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काव्य- जब भी मायके जाती हूं… (Kavay- Jab Bhi Mayke Jati Hun…)

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जब भी मायके जाती हूं
फिर बचपन जी आती हूं
टुकड़ों में बंटी ख़ुशियों को
आंचल में समेट लाती हूं

अपनी हर मुश्किल का जवाब
मां के ‘सब ठीक हो जाएगा’ में पा जाती हूं
रूखे हो चुके कड़े हाथों से
कोमल थपकी ले आती हूं
सख़्त हो चुकी गोद में से
मीठी झपकी ले आती हूं

पापा ये चाहिए… पापा वो चाहिए…
कहकर इठलाती हूं
भाई से भी जीभर के
झगड़ा करके आती हूं

भूल जाती हूं कि मैं भी एक मां हूं
मायके जाकर फिर से बच्ची बन जाती हूं…

– पायल अग्रवाल

 

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ग़ज़ल- थोड़ा-सा आसमान… (Gazal- Thoda-Sa Aasman)

Gazal, Thoda-Sa Aasman

Gazal, Thoda-Sa Aasman

 

ग़म इतने मिले ख़ुशी से डर लगने लगा है
मौत क्या अब ज़िंदगी से डर लगने लगा है
सोचा था मिलेगी मुकद्दसे ज़मीं हमें भी
खुले आसमान में दम घुटने-सा लगा है

ख़ुशी आने को बेताब है बांहों में मेरी
ग़म है कि रास्ता रोकने लगा है
मुझे मंज़ूर था उसका न आना हर बार
दिल है कि फिर तकाज़ा करने लगा है

काश! छिन लेती सितारों से हर ख़ुशी अपनी
अब ज़मीन से पांव उखड़ने-सा लगा है
हमने की है हर दवा मकदूर तलक़
तमन्नाओं का दम-सा अब घुटने लगा है

एक बार मिलने की ख़्वाहिश थी उससे मेरी
दिल है कि अब तसल्लियां देने लगा है
ग़मे दिल को सहारा देना है मुमताज़ अब
यह टूटकर बिखरने-सा लगा है…

– मुमताज़

 

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ग़ज़ल- मेरी तन्हाई (Gazal- Meri Tanhai)

Gazal, Meri Tanhai

Gazal- Meri Tanhai

 

जो महफ़िलें रुलाती मुझे हैं
उनसे अच्छी मेरी तन्हाई है

जो महफ़िलें इल्ज़ाम लगाती हैं
उनसे अच्छी मेरी तन्हाई है

उसने जज़्बातों से खेला खिलौनों की तरह
हम यकीं करते रहे उन पर दीवानों की तरह

अब दोस्त भी दुश्मनों-सा मिजाज़ रखते हैं
ऐसी भीड़ से अच्छी मेरी तन्हाई है

कभी यादों के ख़ज़ाने से हसीं का तोहफ़ा लाती है
कभी आंखों में आंसुओं के समंदर भर जाती है

जैसी भी है बस मेरी है
दुनिया से अच्छी मेरी तन्हाई है…

– ऋतु गांगुली

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कविता- अब बिन तेरे सूना है संसार… (Kavita- Ab Bin Tere Soona Hai Sansar…)

Kavita- Ab Bin Tere Soona Hai Sansar

जब-जब तुमसे मुलाक़ात होती है
मेरे दिल में कोई गीत उतर आता है
सामने आ जाते हो तुम
मेरा सूना-सा जहां रंगीन हो उठता है
मैं सोचती हूं तुमसे क्या करूं बातें
पर तुम्हारी हर बात पर दिल झूम उठता है
जब अकेली भी होती हूं मैं
तब भी तुम मेरे क़रीब होते हो
मेरी यादों में, मेरी सांसों, मेरी ख़्वाहिशों में बसे
तुम ही तो हर पल दिल के नज़दीक होते हो
नींद में भी आती है तुम्हारी याद
लगती नहीं अब स्याह रात
तेरा आना भी अब मुझे अजीब नहीं लगता
तेरे आने पर मुझ-सा ख़ुशनसीब न कोई होता
तेरी हर मुस्कुराहट पर मेरा दिल निसार
अब बिन तेरे सूना है संसार…

– श्रुति राय

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कविता- प्रेम (Kavita- Prem)

Kavita, Prem

Kavita, Prem

बेशक़ीमती हैं पल तुम्हारे

यूं ख़्वाबों में आया न करो

माना ह्रदय में

उमड़ता प्यार बहुत है

कहूं क्या बेबस याद बहुत है

न कहीं उमड़ पाया तो क्या?

