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मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूं,
इतनी रुखाई कभी मत देना.

कविता की चंद लाइनें अपने आप कह जाती हैं कि ये किसी महान हस्ती द्वारा रचित हैं. ख़ुद लाइनें भी गौरवांन्वित हो उठती हैं, जब अटल जैसा कोई उन्हें पन्नों पर स्याही से उकेरता है. जी हां, कविता की ये चंद लाइनें हम आपके लिए लाए हैं. अपनी कविता की लाइन की ही तरह एक अद्भुत और अटल व्यक्तिव के धनी अटल बिहारी वाजपेयी जी को मेरी सहेली की ओर से जन्मदिन की हार्दिक बधाई! आइए, आज के इस स्पेशल डे पर जानते हैं अटल जी से जुड़ी कुछ ऐसी बातें, जो शायद ही आप जानते हों.

* 15 साल की उम्र में ही अटजी आरएसएस के फॉलोअर बन गए थे. ऐसे में वो वहां खाकी की हाफ पैंट पहनकर जाते थे. यह बात 1939 के आसपास की है. उस समय उनके पिता सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे, इसलिए अटलजी का वो खाकी पैंट पहनकर बाहर निकलना उनके पिता की जॉब के लिए नुक़सानदायक साबित हो सकता था, इसलिए उनकी बहन उनकी उस पैंट को कभी घर के बाहर, तो कभी घर में ही कहीं फेंक देती थीं.

* फैमिली और कुछ ख़ास दोस्त अटलजी को बापजी कहकर बुलाते हैं.

* वाजपेयी पहले भारतीय प्रधानंत्री हैं, जिन्होंने यूएन में पहली बार हिंदी में भाषण दिया.

* अच्छे इंसान होने के साथ-साथ वाजपेयी एक उम्दा कवि भी हैं.

* कानपुर के डीएवी लॉ कॉलेज में अटल बिहारी वाजपेयी और उनके पिता एक-साथ क़ानून की पढ़ाई किए. दोनों ने हॉस्टल का कमरा भी शेयर किया.

श्वेता सिंह 

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साल 1971… भारतीय इतिहास का गौरवमयी स्वर्णिम साल, जब भारतीय सेना ने अपना दमखम दिखाते हुए पाकिस्तानी सेना पर विजय प्राप्त की थी. भारतीय जवानों ने पाक के उस नापाक इरादे को कुचलते हुए देश का गौरव बढ़ाया था. अपनी जान की परवाह किए बिना भारतीय जवानों ने जी-जीन लगा दी थी. इसका परिणाम ये हुआ कि भारतीय सेना का परचम देश में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्‍व में लहराया. जवानों के उसी पराक्रम को हम विजय दिवस के रूप में मनाते हैं.

वर्तमान स्थिति की ही तरह उस बार भी पाक सैनिकों की ओर से लड़ाई का आगाज़ हुआ. हर बार चोरी-छुपे वार करनेवाले पाकिस्तानियों को लगा था कि वो इस युद्ध में जीत जाएंगे, लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत. बादलों की तरह गरजनेवाले पाक सैनिकों की हालत भारतीय जवानों ने कुछ ऐसी कर दी कि वो समझ ही नहीं पा रहे थे कि अब किया क्या जाए.

एक नज़र इतिहास के उन पन्नों पर
4 व 5 दिसंबर को जब दो हज़ार से ज़्यादा पाकिस्तानी सैनिक लोंगेवाला में नाश्ता, रामगढ़ में लंच और जोधपुर में डिनर का सपना लिए आधी रात को भारतीय सीमाओं की ओर बढ़ रहे थे, तो पंजाब रेजीमेंट के स़िर्फ 120 जवानों इन पाकिस्तानियों को खदेड़ दिया. उस युद्ध में पाकिस्तानियों को ऐसा लगा था जैसे वो भारतीय सेना को हराकर हमारे देश में विजय पताका फहराएंगे. पाकिस्तानियों की यही ग़लती उनकी सबसे बड़े हार की वजह बनी. भारतीय जवानों ने पाक सैनिकों का मनोबल कुछ ऐसा तोड़ा कि वो आत्मसमर्पण करने के लिए आतुर हो गए. लगभग 93 हज़ार सैनिक हथियार नहीं उठा पाए और 16 दिसंबर को पाकिस्तानी सेना के हज़ारों सैनिकों ने अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ पाकिस्तानी जनरल एके नियाजी सहित भारतीय सेना के समक्ष ढाका में आत्मसमर्पण किया.

देश के जवानों को हमारी शुभकामनाएं. सीमा पर आप हैं, तभी हम अपने घरों में चैन की सांस ले पा रहे हैं. मेरी सहेली (Meri Saheli) की ओर से हमारे शहीदों को शत शत नमन.

