first love

आज फिर उसे देखा… अपने हमसफ़र के साथ, उसकी बाहों में बाहें डाले झूम रही थी… बड़ी हसीन लग रही थी और उतनीही मासूम नज़र आ रही थी… वो खुश थी… कम से कम देखने वालों को तो यही लग रहा था… सब उनको आदर्श कपल, मेड फ़ॉर ईच अदर… वग़ैरह वग़ैरह कहकर बुलाते थे… अक्सर उससे यूं ही दोस्तों की पार्टीज़ में मुलाक़ात हो जाया करतीथी… आज भी कुछ ऐसा ही हुआ. 

मैं और हिना कॉलेज में एक साथ ही थे. उसे जब पहली बार देखा था तो बस देखता ही रह गया था… नाज़ों से पली काफ़ीपैसे वाली थी वो और मैं एक मिडल क्लास लड़का. 

‘’हाय रौनक़, मैं हिना. कुछ रोज़ पहले ही कॉलेज जॉइन किया है, तुम्हारे बारे में काफ़ी सुना है सबसे. तुम कॉलेज में काफ़ीपॉप्युलर हो, पढ़ने में तेज़, बाक़ी एक्टिविटीज़ में भी बहुत आगे हो… मुझे तुम्हारी हेल्प चाहिए थी…’’

“हां, बोलिए ना.”

“मेरा गणित बहुत कमजोर है, मैंने सुना है तुम काफ़ी स्टूडेंट्स की हेल्प करते हो, मुझे भी पढ़ा दिया करो… प्लीज़!”

“हां, ज़रूर क्यों नहीं…” बस फिर क्या था, हिना से रोज़ बातें-मुलाक़ातें होतीं, उसकी मीठी सी हंसी की खनक, उसके सुर्ख़गाल, उसके गुलाबों से होंठ और उसके रेशम से बाल… कितनी फ़ुर्सत से गढ़ा था ऊपरवाले ने उसे… लेकिन मैं अपनी सीमाजानता था… सो मन की बात मन में ही रखना मुनासिब समझा. 

“रौनक़, मुझे कुछ कहना है तुमसे.” एक दिन अचानक उसने कहा, तो मुझे लगा कहीं मेरी फ़ीलिंग्स की भनक तो नहीं लगगई इसे, कहीं दोस्ती तो नहीं तोड़ देगी मुझसे… मन में यही सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे कि अचानक उसने कहा, “मुझे अपनाहमसफ़र मिल गया है… और वो तुम हो रौनक़, मैं तुमसे प्यार करती हूं!” 

मेरी हैरानी की सीमा नहीं थी, लेकिन मैंने हिना को अपनी स्थिति से परिचित कराया कि मैं एक साधारण परिवार कालड़का हूं, उसका और मेरा कोई मेल नहीं, पर वो अपनी बात पर अटल थी.

बस फिर क्या था, पहले प्यार की रंगीन दुनिया में हम दोनों पूरी तरह डूब चुके थे. कॉलेज ख़त्म हुआ, मैंने अपने पापा केस्मॉल स्केल बिज़नेस से जुड़ने का निश्चय किया जबकि हिना चाहती थी कि मैं बिज़नेस की पढ़ाई के लिए उसके साथविदेश जाऊं, जो मुझे मंज़ूर नहीं था. 

“रौनक़ तुम पैसों की फ़िक्र मत करो, मेरे पापा हम दिनों की पढ़ाई का खर्च उठाएंगे.” 

“नहीं हिना, मैं अपने पापा का सहारा बनकर इसी बिज़नेस को ऊंचाई तक के जाना चाहता हूं, तुम्हें यक़ीन है ना मुझ पर? मैं यहीं रहकर तुम्हारा इंतज़ार करूंगा.”

ख़ैर भारी मन से हिना को बाय कहा पर कहां पता था कि ये बाय गुडबाय बन जाएगा. हिना से संपर्क धीरे-धीरे कम होनेलगा था. वो फ़ोन भी कम उठाने लगी थी मेरा. मुझे लगा था कोर्स में व्यस्त होगी, लेकिन एक दिन वो लौटी तो देखा उसकीमांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र था… मेरी आंखें भर आई… 

“रौनक़, मुझे ग़लत मत समझना, जय से मेरी मुलाक़ात अमेरिका में हुई, उसने मुझे काफ़ी सपोर्ट किया, ये सपोर्ट मुझेतुमसे मिलना चाहिए था पर तुम्हारी सोच अलग है. जय का स्टैंडर्ड भी मुझसे मैच करता है, बस मुझे लगा जय और मैं एकसाथ ज़्यादा बेहतर कपल बनेंगे… पर जब इंडिया आई और ये जाना कि तुम भी एक कामयाब बिज़नेसमैन बन चुके हो, तोथोड़ा अफ़सोस हुआ कि काश, मैंने जल्दबाज़ी न की होती…” वो बोलती जा रही थी और मैं हैरान होता चला जा रहा था… “रौनक़, वैसे अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है, हम मिलते रहेंगे, जय तो अक्सर टूर पर बाहर रहते हैं तो हम एक साथ अच्छाटाइम स्पेंड कर सकते हैं…” 

“बस करो हिना, वर्ना मेरा हाथ उठ जाएगा… इतनी भोली सूरत के पीछा इतनी घटिया सोच… अच्छा ही हुआ जो वक़्त नेहमें अलग कर दिया वर्ना मैं एक बेहद स्वार्थी और पैसों से लोगों को तोलनेवाली लड़की के चंगुल से नहीं बच पाता… तुममेरी हिना नहीं हो… तुम वो नहीं, जिससे मैंने प्यार किया था, तुमको तो मेरी सोच, मेरी मेहनत और आदर्शों से प्यार हुआकरता था, इतनी बदल गई तुम या फिर नकाब हट गया और तुम्हारी असली सूरत मेरे सामने आ गई, जो बेहद विद्रूप है! तुम मुझे डिज़र्व करती ही नहीं हो… मुझे तो धोखा दिया, जय की तो होकर रहो! और हां, इस ग़लतफ़हमी में मत रहना किमैं तुम जैसी लड़की के प्यार में दीवाना बनकर उम्र भर घुटता रहूंगा, शुक्र है ऊपरवाले ने मुझे तुमसे बचा लिया…”

“अरे रौनक़, यार पार्टी तो एंजॉय कर, कहां खोया हुआ है…?” मेरे दोस्त मार्टिन ने टोका तो मैं यादों से वर्तमान में लौटा औरफिर डान्स फ़्लोर पर चला गया, तमाम पिछली यादों को हमेशा के लिए भुलाकर, एक नई सुनहरी सुबह की उम्मीद केसाथ!

  • गीता शर्मा 

ऑफिस से निकलते ही मेरी नज़र सामने बैठे एक प्रेमी जोड़े पर पड़ी, जो एक-दूसरे से चिपककर बैठे थें. उस जोड़े को देखकर मैं ख़्यालों में खो गई. अनुष्का ने आकर जब मेरे कंधे पर हाथ रखा तब मैं वर्तमान में लौटी.

अनुष्का ने कहा, “निशा तू जिस तरह से उस कपल को देख रही है, लगता है अपने बीते दिनों की याद ताज़ा कर रही है. क्यों सच है न…” थोड़ा झेपते हुए मैंने हां कह दिया. दरअसल, मैं जब ग्यारहवी में पढ़ती थी, तो मेरे बड़े भाई का दोस्त प्रशांत अक्सर हमारे घर आता-जाता था. तब मेरी उससे बात नहीं होती थी. एक दिन उसने मेरे मोबाइल पर फोन किया और  इधर-उधर की बात करने लगा. उस दिन के बाद से फोन का ये सिलसिला काफ़ी लंबा चलता रहा.

एक दिन रोज़ डे था और उसने फोन पर ही मुझे प्रपोज़ कर दिया. मैं उसकी बात सुनकर चौंक गई, “मैंने कहा तुम मेरे भाई के दोस्त हो और मैं तुम्हें अपने भाई जैसा ही मानती हूं,” पर वो नहीं माना. रोज़ फोन करके मिन्नते करने लगा. हर बार मैं उसे मना कर देती, लेकिन उसने कोशिश करना नहीं छोड़ा. मैंने उससे कहा, “मेरे इम्तिहान आने वाले है. अतः मुझे पढ़ने दो.” उसने जवाब दिया, “तुम बस एक बार मेरे प्यार के रंग में रंगकर हां बोल दो, मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करूंगा, प्रॉमिस.” मैं फिर भी नहीं मानी.

