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अधिकांश महिलाओं के लिए पीरियड्स एक बेहद दर्दनाक अनुभव होता है, उन्हें इतना दर्द होता है कि पीरियड्स को लेकर मन में डर बैठ जाता है. इससे छुटकारा पाने के लिए वो अक्सर पेनकिलर का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन दर्दनिवारक दवाओं के अपने साइडइफेक्ट होते हैं इसलिए बेहतर होगा कि घरेलू उपायों को जाना और अपनाया जाए तो बेहद सरल होने के साथ साथ कारगर भी हैं.

पपीते का सेवन: पपीते की तासीर गर्म मानी जाती है और अक्सर दर्द की वजह होती है खुलकर फ्लो का ना होना, ऐसे में पपीता खायें क्योंकि इससे खुलकर फ्लो होता है और दर्द में आराम आता है. यही नहीं पपीता पेट के लिए भी काफ़ी अच्छा माना जाता है और पाचन को सही रखता है.

अदरक और काली मिर्च: अदरक को पानी में उबाल कर चाय की तरह पिएँ. अदरक के टुकड़े करके पानी में डालकर चाय बना लें, चाहें तो काली मिर्च भी मिला लें या फिर अदरक के टुकड़े करके उन्हें चबाकर खाएँ. यह पाचन को भी बेहतर करता है.
अजवायन: यह भी पेट के लिए बेहद फ़ायदेमंद है. इसकी भी तासीर गर्म होती है और यह गैस की समस्या से निजात दिलाने में कारगर है. अक्सर माहवारी के समय गैस की समस्या बढ़ जाती है जो दर्द की एक वजह होती है.

तुलसी की पत्तियाँ: चाय में इसे डालें क्योंकि इसमें दर्दनिवारक तत्व होते हैं जो काफ़ी तहाए पहुँचाते हैं.

जीरा: यह गर्भाशय को साफ़ करता है. इसमें दर्दनिवारक गुण भी हैं. जीरे की चाय बनाकर पिएं, पानी में भी उबालकर इसे पी सकती हैं या यूं ही चटकीभर जीरा चबा चबा कर खाएँ. इससे काफ़ी आराम मिलेगा.

Menstrual Cramps

मेथी: रात को एक कप पानी में एक टीस्पून मेथीदाना भिगो दें और अगले दिन इस पानी क सेवन करें.

गर्म पानी से सिकाई: एक बोतल में गर्म पानी भरकर उससे सिकाई करें काफ़ी आराम मिलेगा. यह पारंपरिक उपाय काफ़ी लोग अपनाते हैं, क्योंकि यह सबसे आसान और कारगर भी है.

तिल का तेल: इससे पेडू में यानी पेट के निचले भाग में हल्के हाथों से मालिश करें. यह गर्माहट और आराम देगा.
एक्सरसाइज़: शोध बताते हैं कि एरोबिक्स से पेन में काफ़ी राहत मिलती है. जो महिलाएँ लगातार दो महीनों तक हफ़्ते में तीन बार आधे घंटे एरोबिक्स करती हैं उन्हें पीरियड्स में दर्द बेहद कम होने लगता है. अगर एरोबिक्स नहीं करना चाहतीं तो सिर्फ़ नंगे पैर ज़मीन पर या घास पर चलें इससे भी दर्द में आराम मिलता है. अगर आप नियमित रूप से योग करती हैं तो भी पेन में आराम मिलेगा और आप ऐसे योगा पोज़ भी ट्राई कर सकती हैं जो इस दर्द में आराम दिलाते हैं.

मेडिटेशन: सांस लेने की तकनीक आपको काफ़ी निजात दिला सकती है. यह मांसपेशियों को रिलैक्स करती है और इसे रिलैक्सेशन टेकनीक ही कहा जाता है. यह रक्त संचार बेहतर करके मस्तिष्क को सुकून का एहसास कराती हैं, दर्द पैदा करनेवाले हार्मोन्स को कम करके राहत का आभास कराती है.
नमक का सेवन कम करें और पानी खूब पिएं: पीरियड्स आने से कुछ दिन पहले से नमक खाना या तो बंद कर दें या कम करें, मसालेदार भोजन, तला-भुना भी ना खाएँ और फ़र्क़ देखें. इस तरह का खाना वॉटर रिटेंशन को बढ़ाता है जिससे गैस, अपच, भारीपन होता है और दर्द का एहसास ज़्यादा होता है. साथ ही पानी खूब पिएँ ताकी डीहाईड्रेट ना हों.

