health guide

लेखक- डॉ. सौरभ जोशी (मुंबई स्थित द वेन सेंटर में वैस्न्युलर रोगों के इंटरवेंशनल और रेडियोलॉजी उपचारों से संबद्ध)
Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

उपचार से पहले और बाद की तस्वीर

स्पाइडर वेन्स पतली, लाल-बैंगनी रंग की नसें होती हैं. ये त्वचा के बहुत करीब होती हैं इसलिए काफ़ी उभरी हुई नज़र आती हैं. ये नसें बहुत भद्दी दिख सकती हैं. स्पाइडर वेन्स आमतौर पर उन लोगों में देखी जाती हैं जो लंबे समय खड़े रहने या बैठने का काम करते हैं, धूम्रपान व तंबाकू का सेवन करते हैं, इसके अलावा वंशानुगत, ज़्यादा वज़न उठाना, गर्भावस्था, बढ़ती उम्र आदि के कारण भी स्पाइडर वेन्स की तकलीफ़ हो सकती है. देशभर में 10 मिलियन से अधिक लोग अपनी टांगों/शरीर पर ब्लू वेन्स होने के रोग से पीड़ित हैं, लेकिन इससे अनजान रहते हैं. चूंकि प्रारंभिक चरण में ब्लू वेन्स का रोग दर्दरहित होता है, इसलिए 99% लोग उपचार ही नहीं करवाते हैं. इन ब्लू वेन्स को वैरिकोज़ वेन्स कहा जाता है जो एक हानिकारक रोग है. भारत में महिलाएं लंबे कपड़े पहनकर इस समस्या को छुपाने की कोशिश करती हैं और अपनी वैरिकोज़ व स्पाइडर वेन्स को छुपाने के लिए फिल्मी सितारे शूटिंग के दौरान आमतौर पर कोई बॉडी कंसीलर लगा लेते हैं.
समय बीतने के साथ वैरिकोज़ वेन्स के उपचार ने लंबी छलांग लगाई है, जिसमें खुली शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं से लेकर ऊष्मा का उपयोग करके नसों को अंदर से बंद करनेवाली न्यूनतम इनवेसिव लेज़र एवं रेडियो फ्रिक्वेंसी एब्लेशन तक के उपचार शामिल हैं. हाल ही में जलाने के बजाए नस को चिपकाकर बंद करने के लिए गोंद जैसी सामग्री का उपयोग किया जाने लगा है, जिससे रोगी का कष्ट और प्रक्रिया संबंधी जटिलताएं और भी कम हो जाती हैं.

Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

नवीनतम गैर-इनवेजिव और वीडियो की मदद से संचालित एक्सोथर्म जैसी अत्यधिक प्रभावी तकनीक बिना कोई इंजेक्शन लगाए ही टॉपिकल लेज़र का उपयोग करके इन स्पाइडर वेन्स का उपचार कर सकती है. यह पहले इस्तेमाल होनेवाली स्न्लेरोथेरेपी के ठीक विपरीत प्रक्रिया है, जो रोगियों के लिए प्रायः दर्दनाक सिद्ध होती थी.

स्पाइडर वेन्स का उपचार करने हेतु लेज़र उपचार रोगियों के लिए बेहद उपयुक्त है और ये नवीनतम विधियां बहुत कम कष्ट और न्यूनतम जोखिम के साथ इच्छित परिणाम देती हैं. लेज़र का उपयोग गर्भवती महिलाओं तथा उन रोगियों के उपचार क्षेत्र में नहीं किया जा सकता है, जिनकी त्वचा पर वायरल अटैक या संक्रमण हो चुका है. ऊपरी वैस्न्युलर घाव त्वचीय वाहिकाओं के विस्तारण के चलते होते हैं और ये किसी शिरापरक विकृति का परिणाम हैं. सबसे आम ऊपरी वैस्न्युलर घावों को टेलांजिएक्टीजिया और एंजियोमा कहा जाता है.

