Geet

1
वसुदेव चले शिशु शीश धरे, तट तीर-लता हरषाय रहीं।
चम से चमके नभ दामिनियाँ, तम चीरत राह दिखाय रहीं।
तट तोड़ चलीं ‘सरिता’ लहरें, हरि पाद पखारन आय रहीं।
अवलोकत देव खड़े नभ में, कलियाँ बिहँसीं मुसकाय रहीं।

Geet

2
वृषभानु लली सखि संग चली, निज शीश धरे दधि की मटकी l
मग बीच मिले जसुदा ललना, झट से झटकी दधि की मटकी ll
सुन कान्हा हमे नहि भावत है, बरजोरि अरे झटको मटकी l
तुम कोप करो नहि आज सखी, नहि फोर दऊँ तुमरी मटकी ll

Geet

3
तकते-तकते थकतीं अँखियाँ, अबहूँ नहि आवत साँवरिया l
गगरी सरपे रख गोरि चली, अब लागत नाहि गुलेल पिया ll
नहि गूँजत है जमुना तट पे, प्रिय गोपिन की हँसि ओ छलिया l
अब तो विनती सुन लो रसिया, फिर आओ लिए कर बाँसुरिया ll

Geet

– अखिलेश तिवारी ‘डाली’

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बड़ी चीज़ें कहां मांगता हूं
मुझे वक़्त बीतने के बाद भी
बस छोटी-छोटी
चीज़ों से प्यार है

मैं तो बस
वह मांगता हूं
जिन्हें तुम ख़ुश हो कर
आसानी से दे दो

जैसे अपने माथे की वो
छोटी-सी हल्की गुलाबी बिंदी
जो ड्रेसिंग टेबिल के शीशे पे
कई महीनों से चिपकी है

वो नेलपॉलिश, वही थोड़ा बिंदी से
ज़्यादा गुलाबी नज़र आनेवाली
जिसकी डिब्बी अब सूखनेवाली है
मुझे दे दो

अपने कानों के वो बूंदें दे दो
जिसकी एक बाली
टूटने के बाद
तुमने सालों से नहीं पहना है

सुनो वो जो चूड़ियां टूट जाती हैं
जिन्हें करीने से उठा कर तुम
डस्टबिन में फेंक देती हो
मुझे दे दिया करो

हो सके तो अपने हाथों से
उतरी मेहंदी की लोई दे देना मुझे
बहुत प्यार से सोचता हूं इसमें क्या छुपा है
जो तुम्हारी हथेलियों को लाल कर देता है

ऐसे ही ढेर-सी चीज़ें होंगी तुम्हारे पास
कुछ जज़्बात, कुछ बीते लम्हे
कुछ आंसू भी होंगे तुम्हारे पास
हो सके तो मुझे दे देना वह सब
जो तुम्हारे काम नहीं आता

क्या करूंगा मैं?
ज़्यादा तो कुछ नहीं बस
अपनी डायरी के पन्ने पर
सब से ऊपर चिपका दूंगा

इस ढेर सारी
अनमोल दौलत को
जिससे हर पन्ने पर
तुम्हारा अक्स उभर आए

यह जो तुम्हारा स्टेटस है
वहां परियों की तस्वीर लगा दो
अबाउट में थोड़ी-सी
स्माइल भर दो

जानता हूं
जो मांग रहा हूं
यह सब मांगने का
हक़ कहां है मुझे

पर क्या करूं
मैं ऐसा नहीं हूं कि जो कुछ तुम दोगी
उसे यादों की तिजोरी में बंद कर
चुपके से निहारूंगा आंखों में आसूं भरकर

मैं तो इन सब से
ख़ुशहाल ज़िंदगी की
तस्वीर बनाने निकला हूं
जो तुम्हारी स्माइल से पैदा होती है…

– शिखर प्रयाग

Geet

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प्रेम कथाओं के पृष्ठों पर, जब-जब कहीं निहारा होगा
सच मानो मेरी आंखों में केवल चित्र तुम्हारा होगा

