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कहानी- वक़्त (Short Story- Waqt)

प्रिया, पति की मुश्किलों को समझकर उनके साथ सहयोग करोगी, तो तुम देखोगी कि वो एक बार तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर पाए, तो अगली बार पूरी करने की पुरज़ोर कोशिश ज़रूर करेंगे. इन छोटी-छोटी बातों से ही रिश्ते में गहराई आती है. व्यक्तित्व में ठहराव आता है. मैं यह नहीं कहती कि तुम्हें नाराज़ होने का हक़ नहीं है, लेकिन ज़्यादा समय तक रूठे रहना पति-पत्नी के रिश्ते में खालीपन पैदा करता है. संवादहीनता उनमें दूरी बढ़ाती है.

Kahani

रात के दो बज रहे थे. विमान की तेज़ आवाज़ सुनकर बेसाख़्ता मैं टैरेस पर चली आई. घर के नज़दीक एयरपोर्ट होने के कारण विमानों की आवाज़ें यहां आती रहती हैं. निगाहें उठाकर मैंने आसमान की ओर देखा. एक विमान काफ़ी नीचे उड़ रहा था. शायद उसने अभी-अभी उड़ान भरी थी. हो सकता है, इसमें रोहित हों. उनकी फ्लाइट का भी तो यही समय था.

जब से रोहित बीजिंग जाने के लिए घर से निकले हैं, मेरा मन कमज़ोर पड़ रहा है. आंखों में नींद नहीं है. एक अजीब-सी बेचैनी, अजीब-सी असुरक्षा का एहसास मन को घेर रहा है. वह बीजिंग न जाएं, एयरपोर्ट से ही घर वापस लौट आएं. हालांकि पहले भी दो बार ऑफिस के काम से वे अमेरिका गए थे, पर उस व़क्त ऐसी बेचैनी का एहसास नहीं हुआ था, फिर आज ऐसा क्यों हो रहा है? शायद इसकी वजह वह झगड़ा है, जो मेरे और रोहित के बीच हुआ था और जिसकी वजह से मैं उनसे बात नहीं कर रही थी.

विवाह के बाद मेरा पहला जन्मदिन था. सोचा था, उस दिन रोहित कुछ स्पेशल करेंगे. मुझे बढ़िया-सा उपहार देंगे, कहीं घुमाने ले जाएंगे, लेकिन यह सब तो दूर, सारा दिन बीत गया और उन्होंने मुझे बधाई तक नहीं दी. शाम को उनका मैसेज आया- ‘बॉस की प्रमोशन पार्टी है. डिनर पर जा रहा हूं. तुम खाना खा लेना. मेरा इंतज़ार मत करना.’ पढ़कर क्रोध और वेदना की मिली-जुली प्रतिक्रिया आंखों से आंसू बनकर बह निकली. ठीक है, उन्हें मेरी परवाह नहीं, तो मुझे क्यों हो? वो मेरी उपेक्षा कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं कर सकती? कितनी मुश्किल से हुई थी हमारी शादी. पापा मेरी शादी अपने दोस्त के बेटे डॉ. आलोक से करना चाहते थे, लेकिन मैं रोहित को चाहती थी. रोहित विजातीय थे, इस कारण मम्मी-पापा इस शादी के लिए सहमत न थे. बाद में मेरे काफ़ी ज़िद करने पर वे राज़ी हुए, लेकिन मुझे क्या पता था, इतनी मुश्किल से हासिल हुआ प्यार भी इतनी जल्दी अपनी ऊष्णता खो देगा. छह महीने बीतते-बीतते हम दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा होने लगा. आज सोच रही हूं, तो लग रहा है, क्या वे बातें उतनी

महत्वपूर्ण थीं, जिनकी वजह से मैं नाराज़ हो जाती थी. रोहित का पिक्चर के लिए प्रॉमिस करना और फिर काम की व्यस्तता के कारण प्रोग्राम कैंसिल कर देना, क्या बहुत बड़ी बात थी? दो दिन तक मुंह फुलाए घूमती रही थी मैं. अगले संडे पिक्चर दिखाने ले गए, तभी मूड ठीक हुआ था मेरा. ऐसी छोटी-छोटी बातें अक्सर हो जातीं. कभी वीकएंड पर भी उन्हें ऑफिस जाना पड़ता, उस समय उखड़ी-उखड़ी रहती मैं उनसे. रोहित कहते, “प्रिया, मैं अपने काम के साथ समझौता नहीं कर सकता. मेरे लिए मेरा काम, मेरी पूजा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता या मुझे तुम्हारी फ़िक्र नहीं है. मैं जानता हूं कि मैं तुम्हें अधिक समय नहीं दे पाता हूं. तुम बस कुछ दिन सब्र रखो. मैंने अपने मैनेजर से बात की है. जल्द ही वो मुझे कोई दूसरा प्रोजेक्ट दे देंगे. तब मैं तुम्हारी सारी शिकायतें दूर कर दूंगा.” पर मुझमें सब्र नहीं था. मुझे रोहित की बातें आधारहीन लगतीं. पुरुष की ज़िंदगी में उसकी पत्नी की अहमियत इससे पता चलती है कि वो अपनी पत्नी को कितना समय देता है.

उस समय भी यही तर्क दिया था मैंने, जब चाचा के बेटे सौरभ की शादी में जाना था. शादी से एक दिन पहले बरेली पहुंचना चाहती थी मैं. रोहित भी राज़ी हो गए थे, पर घर से निकलने के बिल्कुल पहले रोहित के ऑफिस से फोन आ गया. खेदपूर्वक वो बोले, “सॉरी प्रिया, आज मैं किसी हालत में नहीं जा सकूंगा. प्रोजेक्ट में कुछ इश्यूज़ आ गए हैं, जिन्हें सॉल्व करना मेरी ज़िम्मेदारी है.” सुनते ही मुझे ग़ुस्सा आ गया था, “रोहित, आप इस बात को भी समझिए कि रिश्ते निभाना भी उतना ही ज़रूरी है. मेरा एक ही भाई है. मैं शादी में अगर जल्दी नहीं पहुंचूंगी, तो उसे कितना बुरा लगेगा. हो सकता है, ग़ुस्से में वो मुझसे बात भी न करे. चाचा-चाची ज़िंदगीभर इस बात का उलाहना देंगे.” रोहित शांत ही रहे. सारा दिन मेरा मूड ऑफ रहा था. अगले दिन रास्तेभर मैं रोहित से उखड़ी-उखड़ी रही थी. चाचा का घर आते ही मैं अंदर की ओर लपकी. हल्दी की रस्म तभी ख़त्म हुई थी.

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चाचा-चाची ने मुझे गले लगाया. सौरभ अपनी बहन की सहेलियों के साथ हंसी-मज़ाक में उलझा हुआ था. उसने दूर से ही हाथ हिला दिया. पास आकर रोहित से बात करने की औपचारिकता भी नहीं दिखाई. मैं जान-बूझकर वहां सबके नज़दीक जाकर खड़ी रही कि कोई तो मुझे देरी से आने का उलाहना देगा, लेकिन किसी को हमारे आने की फ़िक्र ही नहीं थी, फिर देर या जल्दी का सवाल ही कहां उठता था. मन ही मन मैं खिसिया रही थी. अपने इन्हीं संबंधों के लिए मैंने रोहित से झगड़ा किया था. रोहित मुख से कुछ नहीं बोले. बस, मुझे देखकर मुस्कुराते रहे थे.

रात में फेरों के व़क्त मम्मी मुझे एकांत में ले जाकर बोलीं, “प्रिया, तेरे और रोहित के बीच सब कुछ ठीक है न. सुबह से देख रही हूं, तू रोहित से बात नहीं कर रही है.” मम्मी की सहानुभूति पाकर मेरा दिल भर आया. व्यथित होकर मैं बोली, “मम्मी, मेरे और रोहित के बीच अब बहुत झगड़े होते हैं. कई-कई दिन तक हम एक-दूसरे से बात तक नहीं करते. रोहित अब बहुत बदल गए हैं. पहले उन्हें मेरा कितना ख़्याल था, लेकिन अब उन्हें मेरी बिल्कुल परवाह नहीं है. उनके लिए उनका काम ही सर्वोपरि है.” मम्मी शांत मन से मेरी बातें सुनती रहीं, फिर बोलीं, “प्रिया, कॉलेज में मैं तुम्हारी ही उम्र की कितनी लड़कियों के संपर्क में रहती हूं. उनमें से कई मुझे अपनी समस्याएं भी बताती हैं. प्रिया, मुझे लगता है, आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियों में एडजस्ट करने की भावना कम हो रही है और उनका अहं बढ़ रहा है. आजकल पति और पत्नी को जो बराबरी का दर्जा मिल रहा है, उसके चलते पति से उनकी अपेक्षाएं कुछ ज़्यादा ही रहती हैं और इनके पूरा न होने पर उनका अहं टकराने लगता है. शिकायतों का दौर शुरू हो जाता है.”

“मम्मी, तो क्या ग़लत बातों पर रिएक्ट नहीं करना चाहिए, उन्हें सहते रहना चाहिए.”

“नहीं प्रिया, तुम इस बात को समझो. ग़लत बातें सहने में और एडजस्टमेंट में अंतर है. पति की परिस्थितियों को समझना और उनसे तालमेल बिठाकर चलना एडजस्टमेंट होता है. छोटी-छोटी बातों पर रूठना, बोलचाल बंद कर देना, हर समय शिकायतें करना, ये सब बचपना है. प्रिया, पति की मुश्किलों को समझकर उनके साथ सहयोग करोगी, तो तुम देखोगी कि वो एक बार तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर पाए, तो अगली बार पूरी करने की पुरज़ोर कोशिश करेंगे. इन छोटी-छोटी बातों से ही रिश्ते में गहराई आती है. व्यक्तित्व में ठहराव आता है. मैं यह नहीं कहती कि तुम्हें नाराज़ होने का हक़ नहीं है, लेकिन ज़्यादा समय तक रूठे रहना पति-पत्नी के रिश्ते में खालीपन पैदा करता है. संवादहीनता उनमें दूरी बढ़ाती है.”

“मम्मी, मैं समझ रही हूं, कम से कम आप मेरी भावनाओं को समझेंगी, यही सोचकर अपने मन की बात कह दी. विश्‍लेषण करना ही है, तो निष्पक्ष भाव से करिए न, पक्षपातपूर्ण रवैया क्यों अपना रही हैं? कहां तो आप रोहित के साथ मेरी शादी के ख़िलाफ़ थीं और कहां आपको उनकी हर बात ठीक लगती है.” मम्मी का सदैव की भांति उपदेश देना मुझे खिन्न कर गया था.

ऐसा कम ही होता है कि किसी के समझाने से इंसान पर असर पड़े. मुझ पर भी मम्मी के समझाने का कोई असर नहीं हुआ था. अगर हुआ होता, तो अपना जन्मदिन भूल जाने पर मैं रोहित से इतना नाराज़ न होती. रात में बॉस की पार्टी से वो देर से घर लौटे थे. सुबह मेरे क़रीब आकर बोले, “प्लीज़ प्रिया, मुझसे नाराज़ मत हो. बॉस प्रमोशन पर जा रहा है. कल सारा दिन इतना व्यस्त रहा कि तुम्हारा जन्मदिन भूल गया. आज सुबह मम्मी ने फोन करके याद दिलाया. मुझे बहुत अफ़सोस है प्रिया, लेकिन मैं भी क्या करूं, तीन दिन बाद बीजिंग जाना है. तब तक रत्तीभर भी फुर्सत नहीं है, मगर वादा करता हूं कि वापस आकर हम आउटडोर वीकएंड सेलीब्रेट करेंगे.”

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मैंने रोहित की बात का जवाब नहीं दिया और किचन में चली आई. मुझे लगा शायद यह बात सच है कि ज्यों-ज्यों शादी का समय बीतता जाता है, पत्नी अपने पति से जुड़ती जाती है और पति विमुख होने लगता है, तभी रोहित को मुझसे अधिक अपना काम प्यारा है. मुझे उम्मीद थी, रात में रोहित मुझे फिर से मनाएंगे. देर से ही सही, मेरे लिए जन्मदिन का उपहार ज़रूर लाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. जाने के लिए घर से निकले, तब भी मैंने उनसे बात नहीं की. चुपचाप उनकी पैकिंग की और एक ओर खड़ी हो गई, इस प्रतीक्षा में कि शायद चलते हुए, वो मेरे क़रीब आएं. मुझे अपने आगोश में समेटकर, मेरा माथा चूम लें, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. मेरी हसरत दिल में ही रह गई. रोहित बदल गए हैं. मेरे बोलने न बोलने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. यही एहसास जागा था मन में, लेकिन अब लग रहा है कि यह सच नहीं है. अगर ऐसा होता, तो जाते समय पलटकर बार-बार मुझे न देखते. उनका चेहरा यूं उतर न जाता. मैं भी कितनी मूर्ख हूं,

ज़रा-ज़रा-सी बात पर ओवर रिएक्ट करती हूं. आख़िर क्यों नहीं बोली मैं रोहित से? ऐसा भी क्या कर दिया था उन्होंने, जो उन्हें बाहर तक छोड़ने नहीं गई? जाते समय उनसे यह भी नहीं कहा कि जल्दी आना. उनका व्यथित चेहरा यादकर मेरा मन द्रवित हो रहा था. काश, मम्मी की बातों को मैं गंभीरता से लेती और उनसे यूं नाराज़ न होती. ख़ैर, ईश्‍वर करे कि ये चार दिन जल्दी बीत जाएं और रोहित लौट आएं, फिर अपने अहं को दरकिनार कर उनके साथ एक नई शुरुआत करूंगी. इस विचार के साथ ही निगाहें घड़ी पर जा टिकीं. सुबह के छह बज चुके थे. रोहित की फ्लाइट को चार घंटे से अधिक बीत चुके थे. अब तक उन्होंने बीजिंग की आधी से अधिक दूरी भी तय कर ली होगी.

रातभर जागने के कारण सिर बहुत भारी हो रहा था, लेकिन मन की बेचैनी कुछ भी करने नहीं दे रही थी. अनमने भाव से मैंने टीवी ऑन किया. न्यूज़ चैनल लगाते ही नज़र ब्रेकिंग न्यूज़ पर जा टिकी- ‘बीजिंग जा रहे विमान का एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क टूट गया है. विमान का कुछ पता नहीं है. तलाश जारी है, मेरा दिल धक्क से रह गया. ‘हे भगवान! इसी विमान में तो रोहित थे. तो क्या… नहीं, नहीं. मेरा हृदय चित्कार कर उठा. आंखों से आंसू बहने लगे. ऐसा लगा, शरीर की मानो सारी शक्ति ख़त्म हो गई हो. कांपते हाथों से मैंने एयरपोर्ट का नंबर मिलाया, लेकिन नंबर बिज़ी था.

तभी कॉलबेल बजी. लगता है, रोहित आ गए. शरीर में एक नई स्फूर्ति-सी जागी. आंसू पोंछ बदहवास-सी मैं दरवाज़े की ओर भागी. बाहर कुरियरवाले को देख मन बुझ गया. रोहित ने एयरपोर्ट से एक पैकेट भेजा था. मैंने जल्दी उसे खोला. अंदर एक ख़ूबसूरत-सी रिस्टवॉच थी, साथ में एक स्लिप जिस पर लिखा था- ‘मेरी प्रिया को जन्मदिन का तोहफ़ा’, मन पर बोझ लेकर जा रहा हूं कि जाने से पहले तुम्हारी नाराज़गी दूर न कर पाया. तुमसे बहुत जल्द मिलूंगा, तो सारे गिले-शिकवे दूर कर दूंगा- स़िर्फ तुम्हारा रोहित.

मैं फूट-फूटकर रो पड़ी. रोहित, मुझे उपहार नहीं चाहिए. मुझे स़िर्फ तुम्हारा साथ चाहिए. प्लीज़ लौट आओ रोहित, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगी. काश! मैं रोहित से नाराज़ न हुई होती. काश! मैंने उन्हें रोक लिया होता. मेरी नज़रें दोबारा टीवी पर जा टिकीं. विमान को ढूंढ़ने के प्रयास और तेज़ हो गए थे, लेकिन उसका कुछ पता नहीं चल पा रहा था. थोड़ी देर में मम्मी आ गईं. उनके सीने से लग मैं बिलख उठी.

रोते-रोते मेरी हिचकियां बंध गईं. मम्मी मेरा सिर सहलाते हुए बोलीं, “प्रिया, हिम्मत रखो. तुम्हारे पापा एयरपोर्ट पता करने गए हैं. मेरा मन कह रहा है, रोहित ज़रूर आएंगे.” मम्मी की आवाज़ मुझे कहीं दूर से आती लगी. दिन का उजाला बढ़ रहा था और मेरा भविष्य अंधकार की गहरी खाई में डूबता जा रहा था. अगले दिन से दोस्तों और रिश्तेदारों का आना शुरू हो गया था. हर कोई अपने तरी़के से सांत्वना दे रहा था. धीरे-धीरे एक माह बीत गया. विमान का अब तक कुछ पता नहीं चला है. रोहित के लौट आने की आस आज भी मेरी सांसों में बसी हुई है. आज अपनी बालकनी में बैठी मैं अश्रुपूरित नेत्रों से बीते दिनों की स्मृतियों में खोई हुई हूं. कुछ दिन पहले तक मैं और रोहित इसी बालकनी में बैठकर शाम की चाय पीते थे. रोहित मुझसे ढेर सारी बातें करना चाहते और मैं अपनी शिकायतों के ताने-बाने में उलझी अक्सर ख़ामोशी अख़्तियार कर लेती थी. आज मैं रोहित से बात करना चाहती हूं, उन्हें बताना चाहती हूं कि मैं उन्हें बहुत प्यार करती हूं, लेकिन मेरी बात सुनने के लिए रोहित मेरे पास नहीं हैं. चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ है. व़क्त यह कैसा खेल खेल गया मेरे साथ. काश! मैं व़क्त रहते प्यार की अहमियत को समझ पाती. काश! मैं गु़ज़रे व़क्त को लौटा पाती.

       रेनू मंडल

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कहानी- एक नया अंत (Short Story- Ek Naya Ant)

ऐसा होता है न कि अगर किसी ने हमें जीवन में बहुत कष्ट पहुंचाया हो, तो मौक़ा मिलने पर हम भी दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं, जबकि होना तो यह चाहिए कि जिन कष्टों से हम गुज़र चुके हैं, वे दूसरों को न दें.

Kahani

अभी मैंने किचन में पैर रखा ही था कि डोरबेल बजी. मैं चौंकी, कमलाबाई तो आज छुट्टी पर है, नवीन को भी ऑफिस गए काफ़ी देर हो चुकी है, फिर सुबह-सुबह कौन होगा? दिल ही दिल में यह सब सोचते हुए दरवाज़ा खोला, तो संपदा थी, साथ में विजय भी था. विजय ने जल्दी से कहा, “मम्मी, मैं ऑफिस जा रहा हूं. शाम को संपदा को लेने आऊंगा, पापा से भी मिल लूंगा.” मैंने कहा, “ठीक है बेटा, डिनर यहीं करके जाना.” तो वह, “हां, ठीक है” कहता हुआ जल्दी से चला गया. उसके जाने के बाद संपदा और मैं ड्रॉइंगरूम में आए. संपदा काफ़ी कमज़ोर लग रही थी और काफ़ी दिनों बाद आई थी. मैंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तुम बैठो, मैं आती हूं. अच्छा ऐसा करो, तुम अंदर थोड़ा लेट जाओ, मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को लेकर आती हूं.”

“नहीं मम्मी, मैं नाश्ता कर चुकी हूं. बस, आप आ जाओ, मेरे साथ बैठकर बातें करो. खाना हम मिलकर बना लेंगे.” उसने कुछ उदासी से कहा.

“हां, मुझे पता है तुम्हारा नाश्ता, एक स्लाइस के साथ एक कप चाय पी ली होगी. कितनी बार कहा है इस हालत में अपने खाने-पीने का ख़ास ध्यान रखा करो. दूध पिया करो, फल खाओ, लेकिन आजकल की लड़कियों की समझ में हम पुराने लोगों की बातें आतीं ही नहीं. रुको, मैं कुछ लेकर आती हूं.”

मैं किचन में जाकर उसके लिए मिल्कशेक बनाने लगी, तो मुझे अपना वह समय याद आ गया, जब मैं संपदा जितनी थी और इसी तरह मैं भी जब मायके आती थी, तो मेरा दिल भी यही चाहता था कि मां मेरे पास ही बैठी रहे. मैं मिल्कशेक लेकर संपदा के पास आई. उसका मुरझाया चेहरा देखकर मैं चौंक गई, पूछा, “तबीयत तो ठीक है न?”

“मम्मी, क्या होना है तबीयत को, बिल्कुल ठीक है.” उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था, जो मुझे बुरी तरह चुभा.

“फिर ऐसी गुमसुम-सी क्यों हो?” मैंने कुरेदा, जो आमतौर पर मेरा स्वभाव नहीं था, लेकिन उसका चेहरा देखकर मैं ख़ुद को रोक नहीं पा रही थी, इसलिए  पूछ ही लिया.

“मम्मी, मैं परेशान हो गई हूं, एक तो मेरी तबीयत ख़राब है, मुझे समझ नहीं आता कि क्या करूं.”

मैंने उस पर चिंतित दृष्टि डालते हुए कहा, “तुम अपना ध्यान रखो, खाओ-पीओ, आराम का समय निश्‍चित करो, मैं तुम्हें कितने दिनों से समझा रही हूं.”

“मम्मी, यह बात नहीं है, मैं पहले इस बात पर हंसा करती थी कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है, लेकिन अब इसका मतलब मैं समझ गई हूं.”

“क्यों, ऐसा क्या हुआ?” मैंने हैरानी से पूछा.

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मेरी बेटी संपदा का विवाह सालभर पहले ही हुआ था. विजय हमें सभ्य और समझदार लगा था, उसके पिता भी अच्छे पद पर थे, उससे बड़ी दो विवाहित बहनें थीं. घर में आर्थिक स्थिति अच्छी थी और विजय की मां सुभद्रा देवी मुझे ठीक-ठाक ही लगी थीं. देखने में तो कुछ ऐसा नहीं था, फिर ऐसी क्या बात हुई, जो संपदा इतनी दुखी लग रही थी. “मम्मी, आपको बताया था न कि आजकल मुझसे सुबह उठा नहीं जाता, उल्टियों की वजह से बुरा हाल है, लेकिन मांजी को लगता है कि मैं एक्टिंग कर रही हूं और घर के कामों से जान छुड़ा रही हूं. वहां सबका मूड ख़राब हो जाता है. मम्मी, मुझसे सहन नहीं होता.” कहते-कहते संपदा रोने लगी, तो मेरा दिल जैसे मुट्ठी में आ गया. मैंने पूछा, “और विजय? वह तो तुम्हारा ध्यान रखता है न?”

“हां मम्मी, शुरू-शुरू में तो वह बहुत ख़ुश थे, लेकिन आजकल मांजी का ख़राब मूड देखकर कुछ बोलते ही नहीं. इस पर मेरा दिल और कुढ़ जाता है. मम्मी, एक लड़की के लिए उसकी ससुराल में उसका सबसे मज़बूत सहारा उसका पति ही होता है. अगर वह भी उसका साथ नहीं देगा, तो वह कहां जाएगी?”

“देखो बेटा, इन दिनों तबीयत ऐसे ही ऊपर-नीचे होती रहती है, लेकिन तुम हिम्मत रखो, अगर तुम भी अपनी बड़ी बहन सुखदा की तरह अकेली रहती, तो भी तुम्हें सब कुछ करना पड़ता.”

“तब घरवालों के रोज़ नए मूड तो नहीं देखने पड़ते, रवि जीजाजी ने ऐसी हालत में दीदी का कितना ध्यान रखा था.”

“बेटा, ये तो छोटी-छोटी समस्याएं हैं. समय के साथ ये ख़ुद ही हल हो जाएंगी. अब तुम टेंशन छोड़ो, सुखदा को भी फोन कर दो कि शाम को वह भी यहीं आ जाए. सब मिलकर खाना खाएंगे. बताओ क्या बनाऊं?”

“मम्मी, मेरा दिल कर रहा है आज पापा के लिए छोले बनाऊं. आपको याद है न, पापा को आपके हाथ से ज़्यादा मेरे हाथ के बने छोले अच्छे लगते हैं.” संपदा के हाथ में बहुत स्वाद है, यह मैं जानती हूं, इसलिए मुझे उसकी गर्वीली आवाज़ पर हंसी आ गई.

“मम्मी, आज कमलाबाई नहीं आई?”

“नहीं, उसकी बेटी बीमार है, कल आएगी.” संपदा मेरे पीछे-पीछे किचन में आ गई. “लाओ मम्मी, मिलकर काम निपटाते हैं.” मैंने कहा, “तुम यह सब छोड़ो, तुम जाकर मेरे रूम में टेबल पर देखो, नई पत्रिका आई है. उसमें मेरी वह कहानी छपी है, जो तुम्हें बहुत पसंद आई थी.” मैं उसे किचन से हटाना चाहती थी.

