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गुम होता प्यार… तकनीकी होते एहसास… (This Is How Technology Is Affecting Our Relationships?)

अभी कुछ दशकों पहले तक हाल यह था कि त्योहारों की आहट सुनाई देते ही घर-परिवार, समाज- हर जगह रौनक़ की झालरें लहराने लगती थीं, ख़ुशी, उमंग और ऊर्जा से भरे चेहरों की चमक व उत्साह यहां-वहां बिखर जाता था. क्या करना है, कहां जाना है, किसे क्या उपहार देने हैं और रसोई में से कितने पकवानों की ख़ुुशबू आनी चाहिए- सबकी सूची बनने लगती थी. महीनों पहले से बाज़ार के चक्कर लगने लगते थे और ख़रीददारी का लंबा सिलसिला  चलता था.

Technology and Relationships

समय बदला, हमारी परंपराओं, संस्कृति और सबसे ज़्यादा हमारी सोच पर तकनीक ने घुसपैठ कर ली. हर समय किसी-न-किसी रूप में तकनीक हमारे साथ रहने लगी और फिर वह हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत बन गई. अब आलम यह है कि त्योहारों का आगमन होता है, तो माहौल में चहल-पहल बेशक दिखाई देती है, पर उसमें से उमंगवाला अंश गायब हो गया है और तनावभरा एक शोर यहां-वहां बिखरा सुनाई देता है. दूसरों से बढ़-चढ़कर दिखावा करने की होड़ ने त्योहारों के महत्व को जैसे कम कर दिया है. त्योहार अब या तो अपना स्टेटस दिखाने के लिए, दूसरों पर रौब जमाने के लिए कि देखो हमने कितना ख़र्च किया है, मनाया जाता है या फिर एक परंपरा निभाने के लिए कि बरसों से ऐसा होता आया है, इसलिए मनाना तो पड़ेगा.

फॉरवर्डेड मैसेजेस का दौर

पहले लोग त्योहारों की शुभकामनाएं अपने मित्र-संबंधियों के घर पर स्वयं जाकर देते थे. बाज़ारवाद के कारण पहले तो इसका स्थान बड़े और महंगे ग्रीटिंग कार्ड्स ने लिया, फिर ई-ग्रीटिंग्स ने उनकी जगह ली. ग्रीटिंग कार्ड या पत्र के माध्यम से अपने हाथ से लिखकर जो बधाई संदेश भेजे जाते थे, उसमें एहसास की ख़ुशबू शामिल होती थी, लेकिन उसकी जगह अब फेसबुक और व्हाट्सऐप पर मैसेज भेजे जाने लगे हैं. ये मैसेज भी किसी के द्वारा फॉरवर्ड किए हुए होते हैं, जो आगे फॉरवर्ड कर दिए जाते हैं. कई बार तो बिना पढ़े ही ये मैसेजेस फॉरवर्ड कर दिए जाते हैं. उनमें न तो कोई भावनाएं होती हैं, न ही भेजनेवाले की असली अभिव्यक्ति. ये तो इंटरनेट से लिए मैसेज ही होते हैं. इसी से पता लगाया जा सकता है कि तकनीक कितनी हावी हो गई है हम पर, जिसने संवेदनाओं को ख़त्म कर दिया है.

रिश्तों की गढ़ती नई परिभाषाएं

परस्पर प्रेम और सद्भाव, सामाजिक समरसता, सहभागिता, मिल-जुलकर उत्सव मनाने की ख़ुुशी, भेदभावरहित सामाजिक शिष्टाचार आदि अनेक ख़ूबियों के साथ पहले त्योहार हमारे जीवन को जीवंत बनाते थे और नीरसता या एकरसता को दूर कर स्फूर्ति और उत्साह का संचार करते थे, पर आजकल परिवार के टूटते एकलवाद तथा बाज़ारवाद ने त्योहारों के स्वरूप को केवल बदला नहीं, बल्कि विकृत कर दिया है. सचमुच त्योहारों ने संवेदनशील लोगों के दिलों को भारी टीस पहुंचाना शुरू कर दिया है.

