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Personal Problems: पीरियड्स के बाद यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन हो जाता है (Do You Get Urinary Tract Infection (UTI) After Period?)

मेरी उम्र 32 साल है. पिछले १ साल से हर पीरियड्स (Periods) के बाद मुझे यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (Urinary Tract Infection) हो जाता है, जिसके लिए मुझे एंटबायोटिक्स लेनी पड़ती हैं. और पीरियड्स भी समय पर नहीं आते, आगे पीछे हो जाते हैं. मैं बहुत परेशान हो गई हूं, कृपया मेरी मदद करें.
– शांति कमानी, हैदराबाद.

आपके लक्षण देखकर लग रहा है कि ये यूरिनरी इंफेक्शन है. ज़्यादातर यूरिन इंफेक्शन का कारण बैक्टीरिया होते हैं, जो हमारी ही आंतों से आते हैं. ये हमारी आंतों को तो कोई नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन जब शरीर के दूसरे हिस्सों में पहुंच जाते हैं, तब इंफेक्शन का कारण बनते हैं. कुछ बैक्टीरिया आपके गुदा द्वार (ऐनस) में रहते हैं, जो आपके ब्लैडर तक पहुंचकर यूरिन इंफेक्शन का कारण बनते हैं. सेक्सुअल एक्टिविटी के कारण भी महिलाओं को यूरिन इंफेक्शन होता है. इसके अलावा अनहाइजीनिक पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल करने और कम पानी पीने के कारण भी यूरिनरी टैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई) होता है. यूटीआई में राहत के लिए भरपूर पानी पीएं, ताकि जर्म्स आपके शरीर से फ्लश आउट हो जाएं. इसके अलावा क्रैनबेरी का जूस और नींबू पानी पीएं. साफ़-सुथरी अंडरवेयर पहनें और प्राइवेट पार्ट्स की हाइज़ीन का ख़्याल रखें. अगर यह समस्या आपको बार-बार हो रही है, तो गायनाकोलॉजिस्ट से मिलें.पीरियड्स का यूरिन इंफेक्शन और एंटीबायोटिक्स से कोई कनेक्शन नहीं.

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Urinary Tract Infection

 

मेरी उम्र ३९ है. १ साल पहले मैं डिप्रेशन में थी और पिछले ७ महीनों से मेरे पीरियड्स सिर्फ़ 2 दिन ही रहते हैं और ब्लीडिंग भी बहुत कम होती है. क्या यह मेनोपॉज़ की निशानी है? या फिर डिप्रेशन के कारण ऐसा हो रहा है. क्या मुझे किसी तरह का ट्रीटमेंट लेना होगा या फिर हेल्दी लाइफस्टाइल से ये ठीक हो जाएगा. कृपया, मार्गदर्शन करें.
– उमा विश्वास, फ़िरोज़पुर.

पीरियड्स के दौरान कम ब्लीडिंग के कई कारण हो सकते हैं, जैसे- हार्मोन्स का असंतुलन, पोषण की कमी, पीसीओएस, थायरॉइड प्रॉब्लम्स. अपने परिवार में पता करें कि अर्ली मेनोपॉज़ की हिस्ट्री तो नहीं. आपको कुछ ब्लड टेस्ट कराने होंगे. टेस्ट में ओवेरियन रिज़र्व चेक कराएं और सोनोग्राफी करवाएं ताकि पता चल सके कि कितने साल और रुक सकते हैं.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

 

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हेल्थ प्रॉब्लम्स प्रभावित करती हैं आपकी सेक्स लाइफ (Health Problems That Affect Your Sex Life)

Sex Life

हेल्थ प्रॉब्लम्स प्रभावित करती हैं आपकी सेक्स लाइफ (Health Problems That Affect Your Sex Life)

बीमारियों के चलते हम न स़िर्फ सेहतमंद ज़िंदगी के सुख से वंचित रह जाते हैं, बल्कि सेक्स क्रिया का सुख भी नहीं भोग पाते हैं. बीमारियों का हमारी सेक्स लाइफ पर क्या असर होता है तथा ये हमारी सेक्स लाइफ को किस तरह प्रभावित करती हैं? आइए, हम आपको बताते हैं.

 

धूल-मिट्टी, प्रदूषण, बदलती लाइफ स्टाइल और बदलते मौसम के चलते आए दिन हमें कई बीमारियों का सामना करना पड़ता है. ये बीमारियां हमारी सेहतमंद ज़िंदगी को प्रभावित करने के साथ ही हमारी सेक्स लाइफ पर भी गहरा असर डालती हैं. जानिए कौन-सी बीमारी से कैसे निपटना चाहिए?

डायबिटीज़

डायबिटीज़ का सेक्स लाइफ पर गहरा असर होता है. यह रोगी की कामेच्छा, परफॉर्मेंस और ऑर्गेज़्म को बुरी तरह से प्रभावित करता है. कई बार डायबिटीज़ के रोगी नपुंसक तक हो जाते हैं. जो लोग इंसुलिन लेते हैं, वो कई बार सेक्स क्रिया के दौरान अधिक उत्तेजना के चलते हाइपोग्लेसेमिया की चपेट में भी आ जाते हैं. सेक्स क्रिया के दौरान चक्कर आना, कंपन, धड़कनों का तेज़ होना, ध्यान केद्रिंत न कर पाना जैसी तकली़फें हाइपोग्लेसेमिया के संकेत हैं.

कैसे निपटें?

यदि हाइपोग्लेसेमिया का कोई भी संकेत नज़र आए, तो तुरंत शुगर की गोलियां लें. सेक्स क्रिया से पहले एक्स्ट्रा स्टार्ची कार्बोहाइड्रेट युक्त फूड, जैसे-पास्ता, चावल या ब्रेड खाने से बचें. साथ ही शुगर लेवल को भी नियंत्रण में रखें.

