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Poetry

सुनो-सुनो मज़े की एक कहानी
उस दुनिया की जो हुई सयानी
है कुछ साल पहले की बात
दिवाली के कुछ दिन पहले की रात
चकमक-दकमक बाज़ारों में
गलियों और चौबारों में
चमकीले सामानों को
ख़रीदने की होड़ थी
चीन की बनी वस्तुएं सब
सुंदरता में बेजोड़ थीं
सहसा मैंने इक बिजली की
लड़ी छुई तो अंतर्मन से
आवाज़ आई अरी ठहर
हिंदी-चीनी भाई-भाई कहकर
जिसने ढाया हम पे कहर
पीठ में भोंका छुरा जिसने
हम क्यों उसका स्वार्थ सिद्ध करें?
उसका बाज़ार बनकर क्यों हम
उसको और समृद्ध करें?
लेकिन जैसा कि होता आया है
जब मैंने अपना पक्ष बताया सबको
ख़ुद पर हंसता ही पाया सबको
‘एक हमारे-तुम्हारे न ख़रीदने से
नहीं पड़ेगा कोई अंतर
और सभी को समझाने का
नहीं किसी के पास है मंतर’
सबका मत मुझसे भिन्न था
मेरा मन बहुत ही खिन्न था
घर आकर यों ही आवरण पर
गई निगाह गुरुजी के उद्धरण पर
हम बदलेंगे युग बदलेगा
हम सुधरेंगे युग सुधरेगा
सहसा प्यारा सा विचार आया
मन पर इक उत्साह छाया
ध्यान से देखा तो पाया
बहुत से लोग मेरी तरह
इस संकल्प पर हैं टिक रहे
सोशल मीडिया पर संदेशों में
निज भावनाएं हैं लिख रहे
औरों के भी ऐसे संकल्पों से
मन में नया उत्साह जगा
आज ख़बर पढ़ी तो यही लगा
‘कुछ नहीं होने वाला’
के हथियार से डरना व्यर्थ है
‘कम से कम हम सही करेंगे’ में ही
मानव होने का अर्थ है…

भावना प्रकाश

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क्यों ख़ामोश हो इस कदर
इन अधरों को खुलने दो
जो एहसास जगे है तुममें
उन्हें लबों पर आने दो

ख़ामोश निगाहें कुछ ढूंढ़ती
अनजान हवाएं कुछ पूंछती
अधजले उन चिराग़ों में
प्रेम का दीप जलाने दो

तुम बिन सपनों का मोल नहीं
मेरी बंदगी का कोई तोल नहीं
बस तुम ही हो मेरे अपने
ख़्वाबों के पर से नभ छूने दो

कनखियों से निगाहें टकराई
दिल में आहट ने ली अंगड़ाई
बस ढह गया जुनून मेरा
हिय मधुप परागी होने दो

है अनंत प्रवंचना राहों में
बहु वेदना बसी निगाहों में
दे दो अपने सब दर्द मुझे
उधड़े जज़्बात मुझे सीने दो

इस जहां ने ऐसा पहरा डाला
जीवन का ऐसा दिया हवाला
जज़्बात उमड़ रहे गए हिय में
संंग ख़ामोशियों के मुझे जीने दो…

– सुनीता मुखर्जी

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क्या कहें आज क्या माजरा हो गया

ज़िंदगी से मेरा वास्ता हो गया

इक ख़ुशी क्या मिली मैं निखरती गई

ये तबस्सुम मेरा आईना हो गया

ग़म के साये तले हम पले थे मगर

ये हंसी आज साथी नया हो ग़म


कोई ग़म क्यूं रहे आंख नम क्यूं रहे

मुस्कुराने का अब इक नशा हो गया

हर कठिन दौर में हम अकेले थे पर

जब बढ़ाई कदम क़ाफ़िला हो गया

अब किसी से हमें कोई शिकवा नहीं

वो खुदा अब मेरा रहनुमा हो गया

      – रेखा भारती मिश्रा







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आ गए आपकी मेहरबानी हुई
दिल की सरगम बजी शादमानी हुई

