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क्या आप भी बहुत जल्दी डर जाते हैं? (Generalized Anxiety Disorder: Do You Worry Too Much?)

किसी ने बहुत सही कहा है कि डर आपका सबसे बड़ा दुश्मन है. एक बार आपका डर आप पर हावी हो गया, तो बड़ी मुश्किल से पीछा छोड़ता है. रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जो हर छोटी-छोटी बात को लेकर डर या चिंता में रहते हैं, जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें अपनी सेहत से चुकाना पड़ता है. आप डर से न डरें और ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीएं, इसके लिए ज़रूरी है कि इस डर को समझें. क्या है यह एंज़ायटी डिसऑर्डर (Anxiety Disorder), आइए जानते हैं.

Generalized Anxiety Disorder

इन 10 बातों से सबसे ज़्यादा डरते हैं लोग?

हम सभी डरते हैं और डरना मानव स्वभाव भी है, पर क्या आप भी किसी बीमारी के बारे में सुनकर इतना डर जाते हैं कि लगता है कि अब बचेंगे नहीं या फिर कोई छोटी-सी समस्या आने पर ऐसा लगता है, जैसे सब बर्बाद हो गया, अब कुछ नहीं बचा?  इस तरह डरनेवाले लोग ढर्रे पर चलना पसंद करते हैं. ज़रा-सी परिस्थितियां प्रतिकूल हुई नहीं कि सब बेकार लगने लगता है. डर तो कई तरह के हैं, पर देखते हैं कि सबसे आम डर क्या हैं?

  1. कहीं मैं लेट न हो जाऊं?
  2. कहीं कुछ बुरा न हो जाए?
  3. अगर कोई इमर्जेंसी आ गई, तो कैसे संभालेंगे?
  4. कहीं मैं मोटी न हो जाऊं?
  5. अगर टेस्ट करवा लिया, तो कहीं कोई बीमारी न निकल आए?
  6. कहीं ज़िंदगी यूं ही धक्के खाते-खाते न निकल जाए?
  7. अगर मुझे सही जीवनसाथी नहीं मिला तो?
  8. मुझे कुछ हो गया, तो परिवार का क्या होगा?
  9. कहीं हमारे बीच कोई तीसरा ना आ जाए?
  10. क्या मुझे इससे अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी?
डर का होता है केमिकल रिएक्शन

आजकल हर व्यक्ति किसी न किसी बात से चिंतित या डरा हुआ रहता है, चाहे वो काम को लेकर हो, परिवार, पैसा, सेहत या फिर भविष्य की ही बात क्यों न हो. माना कि कुछ चीज़ों की चिंता करना ज़रूरी है, पर हर चीज़ को लेकर हमेशा मन को सशंकित रखना आपकी सेहत के लिए बिल्कुल ठीक नहीं. दरअसल, जब हम चिंताग्रस्त होते हैं, तो हमारे शरीर में कार्टिसोल नामक केमिकल का स्राव होता है, जो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करता है, जिससे हम आसानी से किसी इंफेक्शन या बीमारी की चपेट में आ जाते हैं.

ख़तरनाक है कार्टिसोल

रिसर्च में यह बात साबित हो गई है कि कार्टिसोल का डायबिटीज़, हार्ट प्रॉब्लम्स और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गंभीर बीमारियों से गहरा संबंध है. स्ट्रेस और डर के कारण आप न स़िर्फ डिप्रेशन और पैनिक डिसऑर्डर, बल्कि बाई पोलार डिसऑर्डर के शिकार भी हो सकते हैं.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ हम जिन बातों को लेकर डरे हुए रहते हैं या हमें जिनकी चिंता सताती रहती है, 96% मामलों में देखा गया है कि वह समस्या कभी हक़ीक़त में होती ही नहीं. हम बेवजह अपने दिमाग़ में ही उस समस्या को पालते-पोसते रहते हैं.

क्या है जनरलाइज़्ड एंज़ायटी डिसऑर्डर?

– छोटी-मोटी बातों पर घबराना या चिंता करना आम बात है, लेकिन जब व्यक्ति हर छोटी-से-छोटी बात पर घबराने या डरने लगे, तो उसे जनरलाइज़्ड एंज़ायटी डिसऑर्डर (जीएडी) कहते हैं. इससे पीड़ित व्यक्ति अपनी घबराहट या डर को कंट्रोल नहीं कर पाता, जिससे उसका मन किसी काम में नहीं लगता.

पहचानें इसके लक्षण

–     रोज़मर्रा के कामों को लेकर भी चिंता करना.

–     घबराहट और चिंता पर कंट्रोल न होना.

–     उन्हें भी पता होता है कि वो ज़रूरत से ज़्यादा परेशान हो रहे हैं.

–     असहज बने रहते हैं, जिससे जल्दी रिलैक्स नहीं हो पाते.

–     एकाग्र नहीं हो पाते.

–     बहुत जल्दी चौंक जाते हैं.

–     जल्दी नींद नहीं आती या फिर सुकूनभरी नींद नहीं ले पाते.

–     बहुत जल्दी थक जाते हैं या फिर हर व़क्त थका हुआ महसूस करते हैं.

–     सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, पेटदर्द या फिर शरीर के किसी हिस्से में बेवजह का दर्द.

–     खाना खाते समय निगलने में परेशानी होना.

–     चिड़चिड़ापन.

–     चक्कर आना.

–     बार-बार टॉयलेट जाना.

लक्षणों को देखकर बहुत से लोगों को लगेगा कि उनमें भी जीएडी है, पर ज़रूरी नहीं कि आप इससे पीड़ित हों. अगर हैं भी, तो कौन-सी बड़ी बात हो गई, हर किसी की तरह इसका भी तो समाधान है.

क्या हैं जीएडी के प्रमुख कारण?

एक्सपर्ट्स की मानें तो कुछ मामलों में इसका एक प्रमुख कारण आनुवांशिकता भी है. आपके मस्तिष्क और बायोलॉजिकल प्रोसेस डर और एंज़ायटी को तैयार होने में अहम् भूमिका निभाते हैं, हालांकि अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि क्यों कुछ परिवारों में ही लोग ज़्यादा डरते हैं, जबकि दूसरे परिवारवाले उतना नहीं डरते. इसके अलावा स्ट्रेस और बाहरी माहौल भी आपको डराने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

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Generalized Anxiety Disorder

कैसे कम करें अपने डर को?

एक बात अच्छी तरह समझ लें कि आप अपने डर को जितना ज़्यादा अनदेखा करेंगे, वह आपके सब कॉन्शियस माइंड में उतनी ही गहरी पैठ जमाएगा. अगर अपने डर से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो उसका सामना करें. डर से नज़रे मिलाएं और पूछें कि ज़्यादा से ज़्यादा वो क्या कर सकता है. यहां हम आपको अपने डर पर काबू पाने के कुछ स्मार्ट ट्रिक्स बता रहे हैं, तो आप भी इन्हें अपनाकर निडर, साहसी व सकारात्मक बनें.

– पेपर थेरेपी आज़माएं

सबसे पहले तो आपको जिस भी चीज़ या बात से डर लग रहा है, उसे डायरी में लिखें. लिखने से डर दिमाग़ से निकलकर पेपर पर आ जाता है, जिससे आपका दिमाग़ शांत होता है. अब उसे चार-पांच बार पढ़ें और फिर फाड़कर जला दें. आपको बहुत अच्छा महसूस होगा. यह एक तरह की थेरेपी भी है, जो आपके अंदर के डर को ख़त्म करती है.

–  बांट दें अपने डर को

जिस तरह लिखने से डर कमज़ोर लगने लगता है, वही हाल उसे बांट देने से भी होता है. किसी भी तरह का डर क्यों न हो, अपने किसी बड़े-बूढ़े या फिर दोस्तों से डिस्कस करें. बांटने से आपको बहुत से समाधान एक साथ मिल जाते हैं, जो शायद ही आपके दिमाग़ में आए हों.

–     थैंक्यू कहें, ख़ुश रहें

सुबह सोकर उठने पर और रात को सोने से पहले आपके पास जो भी है, उसके लिए ईश्‍वर को धन्यवाद कहने और आभार प्रकट करने से आत्मिक संतोष मिलता है, जिससे दिमाग़ में मौजूद डर की ओर आपका ध्यान नहीं जाता. धीरे-धीरे इसे रोज़मर्रा की आदत में शामिल करें. आपकी सोच सकारात्मक होने लगेगी और डर दूर होगा.

