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Good News: अलका याज्ञनिक की बेटी की हुई सगाई, देखें पिक्स (Alka Yagnik’s Daughter Just Got Engaged, See Pics)

Alka Yagnik, Daughter Engagement

2017 को बॉलीवुड की शादियों और बच्चों के लिए याद किया जाएगा. विराट और अनुष्का की सीक्रेट शादी के लिए एक और पावर कपल की ख़ुशखबरी के बारे में सुनने में आया है. हम बात कर रहे हैं, बॉलीवुड की महशूर गायिका अलका याज्ञनिक की बेटी सायशा कपूर की, जिन्होंने हाल ही में अपने लॉन्ग टाइम ब्वॉयफ्रेंड अमित देसाई से सगाई की.

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आपको बता दें कि अलका याज्ञनिक ने फरवरी 1989 में नीरज कपूर से शादी की थी और उसी साल सायशा का जन्म हुआ. अलका मुंबई में रहती हैं, जबकि नीरज शिलॉन्ग में. इसलिए उनकी बेटी अपनी मां के साथ रहती है. पहले सुनने में आया था कि सायशा इंडियन आयडल फेम राहुल वैद्य को डेट कर चुकी हैं, लेकिन दोनों ने कभी यह बात स्वीकार नहीं की. राहुल ने इस बारे में सफाई देते हुए कहा था कि मैं इन दिनों स्ट्रीक्ड डायट पर हूं. और चूंकि सायशा रेस्टोरेंट इंडस्ट्री से जुड़ी हुईं है इसलिए ये मुझे डायट टिप्स देती हैं और इस सिलसिले में अक्सर हमारी मुलाक़ात होती है.

Alka Yagnik, Daughter Engagement

आपको बता दें  कि 27 साल की सायशा अंधेरी स्थित रेस्त्रां Boveda Bristro की को-ऑनर हैं.  वे इस रेस्त्रां को अपने दो चाइल्डहुड फ्रेंड्स के साथ चलाती हैं. उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ मार्केटिंग से एमबीए किया है.  सायशा कई होटल मैनेजमेंट कंपनी से जुड़ चुकी हैं.  बता दें, ग्लैमर की दुनिया से जुड़े रहने के बावजूद सायशा ने इसमें करियर नहीं बनाया.  उन्होंने फिल्म स्कूल में एडमिशन लिया, लेकिन जल्द ही उन्हें समझ आया कि वे एक्टिंग को अपना करियर नहीं बना सकतीं.  सायशा ने मां की राह पर चलते हुए सिंगिंग में भी ट्रेनिंग ली. लेकिन एक दिन की ट्रेनिंग के बाद इसे भी छोड़ दिया था.  वहीं अलका याज्ञनिक ने भी बेटी को मन-मुताबिक करियर चुनने के लिए प्रेरित किया.  फिलहाल, वे मुंबई में होटल मेनेजमेंट फील्ड से जुड़ी हुई हैं.  बाकी स्टार किड्स की तरह सायशा भी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव हैं. देखें सायशा और उनके मंगेतर की और  पिक्स.
Alka Yagnik, Daughter Engagement

 

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शादी से पहले हर बात की हिदायत, तो सेक्स एजुकेशन से परहेज़ क्यों? (Sex Education: Why We Should Talk About Sex Before Marriage)

Sex Education Sex Before Marriage

Sex Education Sex Before Marriage

शादी से पहले हर बात की हिदायत, तो सेक्स एजुकेशन से परहेज़ क्यों? (Sex Education: Why We Should Talk About Sex Before Marriage)

ससुराल में जाकर सबका मन जीत लेना… धीरे-धीरे मीठी आवाज़ में सबसे बात करना… ज़ोर से मत हंसना और न ही ऊंची आवाज़ में बात करना… घर के कामकाज में हाथ बंटाना… इस तरह की तमाम हिदायतें उस लड़की को ज़रूर दी जाती हैं, जिसकी शादी होनेवाली होती है… यह हर घर में आम है, लेकिन क्या कभी इस बात पर हम ग़ौर करते हैं कि इतनी हिदायतों के बीच सेक्स को लेकर हम बेटी को या बेटे को कितना एजुकेट करते हैं? नहीं न? क्योंकि इस स्तर पर बात करना तो दूर, हम सोचते भी नहीं. हमें यह ज़रूरी ही नहीं लगता. वैसे भी सेक्स (Sex) को लेकर आज भी हम उतना खुलकर बात नहीं करते. हमारे समाज में आज भी सेक्स को गंदा या ग़लत ही माना जाता है, लेकिन बात जब शादी-ब्याह की हो, तब भी हम इसे ज़रूरी क्यों नहीं मानते? 

ये किस तरह का समाज है?
  • क्या यह समाज का दोगलापन नहीं है कि हमारे यहां शादी को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है और शादी का जो सबसे महत्वपूर्ण आधार है, उस पर ही बात करने से परहेज़ भी किया जाता है.
  • शादी के बाद गुड न्यूज़ की सबको जल्दी रहती है, लेकिन उससे पहले सेक्स से जुड़ी ज़रूरी बातें बताना किसी को ज़रूरी नहीं लगता.
  • जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है यानी सेक्स करने से किसी को परहेज़ नहीं, लेकिन इस पर एजुकेट करना बेहद शर्मनाक माना जाता है.
  • टीवी कमर्शियल्स में कंडोम, कॉन्ट्रासेप्शन या फिर इससे जुड़ी चीज़ें दिखाए जाने पर परिवार के लोग इस कदर शर्मिंदगी महसूस करते हैं, जैसे यह कोई आपराधिक या शर्मनाक बात हो.
क्या होते हैं दुष्परिणाम?
  • सेक्स एजुकेशन की कमी के चलते सेक्स को लेकर कोई जागरूकता हमारे समाज में नहीं है.
  • नए शादीशुदा जोड़े भी उतना ही जान पाते हैं, जितना उनके यार-दोस्त उन्हें बताते-समझाते हैं.
  • किस तरह से सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ से बचाव करना चाहिए, किस तरह से फैमिली प्लानिंग और कॉन्ट्रासेप्शन का इस्तेमाल करना चाहिए, पर्सनल हाइजीन का क्या महत्व है… इस तरह की तमाम बातों पर किसी का ध्यान नहीं जाता है.
  • यही वजह है कि अधिकांश लड़कियां सेक्स को लेकर एक फैंटसी में जीती हैं और सुहागरात को किसी फिल्मी सीन की तरह देखती हैं. लेकिन जब उनका सामना हक़ीक़त से होता है, तो उनके सपने बिखर जाते हैं.
  • बात स़िर्फ लड़कियों की ही नहीं, लड़कों को भी यह सीख नहीं दी जाती कि पहली रात को सेक्स करना ज़रूरी नहीं. सबसे ज़रूरी होता है एक-दूसरे को कंफर्टेबल महसूस कराना, क्योंकि सेक्स एक क्रिया नहीं, भावना है और आपके रिश्ते की नींव का महत्वपूर्ण आधार भी.
  • हमारे यहां दोस्तों की बातें या फिर पोर्नोग्राफी ही सेक्स एजुकेशन का सबसे बड़ा आधार व ज़रिया होती है, जिससे बहुत ही ग़लत जानकारियां हासिल कर कपल्स अपनी-अपनी सोच के साथ एक-दूसरे के क़रीब आते हैं.
  • इसके अलावा अधिकांश लड़कियों को बचपन से यही सिखाया जाता है कि सेक्स बेहद शर्मनाक और गंदी चीज़ होती है, जिससे वो शादी के बाद भी स़िर्फ पति की इच्छा मानकर इस क्रिया को अंजाम देती हैं. वो न तो अपनी चाहतें बयां कर पाती हैं और न ही अपनी सोच. यहां तक कि वो पति को सहयोग भी नहीं दे पातीं, क्योंकि यहां उनके चरित्र से जोड़कर इसे देखा-परखा जाता है.

