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स्वतंत्रता दिवस 2018: पाएं आज़ादी इन आदतों से (Independence Day 2018: Freedom From Unhealthy Habits)

स्वतंत्रता दिवस के ख़ास मौ़के पर देश की आज़ादी के साथ-साथ उन तमाम मुद्दों पर भी बात करना ज़रूरी है, जहां हमें आज़ादी की ज़रूरत है. यदि हम महिलाओं की बात करें, तो महिलाओं को अपनी कुछ आदतों से आज़ादी पाना बहुत ज़रूरी है. उनकी ये आदतें उन्हें आगे बढ़ने से रोकती हैं और उनके व्यक्तित्व के विकास में भी बाधक बनती हैं. हमारे देश की अधिकतर महिलाएं अपनी कुछ आदतों के कारण अपना बहुत नुक़सान करती हैं. ये आदतें बदलकर महिलाएं अपने आप में और अपने परिवार में बहुत बदलाव ला सकती हैं. कौन-कौन-सी हैं ये आदतें? आइए, जानते हैं.

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अपनी सेहत को नज़रअंदाज़ करना
हाल ही में बॉलीवुड एक्ट्रेस सोनाली बेंद्रे को हुए कैंसर की ख़बर ने सभी को चौंका दिया, लेकिन इसकी एक बड़ी वजह सोनाली बेंद्रे की ख़ुद के प्रति लापरवाही भी थी. सोनाली बेंद्रे को कुछ समय से शरीर में दर्द की शिकायत हो रही थी. लेकिन उन्होंने भी आम महिलाओं की तरह ख़ुद के प्रति लापरवाही के चलते इसे नज़रअंदाज़ कर दिया. जब दर्द ज़्यादा बढ़ने लगा और डॉक्टर को दिखाया, तब सोनाली बेंद्रे का कैंसर एडवांस स्टेज तक पहुंच गया था. जब सोनाली बेंद्रे जैसी एक्ट्रेस अपनी सेहत के प्रति इतनी लापरवाह हो सकती हैं, तो आम महिलाओं की स्थिति का बख़ूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
क्या करें?
जिस तरह आप अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य की सेहत का ध्यान रखती हैं, उनकी हर छोटी-बड़ी तकलीफ़ में उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास ले जाती हैं, उसी तरह अपनी सेहत का भी ख़ास ध्यान रखें. शरीर में कोई भी असामान्यता या दर्द होने पर तुरंत घरवालों को इसके बारे में बताएं और उनके साथ डॉक्टर के पास जाएं.

अपने शौक़ के लिए समय न निकालना
महिलाएं अपने शौक़ और ख़ुशियों को हमेशा आख़िरी पायदान पर रखती हैं. घर-परिवार की तमाम ज़िम्मेदारियों के बाद यदि टाइम मिला, तो ही वो अपने शौक़ के बारे में सोचती हैं और ऐसा बहुत कम ही हो पाता है. महिलाएं पूरी ज़िंदगी अपने परिवार के लिए खटती रहती हैं, लेकिन उनके शौक़ अक्सर अधूरे रह जाते हैं. इसका असर उनकी पर्सनैलिटी, उनके आत्मविश्‍वास और उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. जब महिलाएं अपने शौक़ पूरे नहीं कर पातीं, तो उसकी खीझ उनके व्यवहार में झलकने लगती है. ऐसी स्थिति में महिलाएं या तो बहुत चिड़चिड़ी या मुखर हो जाती हैं या फिर अपनी भावनाओं को दबाने लगती हैं. ये दोनों ही स्थितियां उनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं.
क्या करें?
घर-परिवार, बच्चों की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए अपने लिए भी अलग से व़क्त निकालिए. उस समय आप अपने शौक पूरे कीजिए, जैसे- संगीत, पेंटिंग आदि. ऐसा करने से आप अच्छा महसूस करेंगी और ख़ुश रहने लगेंगी.

घर के कामों के लिए परिवार की मदद न लेना
हमारे देश में घर के काम स़िर्फ महिलाओं के हिस्से ही आते हैं. भले ही वो वर्किंग हों, पति के बराबर कमाती हो, फिर भी घर के काम पुरुष नहीं करते. कई घरों में पुरुष घर के कामों में महिलाओं का हाथ बंटाना भी चाहते हैं, लेकिन महिलाएं ख़ुद उन्हें मना कर देती हैं. उन्हें लगता है कि उनके पति यदि घर का काम करेंगे, तो लोग क्या कहेंगे. ऐसी स्थिति में घर-बाहर दोनों जगहों की ज़िम्मेदारी निभाते हुए महिलाएं इतनी थक जाती हैं कि इससे उनका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है. उनका व्यवहार रूखा होने लगता है, घर का माहौल बिगड़ जाता है, वो बात-बात पर चिढ़ने लगती हैं.
क्या करें?
आप घर के सभी काम अकेले नहीं कर सकतीं, इसलिए घर के सभी सदस्यों से थोड़ी-थोड़ी मदद लीजिए और अपनी ज़िम्मेदारी कम कीजिए. इस तरह घर का सारा काम भी हो जाएगा और आपके काम का बोझ भी हल्का हो जाएगा.