आंसुओं संग ढुलक जाएगा

माटी संग मिल हर रुत में

नए-नए रूप धरेगा

आएगी जो वर्षा तो

महक उठेगी धरती

सोंधी महक से

मेरा प्यार ही तो होगा

रुत बदलेगी

रूप-रंग बदल जाते हैं जैसे

वैसे ही मेरा प्यार

धरती की उमस में

कसमसाता-सा

नव रूप धरेगा

आएगी जो शिशिर

रंगबिरंगे फूलों में

छवि उसकी ही होगी

बदलती भावों की तरह

वह फिर बदलेगा

उष्मा कैसे वह इतनी सहेगा?

ताप हरने को

बिखरने से पहली ही

फिर से, वह रंग बदलेगा

हां, तुम देख लेना

मेरा प्यार वहीं कहीं

तुम्हारे ही आस-पास

सफेद लिली के रूप में

हंस रहा होगा कि

तुम छू लो एक बार उसे

 

– सुनीता नैनम

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 ख़्वाबों की ज़िंदगी… (Khwabon Ki Zindagi…)

ख़्वाबों की ज़िंदगी, Khwabon Ki Zindagi

Khwabon Ki Zindagi

अपने ख़्वाबों की ज़िंदगी 
तो सभी जीते हैं..
पर ज़िंदगी तो वह है,
जो किसी का ख़्वाब हो जाए…

Murli Manohar Shrivastav      

     मुरली मनोहर श्रीवास्तव   

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रोहित की कलम से… (Rohit Ki Kalam Se…)

Rohit Ki Kalam Se

 

बदला हुआ मौसम
अचानक हिंदी पर गोष्ठियां, सम्मेलन व तरह-तरह के समारोह आयोजित होने लगे थे. हिंदी नारे बुलंदियो पर थे. सरकारी संगठनो से साठ-गांठ के ताबड़तोड़ प्रयास भी जोरों पर थे.
इन दिनों ’अंग्रेज़ी’ भी ’हिंदी’ बोलने लगी थी. मौसम बदला-बदला महसूस हो रहा था. कुछ बरसों में ऐसा मौसम तब आता है, जब ’विश्व हिंदी सम्मेलन’ आनेवाला होता है.

संवाद (लघु-कथा)
पिंजरे में बंद दो सफ़ेद कबूतरों को जब भारी भरकम लोगों की भीड़ के बीच लाया गया, तो वे पिंज़रे की सलाखों में सहम कर दुबकते जा रहे थे. फिर, दो हाथों ने एक कबूतर को जोर से पकड़कर पिंज़रे से बाहर निकालते हुए दूसरे हाथों को सौंप दिया. मारे दहशत के कबूतर ने अपनी दोनों आँखे भींच ली थी. समारोह के मुख्य अतिथि ने बारी-बारी से दोनों कबूतर उड़ाकर समारोह की शुरूआत की. तालियों की गड़गड़ाहट जोरों पर थी.
एक झटका-सा लगा, फिर उस कबूतर को एहसास हुआ कि उसे तो पुन उन्मुक्त गगन में उड़ने का अवसर मिल रहा है. वह गिरते-गिरते संभलकर जैसे-तैसे उड़ चला. उसकी खुशी का ठिकाना न रहा, जब बगल में देखा कि दूसरा साथी कबूतर भी उड़कर उसके साथ आ मिला था. दोनों कबूतर अभी तक सहमे हुए थे. उनकी उड़ान सामान्य नहीं थी.
थोड़ी देर में सामान्य होने पर उड़ान लेते-लेते एक ने दूसरे से कहा, आदमी को समझना बहुत मुश्किल है. पहले हमें पकड़ा, फिर छोड़ दिया! यदि हमें उड़ने को छोड़ना ही था, तो पकड़कर इतनी यातना क्यों दी? मैं तो मारे डर के बस मर ही चला था.
चुप, बच गए ना आदमी से! बस उड़ चल!

