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पहला अफेयर: अधूरे ख़्वाब (Pahla Affair: Adhoore Khwab)

Pahla Affair, Adhoore Khwab
Pahla Affair, Adhoore Khwab
पहला अफेयर: अधूरे ख़्वाब (Pahla Affair: Adhoore Khwab)

व़क्त गुज़र जाता है, लेकिन उसकी कुछ यादें दिल के किसी कोने में हमेशा मौजूद होती हैं, जिनमें डूबकर कभी लगता है बहुत हसीन है यह ज़िंदगी, मगर कुछ बेरहम भी है, क्योंकि इनमें तुम्हारी जुदाई के वो कराहते लम्हे ही अधिक हैं… जिनके पार उतरना बहुत असंभव है.
जीवन के संघर्षमय सागर में मुझे अकेला छोड़कर जब तुम चले गए, तो ऐसा कोई नहीं था, जो मेरे जलते हुए निर्विश्राम जीवन पर सांत्वना की दो बूंद छिड़क दे, फिर भी मैं व्यथित नहीं हुई… सर्वथा आमोद-प्रमोद की लहरों में पड़ी रही… मेरा ही दुखी मन और मैं ही समझानेवाली थी. वेदना के शोलों पर मुस्कुराहट की राख बिखेरते हुए हर तरह से मन के भावों को कुचलने की चेष्टा में तुम्हारा इंतज़ार करती रही.

जब तक तुम थे, तभी तक ज़िंदगी थी मेरे आस-पास… लेकिन जब तुम जॉब करने अचानक जर्मनी चले गए, तब मैंने देखा था कैसे किसी शख़्स का चले जाना वीरान कर जाता है सारा शहर!

तुम्हारी योग्यताओं को देखते हुए वहां तुम्हें बहुत बेहतरीन जॉब का ऑफर मिला था, इसलिए वहां तुम्हें जाना पड़ा और तुम चले गए. तुम्हारे इस तरह चले जाने के बाद तुम्हारे ग़म में डूबी मैं ढूंढ़ती रही हूं अपने को! क्योंकि मेरा वजूद तो तुम थे. तुम्हारे बिना मैं आज भी अधूरी हूं.

यह प्यार भी एक अलौकिक सज़ा है… ग़म देनेवाला एक मज़ा है और इसका सिरा मैं कहीं न कहीं से ढूंढ़ ही लेती हूं.

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मेरा ये पहला प्यार ही मेरे लिए सारा जीवन है. मेरी जिन आंखों में आज आंसू ही आंसू हैं, कभी इनमें वो सपने हुआ करते थे, जिन्हें प्यार की राहों में तुम्हारे साथ चलते हुए मेरी पलकों ने सजाया था. हमारे वो सपने कभी आकाश के तारों से रौशन हुआ करते थे और ये सर्द हवाएं हमारे लिए प्यार के तराने गाया करती थीं. महकते फूलों का संगीत उन रास्तों को जगाया करता था, जिन राहों पर एक-दूसरे की बांहों का सहारा लेकर हम रखते थे अपने क़दम!

बचपन के साथी थे हम, लेकिन हमारे बचपन की कहानी ज़माने से कोई अलग नहीं थी. वही साथ-साथ खेलना… नदी के उस पार की बगिया से आम व अमरूद तोड़कर एक साथ पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते हमारा बचपन कैसे बीत गया, हमें पता भी नहीं चला.

तीन वर्ष हो गए तुमको यहां से गए हुए और अब ग़मों से घिर गई हूं मैं. कहां हो तुम? बड़ी वीरान हैं उम्मीदों की राहें… चले आओ मेरी आंखें तुम्हें देखने की चाह में कुछ और देखना ही भूल गई हैं… अपने जल्द आने की बात कहकर भी तुम नहीं आए… न जाने इतना धैर्य तुममें कहां से आ जाता है? लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं है. मेरे साथ पूरा परिवार है और मेरे साथ-साथ मेरे पूरे परिवार ने भी तुम्हारा इंतज़ार किया था. फिर एक दिन रीति-रिवाज़ों के बंधन में बंधकर मैं किसी और की हो गई!

जो प्यार मैंने तुमसे किया और तुम्हारे प्यार ने मुझे जो एहसास, जो यादें दीं शायद इसे ही पहला प्यार कहते हैं… तुम्हारा यही प्यार आज भी ज़िंदा है मेरे मन में. तुम्हारे इस एहसास के साथ-साथ मुझे ‘अधूरे ख़्वाब’ दिखाने के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया!

– दिशा राजवानी

पहला अफेयर: रूठ गया वसंत… (Pahla Affair: Rooth Gaya Vasant)

Pahla Affair, Rooth Gaya Vasant

 

पहला अफेयर: रूठ गया वसंत… (Pahla Affair: Rooth Gaya Vasant)

क्यों रूठा हमसे बसंत
हमने तो सुदूर नीलांबर के इंद्रधनुष में
प्यार के कुछ रंग भरने चाहे थे
ज़माने की आंधी चली कुछ ऐसी
ज़िंदगी में हमेशा के लिए पतझड़ छा गया

फिर वसंत आ गया. बसंत का यह मौसम दिल में एक अजीब-सी हूक जगा देता है. कॉलेज के वो दिन आंखों के सामने घूम जाते हैं, जो मेरी ज़िंदगी में बहार लेकर आए थे.

मेरे लिए यह शहर भी अजनबी था और यहां के लोग भी. मैंने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया था. कॉन्वेंट स्कूल के सख़्त अनुशासन के पश्‍चात् यहां का सहशिक्षा वाला वातावरण उन्मुक्त प्रतीत हुआ. शुरू-शुरू में थोड़ी मुश्किलें ज़रूर आईं, पर जल्दी ही मैंने नए माहौल में अपने आप को ढाल लिया, कई साथी भी बन गए.

कॉलेज में सांस्कृतिक सप्ताह का आयोजन होनेवाला था. मेरे एक सहपाठी ने मुझसे उसके साथ युगल गान प्रतियोगिता में भाग लेने का अनुरोध किया. मैंने उससे स्पष्ट कहा कि मुझे गीत-संगीत सुनने का शौक़ तो बहुत है, किंतु मैं स्वयं अच्छा नहीं गा पाती हूं, इसलिए वह कोई और पार्टनर चुन ले. गायन प्रतियोगिता वाले दिन उस छात्र को जब एक ख़ूबसूरत छात्रा के साथ स्टेज पर गाते देखा तो न जाने क्यों कुछ अच्छा नहीं लगा. मुझे ईर्ष्या का अनुभव हुआ. फिर तो मैं भी नृत्य, नाटक, लेखन आदि प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगी और इसके लिए अनेक पुरस्कार भी जीते. धीरे-धीरे मैंने उस लड़के से दोस्ती भी बढ़ा ली.

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हम दोनों में ख़ूब पटने लगी. एक गहरे आकर्षण के मोहपाश में हम बंधते चले गए. जूही-चंपा व गुलमोहर से हरी-भरी कॉलेज की बगिया हमारी मुलाक़ातों की मौन साक्षी बनी. एक-दूसरे के साथ के सिवाय हमें कुछ अच्छा ही नहीं लगता. साथ उठते-बैठते, लड़ते-झगड़ते कब हम भावी जीवन के मधुर स्वप्न देखने लगे, पता ही नहीं चला. मगर ख़्वाब देखते हुए शायद हम ये भूल गए कि हमारे समाज में जाति-पाति, वर्ग-भेद बहुत गहरा पैठा हुआ है.