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कोरोनावायरस अब भारत पहुंच गया है, लेकिन आपको कोरोनावायरस से डरने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है. भारत में कोरोनावायरस के जो मामले पाए गए हैं, उनमें कई लोगों की रिपोर्ट निगेटिव पाई गई है, फिर भी सावधानी के तौर पर स्वास्थ्य मंत्रालय कोरोनावायरस से बचाव की जानकारी लगातार दे रहा है. कोरोनावायरस से बचने के लिए कई लोगों ने एन-95 मास्क पहनना शुरू कर दिया है. कोरोना वायरस को लेकर जो भ्रांतियां और डर का माहौल पैदा किया जा रहा है, आप उससे घबराएं नहीं. कोरोना वायरस एक आम सीज़नल वायरस की तरह ही है, जो थोड़ी-सी सावधानी और इलाज से ठीक हो जाता है. हम आपको बता रहे हैं कोरोना वायरस से बचने के आसान घरेलू उपाय, जिनसे आप कोरोना वायरस से बचे रह सकते हैं.

कोरोनावायरस से बचाव के लिए लोग ले रहे हैं इन चीज़ों का सहारा
कोरोनावायरस की ख़बर से लोग इस कदर डरे हुए हैं कि बचाव के लिए उन्हें जो भी जानकारी मिल रही है, वो उसका प्रयोग करना शुरू कर रहे हैं. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के एक बयान के अनुसार, अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि फेस मास्क कोरोनावायरस से बचाव करने में लाभदायक है या नहीं, फिर भी सावधानी के तौर पर लोग फेस मास्क का प्रयोग कर रहे हैं. दिल्ली, आगरा आदि शहरों में लोग इतने डरे हुए हैं कि हर कोई सावधानी के तौर पर मास्क खरीद रहा है. इसके चलते एन-95 मास्क की डिमांड इतनी बढ़ गई है कि मार्केट में एन-95 मास्क की कमी हो गई है. इसी तरह मार्केट में हैंड सैनिटाइज़र की भी डिमांड बढ़ गई है और इनकी भी कमी पाई जाने लगी है.

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कोरोनावायरस से बचने के लिए करें ये 10 घरेलू उपाय

1) विटामिन-सी युक्त फल, जैसे संतरा, मौसमी, नींबू, आंवला आदि का नियमित रूप से सेवन करें.

2) रोज़ाना नियमित रूप से योग, प्राणायाम और सूर्य नमस्कार करें. इससे आपका श्‍वसनतंत्र और फेफड़े मजबूत होंगे.

3) कपूर, लौंग, इलाइची और जावित्री को पीसकर अपने साथ रखें और समय-समय पर इस मिश्रण को सूंघते रहें.

4) बासी खाना खाने से बचें. ताज़ा और गरम भोजन ही खाएं.

5) फ्रिज में रखी ठंडी और बासी चीज़ों का सेवन न करें.

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6) बाज़ार में बिकनेवाली अनहेल्दी और खुली जगहों पर बिकनेवाली चीज़ें न खाएं.

7) सर्दी, खांसी, कफ, बुखार होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं.

8) नमक मिले गरम पानी से गरारे करें. इससे वायरस आपके फेफड़ों तक नहीं पहुंच सकेगाा.

9) तुलसी, लौंग, अदरक और हल्दी वाला दूध पीएं.

10) सार्वजनिक स्थानों और भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें.

