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जानें गैस बनने की असली वजहें और उससे बचने के असरदार उपाय ( How to Get Rid of Gas)

How to Get Rid of gas trouble

ज्यादातर लोगों को गैस की समस्या होती है, लेकिन कई लोग इस प्रॉब्लम को मामूली समझकर अनदेखा कर देते हैं या इस पर चर्चा करने से हिचकिचाते हैं. जबकि हक़ीक़त यह है कि इसके कारण भूख कम होना, चेस्ट पेन, सांस लेने में परेशानी या पेट फूलना जैसी समस्याएं होने लगती हैं. अगर गैस की वजहों के बारे में पता चल जाए तो इससे आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है. हम आपको गैस बनने की असली वजहें और इस बीमारी से बचने के उपाय बता रहे हैं.

How to Get Rid of gas trouble

बैक्टीरिया- पेट में अच्छे और ख़राब बैक्टीरिया का बैलेंस बिगड़ जाने से गैस बनती है. कई बार ये असंतुलन किसी बीमारी के साइड इफ़ेक्ट के कारण भी हो सकता है. इसके अलावा लहसुन, प्याज़, बीन्स जैसी सब्ज़ियां भी अच्छे व ख़राब बैक्टीरिया में बैलेंस बिगाड़ने के लिए ज़िम्मेदार होती हैं. इसलिए यदि आपको गैस की समस्या है तो उनका सेवन संभलकर करें.

डेयरी प्रोडक्ट्स- उम्र बढ़ने के साथ खाना पचाने कीशक्ति कमज़ोर होने लगती है. ऐसे में दूध और दूध से बनी चीज़ें (दही छोड़कर) ठीक तरह से डायजेस्ट नही हो पातीं और गैस बनती है. अतः 45 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोगों को डायट में ज़्यादा से ज़्यादा दही शामिल करना चाहिए. बाकी डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन सीमित मात्रा में करना पेट के लिए बेहतर होता है.

कब्ज़– कब्ज़ की प्रॉब्लम होने पर बॉडी के टॉक्सिन्स ठीक तरह से बाहर नहीं आ पाते, जिसकी वजह से गैस बनने लगती है. इससे बचने के लिए दिनभर में 8-10 गिलास पानी पीएं और खाने में फाइबर वाले फूड्स की मात्रा बढा दें.

How to Get Rid of gas trouble

एंटीबायोटिक्स- कुछ एंटीबायोटिक्स के साइड इफेक्ट्स से पेट में अच्छे बैक्टीरिया कम हो जाते हैं, जिससे डायजेशन बिगड़ जाता है और गैस बनने लगती है. अगर एंटीबायोटिक्स लेने के बाद गैस की प्रॉब्लम आए, तो डॉक्टर से सलाह लेकर गैस्ट्रो रेजिस्टेंट दवाई का सेवन करें.

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जल्दी-जल्दी खाना- कई बार जल्दी में हम खाने को सही तरी़के से नहीं चबाते. जिसके कारण गैस की प्रॉब्लम हो सकती है. इससे बचने के लिए खाने को आराम से चबाकर खाएं ताकि वो आसानी से पच सके और खाते समय बातें न करें.

फूड एलर्जी- कुछ लोगों को ब्रेड और पिज़्ज़ा जैसे खाद्य पदार्थों को पचाने में परेशानी होती है. इनकी एलर्जी होने की वजह से गैस बनती है. इसलिए बेहतर होगा कि आप मैदे से बनी चीज़ें, जंक फूड और बाहर का तला हुआ खाना खाने से बचें.