कोरोनरी हार्ट डिसीज़

कोरोनरी हार्ट पेशेंट को सेक्स के दौरान सांस लेने में तकलीफ़ या छाती में दर्द होने की संभावना हो सकती है, क्योंकि सेक्स क्रिया को अंजाम देते वक़्त अधिकांशतः कोरोनरी हार्ट डिसीज़ पेशेंट का हार्ट रेट बढ़ने लगता है तथा ब्लड प्रेशर भी हाई हो जाता है. ऐसे में यदि लगातार दो घंटे तक सेक्स क्रिया चलती रहे, तो अटैक आने की संभावना और भी बढ़ जाती है.

कैसे निपटें?

जिन हार्ट पेशेंट को हाल ही में हार्ट अटैक आया हो, उन्हें 3 से 6 सप्ताह तक सेक्स से परहेज़ करना चाहिए. कोरोनरी हार्ट डिसीज़ से पीड़ित रोगी को यदि डायबिटीज़ हो, तो अटैक आने की गुंज़ाइश और अधिक बढ़ जाती है. ऐसे पेशेंट को तभी सेक्स करना चाहिए, जब उनका ब्लड प्रेशर व पल्स रेट नॉर्मल हो. साथ ही ऐसे पेशेंट्स को भोजन के 3 घंटे बाद तक सेक्स से परहेज़ करना चाहिए.

मोटापा

हालांकि मोटापा एक आम समस्या है, लेकिन मोटापा सेक्स लाइफ को काफ़ी हद तक प्रभावित करता है. मोटापा न स़िर्फ संबंधित व्यक्ति की कामेच्छा को प्रभावित करता है, बल्कि उसके परफॉर्मेंस पर भी गहरा असर डालता है. कई बार मोटे व्यक्ति ऑर्गेज़्म का सुख भी नहीं भोग पाते हैं.

कैसे निपटें?

मोटापा न स़िर्फ आपकी सेक्स लाइफ को प्रभावित करता है, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ठीक नहीं है. अतः सबसे पहले मोटापा कम करने की कोशिश करें. तली-भुनी चीज़ों के सेवन से परहेज़ करें. एक्सरसाइज़ एवं योग को अपनी दिनचर्या में शामिल करें, ताकि आप सेक्स का भरपूर आनंद उठा सकें.

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अस्थमा

अस्थमा से पीड़ित रोगियों में सेक्स क्रिया के दौरान अधिक उत्तेजना के चलते अस्थमा का अटैक आने की संभावना होती है. कई बार महिलाओं में उनके पार्टनर के सेमिनल फ्लूइड में मौजूद प्रोटीन्स की एलर्जी के कारण भी सेक्स के दौरान अस्थमैटिक अटैक आने का ख़तरा बना रहता है. कई महिलाओं एवं पुरुषों को लैटेक्स एलर्जी के कारण कंडोम यूज़ करने पर अस्थमैटिक अटैक आने की गुंजाइश होती है.

कैसे निपटें?

सेक्स क्रिया से पहले ब्रोंकोडिलेटर थेरेपी लें. इससे आपको आराम मिलेगा. डॉक्टर की सलाह पर उचित एक्सरसाइज़ एवं दवाइयां भी आपको राहत दिलाएंगी.

हाइपोथायरॉइज़्म

हाइपोथायरॉइज़्म से पीड़ित व्यक्ति के शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव आते हैं, जैसे- अचानक से वज़न का बढ़ना, ज़्यादा गर्मी का एहसास होना आदि. नतीजतन ऐसे व्यक्ति की कामेच्छा भी कम हो जाती है.

कैसे निपटें?

डॉक्टर की मदद से थायरॉइड को कंट्रोल में रखने की कोशिश करें. इससे आपकी सेक्स लाइफ में संतुलन बना रहेगा.

पीठदर्द

पीठदर्द की वजह से न स़िर्फ आपकी दिनचर्या की गति धीमी हो जाती है, बल्कि आपकी सेक्स लाइफ भी प्रभावित होती है. कई बार सेक्स के दौरान ग़लत पोश्‍चर भी पीठदर्द का कारण बन जाता है, तो कई बार पीठदर्द के चलते सेक्स क्रिया का भरपूर आनंद नहीं लिया जा सकता.

कैसे निपटें?

सही एवं उचित पोश्‍चर में सेक्स क्रिया को अंजाम देने की कोशिश करें. पति-पत्नी दोनों में से जिसे पीठदर्द की शिकायत न हो, उसे टॉप पोजीशन अपनाने को कहें, जैसे- यदि पति को पीठदर्द की शिकायत है, तो पत्नी को तथा पत्नी को पीठदर्द की शिकायत है, तो पति को टॉप पोजीशन लेने को कहें. इसके साथ ही भुजंगासन, शलभासन, सुलभ उत्तासन, सर्पासन आदि आसन करें. इससे पीठदर्द से आराम मिलेगा.

आर्थराइटिस

आर्थराइटिस से पीड़ित रोगी की सेक्स लाइफ भी काफ़ी प्रभावित होती है. सेक्स में अधिक एक्सपेरिमेंट या मुद्राओं का प्रयोग ऐसे व्यक्तियों के लिए घातक साबित होता है तथा नए एक्सपेरिमेंट से उन्हें कई तरह की तकली़फें भी होती हैं.

कैसे निपटें?

सेक्स के दौरान ऐसे आसनों का प्रयोग करें, जिनसे जोड़ों पर अधिक दबाव न पड़े. हो सके तो पार्टनर को ही सेक्स क्रिया के दौरान एक्टिव रहने की सलाह दें.

 

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पर्सनल प्रॉब्लम्स: क्या प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले मेडिकल चेकअप करवाना चाहिए? (Do I Need Pre Pregnancy Checkups?)

Need Pre Pregnancy Checkups
मैं 35 वर्षीया शादीशुदा महिला हूं और मुझे बेटा भी है. मैं एक स्वस्थ महिला हूं और मुझे कोई बुरी आदत भी नहीं है. अगर मुझे दूसरा बच्चा चाहिए, तो क्या मुझे कंप्लीट मेडिकल चेकअप की ज़रूरत है?
– रंजना शिंदे, पुणे.