हिंदी दोहे 

हिंदी दोहे बाहर से तो पीटते, सब हिंदी का ढोल ।

अंतस में रखते नहीं, इसका कोई मोल ।।

एक बरस में आ गई, इनको हिंदी याद ।

भाषण-नारे दे रहे, दें ना पानी-खाद ।।

अपनी मां अपनी रहे, इतना लीजे जान ।

उसको मिलना चाहिए, जो उसका सम्मान ।।

हिंदी की खाते रहे, अंग्रेजी से प्यार ।

हिंदी को लगती रही, बस अपनों की मार ।।

हिंदी को मिलते रहे, भाषण-नारे-गीत ।

पर उसको तो चाहिए, तेरी-मेरी प्रीत ।।

सुन! हिंदी में बोल तू, कर कुछ ऐसा काम ।

दुनियाभर में हिंद का, होवे ऊंचा नाम ।।

हिंदी में मिलती हमें, ‘रोहित’ बड़ी मिठास ।

इससे सुख मिलता हमें, सबसे लगती खास ।।

खुसरो के अच्छे लगें, ‘रोहित’ हिंदवी गीत ।

मीरा-तुलसी-सूर से, लागी हमको प्रीत ।।

रोहित कुमार ‘हैप्पी’ 

(संपादक- भारत दर्शन, न्यूज़ीलैंड)

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कविता- तीन तलाक़ एक अभिशाप! (Kavita- Teen Talak Ek Abhishap)

Kavita Teen Talak Ek Abhishap

Kavita Teen Talak Ek Abhishap

गड़ा हुआ सीने पे कब से पत्थर तीन तलाक़ का
क्यों नहीं गिरने देती तुम, पाखंड निरे नकाब का

बुरखे के भीतर से दो आंखें करती रही सवाल
बेमोल हो गया है जीवन सारा, कर लो अब ख़्याल

जिसने छीन ली आज़ादी तेरी, तुझको औरत जान
क्यों करती हो ऐसे पाखंडी मौलवियों का मान

आगे आओ बोलो जूझो, कर लो ख़ुद को आज़ाद
तुम भी तो भारतवासी हो, छेड़ो गहन गरजता नाद

गूंज उठे सारे जग में, मांगों हर औरत का मान
सबक सीखा दो उनको, भूले तीन तलाक़ का मान…

कंचन देवड़ा

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कविता- आशा-निराशा (Kavita- Aasha-Nirasha)

Kavita, Aasha-Nirasha

Kavita, Aasha-Nirasha

मैं, मेरा व्याकुल मन, जब रात देर तक जाग रहे थे
इक मुट्ठी भर आसमान, हम हसरत से ताक रहे थे

तभी उठी लेखनी मेरी, अपने नन्हें कोमल पंख पसार
उड़ चली सब बंधन तोड़, उस निस्सीम गगन के पार

डर और आलस त्यागा तो, चाँद और तारे दोस्त बने
उजालों को ज़मी पर ले आई, वो चीर कर बादल घने

यारों हम सबकी अकुला में, हुनर की आतिश सोती है
ये मशाल न बन जाए, तक़दीरों की साजिश होती है

ये साजिशें हम अपने, संकल्प से ही झुठला सकते
छोड़ निराशा खुशियों को, मन की राह बता सकते

भावना प्रकाश

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ग़ज़ल- रेत पे लिखती रही, मिटाती रही, वो तेरा नाम था (Gazal- Ret Pe Likhti Rahi, Mitati Rahi, Woh Tera Naam Tha…)

Gazal, Ret Pe Likhti Rahi, Mitati Rahi, Woh Tera

Gazal, Ret Pe Likhti Rahi, Mitati Rahi, Woh Tera

रेत पे लिखती रही, मिटाती रही, वो तेरा नाम था
रातभर जिसे दिल गुनगुनाता रहा, वो तेरा नाम था…

रूह में उतर गए हो सुकून बनकर
तेरी नज़रों ने छू लिया मुझे चंदन बनकर

सांसों में बस गए हो मेरी नज़्म बनकर
तेरी ख़ुशबू ने भर दिया है मुझे धड़कन बनकर

रेत पे लिखती रही, मिटाती रही, वो तेरा नाम था
रातभर जिसे दिल गुनगुनाता रहा, वो तेरा नाम था…

ख़ूबसूरत हूं, तेरी नज़रों ने माना है मुझे
मैं ज़िंदा हूं, तूने ज़िंदगी से मिलाया है मुझे

ख़्वाबों का नहीं, ख़ुश्क रेत का समंदर था भरा
ख़्वाब देकर तुमने, फूलों के रंग से सजाया है मुझे

रेत पे लिखती रही, मिटाती रही, वो तेरा नाम था
रातभर जिसे दिल गुनगुनाता रहा, वो तेरा नाम था…

 

 

 

 

कंचन देवड़ा

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कविता- दोहरे मापदंड (Kavita- Dohare Mapdand)

Kavita, Dohare Mapdand

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       कंचन देवड़ा

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याद आओगे तुम… (Yaad Aaoge Tum…)

Yaad Aaoge Tum

Yaad Shayari

                                                            – ख़ुशबू यादव

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