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पहला अफेयर: गुज़ारिश (Pahla Affair: Guzarish)

Pahla Affair, Guzarish

Pahla Affair, Guzarish

पहला अफेयर: गुज़ारिश (Pahla Affair: Guzarish)

नहीं जानती कि मैं क्यों तुम्हारे बारे में सोचती हूं. मेरे ख़्यालों में हर वक़्त तुम्हीं रहते हो. मुझे आज भी याद है, वो पहला एहसास जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा था. मेरा आईडी कार्ड कहीं गिर गया था. मैं उसे हर जगह ढूंढ़ चुकी थी और परेशान हो रही थी, तभी तुम आए और मेरा आईडी कार्ड मुझे देकर चले गए. तुम्हारी स्मार्टनेस मेरे मन पर गहरी छाप छोड़ चुकी थी. एक सहेली से पता चला कि तुम मुझसे सीनियर यानी एमएससी सेकंड ईयर के छात्र थे.

उस दिन के बाद से मेरी नज़रें कॉलेज में अक्सर तुम्हें तलाश करने लगी थीं. तुम अक्सर दिख ही जाते थे. तुम्हारी पर्सनैलिटी मुझे अपनी तरफ़ आकर्षित करने लगी थी. जब कभी तुम मेरे सामने होते थे, मेरी नज़रें अनायास ही तुम्हारी तरफ़ उठ जाती थीं. पर अगले ही पल दिमाग़ यह एहसास कराता कि एक लड़की का किसी को इस तरह देखना ठीक नहीं. लोग क्या कहेंगे? और मेरी नज़रें झुक जातीं. पर दिल को कहां परवाह थी किसी की? नज़रें फिर तुम्हारी तरफ़ उठतीं और झुक जातीं. जब तक तुम सामने होते दिल और दिमाग़ का ये द्वंद्व चलता ही रहता.

एक दिन बस का इंतज़ार करते वक़्त एक छोटा बच्चा आकर भीख मांगने लगा. तुमने उसे दुकान पर ले जाकर भरपेट खाना खिलाया. उस दिन मैंने तुम्हारे अंदर की ख़ूबसूरती भी देखी थी. मैं अपनी सहेली निशा से अक्सर तुम्हारी बातें करती थी. एक दिन वह मुझे छेड़ते हुए बोली, लगता है, वह तुझे कुछ ज़्यादा ही पसंद है. मैंने कहा, नहीं, वह तो चांद है जिसे स़िर्फ दूर से देखा जा सकता है, हाथों में नहीं लिया जा सकता. वह बोली, लोग चांद पर घर बनाने की सोच रहे हैं और तू पुराने ख़्यालों में अटकी पड़ी है. मैं उसके बारे में पता करूंगी और फिर तुम दोनों प्रो़फेसर बन इसी कॉलेज में साथ-साथ पढ़ाना. ये बातें उसने मज़ाक में ही कही थीं, पर अनजाने में ही उसने हमारे अनजाने रिश्ते की नींव रख दी थी.

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अब न जाने क्यों मैं तुम्हें ख़ुद से जोड़ने लगी थी. फिर निशा ने ही मुझे बताया कि तुम उसी कॉलेज के किसी प्रो़फेसर के बेटे होे. अब निशा मुझसे बार-बार कहने लगी कि अपने मन की बात उससे कह दे, पर न जाने क्यों मैं रुक जाती थी. शायद तुम्हारा स्टेटस मुझे रोक देता था. तुम एक अमीर प्रो़फेसर के बेटे और मैं एक लोअर मिडल क्लास की लड़की. मुझे डर था कि तुम मुझे ठुकरा न दो.

और फिर वो वक़्त भी आ गया, जिसके बारे में सोचकर डर लगता था. तुम्हारी विदाई का वक़्त. हम फ़र्स्ट ईयर वालों ने सेकंड ईयर के स्टूडेंट्स के लिए फेयरवेल पार्टी रखी थी, जिसमें मुझे एंकरिंग करनी थी. सुबह तैयार होते वक़्त भी तुम मेरे ख़्यालों में थे. आज मेरे पास आख़िरी मौक़ा था तुमसे अपने मन की बात कहने का, पर मैंने इसे गवां दिया, क्योंकि मेरे स्वाभिमान ने मुझे रोक दिया. मुझे आज भी याद है, वो बेचैनी, वो बेक़रारी तुम्हें न देख पाने की, जो उस शाम घर लौटते वक़्त मेरे दिलो-दिमाग़ पर छाई हुई थी. एक अनजाने से दर्द ने मुझे सारी रात सोने नहीं दिया. एक्ज़ाम्स के बाद प्रैक्टिकल के दिन जब मैं कॉलेज पहुंची तो तुम्हें बरामदे में खड़े देखकर आंखों पर यक़ीन नहीं हुआ, क्योंकि मैं तो तुमसे दोबारा मिलने की आस भी छोड़ चुकी थी. तुमने भी मेरी तरफ़ देखा और इस बीच मेरी आंखों ने बहुत कुछ बयां कर दिया था तुमसे.

अब मैं अपने शहर वापस आ गई हूं, तुम्हारी यादों को अपने दिल में संजोए हुए. अब शायद कुछ सालों तक मैं तुम्हें न देख पाऊं. जानते हो मेरा रिज़ल्ट आ चुका है. मैं क्लास में सेकंड हूं और वह प्रैक्टिकल, जिसमें तुम मेरे सामने थे, उसमें मेरे सबसे अधिक मार्क्स हैं. शायद तुम मेरी प्रेरणा भी हो. मैं इतने दिनों तक तुमसे कुछ न कह पाई, पर एक दिन अपने मन की बात तुमसे ज़रूर कहूंगी. उस दिन मिट जाएंगी हमारे बीच की सारी दूरियां और गिर जाएंगी सारी दीवारें. ये यक़ीन है मुझे ख़ुद पर और अपनी क़िस्मत पर भी. तब तक तुम मेरा इंतज़ार करना, यही गुज़ारिश है तुमसे.

– सारिका सोनी

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पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta)

Pyar Ki Kahaniya

पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta)

रेस्टोरेंट की सीट पर बैठते ही उसने हमेशा की तरह कहा, “एक काला खट्टा.” हैरानी तब हुई जब पीछे से भी कुछ जानी-पहचानी आवाज़ ने कहा, “एक काला खट्टा.” कुछ ख़ास बात नहीं थी, लेकिन उसे उत्सुकता हो आई. उसका ऑर्डर टेबल पर सज गया था, लेकिन वो उस आवाज़ को देखने का लोभ न छोड़ सकी और हाथ धोने के बहाने उठ खड़ी हुई. जब वो पास से गुज़री, तो एक ताना मिश्रित नारी स्वर उसे सुनाई दिया, “पता नहीं, तुम कब बाज़ आओगे ऐसी बचकानी चीज़ें खाने से…” और वो चाट खाने में व्यस्त हो गई. उसका पति धीरे-धीरे काला खट्टा चूस रहा था.

बेशक उम्र के निशान साफ़ नज़र आ रहे थे, लेकिन वो सोमेश ही था. उसके बचपन का स्कूल के समय का साथी. एक ही स्कूल और पास-पास घर. दोनों इकट्ठे ही खाते-पीते. ख़ासकर काला खट्टा एक ही स्टिक से चूसते. सोमेश को आज एक अरसे बाद इस तरह अचानक देखकर बीती बातों में दिल खोने लगा. बचपन का वो ज़माना फिर याद आने लगा, जहां दोनों एक साथ स्कूल
आते-जाते, एक ही साथ खेलते. बचपन की नादानियां, खट्टी-मीठी नोक-झोंक दोनों को कब एक-दूसरे के क़रीब ले आई, इसका एहसास ही नहीं हो पाया.

