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चिल्ड्रेंस डे स्पेशल: कम करें बच्चों का इमोशनल बोझा (Children’s Day Special: Reduce The Emotional Burden Of Children)

सभी पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में टॉप करे, स्पोर्ट्स में अव्वल आए और एक्स्ट्रा करिकुलर में भी बेस्ट करे यानी कुल मिलाकर ऑलराउंडर बन जाए. लेकिन जब बेचारा बच्चा ऐसा नहीं कर पाता, तो पैरेंट्स उस पर अपना इमोशनल बोझा लादना शुरू कर देते हैं, जिससे बच्चे परेशान हो जाते हैं. क्या है पैरेंट्स का ये इमोशनल बोझा और कैसे बचें, इससे आइए जानते हैं. 

Children’s Day Special

क्या है इमोशनल बोझा?

अपेक्षाएं रखना मानवीय स्वभाव है, पर उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए अत्यधिक भावनात्मक दबाव डालना ही इमोशनल बोझा है. बच्चे अति संवेदनशील होते हैं. ऐसे में पैरेंट्स अगर उन पर अपने सपने और वो सब कुछ करने की ज़िम्मेदारी लगातार थोपते रहते हैं, जो वो कभी नहीं कर पाए, तो बच्चों पर इमोशनल दबाव बहुत बढ़ जाता है, जो उनके मानसिक विकास के लिए ठीक नहीं है.

तरह-तरह के इमोशनल बोझ

मेरा बच्चा बड़ा होकर इंजीनियर बनेगा: सर्वे में भी यह बात साबित हो चुकी है कि ज़्यादातर भारतीय पैरेंट्स अपने बच्चों को इंजीनियर बनाना पसंद करते हैं. आज भी यह परंपरागत सोच बच्चों को कुछ नया करने से रोकती है. बच्चे के हुनर को पहचाने बगैर अपना सपना उस पर थोपना बोझा लादना ही है.

हमारे परिवार में सब डॉक्टर ही बनते हैं: माता-पिता डॉक्टर हों, तो बच्चे को भी मेडिकल ही पढ़ाते हैं. वो चाहते हैं कि उनका बच्चा उनसे भी बड़ा डॉक्टर बने और अपना ख़ुद का अस्पताल खोले. ज़्यादातर बच्चे पैरेंट्स की इच्छा समझ उसी में जुट जाते हैं, पर हर कोई सफल नहीं हो पाता. अपने मन का न कर पाने की छटपटाहट नकारात्मक रूप से ग़ुस्से और चिड़चिड़ेपन के रूप में बाहर निकलती है.

तुम्हें हमेशा टॉप करना है: ये बहुत ख़तरनाक बोझा है, जो हर पैरेंट अपने बच्चों के सर पर रखते हैं. बच्चा अगर औसत हो, तो कितनी भी कोशिश कर ले, पढ़ाई में बहुत अच्छा नहीं कर पाएगा. हो सकता है, वो खेलकूद में अच्छा हो, आर्ट या म्यूज़िक में अच्छा कर पाए. अकैडमिक स्कोर के चक्कर में बच्चे पर बेवजह बोझा न लादें.

हमें तुमसे बहुत उम्मीदें हैं: बच्चों से अपेक्षाएं और उम्मीदें रखना बिल्कुल ग़लत नहीं, पर हर व़क्त यह जताते रहने से उन पर भावनात्मक दबाव पड़ता है. उनके मन में डर बैठने लगता है, जिससे उनका आत्मविश्‍वास डगमगाने लगता है. डर और आत्मविश्‍वास की कमी से बच्चे एंज़ायटी से जूझने लगते हैं.

टूटे परिवार का बोझ: माता-पिता के टूटे रिश्ते का असर बच्चों पर इस प्रकार पड़ता है कि वो भावनात्मक रूप से काफ़ी संवेदनशील हो जाते हैं. शादी-ब्याह से विश्‍वास उठ जाना, दुनिया में सब मतलबी होते हैं, प्यार जैसा कुछ नहीं होता आदि भावनाएं उनमें घर कर लेती हैं.

