Tag Archives: family health

निर्णय लेने से क्यों डरते हैं आप? क्या हैं डिसाइडोफोबिया के शिकार? (Do You Suffer From Decidophobia)

Decidophobia

निर्णय लेने से क्यों डरते हैं आप? क्या हैं डिसाइडोफोबिया के शिकार? (Do You Suffer From Decidophobia)

जैसा कि नाम से थोड़ा-बहुत स्पष्ट होता है कि यह फोबिया यानी एक प्रकार का डर है. डिसाइडोफोबिया (Decidophobia) का मतलब है डिसीज़न यानी निर्णय लेने का भय. हम अपने आसपास भी देखते हैं कि बहुत-से लोग निर्णय लेने से घबराते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है. यह डर बहुत-सी बातों को लेकर हो सकता है कि उनका निर्णय कहीं ग़लत न निकल जाए, इस निर्णय से कहीं उन्हें कुछ नुक़सान न हो जाए, कहीं अपने ही लोग उनके बारे में कोई धारणा न बना लें… आदि.जैसा कि नाम से थोड़ा-बहुत स्पष्ट होता है कि यह फोबिया यानी एक प्रकार का डर है. डिसाइडोफोबिया का मतलब है डिसीज़न यानी निर्णय लेने का भय. हम अपने आसपास भी देखते हैं कि बहुत-से लोग निर्णय लेने से घबराते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है. यह डर बहुत-सी बातों को लेकर हो सकता है कि उनका निर्णय कहीं ग़लत न निकल जाए, इस निर्णय से कहीं उन्हें कुछ नुक़सान न हो जाए, कहीं अपने ही लोग उनके बारे में कोई धारणा न बना लें… आदि.

कारण

इस तरह के भय के कई कारण होते हैं, जैसे बाहरी अनुभव, जैसे- पहले कभी कोई दर्दनाक हादसा हुआ है, तो व्यक्ति हर बात को उससे ही जोड़कर देखने लगता है और कहीं न कहीं इसमें उसके जींस का भी हाथ होता है. उसे कुछ गुण, कुछ तत्व अपने पूर्वजों से मिलते हैं, जो उसे ऐसा बनाते हैं. शोध यह बताते हैं कि अनुवांशिकता यानी जेनेटिक्स और ब्रेन केमिस्ट्री के साथ लाइफ एक्सपीरियंस मिलकर इस तरह की स्थिति का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. इसके अलावा अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि जो लोग तनावग्रस्त होते हैं यानी जब आप डिप्रेशन में होते हैं, तब निर्णय लेने से अधिक डरते हैं, तो डिप्रेशन और डिसाइडोफोबिया का भी कहीं न कहीं एक अलग तरह का संबंध हो सकता है.

लक्षण

इसके लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप किस हद तक इस तरह के फोबिया का शिकार हैं. सामान्य लक्षणों में घबराहट, बेचैनी, सांस लेने में द़िक्क़त, पसीना आना, हृदय गति का तेज़ होना, मितली, मुंह का सूखना, ठीक से न बोल पाना आदि हो सकते हैं. हालांकि कुछ मामलों में यह डर बहुत नुक़सान नहीं पहुंचाता, लेकिन अगर ये आपकी सामान्य ज़िंदगी पर असर डालने लगे, तो समझ जाइए कि एक्सपर्ट की राय ज़रूरी है.

यह भी पढ़ें: प्रतिदिन कितना खाएं नमक? (How Much Salt Should You Have Per Day?)

कब जाएं एक्सपर्ट के पास?

जब आपके लक्षण बहुत ज़्यादा गंभीर हो जाएं, तो समझ जाएं कि अब देर नहीं करनी चाहिए.

आप निर्णय लेने से बचने के लिए हद से आगे बढ़ जाते हैं: आप कोई काम करना तो चाहते हो, लेकिन निर्णय लेने के डर से उसे नहीं करते. यह डर इतना हावी हो जाता है कि आप निर्णय लेने की स्थिति से बचने के लिए कई तरी़के अपनाने लगते हो. हालांकि यह जानलेवा नहीं है, लेकिन डिसाइडोफोबिया आपके रिश्तों को और प्रोफेशनल लाइफ को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है.

निर्णय लेने के लिए आप दूसरों पर निर्भर रहते हो: काउंसलर्स का कहना है कि आप हर निर्णय के लिए दूसरों पर ही निर्भर रहते हो और धीरे-धीरे आपकी दूसरों पर निर्भरता इतनी अधिक बढ़ जाती है कि आप ख़ुद कुछ कर ही नहीं पाते.

ग़लत लोगों और ग़लत तरीक़ों से गाइडेंस लेने लगते हो: ख़ुद निर्णय लेने की क्षमता को इस कदर खो देते हो कि आप ज्योतिषियों, बाबाओं या अन्य लोगों से सलाह लेने लगते हो. यहां तक कि अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए भी इन्हीं पर निर्भरता बढ़ जाती है, जो पूरी तरह अस्वस्थ है.

