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निर्णय लेने से क्यों डरते हैं आप? क्या हैं डिसाइडोफोबिया के शिकार? (Do You Suffer From Decidophobia)

Decidophobia

निर्णय लेने से क्यों डरते हैं आप? क्या हैं डिसाइडोफोबिया के शिकार? (Do You Suffer From Decidophobia)

जैसा कि नाम से थोड़ा-बहुत स्पष्ट होता है कि यह फोबिया यानी एक प्रकार का डर है. डिसाइडोफोबिया (Decidophobia) का मतलब है डिसीज़न यानी निर्णय लेने का भय. हम अपने आसपास भी देखते हैं कि बहुत-से लोग निर्णय लेने से घबराते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है. यह डर बहुत-सी बातों को लेकर हो सकता है कि उनका निर्णय कहीं ग़लत न निकल जाए, इस निर्णय से कहीं उन्हें कुछ नुक़सान न हो जाए, कहीं अपने ही लोग उनके बारे में कोई धारणा न बना लें… आदि.जैसा कि नाम से थोड़ा-बहुत स्पष्ट होता है कि यह फोबिया यानी एक प्रकार का डर है. डिसाइडोफोबिया का मतलब है डिसीज़न यानी निर्णय लेने का भय. हम अपने आसपास भी देखते हैं कि बहुत-से लोग निर्णय लेने से घबराते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है. यह डर बहुत-सी बातों को लेकर हो सकता है कि उनका निर्णय कहीं ग़लत न निकल जाए, इस निर्णय से कहीं उन्हें कुछ नुक़सान न हो जाए, कहीं अपने ही लोग उनके बारे में कोई धारणा न बना लें… आदि.

कारण

इस तरह के भय के कई कारण होते हैं, जैसे बाहरी अनुभव, जैसे- पहले कभी कोई दर्दनाक हादसा हुआ है, तो व्यक्ति हर बात को उससे ही जोड़कर देखने लगता है और कहीं न कहीं इसमें उसके जींस का भी हाथ होता है. उसे कुछ गुण, कुछ तत्व अपने पूर्वजों से मिलते हैं, जो उसे ऐसा बनाते हैं. शोध यह बताते हैं कि अनुवांशिकता यानी जेनेटिक्स और ब्रेन केमिस्ट्री के साथ लाइफ एक्सपीरियंस मिलकर इस तरह की स्थिति का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. इसके अलावा अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि जो लोग तनावग्रस्त होते हैं यानी जब आप डिप्रेशन में होते हैं, तब निर्णय लेने से अधिक डरते हैं, तो डिप्रेशन और डिसाइडोफोबिया का भी कहीं न कहीं एक अलग तरह का संबंध हो सकता है.

लक्षण

इसके लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप किस हद तक इस तरह के फोबिया का शिकार हैं. सामान्य लक्षणों में घबराहट, बेचैनी, सांस लेने में द़िक्क़त, पसीना आना, हृदय गति का तेज़ होना, मितली, मुंह का सूखना, ठीक से न बोल पाना आदि हो सकते हैं. हालांकि कुछ मामलों में यह डर बहुत नुक़सान नहीं पहुंचाता, लेकिन अगर ये आपकी सामान्य ज़िंदगी पर असर डालने लगे, तो समझ जाइए कि एक्सपर्ट की राय ज़रूरी है.

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कब जाएं एक्सपर्ट के पास?

जब आपके लक्षण बहुत ज़्यादा गंभीर हो जाएं, तो समझ जाएं कि अब देर नहीं करनी चाहिए.

आप निर्णय लेने से बचने के लिए हद से आगे बढ़ जाते हैं: आप कोई काम करना तो चाहते हो, लेकिन निर्णय लेने के डर से उसे नहीं करते. यह डर इतना हावी हो जाता है कि आप निर्णय लेने की स्थिति से बचने के लिए कई तरी़के अपनाने लगते हो. हालांकि यह जानलेवा नहीं है, लेकिन डिसाइडोफोबिया आपके रिश्तों को और प्रोफेशनल लाइफ को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है.