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लेखक- डॉ. सौरभ जोशी (मुंबई स्थित द वेन सेंटर में वैस्न्युलर रोगों के इंटरवेंशनल और रेडियोलॉजी उपचारों से संबद्ध)
Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

उपचार से पहले और बाद की तस्वीर

स्पाइडर वेन्स पतली, लाल-बैंगनी रंग की नसें होती हैं. ये त्वचा के बहुत करीब होती हैं इसलिए काफ़ी उभरी हुई नज़र आती हैं. ये नसें बहुत भद्दी दिख सकती हैं. स्पाइडर वेन्स आमतौर पर उन लोगों में देखी जाती हैं जो लंबे समय खड़े रहने या बैठने का काम करते हैं, धूम्रपान व तंबाकू का सेवन करते हैं, इसके अलावा वंशानुगत, ज़्यादा वज़न उठाना, गर्भावस्था, बढ़ती उम्र आदि के कारण भी स्पाइडर वेन्स की तकलीफ़ हो सकती है. देशभर में 10 मिलियन से अधिक लोग अपनी टांगों/शरीर पर ब्लू वेन्स होने के रोग से पीड़ित हैं, लेकिन इससे अनजान रहते हैं. चूंकि प्रारंभिक चरण में ब्लू वेन्स का रोग दर्दरहित होता है, इसलिए 99% लोग उपचार ही नहीं करवाते हैं. इन ब्लू वेन्स को वैरिकोज़ वेन्स कहा जाता है जो एक हानिकारक रोग है. भारत में महिलाएं लंबे कपड़े पहनकर इस समस्या को छुपाने की कोशिश करती हैं और अपनी वैरिकोज़ व स्पाइडर वेन्स को छुपाने के लिए फिल्मी सितारे शूटिंग के दौरान आमतौर पर कोई बॉडी कंसीलर लगा लेते हैं.
समय बीतने के साथ वैरिकोज़ वेन्स के उपचार ने लंबी छलांग लगाई है, जिसमें खुली शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं से लेकर ऊष्मा का उपयोग करके नसों को अंदर से बंद करनेवाली न्यूनतम इनवेसिव लेज़र एवं रेडियो फ्रिक्वेंसी एब्लेशन तक के उपचार शामिल हैं. हाल ही में जलाने के बजाए नस को चिपकाकर बंद करने के लिए गोंद जैसी सामग्री का उपयोग किया जाने लगा है, जिससे रोगी का कष्ट और प्रक्रिया संबंधी जटिलताएं और भी कम हो जाती हैं.

Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

नवीनतम गैर-इनवेजिव और वीडियो की मदद से संचालित एक्सोथर्म जैसी अत्यधिक प्रभावी तकनीक बिना कोई इंजेक्शन लगाए ही टॉपिकल लेज़र का उपयोग करके इन स्पाइडर वेन्स का उपचार कर सकती है. यह पहले इस्तेमाल होनेवाली स्न्लेरोथेरेपी के ठीक विपरीत प्रक्रिया है, जो रोगियों के लिए प्रायः दर्दनाक सिद्ध होती थी.

स्पाइडर वेन्स का उपचार करने हेतु लेज़र उपचार रोगियों के लिए बेहद उपयुक्त है और ये नवीनतम विधियां बहुत कम कष्ट और न्यूनतम जोखिम के साथ इच्छित परिणाम देती हैं. लेज़र का उपयोग गर्भवती महिलाओं तथा उन रोगियों के उपचार क्षेत्र में नहीं किया जा सकता है, जिनकी त्वचा पर वायरल अटैक या संक्रमण हो चुका है. ऊपरी वैस्न्युलर घाव त्वचीय वाहिकाओं के विस्तारण के चलते होते हैं और ये किसी शिरापरक विकृति का परिणाम हैं. सबसे आम ऊपरी वैस्न्युलर घावों को टेलांजिएक्टीजिया और एंजियोमा कहा जाता है.

शिरापरक रोग एक विकसित होता रहने वाला रोग है, बिना उपचार के यह ठीक ही नहीं होता.अपने शिरापरक निदान के लिए सही चिकित्सक से परामर्श करें और जितनी जल्दी हो सके इस विकृति का उपचार कराएं. यह नए ऊपरी वैस्न्युलर घावों के उभार को सीमित करेगा.

Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

लेजर उपचार कैसे काम करता है?
लेजर सिद्धांत एक तापीय क्रिया के उत्पादन पर आधारित है. लेज़र प्रकाश एपिडर्मिस के माध्यम से त्वचा को भेदते हुए प्रवेश करेगा, ताकि डर्मिस के अंदर मौजूद नस को स्पर्श कर सके. इसके बाद ऊष्मा में तब्दील हुआ प्रकाश नस को अवरोधित करेगा और धीरे-धीरे उसे गायब कर देगा. लेज़र उपचार को स्न्लेरोथेरेपी के अतिरिक्त इस्तेमाल किया जा सकता है और यह घुटने, एड़ी या पैर के भीतरी हिस्सों जैसे प्रवेश करने में कठिनाई वाले क्षेत्रों पर कार्य करता है.

किसी लेज़र उपचार से पहले और बाद में बरती जानेवाली सावधानियां:
* उपचार शुरू होने के 2 सप्ताह पहले से धूप में नहीं निकलना है.
* उपचार के बाद उपचार किए गए क्षेत्र पर कोई मॉइश्‍चराइज़िंग क्रीम लगाएं और अगले दो हफ्ते तक धूप में हर्गिज़ न निकलें.

Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

एक्सोथर्म लेज़र, कुशल और बिल्कुल नया  
स्पाइडर वेन्स, जो वैरिकोज़ वेन्स की आरंभिक अवस्था होती हैं, जो एक किस्म की कॉस्मेटिक समस्या होती हैं, उन्हें लक्षित ट्रांसक्यूटेनियस लेज़र का इस्तेमाल करके ठीक किया जा सकता है. इस तकनीक में इन स्पाइडर वेन्स पर एक विशिष्ट तरंग का लेज़र प्रकाश डाला जाता है. यह प्रकाश त्वचा के करीब स्थित 2 मिमि व्यास से कम आकार वाली स्पाइडर वेन्स को वहीं का वहीं जला डालता है. ऐसे विभिन्न उपकरण उपलब्ध हैं जो यह नतीजा प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं. चिकित्सा का वर्तमान मानक एक्सोथर्म डिवाइस है, जिसमें स्पाइडर वेन्स को 10 गुना ज़ूम करने के लिए एक इन-बिल्ट कैमरा लगा हुआ है, जो नसों को आसान निशाना बनाने के साथ-साथ आसपास की त्वचा को 5 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा रखने में मदद करता है. यह एक बहु-उपयोगी और पेटेंट की हुई तकनीक है, जो आसपास के ऊतकों को सर्वोत्तम दक्षता और उच्च सुरक्षा प्रदान करती है. पररणाम धीरे-धीरे दिखाई पड़ते हैं और 4 से 6 सप्ताह के भीतर स्थायी हो जाते हैं. चिकित्सक आपको आवश्यक उपचार सत्रों के बारे में उचित परामर्श देंगे.

प्रक्रिया को  http://bit.ly/2N6q7DX  लिंक पर देखा जा सकता है. 

कई बार हम ऐसे शारीरिक लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जो किसी बड़ी बीमारी का संकेत (Health Signals) हो सकते हैं. आप सेहत के प्रति सर्तक रहें, इसलिए हम आपको कुछ ऐसे हेल्थ सिग्नल्स के बारे में बता रहे हैं, जो संकेत देते हैं कि सब ठीक नहीं है.

Health Signals
30 के पहले स़फेद बालः यदि तीस की उम्र में ही यदि आधे बाल स़फेद हो जाएं तो ये डायबिटीज़ के कारण हो सकता है. अतः अपना शुगर लेवल टेस्ट करवाएं.

आंखों का पीला होनाः अगर आंखों का स़फेद हिस्सा पीला दिखे तो ये जॉन्डिस, लिवर या गॉल ब्लैडर की समस्या का संकेत हो सकता है. यदि ये लाल दिखे, तो हाइपरटेंशन या वायरल डिसीज़ हो सकता है.