सोशल मीडिया के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल ने जहां हमारी एकाग्रता को भंग किया है, वहीं सामाजिकता की धज्जियां उड़ा दी हैं. फोन कर बधाई देना भी अब जैसे आउटडेटेड हो गया है. बेवजह क्यों किसी को फोन कर डिस्टर्ब किया जाए, इस सोच ने मैसेज करने की प्रवृत्ति को बढ़ाकर सामाजिकता की अवधारणा पर ही प्रहार कर दिया है. लोगों का मिलना-जुलना जो त्योहारों के माध्यम से बढ़ जाता था, उस पर विराम लग गया है. ज़ाहिर है जब सोशल मीडिया बात कहने का ज़रिया बन गया है, तो रिश्तों की संस्कृति भी नए सिरे से परिभाषित हो रही है.

हो गई है सामाजिकता ख़त्म

‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’, यह वाक्य हमें बचपन से रटाया गया, परंतु तकनीक ने शायद अब हमें असामाजिक बना दिया है. सोशल मीडिया के बढ़ते वर्चस्व ने मनुष्य की सामाजिकता को ख़त्म कर दिया है. देखा जाए, तो सोशल मीडिया आज की ज़िंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरत बन गया है. व्हाट्सऐप, ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम और न जाने क्या-क्या? स़िर्फ एक टच पर दुनिया के इस हिस्से से उस हिस्से में पहुंचा जा सकता है. देश-दुनिया की दूरियां सिमट गई हैं, लेकिन रिश्तों में दूरियां आ गई हैं.

संवादहीनता और अपनी बात शेयर न करने से आपसी जुड़ाव कम हो गया है और इसका असर त्योहारों पर पड़ा है. माना जाता था कि त्योहारों पर सारे गिले-शिकवे दूर हो जाते थे. एक-दूसरे से गले मिलकर, मिठाई खिलाकर मन की सारी कड़वाहट ख़त्म हो जाती थी. पर अब किसी के घर जाना समय की बर्बादी लगने लगा है, इसलिए बहुत ज़रूरी है तो ऑनलाइन गिफ़्ट ख़रीद कर भेज दिया जाता है.

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Technology and Relationships
रसोई से नहीं उठती ख़ुशबू

आजकल प्रत्येक क्षेत्र में बाज़ारवाद हावी हो रहा है. इस बनावटी माहौल में भावनाएं गौण हो गई हैं. ऑनलाइन संस्कृति ने अपने हाथों से उपहार को सजाकर, उसे स्नेह के धागे से बांधकर और अपनी प्यार की सौग़ात के रूप में अपने हाथों से देने की परंपरा को पीछे धकेल दिया है. बाज़ार में इतने विकल्प मौजूद हैं कि ख़ुद कुछ करने की क्या ज़रूरत है.

एक समय था कि त्योहारों पर घर में न जाने कितने तरह के पकवान बनाए जाते थे. न जाने कितने नाते-रिश्तेदारों के लिए लड्डू, मठरी, नमकपारे, नमकीन, बर्फी, गुलाब जामुन और न जाने कितने डिब्बे पैक होते थे और यह भी तय किया जाता था कि कौन किसके घर जाएगा.

पर एकल परिवारों ने त्योहारों की रौनक़ को अलग ही दिशा दे दी. महंगाई की वजह से त्योहार फ़िज़ूलख़र्ची के दायरे में आ गए हैं. ऐसे में मिठाइयां या अन्य चीज़ें बनाने का कोई औचित्य दिखाई नहीं पड़ता. पहले के दौर में संयुक्त परिवार हुआ करते थे और घर की सारी महिलाएं मिलकर पकवान घर पर ही बना लिया करती थीं. लेकिन अब न लोगों के पास इन सबके लिए व़क्त है और न ही आज की हेल्थ कॉन्शियस पीढ़ी को वह पारंपरिक मिठाइयां पसंद ही आती हैं.

