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व्हाइट डिस्चार्ज (श्‍वेत प्रदर) की समस्या के 5 आसान घरेलू उपाय (5 Best Home Remedies To Cure White Discharge)

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व्हाइट डिस्चार्ज (White Discharge) यानी स़फेद पानी आने की बीमारी स्त्रियों को होने वाला सामान्य रोग है, जो उन्हें पीड़ादाई स्थिति में पहुंचा देता है. व्हाइट डिस्चार्ज (White Discharge) के कई कारण हैं, जैसे- गुप्तांगों की सफ़ाई न करना, ख़ून की कमी, ज़्यादा सेक्स, तेल, मसाले, चटपटे व तीखे पदार्थों का ज़्यादा सेवन, कामुक विचार, वेजाइना में इंफेक्शन, वेजाइना या यूटरस के मुंह पर छाले, पीरियड की विकृति, ज़्यादा संतान होना, मूत्र स्थान में संक्रमण आदि.

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व्हाइट डिस्चार्ज (White Discharge) के लक्षण
सफ़ेद पानी आना शुरू होने पर स्त्री को कमज़ोरी महसूस करती है. ख़ून कम होने से चक्कर आना, आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, भूख न लगना, पेट साफ़ न होना, बार-बार पेशाब, पेट में भारीपन, कमर दर्द, वेजाइना में खुजली आदि लक्षण पाए जाते हैं. पीरियड से पहले या बाद में श्वतप्रदर स़फेद लसदार होता है. इसमें रोगी का चेहरा पीला पड़ जाता है.

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व्हाइट डिस्चार्ज (White Discharge) से छुटकारा पाने के आसान घरेलू नुस्ख़े
* रोज़ाना दो-तीन केला खाने से श्वेतप्रदर की समस्या दूर होती है.
* 3 ग्राम आंवले का पाउडर शहद के साथ दिन में तीन बार चाटने से लाभ होता है.
* गूलर का फूल पीसकर और उसमें मिश्री व शहद मिलाकर दो-तीन बार सेवन करने से फ़ायदा मिलता है.
* स़फेद मूसली पाउडर या ईसबगोल को सुबह- शाम शर्बत के साथ पीने से आराम मिलता है.
* हरे आंवले को पीस कर उसे जौ के आटे में मिलाकर उसकी रोटी एक महीने तक खाने से श्वेतप्रदर से आराम मिलता है.
* टमाटर का रोज़ाना सेवन करने से भी फ़ायदा मिलता है.
* फालसे का शर्बत पीने से श्वेत प्रदर में आराम मिलता है.
* कच्ची भिंडी रोज़ सुबह खाने से लाभ होता है.
* मुलहठी 10 ग्राम, मिश्री 20 ग्राम, जीरा 5 ग्राम, अशोक की छाल 10 ग्राम- इन सभी का चूर्ण बनाकर रख लें. इसमें 3 से 4 ग्राम चूर्ण दिन में तीन बार खाएं.
* कच्चे केले को सुखाकर चूर्ण बना लें. उसमें समान मात्रा में गुड़ मिलाकर दिन में तीन बार कुछ दिन तक लेने से आराम मिलता है.
* सिंघाड़ा, गोखरू, बड़ी इलायची, बबूल की गोंद, शक्कर, सेमल की गोंद समान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम लें.

व्हाइट डिस्चार्ज (White Discharge) की समस्या से छुटकारा पाने के 5 आसान घरेलू उपाय जानने के लिए देखें वीडियो:

व्हाइट डिस्चार्ज (White Discharge) होने पर इन चीज़ों से परहेज़ करें
* श्वेतप्रदर में स्त्रियों को खाने-पीने में विशेष सावधानी रखनी चाहिए.
* खट्टी-मीठी चीज़ें, तेल-मिर्च, ज़्यादा मसालेदार चीज़ों से परहेज़ करें.
* गुप्तांगों को नियमित साफ़ करें.
* ख़ून की कमी को पूरा करने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करें.
* बंदगोभी, पालक, टमाटर, सिंघाड़ा, गूलर आदि फलों का नियमित सेवन करें.

