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रोज़ाना चेक करें अपनी लाइफ का हैप्पीनेस मीटर (Check Your Daily Happiness Meter)

ज़िंदगी में हर रोज़ हम कुछ न कुछ नया सीखते या अनुभव करते हैं. कुछ चीज़ें हमें ख़ुशी देती हैं, तो कुछ तकलीफ़, पर ज़्यादातर लोग उन तकलीफ़ों के बोझ को ही रोज़ाना ढोते रहते हैं, जबकि हम सबको पता है कि जो व़क्त बीत रहा है, वो लौटकर कभी नहीं आएगा, तो क्यों न रोने की बजाय उसे हंसकर बिताएं. आज से ही एक नई शुरुआत करें, रोज़ाना कुछ अलग करें और देखें कि आज का आपका हैप्पीनेस मीटर कितना है.

Happiness

दिमाग़ी कचरा साफ़ करें

हम रोज़ अपने सबकॉन्शियस माइंड में न जाने कितने निगेटिव ख़्याल भर देते हैं और जब वो हमें परेशान करने लगते हैं, तो हम बेवजह दुखी रहने लगते हैं. आज ही ये सारा दिमाग़ी कचरा साफ़ करें.

–    आपके बारे में कौन क्या सोचता है, इस सोच को अपने दिमाग़ से निकाल दें, बल्कि ये सोचकर ख़ुश हो जाएं कि कोई आपके बारे में सोचता तो है.

–     अगर बातचीत के दौरान कोई ग़लतफ़हमी हो गई है, तो उसे तुरंत क्लीयर कर लें. जितनी जल्दी निगेटिव ख़्याल निकलेगा, उतनी जल्दी आपको ख़ुशी का एहसास होगा.

–     माफ़ कर देना और माफ़ी मांग लेना उतना भी कठिन नहीं है, जितना लोगों ने बना रखा है, इसलिए सॉरी कहने में बिल्कुल भी देर न करें. ख़ुद भी ख़ुश रहें और दूसरों को भी ख़ुश रखें.

मैजिकल वर्ड्स का करें इस्तेमाल

हमारे पास मैजिकल वर्ड्स का ख़ज़ाना है, पर अफ़सोस कि हम उनका इस्तेमाल ही नहीं करते, तभी तो दुखी रहते हैं.

–     थैंक यू एक ऐसा जादुई शब्द है, जो न स़िर्फ बोलनेवाले के चेहरे पर मुस्कान लाता है, बल्कि सुननेवाला भी ख़ुश हो जाता है. तो फिर इसे कहने में कंजूसी क्यों करें. सुबह की शुरुआत ही भगवान को थैंक यू कहने से करें, यकीन मानें आपका दिन ख़ुशियों भरा होगा.

–     हर कोई चाहता है कि लोग उसे प्यार करें. पार्टनर, मम्मी-पापा, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी या बच्चे सभी को रोज़ाना वो थ्री मैजिकल वर्ड्स ‘आई लव यू’ ज़रूर कहें. उनके चेहरे की मुस्कान आपके हैप्पीनेस मीटर को बढ़ा देगी.

–     ‘आप अच्छी लग रही हो’ या ‘अच्छे लग रहे हो,’ जैसे जादुई शब्द किसी का भी दिन बना सकते हैं. तो दिल खोलकर लोगों की तारीफ़ करें और ख़ुशियां फैलाते रहें.

चुनें अनजानी राहें

जान-पहचान के लोगों से तो हम हमेशा बोलते-बतियाते हैं, कभी अनजानों से भी दोस्ती करके देखें. बस, यूं ही किसी अजनबी से बातें करें, बहुत अच्छा लगेगा.

–     वर्किंग लोग बस, ट्रेन, ऑटो में रोज़ाना न जाने कितने लोगों से टकराते हैं, तो क्यों न उनसे दोस्ती करें और अपने दोस्तों का दायरा बढ़ाएं.

