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कहानी- नसीहत (Hindi Short Story- Nasihat)

Hindi Short Story
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     उमा शंकर दुबे

Hindi Short Story

“नल खुला छोड़ दिया. पानी व्यर्थ में बह रहा है. इस देश में तमाम लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस जाते हैं… बाथरूम में साबुन सोप बॉक्स में नहीं रखा? फ़र्श पर पड़ा गल रहा है, किसी का पैर पड़ने पर वह फिसल सकता है, चोट लग सकती है… कपड़े सब इधर-उधर बिखरे पड़े हैं. तह करके हैंगर में लगाकर आलमारी में रखने चाहिए… गंदे मोजे व कपड़े बाथरूम में पड़े हैं, वॉशिंग मशीन में क्यों नहीं डाले?… पापा की शाम की चाय में शुगर क्यूब्स दे दिए. शुगर फ्री टेबलेट नहीं दी. जानती हो वे डायबेटिक हैं…” यह शृंखला बहुत लंबी थी. हर छोटी से छोटी बात पर उनकी चौकस निगाह लगी रहती थी.

 

शादी हुए अभी दो महीने ही बीते थे कि सासू मां की नसीहतें शुरू हो गई थीं. वैसे हनीमून पर जाते समय ही सासू मां ने कहा था, “लौटने के बाद एक-दो महीने अपने घर-परिवार को समझने में लगाओ, फिर अपनी घर-गृहस्थी संभालो और मुझे घर की ज़िम्मेदारी से मुक्त करो.” उस समय वो सब सुनकर बहुत अच्छा लगा था. सासू मां का कितना स्नेह और विश्‍वास है मुझ पर कि पूरी गृहस्थी मुझे सौंपकर निश्‍चिंत हो जाना चाहती हैं.
हनीमून से लौटने के बाद दो माह कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला. नवविवाहित दंपति जब एक-दूसरे के प्यार और सान्निध्य में आकंठ डूबे हों, तो समय कैसे बीतता चला जाता है पता ही नहीं चलता. मंजुल के साथ दुनिया-जहान की बातें करते-करते रात के दो-तीन बज जाते. हर तरह से तृप्त होकर, थककर मैं गहरी नींद सो जाती, तो सवेरे नौ बजे से पहले आंख ही नहीं खुलती. शुरुआती एक-दो दिन मंजुल बेड टी मेरे सिरहाने रख देते, जो नौ बजे तक ठंडी हो जाती. अब सुबह की मेरी चाय थर्मस में रख दी जाती है, जो उठने पर मैं गरम-गरम पीती हूं, तब तक मंजुल नाश्ता करके ऑफिस के लिए तैयार हो चुके होते हैं. दो महीने बीतते-बीतते मायके जाते समय सासू मां ने मुझे धीरे से याद दिलाया कि लौटकर आने पर तुम्हें रूटीन बदलना होगा, क्योंकि अब घर-गृहस्थी तुम्हें संभालनी है.
सासू मां बहुत ही कर्मठ, हंसमुख, ख़ुशमिज़ाज और शालीन थीं. मैंने उन्हें कभी ज़ोर से बोलते या डांटते नहीं सुना. फिर भी किसी आदेश की अवहेलना या समय पर कोई काम न करने पर वे असहज होकर कठोर शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया अविलंब व्यक्त कर देती थीं. यदि वे लिहाज़ करती भी थीं तो तब, जब कोई बाहरी व्यक्ति बैठा हो. उस समय तो वे सहज भाव से बतियाती रहती थीं, पर उसके जाते ही वे जिसने ग़लती की हो, उससे कहने में ज़रा भी नहीं चूकती थीं. घर में महरी और एक नौकर था. ससुरजी शेयर मार्केट का काम करते थे. छोटी ननद पढ़ रही थी. सभी का चाय-नाश्ता, टिफिन व भोजन की व्यवस्था से लेकर उनकी अन्य अपेक्षाओं और ज़रूरतों को वह सहजता से पूरा करती रहती थीं.
मायके से लौटने पर स्नानादि करके पूजाघर में ठीक छह बजे मुझे सितार या हारमोनियम बजाते हुए भजन गाने का आदेश मिला. संगीत व गायन में मैं पारंगत थी. मेरे गाए भजन सासू मां को बहुत प्रिय थे. पूजा के बाद अन्य घरेलू कामों में मैं सासू मां का हाथ बंटाने लगी. मैं चाहती थी कि सासू मां ख़ुश रहें और मेरे कारण किसी को कोई असुविधा न हो, पर घर-गृहस्थी में सभी को संतुष्ट कर पाना इतना आसान न था. जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, एक-एक करके सासू मां की ऐसी-ऐसी नसीहतें सामने आने लगीं कि सुनकर मैं तिलमिला उठती, लेकिन कुछ कह नहीं पाती.
मंजुल से मैं कहती, तो वे उसे मज़ाक में उड़ा देते. वे परिहास प्रिय थे. मां का सम्मान करते थे. उन्हें नहीं लगता था कि मां ने कुछ ग़लत कहा. मुझे भी आहत नहीं करना चाहते थे. अतः गंभीर से गंभीर बात को भी हवा में उड़ा देते. रात को बेडरूम में हमारी बातचीत की शुरुआत सासू मां के दिनभर में दिए गए उपदेशों की समीक्षा से होती.
“जानते हो, उनकी मधुरवाणी और सहज स्वर में भी कभी-कभी उस चींटी का दंश छिपा रहता है, जो रेंगते-रेंगते ब्लाउज़ में घुसकर काटने लगती है और सबके सामने न उसे निकाल सकती हूं, न मार सकती हूं, बस कसमसाकर रह जाती हूं.”
“चींटी वाकई बहुत धृष्ट है.” मंजुल कहते. “ऐसे निषिद्ध आकर्षण स्थल पर सहज ही पहुंच जाती है, जहां पहुंचने के लिए मुझे कितनी मनुहार करनी पड़ती है.”
“तुम्हें तो हर बात में मज़ाक सूझता है. मेरा तात्पर्य है, वे कभी-कभी ऐसा वाक्य बोल देती हैं कि जिसे सुनकर तन-बदन में आग लग जाती है.” मैं चिढ़कर कहती.