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नो सेक्स एजुकेशन का मतलब नो सेक्स नहीं है…
  • यह तो हम सभी जानते हैं कि सेक्स एजुकेशन नहीं मिलने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति सेक्स नहीं करेगा, लेकिन इसका यह मतलब ज़रूर है कि वो सेक्स को लेकर कम संवेदनशील होगा, कम जानकार होगा और सेक्स के प्रति उसमें भ्रांतियां अधिक होंगी.
  • सेक्स एजुकेशन न होने का मतलब यह भी है कि यौन शोषण के मामले अधिक होंगे.
  • यह मान लेते हैं और शोध भी इसी ओर इशारा करते हैं कि लगभग 70-80% पैरेंट्स सेक्स एजुकेशन के लिहाज़ से भी बच्चों से सेक्स पर बात ही नहीं करते, लेकिन एडल्ट होने के बाद, शादी से पहले तो कम से कम उन्हें इस विषय पर ज़रूर बात करनी चाहिए, ताकि उनकी शादी की नींव मज़बूत हो.
  • बच्ची को यह तो सिखाया जाता है कि पति को ख़ुश रखना ही तेरा फ़र्ज़ है, लेकिन उसे यह नहीं बताया जाता कि अपनी सेक्सुअल हेल्थ के प्रति सतर्कता बरतना भी ज़रूरी है.
  • कॉन्ट्रासेप्शन क्यों और कितना ज़रूरी है, मेडिकल टेस्ट्स कितने ज़रूरी हैं, इस विषय पर पति से बात करना कितना ज़रूरी है… ये तमाम बातें कभी किसी नई-नवेली दुल्हन को नहीं सिखाई जातीं और न ही दूल्हे को भी इस संदर्भ में एजुकेट किया जाता है.
  • उन्हें इस विषय पर बात करने से भी डर लगता है कि कहीं उन्हें चरित्रहीन न समझ लिया जाए या उनके बारे में कोई राय न कायम कर ली जाए.
  • यही वजह है कि सेक्सुअल हाइजीन को लेकर देश की शहरी महिलाएं तक बहुत पिछड़ी हुई हैं.
  • नई-नवेली दुल्हन के वर्जिनिटी टेस्ट को लेकर जितनी जागरूकता हमारा समाज दिखाता है, क्या उतनी ही जागरूकता लड़के की सेक्सुअल एक्टिविटीज़, सेक्सुअल हेल्थ और सेक्सुअल जानकारी के प्रति दर्शाई जाती है?

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प्रोफेशनल की लें मदद
  • यदि पैरेंट्स से सेक्स एजुकेशन नहीं मिली, तो कपल्स को चाहिए प्रोफेशनल की मदद लें.
  • काउंसलर के पास जाएं. प मन में छिपे डर, भ्रांतियों और आशंकाओं पर खुलकर आपस में बात करें.
  • पैरेंट्स की मानें, तो उनका यही तर्क होता है कि हमें तो किसी ने नहीं दी सेक्स एजुकेशन, फिर भी हमारी ज़िंदगी बेहतर है, लेकिन समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदला है, आज एक्सपोज़र ज़्यादा है, सेक्स को लेकर सवाल ज़्यादा हैं, डर ज़्यादा हैं, भ्रांतियां ज़्यादा हैं.
  • समय के साथ बदलाव होना ज़रूरी है, हमारी सोच में भी और हमारे तरीक़ों में भी.
  • कपल्स शादी से पहले ख़ुद भी बात कर सकते हैं और उन्हें जो सही लगे, वो ऐक्शन ले सकते हैं, ताकि उनकी शादीशुदा ज़िंदगी बेहतर हो और उनका जीवन ख़ुशहाल. प पैरेंट्स भी यह ख़्याल रखें कि संस्कारों के साथ-साथ सेक्स एजुकेशन भी उतनी ही ज़रूरी है, ताकि आपकी बेटी का जीवन बेहतर हो.
  • दूसरी ओर ससुरालपक्ष को भी जानना ज़रूरी है कि नई दुल्हन से उम्मीदें, अपेक्षाएं करना, उसे ज़िम्मेदरियां देना, उसके कर्त्तव्यों की जानकारी देना तो ठीक है, साथ ही अपने बेटे को बेडरूम एटीकेट्स और सेक्स एटीकेट्स की जानकारी देनी भी उतनी ही ज़रूरी है, क्योंकि यह आख़िर उसकी बेहतरी के लिए ही है.

 

– गीता शर्मा

पूजा श्रीराम बिजारनिया ने दिया पिता को अपना लिवर (Pooja Bijarnia Donate Her Liver To Save Her Father)

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कौन कहता है कि बेटियां सहारा नहीं बन सकतीं. पूजा श्रीराम बिजारनिया न सिर्फ़ अपने पिता का गौरव हैं, बल्कि अपना लिवर पिता को देकर पूजा ने ये साबित कर दिया है कि बेटियां अब किसी भी तरह से कमज़ोर नहीं हैं. बेटियों को यदि सही माहौल और हौसला मिले, तो वो कामयाबी की बुलंदियों को छू सकती हैं. चिल्ड्रन डे के ख़ास मौ़के पर आइए, हम आपको मिलाते हैं एक ऐसी बेटी से, जिसने न स़िर्फ अपने पिता को नई ज़िंदगी दी है, बल्कि परिवार का हौसला भी बढ़ाया.

Pooja Bijarnia, Donate Her Liver, Save Her Father

पूजा, आपके पापा को क्या बीमारी थी और कैसे आपने उन्हें नई ज़िंदगी दी?
मेरे डैड पिछले तीन सालों से हेल्थ प्रॉब्लम्स झेल रहे हैं. उन्हें लिवर सोराइसिस हुआ था. दरअसल, उनकी बीमारी की शुरुआत जॉडिंस (पीलिया) से हुई थी, जिसके बारे में काफ़ी समय तक पता नहीं चल पाया था. सही डॉक्टर न मिलने के कारण बीमारी बढ़ती चली गई. पहले डैड का शरीर पीला था, फिर एकदम काला पड़ गया. दवाइयों के ओवर डोज़ से वो हर समय जैसे नींद में रहते थे. हम उन्हें उसी हालत में दवाइयां देते जा रहे थे.

आपके पापा की सेहत में सुधार कब और कैसे आया?
हम डैड को जसलोक हॉस्पिटल ले गए. वहां डॉक्टर आभा नागराल की देखरेख में उनकी हालत सुधरने लगी. लेकिन उस समय तक डैड का लिवर डैमेज हो चुका था और लिवर ट्रांसप्लांट के अलावा और कोई रास्ता नहीं था. इस बीच उनके गॉल ब्लेडर और किडनी में भी प्रॉब्लम आने लगी थी, उन्हें डायबिटीज़ भी हो गया था. बार-बार डैड को लेकर नवी मुंबई से जसलोक हॉस्पिटल जाना बहुत मुश्किल हो रहा था इसलिए डॉक्टर आभा ने हमें नवी मुंबई के अपोलो हॉस्पिटल में पापा को ले जाने के लिए कहा. वो वहां की विज़िटिंग फेकल्टी भी हैं इसलिए हमारे लिए ट्रैवलिंग आसान हो गई. पापा का आगे का ट्रीटमेंट वहीं हुआ. फिर जनवरी 2017 में डॉक्टर ने कहा कि अगले दो-तीन महीने में हमें उनका लिवर ट्रांसप्लांट करना होगा. हमने बहुत कोशिश की, लेकिन हमें लिवर नहीं मिल पाया इसलिए हमने फैसला किया कि हम में से ही कोई पापा को लिवर दे देगा. मेरी बहन का लिवर छोटा था इसलिए वो नहीं दे पाई. मेरे लिवर का साइज़ सही था और मैं हर तरह से फिट थी इसलिए मैंने लिवर देने का फैसला किया.

लिवर देते समय आपको डर नहीं लगा?
मुझे तो डर नहीं लगा, लेकिन मेरी मां बहुत डरी हुई थी. उनके पति और बेटी दोनों की ज़िंदगी दांव पर थी. ऐसे केसेस में दोनों लोग बच भी सकते हैं, कोई एक भी बच सकता है या दोनों की जान भी जा सकती है. लेकिन हमारे पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं था. आख़िरकार ऑपरेशन सक्सेसफुल रहा और हम दोनों को कोई नुक़सान नहीं हुआ. हमारे डैड चाहे कितने ही बीमार थे, लेकिन हमने कभी हार नहीं मानी और न ही कभी कुछ निगेटिव सोचा. इस बीच इतने पैसे ख़र्च हुए कि हमें अपनी प्रॉपर्टी तक बेचनी पड़ी. हां, टाटा फाउंडेशन, रिलायंस फाउंडेशन, सिद्धिविनायक ट्रस्ट आदि ने हमें फाटनेंशियली बहुत मदद की. हमने इन तीन सालों में भले ही बहुत तकली़फें देखीं, लेकिन पापा के ऑपरेशन के बाद हमारी ज़िंदगी में फिर से ख़ुशियां लौट आई हैं.

