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बढ़ते बच्चे बिगड़ते रिश्ते (How Parent-Child Relations Have Changed)

कल तक हमारी हर बात में हां में हां मिलानेवाला बच्चा जब हमारे निर्णय पर सवाल उठाने लगता है, तो ज़्यादातर माता-पिता बच्चे के व्यवहार में आए इस बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते, जिसका असर उनके ख़ूबसूरत रिश्ते पर पड़ने लगता है. काउंसलिंग सायकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ बता रही हैं कि टीनएज बच्चों के व्यवहार में बदलाव क्यों आते हैं और उम्र के इस नाज़ुक दौर में उनके पैरेंट्स को बच्चों के साथ किस तरह डील करना चाहिए, ताकि रिश्तों की डोर मज़बूत बनी रहे.

Parent-Child Relations

शिकायतों का सिलसिला

अधिकतर टीनएज बच्चों के पैरेंट्स का यही रोना होता है कि उनका बच्चा पहले जैसा नहीं रहा. बात-बात पर ग़ुस्सा होना, उल्टा जवाब देना, दोस्तों को ही अपना सब कुछ समझना… तक़रीबन हर दूसरे पैरेंट्स की अपने टीनएज बच्चे से यही शिकायत होती है. वहीं दूसरी तरफ़ बच्चे इस बात की कंप्लेन करते हैं कि उनके अभिभावक उन्हें समझते ही नहीं और न ही उन पर विश्‍वास करते हैं.

क्यों आते हैं बदलाव?

12 से 18 साल की उम्र मेंबच्चों में बहुत-से हार्मोनल व इमोशनल चेंजेज़ आते हैं. प्यूबर्टी के हिसाब से देखा जाए, तो टीनएन में चार प्रकार के बदलाव आते हैं.

शारीरिक बदलावः 11-12 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बच्चों के शरीर में बदलाव आने शुरू हो जाते हैं. यह बदलाव बहुत-से बच्चों के लिए मुश्किलोंभरे होते हैं, जिससे वे आसानी से डील नहीं पाते. उदाहरण के लिए बचपन में जिस गोलमटोल बच्चे को ‘क्यूट’ कहकर सब उसे प्यार करते थे, जब वही बच्चा 11-12 साल की उम्र में पहुंचता है, तो मोटापे के कारण लोग उसे रिजेक्ट करने लगते हैं या उसकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं. ऐसे में बच्चे को ख़ुद भी समझ में नहीं आता कि आख़िर लोग अब उसे क्यों नापसंद करने लगे हैं. इससे कुछ बच्चों को साइकोलॉजिकल ट्रॉमा होता है.

सामाजिक बदलावः इस उम्र में आते-आते बच्चों को ख़ुद को देखने का नज़रिया और लोगों का उनके प्रति नज़रिया, दोनों ही बदलने लगता है. उनकी सोशल इमेज बनना शुरू हो जाती है. वे अपना व्यक्तित्व विकसित करने की कोशिश करते हैं. बच्चे ख़ुद से ‘मैं क्या हूं’ जैसे सवाल करते हैं. ऐसे में अपनी इंडीविज़ुएलिटी सेट करने में किसी बच्चे को ज़्यादा समय लगता है, तो किसी को कम.

मनोवैज्ञानिक बदलावः इस अवस्था में बच्चों में बहुत-से मनोवैज्ञानिक बदलाव भी आते हैं, लेकिन सारे साइकोलॉजिकल बदलाव सकारात्मक नहीं होते. कुछ बच्चे अकेलापन, असुरक्षा इत्यादि महसूस करने लगते हैं.

आध्यात्मिक बदलावः  चौथा बदलाव स्पिरिच्युअल होता है. इस उम्र में बच्चों के ख़्यालात बदलने लगते हैं. उनका ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बदल जाता है. वो नज़रिया उनका अपना होता है. उसमें किसी का कोई योगदान नहीं होता. बच्चे यह चाहते भी नहीं हैं कि उसमें कोई दख़ल दे.

इतने सारे बदलावों के कारण ही किशोरावस्था को ज़िंदगी का सबसे कठिन दौर कहा जाता है. इन सभी बदलावों को स्वीकार करने में 3 से 5 साल यानी तक़रीबन पूरी किशोरावस्था लग जाती है. इन्हीं बदलावों के कारण इस दौर में पैरेंट्स का रोल भी काफ़ी हद तक बदल जाता है, लेकिन ज़्यादातर पैेंरेट्स बदलाव के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होते.

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पैरेंट्स से कहां होती है चूक?

पैरेंट्स के लिए बच्चा हमेशा बच्चा ही रहता है. वे हमेशा ही करेक्शन मोड में रहते हैं.  बच्चा जब 10 साल का होता है तब भी वे उसे करेक्ट करने में लगे रहते हैं और जब वह 12-13 साल का हो जाता है, तब भी वे उसी ढर्रे पर चलते रहते हैं. ऐसे बैठो, ऐसे बात करो, ऐसे कपड़े मत पहनो, यहां मत जाओ… इत्यादि. वे बच्चे को अपनी तरह से रखना चाहते हैं. स्वाभाविक है कि बढ़ते बच्चों को इतनी रोक-टोक पसंद नहीं आती, क्योंकि वे माता-पिता के प्री-डिफाइंड दायरे में नहीं रहना चाहते. भले ही अभी तक उन्होंने दुनिया को माता-पिता की उंगली पकड़कर देखा हो, लेकिन अब वे अपने अनुभव ख़ुद अर्जित करना चाहते हैं. अपनी सीमा, अपनी दिशा ख़ुद तलाशना चाहते हैं और वहीं से बच्चे व माता-पिता के बीच संबंध बिगड़ने शुरू हो जाते हैं.

