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सेहत को नुक़सान पहुंचाते हैं ये गैजेट्स (These Gadgets Can Be Harmful To Your Health)

हाल ही हुए एक अध्ययन में यह साबित हुआ है कि औसतन एक वयस्क 24 घंटे की अवधि में से 8 घंटे 21 मिनट की नींद लेने की तुलना में डिजिटल वर्ल्ड/सोशल मीडिया पर उतना ही व़क्त (यानी 8 घंटे 21 मिनट) व्यस्त रहता है. दूसरे शब्दों में कहें तो अगर हम 16-17 घंटे जागते हैं, तो उसका आधा व़क्त तो हम डिजिटल प्लेफार्म पर ही घूमते रहते हैं. ऐसा करके हम न केवल गैेजेट्स (Gadgets) तक सिमट कर रह गए हैं, बल्कि अनेक बीमारियों (Diseases) को न्योता दे रहे हैं. आइए जाने कैसे?

 

Harmful Gadgets

लैपटॉप/कंप्यूटर

घंटों लैपटॉप/कंप्यूटर पर बैठकर काम करने से सिरदर्द, कमर-गर्दन-कंधों में दर्द होेने लगता है. इतना ही नहीं, यदि आपके बैठने का पोश्‍चर और डेस्क डिज़ाइनिंग भी सही नहीं है, तो भविष्य में जोड़ों व मांसपेशियों संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसके साथ ही लैपटॉप/कंप्यूटर से आंखों पर बुरा असर पड़ता है और कार्पल टर्नल सिंड्रोम का ख़तरा भी बढ़ जाता है, जिससे हाथों की संवेदनशीलता कम होती है और कलाइयों पर दर्द की शिकायत रहती है.

कैसे बचें?

– कंप्यूटर/लैपटॉप पर काम करते हुए हर एक-डेढ़ घंटे के बाद ब्रेक लें.
– हर 1 घंटे के बाद 2-3 मिनट के लिए आंखों को आराम दें.
– ऑफिस वर्क के लिए बड़ी स्क्रीनवाले लैपटॉप का इस्तेमाल करें. इससे पोश्‍चर पर अधिक दबाव नहीं पड़ता.
– लैपटॉप की स्क्रीन आंखों के लेवल पर होनी चाहिए, ताकि स्क्रीन को देखने के लिए गर्दन को घुमाना या मोड़ना न पड़े.
– कीबोर्ड को सही लेवल पर रखें, जिससे
कोहनी को आराम मिले.
– माउस यूज़ करते समय स़िर्फ कलाई का नहीं, पूरे हाथ का इस्तेमाल करें.
– स्पीड में टाइप करने की बजाय हल्के व धीरे से करें.
– डेस्क पर बैठे-बैठे स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज़ करें.
– कंप्युटर पर काम करते समय विशेष रूप से डिज़ाइन की गई कुर्सी का इस्तेमाल करें, जिससे बैठते व़क्त स्पाइन को स्पोर्ट मिले.
– काम के दौरान 10 मिनट का ब्रेक लेकर वॉक करें.
– घर पर लैपटॉप/कंप्यूटर पर काम करने का समय निर्धारित करें.

मोबाइल

विश्‍व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों द्वारा किए गए शोधों से अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि मोबाइल से निकलनेवाली रेडिशएन से किसी को स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्या (कैंसर आदि) हुई हो, लेकिन मोबाइल एडिक्ट होने के कारण नींद पूरी न होना, एकाग्रता में कमी, सिरदर्द, गर्दन व कंधों में दर्द, आंखों पर दबाव, धंधलापन, ड्राई आइज़, रेडनेस, इरिटेशन, ब्रेन एक्टिविटी में बाधाएं और सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि जैसी समस्याएं ज़रूर बढ़ गई है.

कैसे बचें?