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पापा के ऑपरेशन के बाद घर का माहौल कैसा है?

इन तीन सालों में हमने जितना झेला है, वैसा कोई दुश्मन भी न झेले. हां, इस बीच हमारी बॉन्डिंग इतनी बढ़ गई है कि अब हम हर काम साथ मिलकर करते हैं. मैं ऑफिस से सीधे घर आ जाती हूं ताकि अपने पैरेंट्स के साथ समय बिता सकूं. छुट्टी के दिन भी मैं अपने परिवार के साथ ही रहती हूं.

लिवर डोनेट करने से क्या आपकी हेल्थ पर कोई असर होगा?
नहीं, लिवर बहुत जल्दी अपने शेप में फिर से आ जाता है. हां, कुछ रिश्तेदारों ने ये ज़रूर कहा कि अब इसकी शादी कैसे होगी, तो मेरा जवाब ये था कि जिस लड़के को इतनी समझ न हो कि अपने पैरेंट्स के लिए बच्चों को क्या करना चाहिए, उसे मेरा जीवनसाथी बनने का कोई हक़ नहीं है.

अपने परिवार के बारे में बताइए, कैसे माहौल में हुई है आपकी परवरिश?
हम सिकर, राजस्थान के रहनेवाले हैं. डैड ने रोजी-रोटी की तलाश में बहुत पहले ही गांव छोड़ दिया था, लेकिन हमारे काका, मौसी सब गांव में रहते हैं. हम ख़ुशनसीब हैं कि हमारे पैरेंट्स ने हमारी परवरिश बहुत अच्छे माहौल में की है. हम पांच भाई-बहन हैं, चार बहनें और एक भाई. भाई सबसे छोटा है, आप कह सकती हैं कि सोशल प्रेशर में मेरे पैरेंट्स को चार बेटियों तक बेटे का इंतज़ार करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हम बहनों की परवरिश में कभी कोई भेदभाव नहीं किया. परिवार, रिश्तेदार कहते थे कि बेटियों पर इतना ख़र्च क्यों करते हो, इन्हें तो एक दिन पराए घर जाना है, लेकिन मेरे माता-पिता ने कभी हमारे लिए ऐसा नहीं सोचा. उन्होंने हमें बेटा-बेटी की तरह नहीं, औलाद की तरह पाला और हमें सारी सुविधाएं दी. रिश्तेदारों का तो ये हाल है कि डैड की बिमारी में मदद करने की बजाय उन्होंने गांव में ये अफवाह फैला दी थी कि अब डैड की बचने की कोई गुंजाइश नहीं है. लेकिन मेरी मां बहुत स्ट्रॉन्ग हैं, मां ने कभी हार नहीं मानी. उन्हें पूरा विश्‍वास था कि डैड ठीक हो जाएंगे.

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क्या राजस्थान में आज भी बाल विवाह होते हैं?
हां, राजस्थान में आज भी चोरी-छिपे बाल विवाह होते हैं. लोग बेटियों को जल्दी से जल्दी विदा कर देना चाहते हैं. उनके भविष्य के बारे में ज़रा भी नहीं सोचते. जब हम छुट्टियों में गांव जाते थे, तो लोगों की मानसिकता देखकर दंग रह जाते थे. तब मैं कोई 10 साल की रही होगी, हमारी एक रिश्तेदार मां से कहने लगीं, “लड़की अब बड़ी हो गई है, इसका रिश्ता पक्का कर दो”, जबकि हम बहनों में मैं तीसरे नंबर की हूं. उनकी बात सुनकर मां ने साफ़ मना कर दिया और कहा, “मैं इतनी जल्दी अपनी बेटियों की शादी नहीं कर सकती.”

क्या आपके परिवार पर समाज का प्रेशर नहीं है?
पहले मेरे माता-पिता परिवार या समाज के सामने खुलकर अपनी बात नहीं रख पाते थे, लेकिन अब जब उन्होंने देखा कि मुसीबत के समय कोई काम नहीं आता, हमें अपनी तकलीफ़ ख़ुद ही झलेनी होती है, तो वे अब इस बात को लेकर और स्ट्रॉन्ग हो गए हैं कि बेटियों को आत्मनिर्भर बनाना है, ताकि उन्हें कभी किसी का मुंह न देखना पड़े.

– कमला बडोनी

 

VIRAL! चंकी पांडे की बेटी अनन्या की क्यूट पिक्चर्स देखना न भूलें! (Cute Pictures Of Ananya Pandey Are Going Viral On Internet)

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चंकी पांडे की बेटी अनन्या भी बाक़ी स्टार किड्स के साथ सुर्खियों में रहती हैं. अनन्या का चेहरा बेहद ही मासूम है. हाल ही में मुंबई के बांद्रा इलाके में अनन्या को कैजु्अल्स में देखा गया. जैसे ही कैमरे उनकी तरफ़ बढ़े, अनन्या ने प्यारी-सी स्माइल देते हुए पोज़ दिया.
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पिंक शॉर्ट्स और व्हाइट स्पेगिटी में अनन्या बेहद ही क्यूट लग रही थीं. जहां सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान अपनी पहली फिल्म केदारनाथ की शूटिंग शुरू कर चुकी हैं, वहीं ख़बरें हैं कि श्रीदेवी के बेटी जानवी कपूर सैराट की रीमेक में काम कर सकती हैं. चंकी पांडे, बेटी, अनन्या, क्यूट पिक्चर्स, Cute Pictures, Ananya Pandeyअनन्या का नाम भी इसमें शामिल होने वाला है. सुनने में आया है कि जानवी कपूर करण जौहर की फिल्म स्टूडेंट ऑफ दी ईयर 2 से डेब्यू करने वाली हैं.

अदनान सामी ने बिटिया की पहली पिक्चर शेयर की (Adnan Sami Revealed First Pics Of His Daughter Madina)

बॉलीवुड के सुप्रसिद्ध व लोकप्रिय गायक अदनान सामी ने ट्विटर पर पहली बार अपनी बिटिया मदीना सामी ख़ान की पिक्चर शेयर की. हम आपको बता दें कि मई 8 2017 को अदनान की बीवी रोया सामी ने एक प्यारी-सी बेटी को जन्म दिया था. फिलहाल तीनों लोग जर्मनी में हैं, क्योंकि अदनान की बीवी रोया अफगान-जर्मन मूल की हैं, उनकी बेटी का जन्म भी वहीं हुआ. रोया अदनान की तीसरी बीवी हैं. इसके पहले अदनान की शादी ज़ेबा बख्तियार (पहली बीवी) और सबा गालादरी (दूसरी बीवी) से हुई थी

गौरतलब है कि वर्ष 2016 में अदनान को भारतीय नागरिकता मिली थी, जिसकी पाकिस्तानी मीडिया ने बहुत निंदा की थी. लेकिन इन आलोचनाओं का अदनान पर कोई असर नहीं पड़ा. एक इंटरव्यू के दौरान अदनान ने कहा कि वे जल्द ही मदीना की भारतीय नागरिकता के लिए भी आवेदन करेंगे. चूंकि मदीना का जन्म जर्मनी में हुआ इसलिए उन्हें स्वाभाविक तौर पर वहां की नागरिकता मिली है.