परिवार की रज़ामंदी तो दूर, हमारे प्रेम पथ पर दुखों के कांटे बिछा दिए उन्होंने. जीवनभर अपने प्रियजनों से अलगाव झेलने का सामर्थ्य नहीं था हममें, न ही आर्थिक रूप से हम सक्षम थे कि समाज से दूर अपनी नई दुनिया बसा पाते. कठोर यथार्थ के दानव ने हमारा स्वप्न-लोक नष्ट कर दिया. हमारे ख़्वाब अधूरे रह गए. मेरा राजकुमार स़फेद घोड़े पर सवार हो मुझे ब्याहने नहीं आ पाया. अश्रुओं का अथाह सागर अंदर ही शुष्क हो गया. मैंने आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लिया और मेरे इस निश्‍चय को कोई नहीं डिगा पाया.
मेरा प्यार कहां है, कैसा है, यह जानने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाई मैं. नेह के गुलाबों की सुरभित पंखुड़ियां मेरी स्मृतियों की क़िताब के पृष्ठों के बीच आज भी दबी हुई हैं. कभी अनजाने में मेरे पहले और अंतिम प्यार ने गीत गाते हुए जीवन की सच्चाई बयां कर दी थी.

जीवन के सफ़र में राही
मिलते हैं बिछड़ जाने को
और दे जाते हैं यादें
तन्हाई में तड़पाने को.

– डॉ. महिमा

पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

वो मेरी तक़दीर बन गया…
बरसात में हम पानी बनकर बह जाएंगे
पतझड़ में फूल बनकर झर जाएंगे
क्या हुआ आज तुम्हें इतना तंग करते हैं
एक दिन बिना बताए इस दुनिया से चले जाएंगे.

उसने तो शायरी की चंद पंक्तियां सुनाकर सबकी वाहवाही लूट ली. लेकिन मेरा दिल उन ल़फ़्ज़ों की आंच से धीमे-धीमे पिघलने लगा. कई दिनों से वह मेरा पीछा कर रहा था. वह मुझे अपनी हरकतों से इस अंदाज़ से छेड़ता कि मैं चाहकर भी कुछ न कह पाती. मन ही मन उसकी अदाएं, बदमाशियां और उसका इस तरह से मुझे छेड़ना अच्छा भी लगता, लेकिन मैं यह बात उस पर ज़ाहिर न होने देती. एक दिन वह अचानक मेरे सामने आ खड़ा हुआ और कहने लगा, “आख़िर आप मुझसे बात क्यों नहीं करना चाहती हैं? मैं एक शरीफ़ और अच्छे घर का लड़का हूं. आपको पसंद करता हूं, इसलिए आपसे दोस्ती करना चाहता हूं.”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और पलटकर चल दी. कई दिनों तक वो कोशिश करता रहा कि मैं एक बार नज़र उठाकर उसकी तरफ़ देख लूं. मन तो मेरा भी चाहता था कि सबकी नज़रें चुराकर उसकी एक झलक देख लूं, लेकिन एक अनजाना डर हमेशा मुझे इस बात से रोक देता था.

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मैं अपने परिवार से बहुत प्यार करती थी और नहीं चाहती थी कि मेरा कोई भी ग़लत क़दम मुझे उनसे अलग कर दे. हालांकि उसकी लगातार मेरे क़रीब आने और बात करने की कोशिशों से मेरा दिल विद्रोही हो उठा था और बगावत करने पर उतारू हो गया था. लेकिन मैं तो जैसे दिल की बात सुनने को तैयार ही नहीं थी. मैं प्यार के चक्कर में पड़ना नहीं चाहती थी. इतना तो मैं जानती थी कि ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनका प्यार सही अंजाम तक पहुंचता है. मैं प्यार का दर्द लेकर जीना नहीं चाहती थी. इसलिए मैंने उससे दूर रहना ही ठीक समझा.

एक दिन पापा ने मुझसे कहा, “बेटे आज एक पार्टी में जाना है, जहां लड़केवाले आएंगे. मैं चाहता हूं तुम उन लोगों से मिलो. लड़के से भी बात करके देख लो. हमें जल्दी ही तुम्हारी शादी का फैसला लेना है.” मैंने भी पापा की बात को सहमति देते हुए कहा, “पापा, जैसा आप ठीक समझें. मुझे पता है, आपका फैसला ग़लत नहीं होगा.”

जब हम पार्टी में पहुंचे तो मैं सबसे औपचारिक बातें करने में मशग़ूल थी कि माइक पर आवाज़ गूंजी,
अजनबी लोग भी देने लगे इल्ज़ाम मुझे
कहां ले जाएगी तेरी पहचान मुझे
भुलाना चाहूं तो भुलाऊं कैसे,
लोग ले ले के बुलाते हैं तेरा नाम मुझे.

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जो चेहरा मेरे सामने आया, वो उसका ही था. मैं मुड़कर जाने ही लगी कि पापा बोले, “बेटे, यही मधुर है, जिसे हमने तेरे लिए चुना है. अब फैसला तुझे करना है.” मेरी आंखें छलक पड़ीं. जब पलकें उठाकर उसे मुस्कुराते देखा तो मैं रोते-रोते मुस्कुरा उठी और अपनी क़िस्मत पर इतराने लगी-

जिस प्यार को मैं ठुकरा रही थी
वही मेरी क़िस्मत बन गया
जिसे ज़ुबां पर लाना मुश्किल था
वो नाम मेरे माथे का सिंदूर
मेरी तक़दीर बन गया…

– वीना साधवानी

पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

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पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

चली हवा छाई घटा, चुनरी क्यों लहराई
बैठी-बैठी सोच रही मैं, बेबात क्यों हिचकी आई
उस रोज़ स्वेटर सीने बैठी उंगली में सुई ऐसी चुभी कि उस चुभन का एहसास आज भी ताज़ा है. ख़ून आज भी रिस रहा है. सूई की पीड़ा की अथाह परतें आज भी मन को मथने लगती हैं. मम्मी उठकर पास चली आईं. शायद उसने मेरा दर्द महसूस किया. मम्मी के बगल में बैठा मनुज ज़ोर-ज़ोर से ठहाका लगाकर हंस पड़ा. कभी-कभी बातों को हंसी में उड़ा देना और फिर एकदम गंभीर हो जाना, जैसे कोई रहस्यमयी क़िताब पढ़ रहा हो, ये सब उसकी आदतों में शामिल था. मैं खीझ उठती, “मनु, किसी नाटक कंपनी में भरती हो जाओ या मंच पर मिमिक्री का रोल…” मेरी बात को काटकर मम्मी से कहता, “भई स्वेटर के उल्टे फंदों में उलझेगी तो हादसा तो होगा ही.” मैं कटकर रह जाती. वह फिर ठहाका लगाता और… मैं उसकी हंसी की आवाज़ में खो जाती.

उसका छोटा-सा परिचय- वह हमारे गेस्ट हाउस में रहने आया. पापा के किसी ख़ास दोस्त का सिरफिरा साहबज़ादा. उसकी कही हुई एक-एक बात आज भी दुधारी तलवार-सी चीरती है मुझे. हर व़क़्त तोते-सी रटी-रटाई बात कहता, “शिल्पी, ज्यों ही मुझे वीज़ा मिल जाएगा, मैं हवा में फुर्र हो जाऊंगा.”