– मोबाइल सिलेक्ट करते समय ऐसे मॉडल का चुनाव करें, जिसका स्पेसिफिक ऑबज़र्वेशन रेट (एसएआर) कम हो.
– बात करते समय मोबाइल को कान से
सटाकर रखने की बजाय थोड़ी दूरी पर रखें.
– लेटकर बात करते समय मोबाइल को छाती या पेट के ऊपर न रखें.
– मोबाइल पर बात करने के लिए हैंड्स-फ्री डिवाइस (ईयरफोन) का इस्तेमाल करें.
– जहां तक संभव हो मोबाइल की बजाय लैंडलाइन का प्रयोग करें.
– कोशिश करें कि मोबाइल पर 15 मिनट से ज़्यादा समय तक बात न करें.
– सेलफोन पर बहुत देर तक बात करने की बजाय टैक्स्ट मैसेज करें.
– 1 घंटे तक लगातार मैसेज/चैटिंग करने से भी उंगलियों के टिप पर दर्द होने लगता है. इसलिए बेवजह मैसेज/चैटिंग करने से बचें.
– छोटे बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल न दें.
– सड़क पर चलते समय और ड्राइविंग करते समय मोबाइल पर बात न करें. यह छोटी-सी भूल आपके लिए जानलेवा साबित हो सकती है.

 

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टेलीविजन

हाल ही में ‘हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ में किए गए शोध से यह साबित हुआ है कि बहुत अधिक टेलिविजन देखने से शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती है, जिससे अनहेल्दी फूड हैबिट, मोटापा, दिल से जुड़ी बीमारियां और टाइप2 डायबिटीज़ के होने का ख़तरा 20% तक बढ़ जाता है.

कैसे बचें?

– टीवी देखने की बजाय कोई हॉबी क्लास जाएं.
– वर्कआउट के लिए जिम, जॉगिंग, ऐरोबिक्स, स्विमिंग, टेनिन जाएं.
– टीवी देखते समय मंचिंग से बचें.
– डिनर टाइम को फैमिली टाइम बनाएं यानी डिनर के समय टीवी बंद रखें.
– यदि आपके पास पर्याप्त खाली समय है, तो कोई पार्ट-टाइम बिज़नेस या काम शुरू करें.
– बच्चों को टीवी की बजाय फिज़िकल एक्टिव़िटीज़ में हिस्सा लेने के प्रोत्साहित करें.
– टीवी देखने का समय निर्धारित करें, जिससे आपकी टीवी देखने की बुरी आदत धीरे-धीरे कम हो जाए.
– टीवी देखने की बजाय परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं, जैसे- कैरम बोर्ड, चैस आदि गेम खेलें.
– टीवी की बजाय अपना फेवरेट म्यूज़िक सुनें.

वीडियो गेम

बहुत देर तक वीडियो गेम्स खेलने से मांसपेशियों में दर्द, मोटापा, विटामिन डी की कमी और नींद में बाधा उत्पन्न होती है. ‘द पीडियाट्रिक्स इंटरनेशनल जर्नल’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, घंटों तक वीडियो गेम्स खेलने से कंधों की मांसपेशियों में जकड़न बढ़ जाती है. इसके अलावा अनेक वीडियो गेम्स का प्रेजेटेंशन इतना आकर्षक होता है कि बच्चों में गेम जीतने का तनाव, उत्तेजना और मानसिक तनाव हावी होने लगता है.

कैसे बचें?

– वीडियो गेम्स खेलते समय बच्चों पर नज़र रखें कि वह किस तरह के गेम खेल रहे हैं.
– उम्र के अनुसार गेम का चुनाव करें.
– गेम खेलते समय जब वह तनाव या निराशा महसूस करें, तो गेम बंद कर दें.
– उन्हें उत्तेजित व आक्रामक गेम्स खेलने से रोकें.
– 1-2 घंटे तक गेम खेलने की बजाय उनका समय निर्धारित करें.
– उन्हें वीडियो गेम में व्यस्त रखने की बजाय फिजिकल एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करें.
– सोने से पहले वीडियो गेम न खेलने दें. उन्हें समझाएं कि उत्तेजक व आक्रमक गेम खेलने से नींद में बाधा उत्पन्न होती है.
– बच्चों को वीडियो गेम खेलने दें, लेकिन इसकी लत न लगने दें. पैरेंट्स ख़ासतौर से इस बात का ध्यान दें.

– पूनम नागेंद्र शर्मा

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एंटीबायोटिक्स क्यों हैं ख़तरनाक? (Why Antibiotics are Harmful for Your Health)

Antibiotics side effects

Antibiotics side effects

बीमारियों में तुरंत आराम के चक्कर में एंटीबायोटिक्स (Antibiotics side effects) का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन ये स्थिति कई प्रॉब्लम्स की वजह बन सकती है. कई रोगों के इलाज के लिए उपयोग होनेवाली एंटीबायोटिक्स ख़ुद बीमारी की वजह बन सकती है.