 

क्यों आज भी बेटियां वारिस नहीं? (Why Daughters Are still not accepted as Successor)

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क्यों उसके जन्म की ख़ुशी ग़म में बदल दी जाती है, क्यों बधाइयों की जगह लोग अफ़सोस ज़ाहिर कर चले जाते हैं, क्यों उसकी मासूम-सी मुस्कान किसी और के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच देती हैं? आख़िर वो भी तो एक संतान ही है, फिर क्यों उसे लड़का न होने की सज़ा मिली? बेटे-बेटी के बीच का यह भेदभाव आख़िर कब तक चलेगा? आज भी ऐसे कई अनगिनत सवाल वो बेटियां करती हैं, जिन्हें परिवार में एक बेटी का सम्मान नहीं मिला. क्या परिवार का वारिस स़िर्फ एक बेटा ही बन सकता है? क्यों आज भी बेटियां वारिस नहीं? समाज की इसी सोच को समझने की हमने यहां कोशिश की है.

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वारिस शब्द का अर्थ

शब्दकोष के अनुसार- वारिस शब्द का अर्थ उत्तराधिकारी या मृत जन की संपत्ति का अधिकारी होता है.
सामाजिक अर्थ- वारिस वह है, जो परिवार का वंश बढ़ाए और परिवार के नाम को आगे ले जाए, जो सामाजिक मान्यता के अनुसार लड़के ही कर सकते हैं, क्योंकि लड़कियां पराया धन होती हैं और शादी करके दूसरों की वंशवृद्धि करती हैं, इसलिए वो वारिस नहीं मानी जातीं.
सार्थक शब्दार्थ- वारिस शब्द का मतलब है- ङ्गवहन करनेवालाफ. बच्चों को माता-पिता का वारिस इसलिए कहते हैं, क्योंकि वो उनके संस्कारों का, अधिकारों का, कर्त्तव्यों का वहन करते हैं और ये सब काम लड़कियां भी कर सकती हैं. सही मायने में इस शब्द
की यही व्याख्या होनी चाहिए और आज हमें इस सोच को अपनाने की ज़रूरत है.

वारिस के रूप में बेटा ही क्यों?

इसके पीछे कई आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और भावनात्मक कारण हैं-
* बुढ़ापे में बेटा आर्थिक सहारे के साथ-साथ भावनात्मक सहारा भी देता है, जबकि बेटियां शादी करके दूसरे के घर चली
जाती हैं.
* बेटे परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में सहयोग देते हैं और प्रॉपर्टी में इज़ाफ़ा करते हैं, जबकि बेटियों को दहेज देना पड़ता है, जिससे घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है.
* बेटे वंश को आगे बढ़ाते हैं, जबकि बेटियां किसी और का परिवार बढ़ाती हैं.
* हमारे समाज में माता-पिता के जीते जी और मरने के बाद भी बेटे कई धार्मिक संस्कार निभाते हैं, जिसकी इजाज़त धर्म ने बेटियों को नहीं दी है.
* बेटे परिवार के मान-सम्मान को बढ़ाते हैं और परिवार की ताक़त बढ़ाते हैं, जबकि बेटियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी घरवालों पर होती है.
* प्रॉपर्टी और फाइनेंस जैसी बातें स़िर्फ पुरुषोें से जोड़कर देखी जाती हैं, लड़कियों को इसके लिए समर्थ नहीं समझा जाता.
* कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बेटा ही माता-पिता को स्वर्ग के द्वार पार कराता है, इसीलिए ज़्यादातर लोग बेटों की ही चाह रखते हैं.
* बेटे के बिना परिवार अधूरा माना जाता है.

क्या कहते हैं आंकड़े?

* इस साल हुए एक सर्वे में पता चला है कि चाइल्ड सेक्स रेशियो पिछले 70 सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जहां 1000 लड़कों पर महज़ 918 लड़कियां रह गई हैं.
* एक्सपर्ट्स के मुताबिक़, अगर स्थिति को संभाला न गया, तो 2040 तक भारत में लगभग 23 मिलियन महिलाओं की कमी हो जाएगी.
* कन्या भ्रूण हत्या का सबसे बड़ा कारण वारिसवाली सोच ही है.
* इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे, यूनिवर्सिटी ऑफ मैरिलैंड और नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा किए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि 77% भारतीय आज भी बुढ़ापे में बेटी की बजाय बेटे के घर रहना पसंद करते हैं. शायद इसके पीछे का कारण हमारी परंपरागत सोच है, जो कहती है कि बेटियों के घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए.
* ऐसा बिल्कुल नहीं है कि यह भेदभाव अनपढ़ और ग़रीब तबके के लोगों के बीच है, बल्कि सुशिक्षित व अमीर घरों में भी यह उतना ही देखा जाता है.

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सोच बदलने की ज़रूरत है

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* जब ज़माने के साथ हमारी लाइफस्टाइल बदल रही है, हमारा खानपान बदल रहा है, हमारी सोच बदल रही, तो भला शब्दों के अर्थ वही क्यों रहें? क्या यह सही समय नहीं है, सही मायने में लड़कियों को समानता का अधिकार देने का?
* वैसे भी हमारे देश का क़ानून भी समानता का पक्षधर है, तभी तो लड़कियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त है. पर क्या यह काफ़ी है, शायद नहीं. क्योेंकि भले ही इस अधिकार को क़ानूनी जामा पहना दिया गया है, पर क्या इस पर अमल करना इतना आसान है? ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं, जब अपना हक़ लेनेवाली बेटियों से परिवार के लोग ही नाते-रिश्ते तोड़ लेते हैं.
* समाज में ऐसे कई उदाहरण प्रस्तुत हैं, जहां लड़कियां अपने माता-पिता की सेवा व देखभाल की ख़ातिर अपनी ख़ुशियों को तवज्जो नहीं देतीं, तो क्या ऐसे में उनका वारिस कहा जाना ग़लत है?
* हम हमेशा समाज की दुहाई देते हैं, पर जब-जब बदलाव होते हैं, तो सहजता से हर कोई उसे स्वीकार्य कर ले, यह ज़रूरी तो नहीं. पर क्या ऐसे में परिवर्तन नहीं होते? बदलाव तो होते ही रहे हैं और होते रहेंगे. हम क्यों भूल जाते हैं कि समाज हमीं से बनता है, अगर हम इस ओर पहल करेंगे, तो दूसरे भी इस बात को समझेंगे.
* बेटियों को लेकर हमेशा से ही हमारे समाज में दोहरा मापदंड अपनाया जाता रहा है. जहां एक ओर लोग मंच पर महिला मुक्ति और सशक्तिकरण के नारे लगाते हैं, वहीं घर में बेटियों को मान-सम्मान नहीं दिया जाता.
* कई जगहों पर अभी भी बच्चों की परवरिश इस तरह की जाती है कि उनमें बचपन से लड़का-लड़कीवाली बात घर कर जाती है.
* हमारे समाज की यह भी एक विडंबना है कि सभी को मां चाहिए, पत्नी चाहिए, बहन चाहिए, पर बेटी नहीं चाहिए. अब भला आप ही सोचें, अगर बेटी ही न होगी, तो ये सब रिश्ते कहां से आएंगे.
* बेटों को बुढ़ापे का सहारा बनाने की बजाय सभी को अपना रिटायरमेंट सही समय पर प्लान करना चाहिए, ताकि किसी पर आश्रित न रहना पड़े.

