gazal

मत करो विलाप
ऐ स्त्रियों!
कि विलापने से
कांपती है धरती
दरकता है
आसमां भी

कि सुख और दुख
दो पाले हैं
ज़िंदगी के
खेलने दो ना
उन्हें ही कबड्डी
आने दो दुखों को
सुख के पाले
टांग छुड़ा कर
भाग ही जाएंगे
अपने पाले
या दबोच
लिए जाएंगे
सुखों की भीड़ में

मत करो विलाप
ऐ स्त्रियों!
कि गरजने दो
बादलों को ही
बरसने दो
भिगोने दो
धरती को

कि जीवन और मृत्यु
के बीच
एक महीन रेखा ही तो है
मिटकर मोक्ष ही तो पाना है
फिर से जीवन में आना है
कि विलापने से पसरती है
नकारात्मक उर्जा
कि उसी विलाप को
बना लो बांध
और झोंक दो जीवन में

मत करो विलाप
ऐ स्त्रियों!
कि विलापने से
नहीं बदलेगी जून तुम्हारी
कि मोड़ दो
धाराओं को
अपने ही पक्ष में
बिखेर दो रंग अपने ही जीवन में
अपने आसपास
उगा दो फूल
चुग लो कंकर
कि तुम्हारी कईं पीढ़ियों
को एक भी कंकर
ना चुभ पाए
और फूलों
के रास्ते
रंग भरी
दुनिया में
कर जाएं प्रवेश

मत करो विलाप
ऐ स्त्रियों!
बहुत हुआ विलाप
व्यर्थ फिर आंसू
कि जाना है हमें
बहुत आगे
अपनी बनाई
दुनिया को
दिखाना है
दुनिया को
संवारना है
उनको भी
जो विलाप
के कगार पर
अब भी पड़ी हैं
बिलखते हुए
उठाना है
उन्हें कंधे पकड़ कर
समझाना है
बुझाना है
और ले जाना है
रंगों भरी दुनिया में

मत करो विलाप
ऐ स्त्रियों…

Sangeeta Sethi
संगीता सेठी
Poetry

यह भी पढ़े: Shayeri

तुम्हें एहसास है
मैं तुम्हारे साथ
गुज़रे लम्हे और वक़्त
नहीं मिस करता
वे तो एक दिन
दूर जाने थे
भूल जाने थे
नहीं भूला तो
तुम्हारी हंसी
यक़ीन करो
तुम मेरे कहां थे
तुम्हें मांग भी तो नहीं
सकता था
खुदा से
अधिकार और वक़्त
मेरा नहीं था
लेकिन वह हंसी
जो अनायास ही
ज़िंदगी में
और ज़िंदगी भर देती है
आज भी मेरी चाहत है
मैं
आज भी
उसका मुरीद हूं
मैं
आज भी
महसूस करता हूं
उस हंसी की खनक
कानों में
और बस हर वक़्त
उसे मिस करता हूं
मैं
तुम्हारे होने के एहसास से
बढ़ कर
तुम्हारी हंसी की
खनक को कहीं
अधिक मिस करता हूं…

– शिखर प्रयाग

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavita

तेरी आंखों से कब राहों का उजाला मांगा
अपनी आंखों में बस थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

सदियों से इस जहां में इश्क़ इक गुनाह ठहरा
ज़ुल्फ़ों की छांव में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

खुदा ने तिल तेरे चेहरे को नज़र कर रखा है
अपने पहलू में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

रस्मों-रिवाज दुनिया के पत्थरों के साये हैं
अपने ख़्वाबों तले मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

हर तरफ़ मौत के सायों के खौफ़ फैले हैं
दिल मे रख ले मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे

पीरो दरगाह जा के एक दुआ मांगी है
अपनी तमन्ना में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

ज़िंदगी बस ज़िंदगी है ज़िंदगी से क्या मांगूं
अपने साये में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे…

शिखर प्रयाग

यह भी पढ़ें: वैलेंटाइन स्पेशल- प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो… (Happy Valentine’s Day- Most Romantic Quotes For Valentine’s..)