एंटीबायोटिक एक ऐसी दवा है, जो इंफेक्शन व कई गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती है. लेकिन एंटीबायोटिक्स का अगर सही तरी़के से इस्तेमाल नहीं किया गया, तो लाभ की जगह ये नुक़सान पहुंचा सकती है. अगर आप जान लें कि एंटीबायोटिक्स कब इस्तेमाल करनी चाहिए और कब नहीं, तो आप ख़ुद को व अपने परिवार को इसके ख़तरे से बचा सकते हैं.

एंटीबायोटिक्स की ए बी सी…
* आज एंटीबायोटिक्स सबसे ज़्यादा प्रिस्क्राइब की जानेवाली दवा बन गई है और चूंकि इससे तुरंत आराम मिलता है, इसलिए हम भी चाहते हैं कि डॉक्टर एंटीबायोटिक ज़रूर दे. कई डॉक्टर भी ज़रूरी न होने पर भी एंटीबायोटिक्स लिख देते हैं. कुल मिलाकर दुनियाभर में एंटीबायोटिक्स का उपयोग की बजाय दुरुपयोग हो रहा है.

* सबसे पहले तो ये जान लें कि एंटीबायोटिक्स बेहद इफेक्टिव दवा ज़रूर है, लेकिन ये हर बीमारी का इलाज नहीं है.

* ये भी ध्यान रखें कि एंटीबायोटिक्स सिर्फ़ बैक्टीरियल इंफेक्शन से होनेवाली बीमारियों पर असरदार है. वायरल बीमारियों, जैसे- सर्दी-ज़ुकाम, फ्लू, ब्रॉन्काइटिस, गले में इंफेक्शन आदि में ये कोई लाभ नहीं देती.

* ये वायरल बीमारियां ज़्यादातर अपने आप ठीक हो जाती हैं. हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता इन वायरल बीमारियों से ख़ुद ही निपट लेती हैं. इसलिए अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की  कोशिश करें.

* हां, बैक्टीरियल इंफेक्शन से होनेवाली हेल्थ प्रॉब्लम्स में कई बार एंटीबायोटिक्स लेना ज़रूरी हो जाता है.

* एंटीबायोटिक्स तभी लें, जब ज़रूरी हो और जब डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब किया हो, वरना ऐसा हो जाएगा कि जब आपको सही में एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत होगी, तब वो बेअसर हो जाएगी. दरअसल, एंटीबायोटिक्स लेने से सभी बैक्टीरिया नहीं मरते और जो बच जाते हैं, वे ताक़तवर हो जाते हैं. इन बैक्टीरियाज़ को उस एंटीबायोटिक्स से मारना असंभव हो जाता है. ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट बैक्टीरिया कहलाते हैं.

* ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट बैक्टीरिया ज़्यादा लंबी और गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं और इन बीमारियों से लड़ने के लिए ज़्यादा स्ट्रॉन्ग एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत होती है, जिनके और ज़्यादा साइड इफेक्ट्स होते हैं.

* ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट बैक्टीरिया बहुत तेज़ी से फैलते हैं और आपके परिवार के सदस्य, बच्चे और आपके साथ काम करनेवालों को भी अपना शिकार बनाते हैं. और हो सकता है कि एक स्टेज ऐसा भी आ जाए कि सभी ऐसे इंफेक्शन से घिर जाएं, जिसका इलाज मुश्किल हो.

* एंटीबायोटिक्स दवाएं अनहेल्दी व हेल्दी बैक्टीरिया के बीच फ़र्क़ नहीं कर पातीं, यही वजह है कि ये अनहेल्दी बैक्टीरिया के साथ-साथ हेल्दी बैक्टीरिया को भी मार देती हैं.

* दुनियाभर में नई एंटीबायोटिक्स का विकास रुक गया है और एंटीबायोटिक दवाओं के बहुत ज़्यादा व ग़लत इस्तेमाल से जो एंटीबायोटिक दवाएं उपलब्ध हैं, वे बेअसर हो रही हैं और ये दुनियाभर के मेडिकल एक्सपर्ट्स के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि ऐसी स्थिति में कई बीमारियों का इलाज मुश्किल हो जाएगा.

* ध्यान रखें कि जिन एंटीबायोटिक्स की आपको ज़रूरत नहीं है, उसे लेने से आप अच्छा महसूस नहीं करेंगे, ना ही ये आपकी किसी तकलीफ़ का इलाज है, बल्कि ये आपको नुक़सान ही पहुंचाएंगे.