निर्णय लेने की स्थिति में पैनिक अटैक की आशंका: जैसे ही ऐसी परिस्थिति आती है कि आपको निर्णय लेना है, आपको पैनिक अटैक होने लगता है. आप बेचैन होने लगते हो, पसीना, हार्टबीट, मुंह का सूखना, चक्कर आना आदि लक्षण उभरने लगते हैं.

आपका निजी जीवन प्रभावित होने लगता है: निर्णय न ले पाने का यह डर जब आपके रिश्तों, करियर व अन्य बातों को प्रभावित करने लगता है, तब समझ जाइए कि आपको प्रोफेशनल की मदद लेनी होगी.

Decidophobia

ख़ुद करें अपनी मदद

  • सेल्फ हेल्प टेक्नीक्स के ज़रिए आप अपने इस डर पर काबू पा सकते हैं.
  • जब भी निर्णय लेने की स्थिति आए, लंबी व गहरी सांसें लें और इस परिस्थिति को तनावपूर्ण बनाने से बचें.
  • ख़ुद पर विश्‍वास जताएं कि हां, मैं यह कर सकता/सकती हूं. श्र जल्दबाज़ी न करें.
  • अपने मन की बात बोलने से हिचकिचाएं नहीं.
  • अगर आपको लगता है कि आपको सेकंड ओपिनियन की ज़रूरत है, तो जो आपके क़रीबी हैं और जिन पर आप भरोसा करते हो, उनसे शेयर करो और उनसे सलाह लो.
  • अपने इंस्टिंक्ट्स की आवाज़ सुनें यानी आपका दिल अगर किसी बात की गवाही दे रहा है, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें.
  • अगर आपका निर्णय ग़लत भी साबित हुआ, तो उसे स्वीकारने से पीछे न हटें. इस बात से डरें नहीं कि आपने ग़लत निर्णय ले लिया.
  • अगर आपको नशे की लत है, तो उसे कम करने का प्रयास करें.
  • हारने के डर को मन से निकाल दें.
  • कुछ ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ेस करें, योग व ध्यान करें. इससे आपका मन शांत होगा, डर दूर होगा और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होगी.
  • अपनी सोच व अप्रोच बदलें. यह सोचें कि आप भी बाकी लोगों की तरह ही हैं और आप से भी ग़लती हो सकती है, क्योंकि ऐसा कोई नहीं, जिससे गलती न हो.
  • ग़लतियों से ही सीखा जाता है, इस नज़रिए के साथ आगे बढ़ें.
  • यदि बचपन में या कभी अतीत में आपके साथ कुछ ऐसा हादसा हुआ हो, जिससे आप अभी निर्णय लेने से डर रहे हों, तो उस हादसे से वर्तमान को न जोड़ें. हर परिस्थिति अलग होती है और ज़रूरी नहीं कि हर बार ग़लती ही हो.
  • बुरी यादों को याद करने से बेहतर है सकारात्मक बातों के साथ वर्तमान को जोड़ा जाए.
  • हादसे सभी के साथ होते हैं, इसका यह मतलब नहीं कि उसे ज़िंदगीभर हावी रखें. उन्हें भुलाकर आगे बढ़ना सीखें.
  • यदि सेल्फ हेल्प से भी आप अपने डर को दूर नहीं कर पा रहे, तो एक्सपर्ट के पास ज़रूर जाएं और अपने जीवन को बेहतर बनाएं.

 – ब्रह्मानंद शर्मा 

यह भी पढ़ें: दूर करें डायटिंग से जुड़ी गलतफमियां (Diet Myths And Facts)

चार तरह के होते हैं बॉडी फैट्स: आपका कौन-सा है? (4 Types Of Body Fats: Which One Do You Have?)

आप क्या खाते हैं, कितना खाते हैं और किस तरह से खाते हैं- इसी के आधार पर हमारे शरीर (Body) की संरचना होती है और धीरे-धीरे हमारा शरीर एक विशेष आकार में आ जाता है. इसी आकार के कारण हमारी शारीरिक बनावट अलग-अलग होती है. हम यहां पर चार अलग-अलग तरह के बॉडी फैट्स (Types Of Body Fats) के बारे में बता रहे हैं, जिनसे आप अपने बॉडी फैट्स (Body Fats) के बारे में जान सकते हैं.

Types Of Body Fats

1. हाई स्ट्रेस टाइप

काम की व्यस्तता, घरेलू परेशानियां या अन्य कारणों से अधिकतर लोग तनाव में रहते हैं. तनाव होने पर शरीर में कार्टिसोल नामक हार्मोंस का उत्पादन अधिक होता है और अधिक कार्टिसोल होने पर वह पेट के आसपास फैट्स के रूप में जमा होने लगता है.

कैसे छुटकारा पाएं ऐसे बॉडी फैट से?

–    कपालभाति और अन्य प्राणायाम करें.

–     ख़ुद को लिखने-पढ़ने, खेलनेे, संगीत, डांस आदि में व्यस्त रखें.

–     उपरोक्त के अलावा ऐसी गतिविधियों में व्यस्त रहें, जिससे हैप्पी हार्मोंस का उत्पादन बढ़े.