कोई घर पर आ जाता है, तो झट से ऑनलाइन खाना ऑर्डर कर उनकी आवभगत करने की औपचारिकता को पूरा कर लिया जाता है. कौन झंझट करे खाना बनाने का. यह सोच हम पर इसीलिए हावी हो पाई है, क्योंकि तकनीक ने जीवन को आसान बना दिया है. बस फ़ोन पर एक ऐप डाउनलोड करने की ही तो बात है. फिर खाना क्या, गिफ़्ट क्या, घर को सजाने का सामान भी मिल जाएगा और घर आकर लोग आपका हर काम भी कर देंगे. यहां तक कि पूजा भी ऑनलाइन कर सकते हैं. डाक से प्रसाद भी आपके घर पहुंच जाएगा. हो गया फेस्टिवल सेलिब्रेशन- कोई थकान नहीं हुई, कोई तैयारी नहीं करनी पड़ी- तकनीक के एहसास ने मन को झंकृत कर दिया. बाज़ार से आई मिठाइयों ने मुंह का स्वाद बदल दिया और बाज़ारवाद ने उपहारों की व्यवस्था कर रिश्तों को एक साल तक और सहेजकर रख दिया- नहीं हैं इनमें जुड़ाव का कोई अंश तो क्या हुआ, एक मैसेज जगमगाते दीयों का और भेज देंगे और त्योहार मना लेंगे.

– सुमन बाजपेयी

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लो बजट फेस्टिवल सेलिब्रेशन (Low Budget Festival Celebration)

Low Budget Festival Celebration

Low Budget Festival Celebration

हुए रौशन ये चराग़, देखो बेहिसाब…शब की रौऩकें बढ़ाने को हैं ये बेक़रार…कभी चाहत का नूर बनकर, तो कभी मुहब्बत का जुगनू बनकर… कभी चांदनी बनकर, तो कभी आफ़ताब का मंज़र बनकर…

फेस्टिवल के आते ही बाज़ार सजने लगते हैं और घरों की रौऩकें भी बढ़ने लगती हैं, लेकिन त्योहार के जोश और ख़ुशी में हम फ़िज़ूलख़र्ची भी ज़्यादा ही करने लगते हैं और बाद में बजट बिगड़ने पर परेशान होते हैं. बेहतर होगा कि पहले से ही ख़र्चे पर लगाम लगाएं, ताकि दिवाली हंसी-ख़ुशी में बीते. बहुत-से लोगों की आदत होती है कि दिवाली आते ही बिना सोचे-समझे हर चीज़ ख़रीदने लगते हैं. इससे फ़िज़ूलख़र्ची के अलावा और कुछ नहीं होता. बेहतर होगा कि आप इन बातों का ख़्याल रखें-

Low Budget Festival Celebration

  • एक लिस्ट बना लें कि दरअसल क्या-क्या नया ख़रीदना है और क्या नहीं.
  • सबका बजट निश्‍चित कर लें, जैसे- कपड़े-ज्वेलरी, खाना-पीना, गेट-टुगेदर, गिफ्ट्स आदि.
  • अगर आप दिवाली की छुट्टियों में कहीं बाहर जाने की सोच रहे हैं, तो काफ़ी एडवांस में ही टिकट्स और होटल बुकिंग्स कर लें, क्योंकि वो काफ़ी सस्ता पड़ेगा.
  • ग़ैरज़रूरी चीज़ें न ख़रीदें.
  • इस व़क्त बहुत-से ऑफर्स होते हैं, सेल और डिस्काउंट भी आपको बहुत लुभाएंगे, लेकिन स़िर्फ इसलिए कि डिस्काउंट है, आप चीज़ें न ख़रीदें. यदि सच में ज़रूरत है, तो ही ख़रीदें.

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  • नया फर्नीचर बदलने की जगह उन्हें पॉलिश करवा लें.
  • आप घर पर ही नए कर्टन्स और कुशन कवर्स तैयार कर सकते हैं, जैसे- कोई पुरानी साड़ी, जिस पर वर्क हो, तो उसका इस्तेमाल कर सकते हैं.
  • आप अपने पुराने कर्टन्स को लेस से सजाकर भी नया लुक दे सकते हैं.
  • पूरे घर को पेंट करने की बजाय एक दीवार पर डिज़ाइन पेंट करवाएं. इससे पूरे रूम का लुक बदल जाएगा.
  • पुराने वुडन फर्नीचर को भी आप पेंट करके नया लुक दे सकते हैं.