उसने घर पर आना-जाना और फोन करना बंद कर दिया. अब मुझे उसकी कमी खलने लगी क्योंकि उससे बात करने की आदत जो पड़ गई थी. जब मुझसे रहा नहीं गया तो एक दिन मैंने ख़ुद उसे फोन किया और हां बोल दिया. प्रशांत बोला, “इतनी छोटी-सी बात बोलने के लिए निशा तुमने इतना टाइम लगा दिया. हमारा वैलेनटाइन डे भी निकल गया.”

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मैंने कहा, “अगले साल मना लेंगे.” फिर पहले की तरह हमारी बात होने लगी.  हम अक्सर मिलते थे, जब मैं उसके साथ होती तो मुझे लगता कि सारी दुनियां की ख़ुशियां मेरे दामन में समा गई है. काश! व़क्त थम जाता पर व़क्त किसी के लिए नहीं थमता. एक दिन हम अलग हो गए.

दरअसल, प्रशांत के पापा इंजीनियर थे और उनका ट्रांस्फर दूसरे शहर हो गया था. जब यह ख़बर मुझे मिली तो मैं प्रशांत पर भड़क गई और प्रशांत भी गर्दन नीचे झुकाकर रोने लगा. मैंने प्रशांत को गले लगा लिया. वो बोला, “तुमसे भी ज़्यादा मैं तुम्हें प्यार करता हूं, मैं तुमसे दूर नहीं जाना चाहता, निशा मुझे अपने पास रख लो.” मगर ये संभव नहीं था. फिर प्रशांत अपने मम्मी-पापा के साथ दूसरे शहर चला गया. वहां से अक्सर उसका फोन आता, मगर धीरे-धीरे फोन का सिलसिला कम और फिर बिल्कुल बंद हो गया.

हम दोनों अपनी-अपनी दुनिया में मश्गूल हो गए. मेरी पढ़ाई पूरी होने के बाद घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी. एक दिन लड़के वाले मुझे देखने आए. चाय का ट्रे लेकर जैसे ही मैं कमरे में दाख़िल हुई मेरी आंखे फटी की फटी रह गई… क्योंकि जिस लड़के से मेरी शादी तय हुई थी वो और कोई नहीं, बल्कि प्रशांत था. सालों बाद आख़िरकार मुझे अपना प्यार मिल ही गया. शादी के इतने सालों बाद भी जब अपनी लव स्टोरी याद आती है, तो होठों पर मुस्कान बिखर जाती है.

– नूतन जैन

रंगों और ख़ुशियों से सराबोर होली का दिन सबके लिए बेहद रंगीन होता है, लेकिन मेरे लिए ये रंग मेरे पुराने ज़ख्मों कोहरा करने के सिवा और कुछ नहीं… मुझे याद है जब अप्रतिम ने होली के रोज़ ही मुझे आकर गुलाबी रंग से  रंग डाला था. मैं बस देखती ही रह गई थी, न उसे रोका, न टोका. 

अगले दिन कॉलेज में मुलाक़ात हुई तो अप्रतिम ने पूछा, “आरोही, तुमको बुरा तो नहीं लगा मेरा इस तरह अचानक आकरतुमको रंग लगाना?”

“नहीं, ख़ुशी का दिन था, होली में तो वैसे भी गिले-शिकवे दूर हो जाते हैं…” मैंने जवाब दिया. 

अप्रतिम ने फिर मेरी आंखों में झांका और कहा, “अगर मैं ये कहूं कि इसी तरह मैं तुम्हें अपने प्यार के रंग में रंगना चाहता हूं, ताउम्र, तब?”

मैं उसकी तरफ़ देखती रह गई, आख़िर कॉलेज की कई लड़कियां उसकी दीवानी थीं. बेहद आकर्षक और सुलझा हुआ थाअप्रतिम. 

“तुम्हारी चुप्पी को हां समझूं?” अप्रतिम ने टोका तो मैं भी मुस्कुराकर चली गई वहां से. पहले प्यार ने मुझे छू लिया था, मेरीज़िंदगी में इस होली ने वाक़ई मुहब्बत के रंग भर दिए थे. 

कॉलेज पूरा हुआ, अप्रतिम को अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई थी और मैं भी अपना पैशन पूरा करने में जुट गई. कमर्शियल पायलेट बनने का बचपन से ही सपना था मेरा.

इसी बीच अप्रतिम ने बताया उसकी बहन की शादी तय हो गई है और उसके बाद वो हमारी शादी की बात करेगा घर में. 

एक रोज़ मैंने अप्रतिम से कहा कि चलो आज दीदी के ऑफ़िस चलकर उनको सर्प्राइज़ देते हैं, तब अप्रतिम ने बताया किदीदी ने जॉब छोड दिया. वजह पूछने पर उसने बताया कि शादी के बाद वो घर सम्भालेंगी, क्योंकि उनके होनेवाले सास-ससुर व पति भी यही चाहते हैं. 

“लेकिन तुमने या दीदी ने उनको समझाया क्यों नहीं, दीदी इतनी टैलेंटेड हैं. हाइली क्वालिफ़ाइड हैं…” 

अप्रतिम ने मुझे बीच में ही चुप कराकर कहा कि ये उनका मैटर है और शादी के लिए तो लड़कियों को एडजेस्ट करना हीपड़ता है, इसमें ग़लत क्या है? आगे चलकर उनको ग्रहस्थी ही तो सम्भालनी है. 

मुझे बेहद अजीब लगा कि इतनी खुली व सुलझी हुई सोच का लड़का ऐसी बात कैसे कर सकता है?

ख़ैर, मुझे भी जॉब मिल गया था और अब मैं आसमान से बातें करने लगी थी. तभी घर में मेरी भी शादी की बात चलने लगीऔर मम्मी-पापा ने अप्रतिम से कहा कि वो भी अपने घरवालों को बुलाकर हमसे मिलवा दे.

“अप्रतिम, क्या बात है? तुम संडे को आ रहे हो न मॉम-डैड के साथ? इतने परेशान क्यों हो? उनको भी तो हमारे बारे में सबपता है, फिर तुम उलझे हुए से क्यों लग रहे हो?” मैंने सवाल किया तो अप्रतिम ने कहा कि उसकी उलझन की वजह मेराजॉब और करियर है. वो बोला, “आरोही,  मैं समझता हूं कि ये तुम्हारे लिए सिर्फ़ एक जॉब नहीं, बल्कि तुम्हारा सपना है, लेकिन मेरे पेरेंट्स इसे नहीं समझेंगे. उनका कहना है कि इतना टफ़ काम तुम क्यों करती हो? लकड़ी होकर इसमें करियरबनाने की बजाय तुम कोई दफ़्तर की पार्ट टाइम नौकरी कर लो, ताकि मेरा भी ख़याल रख सको और घर भी सम्भालसको…” 

मैंने उसे बीच में टोका, “तुम्हारा ख़याल? तुम कोई बच्चे नहीं हो और न मैं तुम्हारी आया. हम पार्टनर्स हैं, तुमने अपने पेरेंट्सको समझाया नहीं?”

“आरोही मैं क्या समझाता, वो भी तो ग़लत नहीं हैं. मैं अच्छा-ख़ासा कमाता हूं. पैसों को वैसे भी कमी नहीं…”

“बात पैसों की नहीं है, बात मेरे सम्मान और मेरी राय की भी है न अप्रतिम? उसकी कोई क़ीमत नहीं? हम कर लेंगे न दोनोंमिलकर… तुम तो कहते थे कर कदम पर मेरा साथ दोगे…” मैंने उसे समझाया.