How to Get Rid of gas trouble

फास्ट फूड- आजकल बच्चों में भी गैस की प्रॉब्लम देखी जाती है. बर्गर, पिज़्ज़ा, सैंडविच आदि का अत्यधिक सेवन करने के कारण बच्चों का डायजेस्टिव सिस्टम बिगड़ जाता है. नतीज़तन उनका खाना अच्छे से नहीं पचता. रूटीन गड़बड़ होने के कारण पेट साफ़ नहीं होता और यह समस्या गैस के रूप में सामने आने लगती है. समय रहते इस ओर ध्यान न दिया जाए तो यह समस्या विकराल रूप ले लेती है. इसलिए यदि आपका बच्चा भी फास्ट फूड का शौक़ीन है तो समय रहते उसकी आदत छुड़ाने की कोशिश करें.

हार्मोन्स में बदलाव– महिलाओं में मैनोपॉज के बाद और पुरुषों में 50 की आयु के बाद हार्मोनल बदलाव होने शुरू हो जाते हैं, जिसका असर डायजेशन पर भी पड़ता है. बहुत ज़रूरी है कि आप इस उम्र में संतुलित भोजन खाएं. कुछ भी ऐसा न खाएं जिससे आपका हाजमा बिगड़ जाए. संतुलित खाने के साथ रोज़ाना 30 मिनट की एक्सरसाइज़ करें. चाहें तो शुरुआत जॉगिंग से कर सकते हैं.

How to Get Rid of gas trouble

नॉनवेज फूड- अगर गैस की प्रॉब्लम बहुत अधिक परेशान करती है तो आपको नॉनवेज खाना बंद कर देना चाहिए, क्योंकि इसे पचाने में बहुत अधिक समय लगता है, ख़ासतौर पर मटन को. रात को नॉनवेज खाने से बचना चाहिए. अगर आप नॉनवेज खा भी रहे हों तो कम मात्रा में खाएं. यदि आप नॉनवेज के बिना नहीं रह सकते, तो इसे डिनर के बजाय लंच में लें.

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भोपाल गैस ट्रैजेडी- दर्द के वो 32 साल (Bhopal Gas Tragedy- painful 32 years)

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झूठ कहते हैं लोग कि समय के साथ दर्द का एहसास कम होने लगता है, क्योंकि आज भी वो मंज़र भोपाल में देखने को मिल जाता है. एक ऐसा दिन, जिसने न जाने कितनी ज़िंदगियां लील लीं. न जाने कितनी मांओं की गोद सूनी हो गई, घर का चिराग़ बुझ गया और न जाने ऐसे ही कितने दर्द का एहसास भोपाल के लोगों ने उस दिन किया. उस घटना को 32 साल हो चुके हैं, लेकिन ऐसा लगता है जैसे अभी की बात हो. मन मानने को तैयार ही नहीं होता कि ऐसा भी कुछ हो सकता है, जिससे स़िर्फ आज ही नहीं, बल्कि आनेवाला कल भी बर्बाद हो जाएगा.

क्या थी घटना?
भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से एक ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ, जिससे लगभग 15000 से अधिक लोगों की जान गई और बहुत सारे लोग कई तरह की शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए. भोपाल गैस कांड में मिथाइलआइसोसाइनाइट (मिक) नामक ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ था, जिसका उपयोग कीटनाशक बनाने के लिए किया जाता था. भोपाल गैस त्रासदी को लगातार मानवीय समुदाय और पर्यावरण को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिना जाता है.

दर्द बढ़ाने वाला था साल 1984 का दिसंबर माह
दिसंबर की कड़ाके की ठंड में अपने-अपने घरों में सोए लोगों को इस बात का बिल्कुल एहसास नहीं था कि ये माह उन्हें दर्द का ऐसा एहसास कराएगा कि उनकी आनेवाली पीढ़ियां भी नहीं भूल पाएंगी.