–     एक-दो बार जिन्हें मिले हैं, उन्हें देखकर स्माइल ज़रूर दें, उनकी स्माइल आपका हैप्पीनेस मीटर बढ़ा देगी.

–     रास्ते में चलते हुए कभी किसी अजनबी को देखकर स्माइल करें, वो जब तक सोचेगा कि आपको कहां मिला था, आप हंसते-हंसते आगे बढ़ जाओगे.

–     कोई उम्रदराज़ महिला अगर भारी सामान लेकर जा रही है, तो निस्वार्थ भाव से उनकी मदद करें. उन्हें तो ख़ुशी मिलेगी ही, पर आपको भी कुछ कम सुकून नहीं मिलेगा.

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Happy
कुछ रिफ्रेशिंग हो जाएं

–     क्यों न आज थोड़ी मटरगश्ती कर लें. किसी पुराने दोस्त को उसके ऑफिस में या घर पर जाकर सरप्राइज़ दें. यक़ीन मानिए, एक ही दिन में आपके पूरे हफ़्ते का हैप्पीनेस मीटर रीचार्ज हो जाएगा.

–     गाने सुनने के शौक़ीन हैं, तो अपना मनपसंद गाना स़िर्फ सुनें नहीं, बल्कि गुनगुनाएं भी और अगर घर पर हैं, तो गाने पर थिरकें भी. मूड फ्रेश रखने के लिए म्यूज़िक से बेहतर थेरेपी कुछ नहीं.

–     खाने के शौक़ीन हैं, तो कुछ ऐसा चटपटा खाएं, जो बहुत दिनों से खाया न हो. मनपसंद डिश न स़िर्फ आपका मूड अच्छा करेगी, बल्कि एक ख़ुशी भी देगी.

–     हमेशा दूसरों को ही एंटरटेन न करें. कभी ख़ुद को भी एंटरटेन कर लें. आपके साथ-साथ आपकी फैमिली भी ख़ुश रहेगी.

–     मॉनसून तो वैसे ही बहुत रोमांटिक मौसम है, तो आज अपने पार्टनर के लिए कुछ ख़ास करें. उन्हें चॉकलेट, फूल या टेडी दें. इस रोमांटिक मौसम में आपका रोमांटिक अंदाज़ आपके पार्टनर के हैप्पीनेस मीटर को फुल चार्ज कर देगा.

–     हमेशा दूसरों के बारे में ही न सोचें. कभी-कभी ख़ुद के बारे में भी सोचें. ख़ुद की ख़ुशी के लिए भी कुछ चीज़ें करें. थोड़ा स्वार्थी होने में कोई हर्ज़ नहीं.

फैलाएं पॉज़िटिविटी

आजकल ज़्यादातर लोग सोशल मीडिया के ज़रिए आप तक बहुत-सी निगेटिव चीज़ें पहुंचाते रहते हैं, जिससे जाने-अनजाने आप लगातार निगेटिव ख़्यालों  से घिरे रहते हैं. इसे बदलना चाहते हैं, तो शुरुआत ख़ुद से करें.

–     व्हाट्सऐप पर किसी को ऐसी फोटोज़ या वीडियोज़ न भेजें, जिसे देखकर बुरा लगे. जोक्स, मोटिवेशनल बातें या कोट्स आपके साथ-साथ उनको भी ख़ुश करेंगे.

–     अगर आपके आसपास कोई निगेटिव बातें कर रहा है, तो उसे निगेटिव में भी पॉज़िटिव देखना सिखाएं.

–     सकारात्मक सोच आपके चेहरे पर एक मुस्कान की तरह है, जो हर व़क्त आपकी ख़ूबसूरती को निखारती रहती है. तो सुंदर दिखना चाहते हैं, तो मुस्कुराइए, खिलखिलाइए और दूसरों को भी ख़ुश रखिए.