बचपन के छूमंतर होते ही जवानी में क़दम रखते ही लड़कियों पर हज़ारों तरह के पहरे लगना कोई नई बात नहीं है. भले ही ज़माना कितना ही मॉडर्न हो जाए, बहुत आगे पहुंच जाए, लेकिन समाज व परिवार की लक्ष्मण रेखा पार करना सबके बूते की बात नहीं होती. अब बात-बात पर उसे टोका जाने लगा था कि वो बच्ची नहीं है, जवान हो चुकी है. सोमेश के साथ इस तरह आना-जाना या समय बिताना ठीक नहीं. समाज और परिवार के लोग क्या कहेंगे? लेकिन उसके मन में प्यार की कोंपल फूट चुकी थी और सोमेश की आंखों की भाषा भी वो समझती थी. उसके मन में छिपे प्यार को और सोमेश की आंखों में साफ़ नज़र आते इक़रार को दोनों ही बख़ूबी समझते थे.

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अब बचपन की वो बेफ़िक्री नहीं थी, एक अजीब-सी झिझक और हया दोनों के बीच पसर गई थी. एक-दूसरे को देखकर धड़कनें तेज़ हो जाना, चोरी-चोरी एक-दूसरे को छुप-छुपकर निहारना और जब आंखों से आंखें टकरा जाएं, तो अजीब-सी सिहरन और मदहोशी का एहसास होना… ये सब प्यार की ही तो निशानियां थीं… पहले प्यार की ख़ुशबू, एक अलग-सा जादू… दोनों को ही इस अनोखे एहसास ने छू लिया था.

चाहत तो दोनों की ही थी कि एक-दूसरे के हो जाएं हमेशा के लिए. एक पवित्र बंधन में बंध जाएं और खुलकर सबको कह सकें कि हां, हमें मुहब्बत है… और हम अपनी मुहब्बत को रिश्ते का नाम देना चाहते हैं, लेकिन दरिया गहरा था और वो सोहनी नहीं थी, जो कच्चे घड़े से दरिया पार कर लेती. पहला प्यार एक कसक बनकर रह गया.

पीछे वाली सीट खाली हो चुकी थी और उसकी प्लेट का काला खट्टा भी बह गया था, उसकी आंखों के आंसुओं की तरह…

– विमला गुगलानी

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पहला अफेयर: अधूरा एहसास… अधूरा प्यार… (Pahla Affair: Adhura Ehsas… Adhura Pyar)

Pahla Affair

पहला अफेयर: अधूरा एहसास… अधूरा प्यार… (Pahla Affair: Adhura Ehsas… Adhura Pyar)

हर बात अच्छी थी तुम्हारी, क्योंकि तुम में हर वो बात थी, जो किसी भी लड़की को आकर्षित कर सकती थी. कम से कम मुझे तो यही लगता था. यही वहज थी कि मैं भी बिना डोर की पतंग की तरह तुम्हारी ओर खिंचती चली गई. मुहब्बत का वो शुरुआती आकर्षण, वो कशिश, वो एहसास… बेहद ख़ुबसूरत पल थे वो. बेहद हसीन दिन… कॉलेज का लास्ट ईयर था. तुमने इसी साल कॉलेज में एडमिशन लिया था और कुछ ही दिनों में तुम लड़कियों के मोस्ट फेवरेट बन गए थे. तुम्हारा स्टाइल, एटीड्यूड और स्टडीज़ से लेकर हर एक्टिविटीज़ में सबसे आगे रहना… सब दीवानी थीं तुम्हारी ही.

उन सबके बीच तुमने मुझे चुना था. मैं ख़ुद को सबसे ख़ुशनसीब समझ रही थी. वैलेंटाइन डे के दिन तुमने मुझे प्रपोज़ किया और मेरे पास भी इंकार करने का कोई कारण नहीं था. अब तो बस दिन-रात तुम्हारा ही ख़्याल…

इसी बीच हमें कुछ सालों के लिए जुदा होना था, क्योंकि तुम हायर स्टडीज़ के लिए ऑस्ट्रेलिया जा रहे थे और मुझे जॉब मिल गया था. हमने वादा किया था एक-दूसरे से कि इंतज़ार करेंगे और सही व़क्त आने पर शादी भी, शायद इसीलिए ये दूरियां भी खल नहीं रही थीं इतनी.

तुम्हारा रोज़ कॉल आता. वीडियो कॉल पर ढेरों बातें होतीं. तुम अक्सर पूछते कि मेरे ऑफिस में कौन-कौन है… मैं कहां जा रही हूं… क्या कर रही हूं… और मैं भी अपनी सारी बातें तुमसे शेयर करती. हमारे दिन-रात के अंतर का भी हमारी बातचीत पर असर नहीं पड़ता था. तुम देर रात तक जागते थे, मुझसे बात करने के लिए.

उस दिन, तुम शायद नशे में थे, जब मैंने तुम्हें अपनी ऑफिस की पार्टी के बारे में बताया था, क्योंकि तुम्हारा ऐसा रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा था. तुमने मुझे, अपनी प्रिया को इतना बुरा-भला कह दिया कि मुझे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था अपने कानों पर. तुमने मेरे चरित्र पर सवाल उठाए कि ऑफिस पार्टी में दूसरों के साथ डान्स क्यों किया… इतना बन-ठन के क्यों गई… मेरे लिए काफ़ी शॉकिंग था तुम्हारा यह बर्ताव, पर मैंने अपने दिल को यही कहकर समझा लिया कि तुम दूर हो, इसीलिए ओवर पज़ेसिव हो रहे हो. साथ ही तुम नशे में भी थे.
ख़ैर, दो-तीन दिन की नाराज़गी के बाद तुमने माफ़ी मांगी और सब कुछ नॉर्मल हो गया. लेकिन फिर कुछ दिनों बाद तुम्हारे वही सवालात… कि फोन क्यों नहीं उठाया, मेरा फोन था, तुम समझती क्या हो, नौकरी करके मुझ पर एहसान नहीं कर रही… और भी न जाने क्या-क्या… उसके बाद तो ये सिलसिला रूटीन ही बन गया था… तुम हर रोज़ किसी न किसी बात को लेकर मुझे बुरा-भला कहते और अगले दिन माफ़ी मांग लेते.

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अगले महीने तुम छुट्टियों में इंडिया आनेवाले थे. मुझे लगा मिलकर बात करेंगे, तो शायद मैं तुम्हें बेहतर ढंग से समझा सकूं. तुम आए, हम मिले भी, पर मुझे कहीं न कहीं यह एहसास हो रहा था कि तुम्हारा पुरुष अहम् तुम्हें सहज नहीं रहने दे रहा था मेरे साथ. तुम्हें लगता था कि तुम जो बोलो वही हो, तुम जब बोलो, तभी हो, क्यों? “क्योंकि मैं बोल रहा हूं, क्या इतना काफ़ी नहीं है?” यही जवाब होता तुम्हारा.
जब मन करता मेरा फोन उठाकर चेक करना, सोशल मीडिया पर किस-किस से पिक्चर लाइक की है, उसका नाम देखकर उसके बारे में सवाल करना… उसके बाद सोशल मीडिया से दूर रहने की सलाह देना… और मैं भी हर बात मानती चली गई, क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी. पर अक्सर मन में सोचती थी कि मेरा राज ऐसी सोच रखता है. इस मॉडर्न ज़माने में, ऑस्ट्रेलिया में रह रहा है, फिर भी ऐसी सोच?

उस दिन जब तुम वापस लौट रहे थे, मन बहुत उदास था. तुमसे लिपटकर रो रही थी मैं और तुमने मुझे सहलाते हुए कहा, “प्रिया, रोने की क्या बात है, तुम्हारे तो यहां भी बहुत सारे दोस्त हैं. उनस मन बहला लेना.”

“ये क्या बकवास है…”

“अरे, ठीक ही ता है. फ्रेंड्स तो होते ही इसलिए हैं. इतना सीरियस होने की क्या बात है.”