“अरे! सच मम्मी, वह तो बड़ी अच्छी कहानी थी, मैं अभी देखती हूं. वैसे भी मसालों की ख़ुशबू से मुझे अजीब-सी फीलिंग होती है. मम्मी, हमारे आने से आपका काम बढ़ जाता है न?” संपदा की आवाज़ में शर्मिंदगी-सी थी.

“यह काम बढ़ने से मुझे और तुम्हारे पापा को जो ख़ुशी होती है, उसका अंदाज़ा तुम लोग नहीं लगा सकतीं.”

“मम्मी, मुझ पर भी कोई कहानी लिखो न.”

“अच्छा ठीक है, लिखूंगी. अब तुम आराम करो, और हां, सुखदा को फोन कर लो.”

संपदा मेरे रूम की ओर बढ़ी, तो मैंने बिजली की तेज़ी से अपना काम शुरू कर दिया. हाथ अपना काम कर रहे थे और मन अपना. दो ही बेटियां हैं हमारी, यह तो ईश्‍वर की कृपा है, जो दोनों इसी शहर में हैं. दोनों आती-जाती रहती हैं. हम दोनों का काम ही कितना था. इसलिए समय मिलने के कारण मेरा लिखने का शौक़ भी ज़ोरों पर था. कई पत्रिकाओं में मेरी कहानियां छपती थीं,  जिसकी सबसे बड़ी प्रशंसक और आलोचक मेरी बेटियां ही थीं. नवीन तो शाम को ही आते थे. सच तो यह है कि मेरे इस शौक़ ने मेरे अकेलेपन को बड़ा सहारा दिया था, क्योंकि बेटियोंवाली मांओं को तो आदत होती है न कि हर समय घर में गपशप और रौनक़ का माहौल हो, इसलिए संपदा के विवाह के फ़ौरन बाद मैं बहुत घबराई, लेकिन फिर धीरे-धीरे ख़ुद को संभालकर अपने आप को व्यस्त कर ही लिया था.

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रात में मेरी बेटियां-दामाद इकट्ठा हुए, सुखदा के बेटे शौर्य ने ख़ूब रौनक़ लगा रखी थी. नवीन दोनों दामादों के साथ बातों में व्यस्त थे. हम तीनों बेडरूम में आ गए. शौर्य ने नवीन की गोद में डेरा जमा रखा था. सुखदा अपने पापा की तरह हर बात साफ़-साफ़ करती थी. अब तो वह और भी बोल्ड हो गई थी, लेकिन संपदा मेरी तरह बहुत ही सोच-समझकर बोलनेवाली थी. इस बात का ध्यान रखती थी कि सामनेवाले को कोई बात बुरी न लगे. अपनी परेशानी जल्दी शेयर नहीं करती थी, इसलिए मुझे उसकी चिंता रहती थी.

सुखदा ने संपदा से उसकी ससुराल के हाल पूछे, तो वह बताने लगी कि कैसे पिछली बार जब उसकी ननदें आईं, तो सुभद्रा देवी उसे खाने का लंबा-चौड़ा मेनू बताकर अपनी बेटियों के साथ शॉपिंग पर निकल गईं. विजय उसकी तबीयत देखकर कहता ही रह गया कि वह खाना बाहर से ले आएगा, लेकिन सुभद्रा देवी ने उसे बुरी तरह डांटा कि बेकार के नखरे उठाने की ज़रूरत नहीं है. मैं और सुखदा उसकी बात सुनकर दुखी होते रहे और साथ ही उसे समझाते भी रहे. डिनर हो ही चुका था, दोनों बेटियां चली गईं.

एक दिन हमने डिनर शुरू ही किया था कि विजय का फोन आया. संपदा की तबीयत ठीक नहीं है, उसे हॉस्पिटल ले जा रहे हैं. हम तुरंत वहां पहुंचे, संपदा के सास-ससुर भी वहीं थे. मैंने बेचैनी से पूछा, “क्या हुआ? अभी तो काफ़ी टाइम है डिलीवरी में.”

सुभद्रा देवी जैसे भरी बैठी थीं, “होना क्या है. आजकल की लड़कियां हैं ही नाज़ुक, ज़रा-सी गर्मी और ज़रा-सा काम सहन नहीं होता इनसे. हम लोग कितना काम करते थे, न ए.सी. था, न कूलर. इस पीढ़ी में तो जैसे जान ही नहीं है.”

मैंने नवीन का उड़ा हुआ चेहरा देखा, उनकी तो जैसे अपनी बेटियों में जान थी. सुखदा अक्सर कहती थी, कितने मजबूर होते हैं लड़कियों के माता-पिता भी. उनकी बेटी के बारे में ससुरालवाले न जाने क्या-क्या कह जाते हैं और वे पलटकर जवाब भी नहीं दे सकते.

इतने में संपदा की डॉक्टर बाहर आई, विजय से कहने लगी, “हालत देखी है आपने अपनी पत्नी की. इतना ब्लड प्रेशर, उसके खाने-पीने का बहुत ध्यान रखिएगा. अब उसे टोटल बेडरेस्ट की ज़रूरत है. शाम तक आप उसे घर ले जा सकते हैं.” सुभद्रा देवी से रहा नहीं गया, “लो, अब यह नया ड्रामा. एक तो डॉक्टरों ने इन लड़कियों का दिमाग़ ख़राब कर रखा है. बड़ी फीसें दो, लंबी-लंबी बातें सुनो. बस, नए ज़माने के नए-नए रंग.” अपनी मां की बातें सुनकर विजय शर्मिंदा-सा दिखा. मैंने दबी आवाज़ में कहा, “बहनजी, आप आज्ञा दें, तो मैं कुछ दिनों के लिए संपदा को अपने घर ले जाऊं?”

जैसे बिल्ली के भाग से छीका टूटा, फ़ौरन बोलीं, “हां, यह ठीक है. मां के घर जैसा आराम उसे कहां मिलेगा? कुछ ऊंच-नीच हो गई, तो सब कहेंगे, सास ने ध्यान नहीं रखा.”

“लेकिन मां, हम फुलटाइम मेड रख लेंगे, तो संपदा को आराम मिल जाएगा.” विजय ने कहा तो सुभद्रा देवी ने उसे घूरा.

हम संपदा को घर ले आए. मैं व्यस्त हो गई. विजय रोज़ शाम को चक्कर लगा लेता था. कभी-कभी सुभद्रा देवी भी आ जाती थीं. संपदा के चेहरे का पीलापन कुछ कम हो रहा था. अब वह आराम से थी. नवीन के तो जैसे पुराने दिन लौट आए थे. पिता-पुत्री ख़ूब बातें करते.

कठिन से कठिन समय में भी यह ख़ूबी होती है कि वह बीत ही जाता है और संपदा का कठिन समय भी बीत ही गया. आख़िर वह ख़ुशी का दिन आ ही गया, जब संपदा एक प्यारे से बेटे की मां बन गई. सारा परिवार ख़ुशी से खिला जा रहा था. सुभद्रा देवी का मूड भी अच्छा था. बेटे का नाम पार्थ रखा गया.

समय बीतता रहा, स्थितियां बहुत तेज़ी से बदल गई थीं. सुभद्रा देवी अपनी बीमारी के कारण घर के मामलों से दूर-सी हो गई थीं. मैंने कई बार संपदा में आनेवाले परिवर्तनों को नोट किया था. वह अब चुपचाप-सी रहने लगी थी. धीरे-धीरे वह सुभद्रा देवी की बहू बनती जा रही थी.

समय का पंछी अपनी गति से उड़ता जा रहा था. संपदा के सास-ससुर नहीं रहे थे. सुखदा-संपदा के बच्चे बड़े हो गए थे. नवीन रिटायर हो चुके थे. हम दोनों जीवन की सांध्य बेला अपनी बेटियों को फलते-फूलते देखकर संतोष से बिता रहे थे. शौर्य अपनी पत्नी के साथ अमेरिका में था. पार्थ अपनी पत्नी मानसी के साथ संपदा और विजय के साथ रहता था. संपदा कुकिंग में और माहिर हो गई थी. अब तो वह बड़े से बड़े शेफ को मात देती थी. घर में किसी न किसी बहाने पार्टी करती ही रहती थी. हम दोनों को भी आकर ज़बरदस्ती ले जाती थी.

एक दिन संपदा सुबह-सुबह आई, मैंने पूछा, “मानसी कैसी है?”

“अरे मम्मी, क्या हुआ है उसकी तबीयत को? वह तो नॉर्मल है. बस, कुछ लड़कियों की आदत होती है, हर बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताने की.” संपदा का स्वर ही नहीं, ढंग भी बदला हुआ था.

“लेकिन संपदा, यह बीमारी तो नहीं है. हर लड़की इन दिनों शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों का सामना करती है. इसलिए पहली बार मां बननेवाली लड़की अक्सर घबरा जाती है. तुम उसका ख़्याल रखा करो.” मैंने उसे समझाया.

यह भी पढ़ेशरीर ही नहीं, मन की सफ़ाई भी ज़रूरी है (Create In Me A Clean Heart)

“मैं क्या ध्यान रखूं, वह है न उसका ध्यान रखनेवाला मुफ़्त का ग़ुलाम पार्थ. आज सुबह मानसी नाश्ते के लिए नहीं उठी, तो मैंने पार्थ से पूछा तो बोला कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है. कमज़ोरी के कारण उठा नहीं जा रहा है. मम्मी, मेरा मूड इतना ख़राब हुआ क्या बताऊं. वह पार्थ को बेवकूफ़ बना सकती है, मुझे नहीं. उसके रोज़-रोज़ के नाटक मैं ख़ूब समझती हूं. आज पूरा दिन लंच और डिनर बनाएगी, तो दिमाग़ ठीक हो जाएगा. इसलिए मैं तो सुबह-सुबह ही यहां आ गई.” ग़ुस्से में तेज़-तेज़ बोलती संपदा मुझे कठोर-सी लगी.

ऐसा होता है न कि अगर किसी ने हमें जीवन में बहुत कष्ट पहुंचाया हो, तो मौक़ा मिलने पर हम भी दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं, जबकि होना तो यह चाहिए कि जिन कष्टों से हम गुज़र चुके हैं, वे दूसरों को न दें. मैं सोचती रही और संपदा उठकर सुखदा को फोन करने लगी. थोड़ी देर में सुखदा आ गई. सुखदा तो अकेली रहती थी. उसे आना अच्छा ही लगा, शाम होते-होते दोनों चली गईं. मैं मन ही मन अपनी बेटी के कठोर होते हृदय पर दुखी होती रही. नवीन सब ठीक हो जाएगा, कहकर मुझे तसल्ली देते रहते. मैं जानती थी कि मन ही मन अपनी बेटी की बदलती सोच पर वे भी दुखी थे. फिर एक दिन संपदा अचानक आई. कहने लगी, “मम्मी, संडे को एक पार्टी रख रही हूं. आप और पापा डिनर वहीं करना, मैं पार्थ को आप दोनों को लेने भेज दूंगी.”

“मगर बेटा, किस ख़ुशी में?” मैंने हैरानी से पूछा.

“बहुत दिन हो गए, सब मिलकर बैठे नहीं, सुखदा और रवि जीजाजी भी आ जाएंगे. विजय के कुछ दोस्त भी होंगे.”

मैंने पूछा,“खाना बाहर से आएगा?”

“बाहर से क्यों? हर चीज़ घर पर बनेगी.”

“लेकिन मानसी की तबीयत कितनी ख़राब चल रही है. तुम कुछ महीनों के लिए ये पार्टियां छोड़ दो तो अच्छा ही होगा. घर पर पार्टी हो, तो काम पर काम निकलता ही रहता है. मानसी का ध्यान रखो, उसे आराम करने दो.” मैंने कहा तो वह कुछ बुरा मान गई. बोली, “आपको उसकी बड़ी चिंता रहती है. मैं भी तो इस हालत में कितना काम करती थी. याद है न आपको और यहां तो खाना मैं ख़ुद ही बना रही हूं. उसे कहां आता है इतना कुछ बनाना.” उसके स्वर में मज़ाक था. मुझे अच्छा नहीं लगा. मैंने चुपचाप उसकी तरफ़ देखा, उस समय वह मेरी बेटी नहीं, बल्कि स़िर्फ सुभद्रा देवी की बहू लग रही थी. बिल्कुल उन्हीं की जैसी, बस अपनी परवाह करनेवाली, अपने लिए सोचनेवाली.

मेरे जीवन में तो सास-बहू के रिश्ते की कटुता कहीं थी ही नहीं. नवीन के माता-पिता जब तक रहे, मैंने हमेशा उन्हें आदर दिया था और बदले में मुझे पुरस्कार के रूप में मिलता रहा उनका ढेर सारा स्नेह और आशीर्वाद.

“अच्छा मम्मी, मैं जा रही हूं. आप दोनों आ जाना.” संपदा ने कहा तो मैंने एकदम एक निर्णय ले लिया. मैंने दृढ़ स्वर में कहा, “रुको बेटा, तुम हमेशा से कहती थी न कि मेरे ऊपर कहानी लिखो मम्मी.”

“हां मम्मी, मगर वह तो बहुत पुरानी बात हो गई.”

“तुम्हारी कहानी मैंने लिखी तो थी, उस कहानी में तो मेरे अनुभवों, स्नेह और आंसुओं का रंग भी शामिल हो गया था, लेकिन मैंने उसका अंत नहीं किया था. कई दिन यही सोचने में बीत गए हैं कि कहानी का अंत कैसे करूं कि यह ख़ूबसूरत भी हो जाए और पूरी भी.” मैं संपदा का हाथ पकड़ककर उसे अपने कमरे में ले गई और अपनी फाइल निकालकर उसे दे दी. लो, इसे पढ़ो और बताओ कि मैं इस कहानी का अंत कैसे करूं.” मैं फाइल उसे देकर कमरे से बाहर आ गई. बहुत देर बाद जब रोई-रोई आंखोंवाली संपदा आकर मुझसे लिपटी, तो मुझे विश्‍वास हो गया कि इस कहानी को एक नया अंत मिल गया है और मानसी संपदा जैसा जीवन बिताकर एक और संपदा नहीं बनेगी, जो सुभद्रा देवी जैसी है. क्योंकि स्त्री हमेशा ही स्त्री की दुश्मन नहीं होती, बल्कि उसकी हमदर्द और दोस्त भी हो सकती है. मैंने भावुक होकर अपनी बेटी को गले से लगा लिया. बहुत दिनों बाद ऐसा लगा, जैसे मेरे सामने सुभद्रा देवी की बहू नहीं, मेरी बेटी है.

Poonam Ahmed

     पूनम अहमद

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कहानी- बावरे मन के सपने… (Short Story- Baware Mann Ke Sapne…)

पहले उसकी पढ़ाई की लगन ने मुझे उसकी ओर खींचा और फिर शायद एक इंफैच्युएशन-सा हो गया. वह उम्र ही ऐसी होती है. मुझे सजना-संवरना अच्छा लगने लगा. घंटों खिड़की के आगे खड़ी चुपचाप उसे निहारती रहती. धीरे-धीरे उसकी भी नज़रें मुझे छूने लगीं. मैं भी देर रात तक पढ़ने लगी. मैं ऐसी जगह बैठती, जहां से वह मुझे नज़र आता रहता.

Hindi Kahaniya

ठंडे मौसम में बॉनफायर के आगे बैठना किसे सम्मोहित नहीं करेगा…हाथों को उसकी आग में तापते और मोबाइल पर चल रहे ‘बावरा मन देखने चला एक सपना’ गाना सुनते-सुनते सचमुच उस समय मन बावरा हो गया था. बावरी-सी सांसें और धड़कनें, सब आंदोलित होने लगी थीं. किसी का साथ पाने के लिए… किसी के हाथों में हाथ डाल, उस तपिश को महसूस करने के लिए अंगड़ाइयां उफान पर आ गई थीं. गोल दायरे में लकड़ियां लगी थीं. बूंद-बूंद गिरती चिंगारियां… मानो कोई तारा टूट-टूटकर गिर रहा हो. सुर्ख लाल और पीला तारा, चमकदार-चटकीला तारा, लकड़ियों की दरारों से टूट-टूटकर गिरता तारा- पता नहीं कितने असंख्य तारे उस पल मन में फूट गए थे. चारों तरफ़ फैली ख़ामोशी और गिरती ओस की बूंदें… धीमी- गुनगुनाती हवा… एक सन्नाटा जो भीतर था, एक सन्नाटा, जो बाहर था… दोनों ही बहुत अच्छे लग रहे थे. एक सुकून भरी तृप्ति मन और पोर-पोर में भर गई थी.                                                                    ख़ामोशी भी गुनगुना सकती है, यह एहसास उस पल हुआ… जब चारों ओर अंधेरा छाया था, जब कोहरे ने पहाड़ों की हर परत को ढंका हुआ था, जब उसकी हरियाली केवल आभास लग रही थी.

“तेरा चेहरा देखकर लग रहा है कि तू रोमांटिक हो रही है.” भारती ने उसे छेड़ा.  “लगता है माउंट आबू तुझे रास आ गया है. वैसे इस रिसॉर्ट का भी जवाब नहीं है.”

“अब तू ऐसे गाने सुनाएगी, तो किस का मन उड़ान नहीं भरने लगेगा. अब यहां तो कोई है नहीं रोमांस करने के लिए. तेरे साथ ही क्यों न कर लिया जाए.” रिया ने अपनी सहेली के साथ ठिठोली की.

भारती और रिया दोनों बेस्ट फ्रेंड तो थीं ही, साथ ही दोनों एक-दूसरे की हमराज़ भी थीं. कहीं जाना हो, तो दोनों साथ ही जातीं. बस, जब भी दो-चार छुट्टियां आ जातीं, दोनों कहीं घूमने निकल पड़तीं. दरअसल, दोनों को ही फोटोग्राफी का शौक़ था और दोनों बेहतरीन आर्टिस्ट भी थीं. रिया ने तो आईएएस अफ़सर बनने के बाद भी अपने इस शौक़ को नहीं छोड़ा था. ज़िंदगी का हर तार वे मिलकर छेड़तीं और मस्त रहतीं, अपने-अपने शिकवे और शिकायतों के साथ. ज़िंदगी है, तो परेशानियां भी होंगी और दुविधा भी, लेकिन वे बहुत आसानी से अपनी उलझनों को मुंह चिढ़ा निकल पड़तीं, किसी ट्रेकिंग पर या किसी मनोरम स्थल पर.

27-28 की उम्र में ही उन्होंने न जाने कितनी जगहें एक्सप्लोर कर डाली थीं. अलमस्त, बेफ़िक्र ज़िंदगी जीनेवाली दोनों सहेलियां अपने-अपने जीवन में बहुत ख़ुश थीं.

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सुबह जब दोनों सैर पर निकलीं, तो गाइड ने उन्हें बताया कि ‘डेज़र्ट-स्टेट’ कहे जानेवाले राजस्थान का माउंट आबू इकलौता हिल स्टेशन तो है ही, साथ ही गुजरात के लिए भी हिल स्टेशन की कमी को पूरा करनेवाला सांझा पर्वतीय स्थल है. अरावली पर्वत शृंखलाओं के दक्षिणी किनारे पर पसरा यह हिल स्टेशन अपने ठंडे मौसम और वानस्पतिक समृद्धि की वजह से देशभर के पर्यटकों का पसंदीदा सैरगाह बन गया है. यह नक्की झील है. मान्यता है कि इस झील को देवताओं ने अपने नाख़ूनों से खोदा था.

गाइड बताता जा रहा था, पर वे दोनों तो वहां का नज़ारा देख ही मंत्रमुग्ध हो गई थीं. “चल बोटिंग करते हैं. हरी-भरी वादियां, खजूर के वृक्षों की कतारें, पहाड़ियों से घिरी झील और झील के बीच आईलैंड. बड़ा मज़ा आएगा बोटिंग करने का.” भारती चहकी.

“चल न, पहले थोड़ी देर यहीं किनारे पर बैठते हैं. पानी कितना साफ़ और ठंडा है.” रिया बोली.

“काश यार! कोई मिल जाए यहां.” भारती फिर बोली. उसकी चंचलता को परे धकेलते हुए रिया गंभीर स्वर में बोली, “हां यार, जब भी कहीं जाती हूं, तो नज़रें उसी चेहरे को ढूंढ़ने लगती हैं. बस, एक बार सामने आ जाता.”

“पहचान लेगी क्या तू उसे? कितने बरस हो गए उसे देखे हुए?”

“पता नहीं. लेकिन एक बार चाहती हूं कि उससे मिलूं और बताऊं कि देखो तुम्हारी वजह से आज मैं किस मुक़ाम पर पहुंच गई हूं. फेसबुक पर उसे कितना तलाशा, पर नहीं मिला. कई बार अनजाने चेहरों में मैं उसे तलाशने लगती हूं. पता नहीं उसे पहचान भी पाऊंगी कि नहीं. धुंधली नहीं हुई है उसकी छवि, पर अब तो वह भी बदल गया होगा. 11-12 साल का अंतराल कोई कम नहीं होता है.”

“तू भी तो यार, उस चेहरे को तलाश रही है, जिससे कभी बात तक नहीं की, जिसे कभी पास से देखा तक नहीं था.”

“पर भारती, उसी की प्रेरणा मेरे लिए एक जुनून बन गई और मुझमें भी एक धुन समा गई थी कि मुझे भी कुछ बनना है. तुझे तो पता ही है कि हम दोनों एक ही सरकारी कॉलोनी में रहते थे. मेरे घर के पीछेवाला मकान उसका था. उसके घर की खिड़की जो हमारे घर से साफ़ दिखती थी, वहीं उसकी स्टडी टेबल थी, जहां बैठा वह पढ़ता रहता था. स्कूल से आने के बाद देर रात तक वह वहीं बैठा पढ़ता रहता. तब मैं और वह दोनों ही 11वीं में थे. अक्सर उस पर नज़र चली जाती. देखकर हैरानी होती कि आख़िर कोई इतना पढ़ाकू कैसे हो सकता है. पहले उसकी पढ़ाई की लगन ने मुझे उसकी ओर खींचा और फिर शायद एक इंफैच्युएशन-सा हो गया. वह उम्र ही ऐसी होती है. मुझे सजना-संवरना अच्छा लगने लगा. घंटों खिड़की के आगे खड़ी चुपचाप उसे निहारती रहती. धीरे-धीरे उसकी भी नज़रें मुझे छूने लगीं. मैं भी देर रात तक पढ़ने लगी. मैं ऐसी जगह बैठती, जहां से वह मुझे नज़र आता रहता.

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11वीं में मेरे अच्छे नंबर आए, तो 12वीं में मैं जी जान से पढ़ाई में जुट गई. वह जाने-अनजाने मेरी प्रेरणा बन गया. हम न कभी मिले, न बात हुई, पर नज़रों का यदा-कदा होनेवाला आदान-प्रदान ही मेरे लिए काफ़ी था. 12वीं में उसने टॉप किया और मैं भी फर्स्ट आई. फिर उसकी छोटी बहन से पता चला, जो कभी-कभी खेलने हमारे ब्लॉक में चली आती थी कि वह तो एनडीए ज्वॉइन कर रहा था. शायद खड़गवासला में. उसी साल पापा रिटायर हो गए और हमें वह मकान छोड़ना पड़ा. बस, सब वहीं रह गया, पर उसकी छवि और यादें मन में आज तक बसी हैं.

“लेकिन यार, जब तेरी प्रेरणा वहीं छूट गई थी, फिर बाद में तूने अपने उस जुनून को कैसे कायम रखा?”

“वहां से चले आने के बाद उसकी बहुत याद आती थी. पर सोचती कि अगर कभी जीवन में वह दुबारा मुझे कहीं मिल गया, तो उसकी क़ाबिलीयत के सामने मुझे बौना नहीं लगना चाहिए. बस, एक धुन मुझमें समा गई कि मुझे भी उसके जैसा क़ाबिल बनना है. जब वह इतनी मेहनत कर सकता है, तो मैं क्यों नहीं… कभी अगर मुलाक़ात हो जाए, तो मैं गर्व से कह सकूं कि देखो, मैंने भी तुम्हारी राह पर चलकर एक मुक़ाम हासिल कर लिया है. वह जो सामने नहीं था, वह जिसके नाम के सिवाय मैं कुछ नहीं जानती थी, वह मेरी ज़िंदगी का अनजाने में ही मार्गदर्शक बन गया था. और फिर मैं बन गई आईएएस ऑफिसर, पर उससे एक बार मिलने की चाह मन से कभी नहीं गई.” रिया भावुक हो गई थी.

“चल यार, सेंटी मत हो. बोटिंग करने चलते हैं.” भारती ने अपनी सहेली के दर्द को कम करने के ख़्याल से कहा.

“साहब, इन मैडम ने पहले बोट बुक कराई थी, दूसरी बोट के वापस आते ही आप उसमें चले जाना.” टिकट काउंटर पर बैठा आदमी जिससे बोल रहा था, उसने पायलट की यूनिफॉर्म पहनी हुई थी.

