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लंबी कानूनी लड़ाई, विरोध प्रदर्शनों लंबे साल के इंतज़ार के बाद आख़िरकार मंगलवार को 80 महिलाओं के एक समूह ने मुंबई के बहुचर्चित हाजी अली दरगाह की मुख्य मज़ार में प्रवेश किया और दरगाह तक पहुंच कर महिलाओं ने वहां चादर चढ़ाने की रस्म भी मुकम्मिल की.

 भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सहसंस्थापक नूरजहां एस नियाज़ ने कहा, “आज हमने बड़ी लड़ाई जीत ली. अब महिलाएं हाजी अली दरगाह में पुरुषों की तरह चादर चढ़ा सकेंगी. हमने पुलिस या दरगाह ट्रस्ट को सूचित नहीं किया है. हम लोगों ने मत्था टेका और बाहर आ गए.”

 सुश्री नियाज़ ने कहा कि महिलाओं ने मंगलवार को दरगाह पर फूल और चादरें चढ़ाईं और शांति की दुआ की. उन्होंने कहा, “यह समानता, लैंगिक भेदभाव ख़त्म करने और हमारे संवैधानिक अधिकारों को समाप्त करने की लड़ाई थी. हम ख़ुश हैं कि अब महिलाओं और पुरुषों को पवित्र गर्भगृह में प्रवेश का समान अधिकार मिला.”

 पूरे देश की क़रीब 80 महिलाओं के एक समूह ने दोपहर बाद क़रीब तीन बजे मुंबई के वरली तट के निकट एक छोटे से टापू पर स्थित हाजी अली दरगाह में प्रवेश किया. इस बार उन्हें हाजी अली दरगाह ट्रस्ट की ओर से किसी तरह का विरोध का सामना नहीं करना पड़ा. सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अक्टूबर को महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार के आधार पर अपने फैसले में महिलाओं को दरगाह में प्रवेश की अनुमति दी थी। इसके बाद हाजी अली दरगाह ट्रस्ट ने संकेत दिया था कि उनकी ओर से दरगाह में आने वाली महिलाओं का विरोध नहीं किया जाएगा. हालांकि एहतियात के तौर पर पुलिस ने तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था कर रखी थी.

दरगाह के ट्रस्टी सुहैल खांडवानी ने कहा कि दरगाह में प्रवेश के लिए महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार बना दिए गए हैं और किसी को भी पीर की मज़ार छूने की इजाज़त नहीं दी जाएगी. नई व्यवस्था के तहत पुरुषों और महिलाओं को दरगाह में जाने का समान अधिकार होगा और सभी श्रद्धालु मज़ार से करीब दो मीटर की दूरी से दुआ कर सकेंगे.

 जून 2012 तक महिलाओं को मुस्लिम संत सैयद पीर हाजी अली शाह बुखारी की मज़ार के गर्भगृह तक प्रवेश की अनुमति थी, लेकिन उसके बाद गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी. वर्ष 2014 में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन और कई अन्य ने हाजी अली दरगाह के इस कदम को अदालत में चुनौती दी थी.

 बॉम्बे हाईकोर्ट ने 26 अगस्त को हाजी अली दरगाह में महिलाओं को मज़ार तक जाने की परमिशन दी थी। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट की ओर से दरगाह में पुरुषों की ही तरह महिलाओं को भी जाने की इजाजत देने का फ़ैसला सुनाया गया था।

 इससे पहले महाराष्ट्र में शनि शिंगणापुर मंदिर में सामाजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाई के आंदोलन के बाद महिलाओं को शनि मंदिर में प्रवेश मिला था.  तृप्ति ने मुंबई स्थित हाजी अली दरगाह में भी महिलाओं को प्रवेश मिलने के लिए आंदोलन किया था. इस आंदोलन का बड़ा विरोध भी हुआ था। इससे पहले महिलाओं को दरगाह में मज़ार तक जाने की इजाज़त नहीं थी.

हाजी अली दरगाह में पीर हाजी अली शाह बुख़ारी की कब्र है. पीर बुखारी एक सूफी संत थे, जो इस्लाम के प्रचार के लिए ईरान से भारत आए थे. ऐसा माना जाता है कि जिन सूफ़ी-संतों ने अपना जीवन धर्म के प्रचार में समर्पित कर दिया और जान क़ुर्बान कर दी, वे अमर हैं. इसलिए पीर हाजी अली शाह बुख़ारी को भी अमर माना जाता है. उनकी मौत के बाद दरगाह पर कई चमत्कारिक घटनाएं देखी जाती हैं. दरगाह मुंबई के साउथ एरिया वरली के समुद्र तट से करीब500 मीटर अंदर पानी में एक छोटे-से टापू पर स्थित है.

(एजेंसियों के इनपुट के साथ)