ख़ैर, तुम चले गए. तुम्हारी स्टडीज़ कंप्लीट होने को थी और अब तुम हमेशा के लिए इंडिया आनेवाले थे. हम शादी करनेवाले थे. तुम आए, हमारी सगाई भी हो गई. एंगेजमेंट में तुम्हारे दोस्त मेरे साथ हंसी-मज़ाक कर रहे थे. पार्टी ख़त्म होने पर मैंने तुमसे गौतम के बारे में पूछा भी था कि काफ़ी हंसमुख लड़का है. और तुमने कहा, “हां, पसंद है, तो नंबर दे देता हूं. बुला लेना रात को. चाहो तो बेड भी शेयर कर लेना.”

मैं पत्थर बनी वहीं खड़ी रही. सारी रात सोचती रही… कहां, क्या ग़लत हो रहा है मुझसे? क्या मैं यह सब डिज़र्व करती हूं?

“अरे, प्रिया सुबह-सुबह, क्या बात है?”

“हां राज, तुमसे ज़रूरी बात करनी थी. तुम्हें कुछ देना चाहती हूं.”

“क्या लाई हो मेरे लिए स्वीटहार्ट?”

“ये एंगेजमेंट रिंग, इसे अपने पास ही रखो और जब तुम्हें कोई ऐसी लड़की मिल जाए, तो तुम्हारी घटिया सोच के साथ निभा सके, तब उसे यह पहना देना.” और मैं चली आई वहां से. मेरे परिवारवाले भी मेरे इस फैसले से सहमत थे. तुमने भी उसके बाद कोई फोन या माफ़ी नहीं मांगी, क्योंकि मैं जानती थी, तुम्हारा ईगा इतना बड़ा है कि कोई लड़की तुम्हें ठुकरा दे, यह तुमसे बर्दाश्त नहीं होगा.

मेरा पहला प्यार भले ही अधूरा था, उसमें दर्द था, लेकिन मैंने सही समय पर उसे अधूरा छोड़ने का जो फैसला लिया, उससे मैं ख़ुश थी. ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं, इंसान को परखने से कहीं ज़्यादा उसे समझने में व़क्त लग जाता है. ऊपरवाले ने मेरे लिए भी कोई न कोई सही और सच्चा इंसान ज़रूर चुन रखा होगा. जब वो मुझे मिल जाएगा, तो दोबारा प्यार करने से परहेज़ नहीं करूंगी, क्योंकि मुझे प्यार से शिकायत नहीं, प्यार की भावना पर पूरा भरोसा है मुझे, क्योंकि प्यार ग़लत नहीं होता, ग़लत स़िर्फ इंसान होता है.

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: मुझे माफ़ कर देना… (Pahla Affair: Mujhe Maaf Kar Dena)

Love Stories in Hindi

पहला अफेयर: मुझे माफ़ कर देना… (Pahla Affair: Mujhe Maaf Kar Dena)

न जाने क्यों वो आज भी बहुत याद आती है. तीन साल बीत गए, पर बीते दिनों की याद मन में हलचल ही पैदा करती है. प्रेम अद्भुत होता है. जीवन में कब और किससे हो जाए कोई नहीं जानता. किसी के लिए मनमोहक एहसास, तो किसी के लिए जीने का सबब. मेरे लिए मेरा प्यार उसकी नफ़रत है. उसकी ज़िंदगी में मेरी कोई जगह नहीं, फिर भी न जाने कौन-सा तार है, जो मुझे उसकी ओर खींच ही लेता है. बार-बार माफ़ी मांगता हूं, क्योंकि उसका दिल बुरी तरह ज़ख़्मी हुआ है.

फेसबुक पर पहली मुलाक़ात हुई थी. फ्रेंड रिक्वेस्ट को स्वीकार करने से पहले उसका प्रोफाइल चेक किया. भोली-भाली मासूम-सी लगी थी. तीखे नयन-नक्श किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने के लिए काफ़ी थे. धीरे-धीरे बातचीत होने लगी. कभी-कभी लगता कि बातों-बातों में कुछ कहना चाहती है. अब मुझे उसकी आदत हो गई.

एक दिन उसने सीधे सरल शब्दों में प्यार का इज़हार करते हुए कहा, “मैं तुम्हें प्यार करती हूं, मैं नहीं जानती कि तुम्हारे दिल में क्या है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि तुम भी मुझे प्यार करो. प्यार कोई सौदा नहीं कि प्यार के बदले प्यार मिले, ये वो रूहानी एहसास, जो दिल से महसूस किया जाता है, जो मैंने तुम्हारे प्रति पाया.”

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मैं तो जैसे इसी इंतज़ार में था. बिना कुछ सोचे-समझे ‘हां’ कह दिया. एक दिन मन में विचार आया कि जब ज़िंदगी उसके साथ
गुज़ारनी है, तो क्यों न रू-ब-रू हुआ जाए. जब मैंने उसे इस बारे में कहा, तो वह तुरंत तैयार हो गई. जब पहली बार उससे मिला तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. इतना बड़ा धोखा. उस व़क्त तो मैं कुछ कह नहीं पाया, पर उससे दूरियां बनानी शुरू कर दीं.

मेरे और उसके बीच एक दीवार खड़ी हो गई थी. एक व्हील चेयर पर बैठी लड़की और एक अति महत्वाकांक्षी लड़के के बीच बनी ये
दीवार, जिसके नीचे प्यार, सपने सब दब गए. मन ही मन सोचता मैंने

जल्दबाज़ी कर दी. मेरा और उसका क्या मेल? मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि मैं एक विकलांग लड़की के साथ प्यार करूंगा. कभी-कभी लगता कि मेरे सारे दोस्त मुझ पर हंस रहे हैं, ये दुनिया ताना दे रही है. मैं घबराकर आंखें बंद कर लेता हूं. मैं मन ही मन प्रश्‍न करता हूं कि मुझसे ग़लती कहां हो गई.

एक दिन मैंने उसके सामने मन की बात रखी कि अब आगे जाना संभव नहीं होगा. “क्या एक विकलांग लड़की प्यार नहीं कर सकती. क्या मेरा प्यार मेरे पैरों की तरह कमज़ोर था?” उसकी आंखों में आंसू उतर आए. मेरे पास कोई जवाब नहीं था. उसके बाद उसने मुझे अनफ्रेंड कर दिया, कभी कोई मैसेज नहीं किया. यहां तक कि उसने अपना अकाउंट भी डिलीट कर दिया. बिना कुछ कहे, बिना कोई शिकायत के वो मेरी ज़िंदगी से चली गई. आख़िरी बार उसकी बातों में जो उदासी छलकी थी उसे भुला नहीं पाया.

सच में ग़लती मेरी थी. उसके प्रोफाइल पर लगे फोटोग्राफ्स पर ध्यान नहीं दिया. क्यों कभी नहीं पूछा कि वो क्या करती है… मोहब्बत का कोई दायरा नहीं होता, पर मैं न जाने किस दिशा में भटक गया. आज मैं अपनी ग़लती के लिए क्षमाप्रार्थी हूं और बार-बार माफ़ी मांगता हूं कि मुझे माफ़ कर दो…

– शोभा रानी गोयल

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पहला अफेयर: ख़्वाब (Pahla Affair: Khwab)

Love Story in Hindi
पहला अफेयर: ख़्वाब (Pahla Affair: Khwab)

कभी देखा है ख़्वाबों को उड़ते हुए… कभी देखा है चांद को आंगन में बैठे हुए… कभी देखा है आसमान को झुकते हुए… कभी देखा है हथेली पर सूरज को उगते हुए… एक ख़ामोश अफ़साने से तुम जब आते हो. फेसबुक पर जब देखती हूं ये सब कुछ होते हुए, सारी कायनात का नूर समेटे हुए अपनी अदाओं में बेपनाह चाहत भरे हुए जब तुम होते हो, तब स़िर्फ तुम होते हो और कोई नहीं होता आस-पास.

