first love

Pahla Affair

पहला अफेयर: तुम कभी तो मिलोगे (Pahla Affair: Tum Kabhi To Miloge)

आज फिर मेघों से रिमझिम वर्षा रूपी नेह बरस रहा है. दूर-दूर तक मेरी प्रिय तन्हाई पसरी हुई है. एकाएक रेडियो पर बज रहे गीत पर ध्यान चला गया-
छोटी-सी ये दुनिया पहचाने रास्ते, तुम कहीं तो मिलोगे, कभी तो मिलोगे..

मेरा दिल यूं ही भर आया. कितने साल गुज़र गए आपसे बिछड़े हुए, पर मेरा पागलपन आज भी आपके साथ गुज़ारे उन सुखद पलों की अनमोल स्मृतियां संजोए हुए है.

अल्हड़ उम्र के वो सुनहरे भावुक दिन… चांदनी रात में जागना, अपनी ही बनाई ख़यालों की दुनिया में खो जाना, यही सब कुछ अच्छा लगता था तब. शरत्चंद,विमल-मित्र, शिवानी आदि के उपन्यासों को प़ढ़ना तब ज़रूरी शौक़ों में शामिल थे. को-एज्युकेशन के बावजूद अपने अंतर्मुखी स्वभाव के कारण मैं क्लास में बहुत कम बोलती थी.

उन दिनों कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे. आप तब मेरे पास आए थे और एक फ़िल्मी गीत के दूसरे अन्तरे को पूरा करने का आग्रह किया था. उसी गीत को गाने पर आपको प्रथम पुरस्कार मिला था. मेरे बधाई देने पर आपने कितनी आसानी से कह दिया था कि यह गीत तो मैंने तुम्हारे लिए ही गाया था. उसके बाद तो मैं आपसे नज़रें चुराती ही फिरती थी. लेकिन अक्सर ऐसा लगता जैसे आपकी ख़ामोश निगाहें हमेशा मेरा पीछा करती रहती हैं.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: काश, तुम समझे होते (Pahla Affair: Kash Tum Samjhe Hote)

फिर परीक्षा के दिनों में जब मुझे एकाएक बुखार हो गया था, तो आपने बिना परीक्षा की चिंता किए मुझे अस्पताल में भर्ती करवाया था और मेरे माता-पिता के आने तक मेरी पूरी देखभाल की थी.

और जाड़ों में जब हमारी पिकनिक गई थी और मुझे आपके स्कूटर पर पीछे बैठना पड़ा था, उस दिन आपकी पीठ की ओर उन्मुख हो, मैंने जी भर कर बातें की थीं. हम पिकनिक स्पॉट पर सबसे देर से पहुंचे थे, आपका वाहन उस दिन चींटी की ऱफ़्तार से जो चल रहा था.

लेकिन तभी आपके चिकित्सक पिता की विदेश में नियुक्ति हुई और आपका परिवार विदेश चला गया. आपने अपनी मां से आपको यहीं छोड़ने के लिए बहुत अनुरोध भी किया, लेकिन आपका प्रयास असफल रहा. अपने मां-बाप के सामने अपनी पसंद ज़ाहिर करने की आपकी उस व़क़्त न उम्र थी न हालात. और आप अनेक सुनहरे सपने मेरी झोली में डाल सात समंदर पार के राजकुमार बन गए. कुछ वर्षों तक आपके स्नेहिल पत्र मुझे ढा़ंढस बंधाते रहे. फिर एकाएक इस छोटी-सी दुनिया की विशाल भीड़ में आप न जाने कहां खो गये. आपके परिवार की भी कोई खोज-ख़बर नहीं मिली. उन दिनों गल्फ वार (खाड़ी युद्ध) चल रहा था. अनेक प्रवासी-भारतीय गुमनामी के अंधेरे में खो
चुके थे.

मैं अपने प्यार की अजर-अमर सुधियों की शीतल छांव तले जीवन गुज़ारती रही. मुझे ऐसा रोग हो चुका है जिसको प्रवीण चिकित्सक भी समझ पाने में असमर्थ हैं. मुझे अटूट विश्‍वास है कि मेरे जीवन के मंदिर की लौ बुझने से पहले आप ज़रूर मिलेंगे और आपका उजला, हंसता- मुस्कुराता चेहरा ही मेरे जीवन के इंतज़ार को सार्थक बनाएगा. मेरे जीवन का सार बच्चन जी की इन पंक्तियों में है-

स्वागत के साथ ही विदा की होती देखी तैयारी
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन मधुशाला

– डॉ. महिमा श्रीवास्तव

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: धूप का टुकड़ा (Pahla Affair: Dhoop Ka Tukda)

Pahla Affair

पहला अफेयर: काश, तुम समझे होते (Pahla Affair: Kash Tum Samjhe Hote)

कभी-कभी अचानक कहे शब्द ज़िंदगी के मायने बदल देते हैं. इसका एहसास पहली बार मुझे तब हुआ जब अचानक एक दिन आदित्य को अपने सामने मेरे जवाब के इंतज़ार में खड़े पाया. मेरी हालत देखकर बोला, ङ्गङ्घदया, ऑफ़िस से जाने के पूर्व सारी औपचारिकताएं होते-होते एक-दो दिन तो लग ही जाएंगे, जाने से पहले तुम्हारा जवाब सुनना चाहता हूं.फफ कहने के साथ वह मुड़ा और मेरे मन-मस्तिष्क में झंझावत पैदा कर गया.

वो तो चला गया, लेकिन मेरी आंखों के सामने वह दृश्य दौड़ गया, जब एक दिन ऑफ़िस में अंतर्जातीय विवाह को लेकर हो रही चर्चा के दौरान मैंने भी घोषणा कर दी थी कि यूं तो मेरे घर में अंतर्जातीय विवाह के लिए सख़्त मनाही है, लेकिन मैं घरवालों के विरुद्ध जा सकती हूं, बशर्ते लड़का क्लास वन ऑफ़िसर हो.

मुझे सपने में भी इस बात का गुमान न था कि आदित्य मेरे कहे को इतनी संजीदगी से ले लेगा. यूं तो मुझे इस बात का मन-ही-मन एहसास था कि आदित्य के मन में मेरे लिए एक ख़ास जगह है और सच कहूं तो मैं भी उसके सौम्य, सरल व परिपक्व व्यक्तित्व के चुंबकीय आकर्षण में बंधने लगी थी. लेकिन जैसे ही घरवालों के दृष्टिकोण की याद आती, मैं अपने मन को समझा देती कि हमेशा मनचाही मुराद पूरी नहीं होती. इसीलिए आदित्य की लाख कोशिश के बावजूद मैं उससे एक निश्‍चित दूरी बनाए रखती और बातों के दौरान उसे घरवालों के विरोध से सचेत करती रहती.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: उसकी यादें दिल में समाए हूं (Pahla Affair: Uski Yaden Dil Mein Samaye Hoon)

लेकिन होनी को भला कौन टाल सकता था. जब मुझे पता लगा कि उसने ज़ोर-शोर से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी है तो एक अनजाने भय से मैं कांप उठी. उसकी मेहनत रंग लाई और पी. सी. एस. की परीक्षा को अंतिम रूप से पास कर, जब उसने हाथ मांगा तो मैं एक अजीब-सी उलझन में फंस गई. बड़ी कशमकश में थी मैं- मेरे सामने भावी जीवन का निर्णय पत्र था, उसमें हां या ना की मुहर लगानी थी.