निर्णय लेने के लिए आप दूसरों पर निर्भर रहते हो: काउंसलर्स का कहना है कि आप हर निर्णय के लिए दूसरों पर ही निर्भर रहते हो और धीरे-धीरे आपकी दूसरों पर निर्भरता इतनी अधिक बढ़ जाती है कि आप ख़ुद कुछ कर ही नहीं पाते.

ग़लत लोगों और ग़लत तरीक़ों से गाइडेंस लेने लगते हो: ख़ुद निर्णय लेने की क्षमता को इस कदर खो देते हो कि आप ज्योतिषियों, बाबाओं या अन्य लोगों से सलाह लेने लगते हो. यहां तक कि अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए भी इन्हीं पर निर्भरता बढ़ जाती है, जो पूरी तरह अस्वस्थ है.

निर्णय लेने की स्थिति में पैनिक अटैक की आशंका: जैसे ही ऐसी परिस्थिति आती है कि आपको निर्णय लेना है, आपको पैनिक अटैक होने लगता है. आप बेचैन होने लगते हो, पसीना, हार्टबीट, मुंह का सूखना, चक्कर आना आदि लक्षण उभरने लगते हैं.

आपका निजी जीवन प्रभावित होने लगता है: निर्णय न ले पाने का यह डर जब आपके रिश्तों, करियर व अन्य बातों को प्रभावित करने लगता है, तब समझ जाइए कि आपको प्रोफेशनल की मदद लेनी होगी.

Decidophobia

ख़ुद करें अपनी मदद

  • सेल्फ हेल्प टेक्नीक्स के ज़रिए आप अपने इस डर पर काबू पा सकते हैं.
  • जब भी निर्णय लेने की स्थिति आए, लंबी व गहरी सांसें लें और इस परिस्थिति को तनावपूर्ण बनाने से बचें.
  • ख़ुद पर विश्‍वास जताएं कि हां, मैं यह कर सकता/सकती हूं. श्र जल्दबाज़ी न करें.
  • अपने मन की बात बोलने से हिचकिचाएं नहीं.
  • अगर आपको लगता है कि आपको सेकंड ओपिनियन की ज़रूरत है, तो जो आपके क़रीबी हैं और जिन पर आप भरोसा करते हो, उनसे शेयर करो और उनसे सलाह लो.
  • अपने इंस्टिंक्ट्स की आवाज़ सुनें यानी आपका दिल अगर किसी बात की गवाही दे रहा है, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें.
  • अगर आपका निर्णय ग़लत भी साबित हुआ, तो उसे स्वीकारने से पीछे न हटें. इस बात से डरें नहीं कि आपने ग़लत निर्णय ले लिया.
  • अगर आपको नशे की लत है, तो उसे कम करने का प्रयास करें.
  • हारने के डर को मन से निकाल दें.
  • कुछ ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ेस करें, योग व ध्यान करें. इससे आपका मन शांत होगा, डर दूर होगा और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होगी.
  • अपनी सोच व अप्रोच बदलें. यह सोचें कि आप भी बाकी लोगों की तरह ही हैं और आप से भी ग़लती हो सकती है, क्योंकि ऐसा कोई नहीं, जिससे गलती न हो.
  • ग़लतियों से ही सीखा जाता है, इस नज़रिए के साथ आगे बढ़ें.
  • यदि बचपन में या कभी अतीत में आपके साथ कुछ ऐसा हादसा हुआ हो, जिससे आप अभी निर्णय लेने से डर रहे हों, तो उस हादसे से वर्तमान को न जोड़ें. हर परिस्थिति अलग होती है और ज़रूरी नहीं कि हर बार ग़लती ही हो.
  • बुरी यादों को याद करने से बेहतर है सकारात्मक बातों के साथ वर्तमान को जोड़ा जाए.
  • हादसे सभी के साथ होते हैं, इसका यह मतलब नहीं कि उसे ज़िंदगीभर हावी रखें. उन्हें भुलाकर आगे बढ़ना सीखें.
  • यदि सेल्फ हेल्प से भी आप अपने डर को दूर नहीं कर पा रहे, तो एक्सपर्ट के पास ज़रूर जाएं और अपने जीवन को बेहतर बनाएं.

