Family And Relationship

रिश्तों का दूसरा नाम सच्चाई और ईमानदारी है और ऐसे में अगर हम यह कहेंगे कि झूठ बोलने से आपके रिश्ते मज़बूत हो सकते हैं तो आपको लगेगा ग़लत सलाह से रहे हैं, लेकिन यहां हम ऐसे झूठ की बात कर रहे हैं जिनसे किसी का नुक़सान नहीं होगा बल्कि सुनने वालों को ये झूठ बेहद पसंद आएगा. 

  • अगर आपकी पत्नी आपसे पूछती है कि क्या मैं पहले से मोटी हो गई हूं तो भले ही यह सच हो कि उनका वज़न बढ़ा हो पर आप कह सकते हैं कि बिल्कुल नहीं, तुम मोटी नहीं हेल्दी हो और पहले से ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती हो.
  • इसी तरह अगर आपकी पत्नी पूछे कि यह रंग मुझपर कैसा लग रहा है तो अगर आप कहेंगे कि अच्छा नहीं लग रहामत पहनो तो उनको चिढ़ होगी, बेहतर होगा आप कहें यह तो खूब फब रहा है लेकिन अगर इसकी जगह ये वालापहनोगी तो और भी हसीन लगोगी.
  • अगर पति ने कुछ बनाकर खिलाने की कोशिश की है और स्वाद उतना अच्छा नहीं बन सका तो भी आप ज़रूर कहेंकि कोशिश तो क़ाबिले तारीफ़ है, अगली बार इसमें थोड़ा सा ये मसाला भी ट्राई करना तो टेस्ट कुछ अलग होगा.
  • अगर आपको पति का फ़ोन पर ज़ोर ज़ोर से बात करना नहीं भाता तो सीधे आवाज़ कम करने या यह कहने के कि कितना ज़ोर से बोलते हो, यह कहें- तुम्हारी धीमी आवाज़ बेहद हस्की और सेक्सी साउंड करती है, फिर देखिए अगली बार से वो खुद ही धीमा बोलेंगे.
  • अगर आपको पति का किसी काम में हस्तक्षेप पसंद नहीं या उनके काम करने का तरीक़ा आपको पसंद नहीं तो यहना कहें कि तुम्हें नहीं आता तो मत करो, बल्कि यह कहें कि तुमने पहले ही इतनी मदद कर दी, तो अब यह काम मुझेकरने दो या कहें कि तुम वो वाला काम कर दो क्योंकि वो तुम मुझसे बेहतर करोगे और मैं यह कर लेती हूं… या आप यह भी कह सकती हैं कि तुम थक गए होगे तो तुम आराम कर लो बाक़ी मैं संभाल लेती हूं.
  • अगर पतिदेव की तोंद निकल गई हो तो उनको ताना ना दें और ना ही उनके किसी दोस्त से उनकी तुलना करें बल्किकहें कि कुछ दिन मैं डायटिंग करने की सोच रही हूं अगर आप भी साथ देंगे तो मुझे मोटिवेशन मिलेगा, इसलिए प्लीज़ मुझे फिट होने में मेरी मदद करो और मैं फिट रहूंगी तो आपको भी तो अच्छा लगेगा ना. 
  • इसी तरह अगर पति को लगे कि पत्नी को डायटिंग की ज़रूरत है तो किसी पड़ोसन का उदाहरण देने से बेहतर है किआप कहें कि मेरे कपड़े थोड़े टाइट हो रहे हैं इसलिए सुबह जॉगिंग करने की और डायटिंग की सोच रहा है लेकिन तुम्हें मेरा साथ देना होगा.
Happy And Strong Relationship
  • कभी कभी एक दूसरे की झूठी तारीफ़ में क़सीदे कस दिया करें इससे आप दोनों को ही अच्छा लगेगा. 
  • सिर्फ़ पार्टनर ही नहीं, बाक़ी घरवालों के साथ भी थोड़ा बहुत अच्छावाला झूठ बोलने में हर्ज़ नहीं, इससे उन्हें बेहतरफ़ील होगा जिससे वो खुश रहेंगे और रिश्ते भी मज़बूत होंगे.
  • अगर पतिदेव बच्चों की तरफ़ ज़्यादा ध्यान नहीं देते या ज़िम्मेदारी से बचते हैं तो उनसे कहें कि बच्चे अक्सर बोलते हैंकि मुमकिन आपको तो कुछ नहीं आता, पापा ज़्यादा इंटेलीजेंट लगते हैं, इसलिए कल से हम उनसे ही पढ़ेंगे, ऐसाकहने से पतिदेव बच्चों के प्रति ज़िम्मेदारी ज़्यादा ख़ुशी से निभाएंगे और इससे बच्चों के साथ उनकी बॉन्डिंग भी स्ट्रॉंगहोगी. साथ ही आपका एक काम कम हो जाएगा.
  • अगर आपकी पत्नी और आपकी मां की बनती नहि तो पत्नी से कहें कि मां अक्सर तुम्हारे काम और खाने की तारीफ़करती हैं, मां कहती हैं कि बेचारी दिनभर काम में लगी रहती है, थोड़ा भी आराम नहीं मिलता उसको और मैं भी कुछना कुछ बोलती ही रहती हूं लेकिन वो सब सह लेती है. 
  • इसी तरह अपनी मां को भी कहें कि आपकी बहू अक्सर कहती है कि काश मैं भी मम्मी जैसा टेस्टी खाना बना पाती, उनके हाथों में जो स्वाद है वो मेरे में नहीं, वो हर काम सलीके से करती हैं. ऐसी बातों से दोनों के मन में एक दूसरे केप्रति सकारात्मक भाव जागेगा और कड़वाहट दूर होगी.
  • अगर पत्नी को लगता है कि पति और पत्नी के घरवालों की ज़्यादा नहीं बनती तो पत्नी जब भी मायके से आए तोकहे कि मम्मी-पापा हमेशा कहते हैं कि दामाद के रूप में उन्हें बेटा मिल गया है, कितना नेक है, बेटी को खुश रखताहै और किसी तरह की कोई तकलीफ़ नहीं देता वरना आज के ज़माने में कहां मिलते हैं ऐसे लड़के.
  • दूसरी तरफ़ अपने मायकेवालों से कहें आप कि वो हमेशा हमारे घर के संस्कारों की तारीफ़ करते हैं कि तुम्हारे मम्मीपापा ने इतने अच्छे संस्कार दिए हैं कि तुमने मेरा पूरा घर इतने अच्छे से संभाल लिया. इन सबसे आप सभी के बीचतनाव काम और प्यार ज़्यादा बढ़ेगा.
  • इसके अलावा एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि शादी के शुरुआती दौर में कभी भी अपने डार्क सीक्रेट्स किसी सेभी शेयर ना करें, अपने अफ़ेयर्स या फैंटसीज़ आदि के बारे में पार्टनर को जोश जोश में बता ना दें. बाद में भी भले हीआप दोनों में अटूट विश्वास हो पर ये बातें कभी साझा ना करें. पार्टनर भले ही अलग अलग तरीक़ों से पूछने कीकोशिश भी करे तब भी यहां आपके द्वारा बोला गया झूठ आपके रिश्ते को बिगड़ने से बचा सकता है!
  • पिंकु शर्मा