–     निगेविट बात करनेवालों को बताएं कि कैसे सकारात्मक सोच आपके शरीर में अच्छी फीलिंग वाले हार्मोंस का स्राव करती है और आप अच्छा फील करते हैं.

चेक करें हैप्पीनेस मीटर

–     ऐसी कई बातें होती हैं, जो हमारे चेहरे पर मुस्कान लाती हैं. ध्यान दें कि किससे बातें करते समय आप सबसे ज़्यादा ख़ुश रहते हैं और जैसे ही आपको वो शख़्स मिले, जी भरकर उससे बातें करें.

–     कोई न कोई तो ऐसा होता है, जिसके बारे में सोचते ही आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. कोशिश करें कि उससे ज़्यादा से ज़्यादा मिलें. उसके साथ ज़्यादा समय बिताने की कोशिश करें.

–     दोस्तों-यारों के संग बिताई कौन-सी पुरानी यादें आपको गुदगुदाती हैं. उन यादों को दोबारा जीने की कोशिश करें.

–     घर से निकलते व़क्त अगर ‘अपना ख़्याल रखना’ कहने भर से आपके चेहरे पर स्माइल आती है, तो इसे अपनी आदत में शुमार करें.

–     पर्सनल लाइफ के अलावा प्रोफेशनल लाइफ में भी रोज़ कुछ अलग व क्रिएटिव करें, कभी काम में, कभी लुक्स में, तो कभी अपने कलीग्स की ख़ुशी के लिए.

–     अपने भीतर के छोटे मासूम बच्चे को कभी सीरियस न होने दें. वह हंसी-मज़ाक और शरारतों से आपको हमेशा ख़ुशहाल बनाए रखेगा.

– सुनीता सिंह

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काम समेटने में बिखरने न दें ज़िंदगी ( Do not wrap up work in the disintegrating life)

Disintegrating life
न जाने वे दिन कहां खो गए, जब सर्दियों की धूप में अलसाते हुए हम छत पर लेटे रहते थे… या फिर गर्मियों की शाम को बाहर बगीचे में चैन से सब्ज़ी काट रहे होते थे… न कोई टेंशन होती थी और न ही कोई जल्दबाज़ी. एक सुकून था जीवन में और थी एक सहजता. 

Disintegrating life

आज यह नज़ारा देखने तक को नहीं मिलता कि कहीं दो पल भी बैठकर कोई औरत, ख़ासकर कामकाजी, यूं ही सुस्ता ले. ऐसा सोचना तक संभव नहीं लगता, क्योंकि वह तो आज इतनी व्यस्त हो गई है कि केवल उसे काम समेटने की जल्दी रहती है. बस, किसी तरह से यह काम निपट जाए, तो वह दूसरा काम निपटाए. नतीजा, इस समेटने के चक्कर में अक्सर वह उन छोटी-छोटी ख़ुशियों को नज़रअंदाज कर देती है, जो जीवन की सहजता को बनाए रखने के लिए आवश्यक होती हैं. सहजता न हो, तो बिखराव अपनी जड़ें फैलाने लगता है.

क्यों बिखरने लगती है ज़िंदगी?

 

परफेक्शनिस्ट बनने की चाह
बदलती जीवनशैली और कामकाजी होने की ज़रूरत के कारण आज महिलाओं के पास समय की कमी होने लगी है. जो समय उनके पास है, उसमें ही वह बहुत कुछ करना चाहती हैं और वो भी एकदम परफेक्शन के साथ, ताकि कोई यह न कह सके कि वह घर और बाहर दोनों को एक साथ संभालने में अक्षम है. कोई यह आरोप न लगा सके कि उसने जो काम करने की राह चुनी है, वो उसका सबसे ग़लत फैसला है. घर की ज़िम्मेदारियों को सही तरह से निभा सके, इसलिए वह न स़िर्फ ख़ुद को एक अनुशासन के दायरे में बांधती है, बल्कि अपने परिवार को भी उसमें कैद कर लेती है. पति-बच्चे, जो एक सामान्य जीवन जीना चाहते हैं या सहज वातावरण चाहते हैं, उन पर अंकुश लग जाता है. यह अंकुश बोझिलता तो लाता ही है, साथ ही रिश्तों में बिखराव को भी आमंत्रित करता है. काम को समेटने की टेंशन उन्हें परफेक्शनिस्ट बना देती है और परफेक्शनिस्ट कभी संतुष्ट नहीं हो पाते हैं, बल्कि अपनी बात दूसरों पर थोपने की उन्हें आदत पड़ जाती है.