कभी याद तो करके देखो, भूले बिसरे चौराहों को
कान लगा कर सुनो कभी, अपने अंतर की चाहों को

कभी अधर तो सौंपे होंगे, अपनी चंदन सी बांहों को
कस्तूरी सी गंध समझ, हर संभव मुझे बिसारा होगा
सच मानो मेरी…

कई बरस तेरे माथे पर रखी मैंने काजल बिंदिया
कहीं उड़ाकर ले जाती थी, इन आंखों से मेरी निंदिया

संभवता कभी लगाई हूं, एकाकी क्षण में वो बिंदिया
क्या हुआ कभी आभास नहीं, यहीं कहीं बंजारा होगा
सच मानो मेरी…

यह सोच खुले ही छोड़ दिए, इस हृदय भुवन के द्वार सभी
कोई कुछ मुझको कहे मगर, भेडूंगी नहीं किवाड़ अभी

वापस लौट गए तुम यदि तो, यह ज्वाला न होगी शांत कभी
आहट-आहट कान लगाए, तुमने मुझे पुकारा होगा
सच मानो मेरी…

अब दूल्हा सा तुम सज धज, खड़े हुए हो इस आंगन में
लगा रहे हो आग और अब, इस रिमझिम-रिमझिम सावन में

और किसी की किन्तु धरोहर, शोभित हो इस मन दर्पण में
‘डाली’ मर्यादित प्रश्नों पर, किंचित नहीं विचारा होगा
सच मानो मेरी आंखों में, केवल चित्र तुम्हारा होगा

प्रेम कथाओं के पृष्ठों पर, जब-जब कहीं निहारा होगा
सच मानो मेरी…

अखिलेश तिवारी ‘डाली’

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एक दिन मैं

अपनी ही धड़कनों से

नाराज़ हो गया

इतनी सी शिकायत लेकर

कि जब तुम

उसके सीने में नहीं धड़क सकती

तो मेरे सीने में धड़कने की

ज़रूरत क्या है

धड़कनों का मज़ा तो तभी है

जब वो महबूब के

दिल में धड़कना जानें

जैसे मेरे दिल में

तड़पती हुई

तुम्हारी धड़कन…

– शिखर प्रयाग

Gazal

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हे प्रभु
जब मैं तुमसे
प्रेम मांगता था
तब तुमने
जीवन के संघर्ष के
रूप में
मुझे युद्ध प्रदान किया
आज मैं जीवन में
विभिन्न अस्त्र शस्त्र
व उनके संचालन की क्षमता में
पारंगत हो चुका हूं
तुम मुझे प्रेम
करने को कहते हो
आख़िर क्यों?
प्रभु मुस्कुराए और बोले
मैं तुम्हें वही दे सकता हूं
जो तुम्हारे पास नहीं है
बचपन में
तुम्हारे पास
जीवन के रणभूमि में
संघर्ष की
क्षमता नहीं थी
और वह मुझे तुम्हें
वरदान स्वरूप
प्रदान करनी पड़ी
आज तुम
युद्ध करते करते
इतनी दूर निकल आए हो
कि प्रेम भूल गए हो
सो तुम्हें मानवता से
प्रेम करने का वरदान
दे रहा हूं
एक बात और
तुम्हारी मांग
और मेरे प्रतिदान में
थोड़ा सा अंतर है
तुम बचपन में
व्यक्तिगत प्रेम में जीना
और सामाजिक संघर्ष
में निर्वाण चाहते थे
जबकि उस बिंदु पर संघर्ष
के व्यक्तिगत होने की आवश्यकता थी
अर्थात
संघर्षमय जीवन
तुम्हारे लिए
आवश्यक था
आज तुम
शक्ति के दुरुपयोग हेतु
व्यक्तिगत युद्ध
चाहते हो
और मैं तुम्हें
बचाने के लिए
सामाजिक प्रेम
प्रदान कर रहा हूं
बचपन में तुम्हें प्रेम
प्रदान करता
और आज तुम्हें युद्ध
प्रदान करता
तो तुम
भस्मासुर बन जाते
मानव नहीं…