“उ़़फ्! लंदन जाकर पढ़ने का इतना ही शौक़ था तो फिर प्यार की पींगें बढ़ाने का यह जुनून क्यों पाला?” मैं चिढ़कर कहती.
बेशक कसकर बंद कर लूं आंखें. विचार चलचित्र की भांति चलते रहते हैं. चैन कहां लेने देते हैं? सुना था, चूक गए अवसर अपने पीछे पछतावे की लंबी कतारें छोड़ जाते हैं. कैसे यक़ीन की कश्ती पर मुझे बिठा चुपचाप समंदर पार कर गया… और छोड़ गया मेरे लिए यादों की लंबी कतारें. अब तो रूह से एक मायूस गज़ल फूटती है-

अब न लौट के आनेवाला
वो घर छोड़ के जानेवाला
हो गई उधर बात कुछ ऐसी
रुक गया रोज़ का आनेवाला

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जिस रोज़ उसे वीज़ा मिला, उस रोज़ वह बेहद ख़ुश आया. हवा के झोंके-सा आया था मेरे घर. छत पर हम कुछ पल बतियाए. रुख़सत होते व़क़्त मेरे दोनों हाथ पकड़कर वह बोला, “शिल्पी, उदासी उतार फेंको. मेडिकल की पढ़ाई ख़त्म होते ही लौटूंगा अपनी शिल्पी के पास, विवाह बंधन में बंधने.” मैं पगली गुलमोहर के फूलों में भी लाल जोड़े की कल्पना करने लगी.

उसका सच इतना झंझावाती था कि सपनों के तमाम घरौंदों को रौंदता आगे निकल गया. वह जा बसा सात समंदर पार…
मैं यहां बिलखती रही अकेली. कभी-कभी मेरी यादों के परिंदे जाकर मेरे पहले प्यार को छू आते हैं. उन हवाओं में आज भी रची-बसी हैं तुम्हारे यादों की ख़ुशबू… डरती हूं. इन यादों को कहां उखाड़ फेंकूं. ये तो कैक्टस की तरह फिर उग आएंगी.

रात आंखों में कटी, पलकों पे जुगनू आए
हम हवा की तरह जा के उसे छू आए.

– मीरा हिंगोरानी

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना… (Pahla Affair: Tumhara Jana)

 

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना... (Pahla Affair: Tumhara Jana)

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना… (Pahla Affair: Tumhara Jana)

ट्रेन जिस तेज़ी से भाग रही थी, उससे भी ज़्यादा तेज़ी से मन अतीत की ओर दौड़ा जा रहा था. दूर-दूर तक दिखते अलसाए से मैदान और उदासीन खड़े पहाड़ एक अजीब-सा खालीपन पैदा कर रहे थे. रह-रहकर आंखों के कोनों में गीलेपन का एहसास हो रहा था. दिल किसी अपने के कंधे पर सिर रखकर अंदर के गुबार को आंखों के रास्ते बाहर निकाल देना चाहता था. पर नीला, तुम्हारे ये शब्द मुझे रोकने की कोशिश कर रहे थे कि  “लड़के रोते हुए अच्छे नहीं लगते, रोने का काम तो हम लड़कियों का है, सो हमें ही रोने दिया करो.”

इस शहर से जब अजनबीयत का ही रिश्ता था, तब एक अलसाई-सी दोपहर, बस से जाते हुए सड़क के किनारे खड़े देखा था तुम्हें. उस गर्म दोपहर में भी सुबह की ओस जैसी ताज़गी तुम्हारे चेहरे पर खिली हुई थी. इससे पहले कि मैं उस शीतलता को अनुभव कर पाता, बस आगे बढ़ गई थी. लाल बत्ती पर जैसे ही बस रुकी, बिजली-सी फुर्ती से ख़ुद को नीचे खड़ा पाया. आज भी यह सोचकर हैरानी होती है कि मुझ में कहां से इतना साहस आ गया था उस समय. पहली बार मिलने पर भी अजनबीपन को हमारे बीच की दीवार बनने का मौक़ा नहीं मिला. वर्षों पुरानी पहचान के ये संकेत तुम्हें भी मिले थे उस दिन.

तुम्हारी गहरी आंखों में अक्सर नीले आसमान-सा सूनापन दिखता था तो कभी नीली झील-सी गहरी ख़ामोशी, जिसका अनुमान लगाना मुश्किल होता था. शायद इसी वजह से मैंने तुम्हें नाम दिया था “नीला.”

गरजती हुई ट्रेन अचानक एक सुरंग में प्रवेश कर गई. घुप्प अंधेरा आंखों के आगे छा गया. पहाड़ी से उतरते हुए उस दिन शायद ऐसा ही अंधेरा तुम्हारी आंखों में भी छाया था. कुछ क्षणों के लिए चेतनाशून्य हो गई थी तुम. चेहरा एकदम पीला पड़ गया था तुम्हारा. थोड़ा ठीक होने पर सिरदर्द का बहाना बनाकर टाल गई थी. उस दिन के बाद तुम्हारे चेहरे के भावों को पढ़ना मुश्किल लगने लगा था. जिस घर की एक-एक चीज़ को तुमने अपने हाथों से संवारा था, अचानक ही उसे मेरे नाम करने की घोषणा कर दी थी तुमने. तब भी तुम्हारी आंखों की भाषा को पढ़ने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं की मैंने उस दिन.

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कुछ दिन बाद मुझे दूसरे शहर से पेंटिंग्स की शृंखला तैयार करने का प्रस्ताव मिला. शायद ये तुम्हारी ही कोशिशों का परिणाम था. अपना वास्ता देकर तुमने मुझे वहां भेजा था. छह महीने लग गए थे काम पूरा करने में. सभी ने मेरे काम की ख़ूब सराहना की.

वापस लौटने पर पता चला कि तुम इस शहर से जा चुकी हो. कोई निशान भी बाकी नहीं छोड़े थे तुमने, सारी कोशिशें बेकार गईं तुम्हें ढूंढ़ने की. मन में शायद उम्मीद की किरण बाकी थी, सो महीनों तक भटकने के बाद फिर वापस मैं इसी शहर में आया और अचानक ही तुम्हारी बहन से मुलाक़ात हुई. उन्होंने जो बताया, उसे सुनकर होश उड़ गए थे मेरे. तुम इस शहर को तो क्या, दुनिया को भी अलविदा कह चुकी थी. बहाना ब्रेन ट्यूमर. मेरी भावुकता को तुम जानती थी. इसलिए अपने दर्द में बिल्कुल भी शामिल नहीं किया था तुमने. ऐसा लग रहा था पिघलता हुआ शीशा किसी ने मेरे कानों में उड़ेल दिया होे. शहर खाली कैनवास की तरह लग रहा था-बिल्कुल सूना. आज हमेशा के लिए छोड़ आया हूं मैं इस शहर को.

नीला प्लीज़, आज बिल्कुल भी मत रोकना, मन में घुमड़ते इस सैलाब को बहने से, वरना नासूर बनकर सारे शरीर से रिसने लगेगा. ट्रेन के टॉयलेट में बच्चे की तरह फूट-फूटकर रो रहा हूं मैं और सचमुच रोते हुए बहुत बुरा लग रहा हूं मैं.