2. हाई शुगर टाइप

शक्कर के शौकीन लोगों में यह फैट अधिक जमा होता है. जब हम बहुत अधिक शक्कर का सेवन करते हैं, तो हमारा शरीर बहुत अधिक मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन करता है, जिसका शरीर पर साइड इफेक्ट होता है और कमर के आसपास फैट जमा होने लगता है.

कैसे छुटकारा पाएं ऐसे बॉडी फैट से?

–    शक्कर का सेवन कम करें.

–     लहसुन, दालचीनी, अजवायन को अपनी डायट में शामिल करें. ये मसाले शक्कर के प्रभाव को कम करते हैं.

–     प्लैंक, कोर टोनिंग, क्रंचेस जैसी एक्सरसाइज़ करें.

3. हाई एस्ट्रोजन टाइप

अगर आपके बट्स बहुत हैवी हैं, तो आपकी बॉडी में एस्ट्रोजन का लेवल बहुत हाई है.

कैसे छुटकारा पाएं ऐसे बॉडी फैट से?

–     हरी सब्ज़ियां, जैसे- ब्रोकोली, फाइटो केमिकल्स से भरपूर सब्ज़ियों का सेवन अधिक मात्रा में करें.

–     स्कवॉट एक्सरसाइज़ करके शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर संतुलित रख सकते हैं.

4. लो टेस्टोस्टेरॉन टाइप:

अगर आपको अपने बाइसेप्स के पास जमा फैट्स को कम करना मुश्किल लगता है, तो इसका मतलब है कि आपके शरीर में टेस्टोस्टेरॉन का लेवल बहुत कम है.

कैसे छुटकारा पाएं ऐसे बॉडी फैट से?

–     विटामिन डी से भरपूर चीज़ें, जैसे- मशरूम आदि अधिक से अधिक खाएं.

–     डायट के अलावा विटामिन डी सप्लीमेंट्स भी ले सकते हैं.

–     बाइसेप्स को टोन करनेवाली एक्सरसाइज़ करें.

– बेला शर्मा

यह भी पढ़ें: सेहत का हाल बताता है मुंह (What Your Mouth Says About Your Health)

यह भी पढ़ेंः जानिए सीने में जलन के लक्षण, कारण, उपचार और परहेज (Heartburn Causes, Symptoms, Diagnosis, Treatment And Prevention)

त्रिफला के 5 चमत्कारी हेल्थ बेनीफिट्स (5 Health Benefits Of Triphala)

Health Benefits Of Triphala
Health Benefits Of Triphala
त्रिफला के 5 चमत्कारी हेल्थ बेनीफिट्स (5 Health Benefits Of Triphala)

आज के दौर में हर उम्र के व्यक्ति को जीवनशैली यानी लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां होना आम बात है. बदलते फास्ट लाइफ और बदलते समय के साथ-साथ, हमारे खाने-पीने की आदतों में एक बड़ा बदलाव आया है, जिसने हमारे स्वास्थ्य को भी बुरी तरह प्रभावित किया है, ख़ासतौर से हमारे पाचन तंत्र पर इसका काफ़ी असर हुआ है. लेकिन अपने पाचन तंत्र को हेल्दी बनाए रखने का एक बेहद आसान तरीका है अपने डेली रुटीन में त्रिफला को शामिल करना.

त्रिफला सबसे प्रसिद्ध आयुर्वेदिक हर्बल उपचारों में से एक है. यह तीन फलों- आंवला, बहेड़ा और हरितकी का मिश्रण है. डॉ. हरिप्रसाद, अनुसंधान वैज्ञानिक, हिमालय ड्रग कंपनी आपको ऐसे पांच कारण बता रहा है, जिन्हें पढ़कर आपको लगेगा कि अपने दैनिक आहार में त्रिफला को क्यों शामिल करना चाहिए.

कब्ज़ से राहत: आयुर्वेद ग्रंथों और समकालीन शोध अध्ययनों में कहा गया है कि त्रिफला पेट को खाली करने की प्रक्रिया को तेज़ करता है और लंबे समय से बनी कब्ज़ से राहत देतीा है. त्रिफला के तीन हर्बल अवयवों में से प्रत्येक हमारे शरीर की देखभाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसकी जड़ी-बूटियां हमारे शरीर से आंतरिक कचरे को बाहर निकालकर सफाई करने में मदद करती है. साथ ही साथ, इससे पाचन में भी सुधार होता है.

जठरांत्र या गैस्ट्रो-इंटेस्टानल टिश्यूज़ को शांत और जीवंत करना: त्रिफला में मिले आंवला में शामक और प्रदाह शांत करनेवाले गुण होते हैं, जो आंतों के अंदरूनी परत को फिर से जीवंत करने में मदद करता है. यह आंतों की दीवारों को ठंडा और
शांत करता है, इससे पेट फूलने और डकार-उबकाई से राहत मिलती है.

यह भी पढ़ें: बच्चों के आम रोगों के उपयोगी घरेलू नुस्ख़े (Useful Home Remedies For Common Diseases Of Children)

धीरे-धीरे नियमितता बनाए रखता है: त्रिफला चयापचय को उत्तेजित करने में मदद करता है और हमारे शरीर के पाचनतंत्र को आराम देता है. हर रात सोने से पहले एक छोटी-सी खुराक मल त्याग को विनियमित करने में मदद करती है.

