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या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

देवी कूष्मांडा अष्टभुजा से युक्त है,
इसलिए इन्हें अष्टभुजा भी कहा जाता है.
जिस तरह से ब्रह्माचारिणी व चंद्रघंटा देवी
की पूजा-अर्चना की जाती है,
उसी तरह से कूष्मांडा देवी की पूजा का विधान है.
इनकी पूजा करने से आयु, यश व आरोग्य त कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्.
सिंहरूढा अष्टभुजा कुष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्.
कमण्डलु चाप, बाण, पदमसुधाकलश चक्र गदा जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीया कृदुहगस्या नानालंकार भूषिताम्.
मंजीर हार केयूर किंकिण रत्नकुण्डल मण्डिताम्.
प्रफुल्ल वदनां नारू चिकुकां कांत कपोलां तुंग कूचाम्.
कोलांगी स्मेरमुखीं क्षीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ॥

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स्त्रोत मंत्र

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनीम्.
जयंदा धनदां कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्.
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुंदरी त्वंहि दु:ख शोक निवारिणाम्.
परमानंदमयी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

कवच मंत्र

हसरै मे शिर: पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्.
हसलकरीं नेत्रथ, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे वाराही उत्तरे तथा.
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम.
दिग्दिध सर्वत्रैव कूं बीजं सर्वदावतु॥

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Devi Kushmanda

या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा देवी की पूजा की जाती है.
देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है.
इनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है,
इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है.
इनके दस हाथ हैं, जो कमल, धनुष-बाण, कमंडल,
त्रिशूल, गदा, खड्ग, अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं.
चंद्रघंटा देवी की सवारी सिंह है.

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पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता

इस दिन सांवली रंगत की महिला को घर बुलाकर पूजा-अर्चना करें.
भोजन में दही-हलवा आदि खिलाएं.
कलश व मंदिर की घंटी भेंट करें.
इनकी आराधना करने से निर्भयता व सौम्यता दोनों ही प्राप्त होती है.
इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों की प्रेतबाधा से रक्षा करती है.

                           स्त्रोत मंत्र

ध्यान वन्दे वाच्छित लाभाय चन्द्रर्घकृत शेखराम।
सिंहारूढा दशभुजां चन्द्रघण्टा यशंस्वनीम्घ
कंचनाभां मणिपुर स्थितां तृतीयं दुर्गा त्रिनेत्राम।

खड्ग, गदा, त्रिशूल, चापशंर पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्घ
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्यां नानालंकार भूषिताम।
मंजीर हार, केयूर, किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्घ
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुग कुचाम।

कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटिं नितम्बनीम्घ
स्तोत्र आपद्धद्धयी त्वंहि आधा शक्तिरू शुभा पराम।
अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यीहम्घ्
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्ट मंत्र स्वरूपणीम।

धनदात्री आनंददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्घ
नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायनीम।
सौभाग्यारोग्य दायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्घ्
कवच रहस्यं श्रणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।

श्री चन्द्रघण्टास्य कवचं सर्वसिद्धि दायकम्घ
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोद्धरं बिना होमं।
स्नान शौचादिकं नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिकमघ
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च।

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Devi Chandraghanta

सिद्धि प्राप्ति के लिए नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है.

या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप भक्तों व सिद्धों को अनंत फल देनेवाला है.
देवी ब्रह्मचारिणी हिमालय व मैना की पुत्री हैं.
इन्होंने भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी.
इस कठिन तपस्या के कारण ही इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा.
इन्हें त्याग व तपस्या की देवी माना जाता है.
इनके दाहिने हाथ में अक्षमाला और बाएं हाथ में कमंडल है.

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इनकी पूजा-अर्चना करने से हमारे जीवन में तप, संयम, त्याग व सदाचार की वृद्धि होती है.
इनकी पूजा करने से पहले हाथ में एक फूल लेकर यह प्रार्थना करें-

दधाना करपप्राभ्यामक्षमालाकमण्डलू l
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्माचारिण्यनुत्तमा ll

इसके बाद देवी को पंचामृत से स्नान कराकर
फूल, अक्षत, रोली, चंदन, कुमकुम अर्पित करें.
देवी को अरूहूल (लाल रंग का एक विशेष फूल) का फूल विशेष रूप से पसंद है, इसलिए हो सके, तो इसकी माला बनाकर पहनाएं.
मान्यता के अनुसार, इस दिन ऐसी कन्याओं की पूजा व आवभगत की जाती है, जिनका विवाह तय हो गया है, पर अभी शादी नहीं हुई है. इन्हें घर बुलाकर पूजन के बाद भोजन कराकर वस्त्र उपहार स्वरूप दिया जाता है.