शिरापरक रोग एक विकसित होता रहने वाला रोग है, बिना उपचार के यह ठीक ही नहीं होता.अपने शिरापरक निदान के लिए सही चिकित्सक से परामर्श करें और जितनी जल्दी हो सके इस विकृति का उपचार कराएं. यह नए ऊपरी वैस्न्युलर घावों के उभार को सीमित करेगा.

Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

लेजर उपचार कैसे काम करता है?
लेजर सिद्धांत एक तापीय क्रिया के उत्पादन पर आधारित है. लेज़र प्रकाश एपिडर्मिस के माध्यम से त्वचा को भेदते हुए प्रवेश करेगा, ताकि डर्मिस के अंदर मौजूद नस को स्पर्श कर सके. इसके बाद ऊष्मा में तब्दील हुआ प्रकाश नस को अवरोधित करेगा और धीरे-धीरे उसे गायब कर देगा. लेज़र उपचार को स्न्लेरोथेरेपी के अतिरिक्त इस्तेमाल किया जा सकता है और यह घुटने, एड़ी या पैर के भीतरी हिस्सों जैसे प्रवेश करने में कठिनाई वाले क्षेत्रों पर कार्य करता है.

किसी लेज़र उपचार से पहले और बाद में बरती जानेवाली सावधानियां:
* उपचार शुरू होने के 2 सप्ताह पहले से धूप में नहीं निकलना है.
* उपचार के बाद उपचार किए गए क्षेत्र पर कोई मॉइश्‍चराइज़िंग क्रीम लगाएं और अगले दो हफ्ते तक धूप में हर्गिज़ न निकलें.

Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

एक्सोथर्म लेज़र, कुशल और बिल्कुल नया  
स्पाइडर वेन्स, जो वैरिकोज़ वेन्स की आरंभिक अवस्था होती हैं, जो एक किस्म की कॉस्मेटिक समस्या होती हैं, उन्हें लक्षित ट्रांसक्यूटेनियस लेज़र का इस्तेमाल करके ठीक किया जा सकता है. इस तकनीक में इन स्पाइडर वेन्स पर एक विशिष्ट तरंग का लेज़र प्रकाश डाला जाता है. यह प्रकाश त्वचा के करीब स्थित 2 मिमि व्यास से कम आकार वाली स्पाइडर वेन्स को वहीं का वहीं जला डालता है. ऐसे विभिन्न उपकरण उपलब्ध हैं जो यह नतीजा प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं. चिकित्सा का वर्तमान मानक एक्सोथर्म डिवाइस है, जिसमें स्पाइडर वेन्स को 10 गुना ज़ूम करने के लिए एक इन-बिल्ट कैमरा लगा हुआ है, जो नसों को आसान निशाना बनाने के साथ-साथ आसपास की त्वचा को 5 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा रखने में मदद करता है. यह एक बहु-उपयोगी और पेटेंट की हुई तकनीक है, जो आसपास के ऊतकों को सर्वोत्तम दक्षता और उच्च सुरक्षा प्रदान करती है. पररणाम धीरे-धीरे दिखाई पड़ते हैं और 4 से 6 सप्ताह के भीतर स्थायी हो जाते हैं. चिकित्सक आपको आवश्यक उपचार सत्रों के बारे में उचित परामर्श देंगे.

प्रक्रिया को  http://bit.ly/2N6q7DX  लिंक पर देखा जा सकता है. 

थायरॉइड (Thyroid) क्या है, इससे क्या हेल्थ प्रॉब्लम्स हो सकती हैं और इसका इलाज कैसे करें… थायरॉइड के बारे में अगर पूरी कंप्लीट जानकारी हो तो उपचार ज़्यादा मुश्किल नहीं. बस कुछ बातों का ध्यान रखें.

Thyroid care guide

 

हमारे गले में मौजूद थायरॉइड ग्लांड्स थायरॉइड हार्मोंस का निर्माण करते हैं. थायरॉइड हार्मोंस के अधिक निर्माण (ओवरप्रोडक्शन) या कम निर्माण (अंडरप्रोडक्शन) की वजह से थायरॉइड की समस्या होती है. थायरॉइड हार्मोंस हमारे शरीर के तापमान, मेटाबॉलिज़्म और हार्टबीट को नियंत्रित करते हैं.

