Film Review Of Shikara

फिल्मः शिकारा
कलाकार: आदिल खान, सादिया, प्रियांशु चटर्जी
निर्देशक: विधु विनोद चोपड़ा

स्टारः 3.5

वर्ष 1990 में घाटी से कश्मीरी पंडितों को घर से बाहर निकाल दिया गया था, उसी वक्त की कहानी है शिकारा. फिल्म एक नविवाहित जोड़े ( शिव और शांति) के ईद-गिर्द घूमती है, जिन्हें सांप्रदायिक तनाव की वजह से रातों-रात अपना घर, अपना कश्मीर छोड़कर जाना पड़ता है. वे इसी उम्मीद के साथ सालों रिफ्यूजी कैंप में गुजार देते हैं कि शायद एक दिन वो वापस अपने घर जा पाएंगे. निर्माता-निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने घाटी में आतंक  और उसके परिणामस्वरूप कश्मीरी पंडितों पर हुए वीभत्स अत्याचारों को फिल्म में एक कश्मीरी पंडित जोड़े की प्रेम कहानी के रूप में ज्यादा प्रस्तुत किया है. कहानी शुरू होती है 1987 में, जब कश्मीर घाटी कश्मीरी पंडितों की भी उतनी ही थी, जितनी कश्मीरी मुसलमानों की. जब दोनों समुदाय पूरे सौहाद्र् के साथ मिल-जुल कर रहते थे. फिल्म खत्म होती है 2018 में, जब हजारों कश्मीरी पंडित अभी भी शरणार्थी का जीवन जीने को अभिशप्त हैं.

Shikara

कहानीः  शिव प्रकाश धर अपनी पत्नी (आदिल खान) और शांति सप्रू (सादिया) के साथ कश्मीर में एक खुशहाल जिंदगी जी रहे होते हैं. दोनों काफी जतन से अपना घर बनाते हैं, जिसका नाम रखते हैं शिकारा. इधर घाटी में सांप्रदायिक दंगे बढ़ते जा रहे हैं. कश्मीरी पंडितो को घाटी छोड़कर जाने के लिए घमकाया जा रहा है और जो नहीं जा रहे हैं, उऩके घर जलाए जा रहे हैं. दिन ब दिन तनाव बढ़ता जा रहा है. ऐसे में शिव और शांति को भी अपना घर छोड़कर जाना पड़ता है. 19 जनवरी 1990 को लाखों कश्मीरी पंडितों को अपने घरों से ढकेल दिया गया था, जिनके बाद वे रिफ्यूजी कैंप में जीने के लिए मजबूर थे. उनके पास सिर्फ दो ही विकल्प थे. या तो वे अपनी जिंदगी बचाते या कश्मीर में ही रहकर सांप्रदायिक हिंसा के शिकार बनते. इन घटनाओं के साथ शिव और शांति का प्यार किस उतार-चढ़ाव से गुजरता है, उसी की कहानी है शिकारा.

रिव्यूः निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने जिस तरह से अपनों से बिछड़ने के दर्द और अपने बसे बसाए आशियाने छोड़ने की पीड़ा और एक प्रेम की दास्तां को सुनहरे पर्दे पर रंगा है. ऐसा लगता है कि जैसे ये सब आप के ही साथ हो रहा हो. फिल्म की प्रेम कहानी बहुत सशक्त है. वह अंदर तक भिगोती है. इस फिल्म की खासियत यही है कि कहानी के चरित्र भी धार्मिक उद्वेग का शिकार हैं, मगर फिल्म के अंत तक मानवीय संवेदनाएं सबसे प्रमुख हो जाती हैं. निश्चित ही…इसके लिए विधु विनोद चोपड़ा बधाई के हकदार हैं. फिल्म भले ही कश्मीर की कहानी कहती हो, लेकिन इसका असर सार्वभौमिक है, प्रेम की शक्ति में भरोसा पैदा करती है. शिव और शांति का प्रेम जिंदगी के सबसे कठिन लम्हों में भी कम नहीं होता. रंगराजन रामभद्रन की सिनेमेटोग्राफी शानदार है. वह अपने कैमरे से कश्मीर की नैसर्गिक खूबसूरती, वहां के जनजीवन और फिल्म के मूड को बेहतरीन तरीके से पेश करते हैं. विधु की एडिटिंग भी अच्छी है, फिल्म का गीत-संगीत सामान्य है.

निर्देशनः सांप्रदायिक तनावपूर्ण माहौल के बीच एक प्यारी-सी लवस्टोरी पिरोना विधु विनोद चोपड़ा के लिए आसान नहीं रहा होगा. कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्यायपूर्ण घटना को निर्देशक ने दो किरदारों के साथ बुना है, जो दिल को छू जाती है. फिल्म के पहले हॉफ में कहानी तेजी से बढ़ती है, लेकिन दूसरे हाफ में कहानी शिव और शांति के रिश्तों प केंद्रित हो जाती है.
एक्टिंगः  शिव के रूप में आदिल खान का अभिनय बहुत अच्छा है, पहली ही फिल्म में उन्होंने शानदार काम किया है. एक निर्वासित कश्मीरी पंडित की पीड़ा को उन्होंने प्रभावी तरीके से अपने अभिनय से उभारा है. शांति के रूप सादिया भी प्रभावित करती हैं. उनकी भी यह पहली फिल्म है और पहली फिल्म में ही वह प्रभावित करने में सफल रही हैं. शिव के ममेरे भाई नवीन के रूप में प्रियांशु चटर्जी की भूमिका छोटी है, लेकिन वह याद रह जाते हैं.

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