रंग लाती सरकारी मुहिम

* प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस ओर एक सकारात्मक पहल की है. ङ्गबेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओफ के साथ वो देश में लड़कियों की स्थिति मज़बूत करना चाहते हैं, जो हमारे भविष्य के लिए बहुत ज़रूरी है.
* कुछ महीने पहले मोदीजी ने ट्विटर पर ङ्गसेल्फी विद डॉटरफ मुहिम भी शुरू की, ताकि लोग बेटियों की महत्ता को समझें.
* पिछले साल ङ्गसुकन्या समृद्धिफ नामक लघु बचत योजना की शुरुआत की गई, ताकि बेटियों की उच्च शिक्षा और शादी-ब्याह में किसी तरह की परेशानी न आए.
* कन्या भ्रूण हत्या के विरोध और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने 2008 में ङ्गधनलक्ष्मी योजनाफ शुरू की थी, जिसमें 18 की उम्र के बाद शादी किए जाने पर सरकार की ओर से 1 लाख की बीमा राशि देने का प्रावधान है.
* महाराष्ट्र सरकार की ङ्गमाझी कन्या भाग्यश्री योजनाफ ख़ासतौर से ग़रीबी रेखा के नीचे रहनेवाले परिवारों के लिए है, जिसमें बच्ची के 18 साल की होने पर सरकार की ओर से 1 लाख मिलते हैं.
* राजस्थान सरकार ने बेटियों के जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए मुख्यमंत्री शुभलक्ष्मी योजना की शुरुआत की थी. इसके तहत बालिका के जन्म पर, टीकाकरण के लिए, स्कूल में दाख़िले के लिए मां को कुल 7300 मिलते हैं.
* जम्मू-कश्मीर सरकार की लाडली बेटी योजना भी गरीब परिवार की बेटियों के लिए है, जो हर महीने बेटी के खाते में
1000 जमा करते हैं और 21 साल पूरे होने पर साढ़े छह लाख रुपए एकमुश्त देते हैं.
* हिमाचल सरकार की ङ्गबेटी है अनमोल योजनाफ के तहत बेटी के जन्म पर उसके खाते में 1 लाख की रक़म जमा की जाती है और बेटियों की 12वीं तक की शिक्षा के लिए सरकार 300 से 1200 की स्कॉलरशिप भी देती है.
* मध्य प्रदेश सरकार की लाडली लक्ष्मी योजना भी इसी कड़ी में शामिल है. बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उसकी शिक्षा के दौरान समय-समय पर स्कॉलरशिप दी जाती है.

 

– अनीता सिंह

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सौरव गांगुली का बिटिया सना के साथ पहला फोटो शूट… छाया सोशल मीडिया पर (Perfect Father-daughter: Sourav Ganguly’s First Photo-Shoot With Daughter Sana Wins Hearts On Social Media)

Sourav Ganguly Daughter
सौरव गांगुली का अपनी बिटिया के साथ पहले फोटो शूट ने जीता सबको दिल!

सौरव गांगुली क्रिकेट की दुनिया के बेताज बादशाह तो हैं ही, लेकिन वो एक परफेक्ट फादर भी हैं. जी हां, अपनी 16 साल की बिटिया सना के साथ उन्होंने हाल ही में एक फोटो शूट करवाया, जो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है. सौरव और सना ने यह फोटो शूट एक जूलरी ब्रैंड के लिए किया, जिसे बेहद पसंद किया जा रहा है. गुलाबी साड़ी में सिमटी सना बेहद प्यारी लग रही हैं और उन्हें बेहद लाड से निहार रहे हैं पिता सौरव. सौरव की पत्नी डोना ने अपने फेसबुक अकाउंट पर ये पिक्चर्स अपलोड की हैं, जिन्हें फैंस बेहद पसंद कर रहे हैं. आप भी देखिए पिता और बेटी के इस ख़ास अंदाज़ को.

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डोना ने ये पिक्चर्स फेसबुक पर अपलोड करते समय सना के लिए एक प्यारा सा मैसेज भी पोस्ट किया है. 

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Awww! पूल में पापा शाहिद के साथ बेबी मिशा, देखें ये क्यूट पिक्चर (Daddy Shahid Kapoor Enjoys A Pool Time With Daughter Misha)

शाहिद कपूर

शाहिद कपूर

पापा और बेटी का बेस्ट टाइम. पापा शाहिद कपूर ने शेयर की है एक क्यूट पिक्चर, जिसमें वो अपनी बेटी मिशा को गोद में लिए पानी में बैठे हैं. बेबी पूल में शाहिद ने मिशा को अकेले नहीं छोड़ा. ये पिक्चर शेयर करते ही वायरल हो गई. महज़ 30 मिनट में लगभग 1 लाख लोगों ने इस पिक्चर को लाइक किया है.

शाहिद ने इस पिक्चर को शेयर करते हुए लिखा है, “पूल टाइम विद मिस्सी, बेस्ट टाइम्स.”

Pool time with missy. #besttimes

A post shared by Shahid Kapoor (@shahidkapoor) on

 

रिश्तों में तय करें बेटों की भी ज़िम्मेदारियां (How To Make Your Son More Responsible)

ज़िम्मेदारियां

बेहिसाब ख़ामोशियां… चंद तन्हाइयां… कुछ दबी सिसकियां, तो कुछ थकी-हारी परछाइयां… बहुत कुछ कहने को था, पर लबों में ताक़त नहीं थी… मगर अब व़क्त ने लफ़्ज़ों को अपने दायरे तोड़ने की इजाज़त जो दी, तो कुछ वर्जनाएं टूटने लगीं… दबी सिसकियों को बोल मिले, तो ख़ामोशियां बोल उठीं, तन्हाइयां काफ़ूर हुईं, तो परछाइयां खुले आसमान में उड़ने का शौक़ भी रखने लगीं… बराबरी का हक़ अब कुछ-कुछ मिलने लगा है… बराबरी का एहसास अब दिल में भी पलने लगा है…

ज़िम्मेदारियां

हम भले ही लिंग के आधार पर भेदभाव को नकारने की बातें करते हैं, लेकिन हमारे व्यवहार में, घरों में और रिश्तों में वो भेदभाव अब भी बना हुआ है. यही वजह है कि रिश्तों में हम बेटियों की ज़िम्मेदारियां तो तय कर देते हैं, लेकिन बेटों को उनकी हदें और ज़िम्मेदारियां कभी बताते ही नहीं. चूंकि अब समाज बदल रहा है, तो बेहतर होगा कि हम भी अपनी सोच का दायरा बढ़ा लें और रिश्तों में बेटों को भी ज़िम्मेदारी का एहसास कराएं.

घर के काम की ज़िम्मेदारियां
– अक्सर भारतीय परिवारों में घरेलू काम की ज़िम्मेदारियां स़िर्फ बेटियों पर ही डाली जाती हैं. बचपन से ङ्गपराये घर जाना हैफ की सोच के दायरे में ही बेटियों की परवरिश की जाती है.
– यही वजह है कि घर के काम बेटों को सिखाए ही नहीं जाते और उनका यह ज़ेहन ही नहीं बन पाता कि उन्हें भी घरेलू काम आने चाहिए.
– चाहे बेटी हो या बेटा- दोनों को ही हर काम की ज़िम्मेदारी दें.
– बच्चों के मन में लिंग के आधार पर काम के भेद की भावना कभी न जगाएं, वरना अक्सर हम देखते हैं कि घर में भले ही भाई अपनी बहन से छोटा हो या बड़ा- वो बहन से अपने भी काम उसी रुआब से करवाता है, जैसा आप अपनी बेटी से करवाते हैं.
– पानी लेना, चाय बनाना, अपने खाने की प्लेट ख़ुद उठाकर रखना, अपना सामान समेटकर सली़के से रखना आदि काम बेटों को भी ज़रूर सिखाएं.

बड़ों का आदर-सम्मान करना
– कोई रिश्तेदार या दोस्त घर पर आ जाए, तो बेटी के साथ-साथ बेटे को भी यह ज़रूर बताएं कि बड़ों के सामने सलीक़ा कितना
ज़रूरी है.
– चाहे बात करने का तरीक़ा हो या हंसने-बोलने का, दूसरों के सामने बच्चे ही पैरेंट्स की परवरिश का प्रतिबिंब होते हैं. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि बेटों को भी वही संस्कार दें, जो बेटियों को हर बात पर दिए जाते हैं.
– लड़कियों से कैसे बात करनी चाहिए, किस तरह से उनकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, उन्हें किस तरह से सम्मान देना चाहिए… आदि बातों की भी शिक्षा ज़रूरी है.
– घर व बाहर भी बुज़ुर्गों से कैसे पेश आना चाहिए, अगर उनके पास कोई भारी सामान वगैरह है, तो आगे बढ़कर उठा लेना चाहिए, उनके साथ व़क्त बिताना, उनसे बातें शेयर करना, उनका हाथ थामकर सहारा देना आदि व्यवहार बेटों को संवेदनशील बनाने में सहायता करेगा और वो अपनी ज़िम्मेदारियां बेहतर तरी़के से समझ व निभा पाएंगे.