शरीर को विषमुक्त करता है: आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार त्रिफला का चूर्ण शरीर से चयापचय और पाचन के बाद बचे व्यर्थ पदार्थों से शरीर को शुद्ध करके पेट और बड़ी आंत के विषमुक्त करता है.

प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट: त्रिफला में कई एंटीऑक्सीडेंट तत्व शामिल हैं, जिनमें गैलिक एसिड, फ्लेवोनॉइड्स और टैनिन प्रमुख हैं, ये शरीर में स्वाभाविक रूप से ऐसे मुक्त कणों को निशाना बनाता है, जो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने में

सक्षम होते हैं. तीन फलों से प्राप्त हुए सक्रिय तत्व एंटीऑक्सीडेंट के प्रभाव को बढ़ाते हैं और मल त्याग के लिए प्रेरित करते हैं.
तो त्रिफला का प्रयोग अब नियमित रूप से करें और अपनी संपूर्ण सेहत का ध्यान रखें, ताकि आनेवाला कल सेहतमंद बने.

यह भी पढ़ें: हींग के 12 हेल्थ बेनिफिट्स (Top 12 Health Benefits Of Hing)

8 कुकिंग ट्रिक्स जो आपके परिवार को रखेंगे हेल्दी (8 Cooking Tips To Keep Your Family Fit & Healthy)

Healthy Cooking Tips

खाना बनाते समय महिलाएं अक्सर छोटी-छोटी ग़लतियां कर बैठती हैं, जिसका सीधा असर परिवार की सेहत पर पड़ता है. अगर इन छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखे, तो वे परिवार को रख सकती हैं, फिट एंड हेल्दी (Fit & Healthy).

Cooking Tips
1. मैदा से बने पास्ता की जगह साबूत अनाज से बने पास्ता को ट्राई करें.
2.डायट में वसा युक्त चीज़ों का प्रयोग कम से कम करें.

Healthy Foods
3.उनकी जगह फल, सब्ज़ी, दालें, साबूत अनाज, अंंडे, फैटलैस चिकन का सेवन अधिक करें.
4.बैड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ानेवाले फूड न खाएं.

और भी पढ़ें: आपके किचन गार्डन में छिपी हैं ये 9 होम रेमेडीज़ (9 Home Remedies Straight From Your Kitchen)

5.अपने भोजन में नमक का प्रयोग कम से कम करें.
6. भोजन का स्वाद बढ़ाने के लिए दालचीनी, सौंफ, जीरा और मेथी का प्रयोग करें.

Healthy Cooking Tips
7. ब्रेकफास्ट में इडली, पोहा, कॉर्नफ्लेक्स, ओट्स अधिक से अधिक लें.
8. अधिक तला भुना और तैलीय खाने की बजाय स्टर फ्राई, स्टीम्ड फूड व बेकिंग जैसी कुकिंग टेकनीक्स का प्रयोग करें.

और भी पढ़ें: 10 कुकिंग टिप्स, जो बनाएंगे आपके खाने को टेस्टी (10 Cooking Tips To Make Your Foods Tasty)

 – देवांश शर्मा

टॉप 30 Amazing इम्यूनिटी बूस्टर फूड(30 power foods that boost immunity)

immunity booster food

क्या आप अक्सर सर्दी-ज़ुकाम की शिकार हो जाती हैं या आपको इंफेक्शन बहुत जल्दी हो जाता है? इन सबका कारण कमज़ोर इम्यून सिस्टम है, जिसकी वजह से आप जल्दी बीमार हो जाती हैं. डायट से कैसे सुधारें इम्यून सिस्टम?

immunity booster food

इम्यून सिस्टम यानी प्रतिरोधक प्रणाली दुरुस्त न हो, तो हम बहुत जल्द बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. इम्यून सिस्टम के कमज़ोर होने का सबसे बड़ा कारण है डायट में न्यूट्रीएंट्स की कमी. तो आइए जानते हैं, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले कुछ खाद्य पदार्थों के बारे में, ताकि इन्हें अपनी रोज़मर्रा की डायट में शामिल कर आप हमेशा सेहतमंद बने रहें.