ऑफ़िस वालों से विदा लेने से पूर्व वो मेरे पास आया, लेकिन मेरी आंखों से छलकते आंसुओं ने उसके प्रश्‍न का जवाब स्वयं दे दिया. मैं बहुत कुछ कहना चाह रही थी, पर ज़ुबां साथ नहीं दे रही थी. मेरी ख़ामोशी वो बर्दाश्त न कर सका. आख़िरकार वह छटपटा कर कह उठा, दया, मुझे कमज़ोर मत बनाओ, तुम तो मेरी शक्ति हो. आज मैं जो कुछ भी हूं, स़िर्फ तुम्हारी वजह से हूं. हमेशा ख़ुश रहना. ईश्‍वर करे, कोई दुख तुम्हारे क़रीब भी न फटके. इतना कह कर वह थके क़दमों से बाहर निकल गया. उसे जाते हुए देखती रही मैं. चाहती थी उससे कहना कि जीवन पर सबसे पहले जीवन देनेवाले का अधिकार होता है, इस फलसफे को कैसे झुठला सकती थी. लेकिन कहते हैं ना- कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता.

आज माता-पिता की इच्छा के फलस्वरूप अपने आशियाने में ख़ुश भी हूं, पर सीने में दबी पहले प्यार की चोट आज भी ये एहसास कराती है कि पहले तोलो, फिर बोलो. आज भी लगता है जैसे पहले प्यार की दस्तक अब भी मन- मस्तिष्क में अपनी गूंज दे रही हो.

– दया हीत

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर- हस्ताक्षर! (Pahla Affair: Hastakshar)

Pahla Affair Kahaniya

पहला अफेयर: उसकी यादें दिल में समाए हूं (Pahla Affair: Uski Yaden Dil Mein Samaye Hoon)

वह अक्सर कहा करता था… मैं आकाश की ऊंचाई को छूना चाहता हूं. इन बादलों में गुम हो जाने पर मैं उस मधुर आवाज़ का इंतज़ार करूंगा, जो तुम मुझे बुलाने के लिए दोगी. तुम गाओगी… न जाओ सैंया, छुड़ाके बहियां, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूंगी… और मैं गाऊंगा… सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन, मधुर तुम्हारे मिलन बिना दिन कटते न ही रैन… इसी तरह की अठखेलियों में हंसते-गाते हमारे दिन बीत रहे थे. सौरभ बहुत ही ज़िंदादिल इंसान था. मैंने उसे जितने क़रीब से देखा था, उससे ऐसा आभास होने लगा था कि हम दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हैं और एक-दूसरे के लिए ही हमारा जन्म हुआ है.

उन दिनों सौरभ और मैं रविन्द्र कॉलेज में बी.ए. अंतिम वर्ष में प़ढ़ते थे. सौरभ एयरविंग में सीनियर डिविज़न में था तथा कॉलेज की विंग का कैप्टन था. बुधवार और शनिवार को एयरविंग की परेड होती थी. उस ड्रेस में वो बहुत अच्छा लगता था और सुबह आते ही मुझे सैल्यूट करता था. उसकी इस हरकत पर पूरी क्लास में हंसी का फव्वारा फूट पड़ता था.

सौरभ कहता था, अवनि, तुम्हारे प्रति एक अनजाना-सा आकर्षण महसूस करता हूं मैं. एक किताब में भी पढ़ा था मैंने कि यूं तो दुनिया में करोड़ों स्त्री-पुरुष हैं, लेकिन किसी विशेष के प्रति हमारा आकर्षण इसलिए होता है, क्योंकि कुछ हार्मोन्स हमें आकर्षित करने के लिए प्रेरित करते हैं- और उससे आकर्षित होने को ही हम कहते हैं कि मुझे उससे प्यार हो गया है. दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं, उसके इंतज़ार में दिन-रात एक हो जाते हैं.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना (Pahla Affair: Pahle Pyar Ki Akhri Tamanna)

फिर सौरभ ने एयरविंग के माध्यम से एयरक्राफ्ट की ट्रेनिंग शुरू कर दी थी. वह छोटे प्लेन उड़ाने लगा था. उसका सपना पायलेट बनकर वायुसेना में जाने का था, जहां वह हिमालय की ऊंची-ऊंची वादियों में उड़ सके. लेकिन जब भी वो प्लेन उड़ाने जाता, मेरा दिल बहुत डरता. एक अनजाने भय से मैं कांप जाती.

इसी बीच हमारे फाइनल ईयर की परीक्षाएं ख़त्म हो गई थीं. सौरभ ने वायु सेना में जाने के लिए फॉर्म भरा था, जिसमें उसका सिलेक्शन भी हो गया था. उस समय वो बहुत ख़ुश था. और बोला था, ङ्गङ्घबस मेरी ट्रेनिंग पूरी हुई, नौकरी लगी कि इसके बाद हमारी शादी पक्की समझो.फफ हमारे घरवालों को भी हमारी पसंद पर कोई ऐतराज़ नहीं था.

उसके जाने के बाद रात-रात मैं सौरभ की कुशलता की कामना किया करती थी. हर पल मन बोझिल-सा रहता था, किसी काम में मन नहीं लगता था.

दिसंबर की ठंडी सुबह थी वो. फ़ोन की घंटी लगातार बज रही थी, बेमन से मैंने फ़ोन का रिसीवर उठाया. फ़ोन कानपुर से था. सौरभ के पिताजी बोल रहे थे, अवनि, एक प्रशिक्षण उड़ान के दौरान सौरभ का प्लेन क्रेश हो गया है… इसके आगे कुछ सुुनने की मेरी हिम्मत नहीं हुई और रिसीवर मेरे हाथ से छूट गया.

सौरभ हम सबसे बहुत ऊंचाई पर पहुंच गया था. इस आकाश, इस ब्रह्मांड से भी ऊपर. एक सुखद स्वप्न की तरह कॉलेज की यादें अब केवल यादें ही रह गई हैं. सौरभ की ज़िंदादिली, हंसमुख स्वभाव इतने सालों के बाद भी ज़ेहन में अपना सुरक्षित स्थान बनाये हुए है.

– अवनि

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: ख़्वाब (Pahla Affair: Khwab)

Pahla Affair

पहला अफेयर: पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना (Pahla Affair: Pahle Pyar ki Akhri Tamanna)

कहते हैं, इंसान कितना भी चाहे, पर वो अपने पहले प्यार को कभी नहीं भुला पाता. पहले प्यार का एहसास, उसकी यादें उम्रभर जेहन में ज़िंदा रहती हैं. उम्र के किस मोड़ पर, कब कोई अपना-सा लगे कोई नहीं जानता. मुझे भी कहां पता था कि आज से बीस बरस पीछे छूट गई उन यादों की गलियों में मुझे फिर से भटकना पड़ेगा, जिन्हें मैं पीछे छोड़ आई थी.