ज़िम्मेदारियां

अनुशासन ज़रूरी है
– तुम सुबह जल्दी उठने की आदत डालो, तुम्हें शादी के बाद देर तक सोने को नहीं मिलेगा… टीवी देखना कम करो और खाना बनाने में मदद करो, कुछ अच्छा सीखोगी, तो ससुराल में काम ही आएगा… शाम को देर तक घर से बाहर रहना लड़कियों के लिए ठीक नहीं… आदि… इस तरह की बातें अक्सर मांएं अपनी बेटियों को सिखाती रहती हैं, लेकिन क्या कभी बेटों को अनुशासन सिखाने पर इतना ज़ोर दिया जाता है?
– घर से बाहर रात को कितने बजे तक रहना है या सुबह सोकर कितनी जल्दी उठना है, ये तमाम बातें अनुशासन के दायरे में आती हैं और अनुशासन सबके लिए समान ही होना चाहिए.
– खाना बनाना हो या घर की साफ़-सफ़ाई, बेटों को कभी भी इन कामों के दायरे में लाया ही नहीं जाता, लेकिन यदि कभी ऐसी नौबत आ जाए कि उन्हें अकेले रहना पड़े या अपना काम ख़ुद करना पड़े, तो बेहतर होगा कि उन्हें इस मामले में भी बेटियों की तरह ही आत्मनिर्भर बनाया जाए. बेसिक घरेलू काम घर में सभी को आने चाहिए, इसमें बेटा या बेटी को आधार बनाकर एक को सारे काम सिखा देना और दूसरे को पूरी छूट दे देना ग़लत है.

ज़िम्मेदारियां

शादी से पहले की सीख
– शादी से पहले बेटियों को बहुत-सी हिदायतों के साथ विदा किया जाता है, लेकिन क्या कभी बेटों को भी हिदायतें दी जाती हैं कि शादी के बाद उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए? यक़ीनन नहीं.
– बेहतर होगा कि बेटों को भी एडजेस्टमेंट करना सिखाया जाए.
– नए रिश्तों से जुड़ने के बाद की ज़िम्मेदारियां समझाई जाएं.
– किस तरह से नई-नवेली दुल्हन को सपोर्ट करना है, उसके परिवार से किस तरह से जुड़ना है आदि बातें बेटों को भी ज़रूर बताई जानी चाहिए.
– हालांकि भारतीय पैरेंट्स से इस तरह की उम्मीद न के बराबर ही होती है कि वो इस तरह से अपने बेटे को समझाएं, लेकिन आज समय बदल रहा है, तो लोगों की सोच में भी कुछ बदलाव आया है.
– आज की जनरेशन काफ़ी बदल गई है. फिर भी यदि पैरेंट्स नहीं समझा सकते, तो प्री मैरिज काउंसलिंग के लिए ज़रूर काउंसलर के पास जाना चाहिए.

शादी के बाद
– अक्सर शादी के बाद बहुओं को हर कोई नई-नई सीख व सलाहेें देता पाया गया है, लेकिन बेटों को शायद ही कभी कोई ज़िम्मेदारियों की बातें समझाता होगा.
– शादी स़िर्फ लड़की ने लड़के से नहीं की होती, बल्कि यह दोनों तरफ़ का रिश्ता होता है, तो ज़िम्मेदारियां भी समान होनी चाहिए.
– बेटों को यह महसूस कराना ज़रूरी है कि स़िर्फ बहू ही नए माहौल में एडजेस्ट नहीं करेगी, बल्कि उन्हें भी पत्नी के अनुसार ख़ुद को ढालने का प्रयत्न करना होगा, पत्नी को हर काम में सहयोग करना होगा और पत्नी की हर संभव सहायता करनी होगी, ताकि वो बेहतर महसूस कर सके.
– इसके अलावा जितने भी रीति-रिवाज़ व परंपराएं हैं, उन्हें निभाने की ज़िम्मेदारी भी दोनों की होनी चाहिए.
– अक्सर शादी के बाद ससुरालपक्ष और मायके, दोनों को निभाने की ज़िम्मेदारी लड़की पर ही छोड़ दी जाती है. जबकि कोई भी मौक़ा या अवसर हो, तो ज़रूरी है लड़के भी उसमें उतनी ही ज़िम्मेदारी के साथ शामिल हों, जितना लड़कियों से उम्मीद की जाती है.
– इसके लिए बेहतर होगा कि जब भी घर में या किसी रिश्तेदार के यहां भी कोई अवसर पड़े, जैसे- किसी का बर्थडे या शादी, तो बेटों को उनके काम व ज़िम्मेदारी की लिस्ट थमा दी जानी चाहिए कि ये काम तुम्हारे ही ज़िम्मे हैं. इसी तरह घर के हर सदस्य को उसका काम बांट देना चाहिए. इससे वो ज़िम्मेदारी से न तो पीछा छुड़ा पाएंगे और न ही भाग पाएंगे.

ज़िम्मेदारियां

बच्चों की ज़िम्मेदारियां
– बच्चा दोनों की ही ज़िम्मेदारी होता है, लेकिन इसे निभाने का ज़िम्मा अनकहे ही मांओं पर आ जाता है.
– बच्चे से जुड़ी हर छोटी-बड़ी चीज़ के लिए घर के सदस्यों से लेकर ख़ुद पति भी अपनी पत्नी से ही जवाब मांगते हैं.
– लेकिन अब बेटों को यह एहसास कराना ज़रूरी है कि बच्चों के प्रति वो भी उतने ही जवाबदेह हैं, जितना वो अपनी पत्नी को समझते हैं.
– पैरेंट्स मीटिंग हो या बच्चों को होमवर्क करवाना हो, माता-पिता को ज़िम्मेदारी बांटनी होगी. लेकिन अक्सर हमारे परिवारों में बेटे शुरू से अपने घरों में अपनी मम्मी को ये तमाम काम करते देखते आए हैं, लेकिन आज के जो पैरेंट्स हैं, वो अपने परिवार से इसकी शुरुआत कर सकते हैं, ताकि उनके बेटों को आगे चलकर रिश्तों में ज़िम्मेदारियों का एहसास हो सके.

करियर की ज़िम्मेदारी
– आजकल वर्किंग कपल्स का कल्चर बढ़ता जा रहा है, लेकिन जब भी कॉम्प्रोमाइज़ करने की बारी आती है, तो यह समझ लिया जाता है कि पत्नी ही करेगी, क्योंकि बेटों को तो कॉम्प्रोमाइज़ करना कभी सिखाया ही नहीं जाता.
– आप ऐसा न करें. बेहतर होगा कि मिल-बांटकर ज़िम्मेदारी निभाना सिखाएं. बांटने, शेयर करने व सपोर्ट करने का जज़्बा बेटों में भी पैदा करें. बचपन में अपनी बहन के लिए वे ये सब करेंगे, तो आगे चलकर महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव बढ़ेगा और वो बेहतर पति साबित होंगे.
– घर में बहन न भी हो, तो भी महिलाओं के प्रति सम्मान व समान भाव रखने की भावना उनमें ज़रूर होनी चाहिए और ऐसा तभी होगा, जब उनकी परवरिश इस तरह से की जाएगी.
– अगर दोनों ही थके-हारे घर आते हैं, तो काम भी मिलकर करना होगा, वरना पत्नी आते ही घर के काम में जुट जाती है और पति महाशय फ्रेश होकर टीवी के सामने चाय की चुस्कियां लेते हुए पसर जाते हैं.

– गीता शर्मा

मोहम्मद कैफ बने पिता, सोशल साइट पर की ख़ुशी ज़ाहिर (Mohammad Kaif Tweets Pic With Baby Daughter)

Mohammad Kaif Baby

Mohammad Kaif Baby

मोहम्मद कैफ़ के घर एक नन्हा मेहमान आया है. एक प्यारी-सी गुड़िया। कैफ प्यारी सी बेटी के पापा बन गए हैं. आप भी देखिए नन्हीं पारी अपने पापा की गोद में आराम फरमा रही हैं.  कैफ ने एक और ट्वीट करके बेटी के साथ अपना फोटो पोस्‍ट किया. उन्होंने कहा कि यह खुशी का अहम क्षण है. आप सभी को शुभकामनाओं और प्रार्थनाओं के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

 

 

सचिन तेंदुलकर  वीरेंदर सहवाग ने दी बधाई. 