– ब्रजेश नामदेव

ये प्यार इतना कॉम्प्लिकेटेड क्यों होता है? देखें वीडियो:

 

 

पहला अफेयर: मुहब्बत पर यक़ीन है मुझे (Pahla Affair: Mohabbat Per Yakeen Hai Mujhe)

Pahla Affair, Mohabbat Per Yakeen Hai Mujhe

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पहला अफेयर: मुहब्बत पर यक़ीन है मुझे (Pahla Affair: Mohabbat Per Yakeen Hai Mujhe)

मुहब्बत हो जाती है किसी से… आपका दिल इस तरह किसी और का हो जाता है कुछ ही पलों में… वो भी आपको बिना बताए… ऐसे दगा दे जाता है, कभी सोचा ही नहीं था मैंने. मैं तो हमेशा कहा करती थी, “प्यार-व्यार बेकार की बातें हैं. और शादी का तो सवाल ही नहीं उठता.” मेरे विचार सुनकर कभी किसी ने मुझसे प्यार करने की शायद सोची ही नहीं या शायद मैंने कभी किसी के एहसास को महसूस ही नहीं किया.

वैसे तो मैं प्रतीक के प्रति अपनी चाहत को भी नहीं समझ पाई थी. उससे मेरी पहली मुलाक़ात पहले दिन ही ऑफ़िस में हुई. पहली ही नज़र में वो मुझे अपना-सा लगा और मेरी उससे अच्छी दोस्ती हो गई. खाली वक्त में हम अक्सर शेरो-शायरी, राजनीति, फ़िल्में और साहित्य की बातें करते. शादी के बारे में मेरे और उसके विचार बहुत मिलते थे. प्यार पर उसे भी विश्‍वास नहीं था, लेकिन कई लड़कियों के साथ उसका चक्कर था. जब भी मैं उससे पूछती, “जब प्यार पर विश्‍वास ही नहीं है तो प्यार करते क्यों हो?”
तो वो कहता, “अरे, मैं प्यार थोड़े ही करता हूं. वो तो बस, लड़कियों को ये यक़ीन दिलाने के लिए कि प्यार विश्‍वास की चीज़ है ही नहीं, यूं ही थोड़ा टाइम पास कर लेता हूं.” वो मुझसे भी फ्लर्ट करता, पर मैं उसे डांट देती.

मन ही मन मुझे उसका छेड़ना अच्छा लगने लगा था और दूसरी लड़कियों के साथ उसका घूमना-फिरना और बातें करना बुरा. उसे टोकती तो मज़ाकिया लहज़े में कहता, “बुरा लगता है तो तुम प्यार करो मुझे. देखो, सब लड़कियों को छोड़ दूंगा.” ऐसी बातें उसने कई बार कीं, मगर मैंने हर बार मज़ाक में टाल दिया.

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इधर कुछ दिनों से मैं महसूस करने लगी थी कि एक-दो दिन भी उसे देखे बिना, उससे बात किए बिना मुझे खालीपन-सा लगता. मैं हर किसी से उसके बारे में ही पूछती रहती. मेरी फ्रेंड श्‍वेता ने शायद मेरे मन को पढ़ लिया था. एक दिन उसने कहा, “अदिति, तुझे प्रतीक से प्यार हो गया है…” मैंने तो कभी ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि मुझे भी प्यार होगा किसी से. लेकिन श्‍वेता से बातें करने के बाद मुझे लगा कि सचमुच मुझे प्रतीक से प्यार होने लगा है, लेकिन उससे कैसे कहूं और क्या फ़ायदा उसे कहने का? वो तो हंसेगा मुझ पर. मेरे प्यार का मज़ाक उड़ाएगा. बस, इसी ऊहापोह में 4-5 दिन निकल गए.

इधर प्रतीक भी गायब था पिछले दो दिनों से. मैंने उसके सारे दोस्तों को फ़ोन करके पूछा तो उसके सबसे क़रीबी दोस्त राज ने बताया कि वो तो लॉन्ग लीव पर गया है अपने मम्मी-पापा के पास लंदन और एक पत्र छोड़ गया है मेरे लिए.
मैं फौरन वो पत्र लेने पहुंच गई, पत्र हाथ में आते ही मेरे दिल की धड़कन बढ गई.

प्रिय अदिति,
नहीं जानता था कि यूं मुहब्बत हो जाएगी. दिल्लगी करते-करते सचमुच किसी को दिल दे बैठूंगा, नहीं सोचा था. हां, मैं तुमसे प्यार करता हूं… सच्चा प्यार. कई बार कोशिश की तुम्हें बताने की, लेकिन तुम्हें यक़ीन नहीं दिला सका. अब मुझे प्यार पर विश्‍वास होने लगा है. मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं. मैं लंदन जा रहा हूं अपने मम्मी-पापा के पास. अगर तुम मेरे प्यार पर यक़ीन कर लो तो लौट आऊंगा छह महीने के बाद, वरना तुम्हारी यादों के सहारे पूरी ज़िंदगी काट लूंगा. फ़ोन करूंगा तुम्हें, तुम्हारा जवाब जानने के लिए. उम्मीद है तुम मेरे प्यार को, मेरी भावनाओं को समझोगी.

पत्र पढ़ते-पढ़ते न जाने कब मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे. शायद ये ख़ुशी के आंसू थे, जिससे प्यार पर अविश्‍वास करने की मेरी सोच पूरी तरह धुल गई थी. अब बस, मुझे उसके फ़ोन का बेसब्री से इंतज़ार है. उसके प्यार पर विश्‍वास जो हो गया है मुझे.

– प्रीति तिवारी

पहला अफेयर: बहुत देर कर दी… (Pahla Affair: Bahot Der Kar Di)

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पहला अफेयर: बहुत देर कर दी… (Pahla Affair: Bahot Der Kar Di)

गुनाहों का देवता यह वही उपन्यास है, जिसे मैं अपने पढ़ाई के दिनों में सबसे ज़्यादा पसंद किया करता था. मुहब्बत की इस दास्तां को न जाने कितनी बार पढ़ डाला था मैंने. रैक पर से क़िताब तो उठा ली, पर याद ही नहीं आ रहा था कि यह उपन्यास मेरे पास कैसे आया? पहला पृष्ठ खोलते ही नज़र पड़ी, सुषमा की ओर से सप्रेम भेंट. ओह! अब याद आया, यह तो सुषमा ने दिया था कॉलेज के दिनों में, जब विदाई समारोह में आई थी और कहा था, “इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन चूंकि दर्जनों बार यह उपन्यास पढ़ चुका था, इसलिए इसे बिना पढ़े रैक में रख दिया. कब नौकरी लगी, कब शादी हुई और कैसे 35 साल गुज़र गए, पता ही नहीं चला.