हेलीकॉप्टर मॉम, टाइगर मॉम, ड्रैगन मॉम…. पैरेंटिंग स्टाइल से तो मांओं के कई टाइप्स मिल जाएंगे. पर यहां हम बता रहे हैं मांओं की आदतों के आधार पर मांओं के कुछ दिलचस्प टाइप्स. हालांकि इन सभी शेड्स में मां प्यारी हैं और अपने बच्चों को उतना ही प्यार करती हैं.

सोशली एक्टिव मॉमः

Types Of Moms


इस तरह की मांएं सोशली एक्टिव होती हैं और अपनी सारी एनर्जी ये अपने सोशल ग्रुप्स और फ्रेंड्स से जुटाती हैं. इन्हें बस किसी हॉल में अजनबियों के बीच छोड़ दीजिए, ये सारी मम्मियों को फ्रेंड बनाकर उनके फोन नंबर्स जुटा लाएंगी. इतना ही नहीं उन सबको व्हाट्सएप्प ग्रुप में भी जोड़ देंगी. ऐसी सोशली एक्टिव मम्मियों के पास बच्चों को हैंडल करने के सैकड़ों टिप्स होते हैं, जो वो अपनी फ्रेंड मम्मियों को बांटती रहती हैं और उनसे भी बच्चों को संभालने के टिप्स पूछती रहती हैं. ऐसी मांओं के बेचारे बच्चों पर दुनियाभर के टिप्स आजमाए जाते हैं. हां इन बच्चों को एक फायदा ज़रूर होता है, मां के साथ सोशल फंक्शन्स पर जाते रहने से इनकी भी बहुत सारे बच्चों के साथ दोस्ती हो जाती है.