“ओह! थोड़ी ही देर में मेरी फ्लाइट है. चलो कोई बात नहीं, फिर कभी सही.” कहते हुए वह जैसे ही मुड़ा, रिया की नज़र उस पर गई. एक लंबा, साधारण-सा लुकवाला, लेकिन स्मार्ट आदमी सामने खड़ा था. गोल चेहरा, वही आंखें और उनमें से झलकती मासूमियत. रिया के अंदर कुछ हरकत हुई, कोई छवि लहराई… यह वही तो नहीं.

“अब चल भी, क्या सोच रही है?” भारती ने उसका हाथ खींचा.

वह हाथ छुड़ा न जाने किस आकर्षण से खिंची उस आदमी की ओर बढ़ गई. उसके शरीर में कंपन हो रही थी. होंठ सूखते से लग रहे थे, पर फिर भी हिम्मत बटोरकर उसने पूछा, “एक्सक्यूज़ मी, आर यू अश्‍विनी गुप्ता, जो दिल्ली में पंडारा रोड पर रहते थे?”

“पागल हो गई है क्या, हर किसी से यह पूछ बैठती है. किसी दिन मुसीबत में फंस जाएगी.” भारती ने उसे टोका.

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“हां, मेरा नाम अश्‍विनी गुप्ता ही है और मैं पंडारा रोड में ही रहता था, पर वह तो बरसों पुरानी बात है. डैडी की रिटायरमेंट के बाद तो हम अपने घर में शिफ्ट हो गए थे, पर आप कौन हैं और मुझे कैसे जानती हैं?”

“मैं रिया जैन. आप बी-8 में रहते थे और मैं बी-16 में. बिलकुल आपके घर के पीछेवाला फ्लैट.” रिया जैसे उसे छोटी से छोटी हर बात बताने को आतुर थी.

“ओह! याद आया, पर आप तो काफ़ी बदल गई हैं. अब तो स्लिम-ट्रिम हो गई हैं. मैं पहचान ही नहीं पाया. वैसे भी हमारी पहचान तो खिड़की तक ही सीमित थी.” वह मुस्कुराया. वही, पहले जैसी शर्मिली मुस्कान.

उसके बाद तो जैसे बातों का सिलसिला रुका ही नहीं. मानो, दोनों के पास ही अनवरत बातें थीं, पर रिया ख़ुश थी कि आज वह अपने दिल का हाल खोलकर उसके सामने रख पाई है.

“बहुत ख़ुशी हुई तुमसे मिलकर और यह जानकर कि मैं किसी की प्रेरणा बन पाया. मेरी फ्लाइट का व़क्त हो गया है, चलता हूं. फिर मिलेंगे और हां, इस बार मैं तुम्हें फेसबुक पर ढूंढ़कर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजूंगा.” उसने विदा लेते हुए कहा.

रिया का मन उस समय सचमुच बावरा हो गया था और सपने देखने लगा था.

Suman Bajapaye

सुमन बाजपेयी

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कहानी- टाइम पास (Short Story- Time Pass)

मुझे पता है तुम किसी अपने को तलाशती रहती हो, जो तुमको समझ सके, तुमको चाहे, सराहे और तुम भी उसको चाहो, पर यह मत भूलो कि भावनाओं की चंचल सरिता में बहते हुए इमोशनल फूल बन जाना समझदारी नहीं होती. और प्रेम? प्रेम के बारे में तुम क्या जानती हो? तुम्हारे जैसे लोग जिसे लव कहते या समझते हैं, वो दरअसल टाइम पास से अधिक कुछ भी नहीं होता. यह क्रश या इन्फैचुएशन भी नहीं होता. यह बात वो रियलाइज़ तो करते हैं, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

Kahaniya

सुबह के दस बज रहे थे और मैं रोज़ की तरह अपने कार्यालय पहुंच चुका था. अर्दली मेज़ पर डाक रख गया था, जिसमें अधिकतर खाकी रंग के सरकारी लिफ़ा़फे या आम आदमी के कुछ प्रार्थनापत्र होते, जिन्हें वो लोग जाने कितनी आशाओं से लिखते होंगे कि कलेक्टर साहब के पास चिट्ठी पहुंच गई, तो काम हो जाएगा. बेचारे! अगर सिस्टम को समझते, तो इतनी आशाएं न करते.

मैंने अनमने ढंग से लिफ़ाफ़ों के ढेर को देखा कि एक रंगीन लिफ़ा़फे ने मेरा ध्यान बरबस ही आकृष्ट कर लिया. बिल्कुल ऐसा लग रहा था, जैसे शहर से किसी पहाड़ी गांव जानेवाली सामान्य स्थानीय लोगों से भरी बस की खिड़की से कोई विदेशी टूरिस्ट कौतूहल भरी निगाहों से बाहर झांक रहा हो. वो सरकारी या आम आदमी की चिट्ठी नहीं, बल्कि हैंडमेड पेपर का सुर्ख़ प्याज़ी रंग का कलात्मक लिफ़ाफ़ा था, जिसे मैंने लपककर उठाया और अधीरता से प्रेषक का नाम ढूंढ़ा, मगर मायूसी ही हाथ लगी. बस, मार्कर पेन से कलात्मक हस्तलिपि में ‘श्री देवेशचन्द्र, अपर ज़िलाधिकारी, फैज़ाबाद’ ही लिखा था. तुरंत लिफ़ाफ़ा खोलने हेतु अधीर होते अपने मन को किसी प्रकार मैंने नियंत्रित कर उस उत्सुकता बढ़ाते लिफ़ा़फे को रख लिया कि घर पर ही इत्मीनान से देखूंगा.

घर पहुंचते ही पेपर कटर से बहुत सावधानी और प्यार से लिफ़ाफ़ा ऐसे खोला कि ज़रा-सा ग़लत कट कहीं प्रेषक की भावनाओं को आहत न कर दे. नाम ढूंढ़ने को आतुर निगाहें सबसे पहले पत्र के अंत में पहुंच गईं, ‘आपकी डॉली’ पढ़ते ही मुझे किन भावनाओं के ज्वार ने घेर लिया, कह नहीं सकता. डॉली का पत्र, वो भी इतने अंतराल के बाद? मेरा पता उसे कैसे मिला, उसके क्या हाल हैं, आजकल क्या कर रही है? इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए उत्सुकतावश मैं पत्र पढ़ने लगा.

‘आदरणीय सर! सर, यह आदरणीय न तो शब्द मात्र है और न ही कोई औपचारिक संबोधन. आज मैं यह फील कर पा रही हूं कि आपके प्रति मेरे मन में कितना आदर है. सर, आपके आशीर्वाद, प्रयास और गाइडेंस का ही परिणाम है कि मैं एमबीबीएस हो गई हूं और इसका पूरा क्रेडिट आपको ही जाता है. अगर आप मेरे जीवन में न आए होते, तो मैं आंधी में सूखे पत्ते-सी जाने कहां खो गई होती. सर, यह सफलता तो कुछ भी नहीं है. आपने जिस तरह मुझे और मेरे जीवन को बदल दिया है, उसके लिए मैं हमेशा आपकी एहसानमंद रहूंगी. सर, आप ही मेरे फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड हैं.’

मुझे लगा मैं आगे कुछ न पढ़ सकूंगा. पता नहीं, डॉली की सफलता की ख़ुशी थी या उसकी भावनाएं, मुझे दिया जा रहा श्रेय था या पुरानी स्मृतियों का झंझावात, लेकिन मेरी मनोदशा जाने कैसी हो गई थी. बाहर आकाश में काले बादल घिर रहे थे और बिजली चमक रही थी, पर उससे कहीं अधिक तेज़ी से मेरे मन का मौसम बदल रहा था. एकाएक खिड़की से आती तेज़ हवाओं से मेरे हाथ में पत्र प्रकंपित होने लगा, पर उससे कहीं अधिक वेग से प्रकंपित होता मेरा मन कहां-कहां भटकते हुए मेरे उस अतीत में पहुंच गया, जो अवचेतन में आज भी चैतन्य था.

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मैंने अपने गांव में रहकर इंटरमीडिएट परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के साथ मेरिट में भी स्थान पाया था. यह सोचकर कि कहीं प्रतिभाशाली भांजा साधनों के अभाव में अपनी मंज़िल तक पहुंचने से वंचित न रह जाए, इसलिए मेरे एडवोकेट मामा आगे की पढ़ाई के लिए मुझे अपने साथ इलाहाबाद ले गए. हालांकि मुझसे बहुत स्नेह करनेवाले मेरे मामा-मामी ने मुझे अपने बेटे की ही तरह रखा था, परंतु उस उम्र में भी आत्मसम्मान को समझनेवाले मेरे मन में आत्मनिर्भर होने की गहरी आकांक्षा थी, इसलिए मैंने अपनी ज़िद से पढ़ाई के साथ-साथ ट्यूशन पढ़ाने के लिए मामा को राज़ी कर लिया था.

मामा-मामी चकित थे कि उनका इंटरमीडिएट पास भांजा नाइन्थ तक के बच्चों को किस कुशलता से ट्यूशन पढ़ाता था. कुछ समय बाद इनमें डॉक्टर माता-पिता की इकलौती बेटी डॉली भी शामिल हो गई थी, जो हर तरह से मेरे विपरीत थी. जहां मैं साधारण कपड़े पहननेवाला, गंभीर, सीधा-सादा व पढ़ाकू क़िस्म का था, वहीं डॉली एकदम बिंदास, फैशनेबल, चुलबुली, ख़ूबसूरत व मस्तमौला थी. डॉली की चंचल आंखों में मॉडल बनने का ख़्वाब बसा था. 11वीं कक्षा में औसत से भी कम मार्क्स आने पर उसके पिता ने अपने मित्र यानी मेरे मामा से चर्चा की, तो मामाजी ने ट्यूशन के लिए मेरा नाम सुझाया, तो मैं उसका ट्यूटर बन गया. उस समय मैं बीएससी अंतिम वर्ष में था.

इसके बाद ही वो समय आने लगा, जिसने मुझे धर्मसंकट में डाल दिया. ज़ाहिर-सी बात थी कि फिल्में देखने, चैटिंग-शॉपिंग करने, बॉलीवुड के अफेयर्स व अफ़वाहों में रुचि लेनेवाली डॉली का मन पढ़ाई में कम लगता था. शायद उसके पैरेंट्स को उसके स्वभाव का अंदाज़ा हो गया था.

माता-पिता दोनों ही नर्सिंग-होम में आवश्यकता से अधिक व्यस्त रहते थे, इसलिए स्कूल के अलावा घर से बाहर जाने पर पाबंदी थी. यही सब कारण रहे होंगे कि उसने मुझसे ऐसा व्यवहार शुरू किया. कभी मासूम बनकर डॉली ऐसे प्रश्‍न करती कि मैं पसीने-पसीने हो जाता, तो कभी हॉट-पैंट, मिनी स्कर्ट जैसी ड्रेसेज़ पहन आती. कभी मोबाइल में फ्रेंड्स के नॉटी मैसेजेस दिखाती, तो कभी मेरी गर्लफ्रेंड या डेटिंग के बारे में पूछती. सच कहूं, तो उसके व्यवहार से मैं पसोपेश में पड़ जाता कि कल से पढ़ाने आऊं या न आऊं, पर मेरा मन इस परिस्थिति को एक चैलेंज की तरह लेने को कहता.

मैं डॉली के व्यवहार का कारण खोजने का प्रयास करता और उसके पैरेंट्स को ही उत्तरदायी पाकर मुझे डॉली से सहानुभूति ही हो आती. मैं समझ सकता था कि टीनएजर्स तभी भटकते हैं, जब उनको समझाने, स्नेहपूर्ण व्यवहार करने या समय तक देनेवाला घर में अपना कोई न हो. हार्मोंस की क्रियाशीलता, यौवनारंभ के समय होनेवाले दैहिक परिवर्तन, सामाजिक मर्यादाओं की सीमारेखा लांघने के रोमांच, अनजाने आकर्षण की भूल-भुलैया आदि के ऐसे प्रभाव होते हैं, जिन्हें न तो कहा जा सकता है, न ही सहा जा सकता है.

मादक वसंत ॠतु की गुदगुदाती बयार, फागुन के रंगों की बौछार, सावन की पहली फुहार सब तो उस अनुभूति के सामने फीके-से लगते हैं. कभी बिना बात ही मन ऐसा प्रफुल्लित हो जाए कि गुनगुनाने की इच्छा हो, तो कभी अंधेरे कमरे में चुपचाप यूं ही आंसू बहाने का सबब भी समझ न आए. हां, यह चाहत ज़रूर होती है कि कोई तो केयर करनेवाला ऐसा अपना हो, जिससे सब शेयर किया जा सके. परिवार में ही ऐसा अपना होना, जो विश्‍वसनीय हो, अनुभवी हो, अंतरंग हो, तो कितना सहज हो जाता है, लेकिन केयर-शेयर करनेवाला बाहरी होने पर बहुत संवेदनशील स्थितियां होती हैं. भावुक टीनएजर को सरलता से प्रभावित कर अपनापन जताकर प्राय: ग़लत लोग कुत्सित इरादों में सफल हो जाते हैं.

यह तो नहीं कहूंगा कि मैं यौवनावस्था के उद्वेगों से अछूता था, बल्कि सच कहूं, तो कभी-कभी मैं भी सम्मोहित-सा हो जाता था. देह से आती विदेशी परफ्यूम की ख़ुशबू, एकांत में कानों में गूंजते डॉली के रूमानी शब्द, उसकी छेड़खानियां. मुझे लगता, कहीं मैं बहक न जाऊं, परंतु उसी समय मेरे माता-पिता का चेहरा मेरे सामने घूमने लगता. अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर किन अपेक्षाओं से उन्होंने मुझे भेजा था. मैं भटक गया, तो मेरे सिविल सर्विसेज़ के सपनों और उन अपेक्षाओं का क्या होगा? क्या मैं मामा-मामी या डॉली के पैरेंट्स का भरोसा तोड़ सकूंगा? डॉली तो नादान है, पर क्या मैं विश्‍वासघात के आरोपों और अपने टूटे सपनों के साथ जी सकूंगा? बस, मेरे मन में उपजते ऐसे ही प्रश्‍न भटकने से रोक लेते. सच तो यह भी है कि मुझे विश्‍वामित्र व मेनका का प्रसंग जीवंत होता-सा लगता.

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उस दिन तेज़ बारिश में छतरी के बावजूद मैं भीग गया था. मुझे भीगा देखकर डॉली ने छत पर म्यूज़िक लगाकर रेन डांस का प्रस्ताव रखा. मेरे इंकार करने पर भी वो मेरा हाथ खींचते हुए ऊपर ले गई और बेसाख़्ता बोल गई, ‘आई लव यू’, तो मैं नाराज़ होकर उसके घर से वापस आ गया.

उस दिन मेरी उलझन चरम पर थी. मेरे मन ने कहा कल से बिना कुछ कहे डॉली की ट्यूशन बंद, लेकिन मेरी दीवार पर लिखी सूक्तियों में से, वो सूक्ति जैसे चमक उठी कि अंधकार को धिक्कारने से बेहतर होता है कि दीप प्रज्ज्वलित किया जाए. तब मेरे पास मोबाइल फोन भी न था. मैंने तुरंत काग़ज़-पेन उठाकर पत्र लिखना आरंभ किया.

‘प्रिय डॉली! यह प्रिय न तो शब्द मात्र है और न ही कोई औपचारिक संबोधन. मुझे पता है, तुम्हारे मन में कहीं न कहीं मेरे प्रति कोई आकर्षण है. तुम भी मुझे प्रिय हो, परंतु उस रूप में नहीं, जैसा तुम समझ रही हो. जैसे किसी परिवार के सदस्य एक-दूसरे को प्रिय होते हैं, वैसे ही मैं तुमको भी अपना समझता हूं बस. तुमको यह पता होगा कि तुम्हारे पैरेंट्स मुझे न केवल अपने परिवार का ही एक सदस्य मानते हैं, बल्कि मुझ पर कितना विश्‍वास भी करते हैं. उनको तुमसे भी कितनी अपेक्षाएं हैं. वे तो बस यही समझते हैं कि तुममें बचपना बहुत है. तुम चंचल, स्पष्टवादी व बहिर्मुखी हो, पर उनको तुम पर बहुत विश्‍वास है. मुझे पता है, ऐसे नेचर के बावजूद तुम भीतर से कितनी अकेली हो, कितना इनसिक्योर फील करती हो, क्योंकि सोशल गैदरिंग एंजॉय करने और पार्टियों में चहकनेवाले प्राय: अंदर से तन्हा होते हैं. मुझे पता है तुम किसी अपने को तलाशती रहती हो, जो तुमको समझ सके, तुमको चाहे, सराहे और तुम भी उसको चाहो, पर यह मत भूलो कि भावनाओं की चंचल सरिता में बहते हुए इमोशनल फूल बन जाना समझदारी नहीं होती. और प्रेम? प्रेम के बारे में तुम क्या जानती हो? तुम्हारे जैसे लोग जिसे लव कहते या समझते हैं, वो दरअसल टाइम पास से अधिक कुछ भी नहीं होता. यह क्रश या इन्फैचुएशन भी नहीं होता. यह बात वो रियलाइज़ तो करते हैं, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

डॉली, क्या तुम्हारा कोई लॉन्ग टर्म ऑब्जेक्टिव नहीं है? बस, वर्तमान को एंजॉय करते हुए बर्बाद कर देना ही ज़िंदगी होती है? साधनों के अभाव में मेरे स्ट्रगल की तुम कल्पना भी नहीं कर सकती. तुमको इतने सक्षम व समर्थ पैरेंट्स मिले हैं. माना वे तुमको समय नहीं दे पाते हैं, तो क्या तुम उनको इतनी बड़ी सज़ा दोगी? तुम क्या समझती हो वे तुम्हारी इन हरक़तों को बचपना समझकर भूल पाएंगे? नहीं डॉली, वे टूट जाएंगे. उनको आशा है कि उनकी बेटी भले ही चंचल हो, लेकिन अंतत: वो अपनी मंज़िल पा लेगी. तुम्हारी ऐसी भूल को वो अल्हड़ता कहकर माफ़ नहीं कर पाएंगे. कम से कम मैं तो विश्‍वासघात नहीं कर पाऊंगा. मैं बहुत साधारण परिवार का हूं, जिसका सपना सिविल सर्विसेज़ है. मेरे पूरे परिवार को मुझसे बहुत आशाएं हैं और मैं चाहकर भी भटक नहीं सकता.

तुम भी डॉक्टर बनना चाहती थी और वो तुम्हारे पैरेंट्स की इच्छा नहीं, तुम्हारा सपना था. आज की इस चकाचौंध भरी ज़िंदगी की मरीचिका में तुम भटक गई हो. तुम्हारे मार्क्स कम होने का कारण यह नहीं है कि तुम पढ़ने में ख़राब हो, बल्कि तुम पढ़ाई को सीरियसली नहीं ले रही हो. अगर तुम ठान लो, तो क्या नहीं कर सकती हो? कितना अच्छा हो, अगर हम अपने सपनों को साकार करें. लाइफ को एंजॉय करने के बहुत मौ़के मिलेंगे, लेकिन अगर हमने आज को खो दिया, तो जीवन बनाने का मौक़ा दोबारा नहीं मिलेगा. मैं अपनी सिविल सर्विसेज़ की तैयारी का बहाना करके कल से आना बंद कर रहा हूं. मुझे विश्‍वास है कि तुम भी दिल की अच्छी हो और तुम अपने को बदलने का एक प्रयास अवश्य करोगी. अगर तुम अपने को बदल सकी, तो मैं उसे ही तुम्हारा एक गिफ्ट समझ लूंगा.’

‘तुम्हारा स़िर्फ एक गाइड’

डॉली को वो पत्र देकर फिर मैं प्रतियोगी परीक्षाओं में व्यस्त हो गया था. आईएएस की परीक्षा में दो बार साक्षात्कार देने के बाद भी असफलता की मायूसी को पीसीएस में चयन ने कुछ सीमा तक कम तो किया ही था. अब मैं वर्तमान में लौट चुका था और संयत होकर शेष पत्र पढ़ने लगा.

‘अगर आप मेरे जीवन में नहीं आए होते, तो आज मैं क्या होती, इसकी कल्पना तक मुझे शर्मसार कर देती है. आपके लेटर ने मुझ पर क्या प्रभाव डाला, मैं बता नहीं सकती. मैं अपनी ज़िद से राजस्थान के कोटा शहर में कोचिंग के लिए चली गई और जब पहले प्रयास में ही मेरा मेडिकल में सिलेक्शन हुआ, तब से ही आपको ढूंढ़ रही हूं. सर, आपको मैंने कहां-कहां नहीं ढूंढ़ा. सभी सोशल वेबसाइट्स पर सर्च किया, पर कोई फ़ायदा नहीं. वो तो एक दिन न्यूज़चैनल पर अपर ज़िलाधिकारी, फैज़ाबाद के तौर पर आपको देखा, तो तुरंत आपको पहचान लिया. सर, आज के समय में बिना मोबाइल नंबर, ईमेल या पते के आपका मिल जाना भगवान का आशीर्वाद ही लगता है.

मम्मी-पापा ठीक हैं और आपको बहुत याद करते हैं. सर, प्लीज़ रिप्लाई ज़रूर कीजिएगा, पर लेटर नहीं, नीचे लिखे नंबर पर तुरंत कॉल कीजिएगा. बाक़ी बातें बाद में.’

‘आपकी डॉली’

इतना पढ़कर मैं भी भावुक हो गया और डॉली को फोन करने के लिए मोबाइल फोन उठा लिया.

Anoop Shrivastav

    अनूप श्रीवास्तव

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कहानी- एक्सपायरी डेट (Short Story- Expiry Date)

क्या रिश्तों का मूल्य पैसों से ख़रीदी जा सकनेवाली वस्तु से भी कम होता है? क्या रिश्तों को भी रिसायकल करके एकबारगी फिर से एक सुंदर उपहार में परिवर्तित करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए? नहीं, एक्सपायरी डेट मनुष्यों की बनाई वस्तुओं की भले ही होती होगी, ईश्‍वर के बनाए रिश्तों की नहीं होती.

 

अमिता घर के रोज़मर्रा के काम निपटाकर बैठी ही थी कि सामने रखे चेस्ट ऑफ ड्रॉवर्स पर नज़र पड़ गई. पति ऑफिस और दोनों बच्चे स्कूल जा चुके थे.

बहुत दिनों से ध्यान नहीं दिया था उसने. पता नहीं कितना कुछ बेकार का सामान इकट्ठा हो गया होगा. घर में जिसके हाथ भी कुछ सामान आता है, लेकर ड्रॉवर में भर देते हैं.

अमिता ने उठकर एक ड्रॉवर खोला और उसमें रखी हुई चीज़ें छांटने लगी. कई काग़ज़-पत्तर और छोटी-मोटी चीज़ों से वह भरा पड़ा था. उसने काम के काग़ज़ एक साथ पिनअप किए और फ़ालतू काग़ज़ अलग निकाल दिए.

एक ड्रॉवर में कई सारी चीज़ों के साथ बहुत-सी दवाइयां भी निकलीं. अमिता ध्यान से सबकी डेट्स देखने लगी.

“उ़फ्! इनमें से कई दवाइयों की एक्सपायरी डेट निकले भी कई महीने बीत चुके हैं. कभी ग़लती से इन्हें कोई खा न ले.” सोचते हुए अमिता ने सारी पुरानी दवाइयां लीं और डस्टबिन में फेंक दीं.

दवाइयां फेंकते समय अचानक अमला की बातें याद आईं. दो दिन पहले ही अमला ने कहा था, “हर चीज़ की एक्सपायरी डेट होती है दीदी. डेट निकल जाने के बाद उन चीज़ों का उपयोग नहीं करना चाहिए, वरना वो हमें ही नुक़सान पहुंचाती हैं.” फिर अमिता के कंधे पर हाथ रखकर बोली, “चीज़ों की तरह रिश्तों की भी एक निश्‍चित उम्र होती है. उम्र निकल जाने के बाद वो भी ख़त्म हो जाते हैं. फिर उन्हें भी डस्टबिन में डालकर निश्‍चिंत हो जाना ही अच्छा है, वरना वो हमारे ख़ुशहाल जीवन और शांत दिमाग़ में ज़हर घोलने लगते हैं.”

अमला तो अपने घर वापस चली गई, लेकिन अमिता के दिलो-दिमाग़ में तभी से उथल-पुथल मची थी. दरअसल, दो दिन पहले ही एक परिचित से ख़बर मिली थी कि अमिता के देवर का एक्सीडेंट हो गया है और वह बहुत ही गंभीर अवस्था में एक बड़े अस्पताल के आईसीयू में एडमिट है. जब से यह ख़बर मिली थी, तभी से अमिता का मन विचलित हो रहा था. छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी के चलते देवरानी घर और हॉस्पिटल के बीच भागदौड़ में पिस रही है. हॉस्पिटल में बैठनेवाला भी कोई नहीं है और बच्चों की देखभाल करनेवाला भी कोई नहीं.