 

थायरॉइड के असंतुलन के कारण:

निश्‍चित कारण का तो पता नहीं, लेकिन तनाव, पोषण की कमी, आनुवांशिकता, ऑटोइम्यून अटैक, प्रेग्नेंसी, वातावरण में मौजूद टॉक्सिन्स आदि इसकी वजह हो सकते हैं.

लक्षण

चूंकि ये हार्मोंस बड़े स्तर पर काम करते हैं, तो इसका पता लगाना थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन इन लक्षणों के आधार पर पता लगाया जा सकता है-
थकान: अगर आप दिनभर थकान महसूस करते हैं और रातभर अच्छी नींद लेने के बाद भी सुबह ख़ुद को थका हुआ महसूस करते हैं, तो हो सकता है आपके थायरॉइड ग्लांड्स हार्मोंस का कम निर्माण कर रहे हों.
डिप्रेशन: दरअसल, डिप्रेशन भी हार्मोंस के कम स्तर का संकेत हो सकता है, क्योंकि थायरॉइड हार्मोंस का संबंध मस्तिष्क के
सेरोटोनिन नामक तत्व (मोनोअमाइन न्यूरोट्रांसमीटर) से होता है. सेरोटोनिन एक बायोकेमिकल है, जो हमें अच्छा महसूस कराता है और ख़ुश रखने में सहायता करता है. थायरॉइड के कम निर्माण से सेरोटोनिन के स्तर पर भी प्रभाव पड़ता है, जिससे हम डिप्रेशन में जा सकते हैं.
चिंता: बहुत अधिक चिंतित रहना या अजीब-सी घबराहट महसूस होना हाइपरथायरॉइडिज़्म (अधिक निर्माण) से संबंधित हो सकता है. थायरॉइड हार्मोंस का स्तर जब बहुत अधिक बढ़ जाता है, तब आप रिलैक्स महसूस न करके हाइपर रहते हैं, क्योंकि आपके मेटाबॉलिज़्म को इसी तरह के सिग्नल्स मिलते हैं.
भूख, स्वाद और वज़न में परिवर्तन: हाइपरथायरॉइडिज़्म से बहुत अधिक भूख लगने लगती है, लेकिन वज़न बढ़ने की बजाय कम होता जाता है. जबकि हाइपोथायरॉइडिज़्म से स्वाद और गंध में बदलाव आता है और वज़न बढ़ सकता है.
मस्तिष्क पर प्रभाव: थायरॉइड के अधिक होने से एकाग्रता की कमी हो सकती है और इसके कम होने से याददाश्त पर विपरीत प्रभाव पड़ता है यानी आप भूलने की समस्या से परेशान हो सकते हैं और मस्तिष्क में एक रुकावट व असमंजस की स्थिति बनी रहती है. अक्सर थायरॉइड के इलाज के बाद मरीज़ काफ़ी हैरान हो जाते हैं क्योंकि पहले की अपेक्षा उनका मस्तिष्क इतना तेज़ हो जाता है, उन्हें यह अंदाज़ा ही नहीं होता कि थायरॉइड की वजह से भी ऐसा हो सकता है.
सेक्स लाइफ: थायरॉइड हार्मोंस के कम होने पर सेक्स में दिलचस्पी कम होने लगती है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसका सीधा संबंध थायरॉइड से न होकर इसकी वजह से हो रही थकान, बढ़ता वज़न, ऊर्जा की कमी व शरीर में दर्द आदि से हो सकता है.