आज उनके अचानक मिले इस संक्षिप्त पत्र ने फिर से मुझे उनके क़रीब पहुंचा दिया है. उनसे मेरी मुलाक़ात कॉलेज फंक्शन में हुई थी. वो मेरे सीनियर थे. मुलाक़ातें धीरे- धीरे दोस्ती में बदलीं और दोस्ती कब प्यार में बदल गयी, पता ही नहीं चला.

एक दिन वो मेरे पास आए और अपने प्यार का इज़हार कर दिया. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. दिल के ज़ज़्बात ज़बान तक लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. कैसे कहती उनसे कि उनके सिवा कोई ख़यालों में आता ही नहीं, उनके अलावा किसी और को चाहा ही नहीं. पर बात दिल की दिल में ही रह गयी, मैं उनसे कुछ नहीं कह पायी. मेरे जवाब न देने की स्थिति में उन्होंने अपना फ़ोन नंबर देते हुए कहा कि वो मेरे फ़ोन का इंतज़ार करेंगे.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: तुमसा कोई न मिला (Pahla Affair: Tumsa Koi Na Mila)

घर पहुंच कर आईने के सामने न जाने कितनी बार ख़ुद को उनके जवाब के लिए तैयार किया, पर दिल की बात ज़बान तक नहीं ला सकी. मैं जितना ही उनके बारे में सोचती, उतना ही ख़ुुद को उनके क़रीब महसूस करती.
लेकिन मेरे प्यार के परवान चढ़ने से पहले ही उसे मर्यादाओं की बेड़ी में जकड़ जाना पड़ा. माता- पिता ने रिश्ता पक्का करने के साथ-साथ शादी की तारीख़ भी पक्की कर दी. मुझमें विरोध करने का साहस नहीं था, इसलिए चुपचाप घरवालों की मर्ज़ी से शादी कर ली- जवाब देना तो दूर, आख़िरी बार उन्हें देखना तक नसीब न हुआ.

शादी के बाद ज़िम्मेदारियों के बोझ तले कभी- कभार पहले प्यार की यादें ताज़ा हो भी जातीं तो मैं उन्हें ख़ुुद पर हावी न होने देती. पति-ससुराल वालों से कोई शिकायत नहीं थी, फिर भी हमेशा ये लगता कि कहीं कुछ छूट गया है. पति बहुत प्यार करते, लेकिन फिर भी मेरे मन में किसी और का ख़याल रहता. मगर तक़दीर का लिखा कौन टाल पाया है. आज इतने सालों बाद अचानक उनका पत्र आया है जिसमें लिखा है-
प्रिये,
सदा ख़ुुश रहो. मैंने तुम्हारा बहुत इंतज़ार किया,पर अब और न कर सकूंगा, क्योंकि शरीर ने साथ न देने का ़फैसला कर दिया है. व़क़्त बहुत कम है, आख़िरी बार तुम्हें देखने की तमन्ना है. हो सके तो आ जाओ.
तुम्हारा-आकाश

पत्र पढ़कर मुझे अपने कायर होने का एहसास हो रहा है. मुझमें तो अब भी साहस नहीं कि मैं दुनिया वालों को क्या, उन्हें ही बता सकूं कि मैं उन्हें कितना प्यार करती हूं. आज एक बार फिर मुझे औरत होने का हर्जाना चुकाना है, अपने पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना भी पूरी न करके. शायद ङ्गमेरी सहेलीफ के माध्यम से ही उन्हें मेरा जवाब मिल जाए- और उनकी ज़िंदगी से पहले उनका इंतज़ार ख़त्म
हो जाए.

– दीपमाला सिंह

यह भी पढ़ें: तुम्हारी कत्थई आंखें (Pahla Affair: Tumhari Kathai Ankhen)

Pyar Ki Kahani
पहला अफेयर: ख़ामोशियां चीखती हैं… (Pahla Affair: Khamoshiyan Cheekhti Hain)

हमारी दोस्ती का आग़ाज़, शतरंज के मोहरों से हुआ था. जब शबीना अपने प्यादे से मेरे वज़ीर को शह देती, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता… और कहीं मेरा ऊंट उसके प्यादे को भगा-भगाकर बेहाल कर देता, तब उसके ग़ुस्सैल चेहरे की मायूसी देखती बनती.

आज उसकी वही बचकाना हरक़तें याद आती हैं, तो मन से एक हूक उठती है. एक साथ घूमना-फिरना, मौज-मस्ती के वो दिन… न जाने कहां गुम हैं? नहीं जानता वो दोस्ताना हाथ क्यों पीछे हट गया. उफ़़्फ्! व़क्त की गर्द ने मुझे अपनी आग़ोश में लपेट लिया है.
जब-जब मैंने गंभीर हो उसके भविष्य के बारे में कुछ कहा, तो उसने हर बात हंसकर हवा में उड़ा दी. जैसे कोई जासूसी किताब पढ़ रही हो. मैं नादान कहां पढ़ पाया उसके भीतरी निबंध!

न जाने कितने ख़त लिख-लिख पानी में बहाए हैं और कितने किताबों में ़कैद हैं. जो उसकी सहेली शमीम के हाथ भेजे, उनका भी कोई जवाब न आया. व़क्त मुट्ठी से रेत-सा कैसे फिसलता रहा… मैं कहां जान पाया! बस, उसकी चुप्पी अंदर-ही-अंदर सालती है.

शमीम की बातों ने मेरा पूरा वजूद हिला दिया. शमीम से जाना कि उसने किसी अमीर साहिबज़ादे से दोस्ती कर ली है. इस ख़बर ने तो जैसे मेरे जीवन में सूनामी-सा बवंडर ला खड़ा किया.

“जब भंवर में आ गई कश्ती मेरी, नाख़ुदा ने क्यों किनारा कर लिया…”

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: मंज़िल (Pahla Affair: Manzil)

हिम्मत जुटाकर एक दिन मैंने फोन घुमाया… उधर से मर्दाना आवाज़ थी, “हैलो, अरे तुम… राशिद! कहो कैसे फोन किया?”

मैं जल्द ही बोला, “अब्बाजान आदाब! ज़रा सबीना से बात कराएंगे?”

उनके अब्बा की आवाज़ अटकी, “उनसे मिलने कोई आया है. वे गुफ़्तगू में मशग़ूल हैं.”

“आप कहें राशिद का फोन था.” मेरी बात काट उन्होंने खट से फोन रख दिया. कुछ समय मुझ पर बेख़ुदी का आलम रहा, फिर एक दिन

मैंने रात को फोन घुमाया. उधर से सबीना की आवाज़ थी,“कौन?”

“हम हैं राशिद! अरे, इतनी जल्दी आवाज़ भी भूल गई.”

उसने तरकश से ज़हर बुझा तीर छोड़ा, “सुनो, मैंने अपनी ज़िंदगी का मक़सद पा लिया है. अच्छा होगा, तुम भी अपनी कश्ती का रुख मोड़ दो…” और खटाक से फोन कट गया.