“नो प्रॉब्लम, जग में ठंडा पानी तुम्हारे सिरहाने रखा रहता है. फिर यह बंदा अग्निशमन अधिकारी तो तुम्हारी सेवा में सदैव उपस्थित है, आग बुझाने के लिए सतत् तत्पर.” मंजुल मेरी बात को मज़ाक में उड़ा देते.
उस दिन सुबह सात बजे किचन में मैं सभी के लिए नाश्ता बना रही थी कि नौकर ने सूचना दी- सासू मां बेडरूम में बुला रही हैं. मैं सासू मां के पास पहुंची, “यह क्या है?” उन्होंने वही चिर-परिचित व मीठी सहज वाणी में कहा. “तुमने बिस्तर कितने बजे छोड़ा?” “जी छह बजे.” मैंने उत्तर दिया. “इस समय सवा सात बज रहे हैं. सवा घंटे से तुम्हारे कमरे की लाइट, टीवी, एसी सब चल रहे हैं. यह तो बिजली की बरबादी है न. इससे बिजली का बिल निरर्थक बढ़ता है और शॉर्ट सर्किट होकर आग लगने का भी ख़तरा रहता है. कमरे से निकलते ही सारे स्विच ऑफ़ कर दिया करो, इसे अपनी आदत बना लो.”
सासू मां के मधुर वचनों को मैंने कड़वी दवा की तरह निगल लिया. वह मेरे साथ किचन तक आ गई थीं. हड़बड़ाहट में मैं गैस जलती हुई छोड़ गई थी. उस पर कुछ पकाने का बर्तन नहीं था. सासूजी ने पुनः वही बात याद दिलाई, “कहीं भी जाने के पहले गैस जलती हुई मत छोड़ो. इससे गैस बरबाद होने के साथ-साथ दुर्घटना होने का भी ख़तरा हो सकता है. मुझे मेरे घर पर पापा भी इसी प्रकार बात-बात पर टोका करते थे, पर वहां मेरी मम्मी तुरंत अपनी लाडली बिटिया के बचाव के लिए आ जाती थीं. पापा को पलटकर वह जवाब दे देतीं, “क्या कंजूसी सिखा रहे हो. दो-चार रुपए की बिजली ही जाएगी, तो घर के बजट पर क्या अंतर पड़ता है. गैस सिलेंडर तो दो-दो एक्स्ट्रा रखे रहते हैं. थोड़ी-सी गैस क्या बरबाद हो गई, लगे बिटिया को उपदेश देने. अरे, बाद में तो उसे ससुराल में खटना ही है. अपने घर में तो आराम से रहने दो…”
रात को मैंने मंजुल को सारी बातें बताईं, तो वे हो-हो करके हंसने लगे. “हमारे ऑफिस में तो प्रत्येक डायरेक्टर के चेम्बर के बाहर अंदर की लाइन काट देने का स्विच लगा है. हमारा एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर भी चेम्बर से जाते समय ख़ुद स्विच ऑफ करता है. चपरासी का इंतज़ार भी नहीं करता. हम सभी ऑफिस से निकलते समय यह सुनिश्‍चित कर लेते हैं कि कहीं लाइट, एसी न चल रहे हों. यह एक अच्छी आदत है. चलो, अभी से इसकी प्रैक्टिस शुरू कर दो. तुम्हारे रहते लाइट्स की आवश्यकता ही क्या है. तुम्हारे सौंदर्य के आलोक से कमरा ऐसे ही आलोकित रहता है.”
दिन बीतते रहे और सासू मां की नसीहतें भी बदस्तूर जारी रहीं. “नल खुला छोड़ दिया. पानी व्यर्थ में बह रहा है. इस देश में तमाम लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस जाते हैं… बाथरूम में साबुन सोप बॉक्स में नहीं रखा? फ़र्श पर पड़ा गल रहा है, किसी का पैर पड़ने पर वह फिसल सकता है, चोट लग सकती है… कपड़े सब इधर-उधर बिखरे पड़े हैं. तह करके हैंगर में लगाकर आलमारी में रखने चाहिए… गंदे मोजे व कपड़े बाथरूम में पड़े हैं, वॉशिंग मशीन में क्यों नहीं डाले?… पापा की शाम की चाय में शुगर क्यूब्स दे दिए. शुगर फ्री टेबलेट नहीं दी. जानती हो वे डायबेटिक हैं…”
यह शृंखला बहुत लंबी थी. हर छोटी से छोटी बात पर उनकी चौकस निगाह लगी रहती थी. बेडरूम में सोते समय मैं अगरबत्तियां जलाकर लगा देती थी. इससे कमरा भीनी-भीनी ख़ुशबू से महक उठता था. दीवार पर क़िताबें रखने का एक छोटा सुंदर-सा अटैचमेंट लगा था. अगरबत्ती स्टैंड था नहीं, तो मैं अगरबत्ती की तीलियां क़िताब के पन्नों के बीच दबाकर रख देती थी. सासू मां ने ऐसा करने से मना किया और एक सुंदर-सा अगरबत्ती स्टैंड ले आईं.
अगरबत्ती, धूपबत्ती, दीपक आदि के पीतल के छोटे-छोटे बर्तन, जो मुख्य रूप से पूजाघर में रहते थे, की साफ़-सफ़ाई सासू मां स्वयं करती थीं. कभी-कभी यह ज़िम्मेदारी मुझे भी सौंपी जाती थी. बाकी रसोई के बर्तन तो महरी मांजती थी, पर पूजा के बर्तन स्वयं साफ़ किए जाएं, ऐसा सासू मां का निर्देश था. इस सफ़ाई अभियान में कभी-कभी बेडरूम का अगरबत्ती स्टैंड पूजाघर में रखा जाता और रात को अगरबत्तियां मैं फिर से क़िताब के पन्नों के बीच लगा देती. इसके लिए भी सासू मां एक-दो बार मुझे टोक चुकी थीं, पर मुझसे अक्सर भूल हो जाती.