देवी ब्रह्मचारिणी ब्रह्म स्वरूप है. यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है यानी तपस्या का मूर्तिमान स्वरूप है.
ये कई नाम से प्रसिद्ध हैं, जैसे-
तपश्‍चारणी, अपर्णा, उमा आदि.

आप सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएं!..

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एक घर में नौ महिलाएं एक साथ रहती हैं. हर किसी की अपनी कहानी और दर्द है. इसमें काजोल, नेहा धूपिया, श्रुति हसन, नीना कुलकर्णी की अदाकारी की बहुत तारीफ़ हो रही है. नारी की पीड़ा, बलात्कार व संघर्ष को पूरी ईमानदारी व गंभीरता से दिखाया गया है.

इस घर में रह रही स्त्रियां अलग भाषा, पहनावे और धर्म से हैं. कोई शिक्षित है, तो कोई अनपढ़. किसी को अंग्रेज़ी की लत है, तो किसी को अल्कोहल की. सभी महिलाएं एक कमरे में बैठ बहस कर रही हैं. इसमें कुछ शांत हैं, तो कोई बोल नहीं पाती है. सभी नारियां आपस में वाद-विवाद कर रही हैं कि बाहर जो है, उसे घर के अंदर लेना है या नहीं. सबके अपने तर्क और मजबूरियां है. काजोल की भाव-भंगिमाएं और अभिनय लाजवाब है.

देवी में एक संदेश देने की कोशिश की गई है. हर पूर्वाभास से परे होकर हमें एकजुट होकर रहना चाहिए. फिल्म को लोगों का अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. काजोल, नेहा धूपिया, श्रुति हसन अपने स्तर पर इसका प्रमोशन कर ही रही हैं.

देवी की निर्देशक प्रियंका बनर्जी ने थोड़े में बहुत बड़ी बात कह दी है. वे इस शॉर्ट फिल्म की लेखिका भी हैं. इसमें जितनी भी महिला क़िरदार हैं, सभी ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है. टॉप पर काजोल तो हैं ही उनके साथ नेहा धूपिया, श्रुति हसन, नीना कुलकणी, मुक्ता बर्वे, शिवानी रघुवंशी, रमा जोशी, यशस्वनी दयामा, संध्या महात्रे हैं. अंत में महिलाओं से जुड़े बलात्कार के चौंकानेवाले कुछ आंकड़े भी दिए गए हैं, जो हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है.

आज इस बात की सख़्त ज़रूरत है कि नारी को देवी तुल्य कह देना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें उस तरह का सम्मानीय दर्जा देना भी ज़रूरी है. देवी हमारे रवैए और सोच पर भी हमें सवालों के कठघरे में खड़ा करती है. आइए, देखते हैं देवी…

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आज की नारी हर चुनौती का सामना साहस व सकारात्मक सोच के साथ कर रही है. चाहे परेशानियां व उलझन हो या मेहनत व कोशिशों का लंबा सफ़र वह पीछे नहीं हटती. कुछ ऐसा ही जज़्बा देवी शॉर्ट फिल्म में देखने को मिलेगा. नौ महिलाओं पर आधारित इसका फर्स्ट लुक बेहद दिलचस्प है. इसमें काजोल ख़ास अंदाज़ में नज़र आ रही हैं. काजोल और श्रुति हसन की यह पहली शॉर्ट फिल्म है. देवी की कहानी और निर्देशन की बागडोर प्रियंका बनर्जी ने संभाली है.

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जिन नौ स्त्रियों की कहानी दिखाई गई है, इनमें काजोल, श्रुति हसन, नेहा धूपिया, नीना कुलकर्णी, शिवानी रघुवंशी, संध्या म्हात्रे, रमा जोशी, यशस्विनी दयामा और मुक्ता बावरे हैं. ये सभी एक छोटे-से कमरे में रहती हैं. सभी की अपनी-अपनी दर्दभरी कहानियां है. वे अपनी ज़िंदगियों के उतार-चढ़ाव के साथ अपनी-अपनी ख़ुशी व ग़म भी एक-दूसरे से साझा करती हैं. आज के संदर्भ में भी यह कहानी सटीक भी बैठती है. नारी होने का दर्द, उनकी ख़्वाहिशें, कुछ कर गुज़रने का जुनून यानी नारी के हर रंग-रूप को कम समय में पूरी तरह से दिखाने की कोशिश की गई है देवी में.