रूखे-फटे होंठः ठंड के मौसम में तापमान बदलने के कारण फटे होंठों की समस्या आम होती है, लेकिन यदि आपके होंठ हमेशा फटते हैं और उनमें से कई बार खून भी निकलता है और दर्द होता है तो ये विटामिन बी या ज़िंक की कमी का संकेत है. कई बार फंगल इंफेक्शन के कारण भी ऐसा होता है.

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गले में सूजनः यदि आपको कभी महसूस हो कि आपकी गर्दन में सूजन है तो इसे हल्के में न लें, तुरंत डॉक्टर के पास जाएं. गर्दन के अगले हिस्से में सूजन थायरॉइड का संकेत हो सकता है.

आईब्रो का कम होनाः अचानक आईब्रो तेज़ी से कम होने लगे तो इसका कारण थायरॉइड, हाइपरथाइरॉडिज़्म या ओवरऐक्टिव थायरॉइड हो सकता है.

हथेलियों का लाल होनाः यदि आपकी हथेली लाल है तो ये डर्मटाइटिस, एग्ज़िमा, मेटल, दवा, फूड या ड्रिंक्स से एलर्जिक रिएक्शन का संकेत हो सकता है.

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नाख़ूनों में बदलावः नाख़ून बेस्ट हेल्थ इंडिकेटर हैं. यदि शरीर में किसी तरह की समस्या होती है तो नाख़ून में बदलाव साफ़ नज़र आता है. अतः अपनी सेहत का ख़्याल रखने के लिए नाख़ूनों पर नज़र रखें.

पैरों का ठंडा पड़नाः अचानक पैर ठंडे पड़ जाएं तो अलर्ट हो जाइए. ये संकेत है कि शरीर में ब्लड सर्कुलेशन ठीक से नहीं हो पा रहा. यदि पैर बार-बार ठंडे हो रहे हैं तो थायरॉइड भी चेक करवा लें.

बार-बार खुजली होनाः त्वचा में खुजली का कारण एलर्जी या स्किन डिसऑर्डक हो सकता है, लेकिन यदि आपको बार-बार और बहुत ज़्यादा खुजली हो रही है तो अलर्ट हो जाइए. इसका कारण लिवर डिसीज़ हो सकती है.

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Health Warning Signs of Serious Problems
शरीर में छोटी-मोटी तकलीफ़ होती ही रहती है और अक्सर हम इन तकलीफ़ों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. लेकिन यह अनदेखी महंगी भी पड़ सकती है, क्योंकि कभी-कभार ये छोटे-छोटे लक्षण ही किसी बड़ी व गंभीर बीमारी की ओर संकेत करते हैं. बेहतर होगा कि समय रहते इन्हें पहचानकर अलर्ट (Health Warning) रहें, ताकि आनेवाली किसी भी बड़ी समस्या से बचा जा सके.

सिर में दर्द रहना

हमें लगता है- मामूली दर्द या एसिडिटी.
हो सकता है- माइग्रेन, हाई ब्लड प्रेशर, ब्रेन ट्यूमर, साइनस या फिर ब्रेन हैमरेज.
आपको सिर में अक्सर दर्द रहता है, जो पेनकिलर्स लेने पर ठीक भी हो जाता है, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें. अगर दर्द के साथ उल्टियां भी होती हों, तो डॉक्टर से तुरंत मिलें. इसके अलावा आंखों की रौशनी कम होती जाए या दृष्टिभ्रम होने लगे, चक्कर भी आएं, तो यह ट्यूमर का संकेत हो सकता है.

अचानक वज़न कम होना

हमें लगता है- थकान, स्ट्रेस या खाने-पीने में गड़बड़ी के चलते ऐसा हो रहा है.
हो सकता है- टीबी, पेप्टिक अल्सर, थायरॉइड, डायबिटीज़ या फिर कैंसर.
बिना डायटिंग के या फिर बिना किसी बीमारी के अचानक वज़न कम होने लगे, तो सतर्क हो जाइए. मुमकिन है, एंडोक्राइन ग्लैंड्स में किसी असामान्यता के चलते ऐसा हो रहा हो या फिर कैंसर भी इसकी एक वजह हो सकती है.