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क्यों एनीमिक होती हैं भारतीय महिलाएं? (Anemia: A Common Problem Among Indian Women)

Anemia, Common Problem, Indian Women

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यूं तो हमारे देश में आर्थिक से लेकर सामाजिक सुधार हो रहे हैं, लेकिन ऐसे में जब इस तरह की ख़बरें सामने आती हैं, तो रुककर सोचने की ज़रूरत पड़ जाती है. यूं तो हमारे देश में आर्थिक से लेकर सामाजिक सुधार हो रहे हैं, लेकिन ऐसे में जब इस तरह की ख़बरें सामने आती हैं, तो रुककर सोचने की ज़रूरत पड़ जाती है. हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है कि भारत में सबसे अधिक एनीमिक महिलाएं हैं. द ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट के इस सर्वे के मुताबिक़ 15 से लेकर 49 साल तक की 51% भारतीय महिलाएं एनीमिक हैं. वे आयरन डेफिशियंसी झेल रही हैं, वे पोषक आहार नहीं ले रहीं… कुल मिलाकर वे स्वस्थ नहीं हैं. यह 2017 की रिपोर्ट है, जबकि वर्ष 2016 तक 48% महिलाएं एनीमिक थीं यानी यह आंकड़ा अब बढ़ गया है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि 15-49 साल की उम्र यानी युवावस्था, रिप्रोडक्शन की एज में इस तरह का कुपोषण, जिसका सीधा असर आनेवाली पीढ़ी पर पड़ता नज़र आएगा. यदि मां स्वस्थ नहीं, तो बच्चा भी स्वस्थ नहीं होगा.

क्या वजह है?

एक्सपर्ट्स की मानें, तो मात्र कुपोषण ही सबसे बड़ी या एकमात्र वजह नहीं है, बल्कि स्वच्छता की कमी भी एक बड़ा कारण है, क्योंकि पूअर हाइजीन पोषण को शरीर में एब्ज़ॉर्ब नहीं होने देती. इसके अलावा जागरूकता की कमी, अशिक्षा और परिवार के सामने ख़ुद को कम महत्व देना यानी पहले परिवार की ख़ुशी, उनका खाना-पीना, ख़ुद के स्वास्थ्य को महत्व नहीं देना भी प्रमुख कारण हैं.

सामाजिक व पारिवारिक ढांचा

  •  हमारा समाज आज भी इसी सोच को महत्व देता है कि महिलाओं का परम धर्म है पति, बच्चे व परिवार का ख़्याल रखना.
  •  इस पूरी सोच में, इस पूरे ढांचे में कहीं भी इस बात या इस ख़्याल तक की जगह नहीं रहती कि महिलाओं को अपने बारे में भी सोचना है
  •  उनका स्वास्थ्य भी ज़रूरी है, यह उन्हें सिखाया ही नहीं जाता.
  • यदि वे अपने बारे में सोचें भी तो इसे स्वार्थ से जोड़ दिया जाता है. पति व बच्चों से पहले खाना खा लेनेवाली महिलाओं को ग़ैरज़िम्मेदार व स्वार्थी करार दिया जाता है.
  • बचपन से ही उन्हें यह सीख दी जाती है कि तुम्हारा फ़र्ज़ है परिवार की देख-रेख करना. इस सीख में अपनी देख-रेख या अपना ख़्याल रखने को कहीं भी तवज्जो नहीं दी जाती.
  • यही वजह है कि उनकी अपनी सोच भी इसी तरह की हो जाती है. अगर वे ग़लती से भी अपने बारे में सोच लें, तो उन्हें अपराधबोध होने लगता है.
  • शादी के बाद पति को भी वे बच्चे की तरह ही पालती हैं. उसकी छोटी-छोटी ज़रूरतों का ख़्याल रखने से लेकर हर बात मानना उसका पत्नी धर्म बन जाता है. लेकिन इस बीच वो जाने-अनजाने ख़ुद के स्वास्थ्य को सबसे अधिक नज़रअंदाज़ करती है.
  • वो पुरुष है, तो उसके स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी पत्नी की होती है. उसे पोषक आहार, मनपसंद खाना, उसकी नींद पूरी होना… इस तरह की बातों का ख़्याल रखना ही पत्नी का पहला धर्म है.
  • ऐसे में यदि पत्नी बीमार भी हो जाए, तो उसे इस बात की फ़िक्र नहीं रहती कि वो अस्वस्थ है, बल्कि उसे यह लगता है कि पूरा परिवार उसकी बीमारी के कारण परेशान हो रहा है. न कोई ढंग से खा-पी रहा है, न कोई घर का काम ठीक से हो रहा है.
  • पत्नी यदि अपने विषय में कुछ कहे भी और अगर वो हाउसवाइफ है तब तो उसे अक्सर यह सुनने को मिलता है कि आख़िर सारा दिन घर में पड़ी रहती हो, तुम्हारे पास काम ही क्या है?
  • कुल मिलाकर स्त्री के स्वास्थ्य के महत्व को हमारे यहां सबसे कम महत्व दिया जाता है या फिर कहें कि महत्व दिया ही नहीं जाता.