“देखो आरोही, मेरी दीदी ने भी तो किया न एडजेस्ट? तुम क्यों नहीं? अंत में तो घर ही सम्भालना है ना? पैशन तो हो गया नपूरा, अपने प्यार की ख़ातिर? मेरी ख़ातिर?” अप्रतिम की बातें मुझे आहत कर रही थीं… वो कहे जा रहा था… “तुमकोअपने पैशन और मेरे प्यार में से एक को चुनना ही होगा… मैं तुम्हारे जवाब का इंतज़ार करूंगा…”

मैं रातभर रोती रही, सपने बिखरते नज़र आ रहे थे मुझे, फिर पापा ने समझाया, अपने दिल पर हाथ रखकर जवाब मांगो, सही रास्ता नज़र आ जाएगा… और पापा सही थे. आज मेरे सपने खुली हवा में पंख फैलाकर आकार ले रहे थे. मैं खुश थीअपने निर्णय से. ऐसी सोच वाले व्यक्ति के साथ उम्र भर घुटकर जीने से तो अच्छा है कि मैं अपना सम्मान करूं, क्योंकिअगर वो प्यार करता तो खुद भी एडजेस्ट करके पेरेंट्स को समझा सकता था, लेकिन वो मुझे अपनी ज़िद और सोच केआगे झुकाना चाहता था, इसलिए मैंने उसको अगले ही दिन मैसेज कर दिया था- गुडबाय अप्रतिम, हमेशा के लिए!

  • गीता शर्मा 

कॉलेज का वो दौर, वो दिन आज भी याद आते हैं मुझे. 18-19 की उम्र में भला क्या समझ होती है. मैं अपने बिंदास अंदाज़में मस्त रहती थी. कॉलेज में हम चार दोस्तों का ग्रुप था. उसमें मैं अकेली लड़की थी, लेकिन मुझे लड़कों के साथ रहने परभी कभी कुछ अटपटा नहीं लगा. उनमें से सिद्धार्थ तो सीरियस टाइप का था,पर  दूसरा था सुबीर, जो कुछ ज़्यादा ही रोमांटिक था. उसे मेरे बाल और कपड़ों की बड़ी चिंता रहती. लेकिन अजीब से रोमांटिक अंदाज़ में उसके बात करने से मुझेबड़ी चिढ़ होती थी.

लेकिन इन सबसे अलग था हमारे ग्रुप का वो तीसरा लड़का, नाम नहीं लिखना चाहती, पर हां, सुविधा के लिए अवनि कहसकते हैं.

करीब चार साल तक हमारा साथ रहा, लेकिन पढ़ाई और घर के सदस्यों के हाल चाल जानने तक तक ही हमारी बातचीतसीमित थी.

आगे भी एक साल ट्रेनिंग के दौरान भी हम साथ थे, लेकिन हमारे डिपार्टमेंट अलग थे और काफ़ी दूर-दूर थे.

वो दौर ऐसा था कि लड़के-लड़कियों का आपस में बात करना समाज की नज़रों में बुरा माना जाता था, लेकिन अवनिआधे घंटे के लंच टाइम में भी पांच मिनट निकाल कर मुझसे मिलने ज़रूर आता था, बस थोड़ी इधर-उधर की बातें करके चला जाता.

फिर वो समय भी आ गया जब साल भर की ट्रेनिंग भी ख़त्म होने को आई और अवनि को उसके भाई ने नौकरी के लिएअरब कंट्री में बुला लिया था. उसकी कमी खल तो रही थी लेकिन हमारे बीच सिर्फ़ एक दोस्ती का ही तो रिश्ता था. वो जबभी अपने पैरेंट्स से मिलने इंडिया आता तो मुझसे भी ज़रूर मिलकर जाता.

मेरे घर में सभी लोग उससे बड़े प्यार से मिलते थे, वो था ही इतना प्यारा. निश्छल आंखें और बिना किसी स्वार्थ के दोस्तीनिभाना- ये खूबी थी उसकी. मैं अक्सर सोचती कि हम दोनों के बीच कुछ तो ख़ास और अलग है, एक लगाव सा तो ज़रूरहै, वही लगाव उसे भारत आते ही मुझ तक खींच लाता था.

वो जब भी आता मेरी लिए बहुत सारे गिफ़्ट्स भी लाता. उसे पता था कि मेकअप का शौक़ तो मुझे था नहीं, इसलिए वो मेरे लिए परफ़्यूम्स, चॉक्लेट्स और भी न जाने क्या-क्या लाता. 

इसी बीच उसकी शादी भी तय हो गई और जल्द ही उसने सात फेरे ले लिए.

मैं खुश थी उसके लिए, लेकिन उसकी शादी में मैं नहीं जा पाई. हां, अगले दिन ज़रूर गिफ्ट लेकर अवनि और उसकी पत्नीसे मिली.

इसके बाद उससे अगली मुलाकात तब हुई, जब वो अपने एक साल के बेटे को लेकर मुझसे मिलने आया. 

कुछ समय बाद मेरी भी शादी हो गई. वो भी मेरी शादी में नहीं आ पाया. फिर मैं भी घर-परिवार में इतनी खो गई कि कुछसोचने का वक़्त ही नहीं मिला. लेकिन दिल के किसी कोने में, यादों की धुंधली परतों में उसका एहसास कहीं न कहीं था. मुझे याद आया कि आख़री बार जब उससे मिली थी तो जाते समय उसने एक फिल्मी ग़ज़ल सुनाई, जिसका कुछ-कुछअर्थ था कि मैं अपना वादा पूरा नहीं कर पाया, इसलिए मुझे फिर जन्म लेना होगा… 

उसे सुनकर मैं भी अनसुलझे से सवालों में घिरी रही. अब घर-गृहस्थी में कुछ राहत पाने के बाद यूं ही अवनि का ख़यालआया और मन में हूक सी उठी. मैंने एक दिन सोशल मीडिया पर अवनि को ढूंढ़ने की कोशिश की और मैं कामयाब भी होगई. हमारे बीच थोड़ी-बहुत बात हुई और जब मैंने उससे पूछा कि इतने वक़्त से कहां ग़ायब थे, न कोई संपर्क, न हाल-चाल पूछा, मेरी इस बात पर उसने कहा, “तुम्हारी याद तो बहुत आई, पर मैंने सोचा तुम अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो, तोबेवजह डिस्टर्ब क्यों करना.”

मैं हैरान रह गई उसकी यह बात सुनकर कि अवनि इतनी भावुक बात भी कर सकता है? फिर काफ़ी दिन तक हमारी बातनहीं हुई.

एक दिन मैं अपने लैपटॉप पर कुछ देख रही थी कि अचानक अवनि का मैसेंजर पर वीडियो कॉल आया, क्योंकि अरब देशों में व्हाट्सएप्प कॉल पर बैन है. 

कॉल लिया तो देखा वो किसी अस्पताल में के बेड पर था और ढेर सारी नलियां शरीर पर लगी हुई थीं.

कहने लगा, “कैसा लगता है जब आदमी अस्पताल में अकेला होता है… किसी बेहद अपने की याद आती है…” उस समय भी वह मुस्कुरा रहा था. लेकिन उसकी आंखें बंद सी हो रही थीं. 

मैंने घबराकर पूछा, “क्या हुआ तुम्हें?” इससे पहले वो कुछ बोलता कॉल डिसकनेक्ट हो गई.

बाद में मैसेज में पूछने पर उसका जवाब आया कि मैं कुछ ठीक हूं. कोविड से रिकवर हो रहा हूं. जल्दी ही तुमसे मिलुंगा…

लेकिन वो नहीं आया, बस उसकी खबर ही आई… अभी हफ्ते भर पहले पता चला कि वो संसार छोड़ गया.

न जाने क्यों उसके चले जाने से ज़िंदगी का, दिल का एक कोना खाली और तनहा हो गया. लेकिन कुछ सवाल वो छोड़गया और मैं खुद से ही पूछ रही थी कि क्या वो मुझसे प्यार करता था… अस्पताल में अकेले में ज़िंदगी के आख़री पलों मेंउसे मेरी ही याद आई. क्या ये प्यार था?

ये सवाल मेरे मन में आज भी रह-रहकर आता है, लेकिन इसका जवाब देने वाला दूर, बहुत दूर जा चुका है…!