प्रेग्नेंसी के दौरान मां व बच्चे दोनों की अच्छी सेहत के लिए मां का स्वस्थ होना बहुत ज़रूरी है. प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले सभी ज़रूरी टेस्ट्स करवाएं. रेग्युलर हेल्थ चेकअप में ब्लड टेस्ट ज़रूर करवाएं. इससे थायरॉइड, डायबिटीज़ और ओबेसिटी जैसी बीमारियों का पता उनके शुरुआती दौर में ही चल जाता है. थायरॉइड के कारण जहां कंसीव करने में परेशानी होती है, वहीं डायबिटीज़ व ओबेसिटी से प्रेग्नेंसी के दौरान द़िक्क़तें आ सकती हैं. अगर कंसीव करने से पहले इनका पता चल जाए, तो सही तरी़के से इलाज किया जा सकता है और प्रेग्नेंसी में कोई प्रॉब्लम नहीं आती. प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले किसी अच्छे गायनाकोलॉजिस्ट को मिलें.

 Need Pre Pregnancy Checkups
मेरी बेटी की उम्र 15 साल है. पीरियड्स के दौरान उसे बहुत दर्द होता है. क्या उसे इलाज की ज़रूरत है? क्या उसे किसी डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
– ममता शाह, सूरत.

दर्दयुक्त माहवारी आपकी बेटी की सेहत के साथ-साथ उसकी पढ़ाई-लिखाई व पर्सनल लाइफ को भी प्रभावित कर सकती है. अगर इसके कारण वह अपनी लाइफ नॉर्मल तरी़के से जी नहीं पा रही है, तो आपको ज़रूर उसका इलाज कराना चाहिए. यह कई कारणों से हो सकता है, इसलिए सबसे पहले किसी एक्सपर्ट डॉक्टर से उसका चेकअप कराएं. वो उसे सोनोग्राफी करवाने की सलाह दे सकते हैं. पूरा चेकअप हो जाने के बाद डॉक्टर आपको कुछ पेनकिलर्स या ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स लेने की सलाह दे सकते हैं.

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यह भी पढ़ें: पर्सनल प्रॉब्लम्स: गर्भधारण नहीं कर पा रही हूं, क्या मुझमें कोई प्रॉब्लम है?

 

 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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पर्सनल प्रॉब्लम्स: क्या एनीमिया के कारण कंसीव नहीं कर पाऊंगी? (Can Anemia Cause Infertility?)

Can Anemia Cause Infertility
मेरी शादी को 2 साल हो चुके हैं और आजकल मैं एनीमिया से परेशान हूं. डॉक्टर ने बताया है कि एनीमिया की शिकार होने के कारण मैं कंसीव नहीं कर सकती. मेरा हीमोग्लोबिन 12 है, क्या यही एनीमिया का कारण है? मेरे पति के सभी टेस्ट्स नॉर्मल हैं. मैं जानना चाहती हूं कि क्या कंसीव करने का कोई और तरीक़ा है?
– विजयलक्ष्मी, उत्तर प्रदेश.

महिलाओं में कंसीव न कर पाने के कई कारण होते हैं. स़िर्फ एनीमिया के कारण ऐसा हो, इसकी संभावना बहुत कम है. आपका हीमोग्लोबिन 12 है, जिसका अर्थ है कि आप सामान्य हैं और आपको एनीमिया नहीं है. मुझे लगता है कि आपको किसी गायनाकोलॉजिस्ट से कंसल्ट करना चाहिए, जो आपके टेस्ट्स करके इस बात का पता लगाने की कोशिश कर सकते हैं कि इसके अलावा कोई और प्रॉब्लम तो नहीं, जैसे- ओवरीज़ में अंडे बन रहे हैं या नहीं और आपकी फैलोपियन ट्यूब्स कहीं डैमेज या ब्लॉक तो नहीं हो गई हैं. इन टेस्ट्स की मदद से आप प्रेग्नेंसी के लिए अपना सही ट्रीटमेंट करवा सकती हैं.

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 Can Anemia Cause Infertility
मैं 23 वर्षीया स्वस्थ महिला हूं और मुझे कोई हेल्थ प्रॉब्लम भी नहीं है. मैं गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करना चाहती हूं, पर क्या इसके लिए मुझे किसी गायनाकोलॉजिस्ट से मिलना पड़ेगा.
– आशा मल्होत्रा, दिल्ली.

आप बिना किसी डॉक्टर की सलाह के ख़ुद से गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन बिल्कुल न करें. एक ओर जहां सभी गर्भनिरोधक गोलियां अलग-अलग होती हैं, वहीं हर महिला की ज़रूरत भी अलग होती है. इसलिए गर्भनिरोधक गोली शुरू करने से पहले डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन बहुत ज़रूरी है. प्रिस्क्रिप्शन से पहले डॉक्टर आपका बेसिक एक्ज़ामिनेशन करते हैं और उस गोली के फ़ायदे और गोली लेने का सही तरीक़ा भी बताते हैं. साथ ही अगर उस गोली से कोई साइड इफेक्ट हो सकता है, तो वो भी बता देते हैं.

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डॉ. राजश्री कुमार
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पर्सनल प्रॉब्लम्स: एग्स को कितने सालों तक फ्रीज़ करवाकर रख सकते हैं? (How Long Can I Freeze Eggs For?)

How Long Can I Freeze Eggs For
मैं 37 वर्षीया अविवाहित महिला हूं. 2 साल पहले ही मैंने अपने एग्स फ्रीज़ करवाकर रखे हैं. अभी तक मेरे जीवनसाथी की तलाश जारी है और यही सोचकर मैंने अपने एग्स फ्रीज़ करवाए हैं कि भविष्य में अपनी प्रेग्नेंसी के लिए उनका इस्तेमाल कर सकूं. पर मुझे यह पूछना है कि कितने सालों तक एग्स को सुरक्षित फ्रीज़ करके रखा जा सकता है? 
– मोनाली दुबे, मुंबई.