जागरूकता की कमी और अशिक्षा

  • जागरूकता की कमी की सबसे बड़ी वजह यही है कि बचपन से ही उनका पालन-पोषण इसी तरह से किया जाता है कि महिलाएं ख़ुद भी अपने स्वास्थ्य को महत्व नहीं देतीं.
  • उन्हें यही लगता है कि परिवार व पति की सेवा ही सबसे ज़रूरी है और हां, यदि वे स्वयं गर्भवती हों, तो उन्हें अपने स्वास्थ्य का ख़्याल रखना है, क्योंकि यह आनेवाले बच्चे की सेहत से जुड़ा है.
  • लेकिन यदि वे पहले से ही अस्वस्थ हैं, तो ज़ाहिर है मात्र गर्भावस्था के दौरान अपना ख़्याल रखने से भी सब कुछ ठीक नहीं होगा.
  • गर्भावस्था के दौरान भी आयरन टैबलेट्स या बैलेंस्ड डायट वो नहीं लेतीं.
  • अधिकांश महिलाओं को पोषक आहार के संबंध में जानकारी ही नहीं है और न ही वे इसे महत्व देती हैं.
  • हमेशा से पति व बच्चों की लंबी उम्र व सलामती के लिए उन्हें व्रत-उपवास के बहाने भूखा रहने की सीख दी जाती है.
  • जो महिलाएं शाकाहारी हैं, उन्हें किस तरह से अपने डायट को बैलेंस करना है, इसकी जानकारी भी नहीं होती.
  • बहुत ज़रूरी है कि महिलाओं को जागरूक किया जाए, अपने प्रति संवेदनशील बनाया जाए.
  • इसी तरह से अशिक्षा भी बहुत बड़ी वजह है, क्योंकि कम पढ़ी-लिखी महिलाएं तो जागरूकता से लेकर हाइजीन तक के महत्व को नहीं समझ पातीं.
  • साफ़-सफ़ाई की कमी किस तरह से लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, यह समझना बेहद ज़रूरी है. लोग कई गंभीर रोगों के शिकार हो सकते हैं, जिससे उनके शरीर में पोषक तत्व ग्रहण व शोषित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
  • भोजन को किस तरह से संतुलित व पोषक बनाया जाए, इसकी जानकारी भी अधिकांश लोगों को नहीं होती.

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ग़रीबी भी है एक बड़ी वजह

  • आयरन की कमी के चलते होनेवाले एनीमिया की सबसे बड़ी वजह ग़रीबी व कुपोषण है.
  • ग़रीबी के चलते लोग ठीक से खाने का जुगाड़ ही नहीं कर पाते, तो पोषक आहार दूर की बात है.
  • वहीं उन्हें इन तमाम चीज़ों की जानकारी व महत्व के विषय में भी अंदाज़ा नहीं होता.क्या किया जा सकता है?
  • सरकार की ओर से प्रयास ज़रूर किए जा रहे हैं, लेकिन वो नाकाफ़ी हैं.
  • द ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट में इस ओर भी इशारा किया गया है कि बेहतर होगा भारत ग़रीब व आर्थिक रूप से कमज़ोर यानी लो इनकम देशों से सीखे, क्योंकि वे हमसे बेहतर तरी़के से इस समस्या को सुलझा पाए हैं.
  • ब्राज़ील ने ज़ीरो हंगर स्ट्रैटिजी अपनाई है, जिसमें भोजन का प्रबंधन, छोटे किसानों को मज़बूती प्रदान करना और आय के साधनों को उत्पन्न करने जैसे प्रावधानों पर ज़ोर दिया गया है.
  • ब्राज़ील के अलावा पेरू, घाना, वियतनाम जैसे देशों ने भी कुपोषण को तेज़ी से कम करने में सफलता पाई है.

नेशनल न्यूट्रिशनल एनीमिया प्रोफिलैक्सिस प्रोग्राम (एनएनएपीपी) का रोल?