अलका कुलश्रेष्ट

कभी सोचा नही था यूं किसी से प्यार हो जाएगा… ये कहां जानती थी कि खुद का दिल खुद का नही रह जाता… दिल के हाथों मजबूर होना पड़ता है, ये तब समझ में आया, जब मुझे प्यार का मतलब समझ में आया. उससे मेरी पहली मुलाकात कैंसर हॉस्पिटल में हुई थी. मै वहां नर्स थी और वो कैंसर पेशेंट. वह हॉस्पिटल में अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिन काट रहा था. एक दिन मैंने देखा वो वह गुनाहों का देवता उपन्यास पढ़ रहा था… “यह मेरा पंसदीदा उपन्यास है.” मैंने इंजेक्शन तैयार करते हुए कहा.

उसने उपन्यास को एक तरफ रखते हुए कहा, “अरे, आप लोग भी रोमांस से भरी किताबें पढ़ते हैं.” मैंने उसे घूरते हुए देखा.
“नहीं, वो आप लोग इंसानों की चीरफाड़… मुझे लगा आप लोग निष्ठुर होते हो. पेशेंट कितना भी चीखे आप जलने वाली दवा ज़ख्मों पर लगाते ही हो.”
“वो इसलिए कि मरीज़ ठीक हो जाए… कभी-कभी कठोर बनना पड़ता है.”
“आप लोग प्यार-व्यार जानते हो ये नहीं सोचा था…” वह मेरे चेहरे पर नज़रें गड़ाते हुए बोला.
मै मुस्करा कर रह गई.
दूसरे दिन मैं जब उसका चेकअप कर रही थी, तो वो पूछ बैठा- “आपके पास अमृता इमरोज़ हों, तो देना… मैं पढ़ना चाहता हूं. कल लौटा दूंगा.”
जिसके जीवन के अगले पल का भरोसा नहीं, वो आने वाले कल की उम्मीद लगाए बैठा है… मैं अनायास ही मुस्करा दी. 
“आपकी मुस्कराहट ओस के मोती जैसी है”उसने तारीफ करते हुए कहा.
उस दिन मेरी नाइट ड्यूटी थी. मैंने उसे उपन्यास पढ़ने को दिया, वह इतना खुश हुआ था, जैसे मचलते बच्चे को चॉकलेट का मिल गई हो.
वह फ़ौरन पढ़ने बैठ गया. मैं बीच-बीच में उसके वॉर्ड में जाकर उसे देखती, पर वो पढ़ने में ही तल्लीन था. “रात के दो बजे गए, अब सो जाओ.”
“कुछ दिन बाद चिर निंद्रा में सोना ही है, क्यों न कुछ देर जाग लूं.” मेरे पास उसकी बात का जवाब नहीं था. दो कप कॉफ़ी लेकर मैं उसके पास पहुंची. “मुझे भी नींद नहीं आ रही है, चलो कॉफ़ी पीते हैं.” वह कॉफ़ी पीते-पीते बोला, “प्यार भी अजीब चीज़ है.”
“उपन्यास का जादू चढ़ा है या किसी से प्यार किया है” मैंने उसे छेड़ते हुए पूछा.
“एक आरज़ू, एक जुस्तजू, एक ख्वाब, एक नशा… न जाने कितने नाम होते हैं प्यार के. चाहा जो मिल जाए, तो ज़िंदगी से शिकायत कैसी? मै प्यार करता था उससे. मुझे कैंसर है यह बात पता चलते ही वह किनारा कर गई. सच तो है प्यार की परिणति प्यार ही हो ये ज़रूरी नहीं. मैं प्यार नहीं पा सका, पर उसका एहसास मेरे आसपास आज भी मौजूद है. मैं प्रेम कहानियों को जीना चाहता था. वो ख्वाहिश आपने पूरी कर दी.”

Pahla Affair

मैं कुछ दिनों से उसके लिए अलग-सा महसूस करने लगी. मुझे उससे एक अजीब-सा लगाव हो गया था. उसके बगैर कुछ खालीपन लगने लगा था. कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि इस तरह किसी से मुझे प्यार हो जाएगा. मैं खुद को समझाने लगी थी, पर उसकी बातें, उसकी मुस्कुराहट,  उसका एहसास मुझे बैचेन कर रहा था. उस दिन जब मैं हॉस्पिटल पहुंची, तो पता चला वो नहीं रहा. दिल बैठ गया… पर ये तो होना ही था. फिर भी मुझे बुरा लग रहा था. रह-रहकर मुझे उसकी याद आ रही थी. कुछ देर बाद वॉर्ड बॉय ने एक लेटर थमाते हुए कहा, “मरने से पहले उन्होंने यह पत्र आपको देने को कहा था.”
मैंने जल्दी से पत्र खोला, लिखा था…

‘प्रिय दोस्त,
         ख्वाहिशों की कोई उम्र नहीं होती, इन चंद दिनों में मेरे मन में आपके प्रति प्यार एक अलग-सा लगाव, कशिश या सच कहूं तो प्यार जाग गया था. चाहा था कि आपके दिल का एक कोना मेरे लिए, मेरी मुहब्बत से गुलज़ार हो और मेरे प्यार की खुशबू से आपका तन-मन महके, हर लम्हा सुकून से भरा हो, ख्यालों में प्यार की ख़ामोशी हो… और भी न जाने क्या-क्या… पर ऐसा हो न सका. मेरा पास वक्त नहीं है, फिर भी मुझे अफसोस नहीं…  आपके साथ गुज़ारे इन पलों की याद और आपके प्यार की महक साथ लिये जा रहा हूं. शुक्रिया! मेरी ज़िंदगी के आखिरी पलों को खुशनुमा बनाने के लिए.
         – तुम्हारा प्यारा दोस्त
ख़त पढ़ते-पढ़ते मेरी आंखें भीग गईं. उसके प्यार की धरोहर मैंने सहेज ली. उसकी बातें मेरे दिल में गूंज रही थी… प्यार की परिणति प्यार तो नहीं. मैं भी… मैं भी तुमसे प्यार करती हूं मेरे दोस्त… सदा के लिए अलविदा! तुम हमेशा मेरे दिल में, मेरी यादों में रहोगे. 

– शोभा रानी गोयल

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“काजल तू यहां क्या कर रही है? आज शाम को तो शशि जा रहा है न फिर से ड्यूटी जॉइन करने, उसके साथ होना चाहिएतुझे. आख़िर शादी होने वाली है तुम दोनों की… वैसे भी शशि न सिर्फ़ तेरे भइया के साथ फ़ौज में था, उनका दोस्त था, बल्कि तेरा प्यार भी तो है.”

“नहीं भाभी, मुझे शशि से बात नहीं करनी और ना ही शादी, उसके लिए उसका काम ही सब कुछ है…”

“काजल इतनी सी बात के लिए ऐसा नाराज़ नहीं होते… मैं बस इतना कहूंगी कि प्यार भरे पलों को यूं व्यर्थ की बातों मेंबर्बाद मत करो, उनको जितना हो सके समेट लो, वक़्त का कोई भरोसा नहीं, न जाने फिर कभी किसी को मौक़ा दे, नदे…”

काजल से बात करते हुए मैं पुराने दिनों की यादों में खो गई… 

मैं और काजल बचपन के साथी थे. हम साथ ही कॉलेज के लिए निकलते थे. रोज़ की तरह आज भी मैं काजल के घर गईतो दरवाज़ा खुलते ही एक बेहद आकर्षक लड़का मेरे सामने था. मैं एक पल के लिए तो सकपका गई, फिर पूछा मैंने- “जीवो काजल?”

“काजल पास के मेडिकल स्टोर पर गई है अभी आती होगी. अंदर आ जाओ.”

मैं भीतर चली गई, घर में कोई नहीं था.

इतने में ही आवाज़ आई- “तुम ख़ुशबू हो ना?”

“हां, और आप विनोद?”

“अरे वाह! बड़ी जल्दी पहचान लिया, दरवाज़े पर तो ऐसे खड़ी थी जैसे कि भूत देख लिया हो…”

“नहीं वो इतने टाइम के बाद आपको देखा… काफ़ी बदल गए हो.”