–    वर्तमान में जीने की आदत डालें

डर का अस्तित्व भूत या भविष्य से होता है. जितना ज़्यादा आप वर्तमान में जीने की कोशिश करेंगे, उतने ही ज़्यादा ख़ुश रहेंगे. इस व़क्त मैं कैसा महसूस कर रहा हूं? यह जो सांस चल रही है, कितनी अनमोल है, यह वातावरण में घुली ख़ुशबू, ये मधुर आवाज़, सब कुछ कितना अच्छा है. इसे अपनी आदत में शुमार करें. रोज़ाना थोड़ी देर, ख़ुद को महसूस करें. इसमें मेडिटेशन आपकी बहुत मदद करेगा.

–     अनिश्‍चितताओं को स्वीकारें

ज़िंदगी अगले क़दम क्या मोड़ लेगी, आप इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते. हमें पता नहीं कि कल हमारी सेहत कैसी होगी, कौन हमें प्यार करेगा, कौन अनदेखा करेगा, हमारे अपनों के क्या हालात होंगे- हमें कुछ भी नहीं पता. हमें स़िर्फ इतना पता है कि ज़िंदगी के हर पल को एंजॉय करना है. जब कुछ पता ही नहीं कि कल क्या होगा, तो डर किस बात का? क्या पता जिस चीज़ से हम डर रहे हैं, कल उसका अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए, इसलिए अनिश्‍चितताओं को स्वीकार करें और हर डर को ख़ुद से दूर कर दें.

–     नर्वस सिस्टम को शांत करें

जब हम लगातार डरे हुए रहते हैं, तो हमारा नर्वस सिस्टम हाई अलर्ट पर रहता है. मानसिक डर हमारे शरीर को बुरी तरह से प्रभावित करता है, इसलिए बेवजह मसल पेन होना, चक्कर आना और घबराहट जैसी भावनाएं महसूस होती हैं. इससे बचने का बेहतरीन तरीक़ा है फिज़िकल एक्टीविटीज़, एक्सरसाइज़, मेडिटेशन आदि.

–     छोड़ दें कंट्रोल

एक बात ध्यान में रखें कि आप जिस चीज़ के लिए डर रहे हैं और जिस तरह का माहौल है, उस पर आपका कोई कंट्रोल नहीं है. और जब कोई कंट्रोल ही नहीं, तो छोड़ दें उन्हें. उन पर कब्ज़ा जमाकर न रखें. याद रहे, जितना कम दिमाग़ में रखेंगे, उतना ज़्यादा हल्का महसूस करेंगे.

– अनीता सिंह

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बीमार न होने दें मन को (Take Care Of Your Emotional Health)

सारी हसरतें पूरी नहीं होतीं, कुछ ख़्वाब अधूरे भी रह जाते हैं, ज़िंदगी में सब कुछ मनचाहा ही हो यह ज़रूरी तो नहीं, ज़िंदगी को भी तो कभी मनमानी करने दें… ख़्वाहिशों पर बंदिशें तो नहीं लग सकतीं, लेकिन उनकी पूरी होने की शर्त क्यों? अगर शर्त रखेंगे, तो जी ही नहीं पाएंगे, भावनाओं में बहते जाएंगे और मन से बीमार हो जाएंगे. मन भी तो बहुत कुछ सहेजकर, संजोकर रखता है… जब सब कुछ मनचाहा नहीं होता, तो उसका सीधा असर मन पर ही तो होता है. ऐसे में ज़रूरी है अपने मन की सेहत का ख़्याल रखें और अपने मन को बीमार न पड़ने दें.

Family Health

हम अपने शरीर से बेहद प्यार करते हैं. यही वजह है कि उसे सजाते हैं, संवारते हैं, उसका हर तरह से ख़्याल रखते हैं. जब कभी शरीर में तकलीफ़ हो जाए, तो डॉक्टर के पास भी जाते हैं, एक्स्ट्रा केयर करते हैं. इसी तरह से जब हमारा मन बीमार पड़ता है, तो हम क्या करते हैं? हम में से अधिकांश लोगों का जवाब होगा कि कुछ नहीं, क्योंकि मन भी कभी बीमार पड़ता है?