उसका फेंका हुआ वह एक जुमला मेरा जिगर चाक-चाक कर गया. उफ़़्फ्! हुस्न पर इतना ग़ुरूर? जी चाहा सबीना को पकड़कर पूछूं कि ये सुनहरे सपनों का जाल क्यों बिछाया? इतने रंगीन नज़ारों की सैर क्यों कराई? यूं शतरंज के मोहरे-सा उठाकर पटकना कहां की वफ़ादारी है? वाह! क्या दोस्ती निभाई!

अब तो हर तरफ़ दमघोंटू माहौल है… उसकी बेवफ़ाई का कारण अब तक नहीं जान पाया और अगर उसने तय ही कर रखा था कि साथ नहीं निभाना, तो मन से, भावनाओं से क्यों ऐसा खेलकर चली गई. साफ़-साफ़ कह देती कि बस दोस्ती रखनी है, उसके बाद हमारे रास्ते अलग हैं… क्यों मुझे मुहब्बत की हसीन दुनिया दिखाई और क्यों मैं उसकी आंखों को ठीक से पढ़ नहीं पाया. अब तो बस, मैं हूं और मेरी तन्हाई! ये ख़ामोशियां अब चीखने लगी हैं. मेरे पहले प्यार का यह हश्र होगा… नहीं जानता था. अब तो ये ख़ामोशियां ही मुझसे बतियाती हैं… मेरा मन बहलाती हैं…!

कहीं दूर से एक आवाज़ आ रही है…

“धीरे-धीरे अंदर आना… बिल्कुल शोर न करना तुम…
तन्हाई को थपकी देकर… मैंने अभी सुलाया है…”

– मीरा हिंगोरानी

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: खिला गुलाब की तरह मेरा बदन… (Pahla Affair: Khila Gulab Ki Tarah Mera Badan)

Pahla Affair

पहला अफेयर: मंज़िल (Pahla Affair: Manzil)

आज भी दिल का एक कोना सुरक्षित है उसके लिए, जो मेरे लिए केवल एक एहसास है. बात उन दिनों की है, जब मैंने उम्र की दहलीज़ पर सत्रहवां सावन पार किया था और उसे पहली बार अपने नज़दीक से गुज़रते देखा था. एक साधारण-सा लंबा, गोरा शख़्स, गहरी आंखें, घनी पलकें मानो समा जाऊं और वो उन पलकों में मुझे छुपा ले. उसके चेहरे पर ग़ज़ब की मासूमियत थी. उसके चौड़े सीने पर सशक्त बाजू मन में ये अरमान जगा जाते कि वो मुझे अपनी बांहों में कस ले और मेरा रोम- रोम खिल उठे.

वहीं से सिलसिला शुरू हुआ उसके गुज़रने का और मेरा चुपके से उसे निहारने का. वो एक ख़्वाब था मेरे लिए, लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद हमने साथ- साथ कुछ घंटों की दूरी तय की थी. फिर क्या था- वो मेरा अच्छा दोस्त बन गया. लगभग रोज़ ही फ़ोन पर बातें होतीं. उसे अपनी ज़िंदगी में यूं शामिल कर लेने के बाद कब मैं उससे प्यार कर बैठी, कुछ ख़बर नहीं. उसके बाद तो जैसे मेरी दुनिया ही बदल गयी.
लेकिन समय के साथ मेरा प्यार एक अनकहा दर्द बनकर मेरी नस- नस में दौड़ने लगा. उसके साथ होकर भी मैं ख़ुद को अकेला महसूस करने लगी. उसने भी कभी कुछ नहीं कहा. आख़िर ऐसा क्यों होता है, जब हम किसी से प्यार करने लगते हैं तो ज़ुबां ख़ामोश हो जाती है और आंखें बोलने लगती हैं. पर आंखों की भाषा भी तो कोई समझे. भीतर-ही-भीतर टूटकर बिखर रही थी. मेरी एक सहेली ने उस तक मेरे दिल की बात पहुंचा दी.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

मैं बहुत ख़ुश थी उस दिन, जब वो मुझसे मिलने आ रहा था.पहली बार मैंने उसे अपने बहुत क़रीब महसूस किया था. रोम-रोम खिल उठा था मेरा, जब उसकी गर्म हथेलियों को मैंने अपने ब़र्फ से ठंडे हाथों पर महसूस किया था. उसने कहा- देखिये, मैं आपसे बस इतना कहना चाहता हूं कि मेरी नज़र में उसी को प्यार करोे, जिसे ताउम्र अपने पास रखो. लेकिन मैं अपने परिवार की मर्यादाओं की मज़बूत जंजीरों को अपने प्यार के लिए नहीं तोड़ सकता. अच्छा होगा कि प्यार की छोटी-सी ज़िंदगी की जगह दोस्ती की लंबी उम्र को स्वीकारा जाए. आपमें बहुत प्रतिभाएं हैं और मैं आपको आसमां की बुलंदियों पर देखना चाहता हूं.

उसके प्यार को भुलाना तो ख़ैर मेरे वश में नहीं, लेकिन उसकी ख़्वाहिश को मैंने ज़िंदगी का मक़सद बना लिया. समय गुज़र रहा था, हम दोनों ही अपने कैरियर को बुलंदियों तक पहुंचाने में मसरूफ़ थे. मगर तब भी हर व़क़्त उसकी यादें दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे ही जाती थीं. अब उसके बगैर उस शहर में रहना मुश्किल हो रहा था. फिर ख़ुद से समझौता कर मैंने उसे अपना फैसला सुना दिया- प्रकाश, मैं जोधपुर पढ़ने जा रही हूं. मेरा स्वर इतना भारी था कि वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरी आंखें भर आईं- और उसने मेरे आंसुओं को अपनी हथेली में क़ैद कर शुभकामनाओं के साथ मुझे विदा किया.

और मैं चली आई. ईश्‍वर से बस इतनी प्रार्थना है कि इस जनम में ना सही अगले जनम में उसका नाम मेरी हथेली पर लिखना.
आज इस बात को दो साल गुज़र गये- मैं अपनी मंज़िल के बहुत नज़दीक हूं. लेकिन आज भी तन्हाई में अतीत के पन्नों को पलटती हूं तो मेरा प्रकाश मुझे प्रकाशित कर देता है- और थक- हार कर मैं फिर अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ जाती हूं.

– शमिता त्रिपाठी

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: उड़ती हवा का वो झोंका जीना सिखा गया (Pahla Affair: Udti Hawa Ka Wo Jhonka Jeena Sikha Gaya)

Pyaar Ki Kahani

पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

घर में आर्थिक तंगी से मेरी पढ़ाई छूट गई थी. बस, गुज़र-बसर हो रही थी किसी तरह. तभी मकान का आधा हिस्सा एक सरकारी ऑफिस को किराए पर दिया, तो आमदनी का कुछ ठोस ज़रिया हो गया. फिर एक दिन एक आकर्षक युवक को जीप से उतरते देखा, तो बस देखती ही रह गई. पता चला, ये साहब हैं, आलोक नाम है.