सब्ज़ियां

सब्ज़ियां खाने से कोलेस्ट्रॉल व हृदय रोग की संभावना कम होती है. इनसे शरीर को विटामिन व मिनरल्स मिलते हैं, जिनसे इम्यून सिस्टम तंदुरुस्त रहता है.
मेथी
– रोज़ाना मेथी खाने से एनीमिया से राहत मिलती है.
– मेथी डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए भी लाभदायक है.
– डिलीवरी (प्रसव) के बाद इसे खाने से मां को अच्छा दूध आता है.
पालक
– इसमें आयरन, कैल्शियम काफ़ी मात्रा में होता है, जो एनीमिया में लाभदायक है.
– पालक व अन्य हरी सब्ज़ियों में विटामिन, मिनरल, फॉलिक एसिड व फाइबर्स होते हैं.
गाजर
– गाजर विटामिन ए, कैरोटिनाइड और एंटी ऑक्सीडेंट का स्रोत है.
– गाजर के सेवन से लंग कैंसर की संभावना कम होती है.
– विटामिन ए आंखों के लिए अच्छा होता है एवं मोतियाबिंद की संभावना को भी कम करता है.
टमाटर
– टमाटर का नियमित सेवन दिल की बीमारी में आराम पहुंचाता है.
– कोलेस्ट्रॉल हाई हो, तो नियमित रूप से टमाटर का जूस पीएं.
– टमाटर एलडीएल (बैड कोलेस्ट्रॉल) का लेवल कम करने में भी सहायक होता है.
– इसमें लाइकोपेन होता है, जो शरीर में मौजूद फ्री रेडिकल्स को न्यूट्रलाइज़ कर देता है, जिससे फ्री रेडिकल्स हमारे शरीर को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते.
– इसके नियमित सेवन से त्वचा पर पड़ने वाली झुर्रियों से लेकर हार्ट अटैक जैसी संभावित स्वास्थ्य समस्याओं का ख़तरा कम हो जाता है.

फल

ये एंटी-ऑक्सीडेंट के भंडार होते हैं. इन्हें रोज़ खाया जाना चाहिए.
सेब
– सेब विटामिन सी व पोटैशियम का अच्छा स्रोत है.
– यदि 1 या 2 सेब रोज़ खाए जाएं, तो एनर्जी लेवल में बढ़ोतरी होती है.
– इससे इम्यून सिस्टम स्ट्रॉन्ग होता है और ब्लडप्रेशर भी कम होता है.
संतरा
– यह विटामिन ङ्गसीफ का स्रोत है.
– संतरा कैंसर से बचाव, ब्लड सर्कुलेशन (रक्तसंचार) बढ़ाने, घावों को जल्दी भरने मेें भी सहायक है.
अंगूर
– हरे व काले दोनों तरह के अंगूरों में एंटी ऑक्सीडेंट होते हैं.
– ये नसों को संकीर्ण और कड़ा होने से बचाते हैं.
– अंगूर में पाए जाने वाले इलॉजिक एसिड में एंटी कैंसर गुण भी होते हैं.
– इसमें एन्थोसाएनिन्स की मात्रा अधिक होती है.
– ये शरीर में मौजूद ख़राब एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को नष्ट करता है और ख़ून के थक्के नहीं जमने देता.
बेरीज़
– सभी बेरीज़, जैसे- स्ट्रॅाबेरी, ब्लूबेरी, केनबेरी आदि विटामिन एवं फाइटोकेमिकल्स के अच्छे स्रोत हैं.
– फाइटोकेमिकल्स ऐसे पदार्थ हैं, जो बीमारियों से बचाते हैं.
– स्ट्रॉबेरी में एंटी कैंसर गुण भी होते हैं.
– इसे खाने से कमज़ोरी और डिप्रेशन दूर होता है.
केला
– इसे ङ्गइंस्टेंट एनर्जी बूस्टरफ कहना सही होगा, क्योंकि इसे खाने पर तुरंत एनर्जी मिलती है.
– इसमें 3 प्रकार की प्राकृतिक शर्करा होती है- ग्लूकोज़, सूक्रोज़ और फ्रक्टोज़.
– इसमें पाए जानेवाले हाई फाइबर कब्ज़ दूर करने में सहायक होते हैं.
– इसके अलावा केले का सेेवन अल्सर, एनीमिया, ब्लडप्रेशर, डिप्रेशन आदि में भी उपयोगी होता है.
नाशपाती
– यह पेक्टीन फाइबर व पोटैशियम का स्रोत है.
– पेक्टीन कोलेस्ट्रॉल कम करता है, शरीर को टॉक्सीन से मुक्त रखता है.
– इसमें सोडियम, फॉस्फोरस, कॉपर, विटामिन ए, सी भी होता है. यह व्हाइट सेल्स को इंफेक्शन से लड़ने के लिए उत्तेजित करता है और फ्री रेडिकल्स से होनेवाले नुक़सान से बचाता है.
तरबूज़
– इसमें प्रचुर मात्रा में लाइकोपेन पाया जाता है.
– ये प्रोस्टेट कैंसर के ख़तरे को कम करता है.
आड़ू
– इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइट्रेट विटामिन सी, ए और फाइबर होते हैं.
– मेनोपॉज़ के बाद की समस्याओं से बचने के लिए रोज़ 2 पीचेज़ खाना लाभदायक है, क्योंकि इसमें पाया जानेवाला ङ्गबोरोनफ एस्ट्रोजन हार्मोन लेवल को बढ़ाता है.
आंवला
– आंवले में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो इम्यून सिस्टम को बहुत मज़बूत बनाता है.
– रोज़ सुबह आंवले का रस और शहद मिलाकर खाया जाए, तो अनेक बीमारियों से बचाव होता है.

