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फीमेल सेक्सुअलिटी को लेकर कितने मैच्योर हैं हम? (Female Sexuality And Indian Society)

हम सोचते हैं कि व़क्त तेज़ी से बदल रहा है, लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? अगर हम यह मान भी लें कि व़क्त बदल रहा है, लेकिन व़क्त के साथ क्या हम भी उतनी ही तेज़ी से बदल रहे हैं? विशेषज्ञों की मानें, तो जिस तेज़ी से भारतीय समाज बदल रहा है, उतनी तेज़ी से लोग, उनकी सोच और हमारा पारिवारिक व सामाजिक ढांचा नहीं बदल रहा. यही वजह है कि महिलाओं की सेक्सुअलिटी को लेकर आज भी हमारा समाज परिपक्व नहीं हुआ है.स़िर्फ समाज ही नहीं, महिलाएं ख़ुद भी अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर मैच्योर नहीं हुई हैं.

Female Sexuality And Indian Society

– आज भी महिलाएं सेक्स शब्द के इस्तेमाल से बचना चाहती हैं.

– वो अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर कुछ नहीं बोलतीं.

– ख़ासतौर से अपनी शारीरिक ज़रूरतों को लेकर, सेक्स की चाह को लेकर भी वो कुछ भी बोलने से कतराती हैं.

– वो भले ही अपनी चाहत को कितना ही दबाकर रखें, लेकिन इस बात को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि उनमें भी पुरुषों के समान, बल्कि पुरुषों से भी अधिक सेक्सुअल डिज़ायर होती है.

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क्या वजह है?

– सबसे बड़ी वजह है हमारा सामाजिक व पारिवारिक ढांचा.

– महिलाओं को इस तरह ट्रेनिंग दी जाती है कि वो सेक्स को ही ग़लत या गंदा समझती हैं.

– यहां तक कि अधिकांश भारतीय पुरुष यह मानकर चलते हैं कि महिलाएं ‘एसेक्सुअल जीव’ हैं यानी उनमें सेक्स की चाह नहीं होती, बल्कि जब उनका पति उनसे सेक्स की चाह रखे, तब ख़ुद को समर्पित कर देना उनका कर्त्तव्य होता है.

– यही वजह है कि उनका मेल पार्टनर उनकी संतुष्टि से अधिक अपनी शारीरिक संतुष्टि पर ध्यान देता है.

– सेक्स को लेकर ये जो अपरिपक्व सोच है, उसी वजह से शादी के बाद भी अधिकतर महिलाएं ऑर्गेज़्म का अनुभव नहीं कर पातीं, क्योंकि उनका पार्टनर इसे महत्वपूर्ण ही नहीं समझता.

– सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि वेे अपने पति से अपनी संतुष्टि की बात तक नहीं कर पातीं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं इससे उनके चरित्र पर तो उंगलियां उठनी शुरू नहीं हो जाएंगी.

अच्छी लड़कियां कैसी होती हैं?

– हमारे समाज में यही धारणा बनी हुई है कि अच्छी लड़कियां सेक्स पर बात नहीं करतीं. बात तो क्या, वो सेक्स के बारे में सोचती तक नहीं.

– अच्छी लड़कियां सेक्स में पहल भी नहीं करतीं.प वो अपने पार्टनर से अपनी संतुष्टि की डिमांड नहीं कर सकतीं.

– अच्छी लड़कियां अपने पति के बारे में ही सोचती हैं. उसका सुख, उसकी संतुष्टि, उसकी सेहत… आदि.

– शादी के बाद उनके शरीर पर उनके पति का ही हक़ होता है. ऐसे में अपने शरीर के बारे में, अपने सुख के बारे में सोचना स्वार्थ होता है.

– अच्छी लड़कियां सेक्स को लेकर फैंटसाइज़ भी नहीं करतीं.

– अच्छी लड़कियां मास्टरबेट नहीं करतीं.

– अच्छी लड़कियां शादी से पहले सेक्स नहीं करतीं.

– उनकी सोच होती है कि उन्हें अपनी वर्जिनिटी अपने पार्टनर के लिए बचाकर रखनी चाहिए.