स्पंदन महसूस होना: हार्ट पल्पिटेशन यानी धड़कनें आप अपने गले व सीने में महसूस कर सकते हो. दिल या तो ज़ोर-ज़ोर से धड़कता हो या बीट्स मिस हो रही हों, तो यह थायरॉइड के कारण हो सकता है.
त्वचा में बदलाव: थायरॉइड के कम होने पर त्वचा ड्राई व उसमें खुजली भी हो सकती है. हार्मोंस की कमी से मेटाबॉलिज़्म धीमा हो सकता है, जिससे त्वचा पर भी प्रभाव पड़ता है. पसीना कम आता है, जिसकी वजह से त्वचा का मॉइश्‍चर कम हो जाता है.
कब्ज़: मेटाबॉलिज़्म प्रभावित होने से कब्ज़ की शिकायत भी हो सकती है. जबकि थायरॉइड के बढ़ जाने से दस्त की शिकायत हो सकती है.
महिलाओं में पीरियड्स की अनियमितता: थायरॉइड की कमी से पीरियड्स के बीच का अंतर बढ़ जाता है, दर्द अधिक होता है और हैवी ब्लीडिंग भी होती है. जबकि थायरॉइड की अधिकता से पीरियड्स जल्दी-जल्दी होने लगते हैं. हैवी ब्लीडिंग होती है.
मसल्स में दर्द: हाथ-पैरों में दर्द और सुन्नता थायरॉइड की कमी के कारण हो सकता है.
हाई ब्लडप्रेशर: जिन्हें थायरॉइड (कम या ज़्यादा) की समस्या है, उन्हें ब्लडप्रेशर की संभावना अपेक्षाकृत अधिक होती है. थायरॉइड की कमी से ब्लडप्रेशर बढ़ने की संभावना और भी अधिक हो जाती है.
बहुत ठंड या गर्मी लगना: बहुत अधिक ठंड लगना, जल्दी सर्दी होना थायरॉइड की कमी की निशानी भी हो सकती है. जबकि थायरॉइड की अधिकता से गर्मी व पसीने की समस्या हो सकती है.
आवाज़ में बदलाव: थायरॉइड में सूजन की वजह से आवाज़ में बदलाव आ सकता है.
नींद में बदलाव: हमेशा नींद आना थायरॉइड की कमी का संकेत हो सकता है, जबकि नींद न आना इसकी अधिकता की निशानी हो सकती है.
कंसीव करने में समस्या: प्रेग्नेंसी में समस्या हो रही है, तो थायरॉइड भी इसकी वजह हो सकती है, क्योंकि थायरॉइड का असंतुलन ओव्यूलेशन को प्रभावित करता है.
बालों का झड़ना: न स़िर्फ सिर के बाल बल्कि आईब्रो व अन्य हिस्सों के बाल भी थायरॉइड की कमी से कम हो सकते हैं. जबकि थायरॉइड की अधिकता स़िर्फ सिर के बालों को प्रभावित करती है.
हृदय रोग व हाई कोलेस्ट्रॉल: थायरॉइड की कमी से बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है और हृदय रोग भी हो सकता है.

