dadasaheb phalke award

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े पुरस्कार ‘दादासाहेब फाल्के’ से सम्मानित किया जाएगा. आज यह जानकारी सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावेडकर ने बधाई देते हुए ट्वीट करके दी. जब से यह ख़बर मिली है, तब से बधाइयों का सैलाब उमड़ पड़ा है. सबसे पहले उनके सुपुत्र अभिषेक बच्चन ने ख़ुशी प्रकट करते हुए Proudson.. कहा. उसके बाद क्या नेता, अभिनेता, खिलाड़ी, कलाकार सभी शुभ संदेश देने लगे. करण जौहर, रजनीकांत, प्रसून जोशी, नागार्जुन, मोहनलाल, मधुर भंडारकर, लता मंगेशकर, रितेश देशमुख, रविकिशन, दीया मिर्ज़ा, राधिका तमाम फिल्मी हस्तियों के साथ-साथ मंत्रियों में गृहमंत्री अमित शाह, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, शिवराज सिंह चौहान, किरण खेर, सुरेश प्रभु, सचिन पायलट इत्यादि द्वारा उन्हें शुभकामनाएं और बधाइयां देने का सिलसिला-सा चल पड़ा. 

Amitabh Bachchanदादासाहेब फाल्के पुरस्कार फिल्म और कला में महत्वपूर्ण व उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है. साल 1969 में यह सबसे पहले अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया था. उसके बाद देव आनंद, गुलज़ार, यश चोपड़ा, विनोद खन्ना, शशि कपूर, मनोज कुमार, लता मंगेशकर जैसे तमाम हस्तियों को दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. 

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अमिताभ बच्चन यूं तो तमाम पुरस्कार और सम्मान अब तक पा चुके हैं, जिनमें 4 बार राष्ट्रीय पुरस्कार, पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण के अलावा देश-विदेश के कई सम्मानित व उल्लेखनीय पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं. वे हमेशा ही अपने अभिनय व सामाजिक कार्यों से लोगों को प्रभावित करते रहे हैं.
अमिताभ बच्चन आज की पीढ़ी के लिए ही नहीं, पिछ्ले कई पीढ़ी के लिए एक प्रेरणास्रोत और आदर्श रहे हैं. उन्होंने अपने अभिनय से हर किसी को प्रभावित किया है. शहंशाह, बिग बी सुपरस्टार, सदी के महानायक, मेगास्टार न जाने कितने नामों से उन्हें संबोधित किया जाता रहा है. फिल्म इंडस्ट्री को एक अलग तरह का सुपरस्टार एंग्री यंगमैन की छवि उन्होंने ही दी थी. सात हिंदुस्तानी फिल्म से अभिनय का सफ़र जो शुरू हुआ वो आज तक बरक़रार है.

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फिल्म-टीवी हो, विज्ञापन हो या कोई भी सामाजिक कार्य अमिताभ बच्चन हर एक में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते रहे हैं. उनकी बातें और उनके संदेश लोगों को इस कदर प्रभावित करते हैं कि लोग उनका अनुसरण करने लगते हैं.
आज वे जहां छोटे पर्दे पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ शो से लोगों को इंटरटेन कर रहे हैं, वही फिल्मों द्वारा भी उनके अभिनय का जलवा बरक़रार है.

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उनकी आनेवाली कई फिल्में ऐसी हैं, जिनमें उन्हें एक अलग रूप, एक अलग रंग में लोग देखेंगे. ख़ासकर झुंड, सायरा नरसिम्हा रेड्डी, बटरफ्लाई, ब्रह्मास्त्र, चेहरे और गुलाबो सिताबो.
मेरी सहेली की तरफ से अमिताभ बच्चनजी को ‘दादासाहेब फाल्के’ पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की बहुत-बहुत बधाई!.. वे यूं ही कामयाबी के शिखर को छूते रहें. आइए, उनके अलग-अलग रूप-रंग के अक्स देखें…

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देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा इंटरनेशनल स्टार बन चुकी हैं. अंतराष्ट्रीय स्तर पर बॉलीवुड का नाम रोशन करने वाली प्रियंका को अब इसके लिए सम्मानित किया जाएगा. दादा साहेब फाल्के अकैडमी अवॉर्ड में एक नई कैटेगरी बनाई गई है, जिसमें उन लोगों को अवॉर्ड दिया जाएगा, जो भारत को अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला रहे हैं. अब इस कैटेगरी के लिए प्रियंका से बेहतर भला कौन हो सकता है. प्रियंका अमेरिकन टीवी शो क्वांटिको और फिल्म बेवॉच से हॉलीवुड में छा गई हैं, उनके नेगेटिव रोल को काफ़ी पसंद किया जा रहा है.