  • जहां तक भारत की बात है, तो कई ग़रीब देश भी एनीमिया व कुपोषण की समस्या से हमसे बेहतर तरी़के से लड़ने में कारगर सिद्ध हुए हैं, तो हमें उनसे सीखना होगा.
  • भारत में एनीमिया से लड़ने के लिए नेशनल न्यूट्रिशनल एनीमिया प्रोफिलैक्सिस प्रोग्राम (एनएनएपीपी) 1970 से चल रहा है. कुछ वर्ष पहले इस प्रोग्राम के तहत किशोर बच्चों व गर्भवती महिलाओं में आयरन और फोलेट टैबलेट्स बांटने का साप्ताहिक कार्यक्रम शुरू हुआ, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि मात्र दवाएं उन्हें सौंप देना ही कोई विकल्प नहीं है.
  • यह देखना भी ज़रूरी है कि क्या वो ये दवाएं ले रही हैं? एक अन्य सर्वे से पता चला कि बहुत कम महिलाएं ये टैबलेट्स नियमित रूप से लेती हैं.
  • इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि आयरन टैबलेट्स के काफ़ी साइड इफेक्ट्स होते हैं, जैसे- उल्टियां व दस्त और ये गर्भावस्था को और मुश्किल बना देते हैं. यही वजह है कि अधिकतर महिलाएं इन्हें लेना छोड़ देती हैं.
  • जबकि होना यह चाहिए कि उन्हें इन साइड इफेक्ट्स से जूझने का बेहतर तरीक़ा या विकल्प बताना चाहिए.

भारत में गर्भवती स्त्रियां गंभीर रूप से कुपोषण की शिकार हैं- सर्वे

  • न स़िर्फ गर्भावस्था में, बल्कि भारतीय स्त्रियां हर वर्ग में कम स्वस्थ पाई गईं. उनका व उनके बच्चों का स्वास्थ्य व वज़न अन्य ग़रीब देशों की स्त्रियों व बच्चों के मुक़ाबले कम पाया गया. भारत में किशोरावस्था में लड़कियों के एनीमिक होने के पीछे प्रमुख वजह यहां की यह संस्कृति बताई गई, जिसमें लिंग के आधार पर हर स्तर पर भेदभाव किया जाता है.
  • बेटे को पोषक आहार देना और बेटी के स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ करना हमारे परिवारों में देखा जाता है. स़िर्फ ग़रीब तबके में ही नहीं, पढ़े-लिखे व खाते-पीते घरों में भी इस तरह का लिंग भेद काफ़ी पाया जाता है.
  • पोषण की कमी के कारण होनेवाला एनीमिया यानी आयरन और फॉलिक एसिड की कमी से जो एनीमिया होता है, वह परोक्ष या अपरोक्ष रूप से गर्भावस्था के दौरान लगभग 20% मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार होता है.
  • दवाओं के साथ-साथ पोषक आहार किस तरह से इस समस्या को कम कर सकता है, कौन-कौन से आहार के ज़रिए पोषण पाया जा सकता है, इस तरह की जानकारी भी महिलाओं व उनके परिजनों को भी देनी आवश्यक है.

 – गीता शर्मा

 

विंटर हेल्थ केयरः विंटर हेल्थ प्रॉब्लम्स से बचने के लिए Effective होम रेमेडीज़(Effective home remedies for winter health problems)

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विंटर सीज़न को बनाएं हेल्दी, हैप्पी और एक्टिव. ट्राई करें ये होम रेमेडीज़ और रहें हेल्थ प्रॉब्लम्स से दूर.
विंटर सीज़न कोल्ड और फ्लूवाला मौसम कहलाता है. इस मौसम में जहां कुछ लोग नई बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं, वहीं बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए समस्याएं और बढ़ जाती हैं. सर्दियों के इस मौसम में स्वस्थ व सेहतमंद रहने के लिए यहां हमने दी हैं कुछ ईज़ी होम रेमेडीज़.