देवी से जुड़े अपने अनुभव को साझा करते हुए काजोल कहती हैं कि उन्हें इस बात की बेहद ख़ुशी है कि वे देवी में ज्योति के क़िरदार को निभा पाईं. आज की तारीख़ में जहां शोषण, अत्याचार, लिंग भेद जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, ऐसे में देवी जैसी फिल्म का दिखाया जाना बहुत ही ज़रूरी हो गया है. डायरेक्टर प्रियंकाजी ने बहुत ही ख़ूबसूरती से इन मुद्दों को फिल्म में दिखाया है.

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तस्वीर में दिखाया गया हर चेहरा मानो कुछ कह रहा है. अपनी ज़िंदगी की शोर मचाती परेशानियों को किस कदर ख़ामोशी से अपने चेहरे की भाव-भंगिमाओं से बयां करने की कोशिश वाकई में लाजवाब है. निर्देशिका प्रियंका बनर्जी को बहुत-बहुत बधाई, जो उन्होंने इन नौ चहरों को एक फ्रेम में बड़ी ख़ूबसूरती से सजाया है.

अधिकतर हर शॉर्ट फिल्म की यह ख़ूबी रहती है कि वे बहुत थोड़े में अपनी अधिकतर बातों को रखते हैं. इस कसौटी पर देवी पूरी तरह से खरी उतरती है. देवी शब्द से ही हमारे दिलोदिमाग़ में देवी की प्रतिमूर्ति घूमने लगती है. अब इस देवी टाइटल को किस तरह परिभाषित किया गया है, यह तो फिल्म देखने पर ही जान पाएंगे.

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काजोल लंबे अरसे के बाद फिल्मों में अचानक ख़ूब सक्रिय हो गई हैं. हाल ही में रिलीज़ हुई उनकी फिल्म तानाजी- द अनसंग वॉरियर ने तो मात्र हफ़्तेभर के अंदर सौ करोड़ का बिज़नेस कर लिया. ख़ुशी की बात यह भी रही कि इसे उत्तर प्रदेश व हरियाणा में टैक्स फ्री भी कर दिया गया. इसके लिए अजय देवगन और काजोल ने दोनों प्रदेश की सरकारों को धन्यवाद भी कहा. दरअसल, अजय देवगन इस फिल्म के प्रोडयूसरों में से एक हैं.

 

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14 जनवरी 1926 में अविभाजित भारत के ढाका में एक बच्ची का जन्म हुआ. तब किसे पता था कि आगे चलकर वो नन्हीं परी महाश्‍वेता देवी बन जाएगी, जिनकी रचनाएं समाज के लिए आईने का काम करेंगी. इस महान लेखिका और समाज सेविका को मेरी सहेली की ओर से शत-शत नमन. महाश्‍वेता देवी पहले एक स्कूल में पढ़ाती थीं, लेकिन उन्हें लगा कि इससे काम नहीं चलेगा, इसलिए आगे चलकर उन्होंने पढ़ाना छोड़ दिया और अपना पूरा टाइम लेखन और समाज सेवा में लगा दिया.

महाश्वेता देवी की कलम की बेबाकी ने उन्हें समाज के एक ऐसे हिस्से का मसीहा बना दिया, जिनका अस्तित्व न के बराबर रहा. अपनी कलम से उन्होंने ग़रीबों के स्थिति का रेखाचित्र खींचा और बड़े तबके तक पहुंचाया. महाश्‍वेता को लोग मां कहकर बुलाते थे. उनकी कई ऐसी रचनाएं थीं, जिन्होंने समाज को ये सोचने पर मजबूर कर दिया. अपने अंतिम दिनों में महाश्‍वेता कई बीमारियों से परेशान थीं और अंत में जुलाई के महीने में साल 2016 में उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया. भले ही वो अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कृतियां पग-पग पर लोगों को राह दिखाती रहेंगी.

इनकी कई रचनाओं पर फ़िल्म भी बनाई गई. इनके उपन्यास रुदाली पर कल्पना लाज़मी ने रुदाली तथा हज़ार चौरासी की मां पर इसी नाम से 1998 में फिल्मकार गोविन्द निहलानी ने फ़िल्म बनाई.

महाश्वेता देवी ने आदिवासियों के लिए बहुत काम किया. इसमें बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात के आदिवासी आते थे. उन्होंने किसानों की ज़मीन को बड़े लोगों के हाथ बेचने का विरोध किया. कलम के साथ-साथ वो ख़ुद भी समाज के हर तपके लिए काम करती रहीं.

महाश्वेता देवी को 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1986 में पद्मश्री, 1997 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. ज्ञानपीठ पुरस्कार इन्हें नेल्सन मंडेला के हाथों दिया गया. इस पुरस्कार में मिले 5 लाख रुपये इन्होंने बंगाल के पुरुलिया आदिवासी समिति को दे दिया था. उनकी यही आदत उन्हें लोगों में अमर कर गई.

श्वेता सिंह