ये वही सुषमा थी, जिससे मैं बेइंतहा मुहब्बत करता था, लेकिन कभी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. तभी हवा का ज़ोर का झोंका आया और उपन्यास मेरे हाथ से गिरकर फ़र्श पर जा गिरा. काग़ज़ का एक पुर्जा क़िताब के पन्नों से निकलकर बाहर आ गिरा. उठाकर पढ़ा. लिखा था-प्रिय कमल, मुझे ख़ुद नहीं पता कि प्रेम क्या होता है? प्रेम की परिभाषा क्या होती है? लेकिन मैं जब भी तुम्हें देखती हूं मुझे अजीब-सी ख़ुशी होती है और तुम्हारा भोला-भाला चेहरा देखना अच्छा लगता है. शायद यही प्रेम है. आज हमारे कॉलेज का आख़िरी दिन है. तुम मुझे चाहते हो या नहीं, मैं नहीं जानती, लेकिन मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. परसों शाम मैं अपने परिवार के साथ यह शहर छोड़कर जा रही हूं. न जाने फिर मिलना हो न हो. तुम कल शाम चार बजे आनंद भवन में आना. मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. यह क़िताब हमारी नई पहचान का प्रतीक होगी.
                                             – तुम्हारी सुषमा

पढ़ते ही मेरे पैर लड़खड़ाने लगे. “हे ईश्‍वर कितनी देर कर दी मैंने.” आज से 38 साल पहले के दृश्य किसी चलचित्र की भांति मेरी आंखों के सामने से गुज़रने लगे, जब मैं पहली बार गांव से इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में पढ़ने के लिए आया था. पहली क्लास, पहला साल गांव का सीधा-सादा लड़का, उस पर रैगिंग का डर. मैं क्लास में लड़कों के बीच सहमा-सा बैठा हुआ था. हल्ला होने पर पता चला कि सीनियर्स आ रहे हैं रैगिंग के लिए. मेरा तो डर के मारे ख़ून सूख गया. सीनियर्स तो आए, पर रैगिंग नहीं कर पाए. कारण- लड़कियों की ग्रुप लीडर सुषमा ने सब जूनियर्स को संगठित कर लिया. सीनियर्स अपना-सा मुंह लेकर चले गए और वह लड़की क्लास की लीडर बन गई. उसने गर्व से हेय दृष्टि से मेरी ओर देखा, जैसे मेरा मज़ाक उड़ा रही हो. उस दिन के बाद से वह क्लास की ‘मिस शेरनी’ और मैं ‘मिस्टर दब्बू’ के नाम से मशहूर हो गया. गाहे-बगाहे वह उसे छेड़ दिया करती थी. पहले मुझे ख़राब लगता था, पर धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा. लेकिन प्यार का इज़हार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. कॉलेज के आख़िरी दिन विदाई समारोह में सुषमा ने सभी छात्रों को ग़िफ़्ट दिए, बड़े बाप की बेटी जो ठहरी. अंत में मेरे सामने आकर बोली, “मिस्टर दब्बू, इस ग़िफ़्ट में रखी क़िताब तुम्हारे लिए. शायद यह क़िताब तुमने पहले पढ़ी हो, फिर भी इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन उपन्यास का शीर्षक देखकर ही मैंने क़िताब रैक में रख दी थी.

दो साल बाद मेरी शादी हो गई. दो बच्चे छोड़कर पत्नी दुनिया से विदा हो गई. बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं. रिटायरमेंट की उम्र में, ज़िंदगी के इस मोड़ पर आज मेरी ज़िंदगी अकेलेपन में गुज़र रही है.

अचानक तेज़ हवा के झोंके के साथ बारिश की बौछारें मेरे चेहरे को भिगो गईं. मेरी तंद्रा टूटी और हाथ से काग़ज़ का टुकड़ा छूटकर उड़ गया, जैसे हवा का झोंका मुझसे कह रहा हो, ‘व़क़्त गुज़र चुका है- शायद इसे पढ़ने में तुमने बहुत देर कर दी…’

– दिलीप द्विवेदी

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पहला अफेयर: रॉन्ग नंबर (Pahla Affair: Wrong Number)

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पहला अफेयर: रॉन्ग नंबर (Pahla Affair: Wrong Number)

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी ये मखमली, सुकोमल एहसास ज़रूर होता है, जिसमें आपको दुनिया की हर चीज़ अचानक यूं ही अच्छी लगने लगती है. बेवजह मुस्कुराना अच्छा लगता है, जब दिल ज़ोर-ज़ोर से किसी के आने की आहट पर धड़कने लगता है, तो उस पर काबू न कर पाना अच्छा लगता है. मेरे साथ भी कुछ ऐसी ही घटना घटित हुई.

उन दिनों हमारे यहां लैंडलाइन फोन हुआ करता था. उस दिन शाम फोन अचानक घनघनाकर बज उठा था. घर के सभी लोग काम में बिज़ी थे, सो फोन मैंने ही उठाया. उधर से ‘हैलो’ के संबोधन ने मेरे मन-मस्तिष्क के तारों को झंकृत-सा कर दिया था. कितना अपनापन और सुकून था उस आवाज़ में, लेकिन दुर्भाग्य से वो रॉन्ग नंबर था, सो सॉरी कहकर रख दिया. मगर रिसीवर रखने के बाद भी दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़के जा रहा था और मैं समझ नहीं पा रही थी कि ये किस तरह का एहसास है, मगर… वो ‘हैलो’ अभी तक मेरे कानों में गूंज रही थी.

मन कर रहा था कि दोबारा उस अजनबी की आवाज़ सुनने को मिल जाए. मेरे मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. इसी बीच कई दिन गुज़र गए, मगर कोई फोन नहीं आया. कुछ दिनों के बाद उसी समय फोन ‘ट्रिन ट्रिन’ कर फिर बजा और मुझे भी ये एहसास हुआ कि ज़रूर ये उसी अजनबी का कॉल है. मैंने लपककर कॉल लिया और वही निकला, जिसकी मुझे उम्मीद थी. उसकी ‘हैलो’ सुनकर काफ़ी सुकून मिला. मैं जिस तरह उसकी आवाज़ सुनने को बेचैन थी, उसका भी वही हाल था, इसका मतलब अंजाने में दोनों के दिल के तार एक-दूसरे से जुड़ने की कोशिश में थे. अब तो घरवालों से नज़रें चुराकर, बच-बचाकर घंटों एक-दूसरे से फोन पर हम बातें करते और कब हम इतने क़रीब आ गए कि एक-दूसरे की ज़िंदगी का अहम् हिस्सा बन गए, पता भी नहीं चला. हमारी फोन पर दोस्ती को दो साल बीत चुके थे. काफ़ी कुछ जान गए थे हम एक-दूसरे के बारे में, वो भी बिना मिले और देखे.

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ख़ैर, व़क्त अपनी रफ़्तार से चल रहा था. घर में सब मेरी शादी के लिए लड़का तलाशने लगे. मेरा दिल तो डूबा जा रहा था. उस अजनबी के बिना जीना मुश्किल लग रहा था. मगर अपने डर और संकोच के आगे घरवालों को कुछ भी नहीं बता पाई मैं उस फोन फ्रेंड के बारे में.

आख़िर वो पल भी आ गया, जब मुझे लड़केवाले देखने आए. मुझे पहली नज़र में ही पसंद कर लिया गया था. मगर लड़के ने मुझसे अकेले में मिलने की मंशा ज़ाहिर की. मिलने के दौरान उसने मुझे बताया कि उसके जीवन में कोई लड़की है, जिसे वो अपनी ज़िंदगी मानता है. घरवालों के दबाव में आकर वो यहां मुझे देखने आ गया था. हमने सोचा इस व़क्त शादी के लिए इंकार किया, तो दोनों के घरवालों को समझाना मुश्किल होगा. उसने मुझे अपनी जेब से एक फोन निकालकर दिया और कहा कि घर जाकर वो फोन करेगा, ताकि सोचा जा सके कि किस तरह से शादी को रोक सकते हैं. मैंने भी अनमने मन से फोन ले लिया.

जाने के लगभग तीन दिन बाद उस मोबाइल पर फोन आया और ‘हैलो’ का संबोधन सुन मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. अचानक लगा कि वो अजनबी इस फोन पर कैसे हो सकता है, मगर सच्चाई यही थी कि वो अजनबी ही मुझे देखने आया था, लेकिन हम दोनों ही इस बात से अंजान थे. क़िस्मत भी कभी-कभी कितने अजीबो-ग़रीब खेल खेलती है. अब तो हम दोनों ने ही ख़ुशी-ख़ुशी शादी के लिए ‘हां’ कर दी थी. आख़िर करते भी क्यों न, रॉन्ग नंबर मेरे जीवन का राइट नंबर जो बन चुका था.

– मंजू यादव

पहला अफेयर: ख़ामोश मुहब्बत… (Pahla Affair: Khamosh Mohabbat)

Pahla Affair, Khamosh Mohabbat

Pahla Affair, Khamosh Mohabbat

पहला अफेयर: ख़ामोश मुहब्बत… (Pahla Affair: Khamosh Mohabbat)

बात उन दिनों की है, जब मैंने कॉलेज में दाख़िला लिया था. मेरा कोई दोस्त नहीं था, इसलिए थोड़ा अकेलापन-सा लगता. फिर धीरे-धीरे आदत-सी हो चली. कक्षा में मेरी सीट खिड़की के पास थी. कई दिनों से मैं गौर कर रही थी कि रोज़ एक साया मेरे पास से गुज़रता, उसकी निगाहें मुझे ही घूर रही होती थीं. पहले तो मुझे उस पर बहुत ग़ुस्सा आया. सोचा, किसी दिन ऐसी ख़बर लूंगी कि होश ठिकाने आ जाएंगे जनाब के. फिर धीरे-धीरे वह मुझे अच्छा लगने लगा. उसका चेहरा बहुत आकर्षक था. जब भी वह मेरे क्लास रूम के पास से गुज़रता मैं बेचैन हो जाती, उसकी आहटों से मेरी धड़कनें तेज़ हो जातीं.

अब तो ये रोज़ का सिलसिला हो गया था. वह दिन में कई बार उस जगह से गुज़रता और मैं सबकी नज़रें बचाकर उसे देख लिया करती. कई बार तो आते-जाते हमारा आमना-सामना भी हुआ, परंतु कोई बात नहीं हुई. हर समय एक बेक़रारी-सी रहती. कुछ कहना चाहती, पर कह नहीं पाती थी. शायद यही प्यार था. वे मेरे दोस्तों से मेरे बारे में बातें करते. दोस्तों से ही पता चला कि उन्हें मैं बहुत ख़ूबसूरत लगती हूं और जिस तरह के पहनावे में वे मुझे देखना चाहते थे, उसका ज़िक्र भी कर देते. जब बात मुझ तक पहुंचती तो मैं उनकी ही पसंदीदा ड्रेस पहनकर कॉलेज जाती. उनकी प्रशंसा उनकी आंखों में नज़र आ जाती. आंखों ही आंखों में हमारी बातें होतीं. दोनों ही संकोची स्वभाव के थे. न वे कुछ कह पाए, न मैं.

मैं सम्पन्न परिवार से थी और दोस्तों से पता चला कि वे साधारण परिवार के हैं. हमारी जाति में फ़र्क़ था. शायद यही कारण था, जो हम दिल की बात दिल में ही दबाकर रह गए. समय गुज़रता गया. परीक्षाएं हुईं. कॉलेज ख़त्म हो गए. मन में एक कसक लिए हम एक-दूसरे से जुदा हो गए.

कॉलेज के बाद मेरी शादी की बात चलने लगी. मन तो बहुत हुआ कि कहीं से वो सामने आ जाएं और मम्मी-पापा से मेरा हाथ मांग लें, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और मेरी शादी मम्मी-पापा की मर्ज़ी से हो गई. मैंने भी उन्हें पाने की ख़्वाहिश को अपने मन के किसी कोने में दबाकर पति को मन से स्वीकार कर लिया.

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पति स्वभाव से अच्छे थे और मुझे ख़ुश भी रखते. जल्दी ही मैं एक बच्चे की मां भी बन गई. बहुत समय बाद मेरे पति को फुर्सत मिली थी, हमने छुट्टियों में घूमने का प्रोग्राम बना लिया. मेरे बेटे का ट्रेन में ये पहला सफ़र था. मैं और मेरे पति उसे ख़ुश होते, किलकारियां मारते हुए देख आनंदित हो रहे थे. अचानक एक आहट-सी हुई और दिल ज़ोरों से धड़कने लगा. यह तो वही आहट है, जिसका कभी मुझे हर पल इंतज़ार रहता था, धड़कनें बेचैन हो जाया करती थीं. मैंने सिर उठाकर सामने देखा तो देखती रह गई. वही चेहरा नज़र आया, जो आज भी दिल में बसा हुआ है. मेरा प्यार मेरी आंखों के सामने खड़ा मंद-मंद मुस्कुरा रहा था. यही तो वह मुस्कान थी, जिसकी मैं दीवानी थी.

वे मेरे सामने वाली बर्थ पर थे. आज भी फिर वही बात हुई. मैं बहुत-सी बातें करना चाहती थी, पर परिवार के आगे बेबस थी. मेरे पति ने उनसे परिचय किया और बातों-बातों में ही दोस्ती भी कर ली. उनकी बातों से ही पता चला कि उन्होंने मेरी आस में किसी से शादी नहीं की. मेरी आंखें भर आईं.

सफ़र ख़त्म होने को था. अफ़सोस कि आज भी मैं उन्हें नज़रें चुराकर ही देख रही थी. मैं उस मोहिनी मूरत को जीभर के देखना चाहती थी. हमारा स्टेशन आ गया. मैं मन में एक टीस लिए उनसे जुदा हो गई, मेरी तो मंज़िल आ गई थी, पर उनके न सफ़र का पता था, न मंज़िल का.

– अनुपलता श्रीवास्तव

पहला अफेयर: डायट चार्ट (Pahla Affair: Diet Chart)

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पहला अफेयर: डायट चार्ट (Pahla Affair: Diet Chart)

बात उन दिनों की है, जब मैं डायटीशियन का कोर्स कर रही थी. कॉलेज की पढ़ाई के बाद हमारी 6 महीने की इंटर्नशिप रहती है, जिसके लिए दिल्ली के मौलाना आज़ाद मेडिकल हॉस्पिटल जाना रहता था. घर से सुबह 9 बजे से हॉस्पिटल के लिए निकलना, फिर शाम 7 बजे तक वापस आना, काफ़ी व्यस्त दिनचर्या रहती थी. पढ़ाई के अलावा कुछ भी सोचने का व़क्त नहीं मिलता था. किसी छुट्टीवाले दिन यह ज़रूर एहसास होता था कि घर में शादी के बारे में सोचा जाने लगा है. हालांकि मुझसे शादी के बारे में जानने का कोई प्रयास नहीं किया गया था. बस, यही कहते थे कि अपनी पढ़ाई मन लगाकर करो, समय आने पर सब काम हो ही जाते हैं.