– अच्छी लड़कियां मेडिकल स्टोर से कंडोम्स नहीं ख़रीदतीं.

– वो अपने वेजाइनल हेल्थ के बारे में बात नहीं करतीं. उन्हें हर चीज़ छुपानी चाहिए, वरना उन्हें इज़्ज़त नहीं मिलेगी.

– अच्छी लड़कियां हमेशा अच्छे कपड़े पहनती हैं. वो छोटे कपड़े नहीं पहनतीं और सिंपल रहती हैं.

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Female Sexuality And Indian Society

क्या असर होता है?

– महिलाएं अपनी इंटिमेट हाइजीन पर बात नहीं करतीं, जिसके कारण कई तरह के संक्रमण का शिकार हो जाती हैं.

– पार्टनर को भी कंडोम यूज़ करने के लिए नहीं कह पातीं.

– कंट्रासेप्शन के बारे में भी पार्टनर को नहीं कहतीं, वो ये मानकर चलती हैं कि ये तमाम ज़िम्मेदारियां उनकी ही हैं.

– इन सबके गंभीर परिणाम हो सकते हैं, लेकिन फिर भी हमारा समाज सतर्क नहीं होना चाहता, क्योंकि सेक्स जैसे विषय पर महिलाओं का खुलकर बोलना हमारी सभ्यता व संस्कृति के ख़िलाफ़ माना जाता है.

क्या सचमुच बदल रहा है इंडिया?

– बदलाव हो रहे हैं, यह बात सही है, लड़कियां अब बोल्ड हो रही हैं.

– सेक्स पर बात करती हैं, मेडिकल स्टोर पर जाकर कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स या कंडोम भी ख़रीदती हैं… लेकिन यहां हम बात महिलाओं के बदलाव व परिपक्वता की नहीं कर रहे, बल्कि उनके इस बोल्ड अंदाज़ पर समाज की परिपक्व सोच की बात कर रहे हैं.

– क्योंकि पीरियड्स तक पर बात करना यहां बेशर्मी समझा जाता है, सेक्स तो दूर की बात है.

– हमारे समाज में आज भी लिंग आधारित भेदभाव बहुत गहरा है. शादी से पहले भी और शादी के बाद भी हम पुरुषों के अफेयर्स को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन स्त्री के विषय में हम उसे घर की इज़्ज़त, संस्कार व चरित्र से जोड़कर देखते हैं.

– जबकि सच तो यही है कि जो चीज़ ग़लत है, वो दोनों के लिए ग़लत है.

– अगर कोई लड़की छेड़छाड़ का शिकार होती है, तो आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो छेड़छाड़ के लिए लड़कों की बुरी नियत को नहीं, बल्कि लड़की को ही दोषी ठहराते हैं. कभी उनके कपड़ों को लेकर, तो कभी उनके रहन-सहन व बातचीत के तरीक़ों पर तंज कसकर.

– अगर कोई युवती शादी से पहले प्रेग्नेंट हो जाती है, तो सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दी जाती है, लेकिन उन पुरुषों का क्या, जो शादी से पहले और बाद में भी कई महिलाओं के साथ संबंध बनाते हैं और यहां तक कि उन्हें यूज़ करते हैं, प्रेग्नेंट करते और फिर छोड़ देते हैं, क्योंकि उनकी भी यही धारणा होती है कि शादी से पहले जिस लड़की ने हमारे साथ सेक्स कर लिया, वो पत्नी बनाने के लायक नहीं होती, क्योंकि वो तो चरित्रहीन है.

– आज भी हमारा समाज महिलाओं को समान स्तर के नागरिक के रूप में नहीं स्वीकार पा रहा.

– यही वजह है कि जब भी महिलाओं पर कोई अपराध होता है, तो उसका दोष भी महिलाओं के हावभाव और कपड़ों को दिया जाता है, न कि अपराधी की ग़लत सोच को.

– यह बात दर्शाती है कि हम फीमेल सेक्सुअलिटी को लेकर आज भी कितने अपरिपक्व हैं.