 

इलाज

हाइपरथायरॉइडिज़्म: थायरॉइड की अधिकता होने पर रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट (रेडियोथेरेपी का एक प्रकार), एंटी थायरॉइड मेडिकेशन और सर्जरी की जा सकती है. रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट में डॉक्टर आपको टैबलेट या लिक्विड दे सकते हैं, जिसमें रेडियोएक्टिव आयोडीन की भरपूर मात्रा होगी. यह टैबलेट (या लिक्विड) थायरॉइड ग्लांड्स के सेल्स को नष्ट करके और हार्मोंस के निर्माण की क्रिया को कम करके थायरॉइड को नियंत्रित करती है.
कभी-कभी एक से अधिक ट्रीटमेंट की भी ज़रूरत पड़ती है. रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट गर्भवती व फीड करा रही महिलाओं को नहीं करवाना चाहिए. जो लोग यह ट्रीटमेंट लेते हैं, उनमें भी महिलाओं को इलाज के बाद अगले छह महीनों के लिए कंसीव नहीं करना चाहिए और पुरुषों को भी चार महीने तक इससे बचना चाहिए. कई मरीज़ इस ट्रीटमेंट के बाद हाइपोथायरॉइडिज़्म (थायरॉइड की कमी) का शिकार हो जाते हैं, इसलिए बेहतर होगा कि सतर्क रहें और अपना थायरॉइड टेस्ट समय-समय पर करवाते रहें.
इस ट्रीटमेंट के वैसे कोई गंभीर साइड इफेक्ट्स नहीं होते, लेकिन एक साइड इफेक्ट बेहद गंभीर होता है, जिसमें व्हाइट ब्लड सेल्स का बोनमैरो निर्माण कम हो जाता है. इसका एक लक्षण होता है गले में सूजन. यदि आपको भी इलाज के बाद यह लक्षण नज़र आए, तो बेहतर है डॉक्टरी सलाह लेकर अपना व्हाइट ब्लड सेल्स चेक करवाएं.
सर्जरी की सलाह 45 वर्ष से कम आयुवाले ऐसे लोगों को दी जाती है, जहां उनका हाइपरथायरॉइडिज़्म टॉक्सिक ट्यूमर
(एडेनोमाज़- इन्हें हॉट नॉड्यूल्स भी कहते हैं) के कारण होता है. ये नॉड्यूल्स रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट से ठीक नहीं होते, इसलिए सर्जरी का सहारा लिया जाता है. सर्जरी के कुछ ही हफ़्तों बाद हार्मोंस का स्तर सामान्य हो जाता है, लेकिन यहां भी हार्मोंस का स्तर सामान्य से भी कम हो जाने की संभावना रहती है, तो नियमित टेस्ट ज़रूरी है.
कभी-कभी अस्थायी तौर पर भी थायरॉइड हो जाता है, जो बिना दवा के या पेनकिलर्स से ठीक हो जाता है.
हाइपोथायरॉइडिज़्म: थायरॉइड की कमी में थायरॉइड हार्मोन रिप्लेसमेंट द्वारा इलाज किया जाता है. हालांकि एनिमल एक्स्ट्रैक्ट से
हार्मोंस उपलब्ध होते हैं, लेकिन डॉक्टर्स सामान्यत: सिंथेटिक थायरॉइड हार्मोंस को अधिक महत्ता देते हैं. इसके साइड इफेक्ट्स न के बराबर हैं, लेकिन कुछ लोग घबराहट और सीने में दर्द का अनुभव कर सकते हैं.

घरेलू उपाय

हाइपरथायरॉइडिज़्म के लिए

– ब्रोकोली में गॉइट्रोजेन्स और आइसोथायोसाइनेट्स नामक तत्व होते हैं, जो थायरॉइड के निर्माण पर अंकुश लगाते हैं. अपने थायरॉइड हार्मोंस को नियंत्रित रखने के लिए जितना अधिक हो सके, सलाद के रूप में ब्रोकोली का कच्चा ही सेवन करें.
– सोया प्रोडक्ट्स भी फ़ायदेमंद हैं, क्योंकि यह प्रोटीन से भरपूर होते हैं. प्रोटीन थायरॉइड हार्मोंस को दूसरे बॉडी टिश्यूज़ में ट्रांसपोर्ट कर देते हैं.
– अगर आपको सोया प्रोडक्ट्स पसंद नहीं, तो नट्स, अंडे और फलियों को डायट में शामिल करें.
– ओमेगा 3 फैटी एसिड्स ज़रूरी है. यदि आपके शरीर को यह नहीं मिल रहा, तो हार्मोंस में असंतुलन होगा. आप फ्लैक्स सीड्स, अखरोट और मछलियों के सेवन से इसे प्राप्त कर सकते हैं.
– पत्तागोभी में भी भरपूर मात्रा में गॉइट्रोजेन्स होते हैं. पत्तागोभी का सलाद यानी पत्तागोभी को कच्चा खाने से अधिक लाभ मिलेगा.
– बेरीज़ को अपने डायट में शामिल करें, क्योंकि सभी प्रकार की बेरीज़- ब्लू बेरीज़, स्ट्रॉबेरीज़, ब्लैक बेरीज़ और चेरी आदि थायरॉइड ग्लांड्स को हेल्दी रखती हैं.
– आंवला थायरॉइड को कंट्रोल करने में बेहद कारगर है. आंवला पाउडर में शहद मिलाकर रोज़ सुबह नाश्ते से पहले लें.
– प्रीज़र्वेटिव्स युक्त, अधिक शक्कर व मैदा से बने पदार्थ न खाएं, जैसे- पास्ता, व्हाइट ब्रेड आदि.