 – ब्रह्मानंद शर्मा 

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सेक्स प्रॉब्लम्स- सेक्स के समय लाइट्स ऑन रखना चाहते हैं (Sex Problems- He Prefers To Have Sex With The Lights On)

Sex Problems
Sex Problems
मेरे पति चाहते हैं कि सेक्स के समय लाइट्स भी ऑन रखना चाहते हैं

मेरी शादी को एक साल हुआ है. मुझे अपनी समस्या शेयर करने में संकोच व शर्म भी आ रही है, लेकिन मैं क्या करूं. मेरे पति चाहते हैं कि सेक्स (Sex) के समय मेरे बदन पर एक भी कपड़ा न रहे और वो लाइट्स (Lights) भी ऑन रखना चाहते हैं. तेज़ रोशनी में मैं असहज हो जाती हूं, जिससे मेरी सेक्स में रुचि ख़त्म हो जाती है, जबकि मेरे पति काफ़ी एंजॉय करते हैं.

– विशाखा शर्मा, अंबाला.

आप की तरह अधिकांश महिलाएं लाइट्स ऑन रहने पर असहज हो जाती हैं, क्योंकि वे अपने शरीर को लेकर कॉन्शियस रहती हैं. पुराने समय में लाइट्स ऑफ करके सेक्स करना एक नियम था, जबकि आजकल बहुत-से कपल्स लाइट्स ऑन रखना पसंद करते हैं. बेहतर होगा कि आप अपने पति से इस बारे में बात करें और बीच का रास्ता निकालें, जिसमें दोनों सहज हों और दोनों ही एंजॉय करें.

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मैं अपने ब्रेस्ट के बड़े साइज़ को लेकर काफ़ी असहज महसूस करती हूं

मैंने पिछले 10 सालों में अपना वज़न कम करने की बहुत कोशिश की, मगर स़िर्फ 5 किलो ही घटा पाई. मैं अपने ब्रेस्ट के बड़े साइज़ को लेकर काफ़ी असहज महसूस करती हूं, जबकि मेरे पति को कोई शिकायत नहीं. लेकिन सेक्स के समय मैं अपने ब्रेस्ट को लेकर उनका रिएक्शन पढ़ने की कोशिश में रहती हूं, जिससे मेरी सेक्स में रुचि ख़त्म हो जाती है.

– नंदा पाटिल, सांगली.

हर किसी का शरीर अलग होता है और सबकी अलग ख़ूबसूरती होती है. अगर आपके पति को कोई समस्या नहीं, तो आप असहज क्यों होती हैं. बेहतर होगा कि अपने निजी पलों को यूं न गंवाकर फ्लो के साथ जाएं और असहजता छोड़कर उन पलों को एंजॉय करें. कोई भी रिश्ता व उसमें छिपी ख़ुशी किसी साइज़ की मोहताज नहीं. इन चीज़ों को अपनी ख़ुशियों का पैमाना न बनने दें.

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डॉ. राजीव आनंद
सेक्सोलॉजिस्ट
([email protected])

 

कमज़ोर बनाता है डर (Kamzore Banata Hai Dar)

डर

डर

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो किसी चीज़ से डरता न हो, डर एक सहज प्रवृति है, मगर जब ये हद से बढ़ जाए और आपके विकास को प्रभावित करने लगे, तो संभल जाइए. किसी चीज़ को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा डर आपको आगे बढ़ने नहीं देता है. अतः ज़िंदगी की रेस में जीतने के लिए सबसे पहले अपने डर पर जीत हासिल करिए.