“हां, क्या करें, फ़ौजी हूं, पोस्टिंग होती रहती है, तो यहां आना ही कम होता है, फ़िलहाल बॉर्डर पर हूं. वैसे बदल तो तुम भी गई हो, मेरा मतलब कि काफ़ी खूबसूरत हो गई हो.”

Pahla Affair

मैं झेंप गई और इतने में ही काजल भी आ गई थी.

“ख़ुशबू विनोद भइया से मिलीं?”

“हां काजल, चल अब कॉलेज के लिए देर हो रही है.”

कॉलेज से आने के बाद मैं बचपन के दिनों में खो गई. विनोद, काजल और मैं बचपन में साथ खेला करते थे. विनोद हमसे बड़े थे थोड़ा, लेकिन हमारी खूब पटती थी. उसके बाद विनोद डिफेंस फ़ोर्स में चले गए और उनसे मुलाक़ातें भी ना केबराबर हुईं. लेकिन आज विनोद को एक अरसे बाद देख न जाने मन में क्यों हलचल सी हो गई. 

शाम को विनोद घर आए, तो उनका सामना करने से झिझक सी हो रही थी. मैं सोचने लगी ये अचानक क्या हो गया मुझे? विनोद की कशिश से मैं खुद को छुड़ा ही नहीं पा रही थी. पर क्या विनोद भी मेरे लिए ऐसा ही सोचते हैं? 

उस दिन काजल का जन्मदिन था, मैं शाम को पार्टी में गई तो नज़रें विनोद को ही ढूंढ़ रही थीं. इतने में ही मेरे कानों में हल्कीसी आवाज़ आई, बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो, नज़र न लग जाए!” विनोद की इस बात से पूरे बदन में सिहरन सी होने लगी. खाना खाने बैठे तो टेबल के नीचे से उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया. उस पूरी रात मैं सो नहीं पाई.

अगले दिन मम्मी ने कहा आज घर पर ही रहना, तुझे लड़के वाले देखने आ रहे हैं. 

मैं हैरान-परेशान… “मम्मी मुझसे पूछ तो लिया होता, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती.”

“बेटा, अभी कौन कह रहा है, बस बात पक्की हो जाए, फिर तू पढ़ाई पूरी करके, नौकरी लग जाए उसके बाद करना, उनकोकोई ऐतराज़ नहीं.”

“पर मां ये अचानक कहां से आ गया लड़का, कौन हैं ये लोग…”

“तू शाम को देख लेना…”

Pahla Affair

मुझे लगा ये सब क्या हो रहा है, अब विनोद को भी क्या कहूं, कैसे कहूं, हमारे बीच ऐसा रिश्ता तो अब तक बना भी नहींथा…

ख़ैर शाम हुई और मैंने देखा विनोद की फ़ैमिली हमारे घर पर थी. मेरी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था. 

तभी मम्मी और काजल ने कहा- “क्यों शादी के लिए अब भी तुम्हारी ना है या हां?”

हमारी सगाई हुई और विनोद की छुट्टियां ख़त्म… फ़ोन, मैसेजेस पर खूब बातें होतीं, विनोद फिर बीच में कुछ दिनों के लिएआए और तब शादी की तारीख़ भी फ़ाइनल हो गई. कार्ड्स के डिज़ाइंस से लेकर शादी की तैयारियों में दोनों परिवार व्यस्तहो गए. पर इसी बीच एक ख़बर आई कि आतंकियों से लड़ते हुए विनोद शहीद हो गए… सब कुछ बिखर गया…

“भाभी, तुम्हारी आंखों में आंसू… भइया की याद आ गई?”

काजल की आवाज़ से मैं वर्तमान में लौटी… “काजल, मैंने विनोद को खोया उस बात का तो ग़म है ही, लेकिन मुझे खुदपर भी बहुत ग़ुस्सा गई, क्योंकि हमारी आख़री मुलाक़ात में मैं विनोद से खूब झगड़ी थी, नाराज़ हुई थी वो भी सिर्फ़इसलिए कि एक तो वो लेट आए और उन्होंने ना मुझे मूवी दिखाई और ना मेरी तारीफ़ की थी… उनके जाने बाद भी उसनेमुझे सॉरी के मैसेजेस किए, फोन किए पर मैंने अपने झूठे ग़ुस्से में किसी का भी जवाब नहीं दिया… जब ग़ुस्सा ठंडा हुआतब तक उनके शहीद होने की खबर आ चुकी थी… काजल मैंने ताउम्र उनकी विधवा बने रहने का रास्ता चुना और मैंख़ुशनसीब हूं कि मेरे और तेरे घरवालों ने मेरे इस फ़ैसले का सम्मान किया, लेकिन मेरी आत्मा पर ये बोझ हमेशा रहेगा किआख़री पलों को मैंने क्यों नहीं समेटा, प्यार से उनको विदा करती तो कितना अच्छा होता…”

अचानक काजल उठकर जाने लगी तो मैंने टोका- “क्या हुआ? कहां जा रही हो?”

“अपने प्यार को समेटने भाभी…”

उसके और मेरे दोनों के चेहरे पर मुस्कान दौड़ पड़ी! 

  • परी शर्मा 

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सावन बरस रहा है… मेरा विरही मन जल रहा है.. मुझे याद आ रही है सावन की वो पहली बारिश… उस पहली बारिश की वो की भीगती हुई खूबसूरत शाम और उस शाम का वो हसीन लम्हा… मन सुलग रहा था …तन मचल रहा था…लजाती खामोश आंखें… जज़्बातों का उफान चरम पर था, हम दोनों अकेले उस कमरे में थे कि अचानक बिजली कड़कने से मैं डरकर तुम्हारे सीने से लिपट गई थी और तुमने मुझे मजबूती से थाम लिया था.

मैं झिझक रही थी… लजा रही थी और खुद को तुमसे छुड़ाने का असफल प्रयास कर रही थी. बारिश जब तक थम नहीं गई, तब तक हमारी खामोशियां रोमांचित होकर सरगोशियां करती रहीं… मौन मुखर होकर सिर्फ़ आंखों के रास्ते से एक-दूसरे के दिल को अपने मन का हाल बता रहा था. बारिश में भीगते अरमान मुहब्बत के नग़मे गुनगुना रहे थे… इतना हसीन मंजर था वो कि आज भी याद कर मां रोमांचित हो उठता है… लग रहा था कि ये बारिश ताउम्र यूं ही होती रहे, ये बदल ऐसेही मुहब्बत बरसाते रहें… ये बिजली कौंधकर यूं ही डराती रहे ताकि मैं तुमसे यूं ही लिपटी रहूं… चाहत के ये पल यूं ही थमे रहें… 

मन इश्क़ के नशे में डूबा हुआ था कि अचानक बारिश और भी तेज़ हो गई. लग रहा था भगवान ने मेरी सुन ली थी… यूं लग रहा था कि बाहर एक तूफ़ान चल रहा है और यहां अंदर, मन के भीतर भी एक तूफ़ान शुरू हो गया था.

तुमने अपने हाथों से मेरे आरक्त चेहरे को उठाकर मेरे सुर्ख और तपते हुए अधरों को अपनी चाहत भरी पावन नज़रों से  निहारा, फिर कहा… “अभी नहीं, अभी पाप है यह” ये कहते हुए तुमने अपनी नज़रों को झुका लिया था.

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Pahla Affair

सच, आज वो लम्हा याद करके सोच रही हूं कि अगर उस वक़्त तुम्हारी नजर में वो पाप था, तो काश! वो पाप हो जाने दिया होता… उम्र के इस पड़ाव पर आकर वो पाप अब तक पुण्य में तब्दील हो गया होता. 

खैर, अब पाप-पुण्य की परिभाषा से इतर हमारा प्रेम वक्त के साथ परिपक्व और रोमांटिक हो गया है… जो मिलन के क्षणों में भीगते जज़्बात को सावन का एहसास करा देता है. तुम्हारी नेह भरी छवि देखकर मेरे प्रतीक्षारत दृगयुगल में अचानक से जो एक प्रज्ज्वलित पवित्र दीये की तरह चमक आ जाती है, वो क्षण मेरी दिवाली बन जाता है. हर वक्त तुम्हारी टिप टिप बरसती मुहब्बत की रंगीन बरखा से कभी मैं शर्म से लाल हो उठती हूं, तो कभी तुम्हारी शरारत से बनावटी गुस्से में लाल-पीली हो उठती हूं, वही मेरी होली मन जाती है. तुम मेरे जीवन की बसन्त बहार हो, मेरा प्यार हो सिर्फ मेरा प्यार हो…!