आज दो साल हो गए तुमसे बात करते हुए, हम फेसबुक पर एक-दूसरे से चैट करते हैं. कब समय गुज़र गया, पता ही नहीं चला. न व़क्त का होश रहा, न ही अपना ख़्याल. दीन-दुनिया से बेख़बर हम घंटों चैट करते. हर टॉपिक पर बात करते. बहत करते, खिलखिलाते एक अलग ही जहां में खोये रहते.

अजीब चीज़ है ये व़क्त भी… न कभी ठहरता है, न कभी रुकता है. बस, आगे ही आगे बढ़ता रहता है. एक दिन पापा-मम्मी ने कहा, “शादी की उम्र हो गई है तुम्हारी. कोई पसंद हो, तो बताओ.” शादी का नाम सुनते ही कुंआरी उमंगें अंगड़ाई लेने लगीं, पर पसंद तो कोई नहीं था, सो पापा से कहा, “जो आपकी पसंद हो.”

कैसा जीवनसाथी होना चाहिए? उसमें क्या गुण होने चाहिए? क्या बात करनी चाहिए… जब मैंने टाइप करते हुए पूछा, तो उसने कहा, ‘जो तुम्हारी आंखों से ही समझ जाए कि तुम्हें कुछ कहना है… तुम्हारी ख़ामोश ज़ुबां की आवाज़ उसकी धड़कन को सुनाई दे, जो रिश्तों की कद्र करे, तुम्हें मान दे… ऐसा होना चाहिए जीवनसाथी.’ कहां ढूंढ़ूं उसे? पूझने पर बताया बस अपनी आंखें बंद करो, जिसका भी चेहरा सामने आए, वही है सच्चा जीवनसानी, जैसा कहा, वैसा किया, पर कोई चेहरा सामने नहीं आया. आता भी कैसे? इस फेसबुक के चेहरे के अलावा न किसी से जान, न पहचान.

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आज पापा ने कुछ लोगों को घर पर बुलाया है. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि एक अंजान शख़्स से कैसे बात करूं? फेसबुक पर उससे बात करने में जो कंफर्ट लेवल था, वो यहां नहीं था. शाम को वो लोग आए और पापा ने पराग से मेरा परिचय करवाते हुए अकेले में बात करने को कहा. मैं बेहद घबराई हुई थी कि क्या और कहां से बात शुरू करूं. पराग ने भी बस मेरा नाम ही पूछा. हम दोनों लगभग आधे घंटे तक चुपचाप बैठे थे. कुछ दिन बाद पापा ने शादी की तारीख़ भी तय कर दी. मैंने फेसबुक पर उसे मैसेज किया कि कुछ ही दिनों में मेरी शादी होनेवाली है, पर मुझे नहीं पता वो मेरे लिए सही है या नहीं. उधर से तुरंत जवाब मिला, ‘जो केवल नाम पूछकर शादी के लिए हां कर दे, उस पर भी भरोसा नहीं करोगी क्या?’

‘तुम्हें कैसे पता?’

‘…अब भी नहीं पहचाना इस बंदे को?’ यह पढ़ते ही सब कुछ साफ़ हो गया… ‘पराग आप?’

‘हां, क्या तुम मुझसे शादी करोगी?’

‘हां…’ दिल की सारी उलझनें मिट गईं. सब कुछ मिल गया था मुझे. आंखें बंद कीं, तो चेहरा भी सामने आ गया पराग का. दो साल कम नहीं होते किसी को जानने के लिए, मैं ही नहीं समझ पाई थी इस प्यार की अनुभूति को. आज ऐसा लगा छोटे-छोटे बादल के टुकड़े हवा में तैर रहे हैं. लग रहा है मानो आकाश ज़मीं पर उतर आया है और शाम की ख़ामोशियों में एक मीठी खनक गूंज रही है.

– शोभा रानी गोयल

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पहला अफेयर: ख़्वाबों के दरमियान… (Pahla Affair: Khwabon Ke Darmiyaan)

Pahla Affair Ki Kahani

पहला अफेयर: ख़्वाबों के दरमियान… (Pahla Affair: Khwabon Ke Darmiyaan)

वो ख़्वाब था कोई या मेरी ज़िंदगी की ख़ूबसूरत हक़ीक़त… आज तक नहीं समझ पाई हूं. अचानक आया और कई अरमान जगाकर चला गया… ट्रेन का सफ़र लंबा था और वो मेरे सामनेवाली सीट पर बैठा अपने में ही मस्त था. मुझे थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि एक ख़ूबसूरत लड़की सामने बैठी है और पिछले 2-3 घंटों से उसने एक बार में मेरी तरफ़ नज़र भरकर नहीं देखा. पर उसका न देखना ही मुझे उसकी ओर आकर्षित कर रहा था. उसका इस तरह मुझ पर ध्यान न देना ही मुझे ख़ास लग रहा था. न चाहते हुए भी मेरी नज़र उसी की तरफ़ जा रही थी. वो अपने खाने-पीने में, फोन पर म्यूज़िक सुनने में ही बिज़ी था. मैं पहली बार अकेले सफ़र कर रही थी. थोड़ा असहज लग रहा था सब कुछ. मैं खिड़की से बाहर झांकने लगी, कोई बड़ा स्टेशन आया था.

“चाय पीती हैं आप?” अचानक एक आवाज़ आई और मेरे सामने वही था, चाय के दो कप थे हाथ में, एक कप मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा उसने… अजीब लड़का है. मैं कुछ कह पाती, उसने वो चाय का कप मेरे हाथ में थमा दिया और फिर अपनी दुनिया में खो गया.

सच कहूं, तो चाय की बहुत ज़रूरत थी उस व़क्त मुझे. शाम ढली, खाने का टाइम हुआ, तो उसने अपने बैग से खाना निकाला और फिर मुझे देखकर बोला, “मेरे साथ खाना शेयर कर सकती हैं आप, मुझे बुरा नहीं लगेगा, ये घर का बना खाना है, आपको अच्छा लगेगा.”

“थैंक यू, आप खा लीजिए, मुझे भूख नहीं है…” मैंने थोड़ा फॉर्मल होते हुए कहा, तो उसने फ़ौरन जवाब दिया, “नहीं खाना है, तो आपकी

मर्ज़ी, पर झूठ मत बोलो कि भूख नहीं है, क्योंकि दिनभर से आपने कुछ नहीं खाया है. आप कुछ डरी हुई-सी लग रही हैं.”

“जी मैं अकेले पहली बार सफ़र कर रही हूं, इसलिए थोड़ा अजीब-सा लग रहा है.”

“कोई बात नहीं, खाना खा लीजिए, आपका डर कुछ कम हो जाएगा, भूखे पेट ज़्यादा डर लगता है.”

मेरे पास अब उसे मना करने का कोई कारण नहीं था. मैंने उससे बातें करनी शुरू कीं, कहां से आया, कहां जा रहा है, क्या करता है… आदि… पर उसने हर बात को बेफिक्री में उड़ा दिया और सीधा-सरल जवाब नहीं दिया.

मैंने भी सोचा कि क्यों इससे इतनी बातें कर रही हूं, सीधा जवाब तो देता नहीं है. कितना अजीब लड़का है. ख़ैर सुबह स्टेशन आया, तो देखा वो भी अपना सामान पैक कर रहा है. फिर उतरने में मेरी मदद करने लगा. मैंने भी ज़्यादा कुछ तो नहीं कहा, पर थैंक्स बोलकर आगे बढ़ गई.

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“अपना नाम तो बता दो मिस…” पीछे से उसने पुकारा.