परफेक्शनिस्ट मॉम:


परफेक्शनिस्ट मॉम को हर काम में परफेक्शन चाहिए होता है. इनकी दिनचर्या घड़ी की सूइयों के हिसाब से चलती है और इनकी पूरी कोशिश होती है कि इनके बच्चे भी इन्हीं की तरह बनें. इसलिए ये बच्चे के सिर पर सवार रहती हैं और बच्चे के हर काम को क्रॉस चेक करती रहती हैं. चाहे होमवर्क हो, इवनिंग पार्क टाइम, दूध पीना हो या डिनर- इनके बच्चे का सब काम टाइम टेबल के हिसाब से ही होता है. परफेक्शनिस्ट मॉम की पूरी कोशिश होती है बच्चों के रूटीन के बीच ना कोई वेकेशन आए, न ही कोई फैमिली कमिटमेंट या गेट टुगेदर. ये अपने बच्चे को हमेशा टॉप पर देखना चाहती हैं. इनकी कोशिश होती है कि उनका बच्चा स्कूल के हर एग्ज़ाम में टॉप स्कोरर ही हो. रहन-सहन, कपड़े हर बात में वो अपने बच्चे को भी अपनी तरह ही परफेक्शनिस्ट बनाने की कोशिश में जुटी रहती हैं.

हमेशा बच्चे का बखान करनेवाली मां:

Types Of Moms

वैसे तो हर मां को अपना बच्चा दुनिया का सबसे अच्छा बच्चा लगता है, लेकिन इस तरह की मां अपने बच्चों को लेकर कुछ ज़्यादा ही पजेसिव होती हैं. इनकी हर बातचीत का केंद्र इनका बच्चा ही रहता है. इनका बस चले, तो अपने बच्चे की छोटी से छोटी उपलब्धि को भी ये पूरी दुनिया को बता दें. और ये ऐसा करती भी हैं. चाहे पार्क हो, ऑफिस, फैमिली गेट टुगेदर या आस-पड़ोस, फ्रेंड्स- ये हर जगह बस अपने बच्चे का ही गुणगान करती रहती हैं. इतना ही नहीं, इनके दो साल के बच्चे का भी सोशल मीडिया एकाउंट होता है.

अपने लिए जीने की ख़्वाहिश रखनेवाली मॉमः


इस तरह की मांओं की दुनिया सिर्फ अपने बच्चों तक ही सीमित नहीं रहती. ये मांएं थोड़ा आज़ाद ख़्याल की होती हैं और मानती हैं कि घर-परिवार के अलावा उनकी अपनी भी पर्सनल लाइफ है, जिसे वो अपने हिसाब से जीना चाहती हैं. अगर फ्रेंड्स के साथ उनकी पार्टी की प्लानिंग है तो वो अपना प्लान किसी भी शर्त पर नहीं बदलेंगी, भले ही अगले दिन बच्चे की एग्ज़ाम क्यों न हो. ऐसा नहीं है कि ऐसी मांएं ज़िम्मेदार नहीं होतीं, बस उन्हें अपने पर्सनल स्पेस में कोई रुकावट पसंद नहीं. ये अक्सर अपनी फ्रेंड्स के साथ पिकनिक या गेट टुगेदर प्लान करती रहती हैं और उनके साथ ख़ुश रहती हैं. ऐसी मांओं के बच्चे बहुत जल्दी आत्मनिर्भर बन जाते हैं और अपना काम ख़ुद करना सीख जाते हैं.

अंधविश्‍वासी मांः


ऐसी मांओं को हमेशा ये डर लगा रहता है कि कहीं कोई उनके बच्चे को नज़र न लगा दे. इसलिए इनकी कोशिश होती है कि अपने बच्चे का बखान किसी के सामने न ही करें. चाहे इनका बच्चा क्लास में फर्स्ट ही क्यों न आए, ये अपने बच्चे की तारीफ करने की जगह उसकी कमियां गिनाने लग जाएंगी- अरे ये तो मेरी सुनता ही नहीं, खाना नहीं खाता, बड़ा शरारती है और भी न जाने क्या-क्या. और इन सब के पीछे उनका यही डर रहता है कि तारीफ करूंगी, तो मेरे बच्चे को नज़र लग जाएगी. नज़र उतारना इन्हें हर प्रॉब्लम का सोल्यूशन लगता है और हफ्ते में दो दिन तो ये अपने बच्चे की नज़र उतार ही लेती हैं.