चोट लगने पर ब्लड क्लॉट न होना या फिर ज़ख़्म का देरी से भरना

हमें लगता है- स्किन या ख़ून में बदलाव के कारण ऐसा होता हो.
हो सकता है- डायबिटीज़ या फिर प्लेटलेट्स में कमी.
ज़ख़्म भरने में अगर सामान्य से ज़्यादा वक़्त लग रहा हो, तो यह डायबिटीज़ का लक्षण हो सकता है. इसके साथ-साथ यदि स्किन एलर्जी भी हो और चक्कर व वज़न कम होने की समस्या भी हो, तो बिना देर किए एक्सपर्ट के पास जाएं.

दिल का ज़ोर-ज़ोर से धड़कना

हमें लगता है- उत्तेजना या कमज़ोरी.
हो सकता है- हार्ट अटैक का लक्षण या फिर हाई ब्लडप्रेशर.
हो सकता है कि कमज़ोरी या नींद न पूरी होने पर धड़कन असामान्य हो रही हो, लेकिन यह हार्ट अटैक का लक्षण भी हो सकता है. अलर्ट रहें और यदि यह लक्षण लगातार बना रहे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

पेशाब करते समय तेज़ दर्द होना

हमें लगता है- सामान्य इंफेक्शन.
हो सकता है- स्टोन, प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ जाना, मूत्राशय का कैंसर.
मूत्र त्याग के समय अगर हमेशा ही बहुत दर्द होता हो, तो यह कैंसर का लक्षण हो सकता है. यदि पेशाब के साथ ख़ून भी आने लगे, तो बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क करें, ताकि समय रहते इलाज हो सके.

उठते वक़्त चक्कर आना

हमें लगता है- मामूली कमज़ोरी.
हो सकता है- नर्व से संबंधित समस्या, कान की नसों में कोई गड़बड़ी, साइनस, स्पॉन्डिलाइटिस, लो ब्लड प्रेशर.
यूं तो इसके कई अन्य कारण हो सकते हैं, लेकिन लो ब्लडप्रेशर भी इसकी एक बड़ी वजह हो सकती है और लो ब्लडप्रेशर के भी कई कारण हो सकते हैं, जो आपको टेस्ट करवाने पर ही पता चलेंगे. इसलिए तुरंत डॉक्टर से मिलें.

अचानक आंखों के आगे अंधेरा छा जाना

हमें लगता है- नींद न पूरी होने पर या कमज़ोरी के कारण ऐसा हो रहा है.
हो सकता है- स्ट्रोक, लो ब्लडप्रेशर.
यदि आपको हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल है, तो आप स्ट्रोक के शिकार हो सकते हैं. यदि आंखों के सामने अंधेरा छाने के साथ-साथ शरीर के एक तरफ़ का भाग सुन्न होता है, तो अलर्ट हो जाएं. इसके अलावा अगर उच्चारण में भी तकलीफ़ होने लगे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

हाथों का कांपना, घबराहट, नाक से ख़ून आना

हमें लगता है- कमज़ोरी, शरीर में गर्मी का बढ़ जाना इसकी वजह हो सकती है.
हो सकता है- थायरॉइड, पार्किंसन्स.
अचानक घबराहट होने के साथ-साथ हाथ-पैर कांपने लगते हैं, नाक से ख़ून आने लगता है और उल्टियां भी होने लगती हैं. ऐसी स्थिति को नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं. हो सकता है बहुत ज़्यादा एसिडिटी या शरीर में गर्मी बढ़ने के कारण भी ऐसा हो, लेकिन ये तमाम लक्षण किसी गंभीर समस्या के भी संकेत हो सकते हैं.