फ़िलहाल जो वैज्ञानिक दावे हैं उनके मुताबिक, 10 सालों तक एग्स को फ्रीज़ करके रखा जा सकता है. हो सकता है कि भविष्य में यह आंकड़ा और बदले, फिर भी आपको
40-45 या 50 जैसी बड़ी उम्र में प्रेग्नेंसी से जुड़े रिस्क फैक्टर्स के बारे में भी पता होना चाहिए, क्योंकि जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र बढ़ती है, वह हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ जैसी बीमारियों की चपेट में आने लगता है. इन सभी समस्याओं के बारे में आपको अपने फर्टिलिटी एक्सपर्ट से बात करनी चाहिए. आपने 30 की उम्र में अपने एग्स फ्रीज़ करके रख दिए हैं, इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं कि कंसीव करने के लिए अभी आप 10-15 साल और इंतज़ार कर सकती हैं.

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How Long Can I Freeze Eggs For
हाल ही में मेरी शादी हुई है. गर्भनिरोध के लिए हम कंडोम का इस्तेमाल करते हैं, पर जब भी हम कंडोम इस्तेमाल करते हैं, मेरे प्राइवेट पार्ट्स एकदम लाल हो जाते हैं और उनमें खुजली व जलन होती है. मैं क्या करूं?
– सोनिया गोयल, पुणे.

आपकी बातों से लग रहा है कि आप लेटेक्स एलर्जी से परेशान हैं, जिससे कंडोम बनता है. लेटेक्स रबर के पेड़ से बननेवाला एक प्राकृतिक व फ्लेक्सिबल रबर होता है. कुछ लोगों को इसके कारण एलर्जी हो सकती है, पर अगर यह बार-बार हो रहा है, तो नुक़सानदेह भी हो सकता है. जिन्हें केला, अनन्नास, पीच, कीवी, अंगूर, पपीता, एवोकैडो, स्ट्रॉबेरी, काजू, गेहूं आदि से एलर्जी होती है, उन्हें लेटेक्स एलर्जी की संभावना अधिक होती  है. तुरंत अपने  डॉक्टर से मिलें, ताकि वो आपकी सही जांच कर सकें. फैमिली प्लानिंग के लिए कोई और उपाय अपनाएं.

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जानें कंडोम से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

– हर साल 100 में से 18 महिलाएं स़िर्फ इसलिए कंसीव कर लेती हैं, क्योंकि उनके पार्टनर सही तरी़के से कंडोम इस्तेमाल नहीं करते, इसलिए आप इस बात का ध्यान रखें कि आपके पार्टनर सही तरीक़ा जानते हों.

– बाज़ार में मिलनेवाले कलरफुल कंडोम्स की बजाय सिंपल कंडोम्स इस्तेमाल करें, क्योंकि ज़्यादातर मामलों में देखा गया है कि ऐसे कंडोम्स सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ेस से आपको नहीं बचा पाते, जिसके लिए ख़ासतौर पर उनका इस्तेमाल किया जाता है.

– अगर आपको या आपके पार्टनर को लेटेक्स कंडोम की एलर्जी है, तो आप फीमेल कंडोम इस्तेमाल कर सकती हैं.

– कोशिश करें कि सेक्सुअल रिलेशन के दौरान कंडोम ज़रूर इस्तेमाल करें.

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डॉ. राजश्री कुमार

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पर्सनल प्रॉब्लम्स: क्या गर्भाशय का न होना मुमकिन है? (Can A Woman Be Born Without A Womb?)

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मेरी बेटी 16 साल की है, पर अभी तक उसके पीरियड्स नहीं आए हैं. सोनोग्राफी से पता चला कि उसकी ओवरीज़ तो हैं, पर गर्भाशय नहीं है, क्या ऐसा भी होता है? क्या यही वजह है कि उसके पीरियड्स नहीं आए?

– रीता वर्मा, हैदराबाद.

जी हां, यह मुमकिन है और यही वजह है कि उसके पीरियड्स नहीं आ रहे हैं. दरअसल, ऐसे मामलों में ओवरीज़ तो सामान्य होती हैं, पर योनि या गर्भाशय या तो अविकसित रह जाते हैं या होते ही नहीं. लगभग 4 या 5 हज़ार मामलों में से एक मामला ऐसा भी पाया जाता है. मैं समझ सकती हूं कि यह जानकर आप बहुत परेशान होंगी, पर कुछ सपोर्ट ग्रुप हैं, जो ऐसे मामलों में मदद करते हैं.

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मैं 35 वर्षीया दो बच्चों की मां हूं. हम तीसरा बच्चा नहीं चाहते थे, पर चूंकि मैंने कंसीव कर लिया था, इसलिए एबॉर्शन करवाना पड़ा. एबॉर्शन के तुरंत बाद डॉक्टर ने गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने की सलाह दी. पर अगर इनका इस्तेमाल मैं कुछ दिनों बाद करूं, तो क्या इस बीच कंसीव करने की संभावना है?

– कुसुम जोशी, जबलपुर.

एबॉर्शन के 10-12 दिनों बाद ही महिलाओं में ओव्यूलेशन शुरू हो जाता है, इसलिए अगर आपको बच्चे नहीं चाहिए, तो तुरंत किसी गर्भनिरोधक का इस्तेमाल शुरू कर दें.
बार-बार एबॉर्शन से पेल्विक इंफेक्शन, एब्नॉर्मल डिस्चार्ज और पेट में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं, इसलिए तुरंत किसी गर्भनिरोधक का
इस्तेमाल करें.