हाइपोथायरॉइडिज़्म के लिए

– कोकोनट ऑयल थायरॉइड ग्लांड्स को क्रियाशील करके हार्मोंस के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है. खाना पकाने के लिए एक्स्ट्रा वर्जिन ऑर्गैनिक कोकोनट ऑयल का इस्तेमाल करें.
– रोज़ नाश्ता करते समय दूध में 2 टेबलस्पून कोकोनट ऑयल मिक्स करके पीएं.
– एप्पल साइडर विनेगर भी थायरॉइड के असंतुलन को पूरा करने में सहायक है. यह डीटॉक्सीफाइ करता है, एसिड-एल्कलाइन बैलेंस को बनाए रखता है, हार्मोंस को संतुलित करके मेटाबॉलिज़्म को बेहतर बनाता है, वज़न नियंत्रण में रखता है.
– 2 टेबलस्पून ऑर्गैनिक एप्पल साइडर विनेगर को एक ग्लास गर्म पानी में मिलाएं. थोड़ा शहद भी मिला लें. नियमित रूप से इसका सेवन करें.
– फिश ऑयल भी थायरॉइड हार्मोंस के निर्माण में सहायक होता है.
– विटामिन डी की कमी से ऑटोइम्यून डिसीज़ हो सकती हैं, जिनमें थायरॉइड भी एक है. रोज़ सुबह 15 मिनट तक धूप का सेवन करें.
– अदरक ज़िंक, मैग्नीशियम और पोटैशियम से भरपूर होता है. यह थायरॉइड ग्लांड्स की कार्यशैली को बेहतर बनाता है. अपने खाने में या सूप में अदरक के टुकड़े डालकर इसे अपने डायट में शामिल करें या फिर अदरक को पानी में उबालकर गर्म जिंजर टी का सेवन करें. इसमें आप शहद भी मिला सकते हैं.
– विटामिन बी थायरॉइड ग्लांड्स को हेल्दी रखता है. शोधों में पाया गया है कि जो लोग हाइपोथायरॉइडिज़्म से ग्रसित हैं, उनमें विटामिन बी12 की कमी भी पाई जाती है.
– योग व प्राणायाम से थायरॉइड हार्मोंस का स्तर सामान्य बना रहता है. हाइपर व हाइपो दोनों ही थायरॉइड में योग से फ़ायदा है, लेकिन दोनों के लिए पोज़ अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए किसी योग गुरु से पूछकर उनकी देखरेख में ही यह करें.
– हाइपरथायरॉइडिज़्म के लिए सेतुबंधासन, शिशु आसन, शवासन, मार्जारि आसन और सूर्य नमस्कार फ़ायदेमंद हैं.
– हाइपोथायरॉइडिज़्म के लिए प्राणायाम- शीतली प्राणायाम, उज्जयी और नाड़ी शोधन, हर तरह की ब्रीदिंग एक्सरसाइज़, योग निद्रा व ध्यान लाभदायक हैं.
– लेकिन किसी भी तरह के थायरॉइड में योग व एक्सरसाइज़ बिना डॉक्टरी सलाह व बिना एक्सपर्ट की देखरेख के शुरू न करें.

– गीता शर्मा

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Men's Health Check Up Guide

जीवन की जद्दोज़ेहद में अधिकतर पुरुष अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो जाते हैं, जिससे उन्हें अनेक बीमारियां घेर लेती हैं. आइए, जानते हैं कुछ ऐसे आवश्यक टेस्ट्स के बारे में जिन्हें कराने से कुछ बीमारियों का पता प्राथमिक अवस्था में ही चल जाता है.