आख़िर क्यों लगता है डर?
जब इंसान को अपनी क्षमताओं/योग्यताओं पर विश्‍वास नहीं होता, उसमें आत्मविश्‍वास नहीं होता, वो हमेशा नकारात्मक सोचता है, ये नहीं हुआ तो? ऐसा हो गया तो क्या करूंगा? आदि. ऐसा इंसान हमेशा किसी अनहोनी की आशंका से घिरा रहता है, क्योंकि उसमें हालात का सामना करने की हिम्मत नहीं होती. ऐसे लोगों के मन में हमेशा डर बना रहता है, कभी सामाजिक प्रतिष्ठा खोने का डर, कभी किसी चीज़ में हार का डर, कभी करियर तो कभी रिश्ते में असफलता का डर. इसके अलावा भी ये न जाने और कितने डरों से घिरे होते हैं. एक हाउसवाइफ जिसकी दुनिया बस पति तक ही सीमित हो, उसे डर रहता है कि कहीं उसका पति अपने ऑफिस की किसी कलीग की तरफ़ आकर्षित न हो जाए, किसी की ख़ूबसूरती, किसी के फिगर पर फिदा न हो जाए. अपने इसी डर के कारण वो पति के सामने हमेशा बन-ठनकर रहती है, पति के साथ होकर भी उसका मन भटकता रहता है यही सोचकर कि पता नहीं आज ऑफिस में क्या हुआ होगा? उसका डर उसे सहज और ख़ुशहाल ज़िंदगी जीने नहीं देता. इतना ही नहीं हमेशा पति के बारे में सोचकर वो अपना क़ीमती व़क्त बर्बाद करती रहती है, जिसे वो किसी अन्य काम में लगाती, तो शायद पर्सनैलिटी और ज्ञान बढ़ता. कहीं कोई समस्या न होने के बावजूद उसका डर ख़ुद उसके लिए एक समस्या बन जाता है.

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सफलता की राह का रोड़ा है डर

आचार्य चाणक्य के अनुसार, डर हमें कमज़ोर बनाता है, जिस व्यक्ति के मन में भय आ जाए वो अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच सकता. ये बात सौ फीसदी सच है, अपने आसापास नज़र दौराने पर आप पाएंगे कि निडर लोग ही ज़िंदगी में सफल हुए हैं और जो अपने डर पर क़ाबू नहीं कर पाते वो अपनी असफलता के लिए दूसरों को कोसते रहते हैं या फिर ख़ुद से कमज़ोर लोगों पर अपनी खीझ व ग़ुस्सा उतारते हैं. ऑफिस में पति के हाथ से कोई प्रोजेक्ट निकल गया या हर काम के लिए ना-नुकुर करने की वजह से उसकी जगह किसी और को प्रमोशन मिल गया. अपनी इस हार की खीझ अधिकतर पति पत्नी या बच्चों पर उतारते हैं. वो अपने परिवार के सामने ये तो ज़ाहिर नहीं कर सकतें कि उनके डर ने उनकी सफलता का मार्ग अवरूद्ध किया, ऐसे में किसी और बहाने से अपना ग़ुस्सा/चिढ़ उनके सामने ज़ाहिर करते हैं.

कैसे काबू में करें डर?
हिम्मत, आत्मविश्‍वास और ख़ुद की क्षमताओं का विकास और ख़ुद पर विश्‍वास करके ही आप डर को वश में कर सकते हैं. यदि बॉस आपको कोई काम दे रहा है, तो ये तो बहुत मुश्किल है, पता नहीं कब तक हो पाएगा कहने की बजाय कहें सर ये काम मुश्किल ज़रूर है, मगर हो जाएगा डोन्ट वरी. डर से दूर रहने पर ही आप किसी काम को अपना सौ फीसदी दे पाएंगे और निश्‍चय ही पूरे मन व लगन से किया गया काम सफ़ल होगा. इसके विपरित यदि आप काम शुरु करने से पहले ही डरकर ये कहें कि अरे ये कैसे होगा, तो आप उस काम में कभी क़ामयाब नहीं हो पाएंगे यानी डर आपको असफल बना देगा. स्टीव जॉब्स, अब्दुल कलाम और थॉमस एडिसन
जैसे महान व्यक्ति यदि हालात और असफलता से डर जाते, तो शायद आज दुनिया उन्हें महान नहीं मानती, मगर इन शख़्सियतों ने विपरित परिस्थितियों के डर को अपने आत्मविश्‍वास और हिम्मत से दूर करके क़ामयाबी की बेहतरीन मिसाल पेश की. आप भी ऐसा कर सकते हैं.

डर का सकारात्मक असर
डर हमेशा बुरा ही हो, ज़रूरी नहीं. कई बार डर के सकारात्मक परिणाम भी होते हैं, जैसे- बच्चों के मन में पैरेंट्स का डर रहने पर वो घर से बाहर कुछ भी ग़लत करने से डरते हैं, अनुशासन में भी रहते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि ऐसा न करने पर मम्मी/पापा नाराज़ हो जाएंगे या फिर डाटेंगे.कहीं मेरी इमेज न ख़राब हो जाए, इस डर से यदि कोई व्यक्ति हमेशा समय पर काम पूरा करता है और हर जगह सही व़क्त पर पहुंचता है, तो ऐसा डर अच्छा है.

कंचन सिंह 

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कुछ डर, जो कहते हैं शादी न कर (Some fears that deprive you of marriage)

Marriage Fears

शादी… उफ़! रोक-टोक, ज़िम्मेदारियों का बोझ, हर पल किसी की जासूसी… कुछ ऐसे ही ख़्यालात रहते हैं युवाओं के. इसी से जुड़े कई अनजाने डर (Marriage Fears) उन्हें शादी न करने के लिए भी प्रेरित करते हैं. तो आइए, कुछ ऐसे डर के बारे में जानते हैं, जो शादी के बंधन में बंधने से रोकते हैं.

हमारे देश में शादी को पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है. कहीं पर यह किसी के लिए पूरी ज़िंदगी का सबब रहता है, तो कहीं पर जी का जंजाल. ऐसे में एक तबका ऐसा भी है, जो शादी से जुड़े डर यानी मैरिज फोबिया के कारण शादी नहीं करना चाहता. आइए, इस तरह के लोगों के शादी से जुड़े अलग-अलग डरों के बारे में संक्षेप में जानें.

हर बात के लिए जवाबदेही होना होगा…
देशभर में ऐसे युवाओं की कमी नहीं, जो आज़ाद पसंद जीवन जीना चाहते हैं. जिन्हें अपना मस्तमौलापन और आज़ादी बेहद प्यारी है. इस यंग जनरेशन को यह डर लगा रहता है कि शादी के बाद हर छोटी-छोटी बात के लिए पार्टनर को इंफॉर्म करना होगा. यानी अपने हर क्रियाकलाप का ब्योरा देना होगा.
एक्सपर्ट की सलाह- ऐसा नहीं है. यदि पति-पत्नी एक-दूसरे की भावनाओं को अच्छी तरह से समझते हैं. आपसी विश्‍वास और सामंजस्य बेहतर है, तो इस तरह का डर(Marriage Fears) पैदा ही नहीं होता.

प्राइवेसी में खलल…
शादी से पहले हमारी बहुत सारी बातें और चीज़ें ऐसी रहती हैं, जो केवल हम तक ही सीमित रहती हैं, उसमें किसी की दख़लअंदाज़ी बिल्कुल भी नहीं रहती. लेकिन शादी के बाद स्थिति बिल्कुल उलट हो जाती है. यह बहुत बड़ा डर (Marriage Fears) है, जो युवाओं को शादी करने से रोकता है.
एक्सपर्ट की सलाह- शादी के बाद ही कई बार हमें एहसास होता है कि कुछ प्राइवेसी ऐसी होती है, जो हमें अपने पार्टनर से ही शेयर करनी है और इससे जुड़े सुखद पहलू दो दिलों को रोमांचित भी करते हैं.

ज़िम्मेदारियों का बोझ…
आज भी ऐसे लड़के-लड़कियों की कमी नहीं है, जो घर-परिवार से जुड़ी ज़िम्मेदारियों से भागते फिरते हैं. इस तरह के लोगों को यह डर (Marriage Fears) बराबर सताता रहता है कि शादी के बाद
पार्टनर की, फिर बच्चों की, उसके बाद उनकी पढ़ाई-लिखाई, परवरिश… यानी कभी न ख़त्म होनेवाला ज़िम्मेदारियों का सिलसिला… यही डर उन्हें सतत शादी न करने के लिए आगाह करता रहता है.
एक्सपर्ट की सलाह- शादी के बाद जहां ज़िम्मेदारियां बढ़ती हैं, वहीं मान-सम्मान भी तो बढ़ता है. आप दो घरों के बीच सेतु और ख़ास होने का सम्मान पाते हैं. पार्टनर-बच्चों से कई रिश्ते बनते और नाम मिलता है. ये सभी बातें इससे जुड़ी तमाम ज़िम्मेदारियों को पूरा करने का हौसला देने के साथ-साथ दिल को सुकून भी देती है.

Marriage Fears

बच्चों से चिढ़…
ऐसा नहीं कि हर शख़्स को बच्चे प्यारे लगते हैं. ऐसे भी युवाओं की कमी नहीं है, जिन्हें बच्चे और उनका रोना-धोना, शोर-शराबा बिल्कुल भी पसंद नहीं. ऐसे लोगों के लिए शादी और बच्चा दोनों ही काला पानी की सज़ा जैसे हैं. शादी करने के बाद बच्चे होने का दबाव तो रहता ही है, यही डर(Marriage Fears) उन्हें शादी न करने के लिए प्रेरित करता है.
एक्सपर्ट की सलाह- कहते हैं, बच्चों में हम अपना बचपन जीते हैं. वो बचपन जिसे हम छोटेपन में उतना जान-समझ नहीं पाते हैं. अपने बचपन यानी फ्लैश बैक में जाने का हमारे पास यह ख़ूबसूरत मौक़ा होता है.

सेक्स का हौव्वा…
हम चाहे जितने मॉडर्न हो जाएं, पर आज भी सेक्स को लेकर हमारे मन में डर और भ्रांतियां ज्यों की त्यों बनी हुई हैं. कई बार दोस्तों की बातें, आधी-अधूरी नॉलेज भी सेक्स को लेकर ग़लतफ़हमियां पैदा कर देती हैं. पार्टनर को संतुष्ट न कर पाने का डर, उसकी इच्छाओं को पूरी न कर पाने का भय आदि शंका-आशंकाएं बनी रहती हैं.
एक्सपर्ट की सलाह- रिश्ते और प्यार के एहसास को एक मुकम्मल मुक़ाम देता है सेक्स. यदि सेक्स के बारे में अच्छी और पूरी जानकारी हो, तो इससे डरने(Marriage Fears) की बजाय इससे जुड़े सुखद लम्हे दिलों को रोमांच से भर देते हैं.

करियर में रुकावट…
आज के दौर में पढ़ाई और करियर को हर कोई महत्व देने लगा है, फिर चाहे लड़के हो या लड़कियां. इनमें से कई अति महत्वाकांक्षी और वर्कहोलिक क़िस्म के होते हैं. उनके लिए करियर बनना और जीवन में एक मुक़ाम हासिल करना शादी-ब्याह, बीवी-बच्चे से कहीं बढ़कर होता है. उन्हें यह डर बराबर सताता रहता है कि कहीं शादी के बाद अन्य ज़िम्मेदरियों और पूरा करते-करते करियर में वे कहीं बहुत पीछे न छूट जाएं. ऐसे लोगों के लिए उनका करियर, जॉब और क़ामयाबी ही सब कुछ होती है.
एक्सपर्ट की सलाह- ज़िंदगी में हर चीज़ की अपनी ख़ूबसूरती है. फिर चाहे वो करियर, नौकरी हो या शादी. टाइम मैनजमेंट और पॉज़ीटिव एटीट्यूड हो, तो जीवन में हर काम को ख़ूबसूरत अंजाम दिया जा सकता है.

कमिटमेंट का डर…
वैवाहिक जीवन को सफल बनाने के लिए कमिटमेंट का होना बेहद ज़रूरी होता है और इसी से बचना चाहता है बैचुलर गु्रप. उन्हें करियर, जॉब और दोस्ती का कमिटमेंट तो मंज़ूर है, पर शादी का नहीं. क्योंकि इस कमिटमेंट में आपको जाने-अनजाने में कई समझौते और त्याग करने पड़ते हैं.
एक्सपर्ट की सलाह- ज़िंदगीभर हम न जाने कितने एडजस्टमेेंट और कमिटमेंट करते हैं और उसे पूरा करने की कोशिश भी करते हैं. फिर शादी से जुड़े कमिटमेंट को लेकर हिचक क्यों? ध्यान रहे, खुले विचार, सकारात्मक सोच और आपसी सामंजस्य हर कमिटमेंट को पूरा करने का सबब बनती है, फिर वो शादी ही क्यों न हो!

– ऊषा गुप्ता

20 Tips: शादी से पहले करें शादी के बाद की तैयारियां (20 Smart Pre Marriage Preparations For Couples)