Geet

द्रौपदी

स्वयंवर

मैं अग्निसुता, मैं स्वयंप्रभा

मैं स्वयं प्रभासित नारी हूं

मैं यज्ञ जन्मा, और पितृ धर्मा

नहीं किसी से हारी हूं

हे सखे बताओ किंचित ये

क्यों हलचल सी मेरे मन में है?

वरण करूं मैं जिसका क्या

ऐसा कोई इस जग में है?

कैसे चुनूंगी योग्य पति

कैसे मैं उसे पहचानूंगी?

गर मेरे योग्य नही है वो,

तो कैसे मैं ये जानूंगी,

मेरे तेज को क्या कोई

सामान्य जन सह पाएगा

फिर सिर्फ़ निशाना साध मुझे

कोई कैसे ले जाएगा?

हे प्रभु, कहा है सखा मुझे

तो सखा धर्म निभाना तुम

क्या करूं क्या नहीं

सही राह दिखलाना तुम!..

bhavana prakaash
भावना प्रकाश

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Kavita-

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
रिमझिम फुहारों ने मौसम को आशिक़ाना बनाया है

ठंडी बयार कर रही आलिंगन मेरा
लगता है बिछड़ा मीत कोई मुझसे मिलने आया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
ओढ़ इंद्रधनुषी चूनर आसमान ने किया श्रृंगार

मन मयूर भी नाच रहा जब बूंदों ने सुनाई मधुर झंकार
ऐसा लगा मानो कोई सोए अरमान जगाने आया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
चंचल मन सी चंचल बूंदें हलचल सी पैदा करती है

गिली मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू मन में मदहोशी सी भर देती है
ऐसा लगता है दिल के साजों को बूंदों ने मधुर संगीत से सजाया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है…

सारिका फलोर

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Kavya

एक चुप होती हुई स्त्री कहती है बहुत कुछ…

तुलसी जताती है नाराज़गी
नहीं बिखेरती वो मंजरी
सारी फुलवारियां गुमसुम हो जाती हैं
घर की
कनेर.. सूरजमुखी..
सबके चेहरे नहीं दिखते
पहले जैसे
छौंका-तड़का हो जाता है और भी तीखा
रसोईघर में
नहीं मोहती ज़्यादा
भीने पकवानों की ख़ुशबू
और..
दूध उफन बाहर आता है रोज़

एक चुप होती हुई स्त्री..
मानो पृथ्वी का रुके रह जाना
अपनी धुरी पर

एक चुप होती हुई स्त्री..
लांघती है मन ही मन
खोखले रिश्तों की दीवारें
और प्रस्थान कर जाती देहरी के बाहर
बिना कोई आवाज़ किए हुए ही

एक चुप होती हुई स्त्री..
और भी बहुत कुछ सोचती है
वह ‘आती’ तो है
हां, उसे आना ही पड़ता है
पर, वह फिर कभी नहीं लौटती
पहले की तरह…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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Kavya

लिखा था धड़कते दिल से
और दिया था कांपते हाथों से
मैंने नजरें ज़मीन में ही गड़ा रखी थी
फिर भी पढ़ ली थी
तुम्हारी आंखों में प्रत्त्युत्तर की आस
उम्मीद की डोरियों में उलझी
मनाही की आशंका भी
देख ली थी
जितने धड़कते दिल से तुमने लिखा होगा
उतने ही धड़कते दिल से मैंने पढ़ा था
कई-कई बार पढ़ा
सांसों के आवेग के बीच
धड़कनों की आवाज़ दबाकर
कि कहीं कोई सुन न ले
प्रेम को मुखरित होते हुए
एक काग़ज़ के टुकड़े पर
तब तकिए के नीचे से
शब्द-शब्द प्रेम आता रहा सपनों में
छूता रहा होंठों को
चलता रहा साथ में
कॉलेज के रास्ते भर, क्लास में
और घर पर, बहता रहा रगों में
और आज तक बह रहा है
सुनो वो तुम्हारा प्रेम पत्र
आज भी तकिए के नीचे
महक रहा है…

Dr. Vinita Rahurikar
डॉ. विनीता राहुरीकर

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जिस दिन
तमन्ना बड़ी और
हौसला छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
राजनीति बड़ी
और दोस्ती छोटी हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन रिश्ते में
अहंकार बड़ा
और प्यार छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
दौलत बड़ी
और आदमी छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन काम बड़ा
और उसे करनेवाले छोटे हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
सरहद बड़ी
और बलिदान छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
दिमाग़ बड़ा
और दिल छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम…

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Kavya

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आज के हालातों में
हर कोई ‘बचा’ रहा है कुछ न कुछ
पर, नहीं सोचा जा रहा है
‘प्रेम’ के लिए
कहीं भी..

हां, शायद
‘उस प्रलय’ में भी
नाव में ही बचा रह गया था ‘कुछ’
कुछ संस्कृति..
कुछ सभ्यताएं..
और
.. थोड़ा सा आदमी!

प्रेम तब भी नहीं था
आज भी नहीं है
.. वही ‘छूटता’ है हर बार
हर प्रलय में
पता नहीं क्यों…

Hindi Kavita
Namita Gupta
नमिता गुप्ता

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सांस, ख़ुशबू गुलाब की हो

धड़कन ख़्वाब हो जाए

उम्र तो ठहरी रहे

हसरत जवान हो जाए

बहार उतरे तो कैमरा लेकर

तेरी सूरत से प्यार ले जाए

जो नाचता है मोर सावन में

तेरी सीरत उधार ले जाए

लहर गुज़रे तेरे दर से तमन्ना बनकर

तेरे यौवन का भार ले जाए

आज मौसम में कुछ नमी उतरे

तेरी परछाईं बहार ले जाए

रात ख़ामोश हो गई क्यूं कर

अपना सन्नाटा चीर दे बोलो

तेरी आंखों से प्यार ले जाए

ऐ दोस्त ‘तेरी हस्ती’ लिखूं कैसे

फ़क्र हो अगर ‘तुझ पे’

मेरी हस्ती निसार हो जाए…

– शिखर प्रयाग

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Kavya

वह स्त्री..
बचाए रखती है कुछ ‘सिक्के’
पुरानी गुल्लक में
पता नहीं कब से
कभी खोलती भी नहीं
कभी-कभार देखकर हो जाती है संतुष्ट

वह स्त्री..
बचाए रखती है कुछ ‘पल’
फ़ुर्सत के
सहेजती ही रहती है
पर, फ़ुर्सत कहां मिलती है
उन्हें एक बार भी जीने की

वह स्त्री..
बचाए रखती है कुछ ‘स्पर्श’
अनछुए से
महसूस करती रहती है
कभी छू ही नहीं पाती
अंत तक

वह स्त्री..
झाड़ती-बुहारती है सब जगह
सजाती है करीने से
एक-एक कोना
सहजे रखती है कुछ ‘जगहें’
आगंतुकों के लिए
पर, तलाशती रहती है ‘एक कोना’
अपने लिए
अपने ही घर में
अंत तक…

Kavita

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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टीवी की गीत या मधुबाला का नाम लेते ही दिल में एक प्यारी सी ख़ूबसूरत छवि उभर आती है और वो है दृष्टि धामी की. लाखों दिलों की धड़कन दृष्टि जितनी ख़ूबसूरत हैं, उतनी ही शरारती भी. आपको शायद पता नहीं होगा कि दृष्टि फिटनेस फ्रीक भी हैं. जी हां, सोशल मीडिया पर योग और वर्कआउट के उनके वीडियोज़ उनके बारे में बहुत कुछ बताते हैं. भले ही फिलहाल वो टीवी से दूर हैं, पर लोगों के दिलों में अपनी एक ख़ास जगह बनानेवाली दृष्टि के बारे में ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जिनके बारे में आपको पता नहीं होगा.

Drashti Dhami

10 जनवरी, 1985 को मुंबई के एक गुजराती परिवार में जन्मीं दृष्टि परिवार की बेहद लाडली बेटी हैं. दृष्टि का परिवार उन्हें लेकर काफ़ी प्रोटेक्टिव हैं. उनके परिवार की सोच काफ़ी रूढ़िवादी है, इसलिए इंडस्ट्री में आने के लिए उन्हें काफ़ी स्ट्रगल करना पड़ा.

एक इंटरव्यू के दौरान दृष्टि ने बताया था कि जब पहली बार उन्हें एक म्यूज़िक वीडियो में काम करने का मौका मिला, तो उन्हें परिवार के 10 लोगों से इसके लिए इजाज़त मांगनी पड़ी थी. यहां तक कि नज़दीकी रिश्तेदारों को भी
मनाना पड़ा था. ऐसे में मेरी कज़िन ने मेरा साथ दिया, तभी मैं इस इंडस्ट्री का हिस्सा बन पाई.

Drashti Dhami

मुंबई के मीठीबाई कॉलेज से समाजशास्त्र में डिग्री लेनेवाली दृष्टि ने शुरुआती दिनों में बतौर डांस इंस्ट्रक्टर कुछ दिन काम किया था.

आपको शायद पता नहीं होगा कि टीवी एक्ट्रेस सुहासी धामी दृष्टि की भाभी हैं. दोनों की बॉन्डिंग को देखकर सभी को यही लगता है कि ये सहेलियां हैं.

Drashti Dhami

करियर की शुरुआत दृष्टि ने म्यूज़िक वीडियोज़ से की थी. सइयां दिल में आना रे, हमको आज कल है, तेरी मेरी नज़र की डोरी जैसे म्यूज़िक वीडियोज़ में नज़र आनेवाली दृष्टि को टीवी पर पहला रोल शो दिल मिल गए में बतौर डॉ. मुस्कान मिला था.

इसके बाद दृष्टि को उनका पहला लीड रोल 2010 में गीत हुई सबसे पराई में बतौर गीत मिला. इस शो ने गीत यानी दृष्टि धामी को घर घर में पॉप्युलर बना दिया. मान सिंह खुराना और गीत की नोंक-झोंक और लव स्टोरी लोगों को काफ़ी पसंद आई थी. गुरमीत चौधरी और दृष्टि धामी की जोड़ी लोगों के दिलों में बस गई.

Drashti Dhami

साल 2012 में मधुबाला- एक इश्क़ एक जुनून सीरियल ने एक बार फिर दृष्टि को एक नई पहचान दी. अब तक गीत के नाम से मशहूर दृष्टि को मधुबाला के रूप में देखना लोगों के लिए बेहद एक्साइटिंग था. विवियन डिसेना के साथ उनकी केमिस्ट्री काफ़ी हिट हुई. घर-घर में मधुबाला की ख़ूबसूरती और अदाकारी पर लोग फ़िदा हो गए. आज भी टीवी की मधुबाला कहते ही लोगों में मन मे दृष्टि की सूरत घूम जाती है.

Drashti Dhami

दृष्टि धामी ने उसके बाद कोरियोग्राफर सलमान यूसुफ़ खान के साथ झलक दिखला जा के छठे सीज़न में हिस्सा लिया और शो की विनर रहीं. डांस में सफलता पाने के बाद दृष्टि ने एक बार फिर टीवी का रुख किया और शो एक था राजा एक थी रानी में गायत्री देवी की भूमिका निभाई.

Drashti Dhami

21 फरवरी, 2015 को दृष्टि ने बिजनेसमैन नीरज खेमका के संग सात फेरे लिए. अपनी शादी को लेकर दृष्टि काफ़ी एक्साइटेड थीं. सोशल मीडिया पर उनकी शादी की तस्वीरें ख़ूब वायरल हुईं. दृष्टि घूमने की भी बेहद शौकीन हैं. अपने दोस्तों के साथ वेकेशन एंजॉय करना उन्हें रिफ्रेश कर देता है.

Drashti Dhami

शादी के बाद उन्होंने अर्जुन बिजलानी के साथ परदेस में है मेरा दिल शो किया. दृष्टि ने ज़्यादातर शोज़ रोमांस की थीम पर बने हुए ही किए हैं. टीवी के रोमांस को उन्होंने एक नई पहचान दी है. प्यार करनेवालों के लिए गीत और मधुबाला का किरदार आज भी दिल के बेहद क़रीब है.

Drashti Dhami

2018 में दृष्टि ने सिलसिला बदलते रिश्तों का शो में घरेलू हिंसा की शिकार महिला का किरदार निभाया. पहली बार उन्होंने रोमांटिक किरदार के अलावा कोई किरदार निभाया था, जिसके लिए उनकी काफ़ी सराहना भी हुई.

Drashti Dhami

दृष्टि को गुरमीत चौधरी और विवियन डिसेना दोनों के ही साथ दृष्टि को बेस्ट जोड़ी का अवॉर्ड मिल चुका है. मधुबाला के लिए दृष्टि को बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला था. फिलहाल टीवी से दूर दृष्टि अपने फिटनेस पर फोकस कर रही हैं. तो आप भी हमें बताएं कि मधुबाला और गीत में से किसकी सूरत आपके दिल मे बसी है, ज़रा हम भी तो जानें आपका फेवरेट कैरेक्टर.

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बरखा रानी लगता है तुम, युगों के बाद आई हो
धरती की प्यास बुझाने, कितनी ठंडक लाई हो

मीठी यादें, अल्हड़ सपने, तुम झोली में भर लाई हो
तपते-जलते आकुल मन में, बनके शांति मुस्काई हो

सूरज की तपिश झेलकर, तुम वाष्प बन जाती हो
फिर अंबर के आंगन में, संगठित हो जाती हो

अपने अस्तित्व को खोकर, सबकी प्यास बुझाती हो
परिवर्तन और त्याग ही जीवन है, ये पाठ पढ़ाती हो

bhaavana prakaash
भावना प्रकाश

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Kavita- Barkha Rani

वृक्षों से ही वन बनते हैं, धरती हरी-भरी करते हैं।
वर्षा के कारण हैं जंगल, जिससे होता सबका मंगल।

वृक्षों बिन क्या जीवन होता, प्राण वायु हर कोई खोता।
काट-काट वृक्षों को ढोता, बिन वर्षा किस्मत को रोता।

जंगल धरती क्षरण बचायें, वर्षा जल भूतल पहुँचायें।
बाढ़ जनित विपदाएं आयें, अपनी करनी का फल पायें।

कितने प्राणी वन में रहते, प्रकृति संतुलन सब मिल करते।
जीव सभी हैं इन पर निर्भर, वनवासी के भी हैं ये घर।

औषधि भोजन लकड़ी देते, नहीं कभी कुछ वापस लेते।
अर्थव्यवस्था इनसे चलती, सारी दुनिया इन पर पलती।

औषधियाँ दें कितनी सारी, हरते हैं हारी बीमारी।
अंग-अंग गुणवान वनों का, संयम से संधान वनों का।

लकड़ी जो पेड़ों से मिलती, आग तभी चूल्हों में जलती।
अब विकल्प इसका आया, हमने नव ईंधन अपनाया।

काष्ठ शिल्प बिन वन कब होता, जीवनयापन साधन खोता।
घर के खिड़की अरु दरवाजे, गाड़ी हल लकड़ी से साजे।

वन की कीमत हम पहचानें, इन पर निर्भर सबकी जानें।
संरक्षण इनका है करना, सदा संतुलित दोहन करना।

काटना तनिक रोपना ज्यादा, करना होगा सबको वादा।
जीवन का आधार यही है, वन संरक्षण लक्ष्य सही है।

प्रवीण त्रिपाठी

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मैं ख्वाब देखता था
तुम ख्वाब हो गए

उम्मीद के शहर में
तुम प्यास हो गए

उम्र मेरी एक दिन
लौट कर के आई

तुम आईने के लेकिन
एहसास हो गए…

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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