हंसते-खांसते वक़्त या फिर अचानक ही पेशाब निकल जाना

हमें लगता है- बढ़ती उम्र या कमज़ोरी.
हो सकता है- यूरिन इंफेक्शन, ब्लैडर की कोई बीमारी या डायबिटीज़.
अचानक पेशाब निकल जाने की समस्या को हम कमज़ोरी या बढ़ती उम्र से जोड़कर ही देखते हैं, लेकिन यह यूरिनरी ट्रैक्ट में इंफेक्शन की वजह से या फिर कुछ मामलों में डायबिटीज़ के कारण भी हो सकता है. इसलिए किसी भी तकलीफ़ को नज़रअंदाज़ न करें और न ही ख़ुद अंदाज़ा लगाएं. बेहतर होगा एक बार डॉक्टर की सलाह ले ली जाए.

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सीने में दर्द रहना

हमें लगता है- गैस या एसिडिटी का दर्द.
हो सकता है- हृदय रोग या एंजाइना पेन.
सीने में या उसके आस-पास दर्द बना रहे और सांस लेने में भी दिक़्क़त आए, तो शायद यह हार्ट ट्रबल यानी हृदय रोग का संकेत हो सकता है, या फिर एंजाइना का दर्द भी हो सकता है, जिसमें हार्ट अटैक की आशंका हमेशा बनी रहती है. बेहतर होगा कि इस तरह के दर्द को गैस का छोटा-मोटा दर्द न समझकर डॉक्टरी परामर्श ले लिया जाए.

मुंह में छाले होना

हमें लगता है- पेट या आंतों की गड़बड़ी या गर्मी से.
हो सकता है- एड्स, हर्पिस, सेक्स संबंधी किसी इंफेक्शन के कारण या फिर मुंह या गले का कैंसर.
मुंह में छाले होना आम-सी बात है. हमें लगता है पेट साफ़ नहीं होगा, इसलिए छाले हो रहे हैं या फिर कभी-कभार बुख़ार या दवाओं की गर्मी से भी छाले हो जाते हैं. लेकिन यदि ये छाले लंबे समय तक बने रहें या फिर इनका आकार और इनमें दर्द बढ़ रहा हो, तो देर न करें.

शरीर में सूजन

हमें लगता है- थकान या खान-पान की गड़बड़ी हो सकती है.
हो सकता है- एनीमिया, किडनी की बीमारी, हृदय रोग.
अक्सर दिनभर एक ही पोज़िशन में बैठे रहने या फिर बहुत ज़्यादा थकान या वॉटर रिटेंशन से शरीर में या पैरों में सूजन आ जाती है, लेकिन यदि सूजन शरीर के ऊपरी भाग में है तो यह किडनी की बीमारी का संकेत हो सकता है और अगर निचले हिस्से में सूजन आती है तो हृदय रोग का लक्षण हो सकता है.

जोड़ों में दर्द

हमें लगता है- कमज़ोरी, किसी बीमारी या फिर बढ़ती उम्र का असर.
हो सकता है- चिकनगुनिया के कारण, कैल्शियम व मिनरल की कमी, आमवात, गठियावात, ऑस्टियोआर्थराइटिस या फिर स्पॉन्डिलाइटिस.
यदि उम्र 40 से कम है और जोड़ों में अचानक दर्द शुरू हो गया हो, तो आमवात हो सकता है, जिसमें जोड़ों में सूजन, गर्मी व दर्द महसूस होता है. यदि छोटे जोड़ों में अकड़न, सूजन और दर्द है, तो यह गठियावात हो सकता है. इसके अलावा शरीर का पोश्‍चर भी जोड़ों में दर्द का कारण हो सकता है. जो लोग दिनभर कंप्यूटर पर काम करते हैं, उन्हें भी गर्दन, पीठ या पैरों में दर्द हो सकता है. कैल्शियम व मिनरल की कमी से भी यह दर्द हो सकता है.
यदि 40 के बाद दर्द होता है, तो इसकी वजह ऑस्टियोआर्थराइटिस या स्पॉन्डिलाइटिस हो सकती है, जिसमें शुरुआत में हल्का-हल्का दर्द होता है और ध्यान न दिया जाए, तो बढ़ जाता है. कैल्शियम व मिनरल की कमी से भी दर्द हो सकता है.

