ही सेक्स किया जाए. आप दोनों कितने सहज हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है. अगर आपके मन में सेक्स को लेकर डर, शंका या संकोच जैसी बात है, तो आप दोनों काउंसलर के पास भी जा सकते हैं.

10. वर्जिनिटी

आपका पार्टनर इस पर क्या सोच रखता है. क्या वो भी इसी के इंतज़ार में है कि शादी की पहली रात सेक्स करने पर आपकी वर्जिनिटी का पता चल जाएगा… अगर उसकी सोच इस तरह की है, तो अलर्ट हो जाएं. आप बातों ही बातों में, किसी सहेली या किसी मूवी का उदाहरण देकर सामनेवाले की सोच को जांच-परख सकती हैं. यह बहुत ज़रूरी है, वरना ये बातें तलाक़ का कारण भी बन जाती हैं.

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11. एक-दूसरे के विचार

यह ज़रूरी नहीं कि आप दोनों के विचार एक जैसे हों और यह संभव भी नहीं, क्योंकि हर इंसान की सोच अलग होती है, लेकिन क्या आप उसकी सोच के साथ निबाह सकते हैं? कहीं होनेवाला पार्टनर बहुत ज़्यादा ईगोइस्ट तो नहीं, कहीं बहुत ज़िद्दी तो नहीं, कहीं बहुत पिछड़े विचारों का तो नहीं, कहीं बहुत ख़र्चीला या बहुत कंजूस तो नहीं आदि बातों पर चर्चा ज़रूरी है.

12. आदतें

बेहतर होगा एक-दूसरे को इंप्रेस करने की बजाय अपनी रियल साइड दिखाएं, ताकि भ्रम की स्थिति न रहे. आप दोनों की आदतें, जैसे- ईटिंग हैबिट्स, हाइजीन से जुड़ी आदतें, पैसों से जुड़ी, सिगरेट-शराब, वर्किंग हैबिट्स कैसी हैं, यह भी ज़रूर पूछें.

13. शौक़

बाद में पता चला कि एक को मूवीज़ का बेहद शौक़ है, तो दूसरा किताबी कीड़ा निकला. एक को बाहर घूमने में मज़ा आता है, तो दूसरे को घर बैठकर टीवी देखने में… ये बातें पहले ही पता चल जाएं, तो एडजेस्ट करने में आसानी होती है. एक-दूसरे के लिए ख़ुद को बदलने का प्रयास भी किया जा सकता है, वरना ज़िंदगीभर ताने सुनते रहना पड़ेगा कि ये कहीं घुमाने नहीं लेकर जाते.

14. ज़िम्मेदार

होनेवाला पार्टनर कितना ज़िम्मेदार है, कितना गंभीर है किसी भी बात या रिश्ते को लेकर. इस पर भी बात करनी ज़रूरी है. लापरवाही भरा रवैया हर रिश्ते में समस्या खड़ी करता है, चाहे यह लापरवाही लड़के की तरफ़ से हो या लड़की की तरफ़ से.

15. दहेज

लड़का या उसके परिवारवाले कुछ ज़्यादा तो एक्सपेक्ट नहीं कर रहे आपके घरवालों से? यह आप बातों ही बातों में पता कर सकती हैं. शादी के बाद क्या फाइनेंशियल प्लानिंग है, कहीं सामनेवाला करियर छोड़कर बिज़नेस की प्लानिंग तो नहीं कर रहा, कहीं किसी बड़ी गाड़ी या बाइक का सपना तो नहीं पाल रहा… आदि.

16. रेस्पेक्ट

एक-दूसरे को ही नहीं, एक-दूसरे की फैमिली को भी आप दोनों कितना सम्मान देंगे, किस तरह एक-दूसरे के परिवारों में किसी समस्या के समय साथ खड़े रहेंगे, एक-दूसरे के बुरे व़क्त में कितना साथ निभाएंगे, शादी स़िर्फ हसीन सपना ही नहीं, बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी का नाम भी है. आप दोनों मानसिक व शारीरिक तौर पर कितने तैयार हैं इस ज़िम्मेदारी के लिए, इस पर ग़ौर करें.

17. बदलाव

शादी के बाद सब कुछ बदल जाता है. बैचलर लाइफ से मैरिड लाइफ में आना आसान नहीं है. आज़ादी कम हो जाती है, ज़िम्मेदारियां बदलती व बढ़ती हैं, लापरवाही छोड़कर गंभीर होना पड़ता है. ताने देने की बजाय त्याग करके साथ निभाना पड़ता है. अपने शौक़ हो सकता है बदलने पड़ जाएं, हो सकता है कई बार शौक़ पूरे भी न हो पाएं… तो क्या इन बदलावों को आप दोनों सहर्ष स्वीकार करेंगे? इन पहलुओं पर चर्चा व सलाह करना ज़रूरी है.

इन बातों पर चर्चा करते समय यह न सोचें कि कहीं सामनेवाले को बुरा न लग जाए या शादी टूट न जाए. ग़लत रिश्ते, ग़लत लोगों से रिश्ते या ग़लत जगह रिश्ते जुड़ने से बेहतर है थोड़ा और इंतज़ार कर लिया जाए.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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