पूर्व के कुछ अत्यंत कटु अनुभवों और व्यवहार के चलते अमिता के पति सुदीप ने आहत होकर अपने छोटे भाई से रिश्ता ख़त्म कर लिया था. तब से पिछले पांच वर्षों से एक ही शहर में रहने के बावजूद दोनों भाइयों में औपचारिक बोलचाल तक नहीं है. सुदीप के छोटे भाई संदीप ने अमिता के सामने ही अपने बड़े भाई को कह दिया था, “आज से आपका और मेरा कोई रिश्ता नहीं है. आप लोग कभी मुझे अपना मुंह भी मत दिखाना.”

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वही बड़बोला संदीप आज असहाय अवस्था में हॉस्पिटल में एडमिट है. एक मन कह रहा है- ‘जाने दो, जब उसने ही मुंह तक देखने से मना कर दिया है, तो हमें भी क्या ज़रूरत पड़ी है?’

लेकिन दूसरी ओर वही मन छटपटा रहा था. ‘क्या हुआ छोटा है, ग़लती तो सबसे हो जाती है, लेकिन दुख-दर्द में तो अपने ही काम आते हैं.’

दो दिन पहले जब ख़बर मिली थी, तब से वह यही सोच रही थी कि संयोग से अमला आ गई और उससे अपने मन की उलझन बांटने लगी. अमला सारी घटनाओं से वाकिफ़ थी तभी उसे समझा गई.

ड्रॉवर साफ़ हो चुके थे. सोचते-सोचते अमिता का सिर भारी होने लगा था. वह कमरे में जाकर पलंग पर लेट गई, लेकिन विचार कब पीछा छोड़ते हैं. आंख बंद करते ही फिर मस्तिष्क को घेरकर बैठ गए.

‘इस दुनिया में हर चीज़ की एक्सपायरी डेट यानी वह तारीख़ होती है, जिसके बाद वह चीज़ बेकार हो जाएगी. फिर चाहे वह खाने-पीने का सामान हो या दवाइयां या फिर कुछ और. हर वस्तु जो पैदा होती है, बनती है उसका मृत्यु दिवस तय है.’

“वस्तुओं की तरह संबंधों की भी एक एक्सपायरी डेट होती है दीदी, इसका ख़्याल कोई नहीं रखता. रिश्ते पैदा होते हैं और उम्र पूरी होने के बाद मर जाते हैं. लेकिन इसे महसूस करने के लिए पैनी नज़र और संवेदनशील हृदय होना ज़रूरी है, अन्यथा लोगों को पता ही नहीं चलता कि इस संबंध की उम्र पूरी हो चुकी है और इसे अब ख़त्म करना चाहिए. लोग शिष्टाचारवश उसकी लाश को भी ढोए चले जाते हैं और फलस्वरूप अपने जीवन को भी दूषित कर लेते हैं.”

अमला की बातें फिर सामने आ गईं. “और गहरे जाएं, तो विचारों और भावों की भी डेट होती है. इस समय हम जैसा सोचते हैं ज़रूरी नहीं कि कुछ समय बाद भी वैसा ही सोचें. पहले के समय के संस्कार और मान्यताएं अब पुरानी पड़ गई हैं. आज के दौर में उनका कोई औचित्य नहीं है. इसलिए दूसरों की परवाह छोड़ो और अपने घर-परिवार को ही देखो बस. आजकल सब यही करते हैं और सुखी रहते हैं.”

अमला तो अपनी बातें करके चली गई, लेकिन अमिता के मन को चैन कहां. भारतीय संस्कृति में तो आज भी रिश्ते-नातों का मूल्य अन्य किसी भी वस्तु से अधिक ही होता है. यही तो हमारे संस्कार हैं.

दिमाग़ में इन्हीं सब विचारों के चलते कब ढाई बज गए और कब दोनों बच्चे स्कूल से लौट आए, पता ही नहीं चला.

आते ही दोनों मां के आसपास चूज़ों की तरह फुदकने लगे और स्कूल के क़िस्से सुनाने लगे. उनकी बातों में अमिता थोड़ी देर के लिए अपना तनाव भूल गई. उनके कपड़े बदलवाकर और हाथ-मुंह धुलवाकर अमिता ने उन्हें खाना खिलाया.

खाना खाकर दोनों अपना स्कूल बैग लेकर अमिता के पास आ बैठे.

“देखो मां, आज हमने स्कूल में क्या बनाया.” छोटा बेटा रोहन अपने बैग में से कुछ निकालकर दिखाने लगा. “यह देखो, हमने आर्ट एंड क्राफ्ट की क्लास में क्या बनाना सीखा.”

रोहन के हाथ में एक प्लास्टिक की पुरानी बोतल से बना हवाई जहाज़ था. वह बड़े उत्साह से अमिता को बताने लगा, “देखो मां, इसके पंखे और पूंछ सब पुरानी चीज़ों से बने हैं. देखो यह कितना सुंदर लग रहा है. हमारी क्राफ्ट टीचर कहती हैं कि कोई भी चीज़ कभी ख़राब नहीं होती. हर वस्तु को किसी न किसी रूप में फिर से उपयोग में लाया जा सकता है, बस मन में इच्छा होनी चाहिए.”

“हां मां, हमारी एनवायरमेंट स्टडीज़ की टीचर ने भी आज हमें यही सिखाया कि कैसे ख़राब से ख़राब वस्तु को भी रिसायकल करके उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित किया जा सकता है. अगर हम वस्तु को पुरानी और बेकार मानकर फेंक देते हैं, तो वे पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाती हैं और प्रदूषण फैलाती हैं. इससे अच्छा है, उन्हें नए रूप में परिवर्तित करके फिर से उपयोग में लाया जाए. इससे पर्यावरण और हमें दोनों को ही फ़ायदा होता है.” रोहन की बातें सुनकर बड़ी बेटी रितिका भी उत्साह में भरकर बताने लगी. “मां, आजकल तो हर चीज़ रिसायकल हो जाती है प्लास्टिक, काग़ज़, धातुएं, कांच सब कुछ.”

अमिता के मन के संशय धीरे-धीरे दूर होते जा रहे थे. कभी-कभी बच्चों की बातों में जीवन के बड़े सवालों के जवाब छुपे होते हैं. बच्चे साधारण-सरल बातों में गहरे ज्ञान और मूल्यों की बातें बोल जाते हैं.

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दोनों बच्चों को सुलाने तक अमिता का मन काफ़ी कुछ साफ़ और हल्का हो चुका था. आजकल के युग में जब आदमी साधारण-सी भौतिक चीज़ों को रिसायकल करके अपने लाभ के लिए उपयोग में लाता रहता है, तो फिर रिश्तों को डस्टबिन में डालने की बात क्यों करता रहता है? क्या रिश्तों का मूल्य पैसों से ख़रीदी जा सकनेवाली वस्तु से भी कम होता है? क्या रिश्तों को भी रिसायकल करके एकबारगी फिर से एक सुंदर उपहार में परिवर्तित करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए?

नहीं, एक्सपायरी डेट मनुष्यों की बनाई वस्तुओं की भले ही होती होगी, ईश्‍वर के बनाए रिश्तों की नहीं होती.

रितिका बड़ी और समझदार है. वह देवर के दोनों बच्चों को संभाल लेगी. वह आज ही दोनों को अपने घर ले आएगी, ताकि देवरानी अपने पति की ठीक से देखभाल कर सके और बाहर की भागदौड़ के लिए वह सुदीप को मना ही लेगी.

सोचते हुए अमिता का मन पंख के समान हल्का और स्वच्छ हो गया. सुदीप के आने का समय हो रहा है. वह अभी हॉस्पिटल चली जाएगी और आते समय दोनों बच्चों को अपने साथ ले आएगी.

अमिता ने झटपट हॉस्पिटल ले जाने के लिए थर्मस निकालकर रखा और गैस पर चाय का पानी चढ़ा दिया.

Dr. Vineeta Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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कहानी- नई राहें (Short Story- Nayi Raahen)

अवतारजी को लगा कि इतने सालों में जीवन की आपाधापी में कुछ छूट गया था, जो आज उन्हें मिल गया है. पति-पत्नी गृहस्थी की गाड़ी मिलकर खींचते हैं, मगर दोनों एक-दूसरे से कितने दूर-दूर रहते हैं. अगर दोनों क़रीब आ जाएं, तो जीवन का यह सफ़र आनंद से भर उठेगा. उन्हें फिर किसी और की दरकार नहीं रहेगी, चाहे वह अपने बच्चे ही क्यों न हों!

Hindi Kahani

शाम हो चुकी थी. अवतार सिंह अपनी पत्नी शर्मीला का इंतज़ार कर रहे थे. शर्मीलाजी एक ग्राहक के घर अचार की होम डिलीवरी के लिए गई हुई थीं. वे चिंतित थे कि शर्मिला जल्दी घर पहुंच जाएं, वरना जैसे-जैसे रात होती जाएगी, ट्रैफिक बढ़ती जाएगी.

अवतार सिंह को रिटायर हुए सात महीने हो गए हैं. बीकॉम पास करते ही वे एक फर्म में अकाउंटेंट की पोस्ट पर लग गए थे. उनके पिता श्री स्वरूपचंद सिंह भी उसी फर्म में काम करते थे, लेकिन अवतार सिंह यह नहीं चाहते थे कि उनका बेटा एक मामूली-सा अकाउंटेंट बनकर रह जाए, इसलिए उन्होंने अपने बेटे तन्मय को योजनाबद्ध रूप से पढ़ाया. शुरू से ही वे उसकी पढ़ाई पर ध्यान देते रहे. यह उनकी दूरदृष्टि का ही परिणाम था कि उनका बेटा आईटी इंजीनियर बन गया और आज वह अमेरिका में एक बड़ी कंपनी में रीजनल हेड है.

तन्मय को जब अमेरिका में नौकरी मिली, तो अवतार सिंह की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्हें लगा कि उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने अपने बेटे को सही जगह फिट कर दिया. लेकिन उन्हें क्या पता था कि बेटे को विदेश इतना भा जाएगा कि वह अपने देश के लिए मिस फिट हो जाएगा.

अवतार सिंह जब तक नौकरी करते रहे, तब तक उन्हें बेटे की कमी नहीं खली, मगर जब से रिटायर हुए हैं, बेटे को हर पल याद करते हैं. अगर बेटा आज यहां होता, तो रिटायरमेंट के बाद उन्हें अपना घर भरा-भरा लगता. बेटे-बहू के अलावा अपनी तीन साल की पोती तान्या को भी वह बहुत मिस करते हैं.

अवतार सिंह कभी-कभी सोचते हैं कि अगर उन्हें अपने बेटे की इतनी कमी खलती है, तो उनकी पत्नी शर्मीला को बेटे की कितनी याद आती होगी. वह तो उसकी मां है.

जवानी तो सुनहरे भविष्य की आशा में काम करते-करते खप जाती है, मगर वह भविष्य जब बुढ़ापे का रूप धरकर आता है, तो बेहद बदरंग और बोझिल हो जाता है.

पिछले दो साल से अवतार सिंह अपने रिटायरमेंट का इंतज़ार कर रहे थे. इतने बरसों से एक ही जगह काम करते-करते ऊब गए थे. उन्हें लगता था कि एक दिन बेटा विदेश से लौट आएगा और सब मिलकर आनंद के साथ रहेंगे. आज जब वे रिटायर हो चुके हैं, तो परिस्थितियां एकदम उलट हैं. बेटा लौटना नहीं चाहता और वे घर बैठे-बैठे उकता गए हैं. कोई कितना टीवी देखे, कहां तक क्रिकेट मैच देखे? पार्क में भी कितने घंटे बिताए जा सकते हैं भला! आख़िरकार घर लौटना ही पड़ता है और सूना घर काटने को दौड़ता है. पहले पत्नी शिकायत करती थी कि वे दफ़्तर चले जाते हैं और बेटा विदेश में बैठा है. वह अकेली कितना दीवारों से सिर फोड़े.

अंततः शर्मीलाजी ने अपने आपको व्यस्त रखने का तरीक़ा ढूंढ़ लिया. वे पास-पड़ोस की महिलाओं को कुकिंग सिखाने लगीं. महिलाओं की घरेलू पार्टियों में वह केटरिंग का काम कर देती थीं. धीरे-धीरे उन्हें इस काम में मज़ा आने लगा और पैसा भी मिलने लगा.

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इन सात-आठ सालों में शर्मिलाजी ने अपना दायरा बढ़ा लिया है. उनके हुनर, काम के अनुभवों और जानकारियों को देखते हुए महिलाएं उन्हें अपने घर में होनेवाले पारिवारिक और धार्मिक आयोजनों की भी ज़िम्मेदारी देने लगी हैं. नामकरण संस्कार, मुंडन, गोदभराई, जन्मदिन, सगाई के अलावा धार्मिक आयोजनों के कार्यक्रमों का ऑर्डर भी शर्मीलाजी को मिलने लगा है.

शर्मीलाजी ने अपनी मदद के लिए पास की बस्ती की कई ज़रूरतमंद महिलाओं को अपने साथ काम पर रखा है. इस तरह वे अन्य महिलाओं को सम्मानपूर्वक अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करती रहती हैं. अब शर्मीलाजी अपने काम के चलते दोपहर को अक्सर बाहर ही रहती हैं और अवतार सिंह पूरी दोपहर बोर होते रहते हैं.

कुछ काम न हो, तो नींद भी नहीं आती. घर में जितनी भी किताबें थीं इस दौरान उन्होंने पढ़ डालीं. आज उन्हें पत्नी का काम करना खल रहा है. वे ख़ुद को उपेक्षित समझ रहे हैं. अब उन्हें समझ में आ रहा था कि जब वे नौकरी कर रहे थे, उन दिनों उनकी पत्नी भी कितना अकेलापन महसूस करती होगी. सच ही है, जब तक ख़ुद पर न बीते दूसरे का दुख समझ नहीं आता. अब उन्हें अपनी पत्नी से सहानुभूति होने लगी है. उनको चाय की तलब हुई. वे जब भी काम से लौटते थे, शर्मीलाजी तुरंत पानी और चाय लेकर हाज़िर रहती थीं. आज वे बाहर से आती हैं, तो आने पर चाय भी वही बनाती हैं.

तभी घंटी बजी. अवतारजी ने तेज़ी से उठकर दरवाज़ा खोला. शर्मीलाजी थकी हुई थीं, पर थोड़ी उत्साहित भी. जब वे किचन में जाने लगीं, तो अवतारजी ने उन्हें टीवी देखने के लिए पास बिठा लिया. पांच मिनट बाद वे उठकर चले गए. फिर जब वे लौटे, तो उनके हाथ में चाय की ट्रे थी. शर्मीलाजी तो आश्‍चर्य से चौंक पड़ीं, “अरे, आपने क्यों चाय बनाई? मैं तो जा ही रही थी. आपने ही बिठा लिया था.” जैसे किसी ग़लती की माफ़ी मांग रही हों.

अवतारजी मुस्कुराए, बोले, “चलो, आज से एक काम करते हैं, जो घर में रहेगा, वो बाहर से आनेवाले को चाय पिलाएगा.”

शर्मीलाजी के लिए यह दूसरा आश्‍चर्य! उनका जी चाहा कि बाहर देख आएं कि शाम को यह कौन-सा नया सूरज निकला है. फिर उन्होंने

शरारतभरे अंदाज़ में पूछा, “अगर दोनों एक साथ बाहर से आएं तो?”

“तो मैं पानी पिलाऊंगा और तुम चाय.” अवतारजी ने ठहाका लगाया.

यह सुनकर शर्मीलाजी को अच्छा लगा कि उनके पति अब उनके बारे में सोचने लगे हैं. रात में खाना बनाने में भी अवतारजी ने अपनी पत्नी की मदद की.

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इस तरह दोनों पति-पत्नी ने कुछ व़क्त साथ गुज़ारा. अवतारजी को लगा कि इतने सालों में जीवन की आपाधापी में कुछ छूट गया था, जो आज उन्हें मिल गया है. पति-पत्नी गृहस्थी की गाड़ी मिलकर खींचते हैं, मगर दोनों एक-दूसरे से कितने दूर-दूर रहते हैं. अगर दोनों क़रीब आ जाएं, तो जीवन का यह सफ़र आनंद से भर उठेगा. उन्हें फिर किसी और की दरकार नहीं रहेगी, चाहे वह अपने बच्चे ही क्यों न हों!

आज से वे हमेशा अपनी पत्नी के साथ रहेंगे. पति बनकर ही नहीं, बल्कि जीवनसाथी बनकर, हमसफ़र बनकर! मन-ही-मन उन्होंने ख़ुद से वादा किया.

बिस्तर पर पड़े-पड़े उन्होंने शर्मीला की ओर देखा. उसके सिर से तकिया खिसक गया था. उन्हें जाने क्या सूझी कि अपनी बांह पर शर्मीला का सिर रख लिया. नींद में ही शर्मीला जैसे सुकून से मुस्कुराईं और कुछ पलों बाद वे भी नींद की आगोश में चले गए. सुबह नींद खुली, तो ख़ुद को तरोताज़ा पाया. लगा नींद ने बरसों की थकान और बोरियत को दूर भगा दिया है. शर्मीलाजी अभी भी सो रही थीं.

आज पहले वे ही उठे. फ्रेश होने के बाद उन्होंने ही चाय बनाई. जब शर्मिला को उठाया, तो वे चौंक गईं. पतिदेव ने आज उन्हें सोने दिया और ख़ुद ही चाय बनाकर दी. पिछली रात से वे एक नए आश्‍चर्य में जी रही थीं.

अवतारजी ने पत्नी से ज़िद की कि वे दोनों आज साथ-साथ मॉर्निंग वॉक पर जाएंगे. पति के साथ सुबह-सुबह सैर पर जाना शर्मीलाजी के लिए एक नया अनुभव था. वहीं घास पर बैठे-बैठे शर्मीलाजी ने बताया कि उन्हें एक नया काम मिला है और क्या उन्हें यह काम करना चाहिए?

“पहले काम तो बताओ. फिर ़फैसला करूंगा कि तुम्हें करना चाहिए या नहीं?” अवतार सिंह ने गंभीर मुद्रा बनाकर कहा.

शर्मिलाजी बोलीं, “कल जिनके घर मातारानी की चौकी थी, उनके यहां एक प्रस्ताव पास हुआ कि वैष्णो देवी की यात्रा पर जाया जाए और इसका टूर ऑपरेटर मुझे बनाया गया है. अब बताइए मुझे ये काम करना चाहिए या नहीं?” शर्मीलाजी ने अपने पति से पूछा.

“नहीं, तुम ये काम अकेले नहीं कर सकती.” अवतार सिंह ने अपना ़फैसला सुना दिया. शर्मीलाजी यह सुनकर बुझ गईं. उनका बहुत मन था कि काम के बहाने माता वैष्णो देवी के दर्शन भी हो जाएंगे.

“टिकट लेने, होटल बुक करवाने के लिए तुम कहां अकेली-अकेली फिरोगी. मैं भी इस काम में तुम्हारी मदद करूंगा.” अवतार सिंह की बात सुनकर शर्मीलाजी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. काम में पति का साथ मिले, एक पत्नी के लिए इससे बढ़कर और क्या हो सकता है? अवतारजी ने सलाह दी कि काम बड़ा है और इसमें कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, इसलिए मदद के लिए वे अपने दो दोस्तों को भी साथ ले लेंगे.

नेकी और पूछ-पूछ शर्मिलाजी को इससे बढ़कर और क्या चाहिए था!

शर्मीला और अवतार सिंह ने अपने दो रिटायर्ड दोस्तों और उनकी पत्नियों के सहयोग से वैष्णो देवी की यात्रा का आयोजन सफलतापूर्वक कर दिया.

वहां से लौटकर आने के बाद उन्हें चार धाम की यात्रा का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया. अब इन सभी लोगों ने तय किया कि क्यों न वे इस काम को संगठित और व्यवस्थित रूप से करें और इसके लिए एक कंपनी बना ली जाए.

इस तरह सभी रिटायर्ड लोगों ने अपने जीवन के लिए एक नई राह बना ली है, जिस पर चलते हुए उन्हें लगता है कि अब बुढ़ापा बदरंग नहीं रहेगा. काम करते हुए बुढ़ापे को भी शान से जिया जा सकता है.

Suman Saraswat

सुमन सारस्वत

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कहानी- दोहरा व्यक्तित्व (Short Story- Dohra Vyaktitav)

“वह मेरा बेटा है, ज़ाहिर है मुझ पर गया है.” राम शरारत से मुस्कुराये और चलते बने. राम की यही तटस्थता मुझे कभी-कभी संदेहास्पद लगती. मैंने एक लेख में पढ़ा था कि विश्‍व के कुख्यात अपराधी बचपन में तोड़-फोड़ की प्रवृत्तिवाले व हिंसक थे. अत्यधिक चंचलता, अतिरिक्त शारीरिक दम-खम ज़्यादा खुराक एवं नकारात्मक वृत्तियां बालकों में भविष्य के लिए ‘अपराधिक’ बीज बो जाते हैं. राम के प्रति मेरा संदेह सच निकला. उस एक घटना ने मुझे चमत्कृत कर दिया. किसी भी प्रकार की अतृप्ति कितनी ख़तरनाक होती है, यह पता चला.

Hindi Stories

“आज स्कूल से शिकायत आ रही है, कल पड़ोस के घरों के शीशे तोड़ने का आरोप लगेगा, बड़े होने पर लड़कियों के पीछे लगेगा, हे भगवान! मेरा राम तो ऐसा न था, राम का लड़का रावण.” बोलते हुए अम्माजी की सांस फूल गई. इतनी देर से वे अपने पोते यानी अर्जुन की शान में कसीदे पढ़ रही थीं और ‘मेरा राम तो ऐसा न था’ के जुमले से एक तीर से दो शिकार कर रही थीं यानी अर्जुन अपने पिता राम की तरह नहीं, वरन मां यानी मेरी तरह था. अर्जुन चमकती आंखों के साथ खड़ा था. शर्मिंदगी, भय का तो नामो-निशान न था उसके चेहरे पर. उसे पता था, मम्मी और दादी नामक ये दो स्त्रियां हानिरहित हैं, केवल ज़बानी जमा ख़र्च करेंगी, मारने-पीटने की संभावना कम है.

आज नौ वर्षीय अर्जुन ने स्कूल में एक लड़के का हाथ इस कदर मरोड़ दिया था कि उसकी कोहनी की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया. इसके पहले भी वह इस तरह के ‘कृत्य’ में नाम रोशन कर चुका था. सीढ़ियों पर से धक्का दे देना, दूसरे के टिफिन चुराकर खा जाना, अन्य बच्चों या अध्यापिकाओं को गाली दे देना आदि. किंतु आज की घटना ने मेरी सहनशक्ति तोड़ दी और मैंने उसकी जमकर मरम्मत कर दी.

यह आज की बात न थी. अर्जुन पांच-छ: वर्ष की उम्र से ही शरारतें करने लगा था. थोड़ी-बहुत शैतानी तो सभी बच्चे करते हैं, किंतु वह तो जैसे सब पूर्व योजनानुसार करता था. उसके पिता बेहद सीधे और सज्जन थे. उनकी तरह व्यक्तित्व देख पाना तो इस ज़माने में मुमकिन ही नहीं है. अम्माजी के इकलौते पुत्र राम ‘राम’ सरीखे ही थे, पर अर्जुन उनकी तरह अनुशासित नहीं हो पाया.

यदि कभी कुछ कहने की कोशिश करते, तो अम्माजी टोक देतीं. अम्माजी के तेजस्वी रूप के सामने राम ज्यों मद्धिम प्रदीप बन जाते. उनकी पुत्र के प्रति टोका-टोकी अस्वाभाविक-सी लगती, किंतु राम मुंह सिये आज्ञा पालन करते रहते. शायद इससे अम्माजी के अहम् की तुष्टि होती थी. मुझे भी उन्होंने ज़ब्त करने की चेष्टा की, किंतु असफल रहीं. छुटपन में मैं अर्जुन के लिए खिलौने व बढ़िया कपड़े ख़रीदती, तो अम्माजी बिगड़ जातीं, “यह क्या बहू, फ़िज़ूलख़र्ची करती हो और बच्चे की आदत भी बिगाड़ रही हो. इतने महंगे खिलौने-कपड़े की क्या ज़रूरत थी? भविष्य की शिक्षा-दीक्षा के लिए पैसे बचाओ.”

“अरे अम्मा! बच्चा ज़िद कर रहा था, उसका दिल कैसे तोड़ती?”

“अरे, राम क्या कम ज़िद करता था, मगर क्या मजाल जो गेंद और पतंग छोड़ कर कुछ ख़रीदकर दिया हो हमने उसे. कपड़े भी बस होली या दिवाली में, चार हाफ पैंट और शर्ट में पूरा वर्ष गुज़ार देता था वह. क्या मेरा राम इस परवरिश से दूसरों से कम है? आज क्या नहीं है उसके पास-कार, बंगला और ऐशोआराम की सब वस्तुएं.”

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“अम्माजी, ये खिलौने बच्चों को रचनात्मक बनाते हैं, उन्हें एक सपनों की दुनिया में ले जाते हैं. बच्चा बच्चा ही बना रहता है, समय से पूर्व परिपक्व नहीं हो जाता.” मेरा इशारा राम की तरफ़ था.