मास्टरशेफ मॉमः

Types Of Moms


जैसा कि टाइटल से ही ज़ाहिर है ऐसी मांओं को कुकिंग का बहुत शौक होता है. चाहे पास्ता-पिज्ज़ा बनाना हो, केक-पेस्ट्री या कोई स्नैक्स- ये सब घर पर बना लेती हैं. ऐसी मांएं घंटों किचन में ही बिता देती हैं. ऐसी मांओं के बच्चे बहुत लकी होते हैं. इन्हें टिफिन में रोज़ नई वेरायटी मिलती है और इनके फ्रेंड्स को हमेशा टेस्टी ट्रीट.

हमेशा चिंता में डूबी रहनेवाली मॉमः

कहीं मेरा बच्चा बीमार तो नहीं पड़ जाएगा… स्कूल में उसके साथ कोई बुली तो नहीं करता होगा… वो अकेले में डरता तो नहीं होगा… पार्क में खेलते व़क्त कोई उसे धक्का न दे दे…  कुछ मांएं हर समय बच्चे की चिंता में ही डूबी रहती हैं और कई बार तो उनकी चिंता बेवजह भी होती है. ऐसी मांएं जब भी उनका बच्चा उनसे दूर होता है, पता नहीं क्या सोच-सोच कर परेशान होती रहती हैं. ये बच्चे द्वारा अकेले बिताए गए हर मिनट का ब्यौरा जानना चाहती हैं. ये अगर पैरेंट-टीचर मीटिंग में जाती हैं, तो अपने सवालों से टीचर को परेशान करके ही छोड़ती हैं.

फैशनिस्टा मॉमः

Types Of Moms

फैशनिस्टा मॉम ख़ुद तो हमेशा स्टाइल ऑइकॉन नज़र आती ही हैं, अपने बच्चे को भी फैशनेबल ही देखना चाहती हैं. किसी भी पार्टी-फंक्शन में चले जाइए, ये मां-बच्चे आपको स्टाइलिश अंदाज़ में ही नज़र आएंगे. ऐसी मांएं हमेशा हाई स्ट्रीट स्टोर्स से शॉपिंग करती हैं और अपने व अपने बच्चे के लिए यूनिक स्टाइल क्रिएट करती हैं. इनकी हेयरस्टाइल से लेकर कपड़े, फुटवेयर, एक्सेसरीज़ और मेकअप तक हर चीज़ खास होती है और इनके बच्चे में इनका ही रिफ्लेक्शन नज़र आता है. यानि इनके बच्चे भी हाइली फैशनेबल और क्लासी होते हैं.

शॉपोहोलिक मॉमः

Types Of Moms

ऐसी मांएं घर में कम शॉपिंग मॉल में ज़्यादा नज़र आती हैं. इन्हें सभी ऑनलाइन किड्स स्टोर्स के बारे में पता होता है और हर स्टोर्स की जानकारी होती है. किस स्टोर से बेस्ट और सस्ते कपड़े लिए जा सकते हैं. कौन-सी शॉप वेस्टर्न वेयर के लिए बेस्ट है और कौन-सी इंडियन वेयर के लिए… एक्सेसरीज़ की शॉपिंग कहां से करना बेस्ट होता है, सारी बातों की जानकारी होती है इनके पास और ये अपना ज़्यादातर समय शॉपिंग में ही बिताती हैं.

रिश्तों (Relationships) की ख़ुशबू… प्यार के लम्हे… अपनों का साथ… ये सभी मिलकर ही तो एक ईंट-पत्थर से बने मकान को घर बनाते हैं, लेकिन जब इन घरौंदों में भावनाएं पिघलने लगें, अपनों का साथ छूटने लगे… तब रिश्ते भी बिखरने लगते हैं…

Home Relationship

एहसान दोनों का ही था मकान पर… छत ने जता दिया और नींव ने छुपा लिया… कुछ ऐसे ही होते हैं रिश्ते व भावनाएं, जिनके बगैर जीवन का कोई अर्थ नहीं, आख़िर क्यों वे एक दौर आने पर ठहरने से लग जाते हैं. आपसी समझ व अपनापन कम होने लगता है.