लेकिन सच तो यही है, जिस तरह तन बीमार पड़ता है, उसी तरह मन भी बीमार पड़ता है. उसे भी उस व़क्त एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन हम शायद समझ ही नहीं पाते कि हमारा मन बीमार हो गया है, इसलिए बेहतर होगा कि अपने मन का भी ख़्याल रखें, उसे बीमार न होने दें और अगर बीमार हो भी जाए, तो मन के डॉक्टर के पास जाकर उसका भी इलाज करवाएं.

क्या हैं मन की बीमारी के लक्षण?

डर और घबराहट: यह एक बड़ा लक्षण है आपके मन की बीमारी का. आपके मन में बेवजह असुरक्षा की भावना आने लगती है. अंजाना डर और घबराहट-सी बनी रहती है. लोगों पर भरोसा कम करने लगते हैं. एक अविश्‍वास की भावना पनपने लगती है.

नाराज़गी, ग़ुस्सा व दोषारोपण: अगर आप अपनी ज़िंदगी की तकलीफ़ों के लिए बार-बार दूसरों पर दोषारोपण करते हैं, नाराज़गी व ग़ुस्सा दिखाते हैं, तो समझ लीजिए कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है. आपको अपनी परिस्थितियों की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेनी होगी. माना, आपके साथ बुरा हुआ होगा, लेकिन दोषारोपण समाधान नहीं है. हम नकारात्मक परिस्थितियों में भी किस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं, यह हम पर निर्भर करता है. ज़िम्मेदारियों से भागना कोई हल नहीं.

अपराधबोध, शर्मिंदगी, पश्‍चाताप: आपने कुछ ग़लतियां की होंगी. ज़ाहिर-सी बात है, ज़िंदगी परफेक्ट नहीं होती, हम सभी ग़लतियों से ही सीखते हैं, लेकिन उसके लिए कब तक अपराधबोध, शर्मिंदगी व पश्‍चाताप की भावना मन में बनाए रखेंगे? आपको ख़ुद को भी माफ़ करना सीखना होगा. आप भगवान नहीं हैं और हो सकता है आपकी वजह से दूसरों को या आपको भी तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ा हो, पर कब तक ख़ुद को दोषी मानते रहेंगे? माफ़ी मांग लें और ख़ुद को भी माफ़ कर दें.

चिड़चिड़ापन और नकारात्मकता: नकारात्मक भावनाएं कई कारणों से हो सकती हैं, लेकिन वह आपका स्वभाव ही बन जाए, तो ये मन के बीमार होने का संकेत है. नकारात्मकता ही चिड़चिड़ेपन को बढ़ाती है. पैसा, जॉब, रिश्ते व सामाजिक दबाव कई कारण हैं, जो नकारात्मक भावनाएं पैदा करते हैं, पर आपको ख़ुद यह निर्णय लेना होगा कि किस तरह से नकारात्मकता के कारणों से आप दूर रह सकते हैं.

एडिक्शन: जब मन और भावनाएं कमज़ोर हो जाती हैं, तो हम कई तरह की लतों के शिकार हो जाते हैं. एडिक्शन हमें कुछ पलों की राहत देते हैं और हमें लगता है हमारे सारे दर्द दूर हो गए, लेकिन एडिक्शन्स जब हमें पूरी तरह से अपनी गिरफ़्त में ले लेते हैं, तो मन और तन दोनों पर भारी पड़ जाते हैं. बेहतर होगा अपने ग़मों का इलाज लतों में न ढूंढ़ें.

उदासीनता व थकान: हमेशा थकान व उदासी महसूस करना शरीर के नहीं, मन के बीमार होने का संकेत है. ऊर्जा महसूस न होना, निराशावादी रवैया अपना लेना… इस तरह की भावनाएं यही इशारा करती हैं कि आपको अब मन के डॉक्टर की ज़रूरत है.