– गीता शर्मा 

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एक्सक्लूसिव बुनाई डिज़ाइन्स- गर्ल्स गैंग (Exclusive Bunai Designs- girls gang)

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चेरी गार्डन 

सामग्रीः 300 ग्राम ब्लू रंग का ऊन, 25-25 ग्राम गहरा गुलाबी व हरा ऊन, सलाइयां.

विधिः आगे-पीछे का भागः ब्लू रंग से 80-80 फं. डालकर 2 फं. सी. 2 उ. की रिब बुनाई में 3 इंच का बॉर्डर बुनें. अब 10 इंच सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में बुनें. अब चित्रानुसार गुलाबी, हरे व ब्लू रंग से 1-1 उल्टी धारी बुनें. आगे के भाग में गोल गला घटाएं. कंधे जोड़कर गले की पट्टी बुनें.

आस्तीनः 50-50 फं. डालकर बॉर्डर बुनें. अब बीचोंबीच एक चेरी, 2 ब्लू से सी., 2 गुलाबी से उ., एक और चेरी, शेष फं. ब्लू से सादे ही बुनें. इसी तरह बुनते हुए 18 इंच लंबी आस्तीन बुनें. हर 5वीं सलाई में दोनों तरफ से 1-1 फं. बढ़ाती जाएं. स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

 

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प्रिंसेस लुक

सामग्रीः 200 ग्राम स्काई ब्लू रंग का ऊन, 25-25 ग्राम हरा, क्रीम और पिंक ऊन, सलाइयां.

विधिः आगे का भागः 90 फं. स्काई ब्लू रंग से डालकर 1 फं. सी. 1 उ. की रिब बुनाई में बॉर्डर बुनें. सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई करते हुए चित्रानुसार सभी रंगों की बर्फी बुनें. 14 इंच लंबाई हो जाने पर मुड्ढे घटाएं. 2 इंच और बुनने के बाद गोल गला घटाएं.
पीछे का भागः 90 फं. डालकर स्काई ब्लू रंग से बॉर्डर बुनें. फिर स्काई ब्लू से ही सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में बुनें. कंधे जोड़कर गले के फं. उठाएं और डबलपट्टी बुन लें.

आस्तीनः 50-50 फं. डालकर बॉर्डर बुनें. 7 इंच बुनने के सभी रंगों की बर्फी बुनते हुए 17 इंच लंबा बुनें. हर 5वीं सलाई में दोनों किनारों पर 1-1 फं. बढ़ाती जाएं.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

 

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डिज़ाइनर लुक

सामग्रीः 300 ग्राम ग्रे रंग का ऊन, 25-25 ग्राम बैंगनी, मेहंदी, पिंक और मस्टर्ड ऊन, सलाइयां.

विधिः पीछे का भागः 90 फं. डालकर 1 फं. सी. 1 उ. की बुनाई में बॉर्डर बुनें. सीधी-उल्टी सलाई की बुनाई में 15 इंच लंबा बुनें. मुड्ढे घटाएं. 7 इंच और बुनें.

आगे का भागः 90 फं. डालकर 1 फं. सी. 1 उ. की रिब बुनाई में बॉर्डर बुनें. अब चित्रानुसार 2-2 रंगों की बेलें बुनें. मुड्ढे व वी आकार में गला घटाएं. कंधे जोड़कर गले व मुड्ढे के फं. उठाएं. पट्टियां बुन लें.
स्वेटर के सभी भागों को जोड़कर सिल लें.

पीरियड्स- गर्व से कहिए ये दाग़ अच्छे हैं (Periods- say proudly that you are in these days)

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आज तो पार्टी में सब मुझे ही देखेंगे, डीजे फ्लोर पर डांस करके मैं सबको आउट कर दूंगी, मेरी ऑफ व्हाइट फ्लोरलेंथ ड्रेस मुझे अट्रैक्शन ऑफ पार्टी बना देगी… न जाने ऐसी कितनी बातें आप भी सोचती होंगी और इस सोच से ख़ुद को सातवें आसमान पर पाती होंगी, लेकिन बिना बताए डेट से पहले आकर पीरियड आपकी सारी ख़ुशियों और सपनों पर पानी फेर देता है. एक पल में ऐसा लगता है कि आप तो कहीं की नहीं रहीं. बस अब सारा प्लान फुस हो गया. आख़िर ऐसा क्यों?