Antibiotics side effects

एंटीबायोटिक के साइड इफेक्ट्स

* उल्टी महसूस होना या चक्कर आना
* डायरिया या पेटदर्द
* एलर्जिक रिएक्शन. कई बार एलर्जी इतनी गंभीर हो सकती है कि आपको इमर्जेंसी केयर की ज़रूरत पड़ सकती है.
* महिलाओं में वेजाइनल यीस्ट इंफेक्शन की शिकायत भी हो सकती है.

क्यों हैं ख़तरनाक?
* एंटीबायोटिक्स के प्रति हमारा रवैया बेहद लापरवाही भरा है और हम इसे आम दवा समझकर धड़ल्ले से इसका सेवन करते हैं.
* ये सस्ती हैं और आसानी से उपलब्ध भी.
* केमिस्ट बिना किसी डॉक्टर की पर्ची के भी एंटीबायोटिक्स बेचते हैं.
* 70-75% डॉक्टर्स सामान्य सर्दी-ज़ुकाम के लिए भी एंटीबायोटिक्स लिख देते हैं.
* आश्‍चर्यजनक तौर पर 50% मरीज़ ख़ुद एंटीबायोटिक्स दवाएं लेने पर ज़ोर देते हैं.

एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट होने के परिणाम
दुनियाभर में डॉक्टर्स और मरीज़ों द्वारा एंटीबायोटिक्स का दुरुपयोग हो रहा है. नतीजा बैक्टीरिया इन दवाओं के प्रति इतने रेज़िस्टेंट हो रहे हैं कि इन एंटीबायोटिक्स का उन पर कोई असर ही नहीं हो रहा है. आसान शब्दों में बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं से ज़्यादा ताक़तवर हो रहे हैं. ये स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है और इसके परिणाम भी.
क्या हो सकता है?
* गंभीर बीमारियां या विकलांगता
* पूर्व में जिन रोगों का उपचार संभव होता है, वही रोग अब इतने गंभीर हो जाते हैं कि मौत तक का कारण बन सकते हैं.
* बीमारी में ठीक होने में लंबा समय लग सकता है.
* बार-बार डॉक्टर के चक्कर लगाने या हॉस्पिटल में एडमिट होने की नौबत आ सकती है.
* किसी भी ट्रीटमेंट का उतनी जल्दी असर नहीं होता.
* इन सब वजहों से ट्रीटमेंट महंगा भी पड़ सकता है.

तो क्या करें?
जिस तरह नई एंटीबायोटिक्स का विकास नहीं हो रहा है और जो एंटीबायोटिक्स हैं, वे बेअसर हो रहे हैं, उसे देखते हुए बेहद ज़रूरी हो गया है कुछ क़दम उठाना, ताकि इन एंटीबायोटिक्स की उम्र को बढ़ाया जा सके और लोगों को एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट इंफेक्शन्स से बचाया जा सके. इसके लिए कई हॉस्पिटल और मेडिकल एसोसिएशन ज़रूरी क़दम उठा रहे हैं और एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को लेकर गाइडलाइन भी बना रहे हैं, लेकिन आपको व हमें भी कुछ क़दम उठाने होंगे, तभी हम और हमारा परिवार हेल्दी रह सकता है. इसके लिए आप निम्न क़दम उठा सकते हैं-

* एंटीबायोटिक्स तभी लें, जब डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब किया हो.

* बल्कि अगर डॉक्टर आपको एंटीबायोटिक्स लिखकर दें, तो उनसे पूछें कि क्या आपको सचमुच एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत है.

* रोज़ाना नियमित समय पर गोलियां लें और कोर्स ज़रूर पूरा करें.

* अगर कोर्स पूरा करने के बाद एंटीबायोटिक गोलियां बच गई हों, तो उन्हें फ़ौरन फेंक दें. ये सोचकर उन्हें रखे न रहें कि अगली बार बीमार होने पर खा लेंगे, क्योंकि ज़रूरी नहीं कि अगली बार बीमार होने पर वही एंटीबायोटिक्स असर करे.

* किसी और व्यक्ति के लिए प्रिस्क्राइब की गई एंटीबायोटिक ख़ुद कभी न लें. भले ही रोग के लक्षण एक समान हों, पर वही एंटीबायोटिक आपकी तकलीफ़ भी दूर करेगी, ये ज़रूरी नहीं.