क्या तरीक़ा है सही?

बच्चे को सही रास्ता दिखाना कोई ग़लत बात नहीं है, लेकिन उसका तरीक़ा सही होना चाहिए.

बोलिए कम, सुनिए ज़्यादाः  इस उम्र के बच्चों को समझाने का तरीक़ा अलग होता है, जो पैरेंट्स को डेवलप करना चाहिए, क्योंकि डांट-डपटकर बात समझाने से बात बनने की बजाय बिगड़ सकती है. टीनएज से बात करते समय कान बड़े और ज़ुबान छोटी रखनी चाहिए यानी बोलना कम और सुनना ज़्यादा चाहिए. उनकी बात सुनिए और जब वे पूछें, तो ही अपनी राय रखिए. अगर वे राय नहीं मांगें, तो स़िर्फ सुनिए. बिना मांगे राय मत दीजिए. यदि राय देनी भी हो, तो तरीक़ा रिक्वेस्ट वाला होना चाहिए, न कि ऑर्डर वाला.

दूसरों से सीखिएः हर किसी को टीनएज बच्चे को डील करने का तरीक़ा नहीं पता होता और इसमें कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन यह तरीक़ा सीखना ज़रूरी है. अभिभावकों के लिए ज़रूरी है कि वे बच्चे में आए बदलावों के साथ एडजस्ट करें. टीनएज पैरेंटिंग एक कला है. कला में निपुण होने के लिए अभ्यास की ज़रूरत होती है. अपने आस-पास पड़ोस या रिश्तेदारी में आपको जिसकी पैरेंटिंग स्टाइल पसंद हो, उसके साथ हेल्दी डिस्कशन कीजिए. उनकी पैरेंटिंग स्टाइल पर राय लीजिए. रास्ते अपने आप बनते जाएंगे.

कमियों को स्वीकारेंः इस उम्र के बच्चे को भी अटेंशन चाहिए होता है. उसके क़रीब जाने के लिए उसकी तारीफ़ कीजिए. उसके फेलियर को भी स्वीकार करना सीखिए और उसकी कोशिशों के लिए उसका हौसला बढ़ाइए. इससे उसका स्ट्रेस लेवल कम होगा और वो आपके क़रीब आएगा.

रिश्तों में खुलापन लाइएः  अभिभावक को अपने बच्चे के साथ ऐसा रिलेशन डेवलप करना चाहिए, जिससे उनका बच्चा बिना डर या झिझक के उनके साथ अपनी  हर तरह की बात शेयर कर सके. बच्चे को अकेलेपन का एहसास नहीं होने देना चाहिए. पैरेंट्स के दिमाग़ में इतना खुलापन होना चाहिए कि वे इस बात को स्वीकार कर सकें कि अगर बच्चा कुछ ग़लत भी कर रहा है, तो बच्चा नहीं, बल्कि उसका काम ग़लत है. अगर आप बच्चे को ही ग़लत ठहरा देंगे तो सारे रास्ते बंद हो जाएंगे, इसलिए पैरेंट्स को बच्चे के व्यवहार को ग़लत ठहराना चाहिए, न कि बच्चे को. कहने का अर्थ यह है कि बच्चे को रिजेक्ट न करें. पैरेंट्स को अपने बच्चे को इतनी छूट देनी  चाहिए कि कोई ग़लती होने पर वो उनके पास आकर उसे स्वीकारें, न कि डर के मारे उस पर परदा डाल दें.

रिएक्ट, नहीं एक्ट कीजिएः अभिभावकों को बच्चे की ग़लती पर तुरंत किसी तरह का रिएक्शन नहीं देना चाहिए. अगर आप उन पर ग़ुस्से से चिल्लाएंगे, तो वो भी आप पर चिल्ला सकता है, इसलिए उसकी बात सुनिए और तुरंत रिएक्ट करने की बजाय एक्ट कीजिए. एक्ट करने का मतलब है कि सोच-समझकर बोलना या फैसला देना.

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ज़िम्मेदारी सौंपिएः बढ़ते बच्चे के स्वतंत्र व्यक्तित्व को मान्यता देना ज़रूरी है. उसे रोकने-टोकने की बजाय ज़िम्मेदारी सौंपें. यानी इंस्ट्रक्टर नहीं, फेसिलिटेटर बनिए. यदि आप चाहते हैं कि बच्चा आपके मुताबिक़ चले, तो उसे अपनी जायदाद न समझिए. अपने अहम् को परे रखकर परिस्थिति को देखने का प्रयास करिए. बच्चों के साथ चर्चा करते रहिए. उसके लक्ष्य और उद्देश्य को सिरे से ख़ारिज करने से बचिए.

– वेदिका शर्मा

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