सलाद

सलाद में खाए जानेवाले पदार्थ भी इम्यून सिस्टम दुरुस्त करने में सहायक होते हैं.
खीरा
– यह ठंडी प्रकृति का, डाययूरेटिक (मूत्रवर्द्धक) व त्वचा के लिए फ़ायदेमंद होता है.
– खीरे का ताज़ा रस सीने की जलन, एसिडिटी, एक्ज़िमा, आर्थराइटिस, गेस्ट्राइटिस व अल्सर में भी फ़ायदा
पहुंचाता है.
शतावरी
– इसमें कैलोरीज़ न के बराबर और विटामिन व मिनरल प्रचुर मात्रा में होते हैं, जैसे- विटामिन ए, बी, सी, बी 9 आदि.
– एस्पेरेगस में पाया जानेवाला विटामिन ए त्वचा व बालों के लिए एवं फाइबर आंतों की सफ़ाई के लिए फ़ायदेमंद होता है.
मूली
– इसमें ज़िंक काफ़ी मात्रा में होता है.
– यह मूत्रवर्द्धक होती है.
– इसकी पत्तियों में आयरन, कैल्शियम व विटामिन सी होता है.
बीटरूट
– इसमें आयरन, पोटैशियम व विटामिन सी होता है.
– यह लिवर को डिटॉक्स करता है और इम्यून सिस्टम को तंदुरुस्त रखता है.
नींबू
– इसमें इम्यून सिस्टम को स्ट्रॉन्ग बनाने वाला विटामिन सी व फ्लेवोनॉइड नामक कंपाउंड पाया जाता है.
– इसमें एंटी-कैंसर व एंटी-ऑक्सीडेंट के गुण भी होते हैं.
– यह त्वचा और मसूड़ों को हेल्दी बनाता है.
हरी धनिया
– इसमें आयरन होता है.
– यह भोजन का स्वाद बढ़ाता है तथा एलर्जी व अपचन से बचाता है.
दही
– दही में ज़िंक होता है, जिसकी कमी से इम्यून सिस्टम कमज़ोर हो जाता है.
– इसमें कैल्शियम, विटामिन ई व प्रोटीन होता है.
– दही खाने से मुंह से आनेवाली बदबू कम होती है.
– पाचन नली के हानिकारक बैक्टीरिया से लड़ने में मदद मिलती है, जिससे पाचन क्रिया ठीक रहती है.
साथ ही पेट संबंधी सारी समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है.
शहद
– इसमें प्राकृतिक शर्करा व कार्बोहाइड्रेट होेता है, जो शरीर में आसानी से अवशोषित हो कर इंस्टेंट एनर्जी देते हैं, जिसका असर लंबे समय तक रहता है. अतः एथलीट व रनर्स अपनी डेली डायट में इसका उपयोग करते हैं.
– यह स्ट्रेस बूस्टर व एंटीसेप्टिक भी है.
पार्सले
– इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, कैल्शियम, पोटैशियम, मैगनीज़, आयरन होता है.
– यह भी इम्यून सिस्टम को दुरुस्त रखने में सहायक है.
तुलसी
– इसके पत्ते गैस की समस्या, मितली व पेट की समस्या से भी निजात दिलाते हैं.
– हेपेटाइटिस व टाइफ़ाइड से बचने के लिए इसके 5 पत्ते रोज खाएं.
ड्रायफ्रूट्स
– सभी ड्रायफ्रूट्स विटामिन्स, फ़ाइबर, मिनरल आयरन व कैल्शियम के स्रोत हैं.
– ये बहुत हेल्दी होते हैं. इनमें हाई प्रोटीन व फैट होता है.
– ब्रेनफूड बादाम विटामिन ई का स्रोत है, जो त्वचा की झुर्रियां व कोलेस्ट्रॉल कम करता है.
– अखरोट में ओमेगा 3 ़फैटी एसिड होता है, जो आर्थराइटिस कम करता है.

अनाज

विभिन्न अनाजों में मौजूद उपयोगी पदार्थ भी इम्यून सिस्टम बढ़ाते हैं, जिससे हम बने रहते हैं सेहतमंद.
दालें (सभी तरह की)
– इनमें सभी आवश्यक एमीनो एसिड्स होते हैं.
– इनमें 20-25% प्रोटीन होता है, जो गेहूं में पाए जाने वाले प्रोटीन से दुगुना और चावल के प्रोटीन से तिगुना होता है.
सोयाबीन
– इसमें ओमेगा 3 व ओमेगा 6 फैटी एसिड्स होते हैं, जो हेल्थ के लिए अच्छे हैं.
– मेनोपॉज़ व ऑस्टियोपोरोसिस में इसका उपयोग बहुत फ़ायदा पहुंचाता है.
बीन्स
– बीन्स में विटामिन बी व पोटैशियम होता है.
– ये कोलेस्ट्रॉल कम करने, ब्लड शुगर नियंत्रित करने और ब्लडप्रेशर, कैंसर व मोटापे का रिस्क कम करने में
सहायक हैं.
ओट्स (जई)
– इसमें कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम, सिलिकॉन, विटामिन बी व ई होते हैं. नाश्ते में इनका सेवन सेहतमंद होता है.
ये पाचन में भी मदद करते हैं.
– कोलेस्ट्रॉल कम करने व डायबिटीज़ के लिए फ़ायदेमंद हैं.
फ्लेक्स सीड्स (अलसी)
– फ्लेक्स सीड्स में ओमेगा 3 फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में होता है, अतः इसके सेवन से हृदय रोग, कैंसर, आर्थराइटिस जैसी बीमारियों से बचाव होता है.
– इसमें मैगनीज़, फ़ॉलिक एसिड, कॉपर, फ़ॉस्फ़ोरस व विटामिन बी 6 होता है.
– यदि रोज़ इसका सेवन किया जाए तो सोरायसिस, ऑस्टियोपोरोसिस, डायबिटीज़ व एलर्जी में फ़ायदा
होता है.
तिल
– इसमें विटामिन ए, बी, ई के अलावा कैल्शियम, कॉपर, फ़ॉस्फ़ोरस, मैगनीज़, पोटैशियम व ज़िंक भी होता है.
पॉपी सीड्स (खसखस)
– यह गर्भवती व दूध पिलाने वाली मांओं के लिए बहुत फ़ायदेमंद है.
– इसमें कैल्शियम, फॉस्फोरस होता है.
– यह शरीर के पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है.