दुश्मन नहीं दोस्त समझें
अगर सीरियस होना ही है, तो इस बात को लेकर होइए कि यह एक चीज़ है, जो हर माह आपके साथ होती है. तो ऐसे में इसे दुश्मन मानने की बजाय अगर दोस्त बना लें, तो कैसा रहेगा? गुड आइडिया न. यस बोर, उदास और आगे के जीवन में ख़ुशियों के पल बिखेरनेवाले पीरियड्स को अपना दुश्मन नहीं बेस्ट फ्रेंड समझें.

ये दाग़ सच में अच्छे हैं
चॉकलेट खाते हुए जब मेल्टेड चॉकलेट आपकी ड्रेस पर गिर जाती है, तब तो आप उसे बड़ी नज़ाकत से अपनी उंगली से धीरे से पोंछती हैं. कितनी लड़कियां, तो चॉकलेट का एक टुकड़ा या एक बूंद भी ज़ाया नहीं करना चाहतीं. हद तो तब हो जाती है, जब अपनी सहेलियों को ब्रैंडेट आइस्क्रीम, चॉकलेट के दाग़ दिखाकर ख़ुद का रेपो रेट बढ़ाने से पीछे नहीं हटतीं. ऐसे में अगर पीरियड्स के दाग़ लग जाते हैं, तो उन्हें छपाने या किसी के पूछने पर इतना क्या शर्माना या ख़ुद को गिल्ट फील करवाना, जैसे कि कोई पाप कर दिया हो! अपनी इस मेंटैलिटी को बदलिए. ये आप भी जानती हैं कि पीरियड्स आपकी आगे की लाइफ के लिए कितना ज़रूरी है. ऐसे में अगर दाग़ कभी लग भी जाए, तो गर्व से कहिए- यस आई एम इन पीरियड्स.

छुपाएं नहीं, बिंदास कहें
नो यार आई कान्ट कम, कहा न मैं नहीं आ सकती, मैं पूजा में नहीं बैठ सकती, जैसी आदि बातें बनाने की कोई ज़रूरत नहीं. यह आपकी लाइफ का एक अहम् हिस्सा है. इसे खुलकर एंजॉय करें. किसी तरह का बहाना बनाने की बजाय, बिंदास कहें कि मंथ का बेस्ट फेज़ चल रहा है, क्योंकि आपका पीरियड्स आ गया है.

बेफिक्र होकर हर पल को करें एंजॉय
पार्टी, फंक्शन, गेट-टु-गेदर, फैमिली गैदरिंग, जैसे आदि मौक़ों को गंवाने की बजाय खुलकर जिएं. इस पीरियड्स को हौवा न बनाएं. इस किसी तरह का इशू न बनाएं. बेफिक्र होकर अपने हर मोमेंट को जिएं.

सिंगल नहीं मिंगल रहें
क्या आप भी उन लड़कियों में से हैं, जो पीरियड्स के दौरान दूसरों से ख़ुद को अलग कर लेती हैं, घर में किसी कमरे में पड़ी रहना ज़्यादा ज़रूरी समझती हैं, तो अब ट्रेंड है बदलने का मैडम. अब तो लड़कियां पीरियड्स की फोटोज़ को सोशल साइट्स पर भी पोस्ट करने से नहीं कतरातीं. और आप हैं कि दूसरों से दूरी बना रही हैं. इट्स बैड डियर.

ख़ुद को दें स्पेशल ट्रीटमेंट
इसे महीने के वीक डेज़ कहने की बजाय स्पेशल डेज़ कहें. इन दिनों ख़ुद को जितना हो सके स्पेशल फील कराएं. जो पसंद हो, वो खाएं, पहनें, घूमने जाएं. बिना रोक-टोक के लाइफ के इन दिनों को एंजॉय करें.