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पीरियड्स के दर्द में ट्राई करें ये होम रेमेडीज़ 

  • पीरियड्स के पहले ही दिन एक ग्लास गुनगुने पानी में डेढ़ टीस्पून दालचीनी पाउडर और 1 टेबलस्पून शहद मिलाकर दिन में तीन बार पीएं.
  • एक कप पानी में अदरक का एक टुकड़ा, शहद और नींबू का रस मिलाकर पांच मिनट तक उबालें. दिन में तीन बार पीएं.
  • एक कप पानी में 1 टेबलस्पून तुलसी की पत्तियां उबालकर थोड़ी-थोड़ी देर में पीएं.
  • अलसी में दर्दनिवारक गुण होते हैं, जो पीरियड्स में होनेवाले दर्द व मरोड़ मेंे आराम दिलाते हैं. 1-2 टेबलस्पून अलसी फांक लें.
  • गर्म पानी की थैली से पेट के निचले हिस्से में सेंक करें. तुरंत आराम मिलेगा.
  • एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण पपीता पीरियड्स के दर्द में काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होता है. पीरियड्स के दौरान पपीता खाएं, यह दर्द से राहत दिलाकर पीरियड्स को हैप्पी बनाता है.
यह भी पढ़ें:  शादी से पहले गर्भनिरोधक की जानकारी कितनी ज़रूरी है?
डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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पर्सनल प्रॉब्लम्स: क्या हीमोग्लोबिन की कमी के लिए हार्मोनल पिल्स लेनी चाहिए ? (Should I Take Hormonal Pills To Boost Hemoglobin Level?)

हीमोग्लोबिन

मैं 21 वर्षीया छात्रा हूं. मुझे हमेशा कमज़ोरी महसूस होती है. ब्लड टेस्ट में हीमोग्लोबिन कम आया है और गायनाकोलॉजिस्ट ने हैवी ब्लीडिंग को इसका कारण बताया, साथ ही पीरियड्स के 5वें दिन से 3 हफ़्तों के लिए हार्मोनल पिल्स लेने की सलाह दी है. क्या यह ज़रूरी है? कृपया, मार्गदर्शन करें.

– रेखा खोसला, नोएडा.

मैं समझ सकती हूं कि इस उम्र में हार्मोनल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स लेने की सलाह को लेकर आप परेशान हैं. दरअसल, हार्मोनल पिल्स के ज़रिए एक आर्टिफिशियल साइकल तैयार होता है, जिससे आपको ब्लीडिंग कम होती है. पीरियड्स के 5वें दिन से पिल्स लेने के कारण शुरुआत से ही आपके हार्मोंस दब जाते हैं. क्योंकि आपका हीमोग्लोबिन भी कम है, इसलिए दवाओं के साथ-साथ यह ध्यान देना भी ज़रूरी है कि आपको बेवजह हैवी ब्लीडिंग तो नहीं हो रही.

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पिछली डिलीवरी में मेरे बच्चे का वज़न स़िर्फ 2 किलो था, पर डॉक्टर ने इसका कारण नहीं बताया. अब मैं दोबारा प्रेग्नेंट हूं और मुझे डर लग रहा है कि कहीं इस बार भी मेरे बच्चे का वज़न कम न हो. पिछली बार मैं स़िर्फ 3 बार चेकअप के लिए गई थी. इस बार क्या करूं?

– आरोही हांडे, नासिक.

जन्म के बाद जिन बच्चों का वज़न ढाई किलो से कम होता है, उन्हें लो वेट बर्थ कहते हैं. इसका एक अहम् कारण प्री मैच्योर डिलीवरी हो सकती है. इसके अलावा प्रेग्नेंसी में मां का ग़लत खानपान, बार-बार इंफेक्शन, धूम्रपान और अल्कोहल भी इसके कारण हो सकते हैं. जैसा कि आपने बताया कि पिछली बार आप स़िर्फ 3 बार चेकअप के लिए गई थीं, इससे साफ़ पता चलता है कि पिछली प्रेग्नेंसी के दौरान आपने कितनी लापरवाही बरती. इस दौरान सही खानपान और नियमित रूप से डॉक्टर से चेकअप बहुत ज़रूरी होता है. नियमित चेकअप से डॉक्टर समय-समय पर आपके और बच्चे की सही स्थिति के बारे में जानकारी देते रहते हैं. वैसे भी गर्भावस्था के दौरान खानपान, परहेज़, ज़रूरी सावधानियों के अलावा नियमित चेकअप करवाना बेहद ज़रूरी है.

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नेचुरल तरीकों से बूस्ट करें हीमोग्लोबिन लेवल 

  • अपने भोजन में आयरन से भरपूर ओट्स, बार्ली जैसे साबूत अनाज की मात्रा बढ़ा दें.
  • हीमोग्लोबिन लेवल बढ़ाने में विटामिन सी काफ़ी मददगार साबित होता है. संतरा, मोसंबी, लीची, अमरूद और नींबू को अपने डायट में शामिल करें.
  • खजूर, मुनक्का और एप्रीकोट्स में भी भरपूर मात्रा में आयरन होता है. यह आपके हीमोग्लोबिन लेवल को बूस्ट करने में मदद करेगा.
  • स्ट्रॉबेरीज़ काफ़ी फ़ायदेमंद मानी जाती है. इसे जूस, स्मूदी या किसी रेसिपी में जैसे चाहें, वैसे अपने डायट में शामिल करें.
  • बीटरूट, आलू, ब्रोकोली, पालक का भरपूर सेवन करें.

 

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डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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बच्चों में गैजेट एडिक्शन- कितना अच्छा-कितना बुरा? (Gadget Addiction In Kids Good Or Bad?)

 

Gadget Addiction
हाईटेक होते ज़माने में जहां हर चीज़ मोबाइल ऐप पर उपलब्ध होती जा रही है, ऐसे में बच्चों को गैजेट्स से दूर रखना क्या सही है? आज के दौर में हम बच्चों को गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, मगर इनके इस्तेमाल की समयसीमा ज़रूर तय कर सकते हैं. बच्चों में गैजेट एडिक्शन कितना सही या ग़लत है? बता रही हैं प्राची भारद्वाज.