Healthy Habits

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छोटी-छोटी बात के लिए पति पर निर्भर रहना
भारतीय महिलाएं अपने पति पर इस कदर निर्भर रहती हैं कि बैंक से लेकर, बच्चों के स्कूल, घर के सामान तक ख़रीदने जैसे कामों के लिए पति का ही इंतज़ार करती हैं. पढ़ी-लिखी वर्किंग महिलाएं ऑफिस में तो सारे काम कर लेती हैं, लेकिन घर के लिए कोई भी ़फैसला लेते समय उन्हें पति की सहायता चाहिए होती है. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हमारे देश में हमेशा से सारे अधिकार पुरुषों को ही दिए गए हैं, ऐसे में महिलाएं कहीं न कहीं ये मान लेती हैं कि किचन के बाहर के काम उनके बस की बात नहीं है. ख़ासकर पेपरवर्क के मामले में महिलाएं हमेशा पति पर ही निर्भर रहती हैं.
क्या करें?
आपका छोटे-छोटे कामों के लिए पति पर निर्भर रहना ठीक नहीं है, इससे आपके पति को चिढ़ हो सकती है. जो काम आप पति के बिना कर सकती हैं, उन्हें करने की शुरुआत करें. इससे आपका कॉन्फिडेंस बढ़ेगा और आपके पति को राहत महसूस होगी.

अपने खानपान पर ध्यान न देना
हमारे देश की अधिकतर महिलाएं एनीमिया की शिकार पाई जाती हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह है महिलाओं का अपने खानपान पर ध्यान न देना. गरीब घर की महिलाएं ही नहीं, अमीर परिवार की महिलाएं भी एनीमिया से ग्रस्त पाई जाती हैं. हमारे देश में महिलाओं को ये बचपन से सिखाया जाता है कि उन्हें पूरे परिवार को खिलाने के बाद ही भोजन करना चाहिए, तभी वो कुशल गृहिणी कहलाई जाएंगी. माता-पिता भी बेटे के खानपान पर बेटी से ज़्यादा ध्यान देते हैं. अपनी मां को ऐसा करते देख बेटी भी अपनी सेहत के प्रति लापरवाह हो जाती है. अगर परिवार को खाना खिलाने के बाद भोजन नहीं बचा, तो महिलाएं अपने लिए और बनाने की बजाय भूखी ही रह जाती हैं. पूरे परिवार को महिलाएं दूध, फल, मेवे आदि नियम से खिलाती हैं, लेकिन अपने लिए ऐसा नियम नहीं बनाती हैं.
क्या करें?
जब तक पति ऑफिस से घर नहीं आ जाते, तब तक भोजन न करना समझदारी नहीं है. इससे एक तो आपको एसिडिटी की शिकायत हो जाएगी और आपकी भूख भी मर जाएगी. संपन्न होते हुए भी कुपोषण का शिकार होना स़िर्फ लापरवाही है. आप हैं तो सबकुछ है, आपके बीमार होने से पूरा परिवार बिखर जाता है, इसलिए आपका स्वस्थ रहना बहुत ज़रूरी है. जिस तरह आप अपने परिवार का ध्यान रखती हैं, उसी तरह अपनी सेहत का भी ध्यान रखें.

मन की बात न कहना
महिलाएं घर में सभी को ख़ुश रखने के चक्कर में अक्सर अपनी ख़ुशियों को अनदेखा कर देती हैं. यदि उन्हें किसी की कोई बात बुरी लगती है, तो वो उसे मन में ही रखती हैं. उन्हें लगता है कि पलटकर जवाब देने से घर का माहौल बिगड़ जाएगा, सबकी ख़ुशी के लिए चुप रहना ही सही है. हर बात मन में रखने से कई महिलाओं को डिप्रेशन की शिकायत होने लगती है, उनका आत्मविश्‍वास कम होने लगता है, वो अपने में ही सिमट जाती हैं.
क्या करें?
मन की बात मन में रखने से मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और रिश्तों में भी दूरियां आने लगती हैं. किसी की कोई बात बुरी लगने पर आप उसे जवाब भले ही न दें, लेकिन आपके मन में गांठ रह ही जाती है और आप फिर उस इंसान से पहले जैसी आत्मीयता से व्यवहार नहीं कर पातीं. अत: परिवार में किसी की कोई बात बुरी लगे, तो उसे मन में न रखें, बल्कि उस व्यक्ति से उस बारे में बात करें. ऐसा करने से आपका मन हल्का हो जाएगा और उस व्यक्ति को भी पता चल जाएगा कि उसकी कौन-सी बात आपको बुरी लग सकती है. वो फिर आपसे कभी ऐसी बात नहीं करेगा.