मैंने पलटकर स़िर्फ उसको एक स्माइल पास की और आगे बढ़ गई…

एक साल बीत गया. पर वो सफ़र मैं आजतक नहीं भूली हूं, क्योंकि एक अकेले सफ़र में उस अंजान शख़्स से मुझे कुछ देर तो सहज महसूस करवाया. एक पहेली की तरह था वो, जिसे सुलझाने तक का मौक़ा मुझे नहीं मिला. पर उसके प्रति वो आकर्षण आज तक बना हुआ है. सोचती हूं कि क्या मुझे अपना नाम उसे बता देना चाहिए था? कहीं मैंने ग़लती तो नहीं कर दी, क्या पता नाम से बात आगे बढ़ती, तो वो मेरा फोन नंबर, पता-ठिकाना पूछ लेता. पर फिर यह सोचकर मन को समझा लेती हूं कि कितना अजीब लड़का था, क्या पता उसके मन में मेरे प्रति यह आकर्षण था भी या नहीं. मैं बस यूं ही वन वे ट्रैफिक चलाए जा रही हूं.

ख़ैर, जो भी था, बहुत मीठा-गुदगुदानेवाला एहसास था. शायद यही मेरा पहला प्यार था. पर आज इतना सब क्यों सोच रही हूं मैं. अब तो मुझे अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत करनी है, किसी और के ख़्वाबों को अपना बनाना है, उसके ही ख़्वाबों में खो जाना है.

“कविता बेटा, तैयार नहीं हुई क्या अब तक, लड़केवाले आते ही होंगे तुझे देखने…” मां की आवाज़ ने मुझे चौंकाया.

“मैं तैयार ही हूं मां, बस दो मिनट…”

नीचे गई, तो मैं हैरान थी, अरे, ये तो वही लड़का है. मुझे अपनी क़िस्मत पर यक़ीन नहीं हो रहा था. इतने में ही मेरा परिचय करवाया गया, “कविता, ये विक्रमजीत है हमारा छोटा बेटा और तुम्हें जिस ख़ास से मिलना है, वो बस अभी पहुंच ही रहा है. कमलजीत हमारा बड़ा बेटा, वो पीछेवाली कार में था, ट्रैफिक में फंस गया, आता ही होगा.

मुझे फिर एक झटका लगा. ऐसा लगा अब ख़ुद को नहीं रोक पाऊंगी, मैं फूट-फूटकर रो पड़ी, क़िस्मत मेरे साथ ऐसा भद्दा मज़ाक कैसे कर सकती है…!

मैं अपने कमरे में चली आई. सब हैरान थे कि आख़िर ऐसा क्या हो गया…

“उस दिन नाम बता देती, तो आज इस तरह हमारा सामना नहीं होता.” पीछे से विक्रम की आवाज़ सुनाई दी, तो मैं उस पर बिफर पड़ी…

“तुम ख़ुद को क्या समझते हो, ख़ुद चाहे कुछ भी करो, पर मैंने स़िर्फ नाम नहीं बताया, तो उसकी इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी मुझे. तुमने भी तो कुछ नहीं बताया था, न नाम, न पता, न फोन नंबर, न ठिकाना और मुझे तो यह भी नहीं पता था कि तुम मुझसे प्यार करते भी हो या नहीं.”

“अरे, अगर ये आपसे प्यार नहीं करता, तो आज आपका हाथ मांगने आपके घर पर नहीं आया होता…” किसी अंजाने शख़्स की आवाज़ थी यह.मैंने पलटकर देखा, तो विक्रम ने परिचय करवाया… “ये मेरे बड़े भाई कमल हैं.”

कमल ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “कविता, आपकी फोटो देखते ही विक्रम ने मुझे सब कुछ बता दिया था. पर वो आपके दिल की बात जानना चाहता था और इसीलिए उसी का यह आइडिया था कि मैं बाद में आऊंगा और आपको वो इस तरह सरप्राइज़ करेगा. मम्मी-पापा ने आपको पहले ही पसंद कर लिया था, विक्रम ने उन्हें भी अपने दिल की बात बता दी थी, बस आपकी मर्ज़ी वो जानना चाहता था.”

यह सब सुनकर मुझे विक्रम पर ग़ुस्सा भी आ रहा था और प्यार भी… सच में कितना अजीब लड़का है… पर मैं ख़ुश थी कि मैंने जिसको ख़्वाबों में अब तक संजोया था, वही मेरी ज़िंदगी की ख़ूबसूरत हक़ीक़त बन रहा है, मेरा हमसफ़र बन रहा है. मैं ख़ुशनसीब हूं कि मुझे मेरा प्यार ताउम्र के लिए मिल चुका था. थैंक यू भगवान!

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: मुझे क्या हुआ है? (Pahla Affair: Mujhe Kya Hua Hai)

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पहला अफेयर: मुझे क्या हुआ है? (Pahla Affair: Mujhe Kya Hua Hai)

उस समय यह पता ही नहीं लगता था कि दिन कब शुरू हो रहा है व कब ख़त्म हो रहा है. बस, दिल में एक ही बात रहती थी कि कब सुबह हो और कब डीटीसी की बस में ऑफिस जाने के लिए बैठूं. रोज़ के आने-जानेवालों में लगभग सभी एक-दूसरे को पहचानते हैं. ऐसे ही एक दिन वो मेरी बगल में बैठी थी. बस, उस दिन से ना जाने क्या हुआ कि रोज़ हम एक-दूसरे की उत्सुकता के साथ प्रतीक्षा करने लगे.

बस सरोजनी नगर डिपो से आरंभ होकर सचिवालय जाती थी, तो यह भी हम दोनों ही समझ गए कि हम लगभग एक ही जगह के
निवासी हैं व सेवा भी सचिवालय में ही करते हैं. हर रोज़ जब मैं बस में बैठता, तो वो स्वयं ही मेरे पास की सीट पर बैठ जाती अगर कभी वो पहले बस मैं बैठती, तो मैं उसके बगल की सीट पर बैठ जाता. कुछ दिन ऐसे ही चलता रहा. बात बस नयनों की ही भाषा में चलती रही, पर ज़ुबां से कुछ ना कह पाए.

कुछ समय बाद हम घर वापस आने के लिए भी एक-दूसरे का इंतज़ार करते, परंतु हम कभी भी एक-दूसरे से बात नहीं कर पाते थे. मन की भाषा शायद किसी अपने का मन ही पढ़ सकता है या यूं कहें कि कुछ लोगों से कभी-कभी न जाने क्यों ऐसा प्यार हो जाता है जिसे कहा भी नहीं जा सकता और उनके बग़ैर रहा भी नहीं जा सकता.

हम दोनों का साथ-साथ आना-जाना चलता रहा, पर दिल की बात ज़ुबां पर नहीं आ पाई. मन हमेशा ख़ुश रहने लगा था. सब कुछ अच्छा लगता था. परंतु सब कुछ अपने मन मुताबिक़ नहीं चलता. कुछ दिनों बाद उसने अचानक आना बंद कर दिया. मेरे पास न उसका पता और न ही कोई फोन नंबर था. बहुत दिनों तक मैंने उसका इंतज़ार किया, पर कुछ हासिल नहीं हुआ. मन कहता वो ज़रूर आएगी, पर कब तक इंतज़ार करता. 32 की उम्र हो चुकी थी मेरी, घरवालों ने शादी कर दी. धीरे-धीरे सब सामान्य होने लगा. सुंदर-सुशील पत्नी मिली थी. कुल मिलाकर मैं संतुष्ट था अपनी ज़िंदगी से.

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एक दिन जब मैं अपने नए घर के गृह प्रवेश के बाद पास ही के होटल में खाना खाने पत्नी व दोनों बच्चों के साथ गया, तो उसे अपने सामने देखकर सन्न रह गया. वो अपने पति व बच्चों के साथ बैठी हुई थी उसी होटल में. मन बेहद ख़ुश था उसे देखकर. हम दोनों दूर-दूर से ही आपस में एक-दूसरे को देखकर हंसते-मुस्कुराते रहे. खाना खाने के बाद जब वो होटल से बाहर जाने लगे, तो उसके पति ने कई बार मुझे मुड़-मुड़कर देखा.

मैं तो बेहद ख़ुश था. ऐसा लग रहा था जैसे कोई ख़ज़ाना मिल गया हो. कुछ दिनों बाद मेरी बेटी ने मुझसे कहा, “पापा, मेरी मैडम मुझको बहुत प्यार करती हैं और चॉकलेट भी देती हैं.” मैंने उसकी बातों को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी और कहा, “बेटा, तुम सुंदर हो और पढ़ने में होशियार हो, इसलिए मैडम प्यार करती हैं.” आज मेरी बेटी का स्कूल में आख़िरी दिन था, क्योंकि वो स्कूल पांचवीं तक ही था. वैसे तो मेरी पत्नी ही जाती थी उसे स्कूल से लेने के लिए, पर उस दिन मुझे जाना पड़ा.

“पापा, वो देखो मेरी मैडम.” मैडम को देखकर मुझे लगा कि मैं फिर लुट गया, क्योंकि वही मेरा पहला प्यार था, जिसको मैंने मन व आंखों की भाषा में पाया था. मैं ठगा-सा मुंह लटकाए घर वापस आ गया. जीवन तो जीना है, पर कुछ लोग न जाने क्यों मन में घर कर जाते हैं. यह मैं समझ नहीं पाया कि मुझे क्या हुआ है?

– दिनेश लखेड़ा

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पहला अफेयर: यादों की परछाइयां… (Pahla Affair: Yaadon Ki Parchhaiyan)

 

पहला अफेयर: यादों की परछाइयां… (Pahla Affair: Yaadon Ki Parchhaiyan)

जहाज़ ने अपनी चाल पकड़ ली है. बस, मेरी यादों की चाल ढीली पड़ गई है. कभी-कभी तन्हाई जीवन को उलट-पलट कर देखने के अवसर देती है- उसकी कुनीन-सी कड़वी बातों ने उसे दोबारा पाने के मेरे दंभ को चकनाचूर कर दिया है. मैं अपने जीवन को तराज़ू में तोलने लगी हूं- एक पलड़ा उसे पाने की चाह में ज़मीन छू रहा है और उसके दंभ का पलड़ा हवा से बातें कर रहा है… उसने तो मुझे अपनी ग़लती को जानने का मौक़ा तक नहीं दिया.

बेटी के बार-बार आग्रह पर पहली बार मैं अमेरिका जा रही हूं. क्या देखती हूं कि सामने से हाथ में छोटा सूटकेस पकड़े उसी अकड़ू चाल से आदी चला आ रहा है. मुझे ज़ोर का झटका लगा. ख़ैर, मैं उसे अनदेखा कर सामने फॉर्मैलिटीज़ पूरी करते अपने मामाजी की तरफ़ मुड़ने को हुई, तभी आगे बढ़कर आदी ने कहा- अरे सुरभि, तुम यहां कहां? मेरा संक्षिप्त उत्तर था- बेटी के पास जा रही हूं. और… जाना कि वो अपनी कंपनी की तरफ़ से शिकागो जा रहा है.

न जाने कितने सालों के पत्थर सरकते रहे हैं सीने से. सुना था उसका विवाह किसी अमीर बाप की इकलौती बेटी से हुआ है. नतीजा, उसके लालची पिता को ख़ूब दान-दहेज से लादा गया होगा. प्लेन में हमारी सीटें नज़दीक थीं. वह जानकर अचरज हुआ कि दो वर्ष के अंदर ही उसका माधवी से विवाह-विच्छेद हो गया.

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मैं टीचिंग लाइन में आ गई थी. साहित्य में एमए करने के बाद मैंने पब्लिक स्कूल में वाइस प्रिंसिपल का पद संभाला. माता-पिता के अति आग्रह के बाद विवाह बंधन में भी बंधी.

मुझे लगा शायद हम ऑक्टोपस की तरह अष्ट पद वाले ऐसे प्राणी हैं, जो समाज के कई कालों में जीने की मजबूरी झेलते हैं. और जब हार्दिक पीड़ा शब्दों में ढलनी दुष्कर हो जाती है, तो शायद ऐसी आग का सृजन होता है, जो आस-पास का सब कुछ तहस-नहस कर देती है. उसके तलाक़ का कारण जानना मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता. उसकी बातों में मुझे ठुकराने के पश्‍चाताप का लहज़ा-सा ज़ाहिर था.

आज मेरे मन में कई उद्गार पानी के बुलबुले की तरह उठ-गिर रहे हैं. फिर भी मैं जानना चाहती थी कि मैंने तुमसे तुम्हारी हंसी तो न मांगी थी? अनजाने ही संगिनी बनने का सुख मांग बैठी. और आज है सामने रेतीला मैदान और तेरी यादों की परछाइयां और… तुम्हारे झूठे दंभ के कारण बहुत कुछ झेला है मैंने. मन सागर में आए तूफ़ान की हुंकार सुनी है मैंने.

यूं तो ज़माना ख़रीद सका न हमें… तेरे प्यार के लफ़्ज़ों पर बिकते चले गए हम…

फ्लाइट के लैंड करते ही आदी न जाने कहां गायब हो गया. मुझे कुछ कहने तक का मौक़ा नहीं दिया. यूं भी अब खोखली यादों के सिवा क्या था मेरे पास. ये मेरी यादें परछाइयां बन आज भी डोल रही हैं मेरे संग.

रात होते ही अतीत की यादें मुझे पीछे धकेल ले गईं. सुना है स्मृतियों को कहीं भी उखाड़ कर फेंक दो, कैक्टस के कंटीले झाड़ की तरह फिर से उगने की उद्दंडता कर बैठती है. ऐसे ही एक शाम हम बगीचे में बैठे थे, तभी पेड़ से एक पक्षी मुंह में एक कीड़ा लेकर दूर आसमान में उड़ चला. हम ध्यान से उसे देखते रहे- आदी के एक मनचले दोस्त ने एक शेर कह डाला था… न रख उम्मीद किसी परिंदे से इकबाल… जब निकल आते पर अपना आशियां भूल जाते हैं… आज उस शेर का एक-एक मिसरा मुंह चिढ़ा रहा है. मेरे सीने में नश्तर चुभो रहा है… मुझे माज़ी की अधकचरी यादों में, पीछे धकेल रहा है.

– मीरा हिंगोरानी

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पहला अफेयर: आईना (Pahla Affair: Aaina)

Pahla Affair

पहला अफेयर: आईना (Pahla Affair: Aaina)

मेरा यह अंतर्मुखी व्यक्तित्व शायद मैंने अपनी मां से जन्मजात पाया है. बहुत कम बोलने तथा अपनी किताबों में खोये रहने का स्वभाव लिए कब मैंने जीवन के इक्कीस बसंत पार कर लिए, इसका एहसास शायद मुझे भी नहीं हो पाया. उन दिनों अपने स्थानीय यूनिवर्सिटी से रसायन शास्त्र में पीएचडी की डिग्री हासिल करने के लिए मैंने दाख़िला लिया था.

मेरे अनुभवी गाइड ने पढ़ाई में मेरी रुचि देखकर मुझे कुछ समय के लिए बीएचयू, वाराणसी जाने की सलाह दी, जिससे मैं वहां की लाइब्रेरी में अपने विषय के अनुकूल नए शोध पत्रों को पढ़ सकूं. उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर मैंने बीएचयू की लाइब्रेरी में अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया. सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि एक दिन मैंने एक सुशील से गौर वर्ण लड़के को मेरी सामनेवाली मेज़ पर अपनी किताबों में झुके हुए पाया. यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं थी, पर न जाने क्यों मुझे कुछ अजीब और अटपटा-सा लगा. मैंने उचककर उसकी किताबें देखी की कोशिश की, शायद डॉक्टर बनना था उसे, वह भी दांतों का. उसकी किताबें थीं मानव दांतों के आंतरिक अध्ययन विषय पर और उसे शायद बेचैनी की हद तक यह जानकारी चाहिए थी.