माता-पिता की जागरूकता के बावजूद आज दो साल के बच्चे भी टच स्क्रीन फोन चलाना, स्वाइप करना, लॉक खोलना और कैमरे पर फोटो खींचना जानते हैं. एक नए शोध (82 प्रश्‍नावली के आधार पर) के अनुसार, 87% अभिभावक प्रतिदिन औसतन 15 मिनट अपने बच्चों को स्मार्टफोन खेलने के लिए देते हैं, जबकि 62% ने बताया कि वे अपने बच्चों के लिए ऐप्स डाउनलोड करते हैं. स्मार्टफोन के मालिक हर 10 में से 9 अभिभावकों ने बताया कि उनके नन्हें-मुन्ने फोन स्वाइप करना जानते हैं, 10 में से 5 ने बताया कि उनके बच्चे फोन को अनलॉक कर सकते हैं, जबकि कुछ अभिभावकों ने माना कि उनके बच्चे फोन के अन्य फीचर भी ढूंढ़ते हैं. मनोवैज्ञानिकों की मानें, तो पिछले 3 वर्षों में तकनीक पर आश्रित लोगों की संख्या 30 गुना बढ़ गयी है.

गैजेट के अधिक इस्तेमाल से सेहत पर असर

माइकल कोहेन ग्रुप द्वारा किए गए शोध से पता चला कि टीनएजर्स गैजेट्स से खेलना ज़्यादा पसंद करते हैं. गैजेट्स लेकर दिनभर बैठे रहने के कारण उनमें मोटापे की समस्या बढ़ रही है. साथ ही आईपैड, लैपटॉप, मोबाइल आदि पर बिज़ी रहने के कारण वो समय पर सो भी नहीं पाते, जिससे उन्हें शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. गैजेट के अधिक इस्तेमाल से बच्चों में व्यग्रता, उत्कंठा, अवसाद, आत्मकेंद्रित, मनोरोग व अन्य समस्याएं हो रही हैं.

कुछ फ़ायदे भी हैं

बच्चे विकिपीडिया, गूगल, स्मार्ट वॉइस असिस्टेंट इत्यादि से महत्वूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं. कुछ स्कूलों में तो छोटी क्लास से ही टैबलेट इस्तेमाल किया जाने लगा है. ऐसे ही एक स्कूल की टीचर आशिका भाटिया कहती हैं, “टैबलेट की मदद से बच्चे रंग, आकार, नए शब्दों या अंकों को आसानी से पहचानते हैं और ख़ुशी से सीखते हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल समयसीमा में ही होना चाहिए.” कुछ ऐसा ही कहना है गुड़गांव में क्लीनिक चलाने वाली डॉ. सोनल का. उनके मुताबिक़, बदलते व़क्त में गैजेट में बिज़ी रहने के कारण बच्चे घर में ही रहते हैं, जिससे माता-पिता को उनकी सुरक्षा की चिंता नहीं होती. बस, ज़रूरत है तो गैजेट के इस्तेमाल की समयसीमा तय करने की.

क्या हो समय सीमा?

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की स्टडी के मुताबिक़, दो वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी तरह की स्क्रीन से दूर रखना चाहिए. तीन से पांच वर्ष के बच्चे एक घंटा और टीनएज बच्चों को केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक गैजेट इस्तेमाल की अनुमति दी जानी चाहिए.

कैसे पहचानें बच्चे के गैजेट एडिक्शन को?

यदि आपके बच्चे में निम्न लक्षण दिखें, तो समझ जाइए कि वो गैजेट एडिक्शन का शिकार हो चुका है.
* गैजेट चलाने की अनुमति न मिलने पर ग़ुस्सा आना, चिड़चिड़ापन, उदास हो जाना आदि.
* गैजेट के इस्तेमाल के कारण खाने, सोने आदि का समय बदलना.
* ध्यान में कमी, याददाश्त कमज़ोर होना, व्यावहारिक दिक्क़तें, कुछ नया सीखने में मुश्किल आदि.
* सोशल होने से आनाकानी करना.

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क्या करें पैरेंट्स?

* बच्चों को ख़ुश करने की बजाय उनकी भलाई के बारे में सोचना चाहिए. उन्हें अनुशासन में रखने के साथ ही कुछ अन्य बातों का ध्यान रखकर गैजेट की लत से बचाया जा सकता है.
* टीवी, कंप्यूटर या फोन अपने बच्चों को किसी भी स्क्रीन का उपयोग केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक ही करने दें.
* बच्चों को इनाम में गैजेट की बजाय कुछ और उपयोगी वस्तु दें.
* अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार, खाना खाते समय, होमवर्क करते समय, सोते समय बच्चों को गैजेट से दूर रखें.
* कोशिश करें कि बच्चा जब टीवी, कंप्यूटर पर बिज़ी हो, तो आप उसके साथ रहें ताकि ये देख सकें कि वो स्क्रीन पर क्या देख रहा है.
* मोबाइल पर गेम खेलते देख उसे नज़रअंदाज़ करने की बजाय बच्चे को बाहर जाकर दोस्तों के साथ खेलने के लिए प्रेरित करें.
* बच्चे की फिज़िकल एक्टिविटी बढ़ाएं.
* यदि बच्चा आपकी बात मानते हुए आपके द्वारा तय समय तक ही गैजेट का इस्तेमाल करता है, तो उसे प्रोत्साहित करना न भूलें. आज के दौर में आप उन्हें गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, लेकिन संतुलन बनाकर उन्हें इसका आदी होने से ज़रूर बचा सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

मुंबई की सादिया वंजारा कहती हैं, “छोटे बच्चे झुककर, बैठकर टीवी, कंप्यूटर आदि में खोये रहते हैं, जिससे उनकी गर्दन, पीठ, कंधों में तकलीफ़ हो जाती है.”
साइकोलॉजिस्ट डॉ. हरीश शेट्टी का मानना है कि मोबाइल फोन के द्वारा बच्चा इंटरनेट, ऑनलाइन खेल के साथ-साथ पॉर्न की दुनिया में भी झांक सकता है और ये उसके लिए कतई ठीक नहीं.
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. दलवई एक केस का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि एक 3 वर्षीय बच्चे को सबने आत्मकेंद्रित (ऑटिस्टिक) समझ लिया था, क्योंकि वो किसी से नज़रें नहीं मिलाता था, बातचीत नहीं करता था और अन्य बच्चों के साथ खेलता भी नहीं था, लेकिन इन सबकी असली वजह थी उसका घंटों तक ऑनलाइन शो देखते रहना. डॉ. दलवई के अनुसार, “गैजेट से स़िर्फ एकतरफ़ा संचार संभव है. टच-पैड की बजाय बच्चे को कोई पेट (पालतू जानवर) लाकर दें. गैजेट के आदी बच्चों की दुनिया बस वहीं तक सिमटकर रह जाती है.”