डिप्रेशन और आत्महत्या के ख़्याल: किसी भी गतिविधि में मन न लगना, किसी से बात न करना, सामाजिक क्रियाकलापों से दूर होते जाना, खाना कम कर देना, थका-थका महसूस करना जैसे लक्षण गहरे अवसाद की ओर इशारा करते हैं. यही अवसाद आगे चलकर आत्महत्या के ख़्यालों को जन्म देने लगता है. आपको लगने लगता है कि आपकी किसी को ज़रूरत नहीं, आपसे कोई प्यार नहीं करता… और यदि इस दौरान सही इलाज न करवाया जाए, तो आप ख़ुद अपनी जान के दुश्मन तक बन सकते हैं.

भावनात्मक कमज़ोरी: बात-बात पर रो देना, ख़ुद को असहाय व बेचारा महसूस करना मन की बीमारी का गहरा संकेत है. आपको लगता है कि कोई भी आपको प्यार नहीं कर सकता व अपना नहीं सकता. धीरे-धीरे आप लोगों से दूरी बनाने लगते हैं और अपनी ही परिधि में ़कैद हो जाते हैं. अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करते, ख़ुद मन ही मन घुटते रहते हैं.

सामाजिक गतिविधियों से दूर होना: आप पार्टीज़ में जाना बंद कर देते हैं, दोस्तों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों की ब्याह-शादी में न जाना… इस तरह से ख़ुद को आप समाज से काटने लगते हैं, क्योंकि आपको लगता है सभी आपके दुश्मन हैं और आपको कोई अपनाने को तैयार नहीं. ऑफिस पिकनिक हो या सोसायटी का गेट-टुगेदर, आपका मन कहीं नहीं लगता. हो सकता है आपकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी न हो, पर यह कोई समाधान नहीं.

हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाना: आपका मस्तिष्क पूरी तरह से बंद होने लगता है और हर तरह के निगेटिव ख़्याल ही आपको घेरे रहते हैं. अगर उम्मीद व आशा की किरण हो भी, तब भी आप प्रयास करने बंद कर देते हैं, क्योंकि आप पूरी तरह हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाते हैं. आप पहले ही सोच लेते हैं कि प्रयास करने से भी कुछ नहीं होगा और आप कोशिश ही नहीं करते.

शारीरिक तकली़फें: जब आपका मन बीमार होगा, तो ज़ाहिर है शरीर पर भी उसका असर नज़र आने लगेगा. सिरदर्द, पेट की तकली़फें, मांसपेशियों में दर्द व तनाव इसके प्रमुख लक्षण हैं. लेकिन अक्सर लोग शारीरिक लक्षणों के इलाज पर ध्यान देने लगते हैं, जबकि इनकी जो मुख्य वजह है, मन की बीमारी, उसको नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जिससे परेशानी और बढ़ जाती है.

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Family Care
कारण

मन की बीमारी के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक व ख़ुद का व्यक्तित्व भी ज़िम्मेदार हो सकता है.

–     हो सकता है आपकी नौकरी में समस्या हो या आपकी नौकरी चली गई हो और नई नौकरी अनेक प्रयासों के बाद भी न मिल रही हो, तो कई तरह के डर मन में हावी होने लगते हैं. भविष्य की चिंता, आर्थिक तंगी, समाज में तिरस्कार का डर आदि बातें आपको धीरे-धीरे नकारात्मक बनाने लगती हैं.

–     शादी या प्यार जैसा रिश्ता टूटने पर भी बहुत तकलीफ़ होती है. ऐसे में सामान्य बने रहना बेहद मुश्किल भी है, इसीलिए आप समाज से कटने लगते हैं. ख़ुद को एक दायरे में ़कैद कर लेते हैं. एडिक्शन का शिकार हो जाते हैं.

–     कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही ऐसा होता है कि वो अन्य लोगों के मुक़ाबले भावनात्मक व मानसिक रूप से कमज़ोर होते हैं. वो किसी भी नकारात्मक अनुभव का शिकार होते हैं, तो जल्द ही मानसिक रूप से बीमार हो जाते हैं.

–     बहुत अधिक ईर्ष्या या द्वेष भी आपके मन को बीमार करता है. किसी की कामयाबी से जलना, किसी की लाइफस्टाइल से ईर्ष्या करना सही नहीं. ख़ुद को पॉज़िटिव बनाएं, न कि एक निगेटिव व्यक्ति.