सिर्फ तुम्हारी 

डॉ. अनिता राठौर मंजरी

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ये भीगता मौसम, ये बरसती फ़िज़ा… मन के किसी कोने में तुम्हारी यादों की सोंधी महक को फिर हवा दे जाते हैं… जब-जब ये बारिश होती है, तन के साथ-साथ मन को भी भिगो देती है… कैसी अजीब सी कशिश थी तुम्हारी उस सादगी में भी, कैसी रूमानियत थी तुम्हारी आंखों की उस सच्चाई में भी… मेरा पहला जॉब वो भी इतने बड़े बैंक में. थोड़ा डर लग रहा थालेकिन तुमने मुझे काफ़ी कम्फ़र्टेबल फील कराया था.

हर वक्त मेरी मदद की और न जाने कैसे धीरे-धीरे एक दिन अचानक मुझे ये एहसास हुआ कि कहीं मैं प्यार में तो नहीं? 

कुछ दिन अपने दिल को समझने और समझाने में ही बीत गए और उसके बाद मैंने निर्णय ले लिया कि तुमसे अपनीफ़ीलिंग्स का इज़हार कर दूंगी क्योंकि घर में भी मेरी शादी को लेकर बात चलने लगी थी. 

मैंने देर करना ठीक नहीं समझा और कहीं न कहीं मुझे भी ये लगने लगा था कि तुम्हारा भी खिंचाव और लगाव है मेरीतरफ़. मैंने लंच में तुमसे बिना झिझके साफ़-साफ़ अपने दिल की बात कह दी. तुमने भी बड़े सहज तरीक़े से मुझसे कहाकि तुम भी मुझसे प्यार करने लगे हो लेकिन एक सच है जो तुम मुझे बताना चाहते हो, लेकिन शाम को फ़ुर्सत में… 

‘निशांत, कहो क्या कहना चाहते हो?’

‘निधि मैंने तुमको अपने घर इसलिए बुलाया कि बात गंभीर है और मैं तुमको अंधेरे में नहीं रखना चाहता. निधि ये तस्वीर मेरी 3 साल की बेटी किट्टू की है.’ 

‘तुम शादीशुदा हो? तो तुमने मुझे अपने घर क्यों बुलाया? तुम्हारी पत्नी और बेटी कहां हैं?’

‘निधि, यही सब बताने के लिए तो बुलाया है तुम्हें! मेरी पत्नी और मैं अलग रहते हैं. हमने तलाक़ का फ़ैसला लिया है. किट्टू भी राधिका के साथ ही है. मेरी पत्नी राधिका को मेरी सादगी और सहजता पसंद नहीं थी. उसको शुरू से लगता था कि मैंऔरों की तरह स्मार्ट नहीं. उसकी ख्वाहिशें भी बहुत बड़ी थीं जो मैं पूरी न कर सका, इसलिए हमने अलग होने का फ़ैसला किया है.’

‘निशांत मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं, मैं तुमसे बेहद प्यार करती हूं और तलाक़ तक तो क्या, ताउम्र तुम्हारा इंतज़ार कर सकती हूं!’ 

इसके बाद सब कुछ ठीक चल रहा था, मेरी शामों में रूमानियत घुलने लगी थी, दिन रंगीन हो ही रहे थे कि निशांत ने बताया उसकी बेटी किट्टू बहुत बीमार है और राधिका वापस घर लौट आई है क्योंकि किट्टू अपने मम्मी-पापा दोनों के साथ रहना चाहती थी. किट्टू की रिपोर्ट्स से पता चला कि उसको ब्रेन ट्यूमर है और सर्जरी करनी पड़ेगी, जो काफ़ी रिस्की है! 

मैंने निशांत को कहा कि फ़िलहाल वो किट्टू पर ध्यान दे. 

‘क्या बात है निशांत, तुम इतने उलझे-उलझे क्यों रहते हैं इन दिनों? किट्टू ठीक हो जाएगी, ज़्यादा सोचो मत!’

‘निधि किट्टू की फ़िक्र तो है ही लेकिन एक और बात है, राधिका काफ़ी बदल गई है. उसका कहना है कि किट्टू हम दोनों केसाथ रहना चाहती है और उसकी ख़ातिर वो खुद को बदलना चाहती है, लेकिन मैंने उसे अपने और तुम्हारे रिश्ते के बारे मेंबता दिया है, राधिका को कोई आपत्ति नहीं, पर किट्टू की ज़िद का क्या करूं. वो बस यही कहती है कि उसको मम्मी-पापा दोनों के साथ रहना है!

‘निशांत, किट्टू की ज़िद ग़लत नहीं है, हर बच्चा यही चाहता है और जब राधिका भी बदलने को तैयार है तो तुम्हें भी अपने रिश्ते को एक और मौक़ा ज़रूर देना चाहिए!’

‘कैसी बातें कर रही हो तुम? क्या हमने सपने नहीं देखे अपने प्यार के लिए, उनको कैसे तोड़ दूं?’

‘एक 3 साल की बच्ची का दिल और अपनी शादी को तोड़ने से तो बेहतर है हम अपनी ख्वाहिशों को एक कदम पीछे कर लें! रही बात मेरी, तो मैं सारी ज़िंदगी तुम्हारा इंतज़ार करूंगी और अपने प्यार की वजह से ही मैं तुमसे कह रही हूं कि किट्टूकी ख़ातिर एक चान्स ज़रूर दो अपनी शादी को.’

‘पर निधि मैं तुम्हारे बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता.’

‘निशांत, इस वक़्त जो दो रास्ते हैं उनमें से एक को ही चुनना होगा और हमको सही रास्ता ही चुनना चाहिए वरना हमारा प्यार बदनाम होगा, वो प्यार नहीं स्वार्थ कहलाएगा!’

…बस ये आख़री मुलाक़ात थी हमारी, उस दिन खूब बारिश हुई थी बाहर भी और मन के भीतर भी. उसके बाद मैंने अपनी पोस्टिंग दूसरे शहर में करवा ली. ऐसा नहीं कि निशांत से संबंध ख़त्म कर लिए, हम फ़ोन और सोशल मीडिया के ज़रिए सम्पर्क में ज़रूर हैं लेकिन मैं रूबरू नहीं होना चाहती, क्योंकि सामने निशांत को देखूंगी तो अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाऊंगी! 

किट्टू अब ठीक है और अपने मम्मी-पापा के साथ खुश भी है. उसको खुश देख कर मैं और निशांत अपने प्यार पर गर्व महसूस करते हैं. उसकी इसी ख़ुशी में हमारे प्यार की जीत छिपी है! यही है मेरा पहला प्यार, अधूरा रहकर भी मुकम्मल हो गया जो!

  • गोल्डी शर्मा 

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Pahla Affair

पहला अफेयर: तुम कभी तो मिलोगे (Pahla Affair: Tum Kabhi To Miloge)

आज फिर मेघों से रिमझिम वर्षा रूपी नेह बरस रहा है. दूर-दूर तक मेरी प्रिय तन्हाई पसरी हुई है. एकाएक रेडियो पर बज रहे गीत पर ध्यान चला गया-
छोटी-सी ये दुनिया पहचाने रास्ते, तुम कहीं तो मिलोगे, कभी तो मिलोगे..

मेरा दिल यूं ही भर आया. कितने साल गुज़र गए आपसे बिछड़े हुए, पर मेरा पागलपन आज भी आपके साथ गुज़ारे उन सुखद पलों की अनमोल स्मृतियां संजोए हुए है.