पता नहीं क्या और कैसे हुआ, लेकिन मैंने जब उसे पहली बार देखा, हृदय में कोई जल तरंग-सा बज उठा. मुझे अपनी किताबों के अक्षर जैसे दिखाई नहीं पड़ रहे थे. अब तो मैं बहाने से उसे ही देखती रहती. मेरे हृदय की गति पर जैसे मेरा नियंत्रण ही नहीं रह गया था. शाम को जब मैं वापस हॉस्टल लौटती, तो वहां कोई सखी-सहेली या परिचित तो मिलता नहीं, मैं कमरे में जाकर आईने के सामने खड़ी हो जाती और अपने आप से ही घंटों बातें किया करती. एक दिन मैं आईने से ही पूछ बैठी, ‘इतनी सुंदर तो हूं मैं, ये मुझे देखता क्यों नहीं…’ अगले दिन थोड़ा संवरकर जाती, परंतु वो पाषाण हृदय किताबों में ही घुसा रहता, मुझे देखता ही नहीं. ऐसा एक बार भी संभव नहीं हुआ कि हमारी नज़रें टकरा जाएं.

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धीरे-धीरे मेरा ध्यान अपनी किताबों में न होकर उसकी गतिविधियों में रहने लगा. नज़रें उसके चहेरे पर ही टिकी रहने लगीं और मुझे एहसास होता गया कि मैं उससे प्यार करने लगी हूं. मेरा संकोची, अंतर्मुखी मन मुझे मुंह खोलने नहीं देता और उस बेपरवाह को अपनी पढ़ाई के आगे शायद कोई दुनिया ही नहीं दिखाई देती.

और फिर एक दिन वह नहीं आया. आगे जब तक मैं बनारस की उस लाइब्रेरी में रही, वह नहीं आया. मैंने हिसाब लगाया, पूरे पांच दिन आया था वो और मुझे भटकाकर मीलों दूर न जाने किन ख़ुशबुओं के बगीचे में उड़ा ले गया था. मैं तितली की मानिंद उड़ती फिर रही थी, परंतु वह तो जा चुका था.

अथक प्रयासों से मैंने दोबारा अपनी पढ़ाई ब्रारंभ की, लेकिन मुझमें पहले जैसी एकाग्रता नहीं रही. वह चोर मुझसे मेरा ‘मैं’ ही चुरा ले गया था शायद. उसकी कोई पहचान मेरे पास नहीं थी. न नाम, न पता, सिवाय एक काग़ज़ के पन्ने के, जो उसकी मेज़ से उड़कर मेरी मेज़ के नीचे आ गया था. उस पन्ने पर उसने शायद मानव दांतों से संबंधित चित्र बनाने के लिए आड़ी-तिरछी लकीरें खींच रखी थीं. उसी काग़ज़ के पन्ने को मैंने संभालकर रख लिया था.

कैसा जादुई था यह प्यार का एहसास, जो पूर्णतया एक तरफ़ा तो था, लेकिन मुझे इतराना सिखा गया था और इसमें मेरा साक्षी बना था मेरे हॉस्टल के कमरे में लगा हुआ वह आदमक़द आईना. आज मैं दो बेटों की मां हूं और संतुष्ट भी हूं. सभी को मेरी पीएचडी की डिग्री और मेरे द्वारा किए गए हर एक कार्य पर गर्व है, लेकिन मेरी किताबों के बीच दांतों के चित्रवाला काग़ज़ का वह पन्ना आज भी छुपा बैठा है, जो तब बोल पड़ता है, जब-जब मैं आईना देखती हूं.

– डॉ. कमला कुलश्रेष्ठ

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पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत लम्हा (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Lamha)

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पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत लम्हा (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Lamha)

एक बार व़क्त का सबसे ख़ूबसूरत लम्हा गिरा कहीं, उसे देखकर सारी कायनात उसकी दीवानी हो गई और उसके स्पर्श की चाह में सारी हवाओं का रुख़ बदल गया. गुलाब भी उसके होंठों को छूने के लिए तरसने लगे. उस बहार का नाम शैलजा था, लेकिन इस नाम से कभी किसी ने उसे नहीं पुकारा होगा… सभी उसे शैलू कहते थे. अपने इस निकनेम से वह बड़ी मासूम और अल्हड़ लगती थी.

हमारे कॉलेज में आज उसका पहला दिन था और एक बार उसे जिसने भी देखा, वह उसके रूप का दीवाना हो गया. उसे चाहनेवालों की संख्या मतदाता सूची की तरह लंबी थी. जब से शैलू मेरे जीवन में आई थी, मेरी ज़िंदगी का हर लम्हा ख़ुशगवार हो गया था.

साथ पढ़ते हुए अपने कॉलेज की पढ़ाई हमने पूरी कर ली, तो मुझसे लौटकर आने की बात कहकर वह दूसरे शहर अपने घर चली गई. लेकिन उसके बाद लौटकर नहीं आ सकी और मैं न जाने किस उम्मीद पर उसका इंतज़ार करता रहा. व़क्त गुज़रता चला गया, मैं उसे भुला तो न सका, पर ज़िंदगी में आगे ज़रूर बढ़ गया.

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लेकिन इधर कुछ दिनों से अचानक न जाने कितनी बार, कितने ब्लैंक कॉल्स आने लगे और कल रात मैंने उस एक कॉल पर अनायास ही तीन बार फिर से फोन लगाकर जानना चाहा कि यह किसका कॉल था. तीन बार में भी कोई आवाज़ नहीं आई, लेकिन चौथी बार उसकी आवाज़ सुनाई दी. न जाने अंतर्मन ने कैसे जान लिया था कि वह जो बात नहीं कर रहा, वह ज़रूर कोई मेरा अपना ही है और उसकी आवाज़ की कशिश को आज भी मैं नहीं भूल पाया था.

बीस साल पहले मैंने उसे खो दिया और आज इतने सालों बाद रात के दो बजे महज़ वो आवाज़ सुनकर उसके नाम से मैंने उसे पुकारा, तो ख़ुशी के मारे वो भावुक होती चली गई. फिर उसके शब्द भीगने लगे थे. मेरे लिए दुनिया का यह सबसे सुखद आश्‍चर्य था. जाने इन बीस सालों में वह ज़िंदगी के किन हालात से गुज़री होगी और जाने मेरा ये फोन नंबर उसने कहां से, किस तरह से लिया होगा.

और आज एक ही बार की लंबी बातचीत में हमने कॉलेज के अंतिम दिनों के एक-एक पल को न जाने कितनी बार जीया. हम दोनों को अब तक सब कुछ वैसा ही याद था, जैसा हम साथ चलते-चलते पीछे व़क्त की दहलीज़ पर छोड़ आए थे. उसके लहज़े में छिपा दर्द और उदासी मैंने महसूस कर ली थी. एक बेहद अंतरंग रिश्ते के पुनर्जीवित होने की ख़ुशी उसे मुझसे अधिक थी. लेकिन मैं अपनी सुखी ज़िंदगी में व्यस्त था. उसके जीवन के रेगिस्तान को एक क़तरा शबनम भी न दे सका. शायद उसे भी यह एहसास हो गया और वह मुझसे दूर, बहुत दूर चली गई और इस बार मैंने उसे हमेशा के लिए खो दिया था.

कहां मिलता है कोई दिल की गहराइयों से चाहनेवाला…
मेरे पास अब ज़िंदगीभर के लिए उसकी यादों के सिवा कुछ भी नहीं बचा. मैं उसे कभी भुला नहीं सकता था, उसे भुलाने में तो सदियां लग जाएंगी, पर उसकी यादें मेरे जीने का सहारा बनी रहेंगी… ताउम्र!