मिल गई प्यार की सल्तनत अब हमें
वो भी राजा हुआ मैं भी रानी हुई

जब से पड़ने लगी वो निगाह-ए-करम
फूल जैसी खिली ज़िन्दगानी हुई

लग गई क़हक़हों की झड़ी देखिए
इस कदर दोनों में ख़ुश बयानी हुई

फूल बूटे तरन्नुम से गाने लगे
जब शुरू प्यार की यह कहानी हुई

आज मौक़ा मुक़द्दर ने दे ही दिया
जो ये हासिल तेरी मेज़बानी हुई

दिल से ‘डाली’ लगाते हैं हम इसलिए
जां से प्यारी तेरी हर निशानी हुई…

– अखिलेश तिवारी डाली

  • शादमानी- ख़ुशी
  • निगाह-ए-करम- कृपादृष्टि

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देख लेती हूं तुम्हें ख़्वाब में सोते-सोते
चैन मिलता है शब-ए-हिज्र में रोते-रोते

इक तेरे ग़म के सिवा और बचा ही क्या है
बच गई आज ये सौगात भी खोते-खोते

प्यार फलने ही नहीं देते बबूलों के शजर
थक गए हम तो यहां प्यार को बोते-बोते

बेवफ़ा कह के उसे छेड़े हैं दुनिया वाले
मर ही जाए न वो इस बोझ को ढोते-ढोते

इतनी दीवानी बनाया है किसी ने मुझको
प्यार की झील में खाती रही गोते-गोते

ऐसा इल्ज़ामे-तबाही ये लगाया उसने
मुद्दतें हो गईं इस दाग़ को धोते-धोते

आ गया फिर कोई गुलशन में शिकारी शायद
हर तरफ़ दिख रहे आकाश में तोते-तोते

तेरे जैसा ही कोई शख़्स मिला था ‘डाली’
बच गए हम तो किसी और के होते-होते…

– अखिलेश तिवारी ‘डाली’

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प्रेम कथाओं के पृष्ठों पर, जब-जब कहीं निहारा होगा
सच मानो मेरी आंखों में केवल चित्र तुम्हारा होगा

कभी याद तो करके देखो, भूले बिसरे चौराहों को
कान लगा कर सुनो कभी, अपने अंतर की चाहों को

कभी अधर तो सौंपे होंगे, अपनी चंदन सी बांहों को
कस्तूरी सी गंध समझ, हर संभव मुझे बिसारा होगा
सच मानो मेरी…

कई बरस तेरे माथे पर रखी मैंने काजल बिंदिया
कहीं उड़ाकर ले जाती थी, इन आंखों से मेरी निंदिया

संभवता कभी लगाई हूं, एकाकी क्षण में वो बिंदिया
क्या हुआ कभी आभास नहीं, यहीं कहीं बंजारा होगा
सच मानो मेरी…

यह सोच खुले ही छोड़ दिए, इस हृदय भुवन के द्वार सभी
कोई कुछ मुझको कहे मगर, भेडूंगी नहीं किवाड़ अभी

वापस लौट गए तुम यदि तो, यह ज्वाला न होगी शांत कभी
आहट-आहट कान लगाए, तुमने मुझे पुकारा होगा
सच मानो मेरी…

अब दूल्हा सा तुम सज धज, खड़े हुए हो इस आंगन में
लगा रहे हो आग और अब, इस रिमझिम-रिमझिम सावन में

और किसी की किन्तु धरोहर, शोभित हो इस मन दर्पण में
‘डाली’ मर्यादित प्रश्नों पर, किंचित नहीं विचारा होगा
सच मानो मेरी आंखों में, केवल चित्र तुम्हारा होगा

प्रेम कथाओं के पृष्ठों पर, जब-जब कहीं निहारा होगा
सच मानो मेरी…

अखिलेश तिवारी ‘डाली’

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अब मुझे किसी से शिकवा ना शिकायत है

अब मैं अकेला हूं, कितनी बड़ी राहत है

थी चोट लगी उनको और अश्क बहे मेरे

ऐ दिल तू ही बतला दे क्या यही चाहत है

प्यार में था उनके इंतज़ार का ये आलम

हर वक़्त गुमां होता जैसे कोई आहट है

खत का जवाब मेरे आता ज़रूर

पर कलम न उठी उनसे हाय कैसी नज़ाकत है

मुझको मुकाबिल पाकर उनका नकाब उठाना

क़यामत से पहले हाय ये कैसी क़यामत है

जनाज़े को मेरे वो न कांधा देने आए

दोस्तों से मुझको बस इतनी शिकायत है

अब मैं अकेला हूं, कितनी बड़ी राहत है…

Dinesh Khanna
दिनेश खन्ना

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हज़ारों तीर किसी की कमान से गुज़रे
ये एक हम ही थे जो फिर भी शान से गुज़रे