Gazal

यह भी पढ़े: Shayeri

जैसे लौट आती हैं चिड़ियां
दिनभर की उड़ान के बाद
थकी-हारी
वापस घोंसलों में

जैसे लौट आते हैं बीज
ओढ़े हुए
अनंत संभावनाओं के कवच को
हरियाली के सफ़र के बाद
चुपचाप
सूखे हुए फूलों में

जैसे लौट आती हैं बारिशें
समेटे हुए
तमाम नदियों को
और उड़ेल देती हैं
अपना सर्वस्व
जी भर
रेगिस्तानों में

जैसे लौट आता है प्रेम
बगैर ही किसी
मिलने-बिछुडने की शर्तों के साथ
अनसुना करते हुए
सारी नसीहतें
ग्रह-नक्षत्रों की
सुनते हुए सारी फटकारें
जन्म-जन्मांतरों की

सुनो,
लौट आएंगे हम-तुम भी
घोंसलों में
चिड़ियां की तरह ,
बीजों में
फूलों की तरह
रेगिस्तानों में
बारिशों की तरह
एक-दूसरे की कविताओं में
ठीक प्रेम की ही तरह…

नमिता गुप्ता ‘मनसी’

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavya-

यात्रा हो या ज़िंदगी
कुछ न कुछ छूट ही जाता है
पीछे
अधजिया सा
फिर..
‘जिए’ से ज़्यादा
‘अधजिए’ को जीने की लालसा
किए रखती है ज़िंदा
इसीलिए देखते रहते हैं उसे
डबडबाई आंखों से
मुड़-मुड़कर
अंत तक..

कुछ ऐसी ही यात्रा में हैं आजकल
ये ‘दोनों’
इससे बड़ी और कोई यात्रा हुई ही नहीं
और होगी भी नहीं
जिसे सिर्फ़ अनुभव ही किया जा सकता है
कोई शब्द हैं ही नहीं उसके लिए..

मिले थे जो कभी
पन्नों में
लिखते-लिखते
कब में लिखने लगे
एक-दूसरे को शब्दों में
कभी दर्ज हुए इतिहासों में
कभी नियति का इशारा हुए
बंधे हुए मन्नतों के धागों में
उलझते-सुलझते
छोड़ते हुए निशानियां
आत्मिक एहसास की
वो चलते रहे यूं ही..

समुंद्रों में खेलना
किलों की तहकीकात करना
निहारते जाना वृक्षों, जंगलों को
जी भर बातें करना हवाओं से
ये सब सुखद है
पर तलाशना स्वयं को
एक-दूसरे में
फलक से तारे तोड़कर लाने से भी ज़्यादा सुखद है..

सच में,
महज जगहों से गुज़रना ही तो यात्रा नहीं है
स्पर्श करना तमाम अनछुए को
महसूसना वो सब अनकहा
और जी लेना पिछला अनबीता
एक चक्र को पूरा करते हुए
रह जाना अधूरा
फिर कभी पूरा होने के लिए
.. ये सब आत्मिक यात्रा के ही तो सोपान हैं…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavita

चाहकर भी कोई कवि
कभी नहीं लिख सकेगा शोकगीत
स्त्री की उन इच्छाओं की मृत्यु पर
जो अभिव्यक्त होने से पहले ही
अनंत में हो गईं विलीन
हालांकि इतनी भी बड़ी ना थी उनकी कामनाएं
काश कि कोई सुन पाता
उनकी मौन होती आवाज़ के पीछे का शोर
स्याही से स्याह शब्दों में कोई लिख देता
अकेलेपन की हताशा
अवसाद की छाया
ना चाहे जाने, रीते रह जाने का दुख

घर पर कोई स्त्री रोज़ की अपेक्षा
आजकल ज़्यादा चुप है
तो कुछ और भी हो सकती है वजह
वाचालता पे लगा ग्रहण
उन्मुक्त उल्लास पर पड़ी वक्रदृष्टि
काश कि किसी कलाकार की कूची
भर दे इंद्रधनुषीय रंग उसके स्याह अंधेरों में
उपेक्षा के घूरे पर पड़ी सिसकती करवटें
प्रेमपूर्ण चुंबन की राह तकती सिलवटें
पतझड़ में तब्दील होता मर्मस्थल
अनकहे रह गए उद्बोधन