तो क्या समझीं मिस ब्यटीफुल? अब से हर माह अपने उन दिनों को स्पेशल बनाकर अपनी सोच के साथ दूसरों की सोच भी बदलें. ये तो आप भी मानती होंगी कि भगवान की बनाई हर चीज़ बेहद ख़ूबसूरत होती है. ऐसे में आपने ये कैसे सोच लिया कि आपका ये नेचुरल प्रॉसेस आपको सबसे अलग-थलग रहने, ख़ुद को डाउन फील करवाने, जैसी बातों पर ज़ोर देता है. जिन महिलाओं को पीरियड्स नहीं होते, वो मां बनने के सुख से वंचित रह जाती हैं. तो फिर आप अपने इस हसीन और ख़ूबसूरत से तोह़फे की अवहेलना क्यों करती हैं.

– श्वेता सिंह

चाइल्ड मैरिज- ऐसे करो न मुझे विदा (Do not leave me like a child marriage )

child marriage

child marriage

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जो उम्र एच फॉर हेन और एम फॉर मंकी पढ़ने की होती है, उसी उम्र में मासूम बच्चों को कई माता-पिता और हमारा समाज एच फॉर हसबैंड और एम फॉर मैरिज सिखा रहा है. तितली की तरह खुले वातावरण में उड़ता बालमन शादी जैसे भारी-भरकम शब्दों के जाल में फंसकर रह गया है. माफ़ कीजिए, स़िर्फ शब्द ही क्यों, ज़िम्मेदारी का एहसास भी कराया जा रहा है. सभ्य, सुशिक्षित और ख़ुद को आधुनिक कहने वाला ये समाज मासूमों को कम उम्र में शादी के बंधन में पूरे उल्लास और बैंड-बाजे के साथ बांध रहा है. आइए, देखते हैं ऐसे ही कुछ उदाहरण जब अपनी गुड़िया को दुल्हन बनाने वाली मासूम बच्चियां ख़ुद दुल्हन बनकर इस कुप्रथा की सूली चढ़ीं.

  • जुलाई 2015 में राजस्थान के एक 35 साल के पुरुष ने 6 साल की लड़की से इसलिए शादी की, क्योंकि उसका किसी दूसरी शादीशुदा महिला के साथ संबंध था. समाज को चुप कराने के लिए उसने ये विवाह किया ताकि अब उसे कोई कुछ न कह पाए. बताया जाता है कि ये पुरुष पार्षद है. सुनकर भले ही आपको विश्‍वास न हो, लेकिन ये घटना सत्य है.
  • जून 2015, उत्तर प्रदेश के भावली गांव की विधवा राधा की तीन बेटियां और एक बेटा है. बड़ी बेटी की शादी पहले हो चुकी थी. अपनी 17 वर्षीया मझली बेटी और 13 साल की छोटी बेटी का विवाह भी राधा ने तय कर दिया है. बड़ी वाली लड़की के लिए 26 साल का दुल्हा, तो छोटी के लिए उसने 35 साल के पुरुष को अपने दामाद के रूप में चुना. बेटे और गांव के बाकी लोगों के मना करने पर भी जब राधा नहीं मानी, तो उसके अपने ही बेटे ने मां के ख़िलाफ़ पुलिस में मामला दर्ज करवाया. पुलिस के सामने तो राधा ने छोटी बेटी के विवाह को रोक दिया, किंतु अपनी 17 साल की नाबालिग बेटी का विवाह कर दिया. लोगों को लगा कि अच्छा हुआ उसने 13 साल की अपनी बेटी का विवाह नहीं किया, किंतु बाद में उसी दिन राधा ने छोटी बेटी का भी विवाह कर दिया.
  • मई 2015 में ही मध्य प्रदेश के जैतहरी क्षेत्र की 15 वर्षीया लड़की की शादी की ख़बर मिलते ही पुलिस ने वो शादी तो रोक दी, लेकिन कुछ ही दिन बाद फिर से दोनों परिवार वालों ने मिलकर शादी को अंजाम दे दिया.
    क्या है कारण?