कभी ज़मीन कभी आसमान से गुज़रे
जुनून-ए-इश्क़ में किस-किस जहान से गुज़रे

किसी की याद ने बेचैन कर दिया दिल को
परिंदे उड़ते हुए जब मकान से गुज़रे

जिन्होंने अहदे-वफ़ा के दीये बुझाए थे
तमाम नाम वही दास्तान से गुज़रे

हमारे इश्क़ का आलम तो देखिए साहिब
रहे-वफ़ा में बड़ी आनबान से गुज़रे

न आया हर्फ़े-शिकायत कभी भी होंठों पर
हज़ार बार तिरे दर्मियान से गुज़रे

कभी दिमाग़ कभी दिल ने हार मानी है
तमाम उम्र यूं ही इम्तिहान से गुज़रे

जो आज बच के गुज़रते हैं बूढ़े बरगद से
कभी ये लोग इसी सायबान से गुज़रे

हमारे शेर हैं मशहूर इसलिए ‘डाॅली’
हमारे शेर तुम्हारी ज़ुबान से गुज़रे…

– अखिलेश तिवारी ‘डाॅली’

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किसी रिश्ते में
वादे और स्वीकारोक्ति
ज़रूरी तो नहीं
कई बार बिना आई लव यू 
कहे भी तो प्यार होता है
और न जाने
कितने वादे और
आई लव यू 
कहे रिश्ते
उम्र पूरी नहीं कर पाते
इसलिए मुझे
आई लव यू
कहना बेमानी लगता है
और मैं
प्यार को
सिर्फ़ एहसास में जीता हूं
किसी के कहे-अनकहे
शब्द में नहीं
वो एहसास
शब्द से कहीं अधिक क़ीमती होते हैं
जो बिना बोले
समझ लिए जाते हैं…

– शिखर प्रयाग

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मैं आज भी 
वही तो कह रहा हूं
जो सालों से कह रहा था
तुम भी तो सुन रहे हो
सालों से मुझे
मैं कह कहां रहा हूं
और तुम सुन कहां रहे हो
तुम सुन लेते तो
मेरा कहना रुक जाता
और मैं वह कह पाता
जो कहना चाहता था
 तो तुम समझ लेते और 
तुम्हारा सुनना रुक जाता
मुझे हमेशा लगता है
समझना तुम्हें है
और तुम मौन रह कर मुझे बताते हो
सुनना मुझे है
तुम्हारे मौन की भाषा
मैं समझ पाता तो
कुछ हो जाता
क्योंकि मेरे कहने भर से कुछ होता तो
अब तक हो जाता
मुझे सुनना सीखना चाहिए
मौन की भाषा को 
और अपनी बात कहने के लिए
शब्द नहीं
मौन का प्रयोग
करना चाहिए
हो सकता है
इस बहाने हम दोनों
एक-दूसरे की अनकही बात
सुन सकें…

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
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एक दिन मैं

अपनी ही धड़कनों से

नाराज़ हो गया

इतनी सी शिकायत लेकर

कि जब तुम

उसके सीने में नहीं धड़क सकती

तो मेरे सीने में धड़कने की

ज़रूरत क्या है

धड़कनों का मज़ा तो तभी है

जब वो महबूब के

दिल में धड़कना जानें

जैसे मेरे दिल में

तड़पती हुई

तुम्हारी धड़कन…

– शिखर प्रयाग

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सुबहों को व्यस्त ही रखा, दुपहरियां थकी-थकी सी रही
कुछ जो न कह सकी, इन उदास शामों से क्या कहूं..

चुन-चुनकर रख लिए थे जब, कुछ पल सहेज कर
वो जो ख़र्चे ही नहीं कभी, उन हिसाबों का क्या कहूं..

न तुमने कुछ कहा कभी, मैं भी चुप-चुप सी ही रही
हर बार अव्यक्त जो रहा, उन एहसासों का क्या कहूं..

यूं तो गुज़र ही रहे थे हम-तुम, बगैर ही कुछ कहे-सुने
अब कि जब मिलें, छूटे हुए उन जज़्बातों से क्या कहूं..

हां है कोई चांद का दीवाना, कोई पूजा करे सूरज की
वो जो भटकते फिर रहे, मैं उन टूटे तारों से क्या कहूं..

न ख़त का ही इंतज़ार था, और न किसी फूल का
सिर्फ़ लिखी एक कविता, खाली लिफ़ाफ़ों से क्या कहूं…

Namita Gupta 'Manasi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Poetry

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