कपड़े की उधार ख़रीददारी पर सासू मां की तीखी टिप्पणी सुननी पड़ी. “मैं मगनभाई-छगनभाई के यहां से अगर उधार कपड़े लाती हूं, तो साफ़-साफ़ बता देती हूं कि तीन मासिक किश्तों में भुगतान करूंगी और ऐसा बिना भूले करती हूं. तुम उनके यहां से कपड़े ले आईं और दो माह बीत गए रुपए नहीं भिजवाए. या तो उसे बता देतीं कि रुपए इतने महीने बाद भिजवाऊंगी. मैं आज गई थी तो तकादा तो उसने नहीं किया, पर बताया ज़रूर. मैंने आज ही उसका उधार चुकता करके खाता क्लीयर कर दिया है. उधार के लेन-देन में बहुत सतर्क और नियमित होना चाहिए. बैंक में ऋण खाते की किश्त नियत तारीख़ पर नहीं जमा हुई. न मंजुल ने ध्यान दिया, न इनके पापा ने, उस पर पीनल इंटरेस्ट पड़ गया.”
भाई का घर से फ़ोन आया था. वह चहक रहा था, “दीदी, मेरा आयकर अधिकारी के लिए चयन हो गया है. बीस को जाना है. पापा तुम्हें लाने चौदह की सुबह पहुंच जाएंगे. तुम तैयार रहना.”
भाई से कभी मैंने वादा किया था कि उसकी सर्विस लगने पर मैं उसे एक सूट उपहार में दूंगी. मगनभाई-छगनभाई के यहां से मैं बारह हज़ार छह सौ पैंतालीस रुपए में थ्री-पीस सूट का बहुत शानदार कपड़ा ले आई. इनसे प्रार्थना की कि बधाई देने के बहाने यह कल-परसों में चले जाएं और कपड़ा दे आएं, जिससे वह समय से सिलवा सके.
मैं घबरा रही थी कि मेरी कंजूस, लेकिन हिसाब-क़िताब की पक्की सासू मां कहीं किराए आदि के ख़र्च को लेकर इनका जाना रोक न दें, पर उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी सहमति दे दी. इनको छुट्टी नहीं मिल पाई, तो पापा जाने को तैयार हो गए.
बेडरूम में क़िताबों के शेल्फ़ के नीचे रखी टेबल पर मैंने वह सूट का कपड़ा रख दिया कि सुबह पैक करके पापा को दे दूंगी. सुबह आंख खुलने पर जो दृश्य देखा, तो मेरी सांस हलक में अटक कर रह गई.
रात को जलती अगरबत्तियों को मैंने क़िताब के पन्नों में दबाकर लगा दिया था. रात को न जाने कैसे जलती अगरबत्तियां सूट के कपड़े पर गिर पड़ीं, जो ठीक नीचे टेबल पर रखा था और कपड़े के बीचोंबीच जलाकर सुराख़ बना दिया.
मैं किंकर्त्तव्यविमूढ़ और हतप्रभ हो गई. मैंने तीन हज़ार रुपए अपने पास से लगाए थे. चार हज़ार इनसे लिए थे और पांच हज़ार छह सौ पैंतालीस रुपए बाकी कर आई थी. दुख और क्षोभ से मेरी आंखें भर आईं. सासू मां को सारी बात बताई, तो वह सांत्वना देने लगीं. बोलीं, “जो नुक़सान होना था वो तो हो गया. अब रोने से नुक़सान की भरपाई तो होनी नहीं है, जो हुआ उसे भूल जाओ.”
मेरी ग़लती थी. यदि मैंने अगरबत्ती को अगरबत्ती स्टैंड में लगाया होता या कपड़े को आलमारी में रखा होता, तो यह हादसा न होता. छगनभाई-मगनभाई के यहां तुरंत इतना अधिक उधार करने की हिम्मत न थी, जबकि अभी पांच हज़ार उधार कर ही आई थी. सासू मां तो एक पैसे का भी नुक़सान नहीं सहन कर पाती हैं. इसलिए उनसे और कुछ कहना बेकार है. भाई के पास खाली हाथ कैसे जाऊंगी, यही सोच-सोचकर मैं ग्लानि से भरी जा रही थी.
सासू मां ने सुराख़ हो गए कपड़े का निरीक्षण किया, फिर बोलीं, “इसको रफू करवा दूंगी तो काम आ जाएगा.”
दो दिन बाद पापा मेरे मायके भैया को बधाई और उपहार देने चले गए.
चौदह तारीख़ को पापा के साथ मायके जाते समय मैं सोच रही थी, भाई से कैसे आंख मिला पाऊंगी. भाई सोच रहा होगा कि इतने बड़े संपन्न घर में दीदी है और पहली बार उपहार दिया भी तो यह रफू किया सूट. उस टेलर ने भी क्या सोचा होगा. रफू के निशान को सूट सिलते समय कहां छिपा पाएगा कोई. इससे तो अच्छा था कि कोई उपहार ही न देती. कोई बहाना बना देती. कम से कम किरकिरी तो न होती. क्या मेरी बदनामी ससुराल की बदनामी न थी? लेकिन अब तो तीर कमान से निकल चुका था. शर्मिंदगी सहने के अतिरिक्त और कोई उपाय ही कहां था?
घर पर सब मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे. पहुंचते ही भाई की चहकती आवाज़ सुनाई पड़ी, “दीदी, यू आर ग्रेट. मेरा सूट सिलकर आ गया. इतना शानदार सूट कि आंखें नहीं ठहरतीं. लोग अनुमान लगा रहे हैं कि बीस हज़ार से कम का नहीं होगा और मज़े की बात यह है कि टेलर को भी जीजाजी के पापा ने पूरी सिलाई के पैसे दे दिए थे.”
बहुत ही गर्व और प्रसन्नता से भाई ने जो सूट मुझे दिखाया, वह तो उससे भी महंगा कपड़ा था, जो मैंने ख़रीदा था. नया और बिना किसी रफू के.
सासू मां के उपदेश अब कम हो गए हैं, क्योंकि उनकी नसीहतों का अब मैं शत-प्रतिशत पालन करती हूं. मितव्ययिता और कंजूसी का अंतर भी मेरी समझ में आ गया है. इनके पापा के ऊपर रफू किया सूट ख़ूब जमता है. टेलर ने इतनी सफ़ाई से सिला है कि रफू का पता ही नहीं चलता.
मंजुल ने कहा, “पापा कहते हैं, कितना सुंदर सूट मेरी पुत्रवधू ने दिया. उनको तुमने सूट दिया, मुझे क्या दे रही हो?”
मैंने शोख़ी से आंख नचाते हुए कहा, “तुम्हारा उपहार वह पांच हज़ार छह सौ पैंतालीस का छगनभाई-मगनभाई का बिल है, जा के भुगतान करो.”
“लेकिन उसका भुगतान तो मां ने कर दिया. अब उसका मुआवज़ा तुमसे वसूलना है.” और हंसते हुए उन्होंने मुझे बांहों में भर लिया.