* डॉक्टर पर कभी एंटीबायोटिक्स देने के लिए दबाव न डालें. डॉक्टर को ज़रूरी लगेगा, तो वे ख़ुद आपको एंटीबायोटिक्स का कोर्स देंगे.

* बैक्टीरिया के अटैक से बचने की कोशिश करें. इसके लिए हाइजीन का ख़्याल रखें. अपने हाथ अच्छी तरह धोएं, ख़ासकर टॉयलेट यूज़ करने के बाद और कुछ भी खाने-पीने से पहले. सब्ज़ियां और फल इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह धो लें. किचन को साफ़-सुथरा रखें.

* बच्चों को ज़रूरी टीके लगवाना न भूलें. कुछ टीके बैक्टीरियल इंफेक्शन से भी सुरक्षा देते हैं.

Antibiotics side effects

 इन लक्षणों को अनदेखा न करें
* आमतौर पर एंटीबायोटिक्स 24-48 घंटों में असर दिखाने लगती हैं. अगर एंटीबायोटिक्स लेने के बाद भी आपको आराम नहीं आ रहा है या निम्न लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो फ़ौरन डॉक्टर से संपर्क करेंः
* एंटीबायोटिक्स लेने के बावजूद तीन दिन से ज़्यादा बुख़ार.
* बढ़ता-घटता बुख़ार, तेज़ कंपकंपी, लो ब्लड प्रेशर आदि बैक्टीरिया के इंफेक्शन के संकेत हैं.
* डायरिया या पेचिश.
* गर्दन, जांघ के ऊपरी हिस्से या बगल में सूजन भरी गांठ.
* तेज़ सिरदर्द.
* स्किन रैशेज़ या फुंसियां, जिन्हें छूने पर दर्द हो. डॉक्टर से ये बातें ज़रूर बताएं-
* डॉक्टर आपको एंटीबायोटिक्स प्रिस्क्राइब कर रहे हैं और अगर आप पहले से कोई और दवाएं ले रहे हैं.
* अगर आप कोई डायट प्लान फॉलो कर रहे हैं या कोई हर्बल सप्लीमेंट्स ले रहे हैं.
* अगर आपको किसी एंटीबायोटिक्स की एलर्जी है. तो इस बारे में अपने डॉक्टर को ज़रूर बताएं, ताकि डॉक्टर उस हिसाब से आपको एंटीबायोटिक्स लिखकर दे.

– प्रतिभा तिवारी

डिजिटल हो गए हैं रिश्ते भी (Relationships becoming digital)

Relationships becoming digital

टेक्नोलॉजी ने जहां हमें पूरी दुनिया से जोड़ दिया है, वहीं हमारे क़रीबी लोगों से दूर भी कर दिया है. जितना हम बाहरी दुनिया से जुड़ते जा रहे हैं, उतना ही शायद अपने घर से कटते जा रहे हैं. दोस्तों-रिश्तेदारों को मैसेज कर ख़ुश करने के चक्कर में सामने बैठे व्यक्ति को भी कभी-कभी हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं. डिजिटल (Relationships becoming digital) होती इस दुनिया के जितने फ़ायदे हैं, शायद उतने ही नुक़सान भी. आइए, एक नज़र डालें, डिजिटल होते ऐसे रिश्तों पर.

जानें डिजिटल (Relationships becoming digital) होते रिश्तों के लक्षण

– किसी भी बात के लिए फोन करने की बजाय मैसेज से काम चलाते हैं. मिलकर बात करना तो दूर की बात है.

– अपने मोबाइल, टैबलेट या लैपटॉप हर व़क्त अपने साथ रखते हैं, यहां तक कि रात को सिरहाने रखकर सोते भी हैं.

– परिवार के लोगों से बात करने की बजाय ऑनलाइन सर्च करने में ज़्यादा मशगूल रहते हैं.

– परिवार या पार्टनर के साथ टीवी देखते व़क्त आंखें टीवी और मोबाइल फोन के बीच ही घूमती रहती हैं. साथ बैठे लोगों की तरफ़ ध्यान ही नहीं जाता.

– खाना बनाते-खाते समय भी आप मोबाइल अपने पास किचन में या डाइनिंग टेबल पर रखते हैं.

– पार्टनर के साथ क्वालिटी समय बिताते व़क्त भी बार-बार मोबाइल स्क्रीन को देखते रहते हैं.