“शिक्षा तो बड़ा दे रही हो, अपने और मेरे पुत्र में अंतर देखा. राम के पिता पेशकार थे, पैसे की कमी थोड़े ही थी, किंतु हमने उसकी आदत बिगड़ने नहीं दी, लेकिन अर्जुन को देखो.” अम्माजी ने मेरा मुंह बंद करा दिया. फिज़ूलख़र्ची तो मैं भी नहीं करती थी, न ढेर सारा पैसा ख़र्च करके बच्चे को बिगाड़ती. उसे अच्छी बातें सिखाती, तब भी वह न जाने किस रहस्यपूर्ण शिक्षा से निरंतर शैतान होता चला जा रहा था. राम तो मां के समक्ष मुंह नहीं खोलते थे, वे उनसे भयभीत रहते. सुबह उठने में ज़रा देर होने पर अम्माजी उन पर चिल्लाने लगतीं. उनके कम खाने या तेल-मसाला ज़्यादा खाने पर रोष प्रकट करतीं, मेरे साथ कहीं आने-जाने पर बड़बड़ातीं. एकाध घंटे से अधिक टीवी देखने पर उपदेश देतीं. तभी मैंने अंदाज़ा लगा लिया कि इतनी तेज़-तर्रार मां के पुत्र का बचपन कैसे बीता होगा और वे इतने अल्पभाषी और सीधे क्यों हैं.

अम्माजी के तेज़ स्वभाव के संरक्षण में अर्जुन बड़ा होने लगा, किंतु वह पिता के विपरीत था. हर वाकये पर अम्माजी के पांच मिनट के संभाषण को सुन वह अधिक व्यग्र हो जाता. मैं उसे प्यार व मार दोनों ही तरह से समझा कर हार गई. मैं उसे शिक्षाप्रद कहानियां सुनाती, अच्छी आदतें विकसित करने का प्रयास करती. उस समय लगता वह बदल गया है, किंतु अगले दिन फिर वही ढाक के तीन पात. वह अम्माजी के बराबर कुछ-न-कुछ बोलते रहने की आदत से चिढ़ता था. उनके जूड़े का पिन निकाल देता, उन्हें पैर फंसा कर गिराने की चेष्टा करता. खाने की थाली में पानी डाल देता, फिर उन्हें परेशानी में देखकर ख़ूब आनंदित होता. मैं उसे पीटकर बेदम कर देती. कमरे में बंद कर देती. उसे बाहर खेलने नहीं जाने देती कि ग़लत संगत में न पड़ जाए. स्कूल में शिकायत करती, किंतु सब व्यर्थ!

एक दिन मैंने राम से फिर कहा, “आप बच्चे के प्रति उदासीन हैं. उसके लिए आपको सख़्त होना होगा. बचपन में आप तो ऐसे न थे.”

“मैं बच्चा था ही कब? सीधे एक समझदार प्रौढ़ के रूप में जन्म हुआ था मेरा.” एक कम बोलनेवाले व्यक्ति ने मात्र एक वाक्य में अपने बचपन के असंतोष को बयां कर दिया.

“मनोवैज्ञानिक कहते हैं, बच्चों के सर्वांगीण विकास में खिलौने अहम् भूमिका निभाते हैं, किंतु आपने न इसके लिए ज़िद की, न यह सब मिला आपको?” मैंने कुरेदा.

“हो सकता है, लेकिन क्या अभावग्रस्त परिवार के लोगों का सर्वांगीण विकास नहीं होता, छोड़ो न.”

“अच्छा यह बताइए, मैं शुरू से सीधी-साधी थी, आपका तो कहना ही क्या, फिर अर्जुन की ऐसी विध्वंसक प्रवृत्तियों के लिए किसे उत्तरदायी मानते हैं आप? किस पर गया है वह?”

“वह मेरा बेटा है, ज़ाहिर है मुझ पर गया है.” राम शरारत से मुस्कुराये और चलते बने. राम की यही तटस्थता मुझे कभी-कभी संदेहास्पद लगती. मैंने एक लेख में पढ़ा था कि विश्‍व के कुख्यात अपराधी बचपन में तोड़-फोड़ की प्रवृत्तिवाले व हिंसक थे. अत्यधिक चंचलता, अतिरिक्त शारीरिक दम-खम ज़्यादा खुराक एवं नकारात्मक वृत्तियां बालकों में भविष्य के लिए ‘अपराधिक’ बीज बो जाते हैं.

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राम के प्रति मेरा संदेह सच निकला. उस एक घटना ने मुझे चमत्कृत कर दिया. किसी भी प्रकार की अतृप्ति कितनी ख़तरनाक होती है, यह पता चला. उस दिन हमेशा की तरह राम ऑफ़िस से लौटने पर कपड़े बदलकर चाय पी रहे थे, अम्माजी अर्जुन के दिनभर के उपद्रवों का पिटारा खोले बैठी थीं. राम नि:शब्द बैठे चाय-नाश्ता करते रहे, फिर हमारे शयनकक्ष से जुड़े अर्जुन के कमरे में चले गए. वे प्रतिदिन उसे एकाध घंटा पढ़ाया करते थे या स्कूल संबंधी जानकारियां लेते थे. इस दौरान किसी प्रकार का व्यवधान वे नहीं पसंद करते थे. मैं रात के भोजन की तैयारियां कर रही थी कि अचानक मुझे ध्यान आया अर्जुन ने दूध तो पिया ही नहीं. दूध का ग्लास लिए मैं कमरे में पहुंची तो दरवाज़ा बंद पाया. झिर्री में से झांककर देखा, पिता-पुत्र पढ़ने के स्थान पर खिलौनों में मस्त हैं. फ़र्श पर सारे खिलौने बिखरे पड़े थे, उनके बीच में बैठे राम के चेहरे व आंखों में एक उन्माद था. वे एक के बाद दूसरा खिलौना उठा कर खेलते, उनके गले से एक अस्वाभाविक किलकारी निकल रही थी, जो कहीं से भी उनके व्यक्तित्व से मेल नहीं खा रही थी. अर्जुन बोला, “पापा, मैंने आज ऋषभ और अंशुमान की जमकर मरम्मत की. उनके तो ख़ून भी निकल आया, मुझे अगली सीट पर बैठने ही नहीं दे रहे थे.”

“बहुत अच्छा किया, मार खाकर कभी घर मत आना, बदला ज़रूर लेना.”

“उनको और मारता, लेकिन मैडम आ गईं, मुझे दो थप्पड़ जमाये.”

“उसकी इतनी हिम्मत, धकिया नहीं दिया उसे?” राम के स्वर से गुर्राहट निकली.

“कल उसे भी मज़ा चखा के आऊंगा. पापा! दादी बड़ा आफ़त करती हैं.”

“ज़हर दे दूं क्या? काम ही ख़त्म हो जाये, मुझे भी बहुत परेशान किया है उसने. ऐसे लोगों को ज़िंदा रहने का हक़ नहीं है.” राम की आंखों में हिंसा-पशु से भाव थे.

अर्जुन व राम अपने ही कथन पर असभ्यों की तरह हंस रहे थे. फिर राम ने शरारती कारनामों को किस प्रकार अंजाम देना है, इसके गुर अर्जुन को सिखाये. वे अशोभनीय, बल्कि अश्‍लील शब्दावली का प्रयोग कर रहे थे और अर्जुन उसे आत्मसात कर रहा था. अर्जुन के खिलौनों के प्रति उनकी अस्वाभाविक ललक उन्हें अर्द्ध विक्षिप्त सिद्ध कर रही थी. मैं आश्‍चर्य व भय के मिले-जुले भावों से ओत-प्रोत थी. मेरी आहट पर दोनों ने क़िताब-कापियां खोलकर पढ़ने का नाटक शुरू कर दिया. मेरी नाक के ठीक नीचे वर्षों से यह ‘खेल’ खेल रहे थे राम. अर्जुन भी उनका ऐसा विश्‍वसनीय साथी था, जिसने कभी उनके विरुद्ध मुंह नहीं खोला और हम अनभिज्ञ रहे.

फिर जाने-अनजाने छुपकर मैंने उनकी बातें सुनीं, जिसका सार यही निकला कि राम अपनी जन्मदायिनी से बेहद घृणा करते थे. वह उन्हें अपने बचपन और सुख-चैन को छीननेवाली मानते थे. वे मां की बक-बक से क्षुब्ध एक ऐसे युवा थे, जो अपने बचपन की अतृप्ति को पुत्र के खिलौनों से दूर कर रहे थे. दोनों मिलकर अम्माजी के शीघ्र मरने की कामना करके आनंदित होते. राम दो व्यक्तित्व के स्वामी थे, एक ज़माने को दिखानेवाला सीधा, सरल, सज्जन और दूसरा इतना हिंसक व भयानक जो आसानी से किसी की हत्या भी कर सकता था.

इस स्थिति से बुद्धिमत्ता से निपटना था. जल्दीबाज़ी या क्रोध परिस्थिति को और भयावह बना सकती थी, लेकिन ईश्‍वर की कृपा से जैसा मैंने सोचा था, वैसा ही करती गई और एक के बाद एक मुझे सफलता मिलती चली गई. सर्वप्रथम मैंने दिल्ली स्थित अपने बैंक अधिकारी बड़े भाई को चुपचाप फ़ोन करके स्थिति से अवगत कराया. वे सहर्ष अर्जुन को अपने साथ रखने के लिए राजी हो गये. दिल्ली स्कूल में उसका दाखिला हो गया. दो वर्ष वह मामा-मामी और उनके दो बच्चों के साथ एक स्वस्थ वातावरण में रहा. फिर कुछ बड़ा होने पर मैंने वहीं के एक बोर्डिंग स्कूल में उसका दाख़िला करवा दिया. राम पुत्र की दूरी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे, उनकी स्थिति जल बिन मछली की तरह हो गई थी, किंतु उनकी विकलता और बेचैनी को मैंने अपने प्यार व मनुहार से दूर किया. उन्हें पूर्ण भावनात्मक संबल दिया. उन्हें समझाया कि तुम्हारे पुत्र के सुंदर भविष्य के लिए हमें यह अलगाव झेलना ही होगा. वे उदास व खिन्न रहने लगे, लेकिन मैं छाया-सी हर पल उनके साथ रही. छुट्टियों में उन्हें लेकर हिल स्टेशन चली जाती, जहां दूर पहाड़ियों की सुरम्यता में हम नवविवाहित जोड़ा बन जाते. जहां रोज़मर्रा की समस्याओं व तनाव से मुक्त रहते, कई वर्ष लग गए राम को सहज होने में. उन्हें दोहरे व्यक्तित्व से छुटकारा दिलाना ही था. हमने उसके लिए योग कक्षाओं में जाना शुरू किया, अम्माजी को भी धीरे-धीरे वस्तुस्थिति से अवगत कराया. वे डर गईं, किंतु वे अनुभवी व बुद्धिमान थीं, अत: उन्होंने भी परिस्थिति से समझौता कर अपने आक्रामक रवैये में परिवर्तन किया. मैंने सब किया, किंतु राम को अर्जुन से मिलने नहीं दिया, जिसे उन्होंने अपना ‘मोहरा’ बनाना चाहा था, जो वह ख़ुद नहीं कर सके उसे, उससे करवाना चाहा. उसके तेज़-तर्रार, शक्तिशाली, किसी से न डरनेवाले रूप में अपनी प्रतिछाया तलाशी.

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अर्जुन बोर्डिंग की छुट्टियों में भी मामा के पास ही रहता. वह सोचता रहा कि उसकी शरारतों के कारण मैंने उसे अपने से अलग कर दिया, किंतु यह सच न था.

आज वह अट्ठारह वर्ष का था. इंजीनियरिंग प्रथम वर्ष का कुशाग्र व तीव्र बुद्धिवाला स्वस्थ, संतुलित, सभ्य व आज्ञाकारी छात्र, बिल्कुल अपने पिता के समान. वर्षों बाद मिले पिता-पुत्र एक-दूसरे के गले लग कर रो पड़े. उनकी आत्मीयता व प्रेम वैसे ही बरक़रार था, किंतु अब कोई ख़तरा न था. अर्जुन जीवन के उस मोड़ पर था, जहां से कोई उसे भटका नहीं सकता था, क्योंकि उचित-अनुचित का ज्ञान हो गया था उसे और राम भी अपने नकारात्मक व्यक्तित्व को दफ़न कर ‘दोहरे चरित्र’ से निजात पा चुके थे. वे आज भी नहीं जानते कि मैं उनके उस ‘रूप’ से वाकिफ़ थी. उस बात को ज़ाहिर करना सरासर मूर्खता होती, अत: ताउम्र मैंने उन्हें अनभिज्ञता के अंधेरे में रखना ही उचित समझा.

Pama Malik

पमा मलिक

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कहानी- राह वही, सोच नई (Story- Raah Wahi, Soch Nayi)

“जानता हूं, मुझे इतना आशावादी नहीं होना चाहिए, लेकिन बेटा, जिन परिस्थितियों से मैं गुज़र रहा हूं, उसमें आशा के दामन को हर पल थामे रखना नितांत आवश्यक है. मैं अपने लिए इसमें भी ख़ुश होने का सबब ढूंढ़ लेता हूं. रमेशजी विधुर हैं, पर मैं कितना ख़ुशक़िस्मत हूं कि मेरी प्रभा मेरे साथ है. मैं उसे देख सकता हूं, छू सकता हूं, महसूस कर सकता हूं. सच कहूं पराग, तो अब प्रभा मुझे बच्ची-सी लगती है. बेहद निरीह और अबोध शिशु जैसे अपनी देखभाल के लिए पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर होता है, वैसे ही प्रभा अपनी देखभाल हेतु पूरी तरह मुझ पर निर्भर है.”

Kahani

बीच राह में पड़े पत्थर को ठोकर मारते हुए पराग ने एक गहरी सांस ली… क्या अंतर है इसमें और मेरी स्थिति में? मैं भी इसकी तरह हर किसी की ठोकर खाने पर मजबूर हूं. उसकी आंखों के सम्मुख फिर अपने दफ़्तर के वाकए तैरने लगे, अभी वह पहले सीनियर की दी हुई फ़ाइल ही नहीं निबटा पाया था कि एक और सीनियर दो और फ़ाइलें उसके सामने पटक गया. लेकिन अब इतनी मुश्किल से तो एक नौकरी मिली है, उसमें भी मीनमेख निकालने लगा तो बस चल ली ज़िंदगी… सोचते हुए पराग ने इतनी देर से लुढ़काते कंकड़ को ज़ोर से ठोकर मारी, तो वह सामने के पोल से जा टकराया. टन्न की आवाज़ हुई, तो वहां खड़े बुज़ुर्ग सज्जन और कचरे की ट्रॉलीवाला आदमी एक पल को ठिठके, पर फिर उनकी बहस सप्तम सुर में आरंभ हो गई. बुज़ुर्ग महाशय उसे नियमित न आने के लिए डांट लगा रहे थे और कचरेवाला भी बराबर बहस किए जा रहा था. बुज़ुर्ग सज्जन को निहारने पर पराग के चेहरे पर यकायक पहचान के भाव उभरे तो वह पुलक उठा, “अरे, ये तो मनमोहन सर हैं.” उसके सबसे प्रिय सर और वह उनका सबसे प्रिय शिष्य. कितना आदर करता था वह उनका अपने स्कूल के दिनों में. वह तो अक्सर उन्हें याद करता रहता है कि काश वे मिल जाते, तो उसे कुछ सही राह सुझाते. पर यह… यह वह उनका कैसा विद्रूप रूप देख रहा है?
दोनों पक्षों की उग्र बहस बिना किसी निर्णायक मोड़ पर आए समाप्त हो गई थी, क्योंकि मनमोहन सर खाली कूड़ादान लिए अपने घर के गेट में दाख़िल हो गए थे. हालांकि उनके व्यक्तित्व की इस विरूपता को देखकर पराग के चेहरे पर एक पल को विद्रूपता के चिह्न उभर आए थे, पर फिर अपनी विचार श्रृंखला को झटका देते हुए वह तुरंत उनके पीछे लपका.
“सर सर…”
“कौन?” मोटे लेंस के चश्मे के पीछे से झांकती दो आंखों ने घूरते हुए सवाल किया, तो एकबारगी पराग सहम गया. फिर साहस बटोरकर बोला, “जी, मैं पराग!”
बूढ़ी आंखों में यकायक पहचान के कोई चिह्न नहीं उभरे. बाहर बरामदे में ही पड़ी कुर्सी की ओर इंगित करते हुए एक ठंडा स्वर उभरा, “बैठो, आता हूं.” लेकिन कुछ देर इंतज़ार के बाद भी जब अंदर से किसी के बाहर आने के संकेत नहीं मिले, तो पराग ने चलने में ही भलाई समझी. ऑफ़िस पहुंचने में देरी न हो जाए, इसलिए अब उसने सीधे बस स्टॉप का रास्ता पकड़ लिया.

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मनमोहन सर से आकस्मिक भेंट ने पराग की ज़िंदगी के प्रति निराशा में वृद्धि ही की थी. सर उसके लिए हमेशा से आदर्श रहे हैं. हताशा के हर पल में वह सबसे पहले उन्हें ही याद किया करता था और वे भी संकटमोचन की तरह उसे हर मुसीबत से उबार लेते थे. लेकिन सर के व्यक्तित्व के जिस पहलू से वह आज रू-ब-रू हुआ था, वह उसे अचंभित कर गया था. एक कचरेवाले से इस तरह झगड़ा, तू-तड़ाक, फिर इतने ठंडेपन से अपने प्रिय शिष्य का स्वागत. पराग तो अभी तक यह भी निश्‍चित नहीं कर पा रहा था कि सर ने उसे पहचाना भी था या नहीं. अरसे बाद वह उनसे मिला था. कहां खो गए उसके वे शांत, गंभीर और प्रबुद्ध मनमोहन सर?
कुछ अरसे बाद किसी काम से पराग का फिर उसी गली में आना हुआ. मकान ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वह जिस घर तक आ पहुंचा, वह मनमोहन सर के बिल्कुल सामनेवाला घर था. पराग ने एक उचटती-सी दृष्टि सर के बरामदे और बगीचे में डाली और फिर अपने कामवाले घर में चला गया. बाहर निकलते वक़्त
उसे सामने ही गेट पर सर नज़र आ गए. पराग ने नज़रें चुराकर निकल जाना चाहा, लेकिन उन्होंने पकड़ लिया.
“अरे पराग, आओ इधर्रें अंदर आओ.”
न चाहते हुए भी पराग को उनके पीछे-पीछे घर में प्रविष्ट होना पड़ा.
“घर छोटा है, पर हम दो प्राणियों के लिए पर्याप्त है. मैं और मेरी पत्नी प्रभा.” बोलते हुए वे पराग को बैठक में बिठाकर ख़ुद अंदर की ओर मुड़ गए. “चाय चढ़ाकर आता हूं. उस दिन भी तुम ऐसे ही निकल गए थे.”
“जी… वो मैं…” पराग ने सफ़ाई प्रस्तुत करनी चाही.
“मुझे ही ज़्यादा देर लग गई थी. ख़ैर, इसीलिए आज आते ही चाय चढ़ा रहा हूं. और कैसे हो? क्या कर रहे हो आजकल?” रसोई कुछ इस तरह बनी हुई थी कि वहां से दोनों कमरों पर नज़र रखी जा सकती थी. मनमोहनजी पराग की बात भी सुनते जा रहे थे और दूसरे कमरे की ओर मुंह करके वार्तालाप भी करते जा रहे थे. “यही लड़का है प्रभा, जो उस दिन आया था और बाहर से ही चला गया था. हां, बहुत ही होनहार लड़का है. बेहद समझदार और ज़िम्मेदार.”
पराग ने अनुमान लगा लिया कि दूसरे कमरे में अवश्य ही उनकी पत्नी होंगी, लेकिन वह बाहर आकर चाय क्यों नहीं बना रहीं? शायद कुछ काम कर रही होंगी या तबियत ठीक नहीं होगी. ख़ैर, अपनी तारीफ़ सुनकर पराग का मन खिल उठा था. मन हुआ वह भी अपने प्रिय सर की तारीफ़ में कुछ कहे कि तभी अंदर के कमरे में फ़ोन बज उठा. सर गैस धीमी करके अंदर चले गए. फ़ोन पर वार्तालाप चल रही थी कि तभी दरवाज़े की घंटी बज उठी. पराग ने उठकर दरवाज़ा खोलना ही उचित समझा. बैग लिए हुए एक व्यक्ति धड़धड़ाते हुए अंदर घुसा और सीधे अंदर के कमरे में चला गया. पराग को उसका पीछा करते हुए अंदर तक जाना पड़ा.
अंदर का दृश्य चौंकाने वाला था. पलंग पर एक महिला गहरी नींद में सोई हुई थी. उसके बदन में ढेर सारी सुइयां और मशीनी उपकरण लगे हुए थे. आगंतुक ने चढ़ रही ड्रिप में एक इंजेक्शन चुभोया और लेटी हुई महिला की नब्ज़ टटोलने लगा. पराग अब तक समझ चुका था कि आगंतुक कोई कंपाउंडर है. इधर सर ने फ़ोन रखा और उधर आगंतुक चलने के लिए उद्यत हुआ.
पराग उधेड़बुन में था कि वह किस स्वर में सर के सम्मुख अपनी उलझन रखे. तभी सर पत्नी की ओर मुख़ातिब हो सामान्य स्वर में बोल उठे, “रमेशजी देख गए हैं तुम्हें. नब्ज़ ठीक बता रहे हैं. चाय अगली बार पीएंगे. आज ज़रा दो-तीन मरीज़ और संभालने हैं.” उन्होंने बातों के मध्य चाय का एक घूंट भरा. “हूं, अच्छी बन पड़ी है. क्यूं पराग, अच्छी है न चाय?” पराग ने सहमति में गर्दन हिला दी. “लो देखो, पराग को भी अच्छी लगी. इतनी बुरी नहीं बनाता मैं, जितनी तुम समझती हो.”
पराग के लिए अब इस पहेली को झेलना असह्य हो गया था. “सर, आंटी तो गहरी नींद में लग रही हैं. वे शायद आपकी बातें नहीं सुन रही हैं, फिर भी आप इनसे बातें कर रहे हैं… मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा.”
“ओह, मुझे तो ध्यान ही नहीं रहा कि तुम्हें कुछ मालूम नहीं है. दरअसल प्रभा दो साल पहले बाज़ार से फल लेकर लौट रही थी तो एक ट्रक ने टक्कर मार दी. बच तो गई, पर तब से कोमा में है. डॉक्टर कहते हैं सामान्य होने में कितना वक़्त लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. पर किस पल क्या चमत्कार हो जाए, इस उम्मीद में मैं उससे बतियाता रहता हूं. मैं उसे हर आने-जानेवाले की, बदलते मौसम की, रसोई में क्या हो रहा है, यहां तक कि देश में क्या हो रहा है, सबकी ख़बर देता रहता हूं, क्योंकि जब वह सामान्य हो जाएगी, तब सब एक साथ बता पाना संभव नहीं होगा न?” उनकी आंखों में उम्मीद की जो लौ जल रही थ, उसे देखकर कोई भी उनसे यह पूछने का साहस नहीं कर सकता था कि क्या वे सचमुच एक दिन अच्छी हो जाएंगी?
“जानता हूं, मुझे इतना आशावादी नहीं होना चाहिए, लेकिन बेटा, जिन परिस्थितियों से मैं गुज़र रहा हूं, उसमें आशा के दामन को हर पल थामे रखना नितांत आवश्यक है. मैं अपने लिए इसमें भी ख़ुश होने का सबब ढूंढ़ लेता हूं. रमेशजी विधुर हैं, पर मैं कितना ख़ुशक़िस्मत हूं कि मेरी प्रभा मेरे साथ है. मैं उसे देख सकता हूं, छू सकता हूं, महसूस कर सकता हूं. सच कहूं पराग, तो अब प्रभा मुझे बच्ची-सी लगती है. बेहद निरीह और अबोध शिशु जैसे अपनी देखभाल के लिए पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर होता है, वैसे ही प्रभा अपनी देखभाल हेतु पूरी तरह मुझ पर निर्भर है. ऐसा सोचकर मेरी ममता और भी बढ़ जाती है. ममता केवल नारियों की बपौती नहीं है पराग. यह कोमल और अद्भुत भाव हम पुरुषों में भी जाग सकता है, बशर्ते हम अपने पुरुषोचित अहंकार को आड़े न आने दें. मुझे गर्व है कि मुझमें ये कोमल भावनाएं जागीं.” मनमोहनजी प्यार से पत्नी के बालों में हाथ फिराने लगे, तो पराग का मन इस अद्भुत दृश्य को देखकर द्रवित हो उठा.
“आप तो सचमुच देवता हैं सर, आप महान हैं.”