– श्वेता सिंह

Raj Kapoor

हिंदी सिनेमा को वास्तविकता के और क़रीब ले जाकर दर्शाने वाले शो मैन राज कपूर को मेरी सहेली (Meri Saheli) की ओर से जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं! राज कपूर… एक ऐसी हस्ती, जिसे स़िर्फ भारतीय ही नहीं, बल्कि विदेशी दर्शकों ने भी ख़ूब पसंद किया. आइए, जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ इंटरेस्टिंग बातें.

राज कपूर का नाम कुछ और था!
राज कपूर का पूरा नाम रणबीर राज कपूर है.

ऐक्टर और डायरेक्टर नहीं, बल्कि कुछ और बनना चाहते थे राज कपूर!
अभिनय और निर्देशन का लोहा मनवानेवाले शो मैन राज कपूर का लक्ष्य ऐक्टर बनना नहीं था, बल्कि वो तो किसी और विधा के मास्टर बनना चाहते थे. जी हां, राज कपूर म्यूज़िक डायरेक्टर बनना चाहते थे.

थप्पड़ से शुरू हुआ राज कपूर का करियर!
केदार शर्मा की फिल्म से राज कपूर ने बतौर क्लैपर बॉय फिल्मी पारी की शुरुआत की. इस फिल्म में राज कपूर ने इतनी तेज़ से क्लैपिंग की कि ऐक्टर की नकली दाढ़ी क्लैप में फंसकर गिर गई. इस पर केदार शर्मा ने राज कपूर को एक थप्पड़ मारा था.

किस उम्र में पहली फिल्म डायरेक्ट की?
अभिनय तो राज कपूर को अपने पिता से विरासत में मिली थी, लेकिन निर्देशन की कला पर किसी की मुहर नहीं. महज़ 24 साल की उम्र में ही राज कपूर फिल्म निर्देशक बन गए थे. आग उनकी पहली निर्देशित फिल्म थी. इस फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया था.

तो क्या पाकिस्तानी थे राज कपूर!
राज कपूर हिंदुस्तान नहीं, बल्कि पाकिस्तान में पैदा हुए थे. जी हां, वो पेशावर में पैदा हुए थे, जो अब पाकिस्तान में है.

क्या कम उम्र में ही बनाया था RK Films?
फिल्मों में क्लैप बॉय से अपनी जर्नी शुरू करनेवाले राज कपूर ने महज़ 24 साल की उम्र में ही अपना फिल्म बैनर RK Films बनाया.

आख़िर क्यों अपनी हिरोइनों को स़फेद साड़ी पहनाते थे राज साहब?
शो मैन राज कपूर को स़फेद साड़ी बहुत पसंद थी. असल में इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है. बचपन में राज साहब ने एक महिला को स़फेद साड़ी में देखा और उस पर उनका दिल आ गया. फिर क्या था अपनी हिरोइनों को राज साहब स़फेद साड़ी ज़रूर पहनाते थे.

क्या अपनी फिल्मों में निजी ज़िंदगी के कुछ पल ज़रूर डालते थे शो मैन?
राज कपूर रियल शो मैन थे. शायद इसीलिए अपनी कई फिल्मों में वो कोई ऐसा सीन ज़रूर रख देते थे, जो उनके निजी ज़िंदगी का कभी हिस्सा रहा हो. फिल्म बॉबी का वो सीन तो आपको याद ही होगा, जब पहली बार ऋषि कपूर डिंपल कपाड़िया से उसके घर मिलते हैं. डिंपल दरवाज़ा खोलती हैं और उनके चेहरे पर आटा लगा होता है. असल में यह सीन राज कपूर और नरगिस के रियल लाइफ का हिस्सा था.

किसको टैक्सी कहकर बुलाते थे राज कपूर?
राज कपूर जब सत्यम-शिवम- सुंदरम फिल्म बना रहे थे, उस समय उनके छोटे भाई शशि कपूर दिन में 3-3 शिफ्ट में काम करते थे. इससे राज कपूर को अपनी फिल्म के लिए समय नहीं मिल पा रहा था, चूंकि शशि ही लीड रोल में थे. ऐसे में उनका काम फिल्म में ज़्यादा था, लेकिन उनके समय न दे पाने पर एक दिन राज कपूर ने शशि कपूर को कहा कि शशि टैक्सी है, जो दिनभर चलता है.

आख़िर क्यों रूस में राज कपूर की टैक्सी अचानक हवा में चलने लगी?
अब इसे राज कपूर की दीवानगी ही कहेंगे. बात उस समय की है जब राज साहब फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए रशियन सर्कस से बात कर रहे थे. उस समय राज कपूर लंदन में थे और बिना वीज़ा के ही वो मास्को पहुंच गए. बिना किसी पूर्व सूचना के वो वहां पहुंचे थे, इसलिए उनके स्वागत के लिए कोई नहीं था. फिर राज कपूर एयरपोर्ट से बाहर निकले और टैक्सी ले लिया. टैक्सी चल ही नहीं रही थी. तब अचानक राज कपूर का ध्यान गया कि टैक्सी चलने की बजाय हवा में थी. राज कपूर के फैन्स ने टैक्सी को अपने कंधे पर उठा लिया था.

– श्वेता सिंह