Low Budget Festival Celebration

  • दीयों को आप ख़ुद भी पेंट करके अलग लुक दे सकते हैं. मिट्टी के साधारण दीये ले आएं और उन्हें पेंट करके, मिरर या मोतियों से सजाएं.
  • घर पर रखे कांच के जार को नीचे से कलर करें और पानी भरकर फ्लोटिंग कैंडल्स से सजाकर सेंटर टेबल पर रखें. ये शोपीस का काम करेगा.
  • इलेक्ट्रॉनिक डेकोरेशन आपको हर साल नया लेने की ज़रूरत नहीं है. पिछले साल वाला ही इस्तेमाल में लाया जा सकता है.
  • रातभर इलेक्ट्रॉनिक डेकोरेशन को ऑन रखने की ज़रूरत नहीं है. एक निश्‍चित समय के बाद उसे ऑफ कर दें. इससे बिजली की बचत भी होगी. बहुत ज़्यादा डेकोरेशन से घर म्यूज़ियम लगने लगता है, इसलिए हर चीज़ को न सजाएं.
  • फूलों से आप घर को फेस्टिव लुक दे सकते हैं. वो ख़ूबसूरत भी लगते हैं, इको फ्रेंडली भी होते हैं और महंगे भी नहीं पड़ते.
  • अगर आपका बजट आपको इजाज़त नहीं देता, तो महंगे गिफ्ट्स न ख़रीदें. आपके द्वारा दिया गया ग्रीटिंग कार्ड या एक फोन कॉल ही काफ़ी है यह दर्शाने के लिए कि आपको उनकी फ़िक्र है. इसके लिए बेवजह मात्र दिखावे के लिए महंगे गिफ्ट्स न लें.

Low Budget Festival Celebration

  • मार्केट में रेडीमेड ड्रायफ्रूट्स या चॉकलेट्स के गिफ्ट पैक्स इस दौरान काफ़ी महंगे हो जाते हैं. बेहतर होगा कि आप ड्रायफ्रूट्स और चॉकलेट्स ख़रीदकर ख़ुद घर पर उनकी पैकिंग करके गिफ्ट के तौर पर दें. उसमें आप वेरायटी भी दे सकते हैं, जैसे- ड्रायफ्रूट्स के साथ घर पर बनी मिठाइयां आदि भी पैक कर सकते हैं.
  • ईएमआई पर चीज़ें उपलब्ध हैं, मात्र इसी कारण आप उन्हें न ख़रीदें. पहले यह तय करें कि क्या आपको उन चीज़ों की ज़रूरत है? क्या आप ईएमआई का बोझ उठा सकते हैं? ऐसा न हो कि वो आगे चलकर आपके तनाव का कारण बन जाए. जिन चीज़ों को आप एंजॉय नहीं कर पाएंगे और जो आपके तनाव का कारण बन जाएं, उन्हें न लें.
  • पटाखों पर ज़्यादा पैसे फूंकने से बेहतर होगा कि सेफ दिवाली मनाने के लिए बच्चों को मनाएं. उन्हें प्यार से समझाएं कि पटाखों से प्रदूषण फैलता है, बीमारी हो सकती है और ये ख़तरनाक भी हो सकते हैं.
  • मिठाइयां और अन्य पकवान भी उतने ही बनाएं, जितना काम आ सके, वरना बाद में सब बच जाता है, जो ख़राब हो जाता है और फिर फेंकना पड़ता है.
  • कोशिश करें कि कैश या डेबिट कार्ड से ही शॉपिंग करें. क्रेडिट कार्ड से फ़िज़ूलख़र्ची की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं.
  • मॉल्स या महंगी दुकानों की बजाय कुछ चीज़ों की शॉपिंग एक्ज़िबिशन्स या स्ट्रीट से करें. यह काफ़ी सस्ता पड़ेगा.
  • ज़रूरत और चाहत के बीच के फ़र्क़ को पहचानें. विभिन्न ऑफर्स के चक्कर में न आकर यह देखें कि यह चीज़ आपकी ज़रूरत की लिस्ट में है या आप बस यूं ही अट्रैक्ट होकर उसे ख़रीदने की चाहत रखते हैं.
  • सबसे ज़रूरी बात तो यह है कि आप यह समझें कि दिवाली या कोई भी त्योहार दिखावे के लिए नहीं, मेल-मिलाप बढ़ाने और मिल-जुलकर ख़ुशियां सेलिब्रेट करने के लिए होते हैं.

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– ब्रह्मानंद शर्मा

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