कोई काम तो था नहीं, उधर ताक-झांककर मन बहला लेती, पकड़ी जाती, तो मैं झेंप जाती और वो मुस्कुरा देते. बीस दिन बीते होंगे, मैं अचानक बहुत बीमार हो गई. डॉक्टर ने तुरंत ज़िला अस्पताल ले जाने को कहा.

आस-पड़ोस के तमाम हितैषी जमा थे, पर सर्द आधी रात, सभी तरह-तरह की सलाहें देकर बहाने बनाने लगे. अम्मा हताश-निराश होकर रोने लगीं, तभी उधर से पूछा गया, “मांजी, क्या बात हो गई?” नीम बेहोशी में आगे नहीं जान सकी मैं कि क्या और कैसे हुआ. सुबह आंख खुली, तो ख़ुद को अस्पताल में पाया. साहब थके-थके-से सामने बैठे थे. लगा कि रातभर सोये नहीं थे.

उन्होंने पूछा, “अब कैसी हो?” मैंने कहा, “हां, अब आराम है. मेरे कारण आपको बहुत कष्ट हुआ.” वे बोले, “क्यों? रात अगर मुझे कुछ हो जाता, तो क्या तुम मेरी मदद नहीं करतीं?” यह सुनकर अच्छा लगा था. तीन दिन बाद अपना सहारा देकर उन्होंने जीप से घर उतारा तो उन्हीं पड़ोस के हितैषी जनों में चर्चा का आधार भी बन गई.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: लम्हे तुम्हारी याद के (Pahla Affair: Lamhe Teri Yaad Ke)

पड़ोस में रहते हुए उन्हें मेरे घर में दो वर्ष के भीतर घटित विपदा व दीनदशा की सारी जानकारी हो चुकी थी. अब कभी-कभी आंगन के बीच की दीवार पर कुछ देर बातें भी होने लगीं, जिससे मेरी ताका-झांकी तो बंद हो गई, लेकिन रातों की नींद और चैन गायब हो गया था. और जब एक दिन मुझे बुलाकर मेरा इंटरमीडिएट का फॉर्म भरवा दिया, पढ़ाई शुरू कराई, तो मैं शीशे में बार-बार ख़ुद को निहारती कुंआरे सपनों को संवारती रहती. इंटर पास हो गई, तो उसी ऑफिस में नौकरी भी मिल गई. मेरा बीए का फॉर्म भी भराया गया. अब मकान के किराए व मेरे वेतन से घर को बहुत सहारा हो गया. पुराने घाव भर से गए.

नज़दीकियां प्यार को जन्म देती हैं. ऑफिस में काम बताते, डिक्टेशन देते हुए उनकी आंखों की तरलता में अपने लिए जिज्ञासा देखती और वो अपने पद की मर्यादा व गरिमा से बंधे मेरा मन टटोला करते. मैं हिम्मत करके कुछ कहना चाहती, किंतु कस्बई संकीर्ण संस्कार घर की पुरानी चौखट लांघ ही न पाते.

नानी का निधन हो गया. सुबह छुट्टी मांगने उधर गई, तो मेरे दोनों हाथ पकड़कर पूछा, “कुछ और नहीं कहोगी?” दरिद्रता कृपण भी तो होती है. मैं ठूंठ-सी खड़ी रही, न एतराज़ कर पाई और न उस अनुपम प्यार का प्रतिदान कर अपना व उनका असमंजस ही मिटा पाई. लौटकर आई, तो बड़े बाबू ने एक पत्र देकर बताया, “साहब को दो वर्ष की ट्रेनिंग पर विदेश भेजा गया है.”

पत्र पढ़ा- ‘आरती, इतने दिन साथ रहे. अच्छा लगा. कभी-कभी सफ़र में कुछ ऐसा छूट जाता है, जिसकी भरपाई नहीं हो पाती और वो तुम हो आरती. याद है, अस्पताल से आते ही तुमने कहा था कि अगर रात आप न होते, तो मरी कहानी ख़त्म ही थी. उस कहानी को मैंने आगे बढ़ाना चाहा, पर तुम्हारा अंतर्मन पढ़ न पाया. हो सकता है, तुम्हारे मन में वैसा कुछ न रहा हो, जैसा मैं सोचता रहा. तभी तो जाते समय तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. तुमसे मिल न सका, नौकरी की मजबूरी जानती हो. तुम्हें दुख तो होगा और मुझे तुम्हारी याद आया करेगी. पथराई आंखों से पत्र पकड़े संज्ञा-शून्य-सी बैठी रह गई थी.

कैसा दुख? ग़रीब को तो दुख की आदत होती है. सुख कभी आता भी है, तो अधिक देर ठहरता नहीं. मैं तो स्त्री थी. उपकारों के बोझ से दबी. वे तो पुरुष थे. सबल व समर्थ भी. मेरी दीनदशा से मर्माहत हो मुझसे कौन-सा रिश्ता बनाए रहे, तो जता न सके? तब भी नहीं, जब हमारे प्यार की चर्चा कस्बे में फैली. तब भी इतना ही बोले, “आरती हवन करते हाथ भले ही न जलें, आंच तो आती ही है.” फिर न कोई वादा, न सांत्वना. अपने फर्ज़ से वो तो ़फुर्सत पा गए और मैं ख़ूबसूरत फरेब का ताना-बाना बुनती रह गई.

– आरती सिंह

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: हरसिंगार के फूल (Pahla Affair: Harsingar Ke Phool)

Love Stories

पहला अफेयर: लम्हे तुम्हारी याद के (Pahla Affair: Lamhe Teri Yaad Ke)

प्यार, यूं तो इस शब्द से हर शख़्स वाकिफ़ होता है, पर इसका एहसास तो होता है तब, जब किसी का इंतज़ार यूंं ही करते रहना अच्छा लगने लगता है. प्यार का एहसास मुझे इस रूप में होगा, मैंने कभी सोचा भी न था. ज़िंदगी की बीस बहारें यूूं ही गुज़र गईं और इस बहार ने मेरी ज़िंदगी के मायने ही बदल दिए.

हमने घर हाल में ही बदला था. कुछ दूर मोड़ पर जाकर ही उनका घर था. एक संपूर्ण व्यक्तित्व – सुंदर, बोलने में इतनी आत्मीयता कि कोई भी प्रभावित हुए बिना रह न सके. देखते-देखते कब बातें शुरू हुईं और कब एक अजनबी अपनों से बढ़कर मेरे इतने क़रीब आ गया, पता ही नहीं चला.