जीवन की खुरदरी दीवारों से
झै गया उम्मीदों का प्लस्तर
और एक दिन वो स्त्री
खो बैठेंगी अपना भोलापन
बाल-सुलभ ज़िद करने की आदतें
मनुहार की रवायतें
वह बनकर रह जाएंगी खांटी औरतें
सदियों से, सभ्यताओं से
ज़ारी यह सिलसिला इस युग में भी रहा गर अनवरत
तो जान लो
तिरस्कार, उपेक्षा से हिल जाती हैं घर की बुनियादें
वो घर फिर घर नहीं रहता…

यामिनी नयन गुप्ता

यह भी पढ़े: Shayeri

वक़्त से लम्हों को
ख़रीदने की कोशिश की
वह मुस्कुराया
बोला
क्या क़ीमत दे सकोगे
मैं बोला
अपने जज़्बात दे देता हूं
तुम मुझे लम्हे दे दो
वह बोला कम हैं
इस मोल न ख़रीद सकोगे
मैं बोला जीवन ले लो
वह बोला
वह तो महबूब के हाथों
गिरवी रख चुके हो
और उस उधार को चुका कर
तुम्हारे महबूब से
तुम्हारी ज़िंदगी ले पाने की
औकात मेरी नहीं है
मैं बोला तुम क़ीमत बता तो
ऐ वक़्त
बिना लम्हों के
ज़िंदा कैसे रहूंगा
सुनो मुझ से मेरी यादें ले लो
बड़ी क़ीमती है
वह हंसा
एक तरफ़ मुझ से लम्हों की क़ीमत पूछते हो
और दूसरी तरफ़ मोलभाव कर
ऑफर देते हो
इंसान हो
अपनी फ़ितरत से
नहीं बाज आओगे
चलो मैं बता देता हूं
अपने दिल को
शीशा कर लो
कुछ ओस की बूंदें
भर लो
देख लो आर-पार ज़िंदगी के
अपनी मुट्ठी खोल लो
अपनी आंखों को ऊपर कर लो
तुम इंसान सिर्फ़
ख़रीदना और बेचना जानते हो
यहां तक कि
प्यार भी
लम्हे ख़रीद पाना
तुम्हारी औकात के बाहर है
कोई दौलत दे कर
न ख़रीद पाओगे
हां वक़्त के कदमों में झुक सको
तो हाथ ऊपर कर अजान दे दुआ मांगना
हो सकता है
उसकी रहमत से
कुछ लम्हे
तुम्हारी झोली में
आ गिरे
आमीन…

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

Kavita

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavita

नव वर्ष की पावन बेला मन मेरा तो हर्षित है
नए सूर्य की आभा से मानो सब आलोकित है

उम्मीद और आशा की ओढ़ चुनर ये आया है
स्वागत में अल्लाहदित इसके हवाओं ने गीत गाया है

चहुं ओर उल्लास है आनंदमयी प्रकाश है
चांद और तारों के संग झूमता आकाश है

निराशा के घोर तम का तर्पण आओ करते हैं
पुष्प आशा के नव वर्ष को सब मिल अर्पण करते हैं

बिखर गया जो गए साल में फिर से उसे संजोते हैं
उजड़ गया था चमन हमारा नई फसल फिर बोते हैं

ग़म में अश्रु बहुत बहाए अब ख़ुशियों की बारी है
नव चेतना से संचित हो जीने की तैयारी है

वर्ष था संघर्षोंभरा मुश्किलों का जोर था
सीखा गया जो हमें भूले अपनेपन का दौर था

खोई थी पहचान हमारी स्वयं से नाता जोड़ गया
हम ही श्रेष्ठ धरा पर इस भ्रम को कैसे तोड़ गया

चिरनिद्रा में सोकर हम तो भौतिकता में खोए थे
प्रतिफल मिला हमे वो ही जो बीज हमने बोए थे

सरिता का नीर स्वच्छ कलकल पंछियों का मधुर गान
कोरोना आया कैसा कुदरत से कराई पहचान

जीवन का अनूठा सबक गत वर्ष जाते दे गया
पर थे जो कुछ अनमोल पल वो छीन हमसे ले गया

जो चला गया, बीत गया, वो था कल पुराना
दृढ़ संकल्पों की ख़ुशबू से महकेगा नया ज़माना

सकारात्मक सोच की उड़ान आओ भरते हैं
नव भावों के नव सृजन से नव वर्ष का आगाज़ करते हैं…

Saarika phalor
सारिका फलोर

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavita

तुम और मैं
मिले तो मुझे अच्छा लगा
गुज़रे वक़्त की कसक कुछ कम हुई
परंतु मन के डर ने कहा
तुम दूर ही अच्छे हो..