बॉलीवुड एक्टर सुनील शेट्टी ने भी ट्वीट के ज़रिए कैफ़ को बधाई दी 

कुंबले और हरभजन सिंह ने भी दिया बधाई संदेश

 

Cute! चंदन प्रभाकर ने शेयर की अपनी बेटी की पहली तस्वीर (Chandan Prabhakar Shares First Picture Of His Daughter)

Chandan Prabhakar

Chandan Prabhakar

कॉमेडियन चंदन प्रभाकर ने शेयर की है अपनी बेटी की पहली तस्वीर. द कपिल शर्मा शो छोड़ने के बाद फिलहाल चंदन हर कॉन्ट्रोवर्सी से दूर होकर अपनी फेमिली लाइफ एंजॉय कर रहे हैं. उनके घर में नन्हीं परी ने कदम रखा है. पिछले हफ़्ते ही चंदन एक प्यारी-सी बच्ची के पिता बने हैं और अब उन्होंने पिक्चर शेयर की है. चंदन ने टि्वटर पर लिखा है, “मैं और मेरी बेटी… इस एहसास के लिए कोई शब्द नहीं है…लव”

आप भी देखें ये क्यूट पिक्चर.

अनमोल हैं बेटियां जीने दो इन्हें (don’t kill your precious daughter)

Daughters

Daughters

आज़ाद, क़ामयाब, आसमान की बुलंदियों को छूती महिलाएं… लेकिन ये तस्वीर का स़िर्फ एक पहलू है. इसका दूसरा पहलू बेहद दर्दनाक और भयावह है, जहां क़ामयाबी की राह पर आगे बढ़ना तो दूर, लाखों-करोड़ों बच्चियोेंं को दुनिया में आने से पहले ही मार दिया जाता है. तमाम तरह के क़ानून और जागरूकता अभियान के बावजूद कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला थमा नहीं है. पेश है, इस सामाजिक बुराई के विभिन्न पहलुओं को समेटती एक स्पेशल रिपोर्ट.

सच बहुत कड़वा है
हमारे पुरुष प्रधान समाज में आज भी बेटियों को बेटों से कमतर आंका जाता है. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ज़्यादातर परिवारों में बेटियों के जन्म पर आज भी मायूसी छा जाती है. बेटी के जन्म पर बधाई देते हुए अक्सर लोग कहते हैं, ङ्गङ्घमुबारक हो, लक्ष्मी आई है.फफ लेकिन सच ये है कि धन रूपी लक्ष्मी आने पर सभी को ख़ुशी होती है, लेकिन बेटी रूपी लक्ष्मी के आने पर सबके चेहरे का रंग उड़ जाता है. उसे बोझ समझा जाता है. इसी मानसिकता के चलते कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा, बल्कि व़क्त के साथ बढ़ता ही जा रहा है.

शिक्षित वर्ग भी नहीं है पीछे
ऐसा नहीं है कि स़िर्फ गांव, कस्बे और अशिक्षित वर्ग में ही लड़कियों को जन्म से पहले मारने के मामले सामने आते हैं, हैरत की बात ये है कि ख़ुद को पढ़ा-लिखा और मॉडर्न कहने वाले लोग भी निःसंकोच इस जघन्य अपराध को अंजाम दे रहे हैं. कुछ मामलों में तो परिवार वाले मां की मर्ज़ी के बिना ज़बरदस्ती उसका गर्भपात करवा देते हैं. इसके अलावा छोटे परिवार की चाहत रखने वाले अधिकतर दंपति पहली लड़की होने पर हर हाल में दूसरा लड़का ही चाहते हैं, इसलिए सेक्स डिटर्मिनेशन टेस्ट करवाते हैं और लड़की होने पर एबॉर्शन करवा लेते हैं. ताज्जुब की बात ये है कि पढ़ी-लिखी और उच्च पदों पर काम करने वाली महिलाओं पर भी परिवार वाले लड़के के लिए दबाव डालते हैं.

एक प्रतिष्ठित कंपनी में एक्ज़ीक्यूटिव पद पर कार्यरत स्वाति (परिवर्तित नाम) बताती हैं, “बेटी होने की ख़बर सुनते ही मेरे ससुराल वालों के चेहरे पर मायूसी छा गई, क्योंकि सबको बेटे की आस थी. बेटी के जन्म के कुछ महीनों बाद से ही घर में बार-बार दूसरे बच्चे की प्लानिंग की चर्चा होने लगी. इतना ही नहीं, दूसरी बार भी लड़की न हो जाए इसके लिए लिंग परीक्षण कहां करवाया जाए,इस पर भी सोच-विचार होने लगा. हैरानी तो तब हुई जब मेरे पति भी दूसरी बार लड़की होने पर एबॉर्शन की बात करने लगे.”

कुछ ऐसी ही कहानी दीपिका की भी है. एचआर प्रोफेशनल दीपिका कहती हैं, “शादी के 4 साल बाद मुझे लड़की हुई, लेकिन बेटी के जन्म से घर में कोई भी ख़ुश नहीं था. उसके जन्म के 1 साल बाद ही मुझ पर दोबारा मां बनने का दबाव डाला जाने लगा, लेकिन मैं इसके लिए न तो शारीरिक रूप से तैयार थी और न ही मानसिक. उस दौरान मेरी हालत बहुत अजीब हो गई थी. घर वालों की बातें सुनते-सुनते मैं बहुत परेशान हो गई थी. मुझे समझ में नहीं आता, आख़िर लोग ये क्यों भूल जाते हैं कि लड़के को जन्म देने के लिए भी तो लड़की ही चाहिए. सब कहते हैं लड़कों से वंश आगे बढ़ता है, लेकिन लड़कियां ही नहीं रहेंगी, तो आपकी पीढ़ी आगे कैसे बढ़ेगी?”
दीपिका का सवाल बिल्कुल जायज़ है, वंश और ख़ानदान को आगे बढ़ाने के लिए लड़के जितने ज़रूरी हैं, लड़कियां भी उतनी ही अहम् हैं. ये गाड़ी के दो पहियों के समान हैं. यदि एक भी पहिया निकाल दिया जाए तो परिवार और समाज की गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाएगी, लेकिन लोग इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं. बेटे के मोह में महिलाओं का कई बार गर्भपात करवाया जाता है, बिना ये सोचे कि इसका उनके शरीर और मन पर क्या असर पड़ेगा. इतना ही नहीं, कई बार तो पांचवें-छठे महीने में भी गर्भपात करवा दिया जाता है, जिससे कई महिलाओं की जान भी चली जाती है.

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कन्या भ्रूण हत्या के कारण
हमारे देश में दशकों से बेटों की चाह में बेटियों की बलि चढ़ाई जाती रही है. कहीं जन्म लेने के बाद उसे मार दिया जाता है, तो कहीं जन्म से पहले. अब नई तकनीक की बदौलत उन्हें दुनिया में आने ही नहीं दिया जाता. आख़िर क्या कारण है कि लोग लड़कियों को जन्म ही नहीं लेने देते?

* लड़कियों को बोझ समझने की सबसे बड़ी वजह है बरसों पुरानी दहेज प्रथा, जो आज भी फल-फूल रही है. शादी के समय बेटी को लाखों रुपए दहेज  देना पड़ेगा, यही सोचकर लोग लड़कियों के जन्म से डरते हैं.

* लड़कियां तो पराया धन हैं, शादी के बाद पति के घर चली जाएंगी, लेकिन लड़के बुढ़ापे का सहारा बनेंगे, वंश आगे बढ़ाएंगे, ख़ानदान का नाम अगली  पीढ़ी तक ले जाएंगे, ये सोच लड़कियों के जन्म के आड़े आती है.

* कई परिवार लड़कों के जन्म को प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं, ऐसे परिवारों में लड़कियों के जन्म को शर्मनाक समझा जाता है.

* यदि पहली लड़की है, तो दूसरी लड़की को जन्म नहीं लेने दिया जाता.

* गरीबी, अशिक्षा और लड़कियों को बोझ समझने वाली मानसिकता कन्या भ्रूण हत्या के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं.