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“नहीं, देवता से मेरी तुलना कर देवता को छोटा मत करो. मैं एक अदना-सा इंसान हूं और आम इंसान की तरह कभी-कभी महानता का यह चोला उतर जाता है, तब बहुत तुच्छ, स्वार्थी और खीझा हुआ इंसान सामने आता है. जैसा कि उस दिन तुमने मुझे देखा था. उस दिन रात से ही प्रभा की हालत ख़राब थी. बार-बार बिस्तर गीला कर रही थी. सारी रात मैं सो नहीं पाया था. सवेरे उठते ही मुझे चाय की तलब लग जाती है. चाय बनी ही थी कि कचरेवाला आ गया. पंद्रह दिन नागा करने के बाद उसे आया देख मेरा ग़ुस्सा भड़क उठा. उसकी बहस ने आग में घी का काम किया. तभी तुम आ गए. चाय ठंडी हो चुकी थी. सोचा तुम्हारे साथ दूसरी गरम चाय का आनंद लूंगा, पर तभी प्रभा का बिस्तर फिर गंदा हुआ देख दिमाग़ भन्ना गया. एक मन हुआ पहले चाय पी लूं, फिर बदल दूंगा, उसे कौन-सा फ़र्क़ पड़ रहा है? पर दूसरे ही पल मेरी आत्मा ने मुझे धिक्कारा कि क्या कोई मां इस तरह कभी अपने बच्चे को अनदेखा कर सकती है? मेरे पांव में फ्रेक्चर के वक़्त, मेरी बाइपास सर्जरी के वक़्त प्रभा ने कैसे मेरी सेवा में दिन-रात एक कर दिया था? मैं तुरंत सफ़ाई में जुट गया. जल्दी-जल्दी बाहर आया, तब तक तुम निकल चुके थे.”
मनमोहन सर से विदा लेकर लौटते वक़्त न केवल पराग के मन में उनके प्रति पनपा भ्रम दूर हो चुका था, बल्कि उसका ज़िंदगी को देखने का नज़रिया भी पूरी तरह बदल चुका था.
ऑफ़िस के उसके सीनियर्स इतने बुरे नहीं हैं. काम भरपूर लेते हैं, पर उसका रिवॉर्ड भी तो देते हैं. अभी पिछले सप्ताह कंपनी के डायरेक्टर ने कंपनी के होनहार कर्मचारियों की सूची मांगी, तो दोनों सीनियर्स ने एकमत होकर सबसे पहले उसका नाम लिया था और उसे वेतनवृद्धि मिली थी… मकान मालिक भी उसके हित में ही तो टोका-टोकी करते हैं. फिर उसका ख़्याल भी तो कितना रखते हैं. आंटी जब तब कुछ न कुछ खाने बुला लेती हैं. मनमोहन सर अप्रत्यक्ष में ही सही, पर एक बार फिर उसके लिए आदर्श बन गए थे. पराग को ज़िंदगी बेहद हसीन और ख़ूबसूरत नज़र आने लगी थी.

– अर्णिम

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कहानी- लाइफ बाई चॉइस बनाम बाई डिफॉल्ट (Short Story- Life By Choice Banam By Default)

दरअसल, समस्या व़क्त की नहीं है, न ही उम्र की है. समस्या है अपने भीतर पैदा हुए नश्‍वरता के एहसास की. हर वह चीज़, जो किसी व़क्त जान से भी अधिक प्यारी और क़ीमती होती है, व़क्त बीतने के साथ न जाने कैसे अपने आप वह मिट्टी हो जाती है. वह चाहे जज़्बात हों, सामान हों या रुपए-पैसे.

Hindi Kahani

ज़िंदगी क्या है कोई चाके कफ़न है यारों, उम्र के हाथों जिसे चुपचाप सिये जाते हैं…

उसने एक बार फिर से रिपीट कर ग़ज़ल की लाइनें सुनीं.  क्या सचमुच बस इतनी ही है ज़िंदगी या फिर हम ज़िंदगी को इतना ही जानते हैं. 50-55 साल की उम्र गुज़रने के बाद अगर कोई महसूस करने लगे कि वह उम्र से परे जा चुका है… जीते जी अपने होने के एहसास से बाहर है… किसी ख़्वाबों-ख़्यालों की दुनिया में जी रहा है या फिर निराशा की पराकाष्ठा पर खड़ा है, तो उसे ज़िंदगी कौन दे पाएगा? कहने का अर्थ यह कि जब किसी के जीने की इच्छा ही ख़त्म हो जाए, तो उसे कौन-सी दवा, कौन-सा डॉक्टर ज़िंदा रख पाएगा.

छीन ली व़क्त ने उल्फ़त के ग़मों की दौलत, खाली दामन है, वही साथ लिए जाते हैं…

क्या फ़लसफ़ा है प्यार में मिले ग़म ज़िंदगी की दौलत की तरह हैं और कमाल की बात यह कि इन्हीं ग़मों के सहारे ज़िंदगी कट रही है. समय ने मेमोरी डिलीट करके ग़मों की दौलत तक छीन ली है.

रोज़ एक सुबह और फिर किसी शाम का गुज़र जाना ज़िंदगी है, तो फिर ये ज़िंदगी कौन-सी ज़िंदगी है…

तभी तो कहते हैं कि ज़िंदगी कुछ भी नहीं, फिर भी जीए जाते हैं, तुझ पे ऐ व़क्त हम एहसान किए जाते हैं…

माय गॉड! जहां इंसान एक-एक मिनट जीने को तड़प रहा है, वहां किसी के लिए जीना व़क्त पर एहसान करने के समान है, तो कहीं न कहीं कुछ तो छुपा है उसकी ज़िंदगी के दामन में. क्या सचमुच ज़िंदगी का दामन इतना छोटा है कि उसमें स़िर्फकांटे ही कांटे हों. वह सोचने लगा ज़िंदगी बाई चॉइस है या बाई डिफॉल्ट है, क्योंकि किसी ने लिखा है… लाई हयात आए, कजा ले चली चले, अपनी ख़ुशी से आए न अपनी ख़ुशी चले.

कहने का अर्थ यह कि इस धरती पर आना और जाना हमारी चॉइस नहीं है. वह बाई डिफॉल्ट है. इसे हम चुन नहीं सकते और इस आने-जाने के बीच जो है, वही तो उम्र है.

व़क्त और उम्र में फ़र्क़ है. कुछ लोग व़क्त के गुज़र जाने को उम्र की तरह देखते हैं और जन्मदिन मनाते हुए बोलते हैं कि इस धरती पर 25 साल का व़क्त गुज़र गया और यह मेरी लाइफ की सिल्वर जुबली है.

इसी तरह गोल्डन और प्लैटिनम जुबली भी होती है. व़क्त का क्या है, लोग वेडिंग ऐनिवर्सरी से लेकर अपनी शॉप के 10 साल और 20 साल होने का जश्‍न भी मनाते हैं. कई संस्थाएं अपनी स्थापना के 30 वर्ष और 40 वर्ष का उत्सव मनाती हैं. ढेरों कार्यक्रम होते हैं, उपहार बांटे जाते हैं, पार्टी होती है और लोग ऐसे उत्सव को वर्षों याद रखते हैं, लेकिन यह व़क्त उम्र नहीं है.

किसी की ज़िंदगी का 20 से 30 साल का 10 वर्ष का व़क्त और उसी की ज़िंदगी का 50 से 60 साल का और फिर 70 से 80, 80 से 90 साल का व़क्त गिनती में भले ही 10 साल हों, पर हर 10 साल ज़िंदगी के हर पड़ाव पर अलग-अलग होता है.

जब हम ख़्वाबों में खो सकते हैं, गाने सुन सकते हैं, फिल्म देख सकते हैं, नाम और शोहरत के पीछे पागल हो सकते हैं… उस व़क्त के 10 साल कब, कहां और कैसे खो जाते हैं, पता ही नहीं चलता. लेकिन वही 10 साल का व़क्त तब बहुत बड़ा हो जाता है, जब उम्र अधिक हो जाए. जब व्यक्ति को जीवन की सच्चाई का बोध हो जाए, तब यही 10 साल बहुत लंबे हो जाते हैं.

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दरअसल, समस्या व़क्त की नहीं है, न ही उम्र की है. समस्या है अपने भीतर पैदा हुए नश्‍वरता के एहसास की. हर वह चीज़, जो किसी व़क्त जान से भी अधिक प्यारी और क़ीमती होती है, व़क्त बीतने के साथ न जाने कैसे अपने आप वह मिट्टी हो जाती है. वह चाहे जज़्बात हों, सामान हो या रुपए-पैसे. दर्द तो यह है कि हमारे अपने ख़्याल भी अपने नहीं रह जाते, उनसे भी लगाव ख़त्म-सा हो जाता है.

वो गाड़ी-बंगला, नौकर, आलमारी में भरे कपड़े, ढेर सारे काग़ज़, बैंक व लॉकर के पेपर सब निरर्थक हो जाते हैं. यह जो बिस्तर है, टीवी, फ्रिज, मेल आईडी, इंटरनेट, ख़बरें… अपने आस-पास बिखरी दुनिया आख़िर क्या है यह सब? सब का सब तो निरर्थक है. हां, मोह तो शरीर का भी छूट जाता है. आख़िर जितना लंबा यह शरीर चलेगा, उतनी ही इसे फिट रखने की मांग होगी. दवा-दारू, सेवा सब तो इसी शरीर के लिए चाहिए और इस शरीर में बचा क्या है?

अजीब बात है. एक तरफ़ सच का बोध होता है और दूसरी तरफ़ ज़िंदगी जीना दूभर हो जाता है. उम्र बढ़ने के साथ सांसारिकता और जीवन की नश्‍वरता जैसे जीने के सभी कारण समाप्त कर देती है और जीवन जैसे स्वयं ही अवसान की बाट जोहने लगता है. अर्थ यह कि अब यह जीवन किसलिए? क्या है इसके चलते रहने की सार्थकता? बस,  किसी अनजान अनकहे लम्हे का इंतज़ार. उसकी आवाज़ नीम बेहोशी और चिंतन से गुज़रते हुए कब चेतना से मुखातिब हो गई उसे पता नहीं चला. वह उधेड़बुन में था कि अचानक उसे अपने आस-पास कोई शोर  महसूस हुआ.

“डॉक्टर-डॉक्टर, पेशेंट नंबर नाइन को होश आ गया है…”

वह चौंका! पेशेंट नंबर नाईन… यह कौन है?

तभी सचमुच उसे होश आया. उस ने ख़ुद को देखा. यह क्या? वह तो किसी अस्पताल के बेड पर पड़ा है. उसका सिर दर्द से फटने लगा. उसे कुछ समझ में नहीं आया वह यहां कैसे?

वह तो अकेला रहता है और आख़िरी बात जो उसे याद थी, वह यह कि वह अपने डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करने बैठा था.

इससे पहले कि वह कुछ और समझता बेटे ने क़दम रखा, “पापा, अब कैसी है आपकी तबीयत?”

एक बेहद मज़बूत आदमी आसक्त-सा बिस्तर पर निढाल पड़ा क्या जवाब देता?  अभी तो ‘उसे’ अपने सवालों के जवाब चाहिए थे.

तभी देखा, तो शिबी दौड़ते हुए आई और हाथ पकड़कर बोली, “दादू… दादू, मेरे साथ खेलो ना. पापा मुझे आने नहीं दे रहे थे. कह रहे थे दादू बीमार हैं, अभी नहीं खेलेंगे. दादू आप पापा को बताओ आप बीमार नहीं हो, आप मेरे साथ खेलोगे. मैं आपके साथ खेलने ही तो आती हूं यहां.” इतना कहकर वह रोने लगी.

उसे समझ नहीं आया कि वह पहले इन मासूम सवालों के जवाब दे या अपने सवालों के जवाब ढूंढ़े.

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तभी डॉक्टर गोखले ने प्रवेश किया. नर्स ने ब्लड टेस्ट, बीपी, शुगर की रिपोर्ट रख दी. कुछ देर देखने और हार्ट बीट चेक करने के बाद वे बोले, “हाउ आर यू फीलिंग सर?”

अब शायद उनके बोलने का नंबर आ गया था. “अभी तो ठीक फील हो रहा है, पर मैं यहां कैसे डॉक्टर? और मुझे हुआ क्या है?”

डॉक्टर हंसे. “कुछ नहीं, बस एक माइल्ड अटैक था, पर अब चिंता की कोई बात नहीं है, सब नॉर्मल है. बीपी, शुगर और हार्ट बीट. हां, बस दो-तीन दिन ऑब्ज़र्वेशन में रखकर छुट्टी दे देंगे.

अब आप रेस्ट कीजिए और रिलैक्स, आपको कुछ नहीं हुआ है. उस दिन आपकी शुगर हाई हुई और ब्लड प्रेशर लो हो गया था. शायद आप अपनी रेग्युलर मेडिसिन नहीं ले रहे थे.”

यह तो डॉक्टर का जवाब था. अभी भी उनके सवाल वहीं खड़े थे. आख़िर वह यहां तक आए कैसे? वे तो घर में अकेले थे, फिर उन्हें ऐन वक़्त पर यहां कौन लाया? बेटे को उनकी ख़बर किसने दी, वह भी बिना समय गंवाए? और यह शिबी, जो दादू… दादू… करते हाथ पकड़े रोए जा रही है, यह यहां कब और कैसे पहुंची?

फिर ख़्याल आया, सचमुच अगर मुझे कुछ हो जाता, तो शिबी का क्या होता? यह दादू को इतना प्यार करती है… हमें कभी पता ही नहीं चला.

इससे पहले कि वे कुछ और सोच पाते, सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड को देख चौंक गए, “तुम भी यहां हो?”

वह बोला, “बाबूजी, हम ही तो आपको यहां लाए आप जब बेहोश हुए, तो भइया का फोन आया कि मास्टर की से डोर खोल आपके पास पहुंचे. एंबुलेंस आ रही है. बाबूजी को अस्पताल भेजकर मुझे ख़बर करो, मैं रात तक आ रहा हूं, फ्लाइट में इतना टाइम लग जाएगा, बस तब तक तुम ध्यान रखना.

इतना सुनते ही उनकी आंखों में आंसू आ गए. वे सोचने लगे… ‘ज़िंदगी वाकई बाई डिफॉल्ट है, बाई चॉइस नहीं’ न ही मौत ‘बाई चॉइस’ है. वह बेटा, जिसे वे सोचते थे कि उसे किसी की परवाह ही नहीं है, वह बस अपनी दुनिया और जॉब में खोया रहता है. उन्हें आज एहसास हो रहा था कि इतनी दूर रहकर भी वह उनके कितना क़रीब है. यह अलग बात है कि इसका उन्हें पता ही नहीं था.

इससे पहले कि रघुवीर सहाय कुछ और बोलते, शिशिर बोला, “पापा, हम आपको  ऐसे नहीं जाने देंगे. वैसे भी अभी आपकी उम्र ही क्या है 65… आपके बिना  हमारी सफलता और संपन्नता के क्या मायने हैं. आपकी ज़िंदगी बहुत क़ीमती है, इसकी क़ीमत आप क्या समझेंगे. यह जानना है, तो शिबी से पूछिए, जो रात-दिन ‘दादू-दादू’ करती रहती है.

पापा, टेक्नोलॉजी, नौकरी और व़क्त हमसे साथ रहने का अधिकार छीन सकती है. संस्कार नहीं. भौतिक संपन्नता की मांग ने जहां हमें अपनों से दूर रहने को मजबूर किया है,  काम के दबाव ने जहां हमें पहले की तरह ढेर सारी बातें करने और गप्पे मारने से दूर कर दिया है, वहीं इस टेक्नोलॉजी ने हमें बहुत कुछ दिया भी है.

हां, हम कुछ कह नहीं पाते, तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम मशीन हैं. हमारे सीने में भी दिल है. हमारे भीतर भी वैसे ही जज़्बात पलते हैं, जैसे आपके भीतर. बस, हम आपकी तरह व्यक्त नहीं कर पाते.

रात-दिन कंप्यूटर, लैपटॉप और  मोबाइल से जुड़े रहने का यह अर्थ नहीं कि हम आपसे जुड़े हुए नहीं हैं. ना ही आपके पास न रह पाने का यह अर्थ है कि हमें आपकी चिंता नहीं है.

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रोज़ ऑफिस में मैं लंच से पहले घर की सीसीटीवी फुटेज में देखता हूं और उस दिन जब आप बेहोश हुए, तो तुरंत मैंने सिक्योरिटी गार्ड को मास्टर की के साथ भेज दिया, जो मैंने किसी इमर्जेंसी के लिए सोसायटी में दे रखी थी.

आज कहीं से भी एंबुलेंस भेजी जा सकती है. सिक्योरिटी गार्ड और एंबुलेंस  के सही मेल ने आपको व़क्त पर मेडिकल सुविधा दिला दी. रही फ्लाइट, तो आजकल कहीं भी आना-जाना बहुत आसान हो गया है.” इतना सुनते ही रघुवीर सहाय न जाने कब फिर चिंतन की दुनिया में खो गए.

‘पता नहीं कब और कैसे हम ख़ुद-ब-ख़ुद अपने ख़्यालों की दुनिया में सिमटते चले जाते हैं. ख़ुद ही अपने लिए दायरे बना लेते हैं कि इस उम्र के बाद यह कपड़े नहीं पहनने हैं, यहां नहीं जाना है, यह नहीं खाना है, हंसना नहीं है, सीरियस रहना है. बस, हमउम्र लोगों से ही मिलना है, यह नहीं सोचना है और न जाने क्या-क्या… इसी सोच में कि किसे क्या अच्छा लगेगा… क्या बुरा लगेगा… इसी  उधेड़बुन में पड़े रहते हैं… न जाने कब और कैसे हम सोच लेते हैं कि हमारे अपनों को हमारी ज़रूरत नहीं रही.’

बड़ी बारीक़ लाइन है दुनिया ने हमें छोड़ दिया है या हमने दुनिया को अर्थात् हम ख़ुद ही अपने विचारों में बंधकर इस ख़ूबसूरत दुनिया की सुंदरता और अपने क़रीबी रिश्तों को भूलते और छोड़ते चले जाते हैं. हां, अपनी सोच को तर्क में भरने के लिए हमने मनगढ़ंत भ्रम पाल लिए हैं कि दुनिया हमें छोड़ रही है.

और जैसे ही शिशिर ने कहा, “पापा, आपको कुछ हो जाता, तो हम तो कहीं के नहीं रहते. आपको क्या पता कि आपके इमोशनल सपोर्ट की मेरी ज़िंदगी में कितनी क़ीमत है…” इतना कहते-कहते जहां शिशिर की आंखें छलछला आईं, वहीं रघुवीर सहाय की आंखों से भी झर-झर आंसू बहने लगे. सचमुच चार आंखें और दो दिल ख़ामोशी से रोए जा रहे थे. किसी के पास अब कहने को कुछ नहीं था और न ही ज़िंदगी की सार्थकता को लेकर कहीं कोई प्रश्‍न बचा था.

Murli Manohar Shrivastav

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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कहानी- होली की गुझिया (Short Story- Holi Ki Gujhiya)

क़रीब 10 बजे गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ पर वह बाहर आई, तो “हैप्पी होली” के समवेत स्वर के साथ सास-ससुर आते दिखाए दिए. पैर छूती तूलिका को सास ने गर्मजोशी से बांहों में भर लिया. ससुर ने स्नेहजनित आशीर्वाद भरा हाथ उसके सिर पर रखा. परदेस में सहसा अपने देश की महक उसे भली लगी कि तभी उसकी नज़र समीर को ढ़ूंढ़ने लगी, फिर समीर को देख वह हर्षमिश्रित विस्मय से चिल्ला पड़ी.

Holi Story

‘’तूलिका, तुम यहां समंदर के किनारे आराम से  बैठो, मैं डियर आयलैंड और गैब्रियल आयलैंड का टिकट लेकर ट्रैवल एजेंसी से पता करता हूं कि मम्मी-पापा को कहां-कहां घुमाया जा सकता है.” समीर अपने मम्मी-पापा के मॉरिशस आने पर बहुत उत्साहित नज़र आ रहे थे. शीघ्रता से वह जेटी की ओर बढ़ गए.

तूलिका समंदर के किनारे बैठकर लहरों का आना-जाना देखने लगी. मॉरिशस में समंदर का नीला पन्ने-सा हरा रंग उसे बहुत भाता है. समीर के साथ अक्सर यहां आकर घंटों बैठती है. किस व़क्त लो टाइड-हाई टाइड होगा, उसे पता है. क़रीब आधे घंटे बैठने के बाद उसने महसूस किया कि समंदर की लहरें रफ़्ता-रफ़्ता आगे बढ़ने लगी थीं. आस-पास की गीली रेत को देख मन गीला-गीला-सा होने लगा था.

बीते रविवार की बात मन-मस्तिष्क में घूमने लगी. जब वह सुबह-सुबह  समीर के साथ बैठी इत्मिनान से चाय की चुस्कियां भर रही थी. उस व़क्त उसके मुंह से निकला, “समीर, होली आनेवाली है. काश! हम शादी के बाद की पहली होली इंडिया में मनाते… सच घर की बहुत याद आ रही है.” उसकी बात पर समीर कुछ मौन के बाद बोले, “तूलिका, होली के एक दिन पहले मम्मी-पापा यहां आएंगे…”

सास-ससुर  के अप्रत्याशित आगमन की ख़बर सुनकर वह चौंकी, तो समीर कहने लगे, “सोचा था तुम्हें सरप्राइज़ दूंगा, पर तुम पहले भी कई बार होली पर इंडिया जाने की बात कह चुकी हो, तो रहा नहीं गया, इसलिए बता दिया.” यह सुनकर वह आश्‍चर्य से बोली, “मम्मी-पापा के आने का प्रोग्राम कब बना? तुम पहले से जानते थे क्या?”

“अरे! अब मॉरिशस का प्रोग्राम अचानक तो नहीं ही बनेगा, क़रीब एक-दो महीने पहले ही मुझे पता चला.”

“वाह! और तुम मुझे अब बता रहे हो. अरे! इसमें सरप्राइज़ जैसा क्या था.

मम्मी-पापा अचानक मॉरिशस आ जाते, तो मेरे लिए कितनी अजीब सिचुएशन होती.” बेसाख़्ता उसके मुंह से निकला, तो समीर अटपटाकर कहने लगे, “अरे! मैं तो सोच रहा था कि मम्मी-पापा के आने की बात सुनकर तुम ख़ुशी से उछल पड़ोगी, पर तुमने तो बड़ा ठंडा रिस्पॉन्स दिया.”

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“अरे नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. अब अचानक किसी के आने की ख़बर दोगे, तो थोड़ी हड़बड़ाहट तो होगी न.” तूलिका के कहने पर समीर बोले, “जानती हो, हमारी शादी के पहले मैंने उन्हें कई बार मॉरिशस घूमने आने के लिए कहा, पर वो नहीं आए और अब देखो अपनी बहूरानी के साथ होली खेलने की इच्छा उन्हें मॉरिशस खींच लाई. वो दोनों बड़े उत्साह से यहां आ रहे हैं होली मनाने, ये हमारे लिए बहुत बड़ी बात है.”

समीर की बात पर वह संभलकर बोली, “वो तो ठीक है, पर सोचो, तुम्हारे सरप्राइज़ के चक्कर में मेरे इम्प्रेशन की तो बैंड बज जाती. मम्मी-पापा पहली बार घर आते और मैं उन्हें आठ बजे तक सोती मिलती, घर अस्त-व्यस्त मिलता, तो वो यही कहते कि उनकी बहू को घर संभालना भी नहीं आता. आज पूरा दिन साफ़-सफ़ाई में लगना मेरे साथ.”

यह सुनकर समीर अदा से बोले, “आज बंदा आपकी सेवा में सहर्ष तत्पर है.”

पति-पत्नी के बीच हल्के-फुल्के ढंग से बात का समापन हो गया, पर तूलिका का मन न जाने क्यों होली के अवसर पर सास-ससुर के आने को लेकर असहज था.

उसे याद आया कि कुछ दिनों पहले उसने होली पर अपने मायके जाने की बात कही, तो समीर तनाव में आ गए. फिर उसे भारत जाने से ये कहकर रोक लिया कि ऑफिशियल कमिटमेंट के कारण मैं तो भारत जा नहीं सकता, फिर तुम क्या अकेले जाओगी. वो भी होली पर… मुझे अकेले छोड़कर होली का त्योहार मनाना अच्छा लगेगा तुम्हें? तुम्हें रंग लगाए बिना मेरी होली तो फीकी रह जाएगी.”

उसके प्रेम के वशीभूत भावुकतावश उसने आगरा जाना टाल दिया, पर अब वह समझ पा रही थी कि यकीनन सास-ससुर के मॉरिशस आने के कार्यक्रम की वजह से उसने उसे मायके जाने से रोका होगा.

और तो और समीर ने सास-ससुर को घुमाने के लिए हफ़्ते-दस दिन की छुट्टी के लिए भी अप्लाई कर दिया. सास-ससुर किसी और समय मॉरिशस आते, तो वह उत्साह से भर जाती, पर मायके में होली न मनाकर यहां सास-ससुर के स्वागत के निहितार्थ उसका रुकना मन को बुझा गया.