एग्ज़ाम टाइम को कर्फ्यू में तब्दील कर देना: कुछ पैरेंट्स एग्ज़ाम टाइम में बच्चों को बाहरी दुनिया से पूरी तरह डिस्कनेक्ट कर देते हैं. परीक्षा मतलब स़िर्फ पढ़ाई करना हो जाता है. ऐसा माहौल बच्चों के लिए मुश्किलोंभरा हो जाता है, तभी तो वो बाहर जाने और वहां से निकलने के लिए छटपटाने लगते हैं, इसलिए एग्ज़ाम  को हौवा न बनाएं.

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बच्चों में होनेवाले नकारात्मक बदलाव

एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ इमोशनल बोझ का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण उनमें कुछ बदलाव नज़र आते हैं. अगर आपके बच्चे में भी ये लक्षण नज़र आते हैं, तो किसी चाइल्ड काउंसलर से मिलें.

* एकाग्रता में कमी होना

* छोटी-छोटी बातों पर ओवर रिएक्ट करना

* होमवर्क करने में दिलचस्पी न दिखाना

* हर व़क्त ग़ुस्सा और चिड़चिड़ापन रहना

* जो भी कहा जाए, उसका उल्टा करना

* हर व़क्त गुमसुम रहना

* वायलेंट गेम्स खेलना

* अचानक कम या ज़्यादा खाना शुरू करना

यह भी पढ़ेएग्ज़ाम गाइड- कैसे करें परीक्षा की तैयारी? (Exam Guide- How To Prepare For The Examination?)

डिप्रेशन-एंज़ायटी के बढ़ते मामले

बच्चों में बढ़ते इमोशनल दबाव का ही प्रभाव है कि बढ़ती उम्र के बच्चे एंज़ायटी और डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं और जो बच्चे इनसे जूझ नहीं पाते, वो आत्महत्या जैसा गंभीर कदम भी उठा लेते हैं.

हर घंटे एक विद्यार्थी कर रहा है आत्महत्या

2015 में आए नेशनल ब्यूरो ऑफ क्राइम रिकॉर्ड्स के मुताबिक़, हमारे देश में हर साल 8,934 विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं यानी लगभग हर घंटे एक छात्र. यह आंकड़ा हमारे लिए बेहद चिंता का विषय है, क्योंकि न स़िर्फ परिवार के रूप में बल्कि एक सभ्य समाज के रूप में भी यह हमारी हार है.

Children’s Day Special

कैसे कम करें इमोशनल बोझा?

* स्कूलों में वैसे ही पढ़ाई का बहुत ज़्यादा दबाव बच्चों पर रहता है, आप भी उसे बहुत ज़्यादा अलग-अलग क्लासेस में लगाकर इंगेज न रखें. उसे खेलने-कूदने और परिवार के साथ समय बिताने का पर्याप्त समय मिले, इसका ध्यान रखें.

* हर बात पर बच्चों को यह कहकर इमोशनली ब्लैकमेल न करें कि हमारे समय पर ऐसा होता था, हम तो ये करते थे, वो करते थे. आपको समझना होगा कि आपका ज़माना अलग था और बच्चे का समय अलग है. आपको आज के बदलते माहौल को ध्यान में रखकर उसे उदाहरण देने चाहिए.

* यूनिट टेस्ट हो या सेमिस्टर एग्ज़ाम, उसका हौवा न बनाएं. बच्चा पहले से ही एग्ज़ाम के नाम से डरा होता है. आप ऐसा माहौल बनाकर उसे और डरा देते हैं. ऐसा न करें. एग्ज़ाम टाइम में भी घर का माहौल सामान्य रखें. बच्चों को स्ट्रेस फ्री होने के लिए थोड़ा फ्री टाइम भी दें.

* ज़्यादातर मांएं इमोशनल कार्ड खेलती हैं. दूसरों के बच्चों के उदाहरण दे-देकर बच्चों पर और दबाव डालती हैं. आपको समझना होगा कि हर बच्चा अलग और ख़ास होता है. आपके बच्चे में जो ख़ूबियां हैं, शायद ये ख़ूबियां उस बच्चे में न हों, तो तुलना किस बात की.

* वर्किंग कपल्स के बच्चों की परवरिश एक बड़ा टास्क है. उन्हें समय न दे पाना और उनके लिए हर व़क्त मौजूद न रहनेवाली भावना उन्हें इस कदर इमोशनल बना देती है कि वो बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा छूट दे देते हैं. यह भी सही नहीं है. बच्चों की सही परवरिश के लिए नियमों से लेकर पैंपरिंग तक को संतुलित रखना ज़रूरी है.