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सर्दी-ज़ुकाम

सर्दी-ज़ुकाम कभी भी हो सकता है, पर सर्दियों में इसकी संभावना काफ़ी बढ़ जाती है. ख़ासतौर से कमज़ोर इम्यून सिस्टमवालों को सर्दी जल्दी होती है. सर्दी-ज़ुकाम काफ़ी संक्रामक होता है, इसलिए सर्दी के मौसम में लोग संभलकर रहें. बहती नाक, सीने में जकड़न, छींकें आना, सिरदर्द, गले में ख़राश और हल्का बुख़ार इसके आम लक्षण हैं.
डॉक्टर की सलाह
सर्दी से बचने का सबसे सरल उपाय है, अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत करना. जिन्हें बार-बार सर्दी हो जाती है, उन्हें सर्दियों में आंवले का मुरब्बा खाना चाहिए, इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत होती है.
होम रेमेडीज़
– सर्दी से छुटकारा दिलाने में लहसुन काफ़ी कारगर है. 4-5 लहसुन की कलियां पीसकर कच्चा ही खाएं.
– पानी उबालकर उसमें थोड़ी-सी अदरक, 1 नींबू का रस और 1 टेबलस्पून शहद मिलाएं और काढ़ा बनाकर पीएं.
– आधे टेबलस्पून शहद में 1 टेबलस्पून दालचीनी का पाउडर मिलाकर तीन दिनों तक लें.
– 1 ग्लास गुनगुने पानी में 2 टीस्पून हल्दी मिलाकर पीएं.

फ्लू

बुख़ार, सिरदर्द, बदनदर्द और थकान फ्लू के आम लक्षण हैं.
कुछ लोगों को सर्दी के लक्षण, जैसे- गले में ख़राश, सीने में जकड़न, छींकें आना आदि भी होते हैं.
डॉक्टर की सलाह
टीकाकरण ही इसका सबसे बढ़िया उपाय है. एंटीबैक्टीरियल सोप से हाथ धोते रहें. फ्लू से संक्रमित लोगों के संपर्क में आने से बचें.
होम रेमेडीज़
– समान मात्रा में शहद और प्याज़ का रस मिलाकर दिन में तीन बार फ्लू जाने तक लें.
– 1 टीस्पून शहद में 10-12 तुलसी की पत्तियों का रस मिलाकर दिन में एक बार लेने से भी राहत मिलती है.
– 1 ग्लास उबलते पानी में 1 नींबू काटकर डालें और इसकी भाप लें. दिन में 3-4 बार ऐसा करें.
– सीने की जकड़न को दूर करने के लिए आधी बाल्टी गरम पानी में एक टेबलस्पून राई पाउडर मिलाकर उसमें पैर डालकर थोड़ी देर बैठें. यह उपाय दिन में 2 बार करें.

जोड़ों मेें दर्द

सर्दियों में अक्सर जोड़ों का दर्द उभर जाता है. ऑस्टियोपोरोसिस और आर्थराइटिस के मरीज़ों की मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं. इसमें जोड़ों में लगातार दर्द, ऐंठन व जकड़न बनी रहती है. दर्द को कम करने के लिए फिज़िकली एक्टिव रहना बहुत ज़रूरी है.
डॉक्टर की सलाह
विटामिन डी और सप्लीमेंट्स लेने से कुछ राहत मिलती है, पर कुछ भी लेने से पहले अपने डॉक्टर को कंसल्ट करें. ओमेगा 3, विटामिन ङ्गकेफ और ङ्गसीफ के गुणों से भरपूर डायट लें.
हल्की-फुल्की एक्सरसाइज़ करें. सुबह सोकर उठने पर अंगड़ाई लें
और स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज़ करें.
होम रेमेडीज़
– रोज़ाना सुबह 1 टीस्पून मेथी पाउडर फांककर 1 ग्लास गुनगुना पानी पीएं.
– 1 ग्लास गुनगुने दूध में थोड़ा-सा हल्दी पाउडर और 1 टीस्पून शहद मिलाकर कुछ दिनों तक रोज़ाना लें.
– 1 कप गुनगुने पानी में 1 टीस्पून एप्पल साइडर विनेगर और थोड़ी-सी शहद मिलाकर दिन में दो बार खाने से पहले लें.
– गुनगुना नारियल तेल, ऑलिव ऑयल, सरसों के तेल या एरंडी के तेल से मसाज करें.