प्रियंका के लिए वैसे ये डबल सेलिब्रेशन का मौक़ा है, क्योंकि उनकी मम्मी मधु चोपड़ा को भी मराठी फिल्म वेंटिलेटर के निर्माण के लिए दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा.

Manna-de-241013 (1)मन्ना डे अब इस जहां में नहीं हैं, मगर करोड़ों दिलों में बसे हैं अपनी मखमली आवाज और गाने के अनोखे अंदाज की बदौलत. शास्त्रीय गायन में पारंगत मन्ना डे अपनी गायन शैली से शब्दों के पीछे छिपे भाव को ख़ूबसूरती से सामने ले आते थे. मोहम्मद रफ़ी और महेंद्र कपूर सहित उस समय के कई मशहूर गायक उनके ज़बरदस्त प्रशंसक थे. उनका वास्तविक नाम प्रबोध चंद्र डे था. प्यार से उन्हें ‘मन्ना दा’ भी पुकारा जाता था.

मन्ना दा का जन्म कोलकाता में 1 मई, 1919 को हुआ था. उनकी मां का नाम महामाया और पिता का नाम पूर्णचंद्र डे था. उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा इंदु बाबुरपुर पाठशाला से की और उसके बाद विद्यासागर कॉलेज से स्नातक किया. वह कुश्ती और मुक्केबाजी की प्रतियोगिताओं में भी खूब भाग लेते थे. उनके पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे, मगर उन्हें अदालत नहीं, अदावत पसंद थी.

इस सुप्रसिद्ध गायक ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने चाचा कृष्ण चंद्र डे से ली थी. एक बार जब उस्ताद बादल खान और मन्ना डे के चाचा साथ में रियाज़ कर रहे थे, तभी बगल के कमरे में बालक मन्ना भी गा रहे थे. बादल खान ने कृष्ण चंद्र डे से पूछा कि यह कौन गा रहा है, तो उन्होंने मन्ना डे को बुलाया. वह उनकी प्रतिभा पहचान चुके थे और तभी से मन्ना अपने चाचा से संगीत की तालीम लेने लगे. उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण उस्ताद दबीर खान, उस्ताद अमन अली खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान से लिया था.

मन्ना डे 1940 के दशक में संगीत के क्षेत्र में अपना मुकाम बनाने के लिए अपने चाचा के साथ मुंबई आ गए. वहां उन्होंने बतौर सहायक संगीत निर्देशक पहले अपने चाचा के साथ, फिर सचिन देव वर्मन के साथ काम किया.

पार्श्व गायक के रूप में मन्ना ने पहली बार फिल्म तमन्ना (1942) के लिए सुरैया के साथ गाना गाया. हालांकि उससे पहले वह फिल्म राम राज्य में समूहगान में शामिल हुए थे. इस फिल्म के बारे में दिलचस्प बात यह है कि यही एकमात्र फिल्म थी, जिसे महात्मा गांधी ने देखी थी.

पहली बार सोलो गायक के रूप में उन्हें संगीतकार शंकर राव व्यास ने राम राज्य (1943) फिल्म का गीत गई तू गई सीता सती… गाने का मौका दिया. उन्होंने ओ प्रेम दीवानी संभल के चलना… (कादंबरी-1944), ऐ दुनिया जरा… (कमला -1946)’, हाय ये है… (जंगल का जानवर- 1951),’ प्यार हुआ इकरार हुआ… (श्री 420-1955), ये रात भीगी भीगी… (चोरी-चोरी-1956) जैसे कई गीत गाए, लेकिन 1961 में आई फिल्म काबुली वाला के गीत ऐ मेरे प्यारे वतन… ने मन्ना डे को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया.