 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैरेंट्स की उम्मीदों का दिलचस्प डाटा

एचएसबीसी द्वारा की गई स्टडी ‘होप्स एंड एक्सपेक्टेशन ऑफ पैरेंट्स ऑन देयर चिल्ड्रेन्स एजुकेशन’ में दुनिया के अलग-अलग देशों में बच्चों की पढ़ाई और करियर से जुड़ी बातों पर दिलचस्प डाटा तैयार किया गया है. आप भी देखें फैक्ट्स.

* भारत के 51% पैरेंट्स चाहते हैं कि उनके बच्चों का सक्सेसफुल करियर हो, जबकि बाकी देशों में बच्चों की ख़ुशी और अच्छी लाइफस्टाइल को ज़्यादा तवज्जो दिया जाता है.

* जब भारतीय पैरेंट्स को अपने बच्चे के लिए तीन सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित करने के लिए कहा गया, तो 51% ने सफल करियर, 49% ने जीवन में ख़ुशहाली, 33% ने स्वस्थ जीवनशैली और 22% ने कहा कि इतना कमा ले, जिससे ज़िंदगी

आसानी से जी सके और स़िर्फ 17% ने कहा कि वो अपनी काबीलियत के अनुसार जो भी करना चाहे, उसमें वो मदद करेंगे.

* वहीं अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पैरेंट्स ने सफल करियर को उतनी तवज्जो नहीं दी. यहां स़िर्फ 17% पैरेंट्स ने सफल करियर की बात कही.

* बच्चे की ख़ुशी के मामले में दुनिया के ज़्यादातर देश हम भारतीयों से आगे हैं. जहां फ्रांस में 86%, कनाडा में 78%, इंग्लैंड में 77%, यूएई में 60% हॉन्गकॉन्ग में 58% और इंडोनेशिया में 56% है, वही आंकड़ा भारत में 49% है यानी हमें अपने बच्चों की ख़ुशी का और ध्यान रखना होगा.

* जब बात शिक्षा की हो, तो ज़्यादातर भारतीय पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर इंजीनियर बने, जबकि ‘मैन्यूफैक्चरिंग का हब’ कहे जानेवाले चीन में भी पैरेंट्स इंजीनियरिंग को उतनी तवज्जो नहीं देते, जितना हमारे देश में. हमारे देश के पैरेंट्स की रुचि को देखें, तो 23% इंजीनियरिंग, 22% फाइनांस, 16% कंप्यूटर और इंफॉर्मेशन साइंस, 14% मेडिकल और 2% अपने बच्चों को लॉ पढ़ाना चाहते हैं.

* भारत में 88% पैरेंट्स बच्चों को मास्टर्स या पीएचडी करवाना चाहते हैं, जबकि बाकी देशों में बारहवीं के बाद कोई कोर्स या डिग्री को लोग ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं. हायर एजुकेशन की लालसा सभी पैरेंट्स को नहीं होती.

– संतारा सिंह

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide

बीमार न होने दें मन को (Take Care Of Your Emotional Health)

सारी हसरतें पूरी नहीं होतीं, कुछ ख़्वाब अधूरे भी रह जाते हैं, ज़िंदगी में सब कुछ मनचाहा ही हो यह ज़रूरी तो नहीं, ज़िंदगी को भी तो कभी मनमानी करने दें… ख़्वाहिशों पर बंदिशें तो नहीं लग सकतीं, लेकिन उनकी पूरी होने की शर्त क्यों? अगर शर्त रखेंगे, तो जी ही नहीं पाएंगे, भावनाओं में बहते जाएंगे और मन से बीमार हो जाएंगे. मन भी तो बहुत कुछ सहेजकर, संजोकर रखता है… जब सब कुछ मनचाहा नहीं होता, तो उसका सीधा असर मन पर ही तो होता है. ऐसे में ज़रूरी है अपने मन की सेहत का ख़्याल रखें और अपने मन को बीमार न पड़ने दें.

Family Health

हम अपने शरीर से बेहद प्यार करते हैं. यही वजह है कि उसे सजाते हैं, संवारते हैं, उसका हर तरह से ख़्याल रखते हैं. जब कभी शरीर में तकलीफ़ हो जाए, तो डॉक्टर के पास भी जाते हैं, एक्स्ट्रा केयर करते हैं. इसी तरह से जब हमारा मन बीमार पड़ता है, तो हम क्या करते हैं? हम में से अधिकांश लोगों का जवाब होगा कि कुछ नहीं, क्योंकि मन भी कभी बीमार पड़ता है?

लेकिन सच तो यही है, जिस तरह तन बीमार पड़ता है, उसी तरह मन भी बीमार पड़ता है. उसे भी उस व़क्त एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन हम शायद समझ ही नहीं पाते कि हमारा मन बीमार हो गया है, इसलिए बेहतर होगा कि अपने मन का भी ख़्याल रखें, उसे बीमार न होने दें और अगर बीमार हो भी जाए, तो मन के डॉक्टर के पास जाकर उसका भी इलाज करवाएं.

क्या हैं मन की बीमारी के लक्षण?

डर और घबराहट: यह एक बड़ा लक्षण है आपके मन की बीमारी का. आपके मन में बेवजह असुरक्षा की भावना आने लगती है. अंजाना डर और घबराहट-सी बनी रहती है. लोगों पर भरोसा कम करने लगते हैं. एक अविश्‍वास की भावना पनपने लगती है.

नाराज़गी, ग़ुस्सा व दोषारोपण: अगर आप अपनी ज़िंदगी की तकलीफ़ों के लिए बार-बार दूसरों पर दोषारोपण करते हैं, नाराज़गी व ग़ुस्सा दिखाते हैं, तो समझ लीजिए कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है. आपको अपनी परिस्थितियों की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेनी होगी. माना, आपके साथ बुरा हुआ होगा, लेकिन दोषारोपण समाधान नहीं है. हम नकारात्मक परिस्थितियों में भी किस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं, यह हम पर निर्भर करता है. ज़िम्मेदारियों से भागना कोई हल नहीं.

अपराधबोध, शर्मिंदगी, पश्‍चाताप: आपने कुछ ग़लतियां की होंगी. ज़ाहिर-सी बात है, ज़िंदगी परफेक्ट नहीं होती, हम सभी ग़लतियों से ही सीखते हैं, लेकिन उसके लिए कब तक अपराधबोध, शर्मिंदगी व पश्‍चाताप की भावना मन में बनाए रखेंगे? आपको ख़ुद को भी माफ़ करना सीखना होगा. आप भगवान नहीं हैं और हो सकता है आपकी वजह से दूसरों को या आपको भी तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ा हो, पर कब तक ख़ुद को दोषी मानते रहेंगे? माफ़ी मांग लें और ख़ुद को भी माफ़ कर दें.

चिड़चिड़ापन और नकारात्मकता: नकारात्मक भावनाएं कई कारणों से हो सकती हैं, लेकिन वह आपका स्वभाव ही बन जाए, तो ये मन के बीमार होने का संकेत है. नकारात्मकता ही चिड़चिड़ेपन को बढ़ाती है. पैसा, जॉब, रिश्ते व सामाजिक दबाव कई कारण हैं, जो नकारात्मक भावनाएं पैदा करते हैं, पर आपको ख़ुद यह निर्णय लेना होगा कि किस तरह से नकारात्मकता के कारणों से आप दूर रह सकते हैं.

एडिक्शन: जब मन और भावनाएं कमज़ोर हो जाती हैं, तो हम कई तरह की लतों के शिकार हो जाते हैं. एडिक्शन हमें कुछ पलों की राहत देते हैं और हमें लगता है हमारे सारे दर्द दूर हो गए, लेकिन एडिक्शन्स जब हमें पूरी तरह से अपनी गिरफ़्त में ले लेते हैं, तो मन और तन दोनों पर भारी पड़ जाते हैं. बेहतर होगा अपने ग़मों का इलाज लतों में न ढूंढ़ें.

उदासीनता व थकान: हमेशा थकान व उदासी महसूस करना शरीर के नहीं, मन के बीमार होने का संकेत है. ऊर्जा महसूस न होना, निराशावादी रवैया अपना लेना… इस तरह की भावनाएं यही इशारा करती हैं कि आपको अब मन के डॉक्टर की ज़रूरत है.