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चेहरे से जानें क्या हेल्थ प्रॉब्लम्स हो सकती हैं आपको? (What your face says about your Health)

face reveals about health

आपका चेहरा न स़िर्फ आपके इमोशन्स को दर्शाता है, बल्कि ये आपके हेल्थ के बारे में भी बताता है. तो आप भी अपने चेहरे को ग़ौर से देखें और जानें कि वो क्या कहता है आपकी सेहत के बारे में?

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माथा

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: पित्ताशय और लिवर की समस्या के अलावा पाचनक्रिया में गड़बड़ी की ओर संकेत करती है.

माथा हमारे नर्वस सिस्टम और पाचनतंत्र से जुड़ा होता है, जिससे किसी भी तरह का स्ट्रेस या पाचनक्रिया में गड़बड़ी का सीधा असर माथे पर आड़ी रेखाओं या पिंपल्स के रूप में नज़र आता है
हेल्थ टिप: रोज़ाना सुबह गुनगुने पानी में नींबू निचोड़कर पीएं. खाने में प्रोसेस्ड फूड और फैट्स की मात्रा कम कर दें. स्ट्रेस से दूर रहने के लिए ध्यान व योग करें.

 

आंखें

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: आंतों या जोड़ों की समस्याओं के अलावा, लिवर-किडनी और थायरॉइड की समस्या बयां करती हैं.

कहते हैं आंखें बोलती हैं, तभी तो आंखों का रंग, उनमें होनेवाले बदलाव, किसी तरह का धब्बा हमें हमारी सेहत के प्रति सचेत करता है.

आंखों की पुतली: पुतली अगर सिकुड़ रही है, तो उसका कारण जोड़ों की समस्याएं हो सकती हैं, वहीं अगर उसमें स़फेद धब्बे दिखाई दे रहे हैं, तो शरीर में विटामिन्स की कमी हो सकती है और अगर पुतली के अगल-बगल में स़फेद रिंग दिखाई दे, तो वह ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का इशारा है. इसके लिए खाने में नमक व शक्कर की मात्रा कम कर दें.
बदलता रंग: आंखें अगर लाल हो जाएं, तो इसका मतलब आपको कोई ऑटो इम्यून डिसीज़ है या फिर आप डिप्रेशन के शिकार हैं. आंखों के पीलेपन का कारण कमज़ोर लिवर या लिवर की बीमारी हो सकती है.
आंखों के नीचे डार्क सर्कल्स: डार्क सर्कल्स या फिर पफी या बैगी आईज़ का कारण नींद पूरी न होना, ख़ून में आयरन की कमी, किडनी में गड़बड़ी आदि हो सकता है.
हेल्थ टिप: आंखोें की पुतली की सेहत के लिए खाने में नमक व शक्कर की मात्रा कम कर दें. बदलते रंग के लिए तुरंत आंखों के डॉक्टर से संपर्क करें. पफी और बैगी आईज़ के लिए पानी ज़्यादा पीएं. भोजन को ख़ूब चबा-चबाकर खाएं और 6-8 घंटे की भरपूर नींद लें. डार्क सर्कल्स के लिए डेयरी प्रोडक्ट्स और गेहूं से कुछ दिन दूर रहें.

गाल

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: धीमा मेटाबॉलिज़्म, पोषक तत्वों की कमी, हृदय व फेफड़ों की समस्याएं आदि की ओर संकेत करते हैं.

गालों की रंगत: गालों का रंग उड़ जाना या फिर गालों के पैची नज़र आने का कारण मेटाबॉलिज़्म का धीमा होना या फिर फॉलिक एसिड और आयरन जैसे पोषक तत्वों की कमी हो सकता है. इसके अलावा गाल फेफड़ों व हृदय की क्रियाओं से जुड़े होते हैं, इसलिए इनकी स्थिति गालों पर नज़र आती है, जैसा कि अगर आप हैवी वर्कआउट करें, तो गाल लाल हो जाते हैं.

कील-मुंहासे: फेफ़ड़ों की कमज़ोरी, हार्मोनल बदलाव, एलर्जी, पाचनक्रिया में गड़बड़ी और ब्लड प्यूरिफिकेशन सही न होने के कारण भी गालों पर कील-मुंहासे आ जाते हैं. इसके अलावा गंदे मोबाइल फोन, गंदा तकिया और बेडशीट भी मुंहासे के कारण हो सकते हैं.
हेल्थ टिप: गाल फेफड़ों को दर्शाते हैं, इसलिए गालों की गुलाबी रंगत बनाए रखना चाहते हैं, तो फेफड़ों को हेल्दी बनाए रखने पर ध्यान दें. खाने में गुड फैट्स को शामिल करें. रोज़ाना ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ करें. मोबाइल फोन कोे साफ़ रखें, ज़्यादा देर बात करनी है, तो ईयरफोन इस्तेमाल करें. तकिये और बेडशीट्स को साफ़ रखें और बार-बार चेहरे को न छूएं.

 

नाक

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: हृदय संबंधी समस्याएं व फेफड़ों की समस्याएं. कील-मुंहासे: नाक पर होनेवाले कील-मुंहासों का कारण हाइ ब्लड प्रेशर या हार्ट प्रॉब्लम्स हो सकती हैं.

लाल नाक: अगर नाक बार-बार लाल हो जाती है या बहती रहती है, तो उसका कारण हार्ट प्रॉब्लम्स, हाइ ब्लड प्रेशर या लिवर डिसऑर्डर हो सकता है.