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शर्म-हिचक हो सकती है जानलेवा
महिलाएं अक्सर वेजाइनल प्रॉब्लम्स, ब्रेस्ट प्रॉब्लम्स आदि के बारे में बात करने से हिचकिचाती हैं, जिसके चलते समस्या गंभीर हो जाती है. महिलाओं की शर्म और हिचक उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती है इसलिए सेहत के मामले में कभी भी शर्म ना करें और शरीर के किसी भी हिस्से में तकलीफ़ होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

– कमला बडोनी

क्या होता है जब आप बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा आज़ादी देते हैं, देखें वीडियो:

Shaheed Diwas: शहीदों की शहादत को नमन (Shaeed Diwas Special)

Shaheed Diwas, शहीदों की शहादत को नमन, Shaeed Diwas Special

Shaheed Diwas, शहीदों की शहादत को नमन, Shaeed Diwas Special

23 मार्च 1931 का वो दिन आज एक बार फिर से ताज़ा हो गया. यही वो दिन था जब हंसते-हंसते देश के हीरो ने धरती मां के लिए ख़ुद को कुर्बान कर दिया था. उनकी शहादत का वो दिन हर हिंदुस्तानी को गर्व से भर देता है. मन में एक अजीब सा साहस भर जाता है. उन हीरोज़ के लिए मस्तक अपने आप झुक जाता है. भारतीय इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में 23 मार्च लिखा गया है. इस तारीख़ से हिंदुस्तान को अपना बीता हुआ कल और आज की झलक मिलती है.

  • क्रांतिकारी भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को आज ही के दिन 1931 में फांसी दे दी गई थी. भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था.
  • भगत सिंह, शिवराम हरिनारायण राजगुरु और सुखदेव थापर में वतन परस्ती कूट-कूट कर भरी थी.
  • अंग्रेज़ों की नाक में दम करनेवाले इन हीरोज़ ने उऩकी चलती संसद में बम फेंककर हिंदुस्तान की आज़ादी की नींव को पुख़्ता किया था. इसके जुर्म में अंग्रेज़ों ने 3 हीरोज़ को सूली पर चढ़ाने का फैसला किया.
  • अंग्रेज़ों को लगा था कि ये छोटी उम्र के लड़के फांसी से डर जाएंगे और उनके क़दमों में सिर झुका देंगे, लेकिन वतन पर कुर्बान होनेवाले इन हीरोज़ ने वो कर दिखाया, जिसे करने के लिए बड़े-बड़े लोग कांप जाते हैं.
  • फांसी के तख्ते पर डरते हुए नहीं, बल्कि गाते हुए पहुंचे और फांसी के फंदे को चूमकर भारत माता की जय कहकर ख़ुद को माता की स्वतंत्रता के लिए कुर्बान कर दिया.
  • फांसी के फंदे को चूमकर उनके जीवन का तो अंत हो गया, लेकिन देश को एक नई सुबह मिल गई. एक ऐसी सुबह, जिसकी स्वतंत्र आबोहवा में आज हर हिंदुस्तानी खुलकर सांस ले रहा है.
  • शहीद दिवस के मौ़के पर शहीदों को मेरी सहेली (Meri Saheli) की ओर से शत-शत नमन!

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शहीद भगत सिंह के जन्मदिन पर उनके टॉप 10 अनमोल वचन (Top 10 quotes by Shaheed Bhagat Singh on his Birth Anniversary)

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का नाम सुनकर ही हर हिंदुस्तानी का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है और रग-रग में देशभक्ति की लहर बहने लगती है. महज़ 23 साल की उम्र में देश पर शहीद होनेवाले भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को बंगा गांव, लायलपुर, पंजाब के सिख परिवार में हुआ था. देश की आज़ादी के लिए अपना संपूर्ण जीवन न्योक्षावर कर देनेवाले भगत सिंह आज भी देश के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं. आज भी उनके कहे अनमोल वचन लोगों कोे प्रेरित करते हैं. आइए पढ़ें, उनके कहे 10 अनमोल वचन… bhagat singh

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1. ज़िंदगी हमेशा अपने दम पर ही जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो बस जनाज़े ही उठाए जाते हैं.

2. बुराई इसलिए नहीं बढ़ती कि बुरे लोग बढ़ गए हैं, बल्कि इसलिए बढ़ती है, क्योंकि बुराई सहन करनेवाले लोग बढ़ गए हैं.

3. जो भी व्यक्ति विकास के लिए खड़ा होगा, उसेे हर एक रूढ़िवादी चीज़ को चुनौती देनी होगी तथा उसमें अविश्‍वास करना होगा.

4. मेरा एक ही धर्म है, देश की सेवा करना.

5. कवि, एक पागल प्रेमी और देशभक्त एक ही चीज़ से बने हैं.

6. हमारे लोगों को मारकर वो कभी हमारे विचारों को नहीं मार सकते.

7. सामान्यत: लोग परिस्थिति के आदी हो जाते हैं और उनमें बदलाव करने की सोच मात्र से डर जाते हैं. अत: हमें इस भावना को क्रांति की भावना से बदलने की ज़रूरत है.

8. मैं एक इंसान हूं और जो भी चीज़ें इंसानियत को प्रभावित करती हैं, मुझे उनसे फ़र्क पड़ता है.

9. क्रांति मानव जाति का एक अपरिहार्य अधिकार है. स्वतंत्रता सभी का कभी न ख़त्म होनेवाला जन्म सिद्ध अधिकार है. श्रम समाज का वास्तविक निर्वाहक है.