 

जब उम्र 20 से 35 वर्ष हो

20 से 30 वर्ष के पुरुष हर वर्ष नॉर्मल फ़िज़िकल चेकअप करवाएं, जिसमें वज़न,  हाइट व ब्लड प्रेशर आदि चेक कराएं. लेकिन जब तीस साल की उम्र को पार कर जाएं, तो सामान्य शारीरिक जांच के साथ-साथ डायबिटीज़, हार्ट, थायरॉइड, लीवर व एनीमिया के लिए भी ज़रूरी टेस्ट्स करवाएं.

1. ब्लड टेस्ट : कंप्लीट ब्लड काउंट, लीवर ़फंक्शन टेस्ट, फ़ास्टिंग एवं पोस्ट प्रैंडियल ब्लड शुगर, लिपिड प्रोफ़ाइल, थायरॉइड टेस्ट आदि.

कब कराएं?
हर तीसरे वर्ष. यदि टेस्ट में कोई चीज़ असामान्य आती है, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें.

क्यों कराएं?
इससे कई बातों का पता चलता है, जैसे- व्हाइट सेल्स, प्लेटलेट काउंट, किडनी व लीवर की स्थिति, कोलेस्ट्रॉल लेवल, थायरॉइड, एनीमिया, डायबिटीज़ या प्रीडायबेटिक अवस्था आदि. कोई भी असाधारण स्थिति हो, तो दवाइयों से इलाज संभव है.

2. ईसीजी- इसे इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम कहते हैं, इसमें छोटी-छोटी विद्युत तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो हार्ट की क्रियाशीलता को रिकॉर्ड करती हैं.

कब कराएं?
यदि सीने में दर्द, हांफना या तेज़ धड़कन की शिकायत न हो, तो हर तीसरे वर्ष कराएं. यदि परिवार में हार्ट प्रॉब्लम का इतिहास हो या कोई रिस्क फैक्टर्स हों, तो हर साल कराए.

क्यों कराएं?
यह हृदय संबंधी समस्याओं की पहचान का मुख्य टेस्ट है.

3. चेस्ट एक्स-रे

कब कराएं?
हर तीन साल बाद.

क्यों कराएं?
इससे फेफड़ों के संक्रमण, लंग कैंसर व टी.बी. के बारे में पता चलता है.

4. सोनोग्राफ़ी

कब कराएं?
हर तीन साल बाद.

क्यों कराएं?
इससे पेट की समस्याएं, जैसे- लीवर की वृद्धि होना, किडनी स्टोन तथा गाल ब्लैडर स्टोन के बारे में पता चलता है.

जब उम्र 35 से 50 वर्ष हो

1. ट्रेडमील टेस्ट

कब कराएं?
40 वर्ष की उम्र तक हर दो साल बाद एवं उसके बाद हर साल यह टेस्ट कराएं.

क्यों कराएं?
यह एंजाइना व हार्ट अटैक के लिए ज़िम्मेदार कोरोनरी हार्ट डिसीज़ का स्क्रीनिंग टेस्ट है. इसमें बीमारी का जल्दी पता लगने से आनेवाली दुर्घटना से बचा जा सकता है.

2. इको कार्डियोग्राफ़ी

कब कराएं?
40 वर्ष की उम्र तक हर दो साल बाद एवं उसके बाद हर साल यह टेस्ट कराएं.

क्यों कराएं?
यह टेस्ट हार्ट की आरामावस्था में उसकी रचना एवं बनावट संबंधी सारी विस्तृत जानकारी देता है. यदि ब्लॉकेज है, तो उसका पता लगाने में मदद करता है. इससे आगे का इलाज कराने में आसानी होती है.

3. लंग फंक्शन टेस्ट या पलमोनरी फंक्शन टेस्ट

कब कराएं?
40 वर्ष की उम्र तक हर 2 साल बाद एवं उसके बाद हर साल यह टेस्ट कराएं.