अपने हक़ से महरूम है आधी आबादी

स्त्री को मां और पत्नी के रूप में अपनाने वाला समाज न जाने क्यों उसे बेटी के रूप में स्वीकार नहीं कर पाता. बेटियों को जन्म से पहले ही मारकर न स़िर्फ उनसे जीने का अधिकार छीना जा रहा है, बल्कि ऐसा करके लोग प्रकृति के संतुलन को भी बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
इसी मानसिकता के चलते आज भी कई परिवारों में लड़के-लड़कियों की परवरिश में फर्क़ किया जाता है. ये भेदभाव अनपढ़ ही नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे परिवारों में भी होता है. कई अभिभावक बेटे की हर जायज़-नाजायज़ मांग तुरंत पूरी करते हैं, लेकिन वही मांग अगर बेटी करे, तो उसकी उपेक्षा कर दी जाती है.

घटती तादाद चिंता का विषय
जिस रफ़्तार से लड़कियों की तादाद कम हो रही है, उसे देखते हुए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि वो दिन दूर नहीं जब शादी के लिए लड़कियां ही नहीं मिलेंगी. कई जगहों पर तो ये समस्या शुरू भी हो चुकी है. इतना ही नहीं, इस असंतुलन से समाज में महिलाओं से जुड़े अपराध और सेक्स संबंधी हिंसा के मामलों में और बढ़ोतरी होगी. यदि इसी तरह से लड़कियों को कोख में मारने का सिलसिला चलता रहा, तो संभव है कि भविष्य में हर पुरुष को पत्नी न मिल पाए. ऐसे में एक औरत को कई पुरुषों के बीच बांटा जाएगा. हो सकता है, औरत पर अपना हक़ जताने के लिए लड़ाइयां भी शुरू हो जाएं. ये सारी बातें समाज के नैतिक पतन की ओर इशारा करती हैं, लेकिन कन्या भ्रूण हत्या जैसा घिनौना अपराध करने वाले लोग इस भयावह स्थिति के बारे में सोचने तक की ज़हमत नहीं उठाते. यदि बेटी को जन्म ही नहीं लेने दिया जाएगा, तो ममता की छांव व मार्गदर्शन करने वाली मां और हर मुश्किल में साथ देने वाली पत्नी कहां से मिलेगी. बिना औरत के सभ्य समाज की कल्पना नहीं की जा सकती. इतनी अनमोल होते हुए भी न जाने क्यों कुछ लोग बेटियों की अहमियत नहीं समझ पाते.

क्या कहता है क़ानून?
बॉम्बे हाईकोर्ट की वकील ज्योति सहगल के मुताबिक, प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नैटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स(पीसीपीएनडीटी) एक्ट 1994 के तहत, प्रेग्नेंसी के दौरान लिंग परीक्षण और जन्म से पहले कन्या भ्रूण की हत्या को ग़ैर क़ानूनी ठहराया गया है, लेकिन इस क़ानून का व्यापक असर नहीं हुआ है. कन्या भ्रूण हत्या प्रतिबंधित है, लेकिन मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट के तहत निम्न परिस्थितियों में क़ानूनन गर्भपात की अनुमति है.
* प्रेग्नेंसी की वजह से महिला की जान को ख़तरा हो.
* महिला के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को ख़तरा हो.
* प्रेग्नेंसी की वजह रेप हो.
* यदि बच्चा गंभीर रूप से विकलांग या अपाहिज पैदा होने की संभावना हो.

कब होती है सज़ा?
कन्या भ्रूण हत्या जैसे गंभीर ज़ुर्म के लिए क़ानून द्वारा निम्न सज़ा तय की गई हैंः

  • आईपीसी धारा 313- महिला की अनुमित के बिना ज़बरदस्ती गर्भपात करवाने वाले को आजीवन कारावास या जुर्माने की सज़ा हो सकती है.
  • आईपीसी धारा 314- गर्भपात करवाने के लिए किए गए कार्यों से यदि महिला की मृत्यु हो जाती है, तो 10 साल की सज़ा या जुर्माना या फिर दोनों की सज़ा हो सकती है. यदि एबॉर्शन महिला की मर्ज़ी के बिना किया जा रहा हो तो सज़ा आजीवन कारावास होगी.
  • आईपीसी धारा 315- बच्चे को ज़िंदा जन्म लेने से रोकना या ऐसे कार्य करना जिससे जन्म लेते ही उसकी मृत्यु हो जाए दंडनीय अपराध है. इसके लिए अपराधी को 10 साल की सज़ा या जुर्माना या फिर दोनों से दण्डित किया जा सकता है.

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सख़्त क़ानून के साथ ही मानसिकता बदलने की ज़रूरत
सोशल एक्टिविस्ट वर्षा देशपांडे कहती हैं, “कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए स़िर्फ मज़बूत क़ानून और पॉलिसी बनाने की ही नहीं, बल्कि उसे सख़्ती से लागू करने की भी ज़रूरत है.फफ एडवोकेट ज्योति सहगल भी इस बात से सहमत हैं. उनका मानना है, ङ्गङ्घक़ानून को अमल में लाने की जो प्रक्रिया है उसे सुधारना ज़रूरी है. साथ ही कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराई को ख़त्म करने के लिए लोगों की सोच बदलनी भी बेहद ज़रूरी है. जब तक लोगों के विचार नहीं बदलेंगे स़िर्फ क़ानून बनाने से कुछ नहीं होगा. पहली पत्नी के ज़िंदा रहते दूसरी शादी करना क़ानूनन ज़ुर्म है, बावजूद इसके आज भी कई लोग ऐसे हैं जो पहली पत्नी से बेटा न होने पर दूसरी शादी कर लेते हैं और समाज इसे ग़लत नहीं मानता. जब तक ये स्थिति नहीं बदलेगी लड़कियों को उनका हक़ नहीं मिलेगा. जन्म से पहले ही लड़कियों को मारना हत्या जैसा ज़ुर्म है और इसके लिए डॉक्टर के साथ ही वो व्यक्ति भी सज़ा का हक़दार है जो गर्भपात करवाता है.”

लेक लाडकी अभियान
कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए महाराष्ट्र में लेक लाडकी अभियान की शुरुआत करने वाली सोशल एक्टिविस्ट वर्षा देशपांडे का कहना है कि डिज़ाइनर साड़ियों की तरह ही आजकल लोग डिज़ाइनर बेबी चाहते हैं. पढ़े-लिखे और रसूखदार लोग लाखों रुपए देकर लिंग परीक्षण करवा रहे हैं. वर्षा का कहना है कि लिंग भेद के मामले में महाराष्ट्र की स्थिति हरियाणा से भी बदतर है. कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए वर्षा सबसे ज़्यादा ज़ोर सेक्स डिटर्मिनेशन टेस्ट बंद करवाने पर देती हैं. वर्षा कहती हैं, “पहले लिंग परीक्षण पर रोक लगाना ज़रूरी है. जब परीक्षण ही नहीं होगा तो कन्या भ्रूण हत्या भी नहीं होगी. कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते मामलों के लिए वर्षा डॉक्टरों को भी आड़े हाथों लेती हैं. उनके मुताबिक ङ्गङ्घडॉक्टर्स लॉबी में एथिकल क्राइसेस हैं. चंद रुपयों की ख़ातिर ये लोग टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग कर रहे हैं.”

आज भी कई गांव व शहरों में कन्या भू्रण हत्या की जा रही है. आज भी कई लोग ऐसे हैं जो लड़की को बोझ समझते हैं और सोचते हैं कि लड़की से ख़ानदान आगे कैसे बढ़ेगा? महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार लाने के लिए सबसे पहले इस विचारधारा को बदलने की ज़रूरत है.
मेघना मलिक, टीवी कलाकार

बेटियों की घटती संख्या को उजागर करते आंकड़े

  • 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या स़िर्फ 914 रह गई है, जो आज़ादी के बाद से सबसे कम है.
  • 2001 में ये तादाद 927 थी.
  • सबसे बदतर हालात हरियाणा में हैं. यहां लड़कियों का अनुपात स़िर्फ 861 है.
  • युनाइटेड नेशंस पॉप्युलेशन फंड एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक, अकेले महाराष्ट्र में हर साल क़रीब 55,000 लड़कियों को जन्म से पहले मार दिया जाता है.
  • महाराष्ट्र में साल 2001 में प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों कि संख्या 913 थी जो 2011 में घटकर 883 हो गई.

– कंचन सिंह