मिसेज़ इंदू आहूजा, हमारी चीफ डायटीशियन थीं. एक दिन उनसे किसी बात पर विचार-विमर्श कर रही थी कि तभी एक साथ तीन लड़के कमरे में आए. यही सोचकर कि डायट चार्ट बनवाने आए हैं, मैंने उन्हें इंतज़ार करने को कहा. किंतु वे तीनों टेबल पर ही आ गए, यह कहते हुए कि डायट चार्ट बनवाना है और कुछ जानकारी भी लेनी है. वैसे तो इतने लोग आते हैं, मेरा ध्यान किसी पर नहीं जाता, परंतु न जाने क्यूं उनमें से एक लड़के पर मेरी नज़र गई, तो मैं उसे देखती ही रह गई. एक अलग ही आकर्षण था उसमें. मन में अजीब-सी हलचल हुई. शायद यह पहली नज़र के प्यार का हल्का-सा एहसास था.

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वे तीनों अपना काम पूरा होते ही चले गए, जाते-जाते भी मैं उसी लड़के को देख रही थी, उसने भी मुड़कर देखा और मेरी नज़रें उससे मिलीं, अच्छा लगा. ख़ैर, बात आई-गई हो गई और मैं भी अपने काम में व्यस्त हो गई. बीच-बीच में उसका ख़्याल एक मीठे एहसास की तरह तन-मन को भिगो जाता था.

क़रीब एक महीने बाद एक दिन मम्मी-पापा ने अपने पास बुलाया और कहने लगे, “अब पढ़ाई पूरी हो गई, इंटर्नशिप भी ख़त्म होनेवाली है, तो सोचा क्यों न शादी के बारे में तुमसे बात करें.” मेरा मन तैयार नहीं हो रहा था, क्योंकि मैं जॉब करना चाहती थी. मम्मी-पापा भी शायद समझ गए थे, सो उन्होंने कहा, “एक लड़का देखा है. घर-परिवार भी अच्छा है. सारी बातें पक्की हैं, लेकिन तेरा फैसला ही अंतिम होगा. अगर लड़का पसंद न आए, तो जैसा तू चाहेगी, वैसा ही होगा.” मैंने भी हां कर दी, लेकिन इस बीच रह-रहकर मेरी आंखों के सामने उसी हॉस्पिटलवाले लड़के की तस्वीर घूम जाती. मुझे अपने ऊपर हंसी भी आती कि ये तो बचपना है.

ख़ैर, दिल्ली के बिड़ला मंदिर में देखने की बात तय हुई. निश्‍चित समय पर हम लोग वहां पहुंच गए. थोड़ी ही देर में लड़केवाले भी आ गए. उनके बीच अचानक उस परिचित चेहरे पर मेरी नज़र पड़ी, मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. मैंने सबसे नज़रें चुराकर दो-तीन बार आंखें उठाकर उसे देखने की कोशिश की. जैसे ही उसने भी मुझे देखा, तो मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया, “अरे, आप? आप तो हॉस्पिटल में आए थे. यहां कैसे?” मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी, इसी बीच मुझे सम्मिलित हंसी के ठहाके सुनाई दिए. मेरी तंद्रा भंग हुई, तो देखा सबकी नज़रें मेरी ओर ही थीं और अब चौंकने की मेरी बारी थी. मुझे बताया गया कि दरअसल ये अपने दोनों भाइयों के साथ मुझे देखने ही हॉस्पिटल आए थे. मां ने बताया, “तुम्हें फोटो में सबने पसंद कर लिया था, लेकिन सबने सोचा कि एक बार तुम दोनों आमने-सामने एक-दूसरे को देख लो, तो बेहतर होगा.”

मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे पहली नज़र में चाहा, वही मुझे मिल गया. हम दोनों की हां थी, सो शादी भी जल्दी हो गई. आज मैं अपनी गृहस्थी में सुखी-संतुष्ट हूं और बार-बार ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करती हूं कि मेरा पहला प्यार ही मेरे जन्म-जन्मांतर का प्यार बन गया.

– प्रीता जैन

पहला अफेयर: पहला-पहला प्यार है… (Pahla Affair: Pahla Pahla Pyar Hai)

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पहला अफेयर: पहला-पहला प्यार है… (Pahla Affair: Pahla Pahla Pyar Hai)

भारतीय नारी के लिए पहला प्यार ही उसके जीवन का आधार होता है. मम्मी-पापा ने भी बचपन से यही सिखाया था कि भारतीय संस्कृति में लड़कियां पहले शादी करती हैं और बाद में उन्हें प्यार होता है. उस वक़्त तक मैं प्यार के एहसास से भी अनजान थी. मेरा तो शौक़ था पढ़ाई और कविताएं लिखना.

जब मम्मी ने मेरी शादी का फैसला सुनाया, तब मेरी उम्र मात्र 17 वर्ष थी.

“पर अभी तो मुझे पढ़ना है.” मैं चिल्लाई थी.

“अभी कौन-सा शादी कर रहे हैं? तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे.”  मां ने मुझे आश्‍वस्त किया. आख़िर मैं भी जानना चाहती थी कि वो शख़्स कौन है? जब नाम सुना तो पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई. हमारे सामनेवाले मकान में रहनेवाले राज ही मेरे होनेवाले पति थे.
मेरी ख़ामोशी को मेरी हां मान लिया गया था. बात आगे चली तो उनकी तरफ़ से भी हां कर दी गई. मेरी दो शर्तें थीं- एक तो मुझे पढ़ाई जारी रखनी है और दूसरी ये कि कॉलोनी में इस रिश्ते की चर्चा नहीं होनी चाहिए. .

हमारी सगाई कर दी गई, परंतु बाकी लोगों से इस बात को छुपाए रखा गया. एक दिन मम्मी से मिलने उनकी सहकर्मी आईं. उनको विदा करने मैं और मम्मी दरवाज़े तक आए तो सामने राज को खड़ा देखकर मैं छुपकर भागना ही चाहती थी कि मम्मी ने अपना पांव मेरे पांव पर ज़ोर से रख दिया. मैं घबरा-सी गई. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. मम्मी ने पांव तब तक दबाए रखा, जब तक वो सहकर्मी विदा नहीं हो गई. उनके जाने के बाद मम्मी ने डांटा कि इस तरह भागने की क्या ज़रूरत थी. ऐसे तो किसी को न मालूम हो तो भी पता चल जाएगा.

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आख़िर इस रिश्ते का ऐलान तो करना ही था. ऐलान होते ही चारों तरफ़ हंगामा हो गया था. इस तरह आमने-सामने घरों में रिश्ता होने का कॉलोनी में यह एक अनोखा उदाहरण था. लेकिन मैं इन सबसे दूर पढ़ाई में व्यस्त थी. मुश्किल ये थी कि अब उनका सामना करना भी दूभर हो गया था मेरे लिए. जैसे ही राज सामने दिखते, मैं भागकर अपने घर में घुसकर दरवाज़ा बंद कर लेती.
एक दिन मेरे पीठ दिखाते ही वे बोल पड़े, “नाराज़ हो क्या?” मेरे पांव ठिठक गए. दिल ने कहा, पलटकर देख लूं, पर संस्कारों में मिली मर्यादा मुझे राज को खुलेआम देखने से रोक रही थी.