– सुबह सोकर उठने पर सबसे पहले मोबाइल चेक करते हैं.

छूटता पर्सनल टच

– डिजिटल (Relationships becoming digital) होते रिश्तों में आई कॉन्टैक्ट कम होता जा रहा है. एक ही कमरे में बैठे घर के सदस्य बातचीत भी अपने-अपने मोबाइल में देखकर करते हैं. मोबाइल ने ऐसे जकड़ रखा है कि उससे नज़रें हटाकर सामनेवाले की तरफ़ देखकर बात करने की फुर्सत नहीं.

– फिज़िकली हम भले ही एक-दूसरे के साथ होते हैं, पर ध्यान मोबाइल या लैपटॉप पर होता है यानी साथ रहकर भी साथ नहीं रहते.

– आजकल के ज़्यादातर टीनएजर्स और यंगस्टर्स अपने मोबाइल पर गेम खेलने या चैट करने में लगे रहते हैं, जिससे घर पर मौजूद मां, दादा या दादी ख़ुद को अकेला महसूस करते हैैं.

– चैट पर हम कितने भी स्माइली क्यों न भेज लें, पर सामने से बात करने पर अपनों के आंखों की चमक और खिलखिलाती हंसी देखने में जो मज़ा है, वो उस स्माइली में कहां.

– स्मार्टफोन्स के आने से पहले जो समय हम अपने परिवार को देते थे, अब वो समय सोशल मीडिया, लेटेस्ट ऐप्स और गेम्स ने ले ली है.

– रास्ते में जान-पहचान के लोगों को देखकर मुस्कुराना या हाय-हेलो कहना कम होता जा रहा है, क्योंकि हर कोई सिर झुकाए अपने मोबाइल में व्यस्त ही नज़र आता है.

– अड़ोस-पड़ोस में या एक ही फ्लोर पर रहनेवाले भी आमने-सामने बैठकर बात करने की बजाय गु्रप चैट को ज़्यादा तवज्जो देते हैं.

Relationships becoming digital

दूर होते क़रीबी रिश्ते

– एक व़क्त था जब शाम का खाना खाते व़क्त घर के सभी सदस्य दिनभर के अपने अनुभवों को एक-दूसरे से शेयर करते थे. लेकिन आज ये नज़ारा बदल गया है. घर के ज़्यादातर सदस्य अपने-अपने मोबाइल फोन में बिज़ी रहते हैं.

– बेडरूम में भी टेक्नोलॉजी रिश्तों पर भारी पड़ रही है. अपने लैपटॉप पर ऑफिस का काम निपटाते पार्टनर के साथ मिलनेवाले पर्सनल स्पेस पर भी टेक्नोलॉजी का कब्ज़ा होता जा रहा है.

– एक सर्वे में लगभग 80% कपल्स ने माना कि डिनर के व़क्त उनका ध्यान खाने से ज़्यादा अपने मोबाइल या लैपटॉप पर रहता है, जिससे कई बातों पर डिस्कशन नहीं हो पाता. बिना डिस्कशन लिए गए फैसलों से दूसरा पार्टनर ख़ुद को उपेक्षित महसूस करता है.

– सर्वे में शामिल 98% लोगों ने माना कि पहले जहां वो 2-4 महीनों में गेट-टुगेदर कर लेते थे, वहीं अब गु्रप चैट व वीडियो कॉन्फ्रेंस पर ज़्यादा समय निकल जाता है और साल-दो साल बाद ही समय निकाल पाते हैं.

– लोग हक़ीक़त से ज़्यादा वर्चुअल वर्ल्ड में ज़िंदगी जीने लगे हैं. अपने आस-पास बैठे लोगों से बातें करने की बजाय सोशल मीडिया से जुड़े लोगों को अपने अपडेट्स देने में ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं.

– त्योहारों पर परिवारवालों से मिलकर त्योहार मनाने या उसका मज़ा लेने की बजाय सोशल मीडिया पर अपडेट करने में लगे रहते हैं.

रिश्तों को दें पर्सनल टच

– रात के खाने के समय को ‘नो मोबाइल टाइम’ बनाएं. कोई भी उस समय मोबाइल या लैपटॉप इस्तेमाल नहीं करेगा.

– शादीशुदा हैं, तो बेडरूम में जब तक आपका पार्टनर नहीं, तब तक सारे काम निपटा लें, उसके बाद का समय उसे दें, न कि अपने वर्चुअल वर्ल्ड को.