बहुत ज़्यादा हांफना

हमें लगता है- थकान, कमज़ोरी.
हो सकता है- कोलेस्ट्रॉल व ट्रायग्लिसरॉइड्स का बढ़ जाना, एनीमिया, थायरॉइड, मोटापा, बीमारी के बाद की कमज़ोरी.
अगर थोड़ा-सा चलने से ही बहुत ज़्यादा हांफने लगें, तो सचेत हो जाएं और अपना चेकअप ज़रूर करवाएं.

अत्यधिक भूख लगना

हमें लगता है- मौसम परिवर्तन के कारण या फिर हाज़मा अच्छा हो गया है.
हो सकता है- डायबिटीज़, मोटापा या फिर पेट में कीड़े.
जब ज़रूरत से ज़्यादा भूख लगने लगे, तो इसे हर बार मौसम परिवर्तन से जोड़कर न देखें. हो सकता है वजह कुछ और हो. एक्सपर्ट की राय ज़रूर लें.

कब्ज़

हमें लगता है- पानी कम पीने या फिर खाने-पीने की गड़बड़ी से हो रहा है.
हो सकता है- अत्यधिक गैस, बवासीर, आंतों में गड़बड़ी या फिर कैंसर हो सकता है.
यदि कब्ज़ लंबे समय से है और कोई भी नुस्ख़ा काम नहीं कर रहा, तो डॉक्टरी परामर्श लेने में कोई नुक़सान नहीं है.

एनल ब्लीडिंग
हमें लगता है- शरीर में गर्मी बढ़ जाने या फिर बवासीर की समस्या से यह परेशानी हो रही है.
हो सकता है- आंतों में शोथ, ज़ख़्म या फिर कैंसर हो सकता है.
ख़ूनी बवासीर, फिशर्स या फिर कोलाइटिस के अलावा आंतों में शोथ व ज़ख़्म के कारण भी एनल ब्लीडिंग हो सकती है. लेकिन यह रेक्टल कैंसर का भी पहला लक्षण हो सकता है. यदि मोशन के बाद भी ख़ून, और वह भी ताज़ा ख़ून आता है, तो सतर्क हो जाइए.

मल के रंग में बदलाव

हमें लगता है- खाने-पीने में बदलाव के कारण हो सकता है.
हो सकता है- अल्सर या पित्ताशय में गड़बड़ी, पीलिया.
अगर मल का रंग स़फेद है, तो पित्त की कमी इसका कारण है, यदि रंग ब्लैकिश-रेड है, तो इसका मतलब है मल में ख़ून भी आ रहा है और इसकी वजह हो सकती है अल्सराइटिव कोलाइटिस. यदि शौच ज़रूरत से ज़्यादा पीला है, तो जॉन्डिस का लक्षण हो सकता है.

मूत्र के रंग में बदलाव

हमें लगता है- पानी कम पीने से या फिर खाने में कुछ बदलाव करने से ऐसा होता है.
हो सकता है- इंफेक्शन, जॉन्डिस, ब्लैडर की गड़बड़ी या फिर कैंसर.
यदि पेशाब का रंग दूधिया स़फेद है, तो इसका अर्थ है मूत्र के साथ प्रोटीन भी निकल रहा है. यदि रंग पीला है, तो जॉन्डिस या फिर यूरिन इंफेक्शन हो सकता है. अगर रंग लाल है तो स्टोन, ब्लैडर, यूरिथ्रा में ज़ख़्म या फिर प्रोस्टेट कैंसर का भी लक्षण हो सकता है.

अत्यधिक थकान

हमें लगता है- सामान्य कमज़ोरी.
हो सकता है- मिनरल्स की कमी, आयरन, सोडियम, कैल्शियम और विटामिन्स की कमी, डायबिटीज़, लो ब्लड प्रेशर.
किसी-किसी केस में बहुत पसीना भी आता है तो, यह आनेवाली बीमारी का संकेत भी होता है, जैसे- जॉन्डिस, बुख़ार या फिर तनाव इत्यादि में पसीना ज़्यादा आता है.