डिप्रेशन और आत्महत्या के ख़्याल: किसी भी गतिविधि में मन न लगना, किसी से बात न करना, सामाजिक क्रियाकलापों से दूर होते जाना, खाना कम कर देना, थका-थका महसूस करना जैसे लक्षण गहरे अवसाद की ओर इशारा करते हैं. यही अवसाद आगे चलकर आत्महत्या के ख़्यालों को जन्म देने लगता है. आपको लगने लगता है कि आपकी किसी को ज़रूरत नहीं, आपसे कोई प्यार नहीं करता… और यदि इस दौरान सही इलाज न करवाया जाए, तो आप ख़ुद अपनी जान के दुश्मन तक बन सकते हैं.

भावनात्मक कमज़ोरी: बात-बात पर रो देना, ख़ुद को असहाय व बेचारा महसूस करना मन की बीमारी का गहरा संकेत है. आपको लगता है कि कोई भी आपको प्यार नहीं कर सकता व अपना नहीं सकता. धीरे-धीरे आप लोगों से दूरी बनाने लगते हैं और अपनी ही परिधि में ़कैद हो जाते हैं. अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करते, ख़ुद मन ही मन घुटते रहते हैं.

सामाजिक गतिविधियों से दूर होना: आप पार्टीज़ में जाना बंद कर देते हैं, दोस्तों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों की ब्याह-शादी में न जाना… इस तरह से ख़ुद को आप समाज से काटने लगते हैं, क्योंकि आपको लगता है सभी आपके दुश्मन हैं और आपको कोई अपनाने को तैयार नहीं. ऑफिस पिकनिक हो या सोसायटी का गेट-टुगेदर, आपका मन कहीं नहीं लगता. हो सकता है आपकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी न हो, पर यह कोई समाधान नहीं.

हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाना: आपका मस्तिष्क पूरी तरह से बंद होने लगता है और हर तरह के निगेटिव ख़्याल ही आपको घेरे रहते हैं. अगर उम्मीद व आशा की किरण हो भी, तब भी आप प्रयास करने बंद कर देते हैं, क्योंकि आप पूरी तरह हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाते हैं. आप पहले ही सोच लेते हैं कि प्रयास करने से भी कुछ नहीं होगा और आप कोशिश ही नहीं करते.

शारीरिक तकली़फें: जब आपका मन बीमार होगा, तो ज़ाहिर है शरीर पर भी उसका असर नज़र आने लगेगा. सिरदर्द, पेट की तकली़फें, मांसपेशियों में दर्द व तनाव इसके प्रमुख लक्षण हैं. लेकिन अक्सर लोग शारीरिक लक्षणों के इलाज पर ध्यान देने लगते हैं, जबकि इनकी जो मुख्य वजह है, मन की बीमारी, उसको नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जिससे परेशानी और बढ़ जाती है.

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Family Care
कारण

मन की बीमारी के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक व ख़ुद का व्यक्तित्व भी ज़िम्मेदार हो सकता है.

–     हो सकता है आपकी नौकरी में समस्या हो या आपकी नौकरी चली गई हो और नई नौकरी अनेक प्रयासों के बाद भी न मिल रही हो, तो कई तरह के डर मन में हावी होने लगते हैं. भविष्य की चिंता, आर्थिक तंगी, समाज में तिरस्कार का डर आदि बातें आपको धीरे-धीरे नकारात्मक बनाने लगती हैं.

–     शादी या प्यार जैसा रिश्ता टूटने पर भी बहुत तकलीफ़ होती है. ऐसे में सामान्य बने रहना बेहद मुश्किल भी है, इसीलिए आप समाज से कटने लगते हैं. ख़ुद को एक दायरे में ़कैद कर लेते हैं. एडिक्शन का शिकार हो जाते हैं.

–     कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही ऐसा होता है कि वो अन्य लोगों के मुक़ाबले भावनात्मक व मानसिक रूप से कमज़ोर होते हैं. वो किसी भी नकारात्मक अनुभव का शिकार होते हैं, तो जल्द ही मानसिक रूप से बीमार हो जाते हैं.

–     बहुत अधिक ईर्ष्या या द्वेष भी आपके मन को बीमार करता है. किसी की कामयाबी से जलना, किसी की लाइफस्टाइल से ईर्ष्या करना सही नहीं. ख़ुद को पॉज़िटिव बनाएं, न कि एक निगेटिव व्यक्ति.