 

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ब्लड डोनेट करें, हेल्दी रहें

आमतौर पर लोगों की सोच होती है कि रक्तदान यानी ब्लड डोनेट करने से उन्हें कमज़ोरी आ जाएगी या उनकी सेहत पर इसका बुरा असर होगा, इसलिए वे ब्लड डोनेट करने से कतराते हैं, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. ब्लड डोनेट करने से ब्लड डोनर को किसी का जीवन बचाने या किसी की मदद करने की आत्मसंतुष्टि तो  मिलती ही है, साथ ही ये उनके हेल्थ के लिए भी फ़ायदेमंद है.

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हमारे देश में समय पर खून न मिलने के कारण हर साल 15 लाख मरीज़ अपनी जान गंवा बैठते हैं. इनमें उन बच्चों की तादाद अधिक होती है, जिन्हें थेलेसिमिया के कारण बार-बार ब्लड की ज़रूरत होती है. दुर्घटना के शिकार, मलेरिया के मरीज़ों, कुपोषणग्रस्त बच्चों के अलावा प्रेग्नेंट वुमन को भी कई कारणों से ब्लड की ज़रूरत होती है. ब्लड डोनेशन से जुड़े अहम् पहलुओं पर डॉ. मनोज जैन ने हमें कई उपयोगी जानकारियां दीं.

यदि सभी लोग साल में एक बार भी ब्लड डोनेट करें, तो कई ज़िंदगियां बचाई जा सकती हैं. एक सामान्य मनुष्य में 5 से 6 लीटर ब्लड होता है और उसके शरीर के वज़न में 7 % वज़न ब्लड का होता है. मेडिकली एक हेल्दी व्यक्ति हर तीन महीने में एक बार ब्लड डोनेट कर सकता है. यदि देश का हर हेल्दी व्यक्ति ब्लड डोनेट करता रहे, तो ब्लड की कमी से कभी किसी की मृत्यु नहीं हो सकती. हमारे यहां सबसे अधिक पाया जानेवाला ब्लड ग्रुप ‘ओ’ और सबसे कम ‘एबी निगेटिव’ है.

दान भी, सेहत भी…
अधिकतर लोगों का मानना है कि ब्लड डोनेट करने से कमज़ोरी आती है. ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. ब्लड डोनेट करते समय जितना ब्लड निकलता है, उसकी भरपाई हमारे शरीर में 2-3 दिन के अंदर हो जाती है. इसलिए ब्लड डोनेट करना न केवल एक अच्छा काम है, बल्कि ये आपको स्वस्थ भी रखता है. कैसे? आइए, जानते हैं.

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ब्लड डोनेट करने से शरीर को नुक़सान की बजाय कई फ़ायदे होते हैं, जैसे-

  • ब्लड प्यूरिफाई हो जाता है. ब्लड डोनेशन के दौरान मात्र 300 मि.ली. ब्लड लिया जाता है और शरीर इस ब्लड की पूर्ति 24 से 48 घंटे में कर लेता है.
  • इससे शरीर की रक्त कोशिकाएं तेज़ी से बनने लगती हैं.
  • रेड ब्लड सेल्स भी रिडेवलप होते हैं, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक रहती है. यानी रक्तदान के तुरंत बाद ही नई लाल कोशिकाएं बनने से शरीर में स्फूर्ति पैदा होती है.
  • ब्लड डोनेट करते रहने से हार्ट डिसीज़ में 5% की कमी आ जाती है.
  • ब्लड डोनेट करते रहने से बोनमैरो (अस्थिमज्जा) लगातार क्रियाशील बना रहता है.
  • रक्त द्वारा संक्रमित होनेवाली बीमारियों की भी अपने आप जांच हो जाती है.