    बाल विवाह जैसी घातक बीमारी का क्षेत्र बढ़ता ही जा रहा है. क्या आप जानते हैं कि इस कुप्रथा का आख़िर कारण क्या है?
    ग़रीबीः भले ही आज दुनिया चांद-सितारों पर पहुंच गई हो, लेकिन इसी धरती पर कुछ जगहें ऐसी भी हैं, जहां पेटभर खाना भी लोगों को नसीब नहीं होता. मां-बाप सारा दिन काम करते हैं, तब कहीं रात को आधा पेट खाना मिल पाता है. ऐसे में माता-पिता अपने बच्चों को ज़िंदा देखने के लिए कम उम्र में उनकी शादी कर देते हैं.
    अशिक्षाः बाल विवाह का दूसरा सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है. ग़रीबी के चलते अशिक्षा का जन्म होता है. जहां पेटभर खाने को नहीं मिलता, वहां के बच्चे स्कूल जाएं, ये सपने में भी नहीं सोचा जा सकता. शिक्षा से कोसों दूर लोगों को ये लगता है कि कम उम्र में बच्चों की शादी करके वो उन्हें सही राह दिखाते हैं.
    कन्यादानः उत्तर प्रदेश की 40 साल की जमुनाबाई (बदला हुआ नाम) से जब हमने पूछा कि बेटी की शादी इतनी कम उम्र में क्यों कर रही हैं, तो उनका जवाब सुनकर हम दंग रह गए. बकौल जमुनाबाई, “ये तो सही उम्र है वियाह (विवाह) की. अरे, माहवारी से पहिले (पहले) ही लड़कियों की शादी कर देनी चाहिए. तभी तो कन्यादान हुआ न. इससे हम लोगों को पुण्य मिलता है.” जमुनाबाई अकेली ऐसा नहीं सोचतीं. इस देश में कई जमुनाबाई हैं, जो इस तरह की सोच को समर्थन देती हैं.

क्या कहते हैं जानकार?
देशभर में अब तक कई बाल विवाह निरस्त करा चुकीं जोधपुर की साइकोलॉजिस्ट और समाज सेविका कृति भारती कहती हैं, “बाल विवाह किसी बीमारी की तरह है. जिस तरह नई बीमारी को रोकने के लिए नई दवाइयां तो बना दी जाती हैं, लेकिन कई बार बीमारी से ग्रसित लोगों तक सही दवा पहुंचाई नहीं जाती, ठीक उसी तरह बाल विवाह रोकने के लिए सरकार और ग़ैर सरकारी संस्थान दोनों बहुत प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जो बच्चे इस बीमारी से ग्रसित हो चुके हैं यानी जिनका बाल विवाह हो चुका है, उनके लिए सरकार कुछ नहीं कर पा रही. बाल विवाह रोकना तो आसान है, लेकिन जिनका हो चुका है उसे निरस्त करना मुश्किल है. सरकार को इसी बात पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए. अभी भी गांव-गांव तक जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है. स़िर्फ अनपढ़ और ग़रीब लोग ही इसके शिकार नहीं हैं. मैंने ऐसे तमाम पढ़े-लिखे और अमीरों को भी बाल विवाह करवाते देखा है. स़िर्फ अक्षय तृतीया या ऐसे ही कई महत्वपूर्ण दिन ही बाल विवाह नहीं होते, बल्कि देशभर में हर दिन मासूम बच्चे इस कुप्रथा के शिकार होते हैं.
ऐसा नहीं है कि कम उम्र की लड़कियों की शादी हमेशा उनके उम्र के लड़कों के साथ ही होती है. आए दिन अख़बारों में ऐसी ख़बरें भी पढ़ने को मिलती हैं, जब मां-बाप अपनी फूल-सी बच्ची का कन्यादान अधेड़ उम्र के पुरुष से करते हैं. सवाल ये उठता है कि ख़ुद को समाज का कर्ता-धर्ता कहने वाले उन पुरुषों का दिमाग़ तब कहां चला जाता है, जो अपनी पोती और बेटी से भी कम उम्र की लड़कियों के साथ विवाह करते हैं. भारत के साथ ही कई अन्य देशों में भी इस कुप्रथा ने महिलाओं के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है.”