मन्ना डे शास्त्रीय संगीत पर आधारित कठिन गीत गाने के शौक़ीन थे. पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई…, सुर ना सजे क्या गाऊ मैं… और तू प्यार का सागर है… तेरी इक बूंद के प्यासे हम… जैसे गीतों को उन्होंने बड़ी सहजता से गाया.

मन्ना डे शास्त्रीय संगीत में पारंगत थे, मगर किशोर कुमार को शास्त्रीय संगीत का ज्ञान ज़्यादा नहीं था. जब फिल्म पड़ोसन (1968) के गीत एक चतुर नार बड़ी होशियार… की रिकॉर्डिंग हो रही थी, तो निर्माता महमूद ने कहा कि राजेंद्र कृष्ण ने जैसा यह गीत लिखा है, उसी तरह हल्के-फुल्के तरीके से गाना है, लेकिन मन्ना डे नहीं माने, उन्होंने इसे अपने ही अंदाज़ में गाया. जब किशोर कुमार ने मुखड़ा गाया तो मन्ना डे को वह पसंद नहीं आया था. जैसे-तैसे इस गाने की रिकॉर्डिंग की गई.

प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने मन्ना डे से प्रभावित होकर अपनी अमर रचना मधुशाला को गाकर सुनाने का उन्हें मौका दिया था. उनकी गायकी से सजी आखिरी हिंदी फिल्म उमर थी.

मन्ना डे की शादी 18 दिसंबर, 1953 को केरल की सुलोचना कुमारन से हुई थी. उनकी दो बेटियां शुरोमा और सुमिता हैं. उनकी पत्नी का 2012 में कैंसर से निधन हो गया था.

फिल्म मेरे हुजूर (1969), बांग्ला फिल्म निशि पद्मा (1971) और मेरा नाम जोकर (1970) के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का फिल्मफेयर अवार्ड मिला था.

मोहम्मद रफी ने एक बार उनके बारे में कहा था, “आप लोग मेरे गीत सुनते हैं, लेकिन अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं कहूंगा कि मैं मन्ना डे के गीतों को ही सुनता हूं.”

मन्ना डे ने बांग्ला में अपनी आत्मकथा जीवोनेर जलासाघोरे लिखी थी. भारत सरकार ने उन्हें 1971 में पद्मश्री, 2005 में पद्मभूषण से सम्मानित किया.

साल 2004 में रवींद्र भारती विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि प्रदान की. संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.

24 अक्टूबर, 2013 की सुबह 4.30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. मन्ना दा सदा के लिए हमसे ओझल हो गए. शास्त्रीय संगीत को कर्णप्रिय बनाने में मन्ना डे का कोई सानी नहीं था. अपने गीतों की बदौलत वह अमर हो गए. उनके गीत सदियों तक गूंजते रहेंगे और पीढ़ी दर पीढ़ी लोग उन्हें सुनते रहेंगे.

priyanka-chopra-story_647_072115054042प्रियंका चोपड़ा के लिए एक बार फिर है ख़ुशी का मौक़ा. दूसरी बार प्रियंका को सम्मानित किया जाने वाला है दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड्स से. फिलहाल प्रियंका हॉलीवुड में टीवी शो क्वाटिको और फिल्म बेवॉच की शूटिंग में बिज़ी हैं. उनका फिल्मी करियर काफ़ी अच्छा चल रहा है. बॉलीवुड से हॉलीवुड पहुंची प्रियंका वहां भी अपनी बेहतरीन अभिनय से सबका दिल जीत रही हैं. इससे पहले प्रियंका को फिल्म सात ख़ून माफ़ के लिए पहला दादासाहेब फाल्के पुरस्कार दिया गया था. इस बार दादासाहेब फाल्के की 147वीं जयंती के सेलिब्रेशन के मौ़के पर दादासाहेब फिल्म फाउंडेशन प्रियंका को बेस्ट एक्ट्रेस ऑफ दी ईयर से सम्मानित करेगा. मुंबई में 24 अप्रैल 2016 को यह अवॉर्ड फंक्शन होगा. ख़ैर प्रियंका चोपड़ा अपने बिज़ी शेडयूल से व़क्त निकालकर अवॉर्ड लेने पहुंच पाएंगी या नहीं यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन फिलहाल ये ख़बर सुनकर पीसी ख़ुश ज़रूर होंगी. कॉन्ग्रैचुलेशन्स प्रियंका.