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कुछ अन्य फ़ायदे भी

  • ज़रूरत होने पर ब्लड डोनर को डोनर कार्ड के बदले ब्लड बैंक से ब्लड मिल जाता है.
  • शायद बहुत कम लोगों को मालूम है कि ब्लड के 1 यूनिट से 3 ज़िंदगियां बचाई जा सकती हैं. यानी डोनेट किया हुआ आधा लीटर
    ब्लड कम से कम 3 मरीज़ों का जीवन बचा सकता है.
  • ओ निगेटिव ब्लड ग्रुप वाले यूनिवर्सल डोनर हैैं यानी वे अपना ब्लड किसी को भी दे सकते हैं.

ब्लड डोनेट कर सकते हैं?

  • कोई भी हेल्दी व्यक्ति, जिसकी उम्र 18 से 68 साल के बीच हो.
  • जिसका वज़न 45 किलो या उससे अधिक हो.
  • जिसके ख़ून में हीमोग्लोबिन 12% से अधिक हो.
  • ब्लड डोनेट करते समय कोई एंटीबॉयोटिक न ले रहा हो.
  • पिछले तीन वर्षों में जॉन्डिस या कोई बड़ा ऑपरेशन न हुआ हो.
  • एक ब्लड डोनर सालभर में कम से कम चार बार और तीन-तीन महीने के गैप पर ब्लड डोनेट कर सकता है.

कौन नहीं कर सकता ब्लड डोनेट?

  • जो महिला पीरियड में हो.
  • जो महिला अपने बच्चे को ब्रेस्ट फीडिंग करा रही हो.
  • जो किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो.

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देशभर में ब्लड बैंक की स्थिति
देश में नामी और सही तौर पर मात्र पांच सौ ब्लड बैंक हैं, जहां हर साल दस हज़ार यूनिट्स से अधिक ब्लड जमा होता है. साथ ही क़रीब छह सौ ऐसे ब्लड बैंक भी हैं, जो हर साल 600 यूनिट्स ही इकट्ठा कर पाते हैं. इनके अलावा 2433 ब्लड बैंक्स ऐसे हैं, जो तीन से पांच हज़ार यूनिट्स हर साल इकट्ठा कर लेते हैं.
देश में क़रीब 25 लाख लोग अपनी इच्छा से ब्लड डोनेट करते हैं. सबसे अधिक ब्लड बैंक महाराष्ट्र में 270, तमिलनाडु में 240 और आंध्र प्रदेश में 222 हैं.
जबकि उत्तर-पूर्व के सातों राज्यों में कुल मिलाकर 29 ऑथोराइज़्ड ब्लड बैंक्स हैं.

क्या आप जानते हैं?

  • 1998 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर देश में प्रोफेशनल ब्लड डोनर पर पूरी तरह बैन लगाया गया था.
  • सन् 2007 में वैज्ञानिकों ने एंज़ाइम्स के प्रयोग से ब्लड गु्रप ए, बी, एबी को ओ में बदलने मेें सफलता प्राप्त कर ली थी, लेकिन अब तक इंसानों पर प्रयोग होना बाकी है.
  • विकासशील व ग़रीब देशों में ब्लड डोनेट के बाद भी डोनेट किए हुए ब्लड का 45% ही स्टोर हो पाता है.
  • यदि किसी देश की जनसंख्या के मात्र 1 से 3% लोग भी ब्लड डोनेट करते हैं, तो उस देश की ज़रूरत पूरी हो सकती है, लेकिन दुनियाभर में तक़रीबन 73 देशों में जनसंख्या के 1% से भी कम लोग ब्लड डोनेट करते हैं.
  • वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन के अनुसार, ब्लड बैंक से ब्लड ख़रीदने की बजाय इच्छुक ब्लड डोनर से ़ज़रूरत के समय ब्लड लेना अधिक लाभदायक रहता है.
  • आंकड़ों के अनुसार, स्वैच्छिक ब्लड डोनर द्वारा दिया गया ब्लड न केवल मरीज़ों पर अच्छा असर करता है, बल्कि इसमें एचआईवी और हेपेटाइटिस वायरस के होने की आशंका भी कम रहती है.

ब्लड डोनेट करके जहां हम एक नेक कार्य करते हैं, वहीं अपने शरीर के ब्लड को भी क्लीन करते हैं, जो हमारे सेहत के लिए ज़रूरी भी है. रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए हम सभी कुछ ऐसा भी कर सकते हैं, जैसे जो लोग ब्लड डोनेट करने के इच्छुक हैं, वे अपने दोस्तों का एक ग्रुप बना सकते हैं. और जब कभी जान-पहचान वाले या किसी को भी ब्लड की ज़रूरत पड़े, तब वे एक-दूसरे को मैसेज देकर ब्लड की ज़रूरत को पूरा कर सकते हैं. और यदि इस गु्रप में रेयर ब्लड ग्रुपवाले लोग भी हों, तो और भी अधिक ज़रूरतमंदों की मदद की जा सकेगी.

