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कहानी- समय की खोह (Short Story- Samay Ki Khoh)

Hindi Short Story

मानसिक तनाव से मुक्ति के प्रयास में पत्नी तक को भूल जाने वाला व्यक्ति तब भले ही स्वयं को छलता रहा हो, पर आज उसके पास कोई जवाब नहीं है. तब भले ही लोगों ने पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी अश्रुविहीन आंखें देखकर अध्यात्म प्रदत्त उदासीनता की संज्ञा दी हो, किन्तु वे जानते हैं कि यह सच नहीं था.

एकाएक उन्हें लगा कि पत्नी आवाज़ देकर बुला रही है. उनकी तन्द्रा टूट गई. दृष्टि घुमाकर उन्होंने चारों ओर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था.

पिछले कुछ दिनों से उन्हें बार-बार लगता है कि पत्नी उनसे हिसाब मांग रही है. मानसिक तनाव से मुक्ति के प्रयास में पत्नी तक को भूल जाने वाला व्यक्ति तब भले ही स्वयं को छलता रहा हो, पर आज उसके पास कोई जवाब नहीं है. तब भले ही लोगों ने पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी अश्रुविहीन आंखें देखकर अध्यात्म प्रदत्त उदासीनता की संज्ञा दी हो, किन्तु वे जानते हैं कि यह सच नहीं था. सच यह था कि पत्नी से जुड़ाव इतना कम हो गया था उनका कि आंसू आंखों में आये ही नहीं.

बाबा ने तब उन्हें गुरुमंत्र दिया था. द़फ़्तर के अलावा उनका सारा समय बाबा के दिखाए रास्ते पर चलने में गुज़रने लगा था. सुबह उठकर दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर स्नान करके कुछ देर भजन-पूजन में लगाकर वे डॉक्टर परमानन्द के पास चले जाते. वहां से द़फ़्तर और द़फ़्तर से सीधे बाबा के पास-आश्रम में. आश्रम में वे सत्संग सुनते. वहां चलने वाले ग्रन्थों के अखण्ड पाठ में लगभग दो घण्टे का समय देते. घर पहुंचकर रात्रि को भोजन करते-करते ग्यारह बज चुके होते, तब भी वे न सोते. होमियोपैथी की पुस्तकों का अध्ययन करके बारह-साढ़े बारह बजे बिस्तर पर जाते.

इस दिनचर्या से उनको सन्तुष्टि मिली हो या न मिली हो, किन्तु तनाव से उन्हें छुटकारा मिल गया था. सुबह से लेकर देर रात तक कुछ-न-कुछ करते रहने के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से वे इतने थक चुके होते कि कुछ और सोचने का समय उन्हें मिल ही नहीं पाता था. नींद अच्छी आने लगी थी. मुक्त, निर्द्वन्द्व मस्तिष्क, मन की नई अवस्था ने उन्हें आश्‍वस्त किया था कि होमियापैथी में पारंगत हो जाने के बाद बाबा के निर्देशानुसार निःशुल्क चिकित्सालय खोलकर वे आत्मसंतोष का वरण भी कर सकेंगे.

आत्मसंतुष्टि की खोज की इस प्रक्रिया में जो कुछ उनसे छूटता जा रहा था, उसके दुष्परिणाम उनकी दृष्टि से ओझल थे. पत्नी की अस्वस्थता को यदि संकेत मानकर वे सजग हो गए होते तो बाद में संभवतः नौबत ऐसी न आती. किन्तु आत्मसंतुष्टि के मार्ग की यात्रा का नशा इतना ज़्यादा था कि बाकी सब कुछ गैरज़रूरी लगता था उन्हें. पहले वे पत्नी को मासिक व्यय के लिए  एक बंधी राशि देकर गृह व्यवस्था से निश्‍चिंत होकर अपने कमरे में एकान्त का रसास्वादन किया करते थे. रहते चाहे अलग-थलग थे, मगर होते घर में ही थे. गृहस्थी की आवश्यकताओं की पूर्ति में पत्नी की मदद भले न करते हों, किन्तु घर में उनकी उपस्थिति मात्र पर्याप्त होती थी. पत्नी मानसिक रूप से उनके साथ बहुत गहराई तक जुड़ी हुई थी. दिनचर्या का निर्वाह वह भले ही अकेली कर लेती हो, किन्तु पति की निकटता उसकी मानसिक आवश्यकता थी. सब कुछ करके भी वह पति को ही घर का सर्वेसवा व प्रमुख मानती थी. पति उससे बहुत अधिक योग्य, बहुत अधिक सक्षम हैं, इस बात को सम्मानपूर्वक  अपने हृदय में आसीन किया हुआ था उसने.

अब जबकि व्यस्तताओं ने उन्हें घर से दूर कर दिया था, ऊपर से पूर्ववत् होते हुए भी सब कुछ सामान्य नहीं रहा था, फिर भी घर पहले की तरह चल रहा था. बच्चों के पालन-पोषण, उनकी देखभाल में कोई अन्तर नहीं आया था. भोजन भी आवश्यकतानुसार उन्हें वांछित समय पर परोस दिया जाता था. पहले की तरह ये सारे काम उनकी पत्नी करती जा रही थी, किन्तु उसके व्यवहार में एक विशेष प्रकार का परिवर्तन आता जा रहा था. वह बैठी होती तो बैठी ही रह जाती, हंसती तो बहुत देर तक हंसती रहती. आने-जाने वालों, नाते-रिश्तेदारों के साथ व्यवहार में या तो अनुपात से अधिक सौजन्य होता था या फिर एकदम रूखापन.