काम को एंजॉय नहीं करतीं
सच्चाई तो यही है कि ऐसी महिलाएं, जिन्हें हमेशा काम ख़त्म करने की जल्दी रहती है, वे अपने काम को कभी एंजॉय ही नहीं कर पाती हैं. उनके दिलो-दिमाग़ पर हमेशा एक बोझ-सा बना रहता है कि काम समेटना है. समय पर वह काम नहीं पूरा हुआ, तो दूसरे काम को वह कैसे पूरा कर पाएंगी. यह डर उन्हें हमेशा सताता रहता है. ज़ाहिर है, घर के सदस्यों पर इसका असर तो पड़ेगा ही. उनके अंदर भी एक झल्लाहट कायम हो जाती है और शुरू हो जाता है मन-मुटाव और दोषारोपण का सिलसिला.

अवास्तविक अपेक्षाएं
परफेक्शन और ऑर्गेनाइज़्ड तरह से काम करने की आदत या इसे एक सनक भी कह सकते हैं, अवास्तविक अपेक्षाओं को जन्म देती है. ऐसे लोगों के साथ व्यवहार करना मुश्किल हो जाता है. इस पर सायकोलॉजिस्ट मनु पारेख कहते हैं, जिन महिलाओं को हमेशा यह टेंशन घेरे रहती है कि जल्दी-जल्दी काम ख़त्म करना है, दरअसल, वे अवास्तविक अपेक्षाओं के साथ जीने लगती हैं. ऐसे में परिवार के सदस्यों का यह कर्तव्य बनता है कि वे भी उसे सहयोग दें. ये अवास्तविक अपेक्षाएं संबंधों में मतभेद का कारण बनती हैं. इतना ही नहीं, ऐसे लोगों की फिज़िकल और इमोशनल हेल्थ पर भी इसका असर पड़ता है. साथ ही वे डिप्रेशन के शिकार भी हो जाते हैं.

भूल जाते हैं खुलकर जीना
चाहे घर का काम हो या ऑफिस का या फिर किसी फंक्शन-पार्टी में जाना हो, काम समेटने का बोझ लेकर चलनेवालों को कुछ भी लुभाता नहीं. वे खुलकर जीना तो जैसे भूल ही जाते हैं और एक मशीन की तरह अपने दायित्वों को निभाते रहते हैं.

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क्या करें?

आपकी ज़िंदगी बिखरने लगे और बाद में केवल पछतावा ही हाथ आए, उससे पहले ही स्वयं को संभाल लें और काम समेटने की जल्दी करने की बजाय उसे ख़ुशी से करें.

अपनाएं कुछ टिप्स

एक समय सीमा निर्धारित करें
सच तो यह है कि घर के काम कभी ख़त्म नहीं होते हैं. चाहे आप कितनी ही सफ़ाई से आज घर के फर्श को साफ़कर लें, पर कल कोई गंदे जूते लेकर अंदर आ ही जाएगा. इस बात से ग़ुस्सा होने या उस पर चिल्लाने की बजाय या फिर घंटों सफ़ाई में जुटे रहने की बजाय सफ़ाई के लिए एक समय तय करें. जब टेंशन फ्री होकर काम करेंगी, तब काम जल्दी हो जाएगा और घर का माहौल भी ख़राब नहीं होगा.