– ऊषा गुप्ता

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ह्यूमन ट्रैफिकिंग…शारीरिक शोषण और देह व्यापार मानव तस्करी का अमानवीय व्यापार…! ( Human Trafficking )

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न सपनों की ये दुनिया है, न ख़्वाबों का आसमान… अंधे हैं तमाम रास्ते यहां, अंधा है ये जहां… रूह को बेचकर हर बात होती है यहां इशारों में, जिस्मों को ख़रीदा जाता है मात्र चंद हज़ारों में. किससे शिकवा करें, किससे करें गिला, कुछ अजीब-से हैं इन गलियों के निशान… रिश्ते ढूंढ़ने पड़ते हैं जहां इश्तेहारों में, इंसान भी बिकते हैं यहां बाज़ारों में…

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ह्यूमन ट्रैफिकिंग (Human Trafficking) यानी मानव तस्कारी कहने को तो ग़ैरक़ानूनी है, लेकिन फिर भी यह हमारे समाज की गंभीर समस्या बनी हुई है. शारीरिक शोषण और देह व्यापार से लेकर बंधुआ मज़दूरी तक के लिए ह्यूमन ट्रैफिकिंग की जाती है.

–  ड्रग्स और हथियारों के बाद ह्यूमन ट्रैफिकिंग दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑर्गनाइज़्ड क्राइम है.

– 80% मानव तस्करी जिस्मफ़रोशी के लिए होती है.

–  एशिया की अगर बात करें, तो भारत इस तरह के अपराध का गढ़ माना जाता है.

–  ऐसे में हमारे लिए यह सोचने का विषय है कि किस तरह से हमें इस समस्या से निपटना है.

–  मानव तस्करी में अधिकांश बच्चे बेहद ग़रीब इलाकों के होते हैं.

–  मानव तस्करी में सबसे ज़्यादा बच्चियां भारत के पूर्वी इलाकों के अंदरूनी गांवों से आती हैं.

– अत्यधिक ग़रीबी, शिक्षा की कमी और सरकारी नीतियों का ठीक से लागू न होना ही बच्चियों को मानव तस्करी का शिकार बनने की सबसे बड़ी वजह बनता है.

– इस कड़ी में लोकल एजेंट्स बड़ी भूमिका निभाते हैं.

–  ये एजेंट गांवों के बेहद ग़रीब परिवारों की कम उम्र की बच्चियों पर नज़र रखकर उनके परिवार को शहर में अच्छी नौकरी के नाम पर झांसा देते हैं.

– ये एजेंट इन बच्चियों को घरेलू नौकर उपलब्ध करानेवाली संस्थाओं को बेच देते हैं. आगे चलकर ये संस्थाएं और अधिक दामों में इन बच्चियों को घरों में नौकर के रूप में बेचकर मुनाफ़ा कमाती हैं.

– ग़रीब परिवार व गांव-कस्बों की लड़कियों व उनके परिवारों को बहला-फुसलाकर, बड़े सपने दिखाकर या शहर में अच्छी नौकरी का झांसा देकर बड़े दामों में बेच दिया जाता है या घरेलू नौकर बना दिया जाता है, जहां उनका अन्य तरह से और भी शोषण किया जाता है.

– नई दिल्ली के पश्‍चिमी इलाकों में घरेलू नौकर उपलब्ध करानेवाली लगभग 5000 एजेंसियां मानव तस्करी के भरोसे ही फल-फूल रही हैं. इनके ज़रिए अधिकतर छोटी बच्चियों को ही बेचा जाता है, जहां उन्हें घरों में 16 घंटों तक काम करना पड़ता है.

– साथ ही वहां न स़िर्फ उनके साथ मार-पीट की जाती है, बल्कि अन्य तरह के शारीरिक व मानसिक शोषण का भी वे शिकार होती हैं.

–  न स़िर्फ घरेलू नौकर, बल्कि जिस्मफ़रोशी के जाल में भी ये बच्चियां फंस जाती हैं और हर स्तर व हर तरह से इनका शोषण होने का क्रम जारी रहता है.

एक नज़र आंकड़ों पर…

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के नए आंकड़ों के अनुसार ट्रैफिकिंग में यह दूसरा सबसे बड़ा अपराध है, जो पिछले 10 सालों में 14 गुणा बढ़ा है और वर्ष 2014 में 65% तक बढ़ा है.

– लड़कियां और महिलाएं ट्रैफिकिंग के निशाने पर रहती हैं, जो पिछले दस सालों में देशभर के ह्यूमन ट्रैफिकिंग केसेस का 76% है.

–  ह्यूमन ट्रैफिकिंग के अंतर्गत ही अन्य जो केसेस रजिस्टर होते हैं, उनमें वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों को बेचना, विदेशों से लड़कियों को ख़रीदना और वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की ख़रीद-फरोख़्त आदि आते हैं.

–  यदि भारत की बात की जाए, तो ह्यूमन ट्रैफिकिंग का जाल लगभग हर राज्य में फैला हुआ है. इसमें तमिलनाडु 9, 701 केसेस के साथ सबसे ऊपर है. उसके बाद 5861 केसेस के साथ आंध्र प्रदेश, 5443 केसेस के साथ कर्नाटक, 4190 केसेस के साथ पश्‍चिम बंगाल और 3628 केसेस के साथ महाराष्ट्र का नंबर आता है.

– ये 5 राज्य ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मुख्य स्रोत और गढ़ भी हैं, जहां लड़कियों को रेड लाइट एरिया के लिए ख़रीदा व बेचा जाता है. ह्यूमन ट्रैफिकिंग के रिपोर्टेड केसेस में 70% इन्हीं राज्यों से आते हैं.

–  यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक़ तमिलनाडु युवा लड़कियों की तस्करी मुंबई व दिल्ली के रेड लाइट इलाक़ों में करता है.

–  हालांकि पिछले कुछ समय से तमिलनाडु में इस तरह के मामलों की कमी देखी गई है, जबकि पश्‍चिम बंगाल में ये बढ़ रहे हैं.