दो-तीन दिन तक सास-ससुर कहां-कहां घूमेंगे, खाने में किस दिन क्या-क्या पकेगा, बाहर कहां क्या खाएंगे… होली के एक दिन पहले वे आ रहे हैं, तो होली में क्या पकवान बनेंगे, इस पर चर्चा होती रही. चर्चा के बीच एक दिन समीर ने उत्साह से उससे पूछा, “तूलिका, तुम्हें गुझिया बनानी आती है?”

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यह सुनकर तूलिका ने थोड़ी मायूसी से कहा, “नहीं.”

“अरे यार! होली में गुझिया नहीं बनेगी, तो मज़ा ही नहीं आएगा.” एक लंबी सांस लेते हुए समीर ने कहा, तो तूलिका ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. समीर फिर बोले, “चलो कोई बात नहीं. मम्मी से गुझिया बनवाऊंगा. तुम्हें पता है, मम्मी बहुत अच्छी गुझिया बनाती हैं. वह खोए में ड्रायफ्रूट, किशमिश डालती हैं. सच में मज़ा आ जाता है उनके हाथ की गुझिया खाकर, आह!.. याद करके ही मुंह में पानी आ गया.”

यह सुनकर तूलिका तपाक से बोली, “गुझिया तो मेरी मम्मी भी बहुत स्वादिष्ट बनाती हैं. उनके हाथ की गुझिया खाओगे, तो सब भूल जाओगे. वह  खोए में नारियल-चिरौंजी डालकर ऐसी स्वादिष्ट गुझिया बनाती हैं कि सालभर तक उसका स्वाद ज़ुबां से जाता नहीं है. पर क्या कहूं, इस साल मैं उनके हाथ की गुझिया और आगरा की होली बहुत मिस करूंगी.”

यह सुनकर समीर गंभीर हो गए. उसे भी सहसा भान हुआ कि यूं सास और मां में तुलना करके उसने सही नहीं किया.

एकबारगी उसे अफ़सोस हुआ, पर वह भी क्या करती, जाने-अनजाने वह मायके-ससुराल की तुलना पर मायके को श्रेष्ठतर बताकर ही चैन लेती.

लहरों के स्वर अब तेज़ हो गए थे. उन्होंने सोच-विचार में खोई तूलिका का ध्यान अपनी ओर एक बार फिर आकर्षित किया. तूलिका ने नज़र भरकर समंदर पर दृष्टि डाली…  फिर समय देखा एक घंटा व्यतीत हो गया था, पर समीर अभी तक नहीं आए. बनस्पत समंदर अब पास आ गया था, इसका अंदाज़ा चट्टानों को देखकर लगाया जा सकता था. कुछ देर पहले जो चट्टानें दिख रही थीं, वे अब समंदर में डूबने लगी थीं.

विचारों ने फिर रफ़्तार पकड़ी. क़रीब छह महीने पहले तक वह भी तो इन चट्टानों की भांति शादी न करने का संकल्प लिए अटल थी, पर एक तरफ़ उसके माता-पिता शादी के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे थे, तो दूसरी तरफ़ समीर अपने प्यार की लहरों से उसके संकल्पों को डुबोने का प्रयास कर रहे थे. आख़िरकार तूलिका को मनाने में वह सफल हुए. समीर ने उससे कहा, “इकलौती संतान होने के कारण मैं तुम्हारे पैरेंट्स के प्रति तुम्हारी सोच और कमिटमेंट्स को समझता हूं. मैं भी फैमिली ओरिएंटेड पर्सन हूं. तुम्हारे पैरेंट्स मेरे भी पैरेंट्स होंगे.”

समीर की समझदारी भरी बातों पर रीझकर उसके  प्यार और विश्‍वास पर भरोसा करके उसने शादी के लिए ‘हां’ कर दी.

पर आज अपनी उस ‘हां’ पर उसे चिंता हो रही है. वह तो उसके मायके को हाशिये पर छोड़कर अपने पैरेंट्स को घुमाने-फिराने और त्योहार मनाने की योजनाएं बना रहा है. इस विचार की गड़ी फांस रह-रहकर मन में टीस उठाती रही. नीले समंदर ने धीरे-धीरे समस्त चट्टानों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था. तूलिका अब

बेचैनी-से समीर के आने का इंतज़ार करने लगी. कुछ ही देर में समीर आते दिखाई दिए. आते ही उन्होंने पूरे उत्साह से बताया कि वे ट्रैवल एजेंसी से सारी जानकारी जुटा लाए हैं और फेरी वगैरह के टिकट भी ले आए हैं. वीकेंड होने की वजह से आज वहां काफ़ी भीड़ थी, इसलिए देर हुई.

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देखते-देखते होली क़रीब आ गई और साथ ही सास-ससुर के मॉरिशस पहुंचने की घड़ी भी. सुबह-सुबह उठकर उसने रसोई की सारी व्यवस्था देखी, फिर चाय का कप लेकर बालकनी में आ बैठी. मन मायके की उस देहरी पर चिड़िया-सा फुदकता जा बैठा, जहां इस व़क्त गुझियों की सुगंध फैली हुई थी. वह आनेवाली होली में खुली आंखों से देखे दृश्य में अपने पापा को अबीर-गुलाल को कटोरियों में सजाए बैठे देख पा रही थी. मां ने चिप्स, पापड़, नमकीन, मठरी जाने क्या-क्या प्लेट में सजाकर रखा था.

तूलिका की आंखों के सामने वे दिन घूम गए, जब उसके पापा बाल्टी में रंग घोलकर उसके लिए रखा करते थे और वह अपनी पिचकारी भरकर रंगों भरी बाल्टी खाली कर देती थी. सहेलियों का हुजूम इकट्ठा होता था. पूरा आंगन गीला हो जाता था, मां रेफरी की तरह यहां-वहां रंग न गिराने की सबको हिदायत देतीं, पर उनकी कोई नहीं सुनता था. और तो और मां को भी घेरकर लाया जाता. पापा उन पर रंग डालते, तो वह बड़बड़ाती फिर पापा से रंग छीनकर उन्हें रंग लगाने का प्रयास करतीं. होली का हुड़दंग सबको रंगों से सराबोर कर देता.

वह जानती थी कि कल सब उसे बहुत मिस करेंगे. उसने तो मां से कहा भी था कि वह होली पर आगरा आना चाहती है, पर मां ने बड़प्पन दिखाते हुए उसे पति के संग वहीं रहकर होली मनाने की सलाह दे डाली.

वह अंदाज़ा लगा रही थी कि आगरा में उसकी अनुपस्थिति में कैसी होली मनेगी. शगुन के तौर पर मां-पापा एक-दूसरे को अबीर-गुलाल का टीका लगाकर एक-दूसरे को गुझिया खिलाकर होली की रवायत पूरी कर लेंगे.

तूलिका का मन अपने माता-पिता से बात करने के लिए सहसा छटपटाया, तो वह बात करने के लिए अपना फोन लेने उठी कि तभी समीर ने उसके दोनों गालों में रंग मल दिया. वह अचानक किए गए इस हमले के लिए तैयार नहीं थी, इसलिए अचकचाकर अपने चेहरे से गुलाल झाड़ते हुए कहने लगी, “अभी तो पूरे घर की सफ़ाई की है और तुम गंदा करने चले आए. और होली आज नहीं, कल है. अभी से परेशान मत करो प्लीज़.”

समीर ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा, तो उसे उसकी आंखों में नमी दिखाई दी. समीर ने परेशान होकर उसके माथे को छूकर पूछा, “‘क्या हुआ तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न? इतनी उदास-सी क्यों दिख रही हो.” तूलिका कुछ अनमनी होकर वहां से जाने लगी, तो समीर उसका रास्ता रोककर कहने लगा, “माना होली कल है, पर तुम्हें रंग आज इसलिए लगा दिया कि कल कहीं मुझसे पहले कोई और रंग न लगा दे. अरे यार, थोड़ा-सा मुस्कुरा दो वरना…”  बात अधूरी छोड़कर वह चुप हो गया.

“थोड़ा मुस्कुरा दो, वरना मेरी पेशी हो जाएगी.” यह वाक्य अक्सर वह अपने पैरेंट्स की मौजूदगी में कहता है और सच भी है. मज़ाक में भी वह अपने सास-ससुर से समीर की शिकायत कर दे, तो वह अपने बेटे की अच्छी क्लास ले लेते हैं.

सास-ससुर से तूलिका को भरपूर प्यार मिला, इसमें दो राय नहीं थी, फिर भी आज उनके आगमन पर उसके मन में नैराश्य पनपना निस्संदेह ग़लत था. उसके उदास होने की पृष्ठभूमि में मायके जाकर होली न मना पाने का मलाल  था, पर इन सबमें उनका क्या दोष. 10-15 दिनों में वह यहां के अनुभव लेकर चले जाएंगे. नहीं-नहीं, अपनी उदासीनता-खिन्नता से वह त्योहार को फीका नहीं कर सकती और बहुत-से त्योहार आएंगे अपने माता-पिता के संग मनाने के लिए. पूरी ताक़त से उसने नैराश्य को मन से उखाड़ फेंका. नए सकारात्मक विचार की सहसा चली हवा  पूर्वाग्रह के बादल ले उड़ी. अपने उदासीन व्यवहार का संज्ञान लेते हुए वह मुस्कुराकर समीर के हाथों से रंग लेकर उसी को लगाते हुए बोली,  “हैप्पी होली.”

कुछ देर बाद समीर अपने पैरेंट्स को लेने एयरपोर्ट चले गए. वह तैयार होकर नाश्ते-खाने की व्यवस्था देखने लगी. क़रीब 10 बजे गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ पर वह बाहर आई, तो “हैप्पी होली” के समवेत स्वर के साथ सास-ससुर आते दिखाए दिए. पैर छूती तूलिका को सास ने गर्मजोशी से बांहों में भर लिया. ससुर ने स्नेहजनित आशीर्वाद भरा हाथ उसके सिर पर रखा. परदेस में सहसा अपने देश की महक उसे भली लगी कि तभी उसकी नज़र समीर को ढ़ूंढ़ने लगी, फिर समीर को देख वह हर्षमिश्रित विस्मय से चिल्ला पड़ी. समीर गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे तूलिका के मम्मी-पापा को उतरने में मदद कर रहे थे.

तूलिका की सास तूलिका के मां-पापा की ओर इशारा करते हुए बोली, “तूलिका, तुमसे बार-बार पूछा कि उपहार में क्या लाएं, पर तुमने तो बताया ही नहीं, इसलिए हम ख़ुद ही सरप्राइज़ ले आए…”

तूलिका को भौंचक्का देखकर ससुरजी कहने लगे, “हम सब नए साल में आना चाहते थे, पर तुम्हारे मां-पापा का वीज़ा तैयार नहीं था, तो सोचा चलो, होली ही मना आएंगे बच्चों के साथ.”

“कैसा रहा सरप्राइज़?”

सहसा समीर ने प्यार से तूलिका का हाथ थामते हुए प्रश्‍न किया, तो जवाब में उसने भावविह्वल मुग्ध नज़रों से निहारकर धीमे से उसकी हथेलियों को दबा दिया.

“पापा, आपके आने का प्रोग्राम कब बना?” एकांत पाते ही तूलिका ने पूछा, तो वह हंसकर कहने लगे, “अचानक तो नहीं बना. तुम्हारे ससुरालवाले तुम्हें सरप्राइज़ देना चाहते थे, सो चुप रहना मुनासिब समझा.”

“हां तूलिका, समीर और तुम्हारे सास-ससुर  की वजह से संभव हो पाया है यहां आना. मुझे तो जानती ही हो, तीज-त्योहार में घर छोड़कर कहीं आती-जाती नहीं, पर तुम्हारे ससुरालवालों ने घेराव करके मनाया कि जहां बच्चे, वहीं त्योहार. तुम्हारे पापा भी जोश में आ गए और देखो होली मनाने मॉरिशस चले आए.”

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अपनी मां के कहने पर तूलिका आश्‍चर्य से बोली, “मैं तो आगरा आने को बोल रही थी, तब भी नहीं बताया.”

“इसीलिए तो तुझे रोका. जो तू आगरा आ जाती, तो हम यहां कैसे आ पाते? पर सच कहूं, इन दो-तीन महीनों तक अपने आने की बात तुझसे छिपाना बड़ा कठिन काम रहा.” यह कहकर मां-पापा हंसने लगे. अपने साथ मां-पापा को यूं उल्लासित पाकर वह आह्लादित थी.

यकीनन ये कार्यक्रम तीन-चार महीनों से बन रहा होगा, इसीलिए उसे भारत जाने से रोका समीर ने. यह सोचकर अथाह प्यार और आदर उमड़ आया अपने जीवनसाथी के प्रति.

पूरे घर में अनोखी रौनक़ थी. सबके व्यवस्थित होने के बाद वह समीर के पास आई. पत्नी के चेहरे के भाव पढ़कर वह नाटकीय अंदाज़ में बोला, “थैंक्यू मत बोलना. वो तो तुम्हें प्रूव करना था कि मेरी मम्मी तुम्हारी मम्मी से ज़्यादा स्वादिष्ट गुझिया बनाती हैं. अब तुम तो मानने को तैयार थी नहीं, इसलिए हाथ कंगन को आरसी क्या. दोनों को यहीं बुला लिया.”

“अरे चलो, ये बात तो महज़ चार दिन पहले हुई है. क्या मैं जानती नहीं कि तुरत-फुरत ऐसे कार्यक्रम नहीं बनते हैं, पर एक बार को तुम्हारी बात मान भी लूं तो भी…” तूलिका रसोईं की ओर इशारा करते फुसफुसाई, “तुम्हारा ये प्रयास तो बेकार गया… वो देखो… मेरी सास और तुम्हारी सास मिलकर गुझिया बना रही हैं, इसलिए गुझिया में नया स्वाद होगा… और हां… कल सबसे पहले तुमसे रंग लगवाऊंगी, ये मेरा वादा है.”

त्योहार की चहल-पहल में लगा ही नहीं कि वे भारत में नहीं हैं. नवदंपत्ति बड़े-बुज़ुर्गों की स्नेह छाया में निश्‍चिंतता और उत्साह के साथ त्योहार की तैयारियों में जुटे थे. घर में गुझियों की महक फैलने लगी थी. इस बार की गुझियों में वाक़ई नया स्वाद था. उसमें किशमिश-चिरौंजी-ड्रायफ्रूट और नारियल सब डाले गए थे.

रिश्तों की मिठास में पकी गुझिया स्वादिष्ट और सालोंसाल तक याद की जाने लायक बनी थी. आपसी समझ के रंग शरीर के साथ मन को भी सराबोर कर गए थे.

Minu tripathi

      मीनू त्रिपाठी

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कहानी- अंतिम अध्याय (Short Story- Antim Adhyay)

यदि इश्क़ छुपाना कठिन है, तो उसका इज़हार कर पाना भी आसान नहीं होता. लेकिन प्यार मौन और अनकहा रहकर भी उतना ही सच्चा हो सकता है और शब्दों में बंधे बिना भी व्यक्त हो जाता है. अमृता तो मन की बात समझ लेने में यूं भी माहिर थी.

बाद में जो कुछ हुआ, वह उसके बस में नहीं था. हमने अपने प्यार का इज़हार शब्दों में किया होता, तो भी क्या कर लेती वो? हमारे जीवन में प्रारब्ध का कितना हाथ है यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन हाथ की लकीरों में लिखा रहता हो या फिर माथे की, नियति अपना खेल दिखाती अवश्य है.

Short Story

बहुत अंतर था गांव और शहर के जीवन में. परंतु गांव का स्कूल दसवीं कक्षा तक ही था. उस वर्ष मामा जब मां से राखी बंधवाने आए, तब बोले, “बहुत मेधावी है तुम्हारा बेटा. इसे मेरे साथ शहर भेज दो. पढ़-लिखकर कुछ बन जाएगा, तो मुझे इस बात की संतुष्टि होगी कि मैं तुम्हारे लिए कुछ कर पाया.”

यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे जितने अच्छे मामा मिले थे, उतनी ही अच्छी मामी भी थीं, जिन्होंने मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया और अपने ही बच्चों जैसा स्नेह भी दिया. मामा ने मेरा दाख़िला उसी स्कूल में करवा दिया, जिसमें उनके अपने बेटे उपेन्द्र ने उसी वर्ष बारहवीं पास की थी.

कहां गांव का दो कमरोंवाला कच्चा स्कूल, जिसमें न तो अध्यापक नियमित रूप से आते थे और न ही बैठने की पूरी व्यवस्था ही थी और कहां शहर का यह नामी स्कूल, जिसमें यदि फीस ऊंची थी, तो सुविधाएं भी पूरी थीं. नियमित रूप से पढ़ाई, हवादार बड़े-बड़े कमरे और लंबा-चौड़ा खेल का मैदान. मेरे नंबर अच्छे होने के कारण मुझे दाख़िला तो मिल गया था, लेकिन मैं थोड़ा घबराया हुआ भी था.

शुरू में उपेन्द्र ने मेरा खुले दिल से स्वागत किया. दो बहनों का अकेला भाई, मुझमें उसे अपना एक संगी मिल गया. उम्र में भी बस दो साल का अंतर था, अतः वह मेरे जीवन का सखा, गाइड सब कुछ बन गया. मैं उसे अपने मन की हर बात कहता और हर बात पर उससे सलाह लेता. पढ़ाई में उपेन्द्र की विशेष रुचि नहीं थी. शायद उसे अपने पिता का जमा-जमाया व्यापार नज़र आ रहा था, लेकिन मामा-मामी चाहते थे कि व्यापार में आने से पहले उपेन्द्र अच्छे से पढ़-लिख ले. उन्होंने अपनी दोनों बेटियों का विवाह भी उच्च शिक्षा दिलवाने के बाद ही किया था. लेकिन उपेन्द्र को प्रोत्साहित करने के लिए जब कभी वे मेरी लगन व मेहनत का उदाहरण रखते, तो उसके चेहरे पर ईर्ष्या की एक लहर दौड़ जाती. बारहवीं में नंबर कम आने के कारण किसी अच्छे कॉलेज में दाख़िला मिलने की संभावना नहीं थी, सो मामा ने एक प्राइवेट कॉलेज में उपेन्द्र का एम.बी.ए में दाख़िला करवा दिया.

आज पीछे मुड़कर देखता हूं, तो यूं लगता है, जैसे यह जीवन भी एक लंबी कहानी ही तो है- हर व्यक्ति की अपनी अलग कहानी, अपने अलग-अलग सुख-दुख.

ग्रामीण जीवन के अपने अध्याय को समाप्त कर शहरी जीवन में ढलने को मैं प्रयत्नरत था, पर यह सब इतना आसान भी न था. मामा मेरी इस कठिनाई को समझते थे कि अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद मैं इस नए माहौल में असहज महसूस कर रहा हूं और अकारण ही अपने दोस्तों की हंसी का पात्र भी बनता हूं. जब तक उपेन्द्र स्कूल में था, तब तक अन्य लड़कों को थोड़ा डर रहता था, पर उपेन्द्र व उसके साथी सब स्कूल पास कर चुके थे.

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मामा के एक परिचित की बेटी थी अमृता, जो उसी स्कूल में पढ़ती थी. वह मुझसे दो वर्ष जूनियर थी, उसी माहौल में ढली होने के कारण आत्मविश्‍वास था उसमें. मामा ने मेरी ज़िम्मेदारी उसी को सौंप दी. वह आधी छुट्टी के व़क्त और वैसे भी यदा-कदा मुझसे बात करने आ जाती. कह सकते हैं कि मुझे तिनके का सहारा मिल गया था और इससे मेरे दोस्तों द्वारा मेरा मज़ाक उड़ाना कम भी हो गया. मैं भी धीरे-धीरे अपने पांव जमाने लगा. स्कूल में तो अमृता से मुलाक़ात होती ही, पारिवारिक मैत्री होने के कारण अन्य अवसरों पर भी हो जाती. अन्य लड़कियों से बहुत अलग थी वो. कोमल और संवेदनशील. यूं वो कम ही बोलती थी, पर नारी सुलभ गुण के चलते वो मेरी परेशानी और मन की बात का सहज अनुमान लगा लेती. मैं उसकी मां से भी कई बार मिला था. वे स्नेहपूर्वक मेरा

आवभगत करतीं. साल बीतते रहे और मैं स्कूल पार करके कॉलेज भी पहुंच गया. मुझे ज़िंदगी अब अच्छी लगने लगी थी, क्योंकि अमृता अच्छी लगने लगी थी. बिना किसी आहट, बिना मेरे जाने, न जाने कब वो मेरे दिल में समा गई थी. यह मेरे जीवन के मधुरतम दिन थे और अज्ञानवश मैं यह मान बैठा था कि जीवन का यह अध्याय सदैव यूं ही चलता रहेगा.

प्यार हमारी कमज़ोरी भी बन सकती है और ताक़त भी. मैंने अपने प्यार को अपना प्रेरणास्रोत बना लिया. मैं जानता था कि उसे पाने के लिए मुझे अन्य लड़कों से कहीं अधिक कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. पढ़ाई में मेहनत कर मैं कितने भी अच्छे नंबर पा लूं, तब भी था तो मैं अनगढ़ ही. गांव से लाकर शहर में रोप दिया गया एक पौधा. मेरे बातचीत करने का सलीका, मेरा एटीकेट और सामान्य ज्ञान उन लोगों के मुक़ाबले नगण्य था, जो शहरी माहौल में पले-बढ़े थे, जिन्होंने अच्छे स्कूलों में शिक्षा पाई थी.

यदि इश्क़ छुपाना कठिन है, तो उसका इज़हार कर पाना भी आसान नहीं होता. लेकिन प्यार मौन और अनकहा रहकर भी उतना ही सच्चा हो सकता है और शब्दों में बंधे बिना भी व्यक्त हो जाता है. अमृता तो मन की बात समझ लेने में यूं भी माहिर थी.

बाद में जो कुछ हुआ, वह उसके बस में नहीं था. हमने अपने प्यार का इज़हार शब्दों में किया होता, तो भी क्या कर लेती वो? हमारे जीवन में प्रारब्ध का कितना हाथ है यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन हाथ की लकीरों में लिखा रहता हो या फिर माथे की, नियति अपना खेल दिखाती अवश्य है.

ग्रेजुएशन के बाद मुझे देहरादून की मिलिट्री एकेडमी में प्रवेश मिला गया. छुट्टियों में मां से मिलने गांव तो जाता ही, परंतु साल के बीच एक-दो चक्कर मेरठ मामा के घर भी लगा आता और अमृता से भी मिल आता. अमृता की मां को हमारी दोस्ती की जानकारी भी थी और स्वीकार्य भी.

ट्रेनिंग पूरी करके लेफ्टिनेंट बना ही था कि मामाजी का पत्र मिला, जिसमें उपेन्द्र के विवाह की सूचना थी. निमंत्रण-पत्र भी साथ था. उपेन्द्र का विवाह अमृता से हो रहा था. लंबा-चौड़ा आयोजन, जिसमें पांच दिन चलनेवाले कार्यक्रमों की फेहरिस्त थी.

मैं हैरान रह गया. अभी ही तो मेरा करियर बना था और समय आया था कि मैं उसे प्रपोज़ कर सकूं. वैसे भी इससे पहले किस बूते पर उसके माता-पिता से बात करता? पर क्या अमृता भी यही चाहती थी?

इसी प्रश्‍न का उत्तर पाने मैं मेरठ जा पहुंचा. पहली बार ऐसा हुआ था कि मैं मामा के घर न जाकर सीधे अमृता के घर गया था. घर में उसकी मां अकेली थीं और अमृता मामी के साथ विवाह की ख़रीददारी करने बाज़ार गई हुई थी. मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी. चाय का प्याला पकड़ाते ही उन्होंने स्वयं ही बात छेड़ी. दरअसल, मेरे मामा और अमृता के पापा एक ही क्लब के मेंबर थे. वहीं पर मामाजी ने अमृता के पापा से कहा कि उपेन्द्र उनकी बेटी से विवाह करने को इच्छुक है. अमृता के पापा को प्रस्ताव पसंद आ गया. जाना-पहचाना, पढ़ा-लिखा परिवार, अच्छा व्यवसाय और भला क्या चाहिए था उन्हें? उन्होंने फ़ौरन हामी भर दी. अमृता की मां ने समझाने की बहुत कोशिश की कि एक बार अमृता से ज़रूर बात कर लेनी चाहिए, लेकिन अमृता के पिता उनमें से थे, जो स्वयं को ही सबसे समझदार व्यक्ति समझते हैं. ऐसे लोग सलाह-मशविरा नहीं करते, केवल फैसला सुनाते हैं, जिसे मानना अनिवार्य होता है. और उनके अपने विचार से अमृता के लिए इससे बेहतर रिश्ता और क्या हो सकता था.

यह जानकर कि विवाह का प्रस्ताव स्वयं उपेन्द्र की तरफ़ से आया है मुझे बहुत अचंभा हुआ, चोट भी लगी. मामा-मामी न सही, उपेन्द्र तो भली-भांति मेरे इस प्यार से परिचित था. जैसे मैं अपनी हर परेशानी उससे बांटता था, वैसे ही अमृता के बारे में भी हर बात मैंने उसे बताई थी. कभी वह मज़ाक में कहता कि तुमने तो आते ही सबसे अच्छी लड़की पटा ली और कभी अनजाने में व्यंग्य भी करता कि तुम जैसे मिट्टी के माधो को अमृता जैसी समझदार लड़की कैसे पसंद करती है, यह मेरी समझ के बाहर है.