अल्हड़ उम्र के वो सुनहरे भावुक दिन… चांदनी रात में जागना, अपनी ही बनाई ख़यालों की दुनिया में खो जाना, यही सब कुछ अच्छा लगता था तब. शरत्चंद,विमल-मित्र, शिवानी आदि के उपन्यासों को प़ढ़ना तब ज़रूरी शौक़ों में शामिल थे. को-एज्युकेशन के बावजूद अपने अंतर्मुखी स्वभाव के कारण मैं क्लास में बहुत कम बोलती थी.

उन दिनों कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे. आप तब मेरे पास आए थे और एक फ़िल्मी गीत के दूसरे अन्तरे को पूरा करने का आग्रह किया था. उसी गीत को गाने पर आपको प्रथम पुरस्कार मिला था. मेरे बधाई देने पर आपने कितनी आसानी से कह दिया था कि यह गीत तो मैंने तुम्हारे लिए ही गाया था. उसके बाद तो मैं आपसे नज़रें चुराती ही फिरती थी. लेकिन अक्सर ऐसा लगता जैसे आपकी ख़ामोश निगाहें हमेशा मेरा पीछा करती रहती हैं.

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फिर परीक्षा के दिनों में जब मुझे एकाएक बुखार हो गया था, तो आपने बिना परीक्षा की चिंता किए मुझे अस्पताल में भर्ती करवाया था और मेरे माता-पिता के आने तक मेरी पूरी देखभाल की थी.

और जाड़ों में जब हमारी पिकनिक गई थी और मुझे आपके स्कूटर पर पीछे बैठना पड़ा था, उस दिन आपकी पीठ की ओर उन्मुख हो, मैंने जी भर कर बातें की थीं. हम पिकनिक स्पॉट पर सबसे देर से पहुंचे थे, आपका वाहन उस दिन चींटी की ऱफ़्तार से जो चल रहा था.

लेकिन तभी आपके चिकित्सक पिता की विदेश में नियुक्ति हुई और आपका परिवार विदेश चला गया. आपने अपनी मां से आपको यहीं छोड़ने के लिए बहुत अनुरोध भी किया, लेकिन आपका प्रयास असफल रहा. अपने मां-बाप के सामने अपनी पसंद ज़ाहिर करने की आपकी उस व़क़्त न उम्र थी न हालात. और आप अनेक सुनहरे सपने मेरी झोली में डाल सात समंदर पार के राजकुमार बन गए. कुछ वर्षों तक आपके स्नेहिल पत्र मुझे ढा़ंढस बंधाते रहे. फिर एकाएक इस छोटी-सी दुनिया की विशाल भीड़ में आप न जाने कहां खो गये. आपके परिवार की भी कोई खोज-ख़बर नहीं मिली. उन दिनों गल्फ वार (खाड़ी युद्ध) चल रहा था. अनेक प्रवासी-भारतीय गुमनामी के अंधेरे में खो
चुके थे.

मैं अपने प्यार की अजर-अमर सुधियों की शीतल छांव तले जीवन गुज़ारती रही. मुझे ऐसा रोग हो चुका है जिसको प्रवीण चिकित्सक भी समझ पाने में असमर्थ हैं. मुझे अटूट विश्‍वास है कि मेरे जीवन के मंदिर की लौ बुझने से पहले आप ज़रूर मिलेंगे और आपका उजला, हंसता- मुस्कुराता चेहरा ही मेरे जीवन के इंतज़ार को सार्थक बनाएगा. मेरे जीवन का सार बच्चन जी की इन पंक्तियों में है-

स्वागत के साथ ही विदा की होती देखी तैयारी
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन मधुशाला

– डॉ. महिमा श्रीवास्तव

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Pahla Affair

पहला अफेयर: काश, तुम समझे होते (Pahla Affair: Kash Tum Samjhe Hote)

कभी-कभी अचानक कहे शब्द ज़िंदगी के मायने बदल देते हैं. इसका एहसास पहली बार मुझे तब हुआ जब अचानक एक दिन आदित्य को अपने सामने मेरे जवाब के इंतज़ार में खड़े पाया. मेरी हालत देखकर बोला, ङ्गङ्घदया, ऑफ़िस से जाने के पूर्व सारी औपचारिकताएं होते-होते एक-दो दिन तो लग ही जाएंगे, जाने से पहले तुम्हारा जवाब सुनना चाहता हूं.फफ कहने के साथ वह मुड़ा और मेरे मन-मस्तिष्क में झंझावत पैदा कर गया.

वो तो चला गया, लेकिन मेरी आंखों के सामने वह दृश्य दौड़ गया, जब एक दिन ऑफ़िस में अंतर्जातीय विवाह को लेकर हो रही चर्चा के दौरान मैंने भी घोषणा कर दी थी कि यूं तो मेरे घर में अंतर्जातीय विवाह के लिए सख़्त मनाही है, लेकिन मैं घरवालों के विरुद्ध जा सकती हूं, बशर्ते लड़का क्लास वन ऑफ़िसर हो.

मुझे सपने में भी इस बात का गुमान न था कि आदित्य मेरे कहे को इतनी संजीदगी से ले लेगा. यूं तो मुझे इस बात का मन-ही-मन एहसास था कि आदित्य के मन में मेरे लिए एक ख़ास जगह है और सच कहूं तो मैं भी उसके सौम्य, सरल व परिपक्व व्यक्तित्व के चुंबकीय आकर्षण में बंधने लगी थी. लेकिन जैसे ही घरवालों के दृष्टिकोण की याद आती, मैं अपने मन को समझा देती कि हमेशा मनचाही मुराद पूरी नहीं होती. इसीलिए आदित्य की लाख कोशिश के बावजूद मैं उससे एक निश्‍चित दूरी बनाए रखती और बातों के दौरान उसे घरवालों के विरोध से सचेत करती रहती.

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लेकिन होनी को भला कौन टाल सकता था. जब मुझे पता लगा कि उसने ज़ोर-शोर से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी है तो एक अनजाने भय से मैं कांप उठी. उसकी मेहनत रंग लाई और पी. सी. एस. की परीक्षा को अंतिम रूप से पास कर, जब उसने हाथ मांगा तो मैं एक अजीब-सी उलझन में फंस गई. बड़ी कशमकश में थी मैं- मेरे सामने भावी जीवन का निर्णय पत्र था, उसमें हां या ना की मुहर लगानी थी.

ऑफ़िस वालों से विदा लेने से पूर्व वो मेरे पास आया, लेकिन मेरी आंखों से छलकते आंसुओं ने उसके प्रश्‍न का जवाब स्वयं दे दिया. मैं बहुत कुछ कहना चाह रही थी, पर ज़ुबां साथ नहीं दे रही थी. मेरी ख़ामोशी वो बर्दाश्त न कर सका. आख़िरकार वह छटपटा कर कह उठा, दया, मुझे कमज़ोर मत बनाओ, तुम तो मेरी शक्ति हो. आज मैं जो कुछ भी हूं, स़िर्फ तुम्हारी वजह से हूं. हमेशा ख़ुश रहना. ईश्‍वर करे, कोई दुख तुम्हारे क़रीब भी न फटके. इतना कह कर वह थके क़दमों से बाहर निकल गया. उसे जाते हुए देखती रही मैं. चाहती थी उससे कहना कि जीवन पर सबसे पहले जीवन देनेवाले का अधिकार होता है, इस फलसफे को कैसे झुठला सकती थी. लेकिन कहते हैं ना- कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता.

आज माता-पिता की इच्छा के फलस्वरूप अपने आशियाने में ख़ुश भी हूं, पर सीने में दबी पहले प्यार की चोट आज भी ये एहसास कराती है कि पहले तोलो, फिर बोलो. आज भी लगता है जैसे पहले प्यार की दस्तक अब भी मन- मस्तिष्क में अपनी गूंज दे रही हो.