– तरुण राजवानी

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पहला अफेयर: इंतज़ार (Pahla Affair: Intezar)

Pahla Affair Kahani

पहला अफेयर: इंतज़ार (Pahla Affair: Intezar)

मुहब्बत इंद्रधनुष की तरह कायनात के एक किनारे से दूसरे किनारे तक फैली हुई है और इसके दोनों सिरे दर्द के अथाह समंदर में डूबे हुए. लेकिन फिर भी जो इस दर्द को गले लगा लेता है, उसे इसी में सुकून मिलता है.

बस, मुझे भी इसका एहसास उस व़क्त हुआ, जब उसकी मासूम आंखें और मुस्कुराते होंठों को मैंने देखा. न जाने कैसी कशिश थी उसकी आंखों में कि डूबता ही चला गया और आज तक उबर ही नहीं पाया.

वैसे तो मैंने उसे कैफे में देखा था, तभी से खो सा गया था, पर आमने-सामने मुलाक़ात कॉलेज के बाइक स्टैंड पर हुई. “ऐ मिस्टर, तुम समझते क्या हो अपने आप को? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी दोस्त से बदतमीज़ी करने की और ये दादागिरी कहीं और जाकर दिखाना.”

मैं ख़ामोश सा बस उसे देखता ही जा रहा था और उसका चेहरा गुस्से में तमतमा रहा था. आंखें चमक रही थीं और माथे पर पसीने की बूंदें थीं. अचानक उसकी सहेली आई और कहने लगी, “ये तू क्या कर रही है, ये वो लड़का नहीं है.”

वो अवाक् सी देखने लगी और कहने लगी, “मुझे माफ़ कर दीजिए, मुझे लगा कि…”

“कोई बात नहीं, अंजाने में ऐसा हो जाता है.” मेरी बात सुनकर वो तेज़ी से वहां से चली गई.

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लेकिन मैं बुत बनकर वहीं खड़ा रहा, जब तक कि मेरे दोस्तों ने आकर मुझे चौंकाया नहीं. फिर तो बस आते-जाते मुलाक़ातें होने लगीं. पहले-पहले वो सकुचाई सी नज़रें उठाती, फिर बाद में मुस्कुराने लगी. उसकी वो मुस्कुराहट मेरे दिल में उतर जाया करती थी. उसकी बोलती आंखें कई ख़्वाब जगाया करती थी. वो भी मुझे पसंद करने लगी थी, कम से कम मुझे तो यही लगने लगा था. हम क़रीब आने लगे थे.

एक दिन उसने कहा कि वो विदेश जा रही है, आगे की पढ़ाई के लिए. मैंने कुछ नहीं कहा. अगले दिन फिर उसने कहा. मैंने कहा कि ठीक है. वो कहने लगी, “कुछ कहोगे या पूछोगे नहीं?”

मैंने कहा, “तू मुझसे दूरी बढ़ाने का शौक पूरा कर, मेरी भी ज़िद है कि तुझे हर दुआ में मांगूंगा.” वो देखती ही रह गई.

पांच साल में शायद बहुत कुछ हो जाता है, लेकिन मेरा प्यार उसके प्रति बढ़ता ही चला गया… बस फिर वो लम्हा आ गया, जब वो सामने आई, लेकिन बदले हुए रूप में. उसके साथ उसका हमसफ़र था और उसके चेहरे की ख़ुशी देखकर मैं मुस्कुरा दिया. बिना किसी शिकवे-गिले के मैंने उसे विदा किया…

मेरा पहला प्यार अधूरा रह गया… बस उम्रभर का इंतज़ार दे गया… मैं अब भी उसके लिए ख़ुशियों की दुआ मांगता हूं, क्योंकि प्यार का अर्थ स्वार्थी होना नहीं है, प्यार का मतलब समर्पण और त्याग भी तो है.

– वीना साधवानी

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पहला अफेयर: नीली छतरीवाली लड़की… (Pahla Affair: Neeli Chhatriwali Ladki)

Pyar ki Khaniya

पहला अफेयर: नीली छतरीवाली लड़की… (Pahla Affair: Neeli Chhatriwali Ladki)

प्रतिदिन वो नीली छतरीवाली लड़की घर के सामने से गुज़रती थी. किसी बच्चे को स्कूल बस तक छोड़ने के लिए चौराहे तक जाना उसका रोज़ का काम था. लेकिन आज पहली बार मेरी नज़र उसकी नज़र से टकरा गई. वो हौले से मुस्कुराई और आगे बढ़ गई. उसकी आंखों में ओस की बूंदों के समान चमक थी. मुस्कुराते हुए उसके लब ऐसे लग रहे थे मानो गुलाब की कई कलियां अभी-अभी खिली हों.

उसकी नाज़ुक-सी कलाई में एक ब्रेसलेट था, उसी हाथ से उसने छतरी को पकड़ रखा था, दूसरे हाथ की उंगली को बच्चे ने पकड़ रखा था. उसकी सुराहीदार गर्दन में कोई आभूषण नहीं था और सच पूछो तो उसे किसी आभूषण की ज़रूरत भी नहीं थी, बिन शृंगार के ही बेहद ख़ूबसूरत लगती थी वो. पैरों में सिंपल-सी चप्पल और हल्के रंग की सलवार-कुर्ती पहनकर आती थी वो. वेशभूषा भले ही साधारण थी उसकी, पर व्यक्तित्व असाधारण था. उसमें ग़ज़ब का आकर्षण था, एक कशिश थी, जो मुझे उसकी ओर खींच रही थी. वो किसी मत्स्यकन्या की तरह ख़ूबसूरत थी.

मैं उसके वापस लौटने का इंतज़ार करने लगा. कुछ देर बाद वह वापस लौटी. अब उसकी पलकें झुकी हुई थीं. लजाते हुए वो छुईमुई-सी प्रतीत हो रही थी. उसकी मासूम मुस्कान अब भी बनी हुई थी. उसे देखकर मेरे भीतर हज़ारों फूल खिल गए थे. यह पहली नज़र का प्यार नहीं तो और क्या था? मैंने घड़ी को देखा, तो दस बजने को थे. मैं अब रोज़ साढ़े नौ बजे से ही उसका इंतज़ार करने लगा था.

वो रोज़ मुस्कुराते हुए आती और चली जाती. मैं बस उसे देखता रह जाता. इतना ज़रूर समझ गया था कि वो भी मुझे पसंद तो करती थी, पर क्या प्यार भी करने लगी थी? सोचता था उसका नाम पूछूं, पर कभी हिम्मत ही नहीं जुटा पाया.

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यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा, फिर अचानक उसका मेरी राह से गुज़रना बंद हो गया. मैं परेशान था. मोहल्ले से पता चला कि उसकी शादी तय हो चुकी है. समय बीतता गया, पर 7-8 महीनों बाद वो फिर दिखाई दी. कलाईभर की चूड़ियां पहने हुए थी वो. मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र था. लेकिन ये क्या… उसका सौदर्य यूं मुरझाया हुआ क्यों लग रहा था. उसके चहरे पर पहले-सी आभा नहीं थी. होंठ सूखे और मन उदास लग रहा था. बेहद कमज़ोर और थकी हुई लग रही थी. अब वो मुस्कुराती भी नहीं थी.

वो अक्सर मायके आया करती थी. सुनने में आता कि जाते समय वो मायके से ढेर सारा सामान ले जाया करती थी.

पर कई महीनों से उसके मायके आने का सिलसिला भी ख़त्म हो गया था. फिर एक दिन अचानक ख़बर मिली कि ससुराल ेमं उसकी जलने से मौत हो गई. क्या, कैसे और क्यों हुआ, कोई नहीं जानता… पर अंदाज़ा तो सबको है कि दहेज की बलि चढ़ चुकी थी वो.

इस दुनिया में अब वो नीली छतरीवाली लड़की नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि वो नीली छतरीवाली लड़की आज भी मुझे नीले आकाश से निहारती है और अब हमें कोई जुदा नहीं कर सकता.

– वैभव कोठारी

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