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Poetry

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तेरी आंखों से कब राहों का उजाला मांगा
अपनी आंखों में बस थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

सदियों से इस जहां में इश्क़ इक गुनाह ठहरा
ज़ुल्फ़ों की छांव में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

खुदा ने तिल तेरे चेहरे को नज़र कर रखा है
अपने पहलू में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

रस्मों-रिवाज दुनिया के पत्थरों के साये हैं
अपने ख़्वाबों तले मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

हर तरफ़ मौत के सायों के खौफ़ फैले हैं
दिल मे रख ले मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे

पीरो दरगाह जा के एक दुआ मांगी है
अपनी तमन्ना में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

ज़िंदगी बस ज़िंदगी है ज़िंदगी से क्या मांगूं
अपने साये में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे…

शिखर प्रयाग

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Gazal

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जैसे लौट आती हैं चिड़ियां
दिनभर की उड़ान के बाद
थकी-हारी
वापस घोंसलों में

जैसे लौट आते हैं बीज
ओढ़े हुए
अनंत संभावनाओं के कवच को
हरियाली के सफ़र के बाद
चुपचाप
सूखे हुए फूलों में

जैसे लौट आती हैं बारिशें
समेटे हुए
तमाम नदियों को
और उड़ेल देती हैं
अपना सर्वस्व
जी भर
रेगिस्तानों में

जैसे लौट आता है प्रेम
बगैर ही किसी
मिलने-बिछुडने की शर्तों के साथ
अनसुना करते हुए
सारी नसीहतें
ग्रह-नक्षत्रों की
सुनते हुए सारी फटकारें
जन्म-जन्मांतरों की

सुनो,
लौट आएंगे हम-तुम भी
घोंसलों में
चिड़ियां की तरह ,
बीजों में
फूलों की तरह
रेगिस्तानों में
बारिशों की तरह
एक-दूसरे की कविताओं में
ठीक प्रेम की ही तरह…

नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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Kavya-

मनमुटाव तो शुरुआत से ही रहा
इसीलिए खींच दी गई
लक्ष्मण-रेखाएं
ईश्वर को ढूंढ़ा गया
उससे मिन्नतें-मनुहार की
फ़ैसला तब भी न हुआ

तब..
धर्मों को गढ़ा
जातियों को जन्म दिया
परंपराओं की दुहाई दी
बंटवारा किया गया सभ्यताओं का भी
और
मनुष्यता कटघरे में ही रही

आरोप-प्रत्यारोप किए
ईश्वर को दोषी करार दिया गया
कभी प्रश्न उठाए गए
उसके होने-न होने पर भी
इसीलिए
स्वयं को भी ईश्वर घोषित किया
समस्याएं जस की तस

सुनो,
ईश्वर की खोज जारी है…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Kavya

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Kavita

वस्त्रहरण

दौपदी का, हुआ था युगों पहले

धृतराष्ट्र के

द्यूत क्रीड़ागृह में

युगों के प्रवाह में नष्ट नहीं हुआ वो

द्यूत क्रीड़ागृह

अपितु इतना फैला

इतना फैला कि आज समूचा देश ही

बन गया है

द्यूत क्रीड़ागृह

दाँव पर लगती है

हर मासूम लड़की की ज़िंदगी

जिसने किया है गुनाह

सपने देखने का

किया है गुनाह

युगों के संवेदनहीन अंधत्व पर हंसने

और

अपनी शर्तों के साथ आत्मनिर्भर जीवन जीने का

युगों पहले कहा था

भीष्म ने सिर झुकाकर अग्निसुता से

धर्म की गति अति सूक्ष्म होती है पुत्री

नहीं है प्रावधान

धर्म में

रोकने का दुःशासन के हाथ

और मैं हूँ बंधा धर्म के साथ

विवश हूँ, क्षमा करो

और आज फिर वही

अनर्गल, नपुंसक विवशता

क़ानून की

मैं विवश हूँ, बंधा हूँ क़ानून के साथ

नहीं रोक सकता किसी नाबालिग के हाथ

पिंजरे में हैं मेरे अधिकार

और

वो है स्वतंत्र करने को, नृशंसता के सभी हदें पार

अभिभावकों, मंच पर आओ

‘ओ री चिरैया’ के गीत गाओ,

और दो आँसू बहाकर

घर जाकर

अपने आँगन की चिरैया के पर कतरकर

कर दो उसे पिंजरे में बंद

क्योंकि हम हैं विवश

अपराधियों को सड़कों पर

विचरने देने को स्वच्छंद

तो क्या

इक क्रांति युग में लाने की

सैलाब दिलों में उठाने की

अथक यात्रा ख़त्म हुई?