– दया हीत

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Pahla Affair Kahaniya

पहला अफेयर: उसकी यादें दिल में समाए हूं (Pahla Affair: Uski Yaden Dil Mein Samaye Hoon)

वह अक्सर कहा करता था… मैं आकाश की ऊंचाई को छूना चाहता हूं. इन बादलों में गुम हो जाने पर मैं उस मधुर आवाज़ का इंतज़ार करूंगा, जो तुम मुझे बुलाने के लिए दोगी. तुम गाओगी… न जाओ सैंया, छुड़ाके बहियां, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूंगी… और मैं गाऊंगा… सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन, मधुर तुम्हारे मिलन बिना दिन कटते न ही रैन… इसी तरह की अठखेलियों में हंसते-गाते हमारे दिन बीत रहे थे. सौरभ बहुत ही ज़िंदादिल इंसान था. मैंने उसे जितने क़रीब से देखा था, उससे ऐसा आभास होने लगा था कि हम दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हैं और एक-दूसरे के लिए ही हमारा जन्म हुआ है.

उन दिनों सौरभ और मैं रविन्द्र कॉलेज में बी.ए. अंतिम वर्ष में प़ढ़ते थे. सौरभ एयरविंग में सीनियर डिविज़न में था तथा कॉलेज की विंग का कैप्टन था. बुधवार और शनिवार को एयरविंग की परेड होती थी. उस ड्रेस में वो बहुत अच्छा लगता था और सुबह आते ही मुझे सैल्यूट करता था. उसकी इस हरकत पर पूरी क्लास में हंसी का फव्वारा फूट पड़ता था.

सौरभ कहता था, अवनि, तुम्हारे प्रति एक अनजाना-सा आकर्षण महसूस करता हूं मैं. एक किताब में भी पढ़ा था मैंने कि यूं तो दुनिया में करोड़ों स्त्री-पुरुष हैं, लेकिन किसी विशेष के प्रति हमारा आकर्षण इसलिए होता है, क्योंकि कुछ हार्मोन्स हमें आकर्षित करने के लिए प्रेरित करते हैं- और उससे आकर्षित होने को ही हम कहते हैं कि मुझे उससे प्यार हो गया है. दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं, उसके इंतज़ार में दिन-रात एक हो जाते हैं.

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फिर सौरभ ने एयरविंग के माध्यम से एयरक्राफ्ट की ट्रेनिंग शुरू कर दी थी. वह छोटे प्लेन उड़ाने लगा था. उसका सपना पायलेट बनकर वायुसेना में जाने का था, जहां वह हिमालय की ऊंची-ऊंची वादियों में उड़ सके. लेकिन जब भी वो प्लेन उड़ाने जाता, मेरा दिल बहुत डरता. एक अनजाने भय से मैं कांप जाती.

इसी बीच हमारे फाइनल ईयर की परीक्षाएं ख़त्म हो गई थीं. सौरभ ने वायु सेना में जाने के लिए फॉर्म भरा था, जिसमें उसका सिलेक्शन भी हो गया था. उस समय वो बहुत ख़ुश था. और बोला था, ङ्गङ्घबस मेरी ट्रेनिंग पूरी हुई, नौकरी लगी कि इसके बाद हमारी शादी पक्की समझो.फफ हमारे घरवालों को भी हमारी पसंद पर कोई ऐतराज़ नहीं था.

उसके जाने के बाद रात-रात मैं सौरभ की कुशलता की कामना किया करती थी. हर पल मन बोझिल-सा रहता था, किसी काम में मन नहीं लगता था.

दिसंबर की ठंडी सुबह थी वो. फ़ोन की घंटी लगातार बज रही थी, बेमन से मैंने फ़ोन का रिसीवर उठाया. फ़ोन कानपुर से था. सौरभ के पिताजी बोल रहे थे, अवनि, एक प्रशिक्षण उड़ान के दौरान सौरभ का प्लेन क्रेश हो गया है… इसके आगे कुछ सुुनने की मेरी हिम्मत नहीं हुई और रिसीवर मेरे हाथ से छूट गया.

सौरभ हम सबसे बहुत ऊंचाई पर पहुंच गया था. इस आकाश, इस ब्रह्मांड से भी ऊपर. एक सुखद स्वप्न की तरह कॉलेज की यादें अब केवल यादें ही रह गई हैं. सौरभ की ज़िंदादिली, हंसमुख स्वभाव इतने सालों के बाद भी ज़ेहन में अपना सुरक्षित स्थान बनाये हुए है.

– अवनि

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Pahla Affair

पहला अफेयर: पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना (Pahla Affair: Pahle Pyar ki Akhri Tamanna)

कहते हैं, इंसान कितना भी चाहे, पर वो अपने पहले प्यार को कभी नहीं भुला पाता. पहले प्यार का एहसास, उसकी यादें उम्रभर जेहन में ज़िंदा रहती हैं. उम्र के किस मोड़ पर, कब कोई अपना-सा लगे कोई नहीं जानता. मुझे भी कहां पता था कि आज से बीस बरस पीछे छूट गई उन यादों की गलियों में मुझे फिर से भटकना पड़ेगा, जिन्हें मैं पीछे छोड़ आई थी.

आज उनके अचानक मिले इस संक्षिप्त पत्र ने फिर से मुझे उनके क़रीब पहुंचा दिया है. उनसे मेरी मुलाक़ात कॉलेज फंक्शन में हुई थी. वो मेरे सीनियर थे. मुलाक़ातें धीरे- धीरे दोस्ती में बदलीं और दोस्ती कब प्यार में बदल गयी, पता ही नहीं चला.

एक दिन वो मेरे पास आए और अपने प्यार का इज़हार कर दिया. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. दिल के ज़ज़्बात ज़बान तक लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. कैसे कहती उनसे कि उनके सिवा कोई ख़यालों में आता ही नहीं, उनके अलावा किसी और को चाहा ही नहीं. पर बात दिल की दिल में ही रह गयी, मैं उनसे कुछ नहीं कह पायी. मेरे जवाब न देने की स्थिति में उन्होंने अपना फ़ोन नंबर देते हुए कहा कि वो मेरे फ़ोन का इंतज़ार करेंगे.

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घर पहुंच कर आईने के सामने न जाने कितनी बार ख़ुद को उनके जवाब के लिए तैयार किया, पर दिल की बात ज़बान तक नहीं ला सकी. मैं जितना ही उनके बारे में सोचती, उतना ही ख़ुुद को उनके क़रीब महसूस करती.
लेकिन मेरे प्यार के परवान चढ़ने से पहले ही उसे मर्यादाओं की बेड़ी में जकड़ जाना पड़ा. माता- पिता ने रिश्ता पक्का करने के साथ-साथ शादी की तारीख़ भी पक्की कर दी. मुझमें विरोध करने का साहस नहीं था, इसलिए चुपचाप घरवालों की मर्ज़ी से शादी कर ली- जवाब देना तो दूर, आख़िरी बार उन्हें देखना तक नसीब न हुआ.

शादी के बाद ज़िम्मेदारियों के बोझ तले कभी- कभार पहले प्यार की यादें ताज़ा हो भी जातीं तो मैं उन्हें ख़ुुद पर हावी न होने देती. पति-ससुराल वालों से कोई शिकायत नहीं थी, फिर भी हमेशा ये लगता कि कहीं कुछ छूट गया है. पति बहुत प्यार करते, लेकिन फिर भी मेरे मन में किसी और का ख़याल रहता. मगर तक़दीर का लिखा कौन टाल पाया है. आज इतने सालों बाद अचानक उनका पत्र आया है जिसमें लिखा है-
प्रिये,
सदा ख़ुुश रहो. मैंने तुम्हारा बहुत इंतज़ार किया,पर अब और न कर सकूंगा, क्योंकि शरीर ने साथ न देने का ़फैसला कर दिया है. व़क़्त बहुत कम है, आख़िरी बार तुम्हें देखने की तमन्ना है. हो सके तो आ जाओ.
तुम्हारा-आकाश

पत्र पढ़कर मुझे अपने कायर होने का एहसास हो रहा है. मुझमें तो अब भी साहस नहीं कि मैं दुनिया वालों को क्या, उन्हें ही बता सकूं कि मैं उन्हें कितना प्यार करती हूं. आज एक बार फिर मुझे औरत होने का हर्जाना चुकाना है, अपने पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना भी पूरी न करके. शायद ङ्गमेरी सहेलीफ के माध्यम से ही उन्हें मेरा जवाब मिल जाए- और उनकी ज़िंदगी से पहले उनका इंतज़ार ख़त्म
हो जाए.

– दीपमाला सिंह

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