एक-दूसरे के प्रति नाराज़गी व उदासी इस कदर बढ़ जाती है कि साथ रहना दूभर हो जाता है. रिश्तों की दरार को भरना मुश्किल हो जाता है. तब बस, यही सोच रहती है कि किसी भी तरह अलग हो जाएं हम, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कुछ अरसे बाद मन पछताता है और दिल वहीं लौटना चाहता है, जहां दुबारा जाना मुमकिन नहीं… जैसे- बचपन, पुराना घर, मासूमियत, पुराने दोस्त, क्योंकि उम्र चाहे जितनी भी हो, सुना है दिल पर कभी झुर्रियां नहीं पड़तीं… पर रिश्तों पर पड़ी गांठ अपनों को दूर कर ही देती है.

कभी ज़रूरतें जुदा कर देती हैं…

श्रीवास्तवजी की बड़ी ख़्वाहिश थी कि बड़ा-सा घर लें और परिवार के साथ इकट्ठे रहें. इसके लिए तमाम जोड़-तोड़ करते हुए आख़िरकार उन्होंने घर ले ही लिया. पत्नी व दोनों बेटों के साथ रहने लगे, लेकिन धीरे-धीरे बहुत कुछ बदलने लगा. बेटों की अपनी ख़्वाहिशें, ज़रूरतें इतनी बड़ी होती चली गईं कि वे दूसरे शहरों में चले गए. बड़े अरमान से श्रीवास्तवजी ने घर लिया था, जो अब सूने दरो-दीवारवाला खाली मकान रह गया है. यहां चूक तो किसी से नहीं हुई. बस, प्राथमिकताएं सबकी अलग-अलग थीं.

घर का वजूद क्यों है?

आख़िर इंसान घर क्यों बनाता है? अपनी व परिवार की सुरक्षा, मज़बूत स्थिति, साथ और ठहराव के लिए ही ना! वरना कइयों की तो पूरी ज़िंदगी बीत जाती है अपना एक घर बनाने में, लेकिन घर की भी एक ख़ूबसूरत परिभाषा होती है, पहचान होती है, जिससे वो घर कहलाता है. वो है प्यार, अपनापन, सहयोग, एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देना आदि.

छोटी-छोटी बातों की ख़ुशियां, छोटी-ब़ड़ी उपलब्धियों से जुड़े यादगार पल ही तो एक गारे-सीमेंट से बने मकान को मोहब्बतभरा घर बना देते हैं, क्योंकि वहां पर माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, बच्चों, रिश्तेदारों से जु़ड़े जाने कितने प्यारभरे लम्हे होते हैं. बचपन की शरारतें, नोक-झोंक, ख़ुशी-ग़म के पल, उम्मीदें, महत्वाकांक्षाएं, प्यार की सौग़ात… अनगिनत भावनाओं का समंदर अपने में संजोए व समेटे होता है घर…

व़क्त बेवफ़ाई कर गया…

आज कमबख़्त व़क्त ही तो नहीं है हम सभी के पास. हर कोई अपनी-अपनी ख़्वाहिशों की उलझनों में उलझा-सा है. कहीं बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चले जाते हैं, तो कहीं नौकरी की ख़ातिर बेटे दूर हो जाते हैं और मजबूर पैरेंट्स अपने ही घर में तन्हा रह जाते हैं. फिर भी एक आस व विश्‍वास रहता है कि एक दिन वे लौटकर आएंगे,

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जैसे- उम्मीदें तैरती रहती हैं.. कश्तियां डूब जाती हैं… कुछ घर सलामत रहते हैं, आंधियां जब भी आती हैं.. बचा ले जो हर तूफ़ां से, उसे आस कहते हैं… बड़ा मज़बूत है ये धागा, जिसे विश्‍वास कहते हैं… पैरेंट्स का विश्‍वास ही तो होता है, जो उन्हें हर पल, यह उम्मीद बंधाता रहता है कि उनका मकान फिर से घर बन जाएगा… अपनों की चहल-पहल से घर का हर ज़र्रा रौशन हो जाएगा…

मैं मकान हूं, घर नहीं…

पढ़ाई, नौकरी, ज़रूरतों से भरी भागती ज़िंदगी ने हमें एक ऐसा खिलाड़ी बना दिया है, जो हर रोज़ बस दौड़ रहा है. घर से ऑफिस, स्कूल-कॉलेज, क्लासेस, बिज़नेस… यानी हम सभी बस सुबह से शाम एक अनजानी-अनकही-सी प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हुए बस भाग रहे हैं और घर रात बिताने का ज़रिया-सा बनता जा रहा है. यानी जहां पर हम रात को पहुंचते हैं और सुबह फिर से निकल जाते हैं सफ़र के लिए. तभी तो कभी भावनाओं से रचे-बसे घर को भी आख़िर कहना पड़ जाता है कि- ‘जनाब मैं घर नहीं मकान हूं. वो तो बहुत पुरानी बात हुई जब मुझे ‘घर’ कहा जाता था… सभी मेरे पास थे. हंसी के कहकहे, शरारतों की अठखेलियां होती थीं, खाने-खिलाने का लंबा दौर चलता था, तीज-त्योहारों की रौनक़ होती थी,