हर सुबह एक नई उमंग लेके आती और हर शाम नए ख़्वाब. उनके बिना कुछ भी सोच पाना मुमकिन न था. दिल के एक कोने में जीवनसाथी की तस्वीर उनके रूप में परिपूर्ण थी. उनकी आंखों में छिपी चाहत को मैंने कई बार महसूस किया, पर उन्होंने कभी कुछ कहा नहीं. वैसे तो निगाहों की भाषा काफ़ी होती है मोहब्बत के इज़हार के लिए, पर शायद वज़ूद के लिए शब्द भी ज़रूरी हैं, इसलिए शब्दों के सहारे मैंने अपनी इच्छाएं उनके सामने रख दीं. वो सुनते रहे और चुप रहे, पर जब उनका मौन टूटा तो मेरी ज़िंदगी, मेरा वज़ूद सब बिखर कर रह गया.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: पहले प्यार की ख़ुशबू (Pahla Affair: Pahle Pyar Ki Khushbu)

‘कृति मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं. तुमने मेरी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी है, पर एक सच्चाई जिसे मैं तुम्हें खोने के डर से आज तक नहीं बता पाया कि मैं एक शादीशुदा पुरुष हूं. तुम्हारे साथ, तुम्हारे प्यार और अपनेपन ने मुझे अंदर तक छू लिया. मेरी भावनाएं, मेरी इच्छाएं जो अब तक अधूरी थीं, तुमने उन सबको परिपूर्ण किया है. तुम्हारे साथ ने ही मुझे प्यार का एहसास कराया है. तुम ही मेरी ज़िंदगी का पहला प्यार हो, जिसे मैं हमेशा चाहूंगा, पर तुम्हारे इस साथ में मैं अपने यथार्थ को भूल गया था और उससे भाग रहा था. तुम्हें खोने के डर ने मुझे बहुत स्वार्थी बना दिया था, इसलिए चाहकर भी मैं तुम्हें आज तक ये नहीं बता पाया और जाने-अनजाने में तुम्हारी भावनाओं को आहत किया. काश! हमारी ज़िंदगी हमारी सोच की तरह आसान होती और जो हम चाहते, हमें मिल जाता. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना…’ इतना कहकर वो चले गए.

सब कुछ रेत की तरह हाथों से निकल गया. उनके इस झूठ ने मेरी ज़िंदगी के मायने ही बदल दिए. सच है पहला प्यार कभी भी भुलाया नहीं जा सकता. सब कुछ जानते हुए आज भी मैं उनसे बेइंतहा मोहब्बत करती हूं और वो लम्हे जो हमने साथ गुज़ारे थे, वो अनमोल पल आज भी मेरी स्मृतियों में यूं ही कायम हैं और हमेशा रहेंगे.

हंसना तो बड़ी शै है, रोने भी नहीं देते
लम्हे तुम्हारी याद के, कुछ ऐसे भी आते हैं

– कृति

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर- तुम मेरे हो… (Pahla Affair- Tum Mere Ho)

Pyaar Ki Kahaniya

पहला अफेयर: पहले प्यार की ख़ुशबू (Pahla Affair: Pahle Pyar Ki Khushbu)

आज भी मेरे हाथों पर तेरे प्यार की मेहंदी का रंग बरक़रार है. वह सिंदूरी शाम. डूबते सूरज की पहली लाली, वो तेरा छत पर पतंग की डोर थाम बार-बार मुझे देख मुस्कुराना….वह मुस्कुराहट आज भी मेरे मन के भीतोें पर रंगीन चित्रों-सी उकरी है. तेरा वो दिलकश क़ातिलाना अंदाज़, बार-बार मुड़कर मुझे निहारना, मुझसे नज़रें मिलाना फिर चुराना सब कुछ याद है मुझे.

याद है तुम्हें, एक दिन अचानक शाम के धुंधलके में तुमने गली के मोड़ पर मेरा हाथ पकड़कर कहा था, ङ्गङ्घशालू मैं तुम्हें तहेदिल से चाहता हूं. मैं तुम्हारे दिल की बात सुनना चाहता हूं.फफ लगा था जैसे गोली की आवाज़ से कई परिंदे पंख फड़फड़ाकर उड़ चले हों. मेरा दिल ज़ोर से धड़क उठा था. मैं सुरमई अंधेरों की गुलाबी खनक में खो-सी गई थी. हाथ छुड़ाकर भागने की कोशिश में मेरी चुन्नी का कोना तुम्हारे हाथ में आ गया था. वही कमबख़्त कोना जैसे तुम्हारी ज़िंदगी का मक़सद बन गया.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: रहें न रहें हम… (Pahla Affair: Rahen Na Rahen Hum)

बहुत चाहा तुम्हारा दामन थाम ज़िंदगी का ख़ुशनुमा सफ़र तय करूं, लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था- मेरे पिता की असमय दिल के दौरे से मौत ने सब कुछ ख़त्म कर दिया. मैं टूटकर बिखर गई, हमारी मोहब्बत बिखर गई.

पिता ने मरते समय मां से वचन लिया था- मैं उनके बताए लड़के से विवाह करने को मज़बूर कर दी गई. वह एक लम्हा, तुम्हारा मेरा हाथ थामना मेरे लिए क़ातिलाना साबित हुआ. मां की आंखों में तैरती बेबसी की नावें और तुम्हारी आंखों में मोहब्बत का बेइंतहा समंदर मेरे लिए ज़िंदगी कशमकश का दरिया बन गई. तुम्हारी यादों की गहरी खाइयों में मैं गिरती चली गई.

याद है, मैंने तुम्हें ख़त लिखा था, यदि मेरा विवाह अन्यत्र हुआ तो मैं आत्महत्या कर लूंगी. छत पर तुमने जो पुर्जा फेंका था, आज वही मेरे पास तुम्हारी धरोहर है-

मेरी अपनी शालू,
ज़िंदगी जीने का नाम है, वे बुज़दिल होते हैं, जो ज़िंदगी से हार मान मौत को गले लगा लेते हैं. तुम्हें अभी ज़िंदगी की कई बहारें देखनी हैं. प्यार तो कुर्बानी मांगता है. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो मैं किसके सहारे जीऊंगा, बोलो.
तुम्हारा पहला प्यार,
पीयूष

हमारे पहले प्यार की ख़ुशबूओं से लबालब वह पुर्ज़ा आज भी मेरे पास तुम्हारी अमानत है, जैसे- वह काग़ज़ का टुकड़ा न होकर छोटा-सा टिमटिमाता जुगनू हो, जो मेरी ज़िंदगी का रहबर बना है. शायद इसी के सहारे ही मैं ज़िंदगी के बीहड़ बियाबान जंगल लताड़ती आगे बढ़ती रही हूं. अब तो मैंने ज़िंदगी की हर मुश्किल से लड़ना सीख लिया है.

कांप उठती हूं मैं ये
सोचकर तनहाई में
मेरे चेहरे पे कहीं
पहला प्यार न
पढ़ ले कोई

– मीरा हिंगोरानी

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम… (Pahla Affair: Kahin Door Main, Kahin Door Tum)

Love Kahaniya

पहला अफेयर: रहें न रहें हम… (Pahla Affair: Rahen Na Rahen Hum)

हमारा पहला प्यार अधूरा ही रहा किसी सपने की मानिंद, पर फिर भी उसकी रेशमी छुअन है जो दिल के किसी कोने में छुपी है मेरी जीवनशक्ति बनकर. बात 8 वर्ष पहले की है. मैं दिल्ली से ग्रेजुएशन फ़ाइनल ईयर की परीक्षा देने के बाद देहरादून ङ्गपर्यावरण संरक्षण वर्कशॉपफ में भाग लेने आई थी. मेरा अंतर्मुखी कवि मन देहरादून के प्राकृतिक सौंदर्य का साथ पा रोमांचित हो उठा. हर शाम को लेक्चर अटेंड करने के बाद मैं राजपुर की वादियों में पहुंच जाती.