क्यों कराएं?
यह फेफड़ों के आकार एवं क्षमता को मापता है. इससे फेफड़ों से संबंधित अनेक समस्याओं व बीमारियों, जैसे- अस्थमा व क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस का पता चल जाता है, जिससे आसानी से इलाज किया जा सकता है.
40 की उम्र के बाद डायबिटीज़ टाइप 2 के लिए एचबी 1, एएलएसी टेस्ट करवाएं. यदि शुगर लेवल 120 से लेकर 200 के बीच में है, तो तीन महीने में टेस्ट करवाएं. साथ ही ग्लूकोज़ टॉलरेंट टेस्ट भी करवाएं.

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जब उम्र 50 वर्ष व उससे अधिक हो

क्या कराएं?
हर साल टाइप 2 डायबिटीज़ व लिपिड डिसऑर्डर के लिए ब्लड टेस्ट ज़रूर करवाएं. इसके अलावा इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम, आंख व कान के टेस्ट्स, प्रोस्टेट व कोलोन कैंसर के लिए स्क्रीनिंग और अगर परिवार में हार्ट डिसीज़ की हिस्ट्री है या फिर सिगरेट, शराब, मोटापा, ब्लड प्रेशर जैसे रिस्क ़फैक्टर्स हैं, तो उसकी भी जांच करवाएं. मोतियाबिंद का भी चेकअप करवाते रहें. साथ ही लिवर एंज़ाइम्स के स्तर की जांच के लिए लिवर की जांच और डिप्रेशन की जांच भी ज़रूरी है. अगर उम्र 60 के पार हो, तो अलज़ाइमर्स और डेमेंशिया की जांच भी करवानी चाहिए.

ऊपर बताए टेस्ट्स के अलावा ये जांच भी करवाएं

1. ब्लड टेस्ट- ब्लड शुगर, लिपिड प्रोफ़ाइल, प्रोस्टेट स्पेसिफ़िक एंटीजन. प्रोस्टेट के लिए टेस्ट बेहद महत्वपूर्ण है और इसका स्तर यदि 20 ग्राम से अधिक हो, तो सतर्क रहें और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

कब कराएं?
प्रतिवर्ष.

क्यों कराएं?
एनीमिया, कोलेस्ट्रॉल लेवल, टाइप 2 डायबिटीज़ व प्रोस्टेट कैंसर की जानकारी के लिए.

2. स्टूल टेस्ट/ कोलनोस्कोपी/ अपर गैस्ट्रोइंटस्टाइनल एंडोस्कोपी (स्टूल में ब्लड पाए जाने पर)

कब कराएं?
प्रतिवर्ष.

क्यों कराएं?
गैस्ट्रोइंटस्टाइनल कैंसर की जानकारी पाने के लिए.

3.आई चेकअप, ईएनटी चेकअप, ऑडियोमेट्री (कान का चेकअप)

कब कराएं?
प्रतिवर्ष.

क्यों कराएं?
आंखों व कानों की जांच के लिए, ख़ासकर मोतियाबिंद की.

4. ईसीजी, ट्रेडमील, इकोकार्डियोग्राफ़ी

कब कराएं?
प्रतिवर्ष.

क्यों कराएं?
कोरोनरी हार्ट डिसीज़ की जानकारी के लिए.

5. बोन मिनरल डेंसिटी स्कैन

कब कराएं?
हर 2 वर्ष में.

क्यों कराएं?
हड्डियों के कमज़ोर होने की स्थिति के बारे में जानने के लिए.

ज़रूरी टेस्ट्स

  • नियमित रूप से डेंटल चेकअप करवाएं. इससे डेंटल प्रॉब्लम का पता जल्दी चल जाता है.
  •  टीथ क्लीनिंग साल में 1 बार कराएं.
  • ध्यान रहे, मसूड़ों की बीमारी हार्ट अटैक व दिल की बीमारी से जुड़ी हुई है.
  • कंप्लीट आई चेकअप करवाएं स्वस्थ व्यक्ति तीन साल में एक बार कराएं.
  • देखने में परेशानी हो रही हो, फैमिली हिस्ट्री हो, आंख में कोई घाव हो गया
    हो, मोतियाबिंद हो, तो जल्दी चेकअप करवाएं.