बस, यहीं से कुछ हलचल-सी हुई मन में. मेरा कवि मन जो प्यार के विषय से अछूता था, कुछ चाहने लगा था. मेरी सारी भावनाएं कलमबद्ध होने लगी थीं. मन में राज के लिए प्यार का अंकुर फूट चुका था, लेकिन मैं उनसे मिलने का साहस नहीं कर पाई. हां, अपनी खिड़की से उनकी एक झलक पाने के लिए हमेशा बेताब रही.

एक दिन मैं अपनी पड़ोस की सहेली के घर बैठी थी कि राज वहां जान-बूझकर पहुंच गए. उन्हें देख मैं घबराहट के मारे सहेली के बाथरूम में जाकर घुस गई. बाथरूम में नल से पानी बह रहा था और नल था कि बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था. मेरे सारे कपड़े भीग गए. मैं फिर भी बाहर नहीं आई. मैं ख़ुद ही नहीं समझ पा रही थी, जिनको देखने के लिए मैं घंटों अपनी खिड़की में खड़ी रहती थी, उनके सामने आते ही मेरी ऐसी हालत क्यों हो जाती है?

वो पहली बार था, जब मैंने प्यार के एहसास को महसूस किया था. आख़िर दो वर्ष बाद इस प्यार की परिणति विवाह में हुई. अब तक डायरी में लिखी सारी भावनाएं शादी के बाद जब मैंने राज के सामने रखीं तो वे आश्‍चर्यचकित रह गए. बोले, “कभी चेहरा भी न दिखानेवाली लड़की अपने मन में इतनी भावनाएं रखती है मेरे प्रति.” आज ज़िंदगी में फूल ही फूल खिले हैं. हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे अपने पहले प्यार से बनी राहों पर चल रहे हैं.

– संगीता सेठी

पहला अफेयर: वो एक पल (Pahla Affair: Wo Ek Pal)

Pahla Affair, Wo Ek Pal
Pahla Affair, Wo Ek Pal
पहला अफेयर: वो एक पल (Pahla Affair: Wo Ek Pal)

दिल क्यों बेचैन है, आंख नम है क्यूं… शायद दिल का कोई टांका उधड़ा है…

जाने क्यों ये पंक्तियां मेरे ज़ेहन में सरगोशी कर उठीं. शायद इसका कारण यही रहा होगा कि कोई ज़रूरी काग़ज़ात तलाश करते हुए मेरे हाथों में एक पुरानी पारिवारिक तस्वीर लग गई, जिसमें ‘तुम’ भी हो. वही मनमोहक, चित्ताकर्षक मुस्कान, जो मेरी अंतर्मन की गहराइयों में उतर गई थी. मैं अतीत के गलियारे में उतरता चला जा रहा हूं. पीछे छूट रहा है वर्तमान. मेरी बुआजी के नए घर का शुभ मुहूर्त था कानपुर में. मैं सपरिवार शामिल होने पहुंचा. बुआजी ने मुझे घर की डेकोरेशन का काम सौंपा था, क्योंकि मैं इंटीरियर डेकोरेशन का कोर्स कर रहा था. बस, यही एक काम मेरे दिल को लुभानेवाला था. मैंने अपनी समस्त इंद्रियां केंद्रित कर दी थीं, जान लगा दी थी इस काम को अंजाम देने में.

फंक्शनवाले दिन डेकोरेशन को देखकर सभी के मुंह से निकला ‘वाह’ शब्द मानो मुझे पुरस्कृत कर रहा था, लेकिन उसी गहमा गहमी में एक सुरीला कंठ मुझे झंकृत कर गया… ‘वाओ! क्या बात है?’ जैसे ही मैंने मुड़कर देखा, तो बुआजी की छोटी बेटी यानी मेरी बहन गरिमा के पास एक ख़ूबसूरत परी-सी हल्के सांवले वर्णवाली लड़की खड़ी थी. वह लगातार कुछ कहे जा रही थी, मगर मेरी श्रवणशक्ति होशोहवास खो बैठी. मेरा दिल पहली बार किसी के लिए धड़का था. पहली नज़र में कोई इस क़दर भा जाए, यह पहला अनुभव था मेरा.

मेरी बहन ने डेकोरेशन का क्रेडिट मुझे देते हुए मेरा उससे परिचय करवाया. मैं अपलक उसे निहारता रहा. लेकिन जब गरिमा ने परिचय के दौरान यह कहा कि ‘तुम्हारी’ मंगनी हो चुकी है और एक हफ़्ते बाद ही तुम्हारी शादी है किसी एनआरआई से, तो मुझे झटका-सा लगा. तुम शादी करके इंग्लैंड चली जाओगी.

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यह भाग्य का कैसा क्रूर मज़ाक था कि एक क्षण पहले कुबेर का ख़ज़ाना सौंपकर अगले ही क्षण सारी ख़ुशियां छीन लीं. मेरे चेहरे पर एक के बाद एक कई रंग आकर चले गए. मैंने एक क्षीण मुस्कान के साथ उसे उज्ज्वल भविष्य की
शुभकामनाएं दीं.

मेरे पहले प्यार का ये कैसा अंजाम था? मैं बस ऊपरवाले से बार-बार यही सवाल कर रहा था. उस पर मेरी बदनसीबी का कटाक्ष देखिए, मुझे न स़िर्फ तुम्हारी शादी में शामिल होना पड़ा, बल्कि सारा डेकोरेशन का काम भी करना पड़ा. मेरे लिए यह मंज़र ही कहर बरपानेवाला था.

ख़ैर, मैं मन में एक टीस और ज़िंदगीभर के लिए नासूर लिए वापस अपने शहर आ गया. आज मैं शादीशुदा ज़िंदगी जी रहा हूं, दो प्यारे बच्चे भी हैं, ज़िंदगी से कोई शिकायत भी नहीं, फिर भी दिल का एक कोना सूना-सा लगता है, मानो वो कोना रिक्त रह गया हो.
तुम जहां भी हो, ख़ुश रहो. तुम्हें तो पता भी नहीं होगा कि दुनिया में कोई ऐसा भी है, जो अपनी ज़िंदगी के उस एक पल की क़ीमत आज तक चुका रहा है, जिस पल उसने तुम्हें देखा था. लाख चाहकर भी मैं तुम्हें भूल नहीं पाया. मुहब्बत भी कभी इम्तिहान लेती है. तुम्हें तो शायद मैं याद भी नहीं और एक मैं हूं, जो तुम्हारी यादों को आज तक सीने में संजोए घूम रहा हूं.

मैं अपनी पत्नी से बेवफ़ाई भी नहीं कर रहा, क्योंकि तुम्हारी तो मैं इबादत करता हूं और मरते दम तक करता रहूंगा. तुम ख़ुश रहो, सलामत रहो, यही दुआ है. मुझे तुम्हारी कोई ख़बर तक नहीं, लेकिन यही यक़ीन है कि मेरी जो सांसें चल रही हैं, वो इस बात का सबूत हैं कि तुम सलामत हो!

– कुलविन्दर वालिया