– बच्चों के लिए भी नियम बनाएं कि रात को इतने बजे के बाद मोबाइल स्विच ऑफ कर दें और सुकून से सोएं. इससे उनकी हेल्थ पर भी असर नहीं होगा और वो समय से सोएंगे व उठेंगे.

– परिवार या दोस्तों के साथ बात करते व़क्त मोबाइल को बगल में रख दें. अगर बातचीत बहुत लंबी चले, तो भले ही एक बार चेक कर लें, पर बार-बार ऐसा न करें.

फ़ायदेमंद भी है डिजिटल दुनिया

– भले ही दिन-ब-दिन हमारे रिश्ते डिजिटल(Relationships becoming digital) होते जा रहे हैं, पर कहीं न कहीं ये टेक्नोलॉजी हमें जोड़े रखने में मददगार भी साबित होती है.

– न जाने हमारे कितने दोस्त थे, जो स्कूल-कॉलेज में हमसे बिछड़ गए थे, सोशल मीडिया के ज़रिए हम दोबारा उनसे जुड़ गए हैं.

– हमारे ऐसे कई रिश्तेदार हैं, जिन्हें हम फलां मौसी, फलां बुआ के नाम से ही जानते-पहचानते थे, भला हो इस टेक्नोलॉजी का कि अब हम एक-दूसरे से बातें करते हैं और एक-दूसरे की ज़िंदगी से जुड़ भी गए हैं.

– दूर-दराज़ और देश-विदेश के दोस्तों-रिश्तेदारों के जन्मदिन, सालगिरह आदि पर शुभकामनाएं देना आसान हो गया है. उनकी ख़ुशियों में अब हम भी शामिल हो पाते हैं.

– हमारे बड़े-बुज़ुर्ग बरसों पहले बिछड़े अपने दोस्तों व उनके परिवार से जुड़ पा रहे हैं.

– स्मार्टफोन्स और सोशल मीडिया दिलों को जोड़ने का काम भी करते हैं. व्हाट्सऐप, फेसबुक और स्काइप के ज़रिए चाहनेवाले 24 घंटे एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं.

– लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप अब दूर नहीं, क्योंकि आप हर व़क्त अपनों के दिल के क़रीब रहते हैं.

– नए रिश्तों को जोड़ने में भी टेक्नोलॉजी काफ़ी मददगार साबित हो रही है. डिजिटल(Relationships becoming digital) दुनिया में बहुतों को अपने हमसफ़र मिल जाते हैं.

– चैट ग्रुप्स के ज़रिए आप अपनों के हमेशा क़रीब रहते हैं.

– परिवार में कोई फंक्शन हो या किसी का जन्मदिन या सालगिरह हर कोई उन्हें अपनी बधाइयां पहुंचाता है और उनकी ख़ुशियों को चार गुना बढ़ा देती है.

– हर रोज़ चैट के ज़रिए सबको एक-दूसरे की ख़बर मिलती रहती है, इसलिए दूरी का एहसास नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ाव और बढ़ गया है.

75% महिलाओं ने माना कि मोबाइल उनके रिश्ते को बिगाड़ रहा है
‘स्मार्टफोन्स रिश्ते को किस तरह प्रभावित कर रहा है?’ इस विषय पर अमेरिका की दो यूनिवर्सिटीज़ द्वारा महिलाओं पर हाल ही में सर्वे किया गया, जिसमें 75% महिलाओं ने माना कि मोबाइल उनके रिश्ते को बिगाड़ रहा है. मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक पति-पत्नी की गृहस्थी में ‘स्मार्टफोन’ तीसरे पहिए के रूप में शामिल होता जा रहा है, जो उनके रिश्ते के लिए ठीक नहीं.

– सर्वे में शामिल 75% महिलाओं ने माना कि स्मार्टफोन की लत उनकी लव लाइफ के लिए ख़तरा बनती जा रही है.

– 62% महिलाओं ने माना कि जब वो अपने पार्टनर के साथ समय बिताने की कोशिश करती हैं, तो उनका आधा ध्यान अपने मोबाइल पर ही होता है, जिसे वो बार-बार चेक करते रहते हैं.

– 75% महिलाओं ने माना कि टेक्नोलॉजी उनके रिश्ते को बिगाड़ रही है. उनके रिश्ते के बीच टेक्नोलॉजी ने अपनी ख़ास जगह बना ली है.

– अनीता सिंह

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