टूटी सारी आशाएँ?

मिट गए सभी भ्रम?

नहीं, नहीं, हम अग्निसुता, हम भैरवी

हम रणचंडी, हम माँ काली

हम इतने कमज़ोर नहीं

अभी नहीं मिटा है एक हमारा

उस परमशक्ति पर दृढ़ विश्‍वास

सह लेंगे हम उसी भरोसे

और कुछ वर्षों का वनवास

बाधा, विघ्नों में तप-तपकर

आत्मशक्ति को और प्रखरकर

पाएंगे हम पात्रता

हो उस महाशक्ति के हाथ हमारे रथ की डोर

फिर जोड़ेंगे महासमर

फिर होगा विप्लव गायन

देंगे फिर युग को झकझोर

शर शैया पर लेटेगा ही

इक दिन ये जर्जर क़ानून

मिटाने को अंधी संवेदनहीनता

जब होगा हर इक दिल में जुनून

लचर न्याय व्यवस्था को

जगत से जाना ही होगा

हम सबको संगठित तपस्या कर

नवयुग को लाना ही होगा…

bhavana prakash
भावना प्रकाश

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Hindi Poems

प्रकृति प्रेम…

Kavita

अभी तलाश रही हूं कुछ पीले शब्द
कि एक कविता लिखूं
पीली सी
ठीक उस पीली सोच वाली लड़की के जैसी
भीगती हुई
पीली धूप में तर-बतर
बटोरती हुई सपनों में
गिरे पीले कनेर
जो नहीं जानती फूल तोड़ना
घंटों बतियाती है जो चुपचाप
पीले अमलतास से
निहारा करती है रोज़
रिश्तों के पीले सूरजमुखी…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Kavita

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द्रौपदी

स्वयंवर

मैं अग्निसुता, मैं स्वयंप्रभा

मैं स्वयं प्रभासित नारी हूं

मैं यज्ञ जन्मा, और पितृ धर्मा

नहीं किसी से हारी हूं

हे सखे बताओ किंचित ये

क्यों हलचल सी मेरे मन में है?

वरण करूं मैं जिसका क्या

ऐसा कोई इस जग में है?

कैसे चुनूंगी योग्य पति

कैसे मैं उसे पहचानूंगी?

गर मेरे योग्य नही है वो,

तो कैसे मैं ये जानूंगी,

मेरे तेज को क्या कोई

सामान्य जन सह पाएगा

फिर सिर्फ़ निशाना साध मुझे

कोई कैसे ले जाएगा?

हे प्रभु, कहा है सखा मुझे

तो सखा धर्म निभाना तुम

क्या करूं क्या नहीं

सही राह दिखलाना तुम!..

bhavana prakaash
भावना प्रकाश

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Kavita-

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
रिमझिम फुहारों ने मौसम को आशिक़ाना बनाया है

ठंडी बयार कर रही आलिंगन मेरा
लगता है बिछड़ा मीत कोई मुझसे मिलने आया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
ओढ़ इंद्रधनुषी चूनर आसमान ने किया श्रृंगार

मन मयूर भी नाच रहा जब बूंदों ने सुनाई मधुर झंकार
ऐसा लगा मानो कोई सोए अरमान जगाने आया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
चंचल मन सी चंचल बूंदें हलचल सी पैदा करती है

गिली मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू मन में मदहोशी सी भर देती है
ऐसा लगता है दिल के साजों को बूंदों ने मधुर संगीत से सजाया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है…

सारिका फलोर

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Kavya
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