उस काली रात की सुबह भी काली थी
आज भी भोपाल गैस ट्रैजेडी को याद करते मन सिहर जाता है. आधी रात को जब यूनियन कार्बाइड से गैस लीक होना शुरू हुई, तो सुबह होने तक उस गैस ने न जाने कितनी ही ज़िंदगियों को अपनी आगोश में ले लिया था. कहने को तो सूरज नया सवेरा लेकर आया था, लेकिन असल में भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए वो काला सवेरा था. सुबह की हर एक किरण दर्द का आभास करा रही थी. चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल, लोगों की आंखों में सूखे आंसू, अपनों के खोने का डर, उजड़ते सपने और न जाने ऐसे ही कितने दर्द का एहसास समेटे लोग इधर-उधर भाग रहे थे. दुनिया भर की मीडिया लोगों को कैमरे में ़कैद करने के लिए भोपाल पहुंच चुकी थी, लेकिन ख़ुद भोपाल कहीं खो-सा गया था.

…और भोपाल ग़ुम हो गया दर्द के साये में
ये पहला ऐसा वाकया था, जिसने भोपाल ही नहीं, बल्कि पूरे देश को हिला कर रख दिया. एक ऐसी त्रासदी, जिसके लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाए, समझ ही नहीं आ रहा था. इस त्रासदी में वो पहले का हंसता-खेलता और चहकता भोपाल सदा के लिए दुख के साये में समा गया था. पूरा शहर थम-सा गया था. जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था.

भयावह मंज़र
उस समय भोपाल में ख़बरों के लिए मीडिया का तांता लगा था. कई पत्रकार उस भयावह मंज़र का गवाह बने. जब ये पत्रकार भोपाल शहर में पहुंचे, तो उन्हें लाशें ही लाशें दिखाई दीं. चाहे इंसान हों या जानवर, मौत सबको लील चुकी थी. उस मंज़र को देखकर एक बात तो साफ़ हो गई थी कि मौत किसी में भेद नहीं करती. उस निर्मम ने तो मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ा.

परिवार तबाह… आशाएं ख़त्म… सपने हुए चूर-चूर
यूनियन कार्बाइड कंपनी के कारखाने के सामनेवाली बस्ती पर इस गैस का असर सबसे ज़्यादा हुआ. बस्ती में तबाही का मज़र था. लोगों की आंखों पर ठंडी पट्टियां बंधीं थीं, लेकिन सामने घनघोर अंधियारा था. रात में सोते समय सुनहरे सपने देखनेवाली आंखें अब सदा के लिए अंधी हो चुकी थीं. परिवार का परिवार तबाह हो चुका था. उनकी आशाएं अब ख़त्म हो चुकी थीं. परिवार के सपने चूर-चूर हो चुके थे.

एक ऐसी बीमारी मिली, जिसका इलाज नहीं
ये एक ऐसी घटना थी, जिसने भोपाल वासियों को एक ऐसी बीमारी सौगात में दे गई, जिसका इलाज संभव नहीं. पीढ़ियां बर्बाद हो गईं. पूरी नस्ल ख़राब हो गई. होनेवाले बच्चे बीमार और अपंग हुए. आख़िर उन मासूमों का क्या कसूर था, जो अपनी मां के पेट में थे. बात वहीं ख़त्म नहीं हुई. उन बच्चों के बच्चे भी न उस गैस की वजह से कई बीमारियों के चंगुल में फंस गए.

भोपाल में शादी करने से कतराने लगे थे लोग
यह औद्योगिक दुर्घटना पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दी की आख़िर इस तरक्क़ी से क्या फ़ायदा, जो इंसानी ज़िंदगी को ही तबाह कर दे, लेकिन देश के अंदर कुछ ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने इस घटना के बाद अपने बच्चों का विवाह तक भोपाल के लोगों से करना पसंद नहीं किया. ऐसी बहुत सी बातें आसपास से सुनने को मिलती रही हैं कि वहां कौन शादी करेगा, आनेवाली पीढ़ी भी बीमार पैदा होगी.

भोपाल के लोगों पर जो बीता उसे भुलाया नहीं जा सकता. आज भी लोग उस घटना को अपने भीतर समेटे हुए सिहर जाते हैं. इंसान होने के नाते हमें इस तरह की स्थिति होने पर लोगों का सपोर्ट करना चाहिए और आगे बढ़कर लोगों की मदद करनी चाहिए.

– श्वेता सिंह