उपाय

–     अगर आप डर व घबराहट का शिकार हो रहे हैं, तो अपने डर के अनहेल्दी कारणों को पहचानें.

–     अनहेल्दी कारणों को हेल्दी बातों से रिप्लेस करना सीखें.

–     कहीं आप यह तो नहीं सोचने लगे कि यह दुनिया विश्‍वास के लायक ही नहीं. यह सोच ही अपने आप में एक्स्ट्रीम है. अपनी सोच को बदलें.

–     लोगों पर विश्‍वास करना सीखें.

–     पॉज़िटिव लोगों के साथ रहें. उन लोगों के संपर्क में रहें, जो आपकी हमेशा मदद करते हैं. आपको यह महसूस होगा कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते.

–     किसी बात को लेकर मन में शंका है, अपराधबोध है, तो बेहतर होगा अपनी शंकाएं बातचीत से दूर कर लें. बातों को मन में रखने से, भीतर ही भीतर कुढ़ने से नकारात्मकता ही बढ़ेगी.

–     माफ़ करना और माफ़ी मांगना सीखें.

–     अपने मन को पहचानें. अपने मन की बीमारी से भागें नहीं, उसका सामना करें और इलाज करवाएं.

–     जब कभी परिस्थितियों से भागने का मन हो, तो अपनी हॉबीज़ में मन लगाएं.

–     स्विमिंग, डान्सिंग, म्यूज़िक, ट्रेकिंग- ये तमाम चीज़ें एक तरह का मेडिटेशन हैं, जो आपको नकारात्मक भावनाओं से बाहर निकालकर पॉज़िटिव बनाने में मदद करती हैं.

–  नए दोस्त बनाएं, उनसे मिलेंगे तो ध्यान निगेटिव बातों से हटेगा.

–     कभी किसी शांत जगह जाकर छुट्टियां बिताएं.

–     मेडिटेशन और योग की शरण लें.

–     रोज़ाना लाइट एक्सरसाइज़ करें.

–     नकारात्मक लोगों से दूरी बनाए रखें.

–     अपने खानपान और इम्यूनिटी पर ख़ासतौर से ध्यान दें.

–     हेल्दी फूड खाएं, ताकि हार्मोंस असंतुलित न हों. हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करनेवाले फूड खाएं.

–     रिसर्च बताते हैं कि घर में पालतू बिल्ली या कुत्ता रखने से फील गुड हार्मोंस रिलीज़ होते हैं और स्ट्रेस हार्मोंस कार्टिसोल कम होते हैं. ये तरीक़ा भी आज़माया जा सकता है.

–     बेहतर होगा कि अपने मन की बात अपनों से शेयर करें. अगर ऐसा संभव न हो, तो बिना देर किए एक्सपर्ट के पास जाएं. फूड, जो बना देते हैं आपका मूड

–     डार्क चॉकलेट मूड ठीक करके डिप्रेशन दूर करता है. यह एंडॉर्फिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाता है और इसमें मौजूद कई अन्य तत्व भी फील गुड के एहसास को बढ़ानेवाले हार्मोंस को बढ़ाकर डिप्रेशन दूर करते हैं.

–     कार्बोहाइड्रेट्स सेरोटोनिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाते हैं और आपके मूड को बेहतर बनाकर हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करते हैं.

–     विटामिन बी बेहद ज़रूरी है हैप्पी हार्मोंस के रिलीज़ के लिए. शोध बताते हैं कि विटामिन बी6 की कमी से चिड़चिड़ापन, भूलने की समस्या, हाइपरएक्टिव हो जाना जैसी समस्याएं होती हैं. विटामिन बी12 भी ब्रेन बूस्टिंग तत्व है. आप विटामिन बी के लिए अपने डायट में हरी पत्तेदार सब्ज़ियां शामिल करें.

–     गाजर, दही, फिश, ड्रायफ्रूट्स, दालचीनी, अदरक, लहसुन, कालीमिर्च, जीरा, करीपत्ता आदि में भी हार्मोंस को संतुलित रखने के गुण होते हैं. इन सभी को अपने डेली डायट में शामिल करें.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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