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इस परिवर्तन को वे कई दिनों तक लक्ष्य नहीं कर पाए. जब ध्यान आया भी तो अपने बाहर बने रहने के साथ वे इसका संबंध नहीं समझ पाए. परिणामतः सुघड़, बुद्धिमती और व्यवस्था निपुण उनकी पत्नी मानसिक और स्नायुविक शिथिलता का शिकार होती चली गई.

प्रारम्भ में वे इस आशा से निष्क्रिय बने रहे कि पत्नी स्वयं ठीक हो जाएगी. उन्होंने नहीं सोचा था कि पत्नी सिरदर्द, ज़ुकाम या खांसी से पीड़ित नहीं है कि पांच-सात दिन में अपने आप ठीक हो जाएगी. परिणामस्वरूप धीरे-धीरे वह क्या और क्यों का स्वाभाविक ज्ञान भी खो बैठी. वे सचेत तब हुए जब पत्नी की हरकतों में, बातचीत में, व्यवहार में और क्रियाकलापों में बेतुकापन बहुत ज़्यादा बढ़ गया.

तब कहीं जाकर उन्होंने चिकित्सकों से परामर्श किया. मानसिक चिकित्सालय में भर्ती कराकर पत्नी का उपचार कराया. चिकित्सकों का मत था कि पत्नी के हृदय पर कोई चोट पड़ी है, जिसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण उनके मस्तिष्क पर असर हुआ है. पत्नी के उपचार के लिए समय चाहिए, इसलिए उन्होंने बाबा से बातचीत करके आश्रम से सम्बन्धित अपनी गतिविधियां बन्द ज़रूर कर दीं, किन्तु तब भी यह एहसास उन्हें नहीं हुआ कि पत्नी की वर्तमान स्थिति के कारण वे स्वयं हैं, उनकी अनुपस्थिति ही इसका कारण है.

आत्मसंतोष की चाह ने कैसा मंददृष्टि बना दिया था उन्हें? उन दिनों वे लगातार पत्नी के साथ बने रहे थे. द़फ़्तर से छुट्टी ले ली थी. पूरा ध्यान चिकित्सा पर केंद्रित करके हर समय पत्नी की सुश्रुषा हेतु प्रस्तुत रहते. वह शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करने लगी तो उन्होंने श्रेय उपचार को दिया. तब भी वे समझ नहीं पाए कि पति की निकटता का योगदान उपचार से भी अधिक रहा है उनकी पत्नी को ठीक करने में.

लगभग दो माह के निरन्तर सान्निध्य और चिकित्सा के बाद उनकी पत्नी प्रत्यक्ष रूप से तो स्वस्थ हो गई, किन्तु उसकी बुद्धि की कुशाग्रता वापस न लौट सकी. चुप्पी, सुस्ती और अपना मत प्रकट न करना उसके स्वभाव के स्थायी अंग बन गए. घर में जहां वह बैठ गई तो बैठी ही रह जाती. लेटी तो लेटी रह जाती. इच्छा हुई तो नमस्ते कर दी, नमस्ते का जवाब दे दिया या मन में आया तो किसी से बात कर ली. किसी ने पूछा तो भोजन कर लिया, अन्यथा भूखी बैठी रही. एक ख़ास तरह की तटस्थता या कहा जाए निष्क्रियतापूर्ण तटस्थता और अवसाद उसे सदैव घेरे रहता.

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जैसा कि सामान्यतः होता है, प्रयत्नों के बावजूद पत्नी में गुणात्मक परिवर्तन  न पाकर उनकी  सुग्राहिता धीरे-धीरे कम होती चली गई. उनकी बन्द गतिविधियां पुनः प्रारम्भ हो गईं. डॉक्टर परमानन्द के पास जाकर होमियोपैथी चिकित्सा सीखने का क्रम फिर चल पड़ा. अलबत्ता रात को वे घर कुछ जल्दी लौटने लगे, किन्तु पत्नी के बारे में उनकी चिन्ता मात्र औपचारिक पूछताछ व औपचारिक बातचीत तक सिमट कर रह गई.

बाद में जब उनकी पत्नी का देहान्त हुआ, तो उनकी आंखों से आंसू का एक कतरा भी बाहर नहीं आया. वे पत्नी की मृत्यु से किंचित मात्र भी विचलित नहीं हुए. पत्नी की स्मृति में उनकी एक रात भी उनींदी नहीं गुज़री. अब अगर पत्नी उनसे हिसाब मांग रही है, तो वे क्या जवाब दें? जो भूल वे उस समय कर बैठे थे, उसका परिष्कार अब कैसे करें? अपना जीवन वे आत्मसंतोष के सुख से भर पाए हों या नहीं, किन्तु एक भरे-पूरे जीवन को मानसिक यंत्रणा के कगार पर ले जाकर मृत्यु के मुख में धकेल देने का जो काम अनजाने में उनसे हो गया, उसका क्या स्पष्टीकरण दें?

चौंककर उन्होंने फिर आंखें खोल दी हैं. कहीं कोई नहीं है. चालीस साल पुरानी समय की खोह में से निकलकर उनके स्नायुओं पर दस्तक देने के बाद पत्नी फिर अदृश्य हो गई है.

– भगवान अटलानी

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