बलात्कार के भय से बढ़ती ये कुप्रथा
गांव ही नहीं, बल्कि आजकल तो बड़े-बड़े शहरों में भी लड़कियां और महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. आए दिन इस तरह की घटनाएं घटती रहती हैं. गांव में इस तरह की घटना का असर इस क़दर लोगों के दिलो-दिमाग़ में घर कर गया है कि लोग छोटी उम्र में ही अपनी बच्चियों की शादी कर देते हैं. अपनी बेटियों की सुरक्षा से चिंतित ग्रामीण महिलाएं दिल पर पत्थर रखकर बेटियों का बाल विवाह करने को मजबूर हैं. झारखंड के एक गांव की संगीता देवी का कहना है, “अब हम लोग कर भी क्या सकते हैं. दूसरा कोई उपाय नहीं है हमारे पास. हम भी सोचे थे कि अपनी बेटियों की शादी 18 साल के बाद ही करेंगे, लेकिन संभव ही नहीं है.” स़िर्फ झारखंड के गांव ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्‍चिम बंगाल, हरियाणा समेत कई गांवों की महिलाओं की यही राय है.

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बाल विवाह से जुड़ा क़ानून
बॉम्बे हाईकोर्ट के एडवोकेट राजेश मिश्रा बताते हैं कि बाल विवाह को रोकने के लिए बाल विवाह निषेध क़ानून में संशोधन करके इसे और कठोर बनाया गया है. बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के अनुसार, बाल विवाह करवाने में शामिल माता-पिता, अभिभावक या ऐसे लोग जिनके संरक्षण में बाल विवाह हो रहा है, उन्हें 2 साल की कठोर सज़ा या एक लाख रुपए का जुर्माना या फिर दोनों हो सकता है.

क्या इसे रोका जा सकता है?
कृति भारती का कहना है, “बाल विवाह निषेध क़ानून के अनुसार, बाल विवाह को पूरी तरह से रोका जा सकता है, लेकिन आज समाज में ये कुप्रथा इस क़दर घर कर चुकी है कि इसे पूरी तरह ख़त्म करने के लिए एक-दो लोग नहीं, बल्कि पूरे समाज को मिलकर काम करना होगा. आम लोगों के साथ सरकार को भी इस मामले में ठोस क़दम उठाना चाहिए. स़िर्फ क़ानून बना देने से समस्या का हल नहीं निकल पाएगा. सबसे पहले सरकार को दंड प्रक्रिया और कड़ी करनी चाहिए, जिससे कोई भी व्यक्ति इस तरह की हरक़त करने से पहले सौ बार सोचे. कई बार तो मैंने सरकारी कर्मचारियों को भी बाल विवाह करवाते देखा है. सरकारी कर्मचारी के ऐसा करने पर सरकार को उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए. देश की अदालतों को भी इस मुहिम से जुड़ना चाहिए. जब भी कोई बाल विवाह का मामला कोर्ट में आए, तो ज़्यादा से ज़्यादा 3 दिन के भीतर कोर्ट को उसमें डिक्री (निर्णय) दे देनी चाहिए. बहुत लंबा नहीं खींचना चाहिए. इन सबके अलावा ख़ुद महिलाओं को भी इसे रोकने के लिए आगे आना ही पड़ेगा, नहीं तो ऐसे ही स्थिति बद से बदतर होती जाएगी. मेरी महिलाओं से ये विनती है कि अपनी बेटियों की शादी रोकने का प्रयास वो ख़ुद ही करें.”

जीजा संग रचाई शादी
राजस्थान के एक गांव की चंपा (परिवर्तित नाम) ने अपना परिचय गुप्त रखने पर अपने दिल की बात हमसे शेयर की. चंपा ने अपनी भाषा में हमें पूरा वाक़या बताया, जिसका हिंदी भाषा में रूपांतरण करके हम आपको बता रहे हैं. चंपा के मुताबिक, “जब मैं दस साल की थी तभी मेरी बहन की मौत हो गई. अपने पीछे वो अपना 1 साल का बेटा छोड़ गई. जीजाजी की उम्र 30 साल थी उस समय. दीदी के बेटे की ख़ातिर मां-बाप ने मेरी शादी जीजाजी से करवा दी. ये बात 2010 की है. मेरी उम्र अब 15 साल है. मैं भी अब एक बच्चे की मां बन गई हूं. दीदी के बच्चे की ज़िंदगी तो बन गई, लेकिन मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गई. मेरी भी एक बेटी है. मैं उसका विवाह कम उम्र में नहीं करूंगी.”

कम उम्र में शादी के भयंकर परिणाम
कारण चाहे जो भी हो, लेकिन हर दिन देश के हर हिस्से में बाल विवाह हो रहे हैं. इसका सबसे बुरा असर उन मासूम लड़कियों पर पड़ता है, जिन्होंने अब तक ज़िंदगी को सही तरह से देखा भी नहीं है. कृति भारती के अनुसार, बाल विवाह वो बीमारी है, जो हर तरह से लड़कियों की ज़िंदगी बर्बाद कर देती है. इसका बहुत बुरा असर होता है उन पर.
असमय मृत्युः कम उम्र में शादी के बाद अक्सर परिवार की ओर से वंश बढ़ाने का ज़ोर भी लड़कियों को झेलना पड़ता है. 15 साल की उम्र के अंदर बच्चा पैदा करना किसी तरह से सही नहीं है. बच्चा पैदा करते समय उस असहनीय दर्द के कारण तो कभी हैवी ब्लीडिंग के कारण मासूमों की जान चली जाती है.
मानसिक रोगीः खेलने-कूदने की उम्र में ही इन बच्चियों पर परिवार की ज़िम्मेदारी आ जाती है. उस पर पति का हर रात ज़ोर-ज़बर्दस्ती करके उनके शरीर को रौंदकर ख़ुद को संतुष्ट करना जैसी बातें उन मासूमों को अंदर तक झकझोर देती हैं. समाज में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब ऐसी मासूम बच्चियां डिप्रेशन की शिकार हो जाती हैं. उन्हें संभालना बहुत मुश्किल होता है. गांव-खेड़े में लोग इन्हें पागल कहने लगते हैं. डिप्रेशन के कारण कई बार लड़कियां कभी पंखे से लटककर, तो कभी कुएं में कूदकर, कभी ज़हर खाकर, तो कभी पेड़ से लटकर मौत को गले लगा लेती हैं
शारीरिक बीमारियांः कम उम्र में शादी करने और बच्चा होने के बाद लड़कियों को कई तरह की शारीरिक बीमारियों से जूझना पड़ता है. ख़ून की कमी, हड्डियों से जुड़ी बीमारी आदि. कई बार एड्स का ख़तरा भी बढ़ जाता है. इसके साथ ही सेक्सुअल ट्रांसमिटेड डिसीज़ का भी ख़तरा रहता है.
ज़रा सोचिए, आपकी नन्हीं लाड़ली जो अभी खेलना-कूदना चाहती है, कुछ बनना चाहती है, आपकी ग़रीबी में आपके साथ खड़ी होना चाहती है, आपको हर तरह से संपन्न करने और बहुत सारा सुख देने की चाहत रखती है, लेकिन आप उसके साथ क्या करते हैं? उसके इन सपनों को झोले में भरकर आप उसे एक तरह से मारकर किसी के साथ विवाह करके विदा कर देते हैं. क्या ऐसा करते हुए आपका दिल एक बार भी नहीं पसीजता? कैसे मां-बाप हैं आप? अरे, अब तो संभल जाइए. आख़िर कब तक ऐसे ही विदा करते रहेंगे अपनी लाड़ली को!

टॉप 5 स्टेट
1 राजस्थान
2 मध्य प्रदेश
3 उत्तर प्रदेश
4 बिहार
5 झारखंड

बाप-महतारी के मजबूरी
“हमार बियाह 10 साल के रहली तबैै होई गयल. तब हम बियाह करे नाहीं चाहत रहे… (कुछ सोचते हुए और आंखों से आंसू पोंछते हुए)
अब होनी के केहू टाल नाही सकत. इ गरीबी और ऊपर से हमरे बाप-महतारी के मजबूरी के कारन हमार बियाह जल्दी होई गयल.” ये कहना है बिहार के एक गांव की कुसुम का. कुसुम के कहने का मतलब ये था कि उनके माता-पिता की मजबूरी और ग़रीबी के कारण उसकी शादी 10 साल में ही कर दी गई थी. अब कुसुम की उम्र 15 साल है और वो एक बच्चे की मां है.

 

– श्‍वेता सिंह