–  वर्ष 2009 से लेकर 2014 के बीच ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मामलों में 92% बढ़ोत्तरी हुई है.

–  इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि यह बहुत अधिक मुना़फे का धंधा है, ज़्यादा-से-ज़्यादा पैसा कमाने का लालच इस तरह के अपराधों के फलने-फूलने की बड़ी वजह बन रहा है.

– वर्ष 2014 में देशभर में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के रजिस्टर्ड केसेस में 39% की बढ़ोत्तरी देखी गई. जैसा कि पहले भी हमने बताया है कि पिछले 6 वर्षों में 92% की बढ़ोत्तरी देखी गई है, जबकि वर्ष 2005 से लेकर 2009 के बीच इस तरह के मामलों में 55% तक की गिरावट देखी गई थी.

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क़ानूनी प्रावधान

इम्मॉरल ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन एक्ट (आईटीपीए) के अनुसार अगर व्यापार के इरादे से ह्यूमन ट्रैफिकिंग होती है, तो 7 साल से लेकर उम्र कैद तक की सज़ा हो सकती है. इसी तरह से बंधुआ मंज़दूरी से लेकर चाइल्ड लेबर तक के लिए विभिन्न क़ानून व सज़ा का प्रावधान है. लेकिन सबसे बड़ी समस्या क़ानून को क्रियान्वित करने की ही है.

–  बात अगर सज़ा की की जाए, तो पिछले 5 सालों में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के फाइल्ड केसेस में 23% में दोष सिद्ध हुआ.
–  इस मामले में लगभग 45,375 लोगों की गिरफ़्तारी हुई और 10,134 लोगों को दोषी क़रार दिया गया, जिसमें जुर्माने से लेकर जेल तक की सज़ा दी गई.

– पिछले 5 सालों में आंध्र प्रदेश में सर्वाधिक गिरफ़्तारियां हुईं, लगभग 7, 450 के क़रीब. महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर आता है, उसके बाद कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्‍चिम बंगाल हैं.

–  इन बढ़ते मामलों की एक वजह यह भी हो सकती है कि अब मामले अधिक दर्ज होने लगे हैं.

प्रशासनिक प्रयास

–  केंद्र सरकार विभिन्न राज्यों को फंड्स प्रदान करती है और वेब पोर्टल भी लॉन्च किया गया है, ताकि मानव तस्करी का यह अमानवीय व्यापार रुक सके या कम हो सके.

–  इसके अलावा महिला व बाल विकास विभाग ने भी पीड़ितों के बचाव व पुनर्वसन के लिए अपने प्रयास तेज़ किए हैं.

एनजीओ की भूमिका

कैथरिन क्लार्क, फाउंडर और सीईओ, ए सेलिब्रेशन ऑफ वुमेन: यह संस्था महिलाओं की विभिन्न समस्याओं पर काम करती है. कैथरिन क्लार्क कनाडा में रहती हैं, लेकिन संस्था के विभिन्न सदस्य विभिन्न देशों में काम करते हैं. कैथरिन के अनुसार ह्यूमन ट्रैफिकिंग न स़िर्फ विकासशील, बल्कि विकसित देशों की भी बड़ी समस्या है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस समस्या से हम किस तरह से जूझते हैं और पुनर्वसन के लिए किस तरह की योजनाएं हैं हमारे पास, क्योंकि भले ही हम लड़कियों को या बच्चों को इस कड़ी से बाहर निकाल लें, लेकिन सही तरी़के से पुनर्वसन के अभाव में वे फिर से इस कड़ी का हिस्सा बन जाते हैं. हमारी संस्था इस तरह के लोगों के लिए सेलिब्रेशन हाउसेस बनाती है और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की दिशा में काम करती है. बच्चों को भी मानसिक रूप से क्लीन किया जाता है, उनकी काउंसलिंग होती है, ताकि उनके मन से वो ख़ौफ़ व बुरी यादें निकल सकें. इसी तरह के काम कई देशों में किए जाते हैं, जिन्हें काफ़ी सफलता भी मिली है.

ए सेलिब्रेशन ऑफ वुमेन से जुड़ी मितिका श्रीवास्तव भारत में एडवायज़र टू एशिया के तौर पर काम करती हैं. ह्यूमन ट्रैफिकिंग के संदर्भ में उन्होंने काफ़ी जानकारी दी है-

– दरअसल, ह्यूमन ट्रैफिकिंग को अक्सर सेक्स ट्रैफिकिंग ही समझ लिया जाता है, जबकि ह्यूमन ट्रैफिकिंग काफ़ी विस्तृत है और सेक्स ट्रैफिकिंग ह्यूमन ट्रैफिकिंग का ही हिस्सा है.

– सस्ते लेबर के चक्कर में काफ़ी बड़े पैमाने पर मानव तस्करी की जाती है.

– बच्चे इसका शिकार जल्दी होते हैं, क्योंकि उनका शोषण करना आसान होता है.

– सेक्स ट्रैफिकिंग भी बहुत बड़े पैमाने पर की जाती है, जिसमें कम उम्र के बच्चों और ख़ासतौर से लड़कियों को निशाना बनाया जाता है.