 

10 गुड फूड, 10 बैड फूड (10 Good Food 10 Bad Food)

बचें इन 25 मेडिसिन मिस्टेक्स से (Dangerous Medication Mistakes You Need to Avoid)

दवाइयां प्रिसक्राइब करते समय डॉक्टर दवाएं लेने का समय व तरीक़ा भी बताते हैं, पर कई लोग डॉक्टर के इंस्ट्रक्शंस फॉलो नहीं करते. नतीजा दवाएं उतना फ़ायदा नहीं करतीं या उनके साइड इफेक्ट्स सामने आने लगते हैं. इसलिए ज़रूरी है कि दवाइयां लेते व़क्त कुछ बातों का ध्यान रखा जाए.

Medication Mistakes

डॉक्टर से लें पूरी जानकारी

 

– डॉक्टर के प्रिसक्रिप्शन को उनके सामने एक बार पढ़ लें, ताकि आपको दवाइयों के नाम समझ में आ जाएं.
– डॉक्टर से पूछ लें कि दवा कब खानी है और कैसे खानी है? कई बार कुछ दवाएं भोजन से पहले लेनी होती हैं, तो कुछ खाने के बाद.
कितने दिनों का डोज़ है? इसकी जानकारी भी लें, ताकि दवाओं का कोर्स पूरा हो सके.
– डॉक्टर से ये भी पूछें कि कौन-सी दवा आपको किस लिए दी गई है? और अगर कोई दवा मिस हो गई हो तो क्या करना चाहिए?
– ये भी जानना ज़रूरी है कि इन दवाओं को लेते व़क्त क्या खानपान से संबंधित परहेज़ करने की ज़रूरत है?
– दवाइयों से होनेवाले साइड इफेक्ट्स और उस परिस्थिति में क्या करना चाहिए? इसके बारे में भी पूछ लें.
– पहले से ही कोई दवा अगर ले रहे हैं या कोई एलर्जी है तो इसकी जानकारी भी डॉक्टर को दें.

दवाइयां ख़रीदते व़क्त

– सबसे पहले ज़रूरी है कि आप सही दवा ख़रीदें. केमिस्ट को डॉक्टर की पर्ची पकड़ाकर दवाइयां न ख़रीदें. प्रिसक्रिप्शन पर लिखे नाम और केमिस्ट द्वारा दी हुई दवाइयों के नाम मैच कर के देख लें.
– मेडिसिन के पैकेट पर लिखे एक्सपायरी डेट को पढ़ना न भूलें.
– कोशिश करें कि आप एक ही मेडिकल स्टोर से सभी दवाएं ख़रीदें. ऐसे में स्टोरवाले को आपकी बीमारी और दवाइयों की पूरी जानकारी होगी.

दवाइयां खाते समय

 