अपने-पराए सभी मिल जाते थे… बड़ा बेशक़ीमती व़क्त था वो और मेरा वजूद भी इतरा उठता था अपनी ख़ुशक़िस्मती पर.’ घर का यह अनकहा दर्द बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है. आख़िर ये कहां आ गए हम!.. क्यों नहीं हमें ़फुर्सत अपनों के संग व़क्त गुज़ारने की? एक बार ज़रूर सोचिएगा इसके बारे में.

गुरुर में इंसान को इंसान नहीं दिखता..

जैसे अपने ही छत से अपना मकान नहीं दिखता…

सच, कुछ ऐसे ही हालात बन जाते हैं, जब हम अपने ही घर के अस्तित्व को अनदेखा करने लगते हैं. बहुत कुछ पाने की इच्छा ने हमें इस कदर स्वार्थी बना दिया है कि हम छोटी-छोटी ख़ुशियों को दरकिनार कर नाम-शौहरत के चक्कर में उलझते चले जा रहे हैं. ऐसे में रिश्ते भी प्राइस टैग की तरह हो गए हैं. यदि आपके पास पैसा है, तो आपकी कई ग़लतियां कोई मायने नहीं रखतीं, क्योंकि पैसों के बोझ तले वे दब जाती हैं. धन-दौलत व रुतबा हमें इस कदर अभिमानी बना देता है कि हमें अपने आगे कुछ दिखाई नहीं देता. दूसरों को नसीहत देना, उन पर उंगली उठाना, ख़ुद को श्रेष्ठ समझना हमारी फ़ितरत में शुमार हो जाता है. सबसे बेख़बर हम अपनी ही मदहोशी में रहते हैं.

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मनोवैज्ञानिक परमिंदर निज्जर का यह मानना है कि घर को लेकर हर किसी की सोच अलग-अलग होती है, जैसे-

* किसी के लिए घर सुरक्षा है, जहां पर वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हैं.

* कुछ के लिए घर सुकून व आराम करने का ठिकाना है.

* कुछ लोगों के लिए होटल जैसा है, जहां वे कुछ समय ख़ासकर रात बिताकर सुबह निकल जाते हैं.

* अधिकतर लोगों के लिए उनकी पहचान है घर, क्योंकि वहां पर उनकी नेमप्लेट है, जिस पर उनकी पहचान है.

* लेकिन इन सब चाहतों व ज़रूरतों के तले कहीं न कहीं घर के होने का सच्चा वजूद दफ़न-सा हो जाता है.

* हम यह क्यों भूल जाते हैं कि हमारे बचपन, लड़कपन की खट्ठी-मीठी यादों का पलछिन है घर.

* माता-पिता के त्याग-प्रेम, संघर्ष, अरमान, ख़ुशी, आशाओं का साक्षी है घर.

* रिश्तों की सोंधी ख़ुशबू, अपनों के

हास-परिहास का केंद्र बिंदु है घर.

* आज फिर ज़रूरत है मकान को घर बनाने की. रिश्तों को एक नए सिरे से सजाने की.

* कोशिश करें ज़िंदगी को रिवाइव करने की, ताकि बेनूर से घरौंदे को प्यारभरे एहसास से सींच सकें.

* ख़ुद को टटोलें, देखें कहां पर हैं हम? क्यों हमें इतनी जल्दबाज़ी, भागदौड़ है?

* अपनों को भरपूर समय दें, वरना ऐसा भी व़क्त आएगा, जब सब कुछ होगा, पर अपने न होंगे.

* रिश्ते हैं, अपने हैं, तो ज़िंदगी ख़ूबसूरत है और जीने का सबब भी है.

* ऐसी कामयाबी, नाम-शौहरत किस काम की, जहां अपनोें का साथ न हो.

तो आओ, फिर से अपने आशियाने को एक नए सिरे से सजाएं, अपनों के प्यार व साथ से भरपूर घर बनाएं…

– ऊषा गुप्ता

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