– भारत में भी कई संस्थाएं हैं, जो सेक्स ट्रैफिकिंग से पीड़ित लोगों के लिए काम करती हैं, इसमें प्रमुख है- डॉ. सुनीता कृष्णन की प्रज्वला नाम की एनजीओ. डॉ. सुनीता ख़ुद एक रेप विक्टिम रह चुकी हैं और उनकी यह संस्था तस्करी की शिकार महिलाओं और बच्चियों के पुनर्वसन का काम करती है. यह संस्था पीड़ितों की शिक्षा व उनमें से जो एचआईवी से संक्रमित होते हैं, उन बच्चों की भी सहायता करती है.  प्रज्वला जिस्मफ़रोशी में लिप्त महिलाओं के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी काम करती है, ताकि वे एक बेहतर जीवन जी सकें. सुनीता कहती हैं कि चकला घरों से महिलाओं को बचाकर लाना बेहद मुश्किल काम होता है. इस दौरान अक्सर उन पर अटैक भी किया गया. इस वजह से वो अपने दाहिने कान से सुनने की क्षमता तक खो बैठीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और न हारेंगी.

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केस स्टडी….

आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले के छोटे-से गांव के ग़रीब परिवार में जन्मी भवानी अपने पैरेंट्स के साथ ही मज़दूरी का काम करती थी. भवानी के परिवार में कुल 11 सदस्य थे, जिनमें 6 लड़कियां और 3 लड़के थे. भवानी की मां के किसी रिश्तेदार के कहने पर 12 वर्षीया भवानी की शादी दिल्ली में रहनेवाले अमर नाम के एक व्यक्ति से करवा दी गई. भवानी के अनुसार, “हालांकि मैं उस व़क्त बहुत छोटी थी, लेकिन फिर भी मैं इस बात से बेहद ख़ुश थी, क्योंकि शादी का पूरा ख़र्च भी उन्हीं लोगों ने उठाया था और मेरे माता-पिता को काफ़ी पैसा
भी दिया था.”शादी के बाद भवानी, उसका रिश्तेदार और अमर दिल्ली के लिए रवाना हुए, जहां पहुंचकर अमर ने भवानी को कुछ समय तक उसके रिश्तेदार के साथ रहने को कहा, ताकि वो उनके रहने का बंदोबस्त कर सके. भवानी के रिश्तेदार का घर दरअसल दिल्ली के रेड लाइट एरिया- जीबी रोड पर स्थित एक वेश्यालय था और भवानी की परीक्षा अगले ही दिन से शुरू हो गई थी, जहां उसे ग्राहकों की देखभाल करने को कहा गया. उस व़क्त उसे एहसास हुआ कि दरअसल उसे 45,000 में बेचा गया था. वहां मौजूद अन्य लड़कियों से बातचीत करने पर पता चला कि उसके पति अमर ने उस एक साल में 12 शादियां की थीं.

शुरुआती विरोध का नतीजा यह हुआ कि भवानी को काफ़ी पीटा गया व भूखा रखा गया. 7 दिनों तक संघर्ष के बाद भवानी ने हथियार डाल दिए. 5 एबॉर्शन्स और ढेर सारे सेक्सुअली ट्रान्समीटेड इंफेक्शन्स के बाद 17 साल की आयु में भवानी को रेस्न्यू किया गया और तब वो एचआईवी पॉज़िटिव थी.

कभी काम दिलाने के नाम पर, कभी फिल्मों या मॉडलिंग में काम दिलाने के लालच में, तो कभी शादी के नाम पर लाखों लड़कियों को
जिस्मफ़रोशी के धंधे में धोखे से व जबरन धकेल दिया जाता है.

प्रज्वला की स्थापना का उद्देश्य था उन महिलाओं और बच्चों की मदद करना, जो तस्करी का शिकार होते हैं. ऐसे में यह संस्था तस्करी विरोधी यानी एंटी ट्रैफिकिंग के रूप में उभरी है, जो महिलाओं और बच्चों को वेश्यावृत्ति में जाने से रोकने में विश्‍वास करती है, क्योंकि यह सेक्सुअल स्लेवरी का सबसे भयावह रूप होता है.

 

 

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पुनर्वसन

ट्रैफिकिंग का अर्थ होता है बहुत-से मानवाधिकारों का उल्लंघन, ऐसे में उनका पुनर्वसन बहुत ही संवदेनशील मुद्दा होता है. चूंकि पीड़ित न स़िर्फ शारीरिक, बल्कि बहुत-से मानसिक शोषण और प्रताड़ना से गुज़रते हैं, इसके अलावा उन्हें ढेरों यौन संक्रमण भी हो जाते हैं. सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि परिवार भी इन्हें अपनाने से कतराते हैं, क्योंकि इसे वो समाज में बदनामी से जोड़कर देखते हैं, वहीं दूसरी ओर एक संभावना यह भी होती है कि परिवार ख़ुद ही इस धंधे में लिप्त होता है. ऐसे में सबसे ज़्यादा ज़रूरत इस बात की होती है कि पीड़ित को सुरक्षा मिले. मानसिक रूप से भी उसे सामान्य किया जाए, उसे बेहतर भविष्य की ओर आशान्वित किया जाए, तब कहीं जाकर पूरी तरह से कामयाबी मिल पाएगी.

पुनर्वसन में एक और बड़ी समस्या यह भी होती है कि पीड़ित हर स्तर पर इतना अधिक शोषण का शिकार हो चुका होता है कि उसका विश्‍वास सभी पर से उठ जाता है, उसे रेस्न्यू की प्रक्रिया पर भी अधिक भरोसा नहीं रहता और न ही वो अधिक पॉज़िटिव होता है अपने भविष्य के प्रति. उसमें फिर से आशा जगाना बेहद चुनौतीभरा काम है. यही वजह है कि जहां पहले प्रज्वला जैसी संस्थाएं रेस्न्यू का काम करती थीं, वहीं वे अब पुलिस की अधिक मदद लेती हैं और अधिक ध्यान पुनर्वसन की प्रक्रिया पर देती हैं, ताकि पीड़ितों को पूरी तरह से इससे बाहर निकाला जा सके.

– गीता शर्मा