वहीं प्रकृति को निहारते मेरी मुलाक़ात हुई थी श्यामल से. वह डॉक्टर था. कानपुर में प्रैक्टिस करता था और लंबी छुट्टी पर देहरादून आया था. देखने में सुदर्शन और मासूम, पर बेहद शरारती. एक पल चुप नहीं बैठता था, पर दिल बेहद साफ़था उसका.

हम जल्दी ही अच्छे दोस्त बन गए. हम दोनों के विपरीत स्वभावों के बावजूद हमें बांध रखा था हमारे प्रकृति प्रेम, गज़लों-शायरी के शौक़ और शायद एक अनकही-सी समझ ने. श्यामल को क़रीब से जानकर लगा कि वह उतना सतही नहीं जितना लगता था. जीवन को बहुत करीब से देखा-समझा था उसने.

कभी-कभी उसकी खनकती हंसी में एक उदासी की ख़ुशबू भी आ जाती थी. तब लगता था जैसे उसने कोई आंसू कहीं छुपा रखा है. मैंने उससे इस बारे में पूछा भी, पर वो हर बार बात टाल जाता. वो अपने बारे में जल्दी बात नहीं करता था. बस, कभी-कभी यूं ही लगता कि वो कुछ कहना चाहता था, पर ख़ामोशी ही अपनी ज़ुबां आप बन जाती.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: हार्डवेयरवाला प्यार (Pahla Affair: Hardwarewala Pyar)

धीरे-धीरे मेरे जाने का दिन क़रीब आ रहा था. कई बार एक अजीब-सा एहसास होता कि मैं श्यामल को ही नहीं, ख़ुद को भी पीछे छोड़ जा रही हूं. जिस दिन मुझे वापस जाना था, उस दिन श्यामल मेरे लिए पीले गुलाब के फूल लाया था. साथ में एक चिट थी जिस पर लिखा था-
आपसे मिलकर तमन्ना इतनी रही, एक बार फिर मिलें अगर ज़िंदगी रही… पढ़कर मैं तड़प उठी थी और श्यामल से वादा लिया था कि वो जल्दी ही मुझसे मिलने दिल्ली आएगा. उसने उदास आंखों से वादा कर दिया.

फिर मैं दिल्ली आ गई, पर श्यामल की यादें ज़ेहन में ताज़ा थीं बिल्कुल महकते गुलाबों की तरह. पर उसका न फ़ोन आया, न कोई चिट्ठी. मैं मोबाइल ट्राई करती तो वो भी ऑफ़ मिलता. मैं बहुत बेचैन थी. तभी एक दिन श्यामल की बहन का फ़ोन आया. उसने जो बताया उससे तो जैसे मेरी दुनिया ही बिखर गई.

श्यामल कैंसर के लास्ट स्टेज पर था, जब मुझसे मिला. उसने कहा था कि उसके आख़िरी दिनों में मेरी मुस्कान ने ही
उसे मौत को हंसते-हंसते गले लगाने की ताक़त दी थी. ज़िंदगी से मौत के बीच का सफ़र ख़ुशगवार बनाने के लिए उसने मेरा शुक्रिया अदा किया था.

श्यामल चला गया था और मेरे पास ज़िंदगी गुज़ारने के लिए थी उसकी शायरी और ढेरों महकती यादें. उसके बाद मैं देहरादून में नौकरी ढूंढ़ यहीं बस गई, उसकी मौजूदगी के एहसास के साए में ज़िंदगी बिताने की ख़्वाहिश लिए. बस, अक्सर फ़िज़ां में उसका एक शेर कौंध जाता है.

रोओ कुछ इस तरह कि अश्क़ न बहें, दर्द सहो इस तरह कि ज़ख़्म न रहे
लबों पे आह, आंखों में पानी, रोको कुछ इस तरह कि कोई ग़म न कहे

– दीपाशिखा श्रीवास्तव

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: कच्ची उम्र का प्यार (Pahla Affair: Kachchi Umra Ka Pyar)

Pyar Ki Kahaniya
पहला अफेयर: हार्डवेयरवाला प्यार (Pahla Affair: Hardwarewala Pyar)

उन दिनों मैं डीएन कॉलेज से इंफॉर्मेशन ब्रांच में बी.ई. कर रही थी. हमारे कॉलेज में संजय भी था, जो कंप्यूटर साइंस में था. आते-जाते अक्सर वह दिख जाता था और इधर-उधर निगाह बचाकर मुझे देखता था. लेकिन मैं ध्यान नहीं देती थी और बाहर निकल जाती थी. इस पर वो मुझे हसरतभरी निगाह से देखता था.

बी.ई. के छठे सेमिस्टर चल रहे थे. मेरा घर कॉलेज से काफ़ी दूर था. मैं बस का इंतज़ार कर रही थी, लेकिन बसें देर से चल रही थीं. मुझे एग्ज़ाम के लिए देर होने की चिंता सताने लगी कि तभी हेलमेट पहने एक बाइक सवार मेरे पास आकर रुका और कहने लगा, “पेपर का समय हो गया है, अगर इसी तरह खड़ी रहीं, तो आज का पेपर गया समझो.”

मैंने जब ग़ौर से देखा, तो मालूम हुआ कि वो तो संजय है. मैं उसके साथ बैठने में हिचकिचाने लगी. तब उसने कहा, “अरे भई, हम कोई भूत नहीं हूं, चलो जल्दी बैठो, पेपर शुरू होने में 10 मिनट ही बचे हैं.” अब मैं उसकी बाइक पर बैठ गई. बीच-बीच में कभी ब्रेक लगाने पर मेरा शरीर उससे छू जाता, तो अजीब-सी सिहरन होने लगती. मेरा मुंह सूख रहा था. मैंने ख़ुद को संभाला और पेपर देने चली गई.

इसके बाद संजय से मुलाक़ातें बढ़ने लगीं और धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि पहला प्यार इसे ही कहते हैं. संजय बिहार से था और उसकी भाषा व बोलने के अंदाज़ पर मुझे कभी-कभी हंसी आ जाती थी. एक दिन वो बोला, “वो ऐसा है कि हमने ज़्यादा किसी से प्यार-व्यार नहीं किया, इसलिए मालूम नहीं कि ये कैसा होता है, पर अपना प्यार तो एकदम हार्डवेयरवाला है. पक्का मतलब एकदम पक्का.” तब मैंने हंसते हुए कहा, “अपन तो सॉफ्टवेयरवाले हैं और प्यार के मामले में भी एकदम सॉफ्ट हैं.”