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विवाह पर जाना तो लाज़िमी था, सो गया, पर केवल बारात में. और फिर छुट्टी न होने का बहाना बनाकर लौट आया. बहुत ख़ुश थे मामा-मामी और उनसे कोई गिला भी न था मुझे. इसमें कोई शक़ नहीं था कि वहां पर अमृता ख़ुश रहेगी. मामा-मामी बहुत अच्छे थे, संपन्न घर था और उपेन्द्र भी ज़रूर मन ही मन उसे चाहता रहा होगा, तभी तो विवाह का प्रस्ताव रखा और क्या चाहिए ख़ुशियों के लिए.

तहेदिल से अमृता की ख़ुशियों की कामना कर मैं लौट आया और मान लिया कि मेरी कहानी की इति हो चुकी है. लेकिन उपन्यासों के उपसंहार भी तो हुआ करते हैं न. लगता है मेरी कथा का उपसंहार लिखना अभी शेष था.

शायद लड़कियों में जीवन से समझौता करने की शक्ति हम पुरुषों से अधिक होती है. ख़ैर, मुझमें नहीं थी और फलस्वरूप मैं मामा के घर जाने से कतराता रहा. उपेन्द्र का बेटा हुआ और वह चार साल का भी हो गया, पर मैं उस घर में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया.

मां से पता चला कि उपेन्द्र का बेटा शिवम बहुत बीमार है और डॉक्टरों ने उसे रक्त का कैंसर बतलाया है. मेरी आंखों के सामने अमृता का उदास चेहरा दिनभर घूमता रहता. एक मां के लिए अपने बच्चे के दुख से बढ़कर कोई दुख नहीं हो सकता.

अमृता की खोई ख़ुशी लौटाने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था, पर मैं वहां जाकर उसे ढाड़स बंधाने का साहस भी नहीं जुटा पा रहा था. बस, प्रार्थना भर कर सकता था और वही कर रहा था. सबकी मिली-जुली दुआओं का ही असर था कि आगे टेस्ट कराने पर उसे रक्त कैंसर की वह क़िस्म एएलएल निकली, जो गंभीर होते हुए भी लाइलाज नहीं थी. अब उसका इलाज संभव हो चुका है.

यद्यपि वह लंबा और कष्टप्रद है, क़रीब साढ़े तीन साल तक चलनेवाला. कैंसर सेल ख़त्म करने के लिए दवाइयां इतनी स्ट्रॉन्ग दी जाती हैं कि मरीज़ का स्वस्थ ख़ून भी प्रभावित होता है. फलस्वरूप मरीज़ को अनेक बार बाहरी ब्लड चढ़ाने की ज़रूरत पड़ती है. एक कठिनाई यह भी थी कि शिवम का ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव था, जो बहुत कम लोगों का होता है और डॉक्टरों की राय में ख़ून ब्लड बैंक से न लेकर किसी स्वस्थ एवं युवा व्यक्ति का ही दिया जाना चाहिए. उपेन्द्र का अपना ब्लड ग्रुप वही था, लेकिन ब्लड इतने कम अंतराल से दिया जाना था कि एक ही व्यक्ति से बार-बार ब्लड नहीं लिया जा सकता था. मुझे पता चलते ही मैंने अपना ब्लड देने की ठानी, क्योंकि मेरा भी वही ब्लड ग्रुप था.

मैंने फ़ौरन फोन पर ही उपेन्द्र से बात की और उसे आश्‍वस्त किया कि जितनी बार भी आवश्यक होगा मैं अपना ब्लड दूंगा. यूं हम बारी-बारी शिवम को ब्लड देने लगे. उपेन्द्र मुझे निश्‍चित तारीख़ बता देता और मैं उसी दिन सीधे अस्पताल पहुंच जाता. इस बीमारी में मरीज़ की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है और उसे इंफेक्शन बहुत जल्दी पकड़ सकता है, अतः उसे सबसे अलग रखा जाता है. केवल एक ही व्यक्ति नहा-धोकर और साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखते हुए उसके पास बैठ सकता है. अमृता भीतर कमरे में बेटे के संग रहती और मेरी मुलाक़ात बाहर स़िर्फ उपेन्द्र से ही होती. उसके बाद मैं घर जाकर मामा-मामी से मिलकर लौट आता.

तीसरी बार जब मैं ब्लड देने गया, तो शिवम की सेहत में काफ़ी सुधार था. हालांकि दवाइयां अभी लंबे समय तक चलनी थीं. डॉक्टर आश्‍वस्त थे कि ख़तरा टल गया है और फ़िलहाल और ब्लड देने की ज़रूरत नहीं. सदैव की भांति अमृता भीतर कमरे में शिवम के पास थी. लौटते समय मैंने उपेन्द्र को आश्‍वस्त किया कि कोई भी आवश्यकता पड़ने पर मुझे बता दे, मैं तुरंत आ जाऊंगा. उपेन्द्र ने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर कहा, “मैं तुम्हारा यह एहसान ज़िंदगीभर नहीं भूलूंगा. तुमने हमारे बुझते चिराग़ को फिर से रौशन करने में मदद की है.” मैं कैसे कहता उससे कि ये सब मैंने तुम्हारे लिए नहीं अमृता के लिए किया है. मेरे लिए आज भी अमृता की ख़ुशी सर्वोपरि है.

अब तो मेरी कहानी का उपसंहार भी लिखा जा चुका है और मैंने क़िताब बंद कर दी है, निश्‍चय के साथ कि अपने अतीत में अब कभी नहीं झांकूंगा और न ही भविष्य की सोचूंगा. बस, केवल वर्तमान में ही जीऊंगा. मैंने अमृता के संग ज़िंदगी गुज़ारने का सपना देखा था, जो पूरा नहीं हुआ. सौभाग्यशाली होते हैं वे, जिनका प्यार परवान चढ़ता है, लेकिन जिनका नाक़ामयाब रह जाता है, दास्तान तो उनकी भी होती है न! और सबसे बड़ी बात यह कि प्यार में क़ामयाब न हो पाने का मतलब यह क़तई नहीं है कि उनकी निष्ठा में कोई कमी रह गई थी.

एक बात और, कहा जाता है कि कच्ची उम्र का प्यार महज़ एक दैहिक आकर्षण होता है, विपरीत लिंगी में जगी नई उत्सुकता मात्र. मुझे तो याद नहीं आता कि मैंने हाथ बढ़ाकर कभी अमृता को छूने का प्रयत्न भी किया हो. सच तो यह है कि किशोरवय और यौवन की दहलीज़ पर खड़ा वह समय, जब दुनिया और उसके स्वार्थ से अभी वास्ता नहीं प़ड़ा होता, बस उसी समय का प्यार ही वास्तविक प्यार होता है, निश्छल और निर्मल. और ऐसा जीवन में स़िर्फ एक ही बार हो सकता है.

सूखी धरती पर वर्षा की पहली फुहार महसूस की है कभी? किस तरह महक उठती है कुंआरी धरती इस पहले मिलन से. बाद में कितना भी बरस ले, जलमय हो जाए पृथ्वी पर वो सोंधी महक फिर नहीं उठती कभी. ठीक वैसा ही होता है अपरिपक्व उम्र का वो पहला प्यार!

Usha Drava

        उषा वधवा

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कहानी- पगलिया (Hindi Short Story- Pagliya)

Hindi Short Story

“मैं अपनी कोख में नन्हीं-सी जान को लेकर घर से निकली, तो जानती थी कि मुझे अपनी और अपनी बच्ची के चारों तरफ़ एक सख़्त कवच बुनना होगा, जो मेरी और उसकी रक्षा समाज में इंसान के वेश में छिपे भेड़ियों से कर सके. ऐसे में घर छोड़ते समय मुझे मेरी मृत मां बहुत याद आईं, जो कहती थीं कि मैं रहूं या न रहूं, मेरा आशीर्वाद हर समय तेरा साथ देगा. मैंने अपनी मां की स्मृतियों से ही अपना कवच बुन लिया, लेकिन वही कवच मेरा दुश्मन बन गया. प्रथम की मां मुझे पागल समझकर मुझसे डरती हैं.’’   

 Hindi Short Story

वाणी के जाने के बाद से उसकी कातर आवाज़ मेरे दिल से निकल ही नहीं रही थी. “प्लीज़ डॉक्टर, आप एक बार

मानसिक अस्पताल चलकर मां को देख लीजिए. मैं उन्हें वहां नहीं छोड़ना चाहती. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि अचानक से मां इतनी आक्रामक कैसे हो गईं? शायद उनसे किसी ने कह दिया था कि उनकी मां मर चुकी हैं, इसीलिए वो हर किसी को पत्थर मारने लगी हैं. लोगों को पकड़कर कहती हैं कि मेरी मां से मिलो. जब वे कहते हैं कि यहां कोई नहीं है, तो उसे मारने दौड़ती हैं.” कहते-कहते वाणी का गला भर्रा गया था.

मैं असमंजस में पड़ गई. मेरे इतने वर्षों का अनुभव ग़लत कैसे हो गया? भले ही सामान्य और परा-मनोविज्ञान के विद्यार्थियों ने उस केस को वाद-विवाद का विषय बना दिया हो, पर मेरी अनुभवी आंखों के लिए तो वो केस आईने की तरह साफ़ था, तभी तो मैंने कह दिया था वाणी से कि उसकी मां को इलाज की कोई आवश्यकता नहीं है, फिर अचानक ये कैसे हो सकता है?

मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा था कि वो अपनी मां की पूरी जीवनी विस्तार से लिखकर लाए. जो कुछ भी वो उनके बचपन से उनके बारे में जानती है या उसने किसी से भी सुना है वो सिलसिलेवार लिखे, ताकि मैं उनका केस एक बार फिर समझ सकूं और आज ही वो ये दर्द का दस्तावेज़ लेकर आ गई थी, जिसे मैंने पूरी तन्मयता से पढ़ना शुरू किया.

‘मेरी मां को भी हर औरत की तरह अपने भीतर उस स्पंदन ने अभिभूत किया, जो किसी भी औरत के जीवन में उल्लास के वो क्षण लेकर आता है, जिनमें वो सृष्टि से सर्जक हो जाने का गौरव पा लेती है. उनके साथ-साथ उनके ससुरालवाले भी बहुत ख़ुश थे, लेकिन घरवालों की नीयत नियति के खेल में कौन-सा अड़ंगा लगानेवाली है, ये पता चला तो उनके होश उड़ गए. तीन महीने पूरे हुए और डॉक्टर ने उनका परीक्षण करके जो बताया, उससे घरवालों के चेहरों के भाव बदल गए. पिता ने जब रात में उन्हें समझाया कि कल शाम को गर्भपात के लिए क्लीनिक जाना है, तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई. कल तक जिस नन्हें जीव के आगमन पर सब हर्षित व उत्साहित थे, आज उसी के आगमन का द्वार बंद कर देना चाहते थे. क्यों? क्योंकि वो एक कन्या थी? वो कन्या जिसे हमारी संस्कृति में देवी कहा गया, वो कन्या जिसका दान वैतरणी नदी को पार करने का साधन बताया गया. वो कन्या, जिसके पांव छूकर नवरात्र में उससे घर की समृद्धि का आशीर्वाद मांगा जाता है. उस कन्या का जीवन छीन लेना उन्हें गवारा न हुआ. उन्होंने घरवालों को समझाने की बहुत कोशिश की, पर कोई निष्कर्ष नहीं निकला. पिता ने अपने पक्ष रखे कि वो तीन बहनों की शादियां करके त्रस्त हो चुके हैं. बेटी की शादी ही नहीं, हिफ़ाज़त करना भी एक जंजाल है. तर्कों की कमी तो मां के पास भी न थी, लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी. आख़िर पिता ने कह ही दिया कि उन्हें अब कोई बहस नहीं करनी है और ये उनका अंतिम फैसला है, तो मां के सामने ये चुनौती खड़ी हो गई कि अपनी संसृति की जान कैसे बचाए.

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इसी ऊहापोह में वे आधी रात में उठकर छत पर टहलने लगीं. हवा कुछ ज़्यादा ही वेगमयी और घुमावदार थी. उसके घर्षण से उपजी सांय-सांय की ध्वनियां जैसे मन के झंझावात का प्रतिनिधित्व कर रही थीं कि उन्हें अपनी मां दिखाई पड़ीं. वो सुखद आश्‍चर्य के साथ दौड़कर उनसे लिपट गईं. “आप यहां? बाबूजी ने तो संदेशा भिजवाया था कि आप… लेकिन मैं जानती थी कि मेरी मां मुझे छोड़कर स्वर्ग भी नहीं जा सकती.” वो रोते हुए बोलीं. नानी ने उनके आंसू पोंछकर सांत्वना दी और कहा कि वे उनके साथ हैं. अब उनके भीतर और बाहर का झंझावात भीषण रूप ले चुका था. एक और एक ख़ुशनुमा ज़िंदगी थी, जिसमें सब कुछ था सिवाय निर्णय लेने की स्वतंत्रता के और दूसरी ओर एक तिनके को तूफ़ानों को ही पायदान बनाते हुए अंबर की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संघर्ष. आख़िर उनके अंतर्द्वंद्व की प्रतिनिधि हवाओं की सरसराहट धीरे-धीरे शांत होते-होते एक रहस्यमयी सन्नाटे में बदल गई. ये तूफ़ान आने के पहले का ख़ामोश शोर था, क्योंकि वो जीवन को तूफ़ान के हवाले करने का निर्णय ले चुकी थीं.

सुबह मां तैयार हुईं. मंदिर जाने के बहाने घर से निकलीं और ट्रेन में बैठ गईं. उनके बैग में उनके गहने, कुछ पैसे, उनके शैक्षणिक प्रमाणपत्र और उस तीर्थस्थान का टिकट था, जहां वो शादी के बाद घूमने गई थीं. ट्रेन से उतरकर वो उसी सराय में पहुंचीं, जहां तब वो लोग ठहरे थे. वहां निराश्रित महिलाओं के लिए एक आश्रम भी था. उन्हें मिलकर सराय के सारे काम करने होते थे और पारिश्रमिक के तौर पर भोजन, वस्त्र और एक सामूहिक छत मिलती थी. काम से मां कब घबराती थीं. यहीं उनका नाम ‘पगलिया’ पड़ा, क्योंकि काम तो वो पागलों की तरह बिना थके-रुके, बिना कोई प्रतिवाद किए करती ही थीं, साथ ही उस मां से अक्सर बात भी करती थीं, जो उनके सिवा किसी को नज़र ही नहीं आती थीं. कुछ लोग तो ये मानने लगे थे कि उन पर किसी भूत-प्रेत का साया है और उसी की सहायता से वो इतना काम कर लेती हैं.

मैं चार साल की हुई, तो वो एक अच्छे स्कूल का फॉर्म लेने गईं, लेकिन उन्हें ये कहकर मना कर दिया गया कि पिता के हस्ताक्षर के बिना बच्चे को प्रवेश नहीं मिल सकता. फिर उन्होंने एक तरकीब आज़माई. वो रोज़ सुबह जाकर प्रधानाध्यापक के घर के गेट के सामने खड़ी हो जातीं. जब उनकी गाड़ी निकलती, तो रोज़ उन्हें सामने से हटाना पड़ता. रोज़ वो उनसे एक ही प्रार्थना करतीं. एक महीने बाद आख़िर वो तंग आ गए और कार से उतरकर उन्हें समझाने का प्रयत्न किया कि अगर तुम्हारी बेटी को प्रवेश दे भी दिया गया, तो तुम अपने बच्चे को गृहकार्य कैसे कराओगी?

अगले दिन मां ने उनके घर की घंटी बजाई. दरवाज़ा खुलने पर वे बोलीं, “आपको ये दिखाना था.” उनके हाथ में एक उत्तर पुस्तिका थी, जिसमें कक्षा आठ की गणित के हल किए हुए सवाल थे. फिर उन्होंने अपनी कहानी बताकर अपने पढ़ाई के प्रमाणपत्र दिखाए और प्रधानाध्यापक से पढ़ाई से संबंधित कुछ भी पूछने को कहा. वो उनके जुनून के आगे नतमस्तक हो गए और मुझे प्रवेश मिल गया.

मां ने अपने साथ लाए गहने बेचकर स्कूल का शुरुआती ख़र्च तो निकाल लिया, पर आगे के ख़र्च की समस्या के लिए उन्होंने आस-पास के लोगों के घरों में काम ढूंढ़ना शुरू किया. उन्हें एक घर में खाना बनाने का काम मिल गया. बच्चे तो आश्रम की कुछ और औरतों के भी थे. वे बगल के सरकारी स्कूल में पढ़ने भी जाते थे,  पर मां की बात और उनकी दिनचर्या कुछ अलग ही थी. मैं हमेशा खिली-खिली और साफ़-सुथरे प्रेस किए कपड़ों में दिखती. जब भी बाकी औरतों के आराम का समय होता, वो थोड़ी देर लेटकर झपकी ले रही होतीं, मां मेरे साथ-साथ और बच्चों को भी बिठाकर गृहकार्य करा रही होतीं या मुझे साथ लेकर पड़ोस के घर में खाना बनाने गई होतीं. अक्सर पूछने पर कि वो इतना काम बिना थके कैसे कर लेती हैं, वो बतातीं कि उनकी मां उनकी काम में मदद करती हैं.

एक दिन मां आश्रम की रसोई में थीं और मैं अपनी कोठरी में पढ़ रही थी. तभी एक प्रबंधक की कुदृष्टि मुझ पर पड़ गई. उसका मन मुझे चॉकलेट देने का हुआ. वो मुझे फुसलाकर अपने कमरे में ले गया और दरवाज़ा बंद करने चला, तो सामने मां को देखकर घबरा गया. वो ग़ुस्से में बोलीं, “मेरी बेटी को अकेला न समझना, उसकी नानी उसके साथ रहती हैं और जब भी वो समझती हैं कि वाणी को मेरी ज़रूरत है, मुझे बता देती हैं. यदि कभी मैं न भी उपलब्ध हुई, तो मेरी मां उसकी रक्षा कर सकती हैं.” मां की आंखों में अंगारे थे और कंठ में ज्वाला. उनकी ऊंचे स्वर में कही गई ये बातें औरों ने भी सुनी. उस दिन के बाद से किसी ने मेरे पास आने की हिम्मत नहीं की.

आसमान के नक्षत्र और घड़ी की सुइयां अपने ढंग से समय के परिवर्तन चक्र में मां के संघर्षों के साक्षी बनते रहे. जब वसंत में वल्लरियों में नए फूटते पल्लव और पुष्पों की नई कोपलें मन का हुलास बढ़ाते होते और अन्य औरतें खिड़की में बैठकर तनिक सुस्ताते हुए वासंती हवा में सराबोर हो रही होतीं, तब मां मुझे फल-मेवे तथा अन्य पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त कमाई हेतु लिफ़ा़फे बना रही होतीं. जब ग्रीष्म के ताप से आक्रांत धरती बरखा की रिमझिम फुहारों से शीतल हो रही होती और आलस भरी दोपहरी में काम से थककर सब नींद ले रहे होते, तब मां मेरी छोटी-बड़ी ज़रूरतें पूरी करने के लिए किसी के घर में खाना बना रही होतीं. जब अमराई में नए बौरों की सोंधास आम्रफलों की मीठी ख़ुशबू में बदलती होती, तब मां पागलों की तरह आश्रम में आनेवाले अजनबियों से बारहवीं के बाद की पढ़ाई के विकल्पों की जानकारी एकत्र कर रही होतीं. जिस प्रकार दीये अपनी प्रकृति के अनुसार हवाओं से जूझते हुए अंधकार को भगाने और किसी के जीवन में उजाला भरने के लिए अपनी देह को निमित्त बनाते हैं, ठीक उसी प्रकार मेरी मां अपनी संपूर्ण ओजस्विता के साथ दिन में उन्नीस घंटे काम करके अपनी संतति के व्यक्तित्व को संपूर्णता देने के यज्ञ में स्वयं के जीवन को होम करती रहीं. संकीर्ण लोगों का डर मां के पागलपन या उन पर किसी प्रेतात्मा की छाया होने की बात फैलाता रहा और उदार लोगों की संवेदना हमारा मार्गदर्शन और विभिन्न समस्याओं का समाधान करती रही.

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मैं रात में सोने से पहले मां की गोद में सिर रखकर अपने दिनभर के क्रियाकलापों के बारे में बताती. मां ने मुझे मेरे जन्म से पहले की बातें तब-तब टुकड़ों में बताईं, जब कभी मैंने किसी परीक्षा, प्रतियोगिता या संघर्ष के कारण निराशा या हताशा भरी बातें कहीं.

परिश्रम और जुझारूपन के गुण मैंने अपनी मां से विरासत में पाए थे, इसलिए विश्‍वविद्यालय में व्याख्याता बन सकी. यहीं मेरी मुलाक़ात प्रथम से हुई. धीरे-धीरे मुलाक़ात जान-पहचान में, फिर दोस्ती और फिर प्यार में बदली. नौकरी शुरू करते ही मैं मां को लेकर एक अच्छे किराए के घर में आ गई. प्रथम को भी मैंने शुरू में ही अपनी कहानी बताते हुए स्पष्ट कर दिया था कि मां सदैव मेरे साथ ही रहेंगी. उस दिन मां प्रथम की मां से मिलकर आईं, फिर अचानक ये सब क्या हो गया? समझ में नहीं आता.’

मेरा ध्यान अंतिम शब्दों पर अटक गया.

‘मां प्रथम की मां से मिलने गईं.’ और माजरा मेरी समझ में आ गया. अब इस केस को सुलझाने का एक ही उपाय था कि देविका का पक्ष प्रथम की मां के सामने रखा जाए. हालांकि ये सैद्धांतिक रूप से तो ग़लत कहा जाता था, एक प्रकार का छल था, पर देविका का भला इसी में था.

दूसरे दिन मानसिक अस्पताल में मैंने देविका का हाथ संपूर्ण स्निग्धता के साथ अपने हाथों में लेकर उसकी आंखों में सीधे झांकते हुए बस इतना ही कहा, “तुम मुझे धोखा नहीं दे सकतीं. जब तुम्हारी बेटी तुम्हें पहली बार मेरे पास इलाज के लिए लाई थी, तभी मैं समझ गई थी कि तुम्हें कोई बीमारी नहीं है. तुम चाहो, तो मुझसे अपने दिल की बात बांट सकती हो.”

इस पर जाने कितनी देर जीवन की सख़्त धूप से वाष्पित होकर मन के आकाश पर जमते गए बादल आंसुओं की बरसात करते रहे और उन्होंने कहना शुरू किया, “मैं अपनी कोख में नन्हीं-सी जान को लेकर घर से निकली, तो जानती थी कि मुझे अपनी और अपनी बच्ची के चारों तरफ़ एक सख़्त कवच बुनना होगा, जो मेरी और उसकी रक्षा समाज में इंसान के वेश में छिपे भेड़ियों से कर सके. ऐसे में घर छोड़ते समय मुझे मेरी मृत मां बहुत याद आईं, जो कहती थीं कि मैं रहूं या न रहूं, मेरा आशीर्वाद हर समय तेरा साथ देगा. मैंने अपनी मां की स्मृतियों से ही अपना कवच बुन लिया, लेकिन वही कवच मेरा दुश्मन बन गया. प्रथम की मां मुझे पागल समझकर मुझसे डरती हैं. वो मुझे साथ रखने को किसी भी प्रकार से तैयार नहीं हो रही हैं, इसीलिए वाणी और प्रथम में दूरियां बढ़ती जा रही हैं. मैं वाणी को अच्छी तरह जानती हूं. वो अपना प्यार छोड़ देगी, पर मां को नहीं छोड़ेगी. मुझे और कुछ नहीं सूझा, तो मैंने ये उपाय किया.” वो मेरे सामने हाथ जोड़कर बैठ गईं, “मैं जानती हूं कि एक जीवनसाथी के बिना जीवन गुज़ारने का दर्द क्या होता है. जब से प्रथम मेरी बेटी के जीवन में आया है, मैंने उसकी आंखों में जो चमक देखी है, उसके छिन जाने की कल्पना से भी सिहर उठती हूं. प्लीज़ आप मेरी बेटी की ख़ुशियां बचा लीजिए. उससे कह दीजिए कि उसकी मां को बाकी का सारा जीवन मानसिक अस्पताल में ही गुज़ारना होगा. वो ठीक नहीं हो सकती.”

मेरे साथ आए और पर्दे के पीछे बैठे वाणी-प्रथम और प्रथम की मां सब सुन रहे थे और किंकर्त्तव्यविमूढ़ से उस त्याग की मूरत को देख रहे थे, जो स़िर्फ एक मां थी. आख़िर प्रथम की मां उठीं और उन्होंने देविका को गले लगा लिया.

भावना प्रकाश

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