10. कोई व्यक्ति तब ही कुछ कर सकता है, जब वह अपने कार्य के परिणाम को लेकर आश्‍वस्त होता है, जैसे हम असेंबली में बम फेंकने पर थे.

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– सत्येंद्र सिंह

सेलिब्रिटीज़ की नज़र में आज़ादी के मायने… (What Freedom Means To Our Celebrities?)

सेलिब्रिटीज़ की नज़र में आज़ादी के मायने

सेलिब्रिटीज़ की नज़र में आज़ादी के मायने

आज़ादी भला किसे नहीं पसंद, लेकिन इसके मायने सभी के लिए अलग-अलग रहे हैं. देश की आज़ादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अपनी मर्ज़ी से जीने का फ्रीडम… इस मामले में फिल्म स्टार्स भी समय-समय पर अपनी राय रखते रहे हैं. जानें आज़ादी के बारे में क्या कहते हैं सितारे.

अमिताभ बच्चन
आज हम सभी एक निःशुल्क पर्यावरण की हवा में सांसें ले रहे हैं. यह स्वतंत्रता के कारण ही संभव है. चूंकि हम आज़ाद हैं, इसलिए सब कुछ करने का आनंद ले सकते हैं.

शाहरुख ख़ान
सभी देशवासियों के लिए 15 अगस्त बेहद ख़ास होता है. मुझे आज भी याद है, इस दिन मैं पिताजी की गोद में बैठकर दिल्ली के कार्यक्रम व परेड का आनंद लिया करता था. मेरे पिताजी स्वतंत्रता सेनानी थे. मेरी मां ने मुझे सदा ही देशप्रेम की सीख दी. मैं अपने तीनों बच्चों को भी वही सिखाता हूं. हम देशभक्त हैं और राष्ट्रप्रेम मेरे रग-रग में बसा है. देशप्रेम के मायने क़ानून का सम्मान करना और एक ज़िम्मेदार नागरिक बनना भी है.

अनिल कपूर
मैं सारी दुनिया घूमा, पर मेरे देश जैसा दूसरा कोई देश नहीं. मुझे अपने देश पर गर्व है. मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं, जो मैं भारत में पैदा हुआ हूं. जहां देशभक्ति, भावनाओं और आपसी भाईचारे का ख़ूबसूरत संगम देखने को मिलता है.

कैटरीना कैफ़
भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. हर व्यक्ति को फ्रीडम एंजॉय करना चाहिए. लेकिन साथ ही इस बात का भी ख़्याल रखना चाहिए कि जिनके संघर्ष, कोशिशों से यह आज़ादी मिली है, उनका हम सम्मान करें. मुझे भारत बहुत प्यारा लगता है, क्योंकि यहां भाषा, रहन-सहन में बहुत-सी विविधता होने के बावजूद सभी एक हैं. आई लव इंडिया!

जॉन अब्राह्म
मुझे अपने देश से बेहद प्यार है और मैं फख़्र के साथ कह सकता हूं कि मैं देशभक्त हूं. मैंने अपनी आलमारी में तिरंगा लगा रखा है, जिसे रोज़ देखता हूं और गर्व महसूस करता हूं. अक्सर हम कहते हैं कि देश ने हमारे लिए क्या किया… यह होना चाहिए… ऐसा करना चाहिए… आदि. जबकि मैं अब्राह्म लिंकन के इस विचार का समर्थक हूं कि आप यह न देखें कि देश ने आपके लिए क्या किया, बल्कि ये सोचें कि आप देश के लिए क्या कर सकते हैं. हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हमें भी देश के लिए बहुत कुछ करने की ज़रूरत है.

दीया मिर्ज़ा
हमें स्वतंत्रता के साथ-साथ अपनी ज़िम्मेदारियों को भी समझना होगा. यदि आप अपने मूल अधिकारों और कर्त्तव्य को अच्छी तरह से जानते-समझते हैं, देश के ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में उन सब का पालन करते हैं, तभी सही मायने में आप आज़ादी का लुत्फ़ उठा सकते हैं.

मनोज बाजपेयी
मेरे लिए आज़ादी के यही मायने हैं कि मैं कहीं भी आ-जा सकता हूं. स्वतंत्र रूप से अपने विचार रख सकता हूं. अपनी पसंद का काम कर सकता हूं. लेकिन आज़ादी के साथ ही विविध लोगों व परिवेश के साथ तालमेल बैठाना, अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी को समझना भी ज़रूरी है.

नाना पाटेकर
हमने तो कुछ भी नहीं किया. जो भी किया, हमारे पूर्वजों ने किया और हमें आज़ादी दिलाई. अब यह हमारा फ़र्ज़ है कि हम उसे सहेजें और आगे बढ़ें. यह हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने आसपास क्या हो रहा है, उसे देखें, समझें और अपनी राय रखें और कुछ काम करें. फिर चाहे वो आतंकवाद हो या किसानों द्वारा आत्महत्या करना. इन मुद्दों के बारे में हम कितना जानते हैं और क्या कर सकते हैं, वो सब हमें सोचना और करना चाहिए.