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: इतना-सा झूठ (Pahla Affair: Itna Sa Jhooth)

अब हम लोग कॉलेज के पास की झील के किनारे बैठकर भविष्य के सपने बुनते रहते… एक बार वो तुकबंदी करते हुए कहने लगा… “जब फूल खिलता है, तो ख़ुशबू फैल जाता है… जब तुम हंसता है, तो बहार आ जाता है.” उसकी इस तुकबंदी पर मुझे ज़ोर से हंसी आ गई और मैंने भी हंसते हुए कहा, “ जब तुम तुकबंदी करता है, तो आंसू आ जाता है… यह ख़ुशी का है या ग़म का पता नहीं लग पाता है.” फिर काफ़ी देर तक हम हंसते रहे और मैंने सोचा कि व़क्त यहीं रुक जाए और यूं ही हंसते-खिलखिलाते ज़िंदगी गुज़र जाए.

बी.ई. पूरा होने के बाद संजय पटना चला गया. बीच-बीच में हमारी बातें होती रहती थीं और इसी बीच संजय ने बताया कि उसका सिलेक्शन आर्मी में हो गया है, संजय काफ़ी मेहनती था, जो ठान लेता, वो करता ही था. उसे दूर-दराज़ के इलाकों में कंप्यूटर इंस्टॉलेशन का काम सौंपा गया था. एक दिन मेरे मोबाइल पर उसका मैसेज आया- हम लोगों को अपने काम पर ले जानेवाला ट्रक खाई में गिर गया है, अस्पताल में पड़ा हूं, ऐसा लगता है ज़िंदगी ज़्यादा नहीं है. तुम अपनी ज़िंदगी सॉफ्टवेयर-सी रखना, मेरे जैसी हार्डवेयर नहीं.

आज मैं एक बैंक में कार्यरत हूं, लेकिन संजय के बिना ज़िंदगी वीरान है. उसका प्यार मेरा संबल है, पर उसके बिना ज़िंदगी सॉफ्ट नहीं, हार्डवेयर-सी है. अकेले जीवन गुज़ारते हुए बस उसका चेहरा और बातें ही सहारा हैं.

– संतोष श्रीवास्तव

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta)

Affair Stories

पहला अफेयर: इतना-सा झूठ (Pahla Affair: Itna Sa Jhooth)

प्यार करने की भी भला कोई उम्र होती है क्या? पंद्रह से पच्चीस वर्ष, बस इसी बीच आप प्यार कर सकते हैं, इसके आगे-पीछे नहीं. फिल्मों और कहानियों से तो ऐसा ही लगता है. नायक-नायिका न केवल जवां होने चाहिए, बल्कि उनका हसीन होना भी ज़रुरी है. सच पूछो तो इस उम्र के बाद का प्यार अधिक परिपक्व होता है, उसमें वासना का स्थान गौण हो जाता है और इस उम्र के पहले का प्यार तो और भी पवित्र होता है. निश्छल- हां बस यही एक शब्द है उसका बखान करने के लिए. और जब भी उस निश्छल प्यार के बारे में सोचती हूं तो मेरे सामने किशोर आ खड़ा होता है. सातवीं कक्षा में पढ़ता अल्हड़ किशोर.

हमारे ग्रुप में बिल्डिंग के बहुत से बच्चे थे. उन्हीं में से एक था- किशोर. बारह वर्षीय किशोर स्वयं को बहुत समझदार समझता था. उसके बड़े भाई का उन्हीं दिनों विवाह हुआ था एवं उसने अपने किशोर मन में कहीं यह ठान लिया था कि वह शादी करेगा तो स़िर्फ मुझसे. मैं तो खैर इन बातों से अनभिज्ञ तब तीसरी कक्षा में पढ़ती थी. बहुत नादान थी.

उन दिनों टी.वी., फ़िल्में उतनी प्रचलित नहीं थीं. हम कभी घर-घर खेलते, शादी-ब्याह करवाते-बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया थी. इसके अलावा प्रायः हम छोटे-छोटे नाटक भी अभिनीत करते. किसी की मां की साड़ी का पर्दा बन जाता और बड़ी बहनों के दुपट्टों से पगड़ी और धोती. किशोर की हमेशा यह ज़िद रहती कि वह मेरे साथ ही काम करेगा. यदि मैं नायिका का रोल कर रही हूं तो वह नायक का करेगा और यदि मैं मां का पार्ट कर रही हूं तो वह पिता का करेगा.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: तुम्हारी कत्थई आंखें (Pahla Affair: Tumhari Kathai Ankhen)

बचपन किशोरावस्था का समय कब पंख लगाकर उड़ जाता है, पता ही नहीं चलता. समय के साथ-साथ हमारी मित्र मंडली भी तितर-बितर हो गई अपने अभिभावकों के संग. पिताजी के तबादलों के कारण हर वर्ष नया शहर, नया स्कूल होता. शेष रह गईं बचपन की यादें. पर किशोर ने उन यादों को कुछ अधिक ही संजो रखा था. अपने उस इरादे पर वह सचमुच संजीदा था.

विधि का विधान देखो, मेरा विवाह तय हुआ भी तो किशोर के ममेरे भाई से और राज़ खुला कार्ड छपने के बाद, जब उसके हाथ वह कार्ड लगा. कार्ड हाथ में लिए ही वह हमारे घर आया. पास ही के शहर में हम रहते थे. पर क्या हो सकता था तब? उसने अपने प्यार की बहुत दुहाई दी. एक अपरिचित व्यक्ति से बंधने के स्थान पर उससे विवाह करना जिसने मुझे ताउम्र चाहा- मेरे लिए बहुत बड़ा प्रलोभन था.

अरसा बीत गया. यूं कहो कि जीवन ही बीत गया. पर मैंने भरसक उससे दूरी बनाए रखी. किसी उत्सव में उसकी उपस्थिति की संभावना मात्र से ही मैं वहां जाना टाल जाती. शादी-ब्याह में शामिल होना ज़रूरी हो जाता तो शादी की भीड़ में गुम हो जाने की कोशिश करती, पर क़रीबी रिश्ता होने से अनायास सामना हो ही जाता. और मुझसे नज़रें मिलते ही उसकी आंखों के चिराग़ दहक उठते. मैं भी उस ताप से कहां बच पाती हूं. मन का चोर हमें सामान्य बातचीत करने से भी रोक देता है. वह आज भी मुझे उसी शिद्दत से चाहता है . यह मात्र मेरी कल्पना नहीं- उसकी पत्नी मालिनी ने स्वयं मुझसे कहा था. कभी क्रोध के ज्वार में उसने अपने जीवन की पूरी निराशा, पूरी कुण्ठा, पत्नी पर उड़ेल दी और वह मेेरे पास आई थी सफ़ाई मांगने.

“मेरे लिए वह मात्र ससुराल पक्ष का रिश्तेदार है. इससे अधिक मैंने उसे कुछ नहीं माना.” मैंने मालिनी को पूरा विश्‍वास दिलाते हुए कहा था. मैं जानती हूं यह सच नहीं. पर सच बोलकर भला दो घरों की शांति भंग क्यों करूं? बच्चों की भावनाओं, उनके सुरक्षित भविष्य पर ठेस पहुंचाऊं? अपने निर्दोष पति और निर्दोष मालिनी का सुख-चैन छीनूं?

इन सबके लिए मेरा इतना-सा झूठ क्षम्य नहीं है क्या?

– उषा

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत रिश्ता (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Rishta)