उपाय

–     अगर आप डर व घबराहट का शिकार हो रहे हैं, तो अपने डर के अनहेल्दी कारणों को पहचानें.

–     अनहेल्दी कारणों को हेल्दी बातों से रिप्लेस करना सीखें.

–     कहीं आप यह तो नहीं सोचने लगे कि यह दुनिया विश्‍वास के लायक ही नहीं. यह सोच ही अपने आप में एक्स्ट्रीम है. अपनी सोच को बदलें.

–     लोगों पर विश्‍वास करना सीखें.

–     पॉज़िटिव लोगों के साथ रहें. उन लोगों के संपर्क में रहें, जो आपकी हमेशा मदद करते हैं. आपको यह महसूस होगा कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते.

–     किसी बात को लेकर मन में शंका है, अपराधबोध है, तो बेहतर होगा अपनी शंकाएं बातचीत से दूर कर लें. बातों को मन में रखने से, भीतर ही भीतर कुढ़ने से नकारात्मकता ही बढ़ेगी.

–     माफ़ करना और माफ़ी मांगना सीखें.

–     अपने मन को पहचानें. अपने मन की बीमारी से भागें नहीं, उसका सामना करें और इलाज करवाएं.

–     जब कभी परिस्थितियों से भागने का मन हो, तो अपनी हॉबीज़ में मन लगाएं.

–     स्विमिंग, डान्सिंग, म्यूज़िक, ट्रेकिंग- ये तमाम चीज़ें एक तरह का मेडिटेशन हैं, जो आपको नकारात्मक भावनाओं से बाहर निकालकर पॉज़िटिव बनाने में मदद करती हैं.

–  नए दोस्त बनाएं, उनसे मिलेंगे तो ध्यान निगेटिव बातों से हटेगा.

–     कभी किसी शांत जगह जाकर छुट्टियां बिताएं.

–     मेडिटेशन और योग की शरण लें.

–     रोज़ाना लाइट एक्सरसाइज़ करें.

–     नकारात्मक लोगों से दूरी बनाए रखें.

–     अपने खानपान और इम्यूनिटी पर ख़ासतौर से ध्यान दें.

–     हेल्दी फूड खाएं, ताकि हार्मोंस असंतुलित न हों. हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करनेवाले फूड खाएं.

–     रिसर्च बताते हैं कि घर में पालतू बिल्ली या कुत्ता रखने से फील गुड हार्मोंस रिलीज़ होते हैं और स्ट्रेस हार्मोंस कार्टिसोल कम होते हैं. ये तरीक़ा भी आज़माया जा सकता है.

–     बेहतर होगा कि अपने मन की बात अपनों से शेयर करें. अगर ऐसा संभव न हो, तो बिना देर किए एक्सपर्ट के पास जाएं. फूड, जो बना देते हैं आपका मूड

–     डार्क चॉकलेट मूड ठीक करके डिप्रेशन दूर करता है. यह एंडॉर्फिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाता है और इसमें मौजूद कई अन्य तत्व भी फील गुड के एहसास को बढ़ानेवाले हार्मोंस को बढ़ाकर डिप्रेशन दूर करते हैं.

–     कार्बोहाइड्रेट्स सेरोटोनिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाते हैं और आपके मूड को बेहतर बनाकर हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करते हैं.

–     विटामिन बी बेहद ज़रूरी है हैप्पी हार्मोंस के रिलीज़ के लिए. शोध बताते हैं कि विटामिन बी6 की कमी से चिड़चिड़ापन, भूलने की समस्या, हाइपरएक्टिव हो जाना जैसी समस्याएं होती हैं. विटामिन बी12 भी ब्रेन बूस्टिंग तत्व है. आप विटामिन बी के लिए अपने डायट में हरी पत्तेदार सब्ज़ियां शामिल करें.

–     गाजर, दही, फिश, ड्रायफ्रूट्स, दालचीनी, अदरक, लहसुन, कालीमिर्च, जीरा, करीपत्ता आदि में भी हार्मोंस को संतुलित रखने के गुण होते हैं. इन सभी को अपने डेली डायट में शामिल करें.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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