Medication Mistakes
– दवाइयां खाने से पहले डॉक्टर द्वारा बताए गए निर्देशों का पालन अवश्य करें. खाने के समय, मील साइज़ आदि का असर भी दवाओं पर पड़ता है.
– दवाइयों की एक पर्ची बना लें और किसी सुरक्षित जगह रख दें या कहीं ऐसी जगह चिपका दें, जहां आपका ध्यान जाए.
– समय पर दवा लें. सुबह, शाम और रात की दवा डॉक्टर के बताए अनुसार ही लें.
– अगर कोई डोज़ मिस हो गया है, तो याद आने पर तुरंत डोज़ ले लें, लेकिन याद रखें मिस्ड डोज़ को लेने के चक्कर में आप डबल डोज़ न लें यानी अगर अगले डोज़ का समय हो गया हो, तो पहले वाला डोज़ छोड़ दें और अगले दिन से समय पर दवाइयां लें.
– दवा की मात्रा का ध्यान ज़रूर रखें. डॉक्टर द्वारा बताई गई मात्रा में ही दवा लें तभी वो फ़ायदा करेंगी. ज़्यादा दवा खा लेने से बीमारी ठीक होने की बजाय बढ़ जाएगी.
– बिना डॉक्टर से पूछे दवाइयां लेना बंद न करें.
– दवाइयों का जितने दिन का कोर्स दिया गया है, उसे पूरा करें.
– दवाइयां बच्चों की पहुंच से दूर रखें.
– दवाओं को उस पर लिखे गए निर्देशों के मुताबिक़ ही स्टोर करें. गर्मी या नमीवाली जगह पर दवा को न रखें.
– अल्कोहल या कोल्ड्रिंक्स के साथ दवाइयां न लें.
– ओवर द काउंटर दवाइयां अगर ले रहे हैं, तो इसे खाने से पहले इसके साइड इफेक्ट की पूरी जानकारी लें. कई बार दवा की बॉटल या पैकेट पर उससे होनेवाले साइड इफेक्ट्स के बारे में लिखा होता है.
– ओवर द काउंटर मिलनेवाली दवाओं पर लिखे गए निर्देशों को पढ़ लें. जैसे- खांसी की दवा दो तरह की होती है, एक सूखी खांसी के लिए, दूसरी बलगमवाली खांसी के लिए. अगर आपने ग़लती से सूखी खांसी के लिए बलगमवाली खांसी की सिरप ले ली तो तकलीफ़ और
बढ़ जाएगी.
– कुछ ऐसी दवाएं भी होती हैं, जो एक साथ नहीं ली जा सकती हैं, क्योंकि उन्हें एक साथ लेने से दवाओं का रिएक्शन हो सकता है या किसी एक दवा का असर कम हो सकता है.
– यदि दवा पानी के साथ लेना है, तो केवल दवा को निगलने के लिए ही नहीं, बल्कि पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं, क्योंकि कम पानी के साथ दवाई लेने से हो सकता है कि दवा गले में ही अटक जाए या ठीक से न घुल पाए.
– दवा को तोड़कर या कूटकर न खाएं. जब तक की डॉक्टर की तरफ़ से ऐसा करने का निर्देश न हो.
– अपनी दवा किसी दूसरे व्यक्ति को खाने के लिए न दें, फिर भले ही लक्षण समान क्यों न हो. हर व्यक्ति की शरीर की बनावट व क्षमता अलग-अलग होती है.
– दवाइयां ख़त्म होने से पहले ख़रीद लें, ताकि कोई डोज़ मिस न हो.

लापरवाही न करें

– अपनी मर्ज़ी से पुराने प्रिसक्रिप्शन के आधार पर दवाएं न खाएं, ये बेहद ख़तरनाक हो सकता है. दवाएं हमेशा उस व़क्त के लक्षणों को देखकर दी जाती हैं.
– दवा लेने पर अगर पेट में दर्द हो, त्वचा पर रैशेस या सूजन आ जाए, तो उस दवा को न लें और फ़ौरन डॉक्टर से संपर्क करें.
– कई बार पैकेट खोलने के बाद दवाएं पिघली हुई या डैमेड हों, तो उस दवा को न खाएं.
– एक्सपायर्ड दवाइयां फेंक दें.
– अगर कहीं बाहर जा रहे हों, तो दवाइयों का एक्सट्रा पैकेट साथ रखें, ताकि दवा ख़त्म हो जाने पर डोज़ मिस न हो जाए.
– सफ़र के दौरान मेडिसिन किट सूटकेस में न रखकर अपने पास हैंडबैग में रखें.
– तंबाकू और धूम्रपान भी दवाओं के असर को कम कर देती हैं. अगर दवा का कोर्स कर रहे हों, तो धूम्रपान बंद कर दें.

खाने के पहले और खाने के बाद की दवाओं का मतलब

कई बार डॉक्टर अपनी पर्ची में लिखते हैं कि ये दवाएं खाने से पहले लें और दूसरी दवाएं खाने के बाद. डॉक्टर के इन निर्देशों का पालन करना ज़रूरी है, नहीं तो दवा बेअसर हो सकती है.

खाली पेट या भोजन के पहले दवा

– कुछ ऐसी दवाएं होती हैं, जो पानी के साथ जल्दी घुल जाती हैं और असर करती हैं. खाने के बाद अगर उन्हें लिया जाए, तो भोजन के साथ उन्हें घुलने में व़क्त लगता है, जिससे दवा का असर कम हो जाता है. खाने के साथ अगर कुछ दवाओं को लिया जाए, तो पेट और आंत उसे एब्जॉर्ब नहीं कर पाता है.
– खाने में मौजूद नमक या अन्य चीज़ें, जैसे- पोटैशियम की अधिक मात्रा दवाओं के साथ मिलकर उसके असर को कम कर देती है.
खाने के बाद दवा

– कुछ ऐसी दवाएं होती हैं, जो पेट में जाकर एसिडिटी का कारण बनती हैं, जिससे पेटदर्द या उल्टी हो सकती है. इसलिए ऐसी दवाओं को भोजन के बाद लेने के लिए कहा जाता है.

 

नोट-
दवा भोजन से कितने देर पहले या कितने देर बाद लेनी है? इसके बारे में डॉक्टर से अवश्य पूछ लें.

– आर एल सिंह