जानती हूं मैं
तुम्हारे आने से होंठो पर मुस्कान आई
और मन में उमंग भी छाई
फिर भी कहती हूं
तुम दूर ही अच्छे हो..

देखने लगी मैं
भविष्य के लिए सुनहरे सपने
सजने लगे आंखों में नई उम्मीदें
फिर भी यह लगा
तुम दूर ही अच्छे हो..

समझ गई मैं
तुम क्षणिक जीवन में विश्‍वास करते हो
परंतु मैंने शाश्वत जीवन की कल्पना की थी
इसलिए मैंने कहा
तुम दूर ही अच्छे हो..

जान गई मैं
हमसफ़र ना हुए तो क्या हुआ
ख़ूबसूरत और मीठी याद तो हो
पास होकर भी
तुम दूर ही अच्छे हो…

अमृता सिन्हा

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavita

नेत्र कहूं नयन कहूं या कहूं मैं चक्षु
आंखों की भाषा सिर्फ़ नहीं है अश्रु
जीवन का दर्पण है आंखें
भक्ति का अर्पण है आंखें
प्रेम की अभिव्यक्ति आंखें
तो कभी विरह का क्रन्दन बन जाती आंखें
जो अधरों से ना फूटे वो बोल है आंखें
प्रियतम की प्रीत का हसीन एहसास करती आंखें
कभी प्रेम तो कभी समर्पण आंखें
तो कभी नशे से मदहोश हो झूमती आंखें
ग़म को अश्रुओं में बहाती आंखें
तो कभी उसी ग़म को हंसी में छिपाती आंखें
दिल के दरवाज़ों में बंद राज़ को बेपरदा करती आंखें
तो कभी हर राज़ को दफ़न करती आंखें
चाहे जितना छिपाओ मन के भावों को पर
हर भाव की अभिव्यक्ति बन जाती ये आंखें
रात को ख़्वाब सजाती
दिन में हक़ीक़त से रूबरू करवाती ये आंखें
ख़ुशक़िस्मत है वो जिन पर आंखों की नेमत है
है अगर दो आंखें तो ज़िंदगी का हर लम्हा रोशन है…

Sarika Fallor
सारिका फलोर

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavita

प्रकृति प्रेम…

Kavita

अभी तलाश रही हूं कुछ पीले शब्द
कि एक कविता लिखूं
पीली सी
ठीक उस पीली सोच वाली लड़की के जैसी
भीगती हुई
पीली धूप में तर-बतर
बटोरती हुई सपनों में
गिरे पीले कनेर
जो नहीं जानती फूल तोड़ना
घंटों बतियाती है जो चुपचाप
पीले अमलतास से
निहारा करती है रोज़
रिश्तों के पीले सूरजमुखी…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Kavita

यह भी पढ़े: Shayeri

द्रौपदी

स्वयंवर

मैं अग्निसुता, मैं स्वयंप्रभा

मैं स्वयं प्रभासित नारी हूं

मैं यज्ञ जन्मा, और पितृ धर्मा

नहीं किसी से हारी हूं

हे सखे बताओ किंचित ये

क्यों हलचल सी मेरे मन में है?

वरण करूं मैं जिसका क्या

ऐसा कोई इस जग में है?

कैसे चुनूंगी योग्य पति

कैसे मैं उसे पहचानूंगी?

गर मेरे योग्य नही है वो,

तो कैसे मैं ये जानूंगी,

मेरे तेज को क्या कोई

सामान्य जन सह पाएगा

फिर सिर्फ़ निशाना साध मुझे

कोई कैसे ले जाएगा?

हे प्रभु, कहा है सखा मुझे

तो सखा धर्म निभाना तुम

क्या करूं क्या नहीं

सही राह दिखलाना तुम!..

bhavana prakaash
भावना प्रकाश

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavita-