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लोग क्या कहेंगे का डर क्यों नहीं निकलता जीवन से? (Stop Caring What Others Think)

Others Think
लोग क्या कहेंगे का डर क्यों नहीं निकलता जीवन से? (Stop Caring What Others Think)

–    अरे, ये क्या पहना है? लोग देखेंगे, तो क्या कहेंगे…?

–    रीना, तुम लड़की होकर इतनी ज़ोर-ज़ोर से हंसती हो, तमीज़ नहीं है क्या, लोग क्या कहेंगे?

–    शांतनु, तुम दिनभर क्लासिकल डांस की प्रैक्टिस में लगे रहते हो, लोग क्या कहेंगे कि शर्माजी का बेटा लड़कियोंवाले काम करता है…

–    गुप्ताजी के दोनों बच्चे डॉक्टरी कर रहे हैं, तुम दोनों को भी इसी फील्ड में जाना होगा, जमकर पढ़ाई करो…

…इस तरह की बातें हम अक्सर सुनते और ख़ुद भी कहते आए हैं, क्योंकि हम समाज में रहते हैं और ऐसे समाज में रहते हैं, जहां दूसरे क्या सोचेंगे, यह बात ज़्यादा मायने रखती है, बजाय इसके कि हम ख़ुद क्या चाहते हैं. हम ‘लोग क्या कहेंगे’ की चिंता में इतने डूबे रहते हैं कि अपने अस्तित्व को ही भूल जाते हैं. कपड़ों से लेकर खान-पान, करियर व शादी-ब्याह जैसे निर्णय भी दूसरे ही हमारे लिए अधिक लेते हैं.

दूसरे इतने अपने क्यों?

–    “रिंकू, तुम्हारी अधिकतर सहेलियों की शादी हो गई है, तुम कब तक कुंआरी रहोगी? अक्सर सोशल गैदरिंग में सब पूछते रहते हैं कि बेटी की शादी कब करोगे… हम क्या जवाब दें उन्हें?”

“मॉम, आप तो जानती हैं कि मैं अभी अपने करियर पर फोकस करना चाहती हूं, शादी के बारे में सोचा भी नहीं… दूसरों का क्या है, वो तो कुछ भी पूछते रहते हैं…” रिंकू ने मम्मी को समझाने की कोशिश की.

–    “मिसेज़ वर्मा बता रही थीं कि उनकी बेटी ने इतनी डिग्रियां ले लीं कि अब उसके लिए उसके स्तर का लड़का ढूंढ़ना मुश्किल हो गया है. सोनल, तू भी पीएचडी शादी के बाद ही करना, क्योंकि ज़्यादा पढ़-लिख  जाओगी,  तो  लड़के  मिलने  मुश्किल हो जाएंगे…”

“लेकिन मम्मी, पढ़ाई करना ग़लत बात थोड़ी है, स़िर्फ शादी को ध्यान में रखते हुए तो हम ज़िंदगी के निर्णय नहीं ले सकते. वैसे भी मैं तो शादी ही नहीं करना चाहती. इसमें दूसरों को क्यों एतराज़ है? ये मेरी ज़िंदगी है, जैसे चाहे, वैसे जीऊंगी…” सोनल ने भी अपनी मम्मी को समझाने की कोशिश की…

शर्माजी के बेटे ने भी घरवालों को समझाने की कोशिश की कि क्लासिकल डांस स़िर्फ लड़कियां ही नहीं, लड़के भी कर सकते हैं और वो इसी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता है, लेकिन उसके पैरेंट्स यह समझने को तैयार ही नहीं थे. उन्हें अपने बेटे के सपने पूरे करने में उसका साथ देने की जगह लोक-लाज की फ़िक़्र थी कि लोग क्या कहेंगे… दूसरे उनका मज़ाक उड़ाएंगे… आदि… लेकिन इन सभी पैरेंट्स को इस बात की अधिक चिंता थी कि लोग क्या कहेंगे… बच्चों ने उन्हें समाज से नज़रें मिलाने के काबिल नहीं छोड़ा… दरअसल, हम समाज की और दूसरों की इतनी ज़्यादा परवाह करते हैं कि हमारी ज़िंदगी में हस्तक्षेप करना वो अपना अधिकार समझने लगते हैं. अक्सर हमारे निर्णय दूसरों की सोच को ध्यान में रखते हुए ही होते हैं.

हमारी पहली सोच यह होती है कि रिश्तेदार और आस-पड़ोसवाले इन बातों पर कैसे रिएक्ट करेंगे…

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इतना डर क्यों लोगों का?

–    हमारी सामाजिक संरचना शुरू से ही ऐसी रही है और इसी संरचना में हम भी

पले-बढ़े हैं, जिससे अंजाने में ही यह डर हमारी सोच का हिस्सा बन जाता है.

–    हर बात को हम अपनी इज़्ज़त और खानदान से जोड़कर देखते हैं, यही वजह है कि अधिकतर निर्णय हम सच जानते हुए भी नहीं ले पाते, क्योंकि हममें इतनी हिम्मत ही नहीं होती.

–    बेटी की सगाई तो कर दी, पर शादी की तैयारियों के बीच यह पता लगा कि जहां शादी होनेवाली है, वो लोग लालची हैं. ऐसे में पैरेंट्स उनकी डिमांड पूरी करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देते हैं और यहां तक कि लड़कियां भी सब कुछ जानते हुए निर्णय लेने से कतराती हैं, क्यों? …क्योंकि सगाई टूट गई, तो लोग क्या कहेंगे? समाज में बदनामी हो जाएगी, बेटी को कोई दूसरा लड़का नहीं मिलेगा… आदि… इत्यादि…!

–    इसी डर की वजह से लड़कियां असफल शादियों को भी निभाती हैं, क्योंकि हमारा समाज आज भी तलाक़शुदा महिलाओं को अच्छी नज़र से नहीं देखता.

–    हम पर सोशल प्रेशर इतना ज़्यादा हावी रहता है कि हम उसे ही पैमाना मानते हैं और फिर ज़िंदगी से जुड़े अत्यधिक निजी ़फैसले भी उसी के अनुसार लेते हैं.

–    हमें यह सब सामान्य लगता है, क्योंकि हम शुरू से यही करते व देखते आए हैं. पर दरअसल, यह बेहद ख़तरनाक है.

–    समाज की मानसिकता भी इस डर को और बढ़ाती है. देश में खाप पंचायतों के कई निर्णयों ने भी यह दिखा दिया है कि किस तरह से पुलिस-प्रशासन भी बेबस नज़र आता है सामाजिक दबाव के चलते.

–    इस तरह की घटनाएं आम लोगों के मन में और भी दबाव व डर को बढ़ाती हैं, जिससे उन्हें भी यही लगता है कि हर छोटे-बड़े निर्णयों में समाज की सोच का भी ख़्याल रखना ज़रूरी है.

–    कॉलेजेज़ से लेकर कई नेताओं तक ने लड़कियों के जींस पहनने व मोबाइल फोन रखने को उनके बलात्कार का कारण मानकर इन पर रोक लगाने की बात कई बार कही है.

–    लड़कियों के पहनावे पर कई तरह की बातें अभी भी होती हैं, जबकि हम ख़ुद को एडवांस सोसायटी मानने लगे हैं.

–    ये बातें हमारे मन में भी इतनी हावी हो जाती हैं कि हमें भी लगता है कि बच्चियों को सुरक्षित रखने का बेहतर तरीक़ा यही है कि जो समाज सोचे, वही हम भी करें.

inquisitive

कैसे निकलेगा यह डर?

–    सीधी-सरल बात है कि अपनी सोच बदलिए, समाज की सोच भी बदलती जाएगी.

–    जहां जवाब देना सही लगे, वहां बोलने से हिचकिचाएं नहीं.

–    समाज की सोच के विपरीत बोलना मुश्किल ज़रूर होता है, पर यह नामुमकिन नहीं है.

–    बात जहां सही-ग़लत की हो, तो लोग भले ही कुछ भी सोचें, हमेशा सही रास्ता ही सही होता है.

–    समाज आपकी ज़िंदगी की मुश्किलों को आसान करने कभी नहीं आएगा. वो मात्र दबाव बना सकता है, हमें उनके अनुसार निर्णय लेने के लिए बाध्य करने की कोशिश कर सकता है, हम पर हंस सकता है, हमारी निंदा कर सकता है. लेकिन इन बातों से इतना प्रभावित नहीं होना चाहिए कि अपनी ज़िंदगी से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय भी हम उन्हीं के अनुसार लें.

–    लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर हम अपनी या अपने बच्चों की ख़ुशियां, उनके सपनों को छोड़ नहीं सकते, वरना यह डर हमारे बाद हमारे बच्चों के दिलों में भी घर कर जाएगा और यह सिलसिला चलता ही रहेगा.

–    बेहतर होगा अपनी सोच व अपने निर्णयों पर दूसरों को हम इतना हावी न होने दें कि हमारा ख़ुद का अस्तित्व ही न रहे.

–    हमें क्या करना है, कैसे करना है यह हमें ही तय करना है. हां, दूसरों की सहायता ज़रूर ली जा सकती है. अगर कहीं कोई कंफ्यूज़न है तो… लेकिन अंतत: हमें ही रास्ता निकालना है.

– गीता शर्मा

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दूसरों की ज़िंदगी में झांकना कहीं आपका शौक़ तो नहीं? (Why Do We Love To Gossip?)

Why Do We Love To Gossip

Why Do We Love To Gossip

अरे सुनो, वो जो पड़ोस की वर्माजी की बेटी है न, वो रोज़ देर रात को घर लौटती है, पता नहीं ऐसा कौनसा काम करती है…?

गुप्ताजी की बीवी को देखा, कितना बनठन के रहती हैं, जबकि अभीअभी उनके जीजाजी का देहांत हुआ है…!

सुनीता को देख आज बॉस के साथ मीटिंग है, तो नए कपड़े और ओवर मेकअप करके आई है

इस तरह की बातें हमारे आसपास भी होती हैं और ये रोज़ की ही बात है. कभी जानेअनजाने, तो कभी जानबूझकर, तो कभी टाइमपास और फन के नाम पर हम अक्सर दूसरों के बारे में अपनी राय बनातेबिगाड़ते हैं और उनकी ज़िंदगी में ताकझांक भी करते हैं. यह धीरेधीरे हमारी आदत और फिर हमारा स्वभाव बनता जाता है. कहीं आप भी तो उन लोगों में से नहीं, जो इस तरह का शौक़ रखते हैं?

क्यों करते हैं हम ताकझांक?

ये इंसानी स्वभाव का हिस्सा है कि हम जिज्ञासावश लोगों के बारे में जानना चाहते हैं. ये जिज्ञासा जब हद से ज़्यादा बढ़ जाती है, तो वो बेवजह की ताकझांक में बदल जाती है.

अक्सर अपनी कमज़ोरियां छिपाने के लिए हम दूसरों में कमियां निकालने लगते हैं. यह एक तरह से ख़ुद को भ्रमित करने जैसा होता है कि हम तो परफेक्ट हैं, हमारे बच्चे तो सबसे अनुशासित हैं, दूसरों में ही कमियां हैं.

कभीकभी हमारे पास इतना खाली समय होता है कि उसे काटने के लिए यही चीज़ सबसे सही लगती है कि देखें आसपास क्या चल रहा है.

दूसरों के बारे में राय बनाना बहुत आसान लगता है, हम बिना सोचेसमझे उन्हें जज करने लगते हैं और फिर हमें यह काम मज़ेदार लगने लगता है.

इंसानी स्वभाव में ईर्ष्या भी होती है. हम ईर्ष्यावश भी ऐसा करते हैं. किसी की ज़्यादा कामयाबी, काबिलीयत हमसे बर्दाश्त नहीं होती, तो हम उसकी ज़िंदगी में झांककर उसकी कमज़ोरियां ढूंढ़ने की कोशिश करने लगते हैं और अपनी राय बना लेते हैं.

इससे एक तरह की संतुष्टि मिलती है कि हम कामयाब नहीं हो पाए, क्योंकि हम उसकी तरह ग़लत रास्ते पर नहीं चले, हम उसकी तरह देर रात तक घर से बाहर नहीं रहते, हम उसकी तरह सीनियर को रिझाते नहींआदि.

कहीं न कहीं हमारी हीनभावना भी हमें इस तरह का व्यवहार करने को मजूबर करती है. हम ख़ुद को सामनेवाले से बेहतर व श्रेष्ठ बताने के चक्कर में ऐसा करने लगते हैं.

हमारा पास्ट एक्सपीरियंस भी हमें यह सब सिखाता है. हम अपने परिवार में यही देखते आए होते हैं, कभी गॉसिप के नाम पर, कभी ताने देने के तौर पर, तो कभी सामनेवाले को नीचा दिखाने के लिए उसकी ज़िंदगी के राज़ या कोई भी ऐसी बात जानने की कोशिश करते हैं. यही सब हम भी सीखते हैं और आगे चलकर ऐसा ही व्यवहार करते हैं.

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Why Do We Love To Gossip

कहां तक जायज़ है यूं दूसरों की ज़िंदगी में झांकना?

इसे जायज़ तो नहीं ठहराया जा सकता है, लेकिन चूंकि यह इंसानी स्वभाव का हिस्सा है, तो इसे पूरी तरह से बंद भी नहीं किया जा सकता.

 किसी की ज़िंदगी में झांकने का अर्थ है आप उसकी प्राइवेसी में दख़लअंदाज़ी कर रहे हैं, जो कि बिल्कुल ग़लत है.

न स़िर्फ ये ग़लत है, बल्कि क़ानूनन जुर्म भी है.

हमें यह नहीं पता होता कि सामनेवाला किन परिस्थितियों में है, वो क्या और क्यों कर रहा है, हम महज़ अपने मज़े के लिए उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ करने लगते हैं.

ये शिष्टाचार के ख़िलाफ़ भी है और एक तरह से इंसानियत के ख़िलाफ़ भी कि हम बेवजह दूसरों की निजी ज़िंदगी में झांकें.

जिस तरह हम यह मानते हैं कि हमारी ज़िंदगी पर हमारा हक़ है, किसी और को हमारे बारे में राय कायम करने या ग़लत तरह से प्रचार करने का अधिकार नहीं है, उसी तरह ये नियम हम पर भी तो लागू होते हैं.

लेकिन अक्सर हम अपने अधिकार तो याद रखते हैं, पर अपनी सीमा, अपने कर्त्तव्य, अपनी मर्यादा भूल जाते हैं.

यदि हमारे किसी भी कृत्य से किसी के मानसम्मान, स्वतंत्रता या मर्यादा को ठेस पहुंचती है, तो वो जायज़ नहीं.

किसने क्या कपड़े पहने हैं, कौन कितनी देर रात घर लौटता है या किसके घर में किसका आनाजाना लगा रहता हैइन तमाम बातों से हमें किसी के चरित्र निर्माण का हक़ नहीं मिल जाता है.

हम जब संस्कारों की बात करते हैं, तो सबसे पहले हमें अपने ही संस्कार देखने चाहिए. क्या वो हमें यह इजाज़त देते हैं कि दूसरों की ज़िंदगी में इतनी

ताकाझांकी करें?

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Why Do We Love To Gossip

कैसे सुधारें ये ग़लत आदत?

किसी के बारे में फ़ौरन राय न कायम कर लें और न ही उसका प्रचारप्रसार आसपड़ोस में करें.

बेहतर होगा यदि इतना ही शौक़ है दूसरों के बारे में जानने का, तो पहले सही बात का पता लगाएं.

ख़ुद को उस व्यक्ति की जगह रखकर देखें.

उसकी परवरिश से लेकर उसकी परिस्थितियां व हालात समझने का प्रयास करें.

दूसरों के प्रति उतने ही संवेदनशील बनें, जितने अपने प्रति रहते हैं.

अपनी ईर्ष्या व हीनभावना से ऊपर उठकर लोगों को देखें.

यह न भूलें कि हमारे बारे में भी लोग इसी तरह से राय कायम कर सकते हैं. हमें कैसा लगेगा, यदि कोई हमारी ज़िंदगी में इतनी ताकझांक करे?

सच तो यह है कि वर्माजी की बेटी मीडिया में काम करती है, उसकी लेट नाइट शिफ्ट होती है, इसीलिए देर से आती है.

गुप्ताजी की बीवी सजसंवरकर इसलिए रहती है कि उसकी बहन ने ही कहा था कि उसके जीजाजी बेहद ज़िंदादिल और ख़ुशमिज़ाज इंसान थे और वो नहीं चाहते थे कि उनके जाने के बाद कोई भी दुखी होकर उनकी याद में आंसू बहाये, बल्कि सब हंसीख़ुशी उन्हें याद करें. इसलिए सबने यह निर्णय लिया कि सभी उनकी इच्छा का सम्मान करेंगे.

– सुनीता का सच यह था कि आज उसकी शादी की सालगिरह भी है, इसलिए वो नए कपड़े और मेकअप में नज़र आ रही है.

ये मात्र चंद उदाहरण हैं, लेकिन इन्हीं में कहीं न कहीं हम सबकी सच्चाई छिपी है. बेहतर होगा हम बेहतर व सुलझे हुए इंसान बनें, क्योंकि आख़िर हमसे ही तो परिवार, परिवार से समाज, समाज से देश और देश से दुनिया बनती है. जैसी हमारी सोच होगी, वैसी ही हमारी दुनिया भी होगी. अपनी दुनिया को बेहतर बनाने के लिए सोच को भी बेहतर बनाना होगा.

विजयलक्ष्मी

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क्या आप भी करते हैं दूसरों की बुराई? (How To Avoid Gossiping)

How To Avoid Gossiping

“बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो” गांधीजी के ये वाक्य भले ही हमने रट लिए हों, लेकिन उन्हें जीवन में उतारने की कोशिश हमने आज तक नहीं की. तो क्यों न अब इस ओर एक प्रयास किया जाए?

How To Avoid Gossiping

क्योंकि निंदा करना बुरी बात है
कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो हमें बचपन से सिखाई जाती हैं, जैसे- झूठ बोलना पाप है, चोरी करना गलत बात है आदि. इसी तरह निंदा करना बुरी बात है यह वाक्य भी कई बार हम अपने बड़े-बूढ़ों के मुंह से सुन चुके हैं, लेकिन आश्‍चर्य इस बात का है कि आज भी हमारी सुबह और शाम पड़ोसी, रिश्तेदार व सखी-सहेली से जुड़ी निंदक बातों से शुरू और खत्म होती है. जब कि हम सब इस बात से भलीभांति अवगत हैं कि निंदा करना बुरी बात है.

निंदा करना और सुनना दोनों ही पाप है
कहते हैं, अन्याय करनेवाले और सहनेवाले दोनों ही बराबर के दोषी होते हैं. ठीक उसी तरह हिंदू वेद-पुराण के अनुसार परनिंदा करनेवाले और सुननेवाले दोनों ही पाप के समान भागीदार होते हैं. अतः अगर धार्मिक किताबों में आपकी निष्ठा है, तो अब से न ही दूसरों की निंदा करें और न ही किसी की निंदक बातों में दिलचस्पी लें.

परनिंदा से बेहतर है संतगुणों की प्रसंशा
काहू कि नहिं निन्दिये, चाहै जैसा होय।
फिर फिर ताको बन्दिये, साधु लच्छ है सोय॥
संत कबीर दासजी कहते हैं कि भले ही कोई व्यक्ति कितना भी बुरा हो, परंतु उसकी निंदा न करें, क्योंकि इससे स़िर्फ समय की बर्बादी होती है और कुछ नहीं, इसलिए अच्छा यह होगा कि आप अपना समय उन लोगों की प्रशंसा में व्यतीत करें, जो स्वभाव से सरल हों, जिनके भीतर साधू के लक्षण विद्यमान हों अथवा जो सतगुणों की खान हों.

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परनिंदा से केवल समय की बर्बादी होती है
यह बात सौ आने सच है कि परनिंदा से केवल समय की बर्बादी होती है और कुछ नहीं, क्योंकि आप जिस व्यक्ति की निंदा करते हैं, उसे इस बात की ख़बर तक नहीं होती कि आप उसके बारे में यूं भला-बुरा कह रहे हैं, नतीजतन वह व्यक्ति तो अपने काम में मस्त रहता है, परंतु उस वक्त उसकी निंदा करने के चक्कर में आपके काम पर अल्पविराम लग जाता है, इसलिए अब से अपना बेशक़ीमती समय दूसरों की निंदा में बर्बाद करने की बजाय अपने काम में मन लगाएं.

परनिंदा से पहले करें स्वयं का परीक्षण
जब हम दूसरों की तरफ एक उंगुली दिखाते हैं, तब हम ये भूल जाते हैं कि बाकी बची चार उंगुलियां हमारी ओर इशारा करती हैं. अर्थात जब हम फलाना व्यक्ति को एक उंगली से परिभाषित करते हैं, तो उस वक्त हमारी चार उंगलियां हमें परिभाषित कर रही होती हैं. इसका मतलब आप उस व्यक्ति से ज़्यादा अवगुणी हैं. अतः किसी और पर दोषारोपण करने से पहले अपने गुण-दोष का परिक्षण करें और ख़ुद से पूछें कि क्या आप दूसरों की निंदा करने के लायक हैं? और उत्तर मिलने के बाद ही किसी की निंदा करें या सुनें.

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महिलाओं की गॉसिप के 10 दिलचस्प टॉपिक (10 Most Interesting Gossip Topics of Women)

Most Interesting Gossip Topics of Women
आख़िर महिलाएं इतनी बातूनी क्यों होती हैं? क्यों उनकी बातें कभी ख़त्म नहीं होतीं? किन मुद्दों पर होती है महिलाओं की बातचीत? क्यों महिलाओं को कहा जाता है गॉसिप क्वीन? महिलाओं की गॉसिप के दिलचस्प पहलू को आइए, और क़रीब से जानते हैं. 

Most Interesting Gossip Topics of Women

आपको ऐसी महिला पसंद है, जो हर व़क्त स्ट्रेस में रहती है, जिसे ज़िंदगी से बहुत शिकायतें हैं, जो लोगों से मिलना-जुलना पसंद नहीं करती, जिसे अपने पड़ोसी के घर की भी ख़बर नहीं रहती… या फिर ऐसी महिला, जिसकी आवाज़ हमेशा आपके आसपास खनकती रहती है, जिसे सजना-संवरना पसंद है, जिसे अपने आसपास की हर बात की ख़बर रहती है, जिसका सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है, जिसके साथ आप एक मिनट के लिए भी बोर नहीं हो सकते, जो अपनी फ्रेंड्स के साथ दिल खोलकर हंसी-मज़ाक या यूं कह लीजिए कि गॉसिप करती है. जी नहीं, हम गॉसिप की पैरवी नहीं कर रहे, बस इतना बताना चाहते हैं कि हेल्दी गॉसिप सेहत के लिए अच्छी होती है और ये बात रिसर्च द्वारा भी साबित हो चुकी है.

गॉसिप का हेल्थ कनेक्शन 

रिसर्च से यह सिद्ध हो चुका है कि गॉसिप करना हमारी सेहत के लिए अच्छा होता है. चटपटी बातें सुनने या गॉसिप करने से न स़िर्फ मनोरंजन हो जाता है, बल्कि इससे मस्तिष्क में डोपामाइन (फीलगुड हार्मोन) का स्तर बढ़ जाता है. इसका फ़ायदा ये होता है कि एक तो हम ख़ुशी महसूस करते हैं. दूसरे, जिन लोगों के साथ हम गॉसिप करते हैं, उनके साथ हमारी बॉन्डिंग बढ़ जाती है. इसीलिए महिलाओं की गॉसिप चटपटी और मनोरंजक होती है और उनकी अपनी फ्रेंड्स के साथ बॉन्डिंग भी अच्छी होती है. इसी बॉन्डिंग के कारण महिलाएं अपनी अधिकतर बातें और सीक्रेट्स भी अपनी फ्रेंड्स के साथ शेयर करती हैं, लेकिन पुरुष ऐसा नहीं कर पाते. पुरुष एक हद तक ही अपनी बातें अपने दोस्तों के साथ शेयर करते हैं, वे हर बात दोस्तों से शेयर नहीं करते.

महिलाएं क्यों करती हैं गॉसिप? 

क्योंकि गॉसिप करना महिलाओं को अच्छा लगता है. इससे उन्हें अपने आसपास होनेवाली हर घटना की ख़बर रहती है. दूसरों की ज़िंदगी में क्या चल रहा है इसकी ख़बर रहती है और सबसे ख़ास बात ये कि इससे उनका स्ट्रेस दूर होता है और उनका मनोरंजन होता है. फ्रेंड्स के साथ गॉसिप करते हुए कब घंटों गुज़र जाते हैं, इसका उन्हें पता ही नहीं चलता. साथ ही फ्रेंड्स के साथ मन की बात शेयर करके महिलाएं हल्का महसूस करती हैं और फिर से नई ऊर्जा महसूस करती हैं.

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Most Interesting Gossip Topics of Women

ये हैं महिलाओं के गॉसिप टॉपिक

गॉसिप और महिलाओं का चोली-दामन का साथ माना जाता है. जहां चार फ्रेंड मिल जाएं, वहां महिलाओं की गॉसिप शुरू हो जाती है. आख़िर महिलाएं इतनी गॉसिप क्यों करती हैं और क्या होते हैं महिलाओं की गॉसिप के टॉपिक? आइए, जानते हैं.

1) ख़ूबसूरती

ख़ूबसूरती महिलाओं की पहली ज़रूरत है. हर महिला हर उम्र में ख़ूबसूरत नज़र आना चाहती है. ऐसे में जब उनकी पड़ोसन, कलीग, रिश्तेदार आदि में से जो भी महिला उनसे ज़्यादा ख़ूबसूरत नज़र आती है या अपनी ख़ूबसूरती पर बहुत ध्यान देती है, तो वो उनके गॉसिप का टॉपिक बन जाती है. या तो वो उसकी ये कहकर बुराई करती हैं कि जब देखो, मैडम टिप टॉप में रहती है. पता नहीं, घर का कोई काम भी करती हैं या नहीं. या फिर उसकी तरह ख़ूबसूरत नज़र आने के लिए उसकी ख़ूबसूरती के सीक्रेट्स पता करने की कोशिश करती रहती हैं.

2) कपड़े

महिलाओं का कपड़ों से कुछ इस कदर मोह होता है कि उनके लिए कहा जाता है, भले ही महिलाओं की आलमारी में कपड़े रखने की जगह न हो, फिर भी वो हमेशा यही कहती हैं कि उनके पास  पहनने के लिए कपड़े ही नहीं हैं, इसीलिए दूसरी महिलाओं के अच्छे-बुरे कपड़े महिलाओं की गॉसिप का हॉट टॉपिक होते हैं. महिलाएं जब भी किसी फंक्शन में जाती हैं, तो उनकी नज़र अपने आसपास की हर महिला के कपड़े पर होती है. फिर जब कुछ महिलाएं साथ मिलकर बातें करने लगती हैं, तो उनकी गॉसिप का टॉपिक दूसरी महिलाओं के कपड़े ही होते हैं.

3) गहने

महिलाओं के लिए गहने उनका रुतबा होता है. भले ही वो हर ओकेज़न पर गहने ना पहनें, लेकिन उनके पास पर्याप्त गहने हों, ये उनकी ख़्वाहिश ज़रूर होती है. इसीलिए शादियों में जब दुल्हन को गहने चढ़ते हैं, तो परिवार और रिश्तेदार महिलाओं की पैनी नज़रें यही टटोलती रहती हैं कि आख़िर दुल्हन को कितने गहने चढ़े हैं. भले ही उन गहनों से उनका कोई लेना-देना नहीं होता, फिर भी शादियों में दुल्हन के गहने महिलाओं की गॉसिप का ख़ास टॉपिक होते हैं. किस फ्रेंड ने कब, कितने गहने ख़रीदे, इसकी भी उन्हें पूरी ख़बर रहती है.

 4) मोटापा

कोई महिला चाहे कितनी भी मोटी क्यों न हो, वो अपने लिए मोटा शब्द नहीं सुन सकती, लेकिन दूसरी महिला यदि मोटी है, तो ये गॉसिप का विषय बन जाता है. इसी तरह यदि कोई महिला फिट है और अपनी फिटनेस पर ध्यान देती है, तो उसकी फिटनेस मोटी महिलाओं के गॉसिप का विषय बन जाती है. फिर मोटी महिलाएं, जो ख़ुद तो फिटनेस के लिए कुछ नहीं करतीं, उस फिट महिला की फिटनेस का राज़ जान लेना चाहती हैं. या फिर ये कहती हैं कि ज़रूर वो कोई दवा या ट्रीटमेंट ले रही होगी, वरना इतना फिट रहना कैसे मुमकिन है.

5) सास-बहू 

महिलाओं के लिए ये कभी न ख़त्म होनेवाला विषय है. सास-बहू की नोक-झोंक की तरह ही उनके बारे में गॉसिप होना भी आम बात है. इसमें सास की फ्रेंड्स मिलकर एक-दूसरे की बहू के बारे में गॉसिप करती हैं और बहू की फ्रेंड्स अपनी-अपनी सास की बुराई करती हैं. ये गॉसिप लगभग हर घर की कहानी है.

 6) पड़ोसी

पड़ोसी हमारे जितने अच्छे दोस्त होते हैं, उतने बड़े कॉम्पिटीटर (प्रतिस्पर्धी) भी होते हैं. आपके पड़ोसी ने इतनी जल्दी एक और घर कैसे ख़रीद लिया, उनकी इनकम इतनी जल्दी कैसे बढ़ गई, वो अचानक इतनी महंगी चीज़ें कैसे ख़रीदने लगे हैं… ये तमाम बातें पड़ोसियों की गॉसिप का हिस्सा हैं और एक सोसाइटी में रहनेवाली महिलाएं आपस में अपने-अपने पड़ोसियों के बारे में ऐसी गॉसिप करती रहती हैं. पड़ोसी के घर में कब, क्या हो रहा है, इसकी महिलाएं पूरी ख़बर रखती हैं.

7) पति

महिलाओं की गॉसिप में उनके पति का ज़िक्र न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. पति की तारीफ़ से लेकर उनकी बुराई तक हर बात महिलाएं अपनी फ्रेंड्स के साथ शेयर करती हैं. इस गॉसिप का आलम ये होता है कि महिलाओं को अपने पति की कुछ ख़बर हो या ना हो, लेकिन अपनी फ्रेंड के पति के बारे में सब कुछ पता होता है.

8) अफेयर

ये एक ऐसा विषय है, जिसमें महिलाओं की बहुत रुचि होती है. किसका किसके साथ चक्कर चल रहा है, ये महिलाओं की गॉसिप का एक दिलचस्प टॉपिक होता है. दरअसल, हम सभी को दूसरों की ज़िंदगी में झांकने में बहुत मज़ा आता है, इसीलिए किसी के भी अफेयर की ख़बरें रातोंरात फैल जाती हैं.

9) सेक्स

ये एक ऐसा विषय है, जो पुरुष और महिला दोनों को लुभाता है. फ्रेंड्स के साथ सेक्स के बारे में बात या गॉसिप करने में पुरुष और महिला दोनों को मज़ा आता है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि फ्रेंड्स के साथ सेक्स के बारे में बात करने में कोई झिझक महसूस नहीं होती, लेकिन ऐसा हम किसी और के साथ नहीं कर सकते.

10) सेलिब्रिटीज़

अपने पसंदीदा सेलिब्रिटीज़ के बारे में बात करना पुरुष और महिला दोनों को पसंद आता है. साथ ही किस सेलिब्रिटी की पर्सनल लाइफ में क्या चल रहा है, ये भी पुरुष और महिला दोनों के गॉसिप का ख़ास मुद्दा होता है. सेलिब्रिटीज़ को लोग जितना पसंद करते हैं, उनके बारे में गॉसिप करना भी उतना ही पसंद करते हैं.

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पुरुषों के गॉसिप के 10 टॉपिक

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि स़िर्फ महिलाएं गॉसिप करती हैं. पुरुष भी गॉसिप करते हैं, लेकिन उनके गॉसिप के टॉपिक महिलाओं से अलग होते हैं. आइए, जानते हैं पुरुष किन टॉपिक पर करते हैं गॉसिप-

1) पैसा: परिवार या समाज द्वारा पुरुष पर पैसे कमाने का प्रेशर हमेशा बना रहता है, इसलिए पुरुष पैसे के बारे में गॉसिप करना पसंद करते हैं.

2) पावर: पावरफुल लोगों के जीवन से जुड़ी अच्छी-बुरी बातों का ज़िक्र करना पुरुषों को बहुत पसंद आता है, इसलिए वो अपने दोस्तों के साथ इस विषय पर गॉसिप करना पसंद करते हैं.

3) प्रमोशन: पैसे की तरह ही प्रमोशन भी पुरुषों की गॉसिप का हॉट टॉपिक होता है. किसे, कितना प्रमोशन मिला, ये जानने में पुरुषों की बहुत दिलचस्पी होती है.

4) सेक्स: ऐसा माना जाता है कि पुरुष दिनभर में कई बार सेक्स के बारे में सोचते हैं, इसीलिए जब वो अपने दोस्तों के साथ बैठते हैं, तो इस विषय पर बात करने में उन्हें बहुत मज़ा आता है.

5) अफेयर: महिलाओं की तरह ही पुरुषों को भी दूसरों के अ़फेयर के बारे में जानने में बहुत दिलचस्पी होती है, इसलिए वो इस बारे में गॉसिप करना पसंद करते हैं.

6) स्पोर्ट्स: स्पोर्ट्स लगभग सभी पुरुषों को पसंद आता है और इस पर बात करने में भी उनकी बहुत दिलचस्पी होती है.

7) सेलिब्रिटीज़: महिलाओं की तरह ही पुरुषों को भी सेलिब्रिटीज़ की ज़िंदगी में झांकना अच्छा लगता है.

8) एडवेंचर: पुरुषों को वाइल्ड लाइफ, कोई खोज, युद्ध जैसे एडवेंचर बहुत पसंद आते हैं, इसीलिए जब कुछ दोस्त साथ मिलकर बातें करते हैं, तो उनकी बातचीत में एडवेंचर भी शामिल होता है.

9) साइंस: विज्ञान से जुड़े शोध, रिसर्च आदि बातों में भी पुरुषों की बहुत दिलचस्पी होती है और मौक़ा मिलते ही वो इस बारे में अपना ज्ञान बघारने में पीछे नहीं रहते.

10) टेक्नोलॉजी: लेटेस्ट मोबाइल, कैमरा, कार आदि पुरुषों को बहुत आकर्षित करते हैं, इसलिए जब वो अपने दोस्तों के साथ होते हैं, तो इनके बारे में बात करना नहीं भूलते.

गॉसिप के 10 फ़ायदे 

गॉसिप करने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते उससे किसी का, किसी भी तरह से कोई नुक़सान न हो रहा हो. फ्रेंड्स के साथ फन के लिए की गई गॉसिप के कई फ़ायदे भी हैं.

* हंसी-मज़ाक का बेहतरीन माध्यम है

* स्ट्रेस दूर होता है

* फ्रेंड्स के साथ बॉन्डिंग बढ़ती है

* नए फ्रेंड्स बनते हैं

* सेंस ऑफ ह्यूमर बढ़ता है

* ख़बरों से अपडेटेड रहते हैं

* लोगों में जल्दी घुल-मिल जाते हैं

* थोड़ी देर के लिए सब कुछ भूल जाते हैं

* नई जानकारी मिलती है

* रिश्तों और दुनियादारी को समझ पाते हैं

 – कमला बडोनी

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