ब्रॉन्कायटिस

सर्दियों में नवजात शिशुओं, बच्चों और जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है, वे ब्रॉन्कायटिस की चपेट में आ जाते हैं. इसमें फेफड़ों के छोटे एयरवेज़ में सूजन और जलन होती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ़ होती है. इसके लक्षण सर्दी-खांसी जैसे ही होते हैं. इसके अलावा लगातार खांसी, सांसों का तेज़ हो जाना और हल्का बुख़ार भी इसके लक्षण हैं.
डॉक्टर की सलाह
ऐसे में जल्द से जल्द डॉक्टर से मिलें. साथ ही किसी भी तरह के धुएं, पटाखों, सिगरेट आदि से दूर रहें.
होम रेमेडीज़
– आधा-आधा टीस्पून कुटी हुई अदरक, लौंग और दालचीनी को 1 कप गरम पानी में मिलाकर कुछ दिन तक पीएं.
– 1 ग्लास दूध में लहसुन की 2-3 कलियां मिलाकर उबालें और रात को सोने से पहले पीएं.
– 1 ग्लास दूध में 1 टीस्पून हल्दी पाउडर मिलाकर उबालें और खाली पेट दिन में 2-3 बार लें. गॉल ब्लैडर स्टोन, हाइपर एसिडिटी, स्टमक अल्सर और जॉन्डिस के मरीज़ इसे न लें.
– कुछ बूंदें नीलगिरी के तेल की उबलते हुए पानी में डालकर भाप लें. इससे काफ़ी राहत मिलती है. इसके अलावा थोड़ा-सा नीलगिरी तेल सीने पर लगाएं.
– नमक के पानी से गरारे करना भी इसमें काफ़ी फ़ायदेमंद होता है.

अस्थमा

अस्थमा के मरीज़ों के लिए सर्दियों का मौसम मुश्किलोें भरा होता है. कभी सांसों का तेज़ होना, तो कभी सांस लेने में तकलीफ़ इसके लक्षण हैं. अन्य लोगों की तुलना में इन्हें अपना ज़्यादा ध्यान रखना पड़ता है.
डॉक्टर की सलाह
ख़ुद को अच्छी तरह ढंककर रखें. बाहर निकलते समय नाक व मुंह को स्कार्फ से अच्छी तरह ढंक लें. अपनी दवाइयां नियमित लें और अपना इनहेलर हमेशा कैरी करें.
होम रेमेडीज़
– समान मात्रा में अदरक का रस, अनार का रस और शहद मिलाकर दिन में 2-3 बार 1-1 टेबलस्पून लें.
– 1 कप पानी में 1 टेबलस्पून मेथी उबालें और उसमें 1-1 टीस्पून अदरक का रस और शहद मिलाकर सुबह-शाम लें.
– सरसों के तेल में कपूर मिलाकर गरम करें. हल्के हाथों से सीने और पीठ में लगाएं. दिन में कई बार दोहराएं.
– 3 अंजीर रातभर भिगोकर रखें, सुबह अंजीर खाकर पानी पी लें.

हार्ट प्रॉब्लम्स

मौसम में ठंड के कारण हमारा ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है और कोरोनरी आर्टरीज़ सिकुड़ने लगती हैं, जिससे रक्तसंचार धीमा हो जाता है. डॉक्टर्स के मुताबिक़ यही कारण है कि सदिर्र्यों में हार्ट अटैक के मामले बढ़ जाते हैं.
डॉक्टर की सलाह
बॉडी में वॉटर रिटेंशन न बढ़े, इसलिए खाने में नमक की मात्रा कम कर दें. फ्लू का टीका ज़रूर लगवाएं. एकदम सुबह-सुबह वॉक पर न जाएं, बल्कि धूप निकलने पर या शाम को जाएं. दो बार में हैवी खाने की बजाय 4-5 बार में थोड़ा-थोड़ा खाएं. अपने वज़न को नियंत्रित रखें. अगर वज़न अचानक से बढ़ने लगे, तो डॉक्टर को बताएं.
होम रेमेडीज़
– 1 ग्लास गुनगुने पानी में आधा टीस्पून अर्जुन की छाल का पाउडर और शहद मिलाकर लें. इससे आपको काफ़ी राहत मिलेगी.
– सर्दियों में रोज़ाना 2-3 लहसुन की कलियां खाएं. अगर लहसुन का स्वाद कसैला लगता है, तो उसके बाद 1 ग्लास दूध पीएं.
– हल्दी आपके लिए काफ़ी फ़ायदेमंद है. रोज़ाना 1 ग्लास दूध में आधा टीस्पून हल्दी पाउडर मिलाकर लें.

– सुनीता सिंह