इम्परफेक्ट होने के फ़ायदों पर ग़ौर करें
परफेक्शनिस्ट होना कोई गर्व की बात नहीं है. मनु पारेख मानते हैं कि परफेक्शनिस्ट एक व्यावहारिक इंसान की तुलना में काम पूरा करने या कमिटमेंट निभाने में ज़्यादा समय लेता है. वह अपने दायित्वों को ख़ुशी से नहीं, बल्कि बोझ की तरह पूरा करता है. उनका बिहेवियर कंट्रोल करनेवाला होता है, जिससे सहजता और काम की ख़ूबसूरती उन्हें नज़र नहीं आती और
उनके काम के स्तर के गिरने के साथ-साथ उसमें अधूरापन भी झलकता है. इम्परफेक्ट होकर देखें, आप अपना धैर्य भी नहीं खोएंगी और काम भी हो जाएगा. परिवार के लोग आपसे ख़ुश रहेंगे, तो आप भी रिश्तों को संभाले
रख पाएंगी.

मदद लें
सुपरवुमन बनने की बजाय घर के सदस्यों से मदद लें. काम बांटें. आपको उन्हें यह दिखाने की ज़रूरत नहीं है कि आप सब कर सकती हैं. साथ मिलकर काम करने से प्यार भी बढ़ता है और दूरियां भी नहीं आतीं.

रिलैक्स रहना सीखें
ग़लतियां आप भी कर सकती हैं, काम आप भी अधूरा छोड़ सकती हैं, तो इसमें बुरा क्या है. इसे स्वीकार करना सीखें. यक़ीन मानिए कोई आपको दोष नहीं देगा. रिलैक्स रहें और दूसरों को भी रहने दें. काम नहीं सिमट पाया, तो कोई पहाड़ तो नहीं टूट जाएगा. कल हो जाएगा, पर परिवार का साथ ज़रूरी है. बच्चों को समय दें. खाना नहीं बनाना है, तो बाहर से मंगा लें. इसको लेकर अपराधबोध न महसूस करें.

जीवन को जटिल नहीं, आसान बनाएं
ज़रूरी तो नहीं कि हर व़क्त जैसा आप चाहती हैं, वैसा ही हो. परिवारवालों की ख़ुशी के लिए अक्सर कुछ बातों को नज़रअंदाज़ करना पड़ता है. इसलिए आप भी जो चीज़ें जैसी हैं, उन्हें वैसा ही स्वीकार करें और फिर देखें जीवन कितना सहज और आसान हो जाएगा.

एक दिलचस्प कहानी

पॉटरी क्लास की एक दिलचस्प कहानी है. इसमें लोगों को दो समूहों में बांटा जाता है. पहले समूह को कहा जाता है कि उनके काम को पॉट्स के वज़न या मात्रा के अनुसार आंका जाएगा, जबकि दूसरे समूह को कहा जाता है कि उन्हें दो दिन दिए जाते हैं और उसमें उन्हें एकदम परफेक्ट पॉट तैयार करना है. अब ज़रा सोचिए, कौन-सा समूह ज़्यादा क्रिएटिव रहा होगा. बेशक, पहलेवाला, क्योंकि उन्होंने काम के दौरान ख़ूब मस्ती की, हंसे, कई पॉट भी तोड़े और ख़ूब हंगामा किया यानी अपने काम को पूरी तरह एंजॉय किया. लेकिन दूसरा समूह ऐसा नहीं कर पाया. एकदम परफेक्ट कलाकृति तैयार करने की टेंशन का आप अंदाज़ा लगा सकते हैं. मास्टर पीस बनाने की धुन में हंसना तो दूर की बात है, उन्होंने एक-दूसरे के साथ बात करना भी समय की बर्बादी समझी होगी.

– सुमन बाजपेयी