 

रिचा चड्ढा
भारतीय लड़कियों के लिए आज़ादी से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही हो सकती है कि उन्हें जन्म लेने की आज़ादी मिले यानी उसे दुनिया में आने की पूरी आज़ादी हो. लड़का-लड़की का भेदभाव न हो. इसके बाद उसके लिए उचित शिक्षा, करियर, सही जीवनसाथी को चुनने का अधिकार आदि की स्वतंत्रता सिलसिलेवार आती है. यूं तो हम विकास की दिशा में ख़ूब आगे बढ़ रहे हैं, पर महिलाओं के मौलिक अधिकार की आज़ादी के साथ भी पूरा-पूरा न्याय होना चाहिए.

सैफ अली ख़ान
हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि दुनिया में हर देश आज़ाद नहीं है, इसलिए हमें अपनी स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए. मैं हमेशा गर्व महसूस करता हूं कि मैं इतने बड़े लोकतांत्रिक देश का नागरिक हूं. हमें आज़ादी के साथ-साथ एक-दूसरे के धर्म का भी सम्मान करना चाहिए. आज हमें ख़ुद को धर्म, राज्य से ऊपर उठकर एक भारतीय के रूप में गर्वित होने व देखने की ज़रूरत भी है.

कमल हासन
कई बार लोकतंत्र को केवल बोलने की आज़ादी के मंच के तौर पर पेश किया जाता है. यह चलता रहता है, लेकिन इसके संरक्षण के लिए सतत निगरानी भी ज़रूरी है. हम बोलने की आज़ादी को हल्के से नहीं ले सकते. भारत ही नहीं, पूरी दुनिया बदलाव के दौर से गुज़र रही है. मुझे अपने देश पर फख़्र है. मैं चाहता हूं कि भारत दुनिया के सामने एक मिसाल बनकर उभरे.

सचिन तेंदुलकर
मुझे अपने देश पर नाज़ है. आज़ाद जीवन जीना हर दिल को सुकून देता है. मैं अपने बच्चों को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ जीवन जीने की स्वतंत्रता देना चाहता हूं, मेरे पिता ने भी मुझे मेरा पसंदीदा खेल खेलने की आज़ादी दी थी, जो बिना किसी उम्मीद के थी. मैं अपने बच्चों को ज़िंदगी में जो भी वो बनना चाहते हैं, उसकी पूरी आज़ादी देना चाहता हूं. मेरा काम उन्हें रास्ता दिखाना, साथ और प्रोत्साहन देना रहेगा.

 

देशभक्ति की बेहतरीन फिल्में

शहीद (1965): देशभक्ति व स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित मनोज कुमार अभिनीत इस फिल्म की कहानी शहीद भगत सिंह के साथी बटुकेश्‍वर दत्त ने लिखी थी. इसके गीत शहीद राम प्रसाद बिस्मिल के थे.
आनंदमठ: साल 1952 की यह फिल्म बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास पर आधारित थी. इसमें 18वीं शताब्दी में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ संन्यासी क्रांतिकारियों द्वारा लड़ी गई लड़ाई दिखाई गई है. इसका वंदे मातरम्… गाना आज भी सुपरहिट है.
बॉर्डर: भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए युद्ध पर आधारित यह फिल्म अपने दमदार संवाद, मधुर गीत-संगीत के कारण ज़बर्दस्त हिट रही थी.
गांधी: इसमें बेन किंग्सले अभिनीत गांधी की भूमिका को हर किसी ने सराहा था. यह साल 1982 की यादगार फिल्मों में से एक थी. मोहनदास करमचंद गांधी की जीवन की बारीक़ियों को निर्देशक रिचर्ड एटनबरो ने बख़ूबी उकेरा था.
हक़ीक़त: सन् 1964 में लद्दाख में भारत-चीन युद्ध के समय सैनिकों के संघर्ष का जीवंत चित्रण इस फिल्म में किया गया था. इसके गीत सुनकर आज भी देशभक्ति का जज़्बा जाग जाता है.
इसके अलावा उपकार, द लीजेंड ऑफ भगत सिंह, लक्ष्य, मंगल पांडे- द राइज़िंग, चिट्टागोंग भी उल्लेखनीय फिल्मों में से थीं.

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देशप्रेम से जुड़े लाजवाब संवाद

* हमारा हिंदुस्तान ज़िंदाबाद था, ज़िंदाबाद है और ज़िंदाबाद रहेगा… (गदर- एक प्रेम कथा)

* आप नमक का हक़ अदा कीजिए… मैं मिट्टी का हक़ अदा करता हूं… (द लीजेंड ऑफ भगत सिंह)

* मेरे देश के लिए मेरा जज़्बा मेरी वर्दी में नहीं… मेरे रगों में दौड़ रहा है… (पुकार)

* रिलिजनवाले कॉलम में इंडियन लिखता हूं… (रुस्तम)

* अब भी जिसका ख़ून न खौला, वो ख़ून नहीं पानी है.. जो देश के काम ना आए, वो बेकार जवानी है… (रंग दे बसंती)

* अपने यहां की मिट्टी की ख़ुशबू है ना… वो तो अजनबी लोगों की सांसों में भी संस्कार भर देती है… (पूरब और पश्‍चिम)

* मुझे स्टेट्स के नाम न सुनाई देते हैं, न दिखाई देते हैं.. स़िर्फ एक मुल्क का नाम सुनाई देता है… इंडिया. (चक दे इंडिया)

– ऊषा गुप्ता
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टीनएज बेटी ही नहीं, बेटे पर भी रखें नज़र, शेयर करें ये ज़रूरी बातें (Raise Your Son As You Raise Your Daughter- Share These Important Points)

 

 

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बदलाव की ज़रूरत तो है, लेकिन हर बार बदलाव की सीख लड़कियों को ही नहीं देनी चाहिए. हर बात उन्हीं पर लागू करवाना, उन्हें ही समाज में फैल रही बुराई का ज़िम्मेदार मानना ग़लत है. बदलाव लड़कियों के कपड़े में नहीं, बल्कि समाज की उस सोच में करना चाहिए, जो स़िर्फ ये सोचते हैं कि अगर परिवर्तन की गुंजाइश कहीं है, तो वो स़िर्फ लड़कियों में ही है. इस सोच को बदलिए और हर प्रतिबंध और परिवर्तन अपनी टीनएज लड़की को समझाने के साथ ही टीनएज लड़कों को भी समझाएं.

अक्सर आप ये भूल कर बैठती हैं. जैसे-जैसे बेटी बड़ी होती है, आप उसके सामने क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए की लिस्ट हर दिन पकड़ाती रहती हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर अपने बेटे पर आपका ध्यान ही नहीं जाता. क्या कभी आपने सोचा कि लड़के और लड़कियों की उम्र समान है, तो ग़लतियां दोनों से हो सकती हैं. ऐसे में स़िर्फ लड़कियों को समझाने की बजाय अपने बेटे को भी समझाएं कुछ ज़रूरी बातें.

लड़कियों से व्यवहार करना

आमतौर पर परिवार में शिष्टाचार की सारी शिक्षा लड़कियों को ही दी जाती है, लेकिन अब ज़माना आ गया है कि आप अपने लड़कों को भी सारे पाठ सिखाएं. सबसे पहले उन्हें ये सिखाएं कि कैसे लड़कियों से व्यवहार करना चाहिए. किस तरह से उनसे बात करनी चाहिए और कैसे उनके साथ समय बिताना चाहिए. इन सारी बातों को बड़ी ही बारीक़ी से अपने लाड़ले को सिखाएं.

ग़लती का एहसास कराना

घर-घर की कहानी है ये. लड़कियों से कोई ग़लती होने से पहले ही उन्हें ग़लती न करने की सीख दी जाती है, लेकिन लड़कों को कभी एहसास भी नहीं कराया जाता कि उनसे भी ग़लती हो सकती है. शायद इसीलिए लड़कियां हर काम करने से पहले कई बार सोचती हैं और लड़कों के दिमाग़ में ये बात आती ही नहीं कि उनसे भी कोई ग़लती हो सकती है.

आज़ादी का ग़लत फ़ायदा

भारतीय परिवेश में आज भी लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को ज़्यादा आज़ादी दी जाती है. कॉलेज में दोस्त बनाने की आज़ादी, दोस्तों के साथ ज़्यादा देर तक घूमने की आज़ादी, किसी भी लड़की पर कमेंट करने की आज़ादी, अपने मन मुताबिक़ हेयरस्टाइल रखने की आज़ादी, स्टाइलिश कपड़े पहनने की आज़ादी आदि. लेकिन जैसे ही बात लड़कियों पर आती है, पैरेंट्स टोका-टाकी करने लगते हैं. घर में आपका दोहरा व्यवहार देखने पर ही लड़के बाहर लड़कियों से अच्छी तरह से पेश नहीं आते. अब से आप उन्हें भी इस बात का एहसास कराएं कि आज़ादी उन्हें भी उतनी ही मिलेगी, जिससे किसी का नुक़सान न हो.

लड़कियों से समानता

बचपन से ही लड़के जब ग्रुप में खेलते हैं, तो किसी लड़की के आने पर वो उसके साथ न खेलने की बात कहते हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि लड़कियां उनके साथ खेल नहीं सकतीं. बचपन में लड़के की इस बात पर हंसने की बजाय उसे उसी समय टोकें और कहें कि वो भी उनके समान है. यही बात जब आपका बेटा टीनएज में हो, तो उसे समझाएं. स्कूल के नोट्स शेयर करने से लेकर सारी बातों में वो उसे अपने समान ही समझे.

लड़कियों पर कमेंट करना

ये उम्र ऐसी होती है कि जब लड़कों के मन में कई तरह की भावनाएं उमड़ने-घुमड़ने लगती हैं. अपनी उम्र से थोड़े बड़े लड़कों में उनका उठना-बैठना होने लगता है. बड़े लड़कों की संगत से वो भी लड़कियों को देखकर कई तरह के कमेंट करने लगते हैं. लड़कियों की ड्रेस, उनकी बॉडी पर कमेंट करना लड़कों को आम बात लगती है. अपने बेटे को समझाएं कि ये ग़लत है.

अपने मज़े की वस्तु न समझें

लड़कों को ये बात समझाना बहुत ज़रूरी है कि लड़कियां उनके लिए किसी वस्तु की तरह नहीं हैं. वो भी उन्हीं की तरह हैं. अपने लाड़लों को इस उम्र में ये ज़रूर सिखाएं. उन्हें ऐसा लगता है कि वो आसानी से किसी भी लड़की को अपनी गर्लफ्रेंड बना सकते हैं, वो ना नहीं कह सकती. लड़के उसके साथ घूमने जा सकते हैं. ऐसे में उन्हें ये समझाना ज़रूरी है कि वो किसी भी लड़की को अपने कंफर्ट के अनुसार यूज़ नहीं कर सकते.

लड़कियों से फ़िज़िकल न होना

टीनएज लड़कों को लगता है कि वो बहुत मज़बूत हैं. वो लड़कियों को अपने से कमज़ोर समझते हैं और कई बार किसी बात पर बहस होने पर वो हाथ भी चला देते हैं. ऐसा नहीं है कि वो ये घर से बाहर करते हैं. ज़रा ग़ौर कीजिए, जब घर में बहन के साथ झगड़ा होता है, तब भी लड़के हाथा-पाई पर उतर आते हैं. बहन के साथ झगड़ा होने पर आप स़िर्फ बेटी को बोलने की बजाय बेटे को भी डांटें और कहें कि ऐसा करना ग़लत है. घर से ही ऐसी रोक लगने पर वो बाहर भी किसी लड़की से झगड़ा करने पर हाथ नहीं उठाएंगे.

कमज़ोर न समझें

लड़कों को लगता है कि दुनिया का कोई भी काम वो कर सकते हैं, लेकिन लड़कियां नहीं. इतना ही नहीं, टीनएज लड़के लड़कियों को ये कहकर भी चिढ़ाते हैं कि वो कमज़ोर हैं और कोई भी काम वो लड़कों के बिना नहीं कर सकतीं. अपने होनहार को इस बात से अवगत कराएं कि लड़कियां हर काम कर सकती हैं. बस, वो लड़कों को रिसपेक्ट देने के लिए उनसे मदद लेती हैं.

सिखाएं ये बातें भी

* टीनएज में लड़कों को सेक्स से जुड़ी बातें भी समझाएं.
* उनके शरीर में होनेवाले बदलाव से उन्हें अवगत कराएं.
* शारीरिक बदलाव के साथ उन्हें किस तरह से कोपअप करना चाहिए, ये
भी बताएं.
* लड़के होने का मतलब उन्हें समझाएं. उनके दिमाग़ में भरें कि लड़के होने से वो ज़्यादा आज़ाद नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार हैं.
* अगर उनके साथ कोई लड़की है और उसे मदद की ज़रूरत हो, तो उसे पूरा सहयोग करें.
* घर में अपने से बड़ों की बातों का आदर करें और उसका अनुकरण करें.
* उन्हें समझाएं कि अभी उनकी उम्र प्यार करने और ढेर सारी गर्लफ्रेंड बनाने की नहीं है.
* उन्हें इस बात से भी अवगत कराएं कि अगर उन्हें कोई ग़लत तरी़के से अप्रोच करता है, तो वो उससे दूरी बनाएं.
* स्कूल में भी बच्चे गुंडा गैंग बनाते हैं. अपने लाडले से कहें कि इस तरह के ग्रुप में शामिल होने से उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो सकती है.
* इस उम्र में उन्हें पढ़ाई का महत्व समझाएं.

 

घर के पुरुषों को निभानी चाहिए ये ज़िम्मेदारी

हेड ऑफ द फैमिली होने के नाते आपकी ये ज़िम्मेदारी बनती है कि आप अपने बेटे को सही तरह से ये बात बताएं कि उसे महिलाओं की इज़्ज़त कैसे करनी चाहिए. ख़ुद आप भी अपनी पत्नी और मां को सम्मान दें, तभी आपका बेटा भी वैसा ही करेगा. हो सके तो बेटे को शारीरिक बदलाव के बारे में आप ख़ुद ही बताएं.

महिलाओं का सम्मान करना

आजकल के लड़कों को सबसे ज़रूरी है ये सिखाना कि कैसे वो किसी महिला का सम्मान करें. ऐसा उन्हें घर से ही करना सिखाएं. घर में पुरुष सदस्य को लड़के सम्मान तो देते हैं, लेकिन जब बात महिलाओं की आती है, तो वो उन्हें सम्मान देना तो दूर, उनसे डरते भी नहीं हैं. पापा की बात वो झट से मानकर काम को पूरा कर लेते हैं, लेकिन आपके किसी काम को कई बार कहने के बावजूद नहीं करते. आप इसे अगर लाड समझती हैं, तो ग़लत है. इससे बच्चा अपनी लाइफ में आनेवाली हर महिला के साथ वैसा ही व्यवहार करेगा. उसे लगेगा कि महिलाओं को सम्मान देना उचित नहीं है.

– श्‍वेता सिंह
अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide 

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5 अधिकार, जो देंगे आपको आर्थिक आज़ादी (5 Financial rights you should know )

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फाइनेंशियल फ्रीडम बहुत ही ज़रूरी है, ख़ासतौर पर महिलाओं के लिए. आपका आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना आपकी बहुत-सी परेशानियों को मिनटों में हल कर देता है. आपने हर तरह के अधिकार के बारे में सुना होगा, लेकिन ये आर्थिक अधिकार किसे कहते हैं. आख़िर ये अधिकार पाने से कैसे आप आर्थिक रूप से आज़ाद होते हैं? आइए, जानते हैं.

अगर आप हैं एजेंट
अगर आप किसी इंश्योरेंस कंपनी में काम करते हैं, तो आर्थिक अधिकार में ये भी आता है. उसके कमिशन पर आपका अधिकार है, अगर आपको वो नहीं मिलता है, तो आप शिकायत दर्ज करा सकते हैं.

सर्विस चार्ज ना देने का अधिकार
किसी भी रेस्टोरेंट में खाने पर अगर उसकी सर्विस आपको अच्छी नहीं लगी, तो आप उसका सर्विस चार्ज देने से इंकार कर सकते हैं. हाल ही में सरकार ने ये पॉलिसी लॉन्च की. इससे आम लोगों को काफ़ी फ़ायदा पहुंचा है. इतना ही नहीं, अगर आपसे ज़बर्दस्ती होटल का मालिक सर्विस पे करने को कहता है, तो आप उसकी शिकायत कर सकते हैं.

लॉकर से जुड़े अधिकार
अगर आप ज्वेलरी को बैंक में जमा करवाना चाह रहे हैं और बैंक में आपका अकाउंट नहीं, तो ज़रूरी नहीं कि आप वहां अकाउंट खुलवाएं. लॉकर से जुड़े
अधिकार के तहत बिना खाते के भी बैंक में लॉकर खोला जा सकता है. लॉकर के लिए बैंक में निवेश करना जरूरी नहीं होता है. किसी भी बैंक में अगर आपको लॉकर के लिए अकाउंट खोलने के लिए ज़बर्दस्ती की जाए, तो आप उस बैंक के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करा सकते हैं.

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समय पर घर के पजेशन का हक
बड़े शहरों में अक्सर लोग अंडर कंस्ट्रक्शन घर ख़रीदते हैं, क्योंकि उन्हें ऐसा करना आसान होता है. उनके ऊपर फाइनेंस का ज़्यादा लोड नहीं होता. कई बार बिल्डर समय पर प्रोजेक्ट पूरा नहीं करते और घर का पजेशन नहीं देते. ऐसे में आप उनके ख़िलाफ़ कंप्लेन कर सकते हैं. पजेशन में देरी होने से बिल्डर को ब्याज देना होगा.

टैक्स रिफंड का अधिकार
ईमानदारी से सरकार को टैक्स देते हैं, तो इसका रिफंड लेने का अधिकार भी आपको है. वो आपका ही पैसा है. टैक्स रिफंड के अधिकार के तहत रिटर्न फाइल करने के 90 दिन के भीतर रिफंड देना ज़रूरी होता है. रिफंड 90 दिन के बाद मिलता है तो हर महीने 0.5 फ़ीसदी ब्याज आपको मिलना चाहिए. अगर ऐसा नहीं है, तो आप रिफंड में देरी होने पर असेसमेंट अधिकारी से शिकायत कर सकते हैं.

– श्वेता सिंह 

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अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस: ज़रूरी है अधिकारों के प्रति जागरूकता (Human rights day)

human rights day
हर साल 10 दिसंबर ‘अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस’ (Human Rights Day) के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि वर्ष 1948 में इसी दिन संयुक्त राष्ट्र ने ‘यूनिवर्सल डेक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स’ की घोषणा की थी. इस घोषणा का मुख्य उद्देश्य सभी को मानव अधिकारों के प्रति जागरूक करना था. हर व्यक्ति के कुछ ऐसे मानवाधिकार होते हैं, जो उनसे कभी छीने नहीं जा सकते. ठीक वैसे ही जैसे हर देश में स्त्री-पुरुष के अधिकार समान हैं. हमारे देश के क़ानून में भी स्त्री-पुरुषों के अधिकार समान हैं, पर आज भी पुरुषों का एक बड़ा तबका महिलाओं को कमतर ही समझता है.

 

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आज मानवाधिकार दिवस (Human Rights Day) के मौ़के पर एक संकल्प लें कि न कभी किसी के अधिकारों का हनन करेंगे और न अपने होने देंगे. अगर कहीं अत्याचार होते देखेंगे, तो उसके लिए आवाज़ ज़रूर उठाएंगे. चाहे आप सड़क पर हों, स्कूल में, ऑफिस में, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में, वोटिंग बूथ पर या फिर सोशल मीडिया पर, हर जगह अधिकारों के प्रति जागरूकता आपकी अपनी ज़िम्मेदारी है. हम जहां भी हैं, वहां बदलाव ज़रूर लाएं.
‘यूनिवर्सल डेक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स’ से कई अधिकारों को हमारे देश के संविधान में शामिल किया गया है. स्वतंत्रता, समानता, अपनी बात रखने का अधिकार, बिना भेदभाव सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार, न्याय मांगने का अधिकार जैसे मौलिक अधिकार हर नागरिक के हैं.
– अनीता सिंह