 

हेल्थ टिप: खाने में फैटी एसिड युक्त एवोकैडो, अलसी, ऑलिव ऑयल आदि शामिल करें. अल्कोहल और मसालेदार खाने से दूर रहें.

 

जीभ

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: टॉक्सिन की बढ़त व फेफड़ों की समस्याएं. जीभ पर बहुत ज़्यादा स़फेद धब्बों का मतलब है कि शरीर में टॉक्सिन की मात्रा बढ़ गई है.

 

हेल्थ टिप: ख़ुद को डिटॉक्स करें.

 

ठुड्डी

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: हार्मोंस का असंतुलन.

पीरियड्स के दौरान बहुत-सी महिलाओं की ठुड्डी के आस-पास कील-मुंहासे हो जाते हैं. यह शरीर में होनेवाले हार्मोंस के असंतुलन के कारण हो सकता है.

 

हेल्थ टिप: स्टे्रस से दूर रहें. भरपूर नींद लें और एक्सरसाइज़ को अपने रूटीन में शामिल करें.

 

होंठ

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: आंतों की समस्याएं, विटामिन बी की कमी, ख़ून की कमी, डिहाइड्रेशन, फेफड़ों व हृदय संबंधी समस्याएं आदि.

होंठों में सूजन: इसका कारण आंतों में सूजन व जलन हो सकती है. इसके अलावा यह फूड सेंसिटिविटी के कारण भी हो सकता है.

सूखे होंठ: आपके रूखे-सूखे होंठ साफ़ इशारा करते हैं कि आपको डिहाइड्रेशन, विटामिन बी की कमी या फिर आयरन की कमी हो सकती है. होंठ जब गुलाबी की बजाय पीले पड़ने लगें, तो समझ जाएं कि यह शरीर में ख़ून की कमी का परिणाम है. कमज़ोर फेफड़ों के कारण जब हृदय तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाता, तब भी उसका असर रूखे-सूखे होंठों के रूप में दिखाई देता है.

फटे होंठ: होंठों के फटने का कारण किसी तरह की एलर्जी हो सकती है या फिर कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स के साइड इफेक्ट्स.

 

हेल्थ टिप: रोज़ाना 8-10 ग्लास पानी पीएं. अगर आपको लगता है कि ये डिहाइड्रेशन के कारण नहीं है, तो अपने फैमिली डॉक्टर को इस बारे में बताएं.

 

मुंह

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: कमज़ोर लिवर, डायबिटीज़, पाचनक्रिया में गड़बड़ी, स्ट्रेस आदि.

सांसों की बदबू: अगर सही ओरल केयर के बावजूद आप सांसों की बदबू से परेशान हैं, तो हो सकता है, इसका कारण ख़राब पेट, अपच या फिर लिवर की समस्या हो.

मुंह का सूखा रहना (ड्राय माउथ): वैसे तो मुंह के सूखे रहने या सलाइवा की कमी के कई कारण हैं,जैसे- डिहाइड्रेशन, बहुत ज़्यादा अल्कोहल,धूम्रपान आदि, पर साथ ही यह डायबिटीज़ के शुरुआती लक्षणों में से एक है.

मुंह में बार-बार छाले हो जाना: मुंह के अगल-बगल में कटना या मुंह में बार-बार छाले हो जाना आपकी रोगप्रतिरोधक शक्ति का कमज़ोर होना और शरीर में विटामिन बी की कमी दर्शाता है. इसके अलावा पाचन क्रिया में गड़बड़ी भी इसका कारण हो सकता है.

 

हेल्थ टिप: सांसों की बदबू के लिए जहां आपको अपने डेंटिस्ट से मिलना होगा, वहीं डायबिटीज़ का सही-सही पता लगाने के लिए अपने फैमिली फिज़िशियन से मिलें. मुंह के छालों और कट के लिए विटामिन बी से भरपूर साबूत अनाज, हरी सब्ज़ियां और मीट को अपने डायट में शामिल करें.

– अनीता सिंह

एंटीबायोटिक्स क्यों हैं ख़तरनाक? (Why Antibiotics are Harmful for Your Health)

Antibiotics side effects

Antibiotics side effects

बीमारियों में तुरंत आराम के चक्कर में एंटीबायोटिक्स (Antibiotics side effects) का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन ये स्थिति कई प्रॉब्लम्स की वजह बन सकती है. कई रोगों के इलाज के लिए उपयोग होनेवाली एंटीबायोटिक्स ख़ुद बीमारी की वजह बन सकती है.

एंटीबायोटिक एक ऐसी दवा है, जो इंफेक्शन व कई गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती है. लेकिन एंटीबायोटिक्स का अगर सही तरी़के से इस्तेमाल नहीं किया गया, तो लाभ की जगह ये नुक़सान पहुंचा सकती है. अगर आप जान लें कि एंटीबायोटिक्स कब इस्तेमाल करनी चाहिए और कब नहीं, तो आप ख़ुद को व अपने परिवार को इसके ख़तरे से बचा सकते हैं.

एंटीबायोटिक्स की ए बी सी…
* आज एंटीबायोटिक्स सबसे ज़्यादा प्रिस्क्राइब की जानेवाली दवा बन गई है और चूंकि इससे तुरंत आराम मिलता है, इसलिए हम भी चाहते हैं कि डॉक्टर एंटीबायोटिक ज़रूर दे. कई डॉक्टर भी ज़रूरी न होने पर भी एंटीबायोटिक्स लिख देते हैं. कुल मिलाकर दुनियाभर में एंटीबायोटिक्स का उपयोग की बजाय दुरुपयोग हो रहा है.

* सबसे पहले तो ये जान लें कि एंटीबायोटिक्स बेहद इफेक्टिव दवा ज़रूर है, लेकिन ये हर बीमारी का इलाज नहीं है.

* ये भी ध्यान रखें कि एंटीबायोटिक्स सिर्फ़ बैक्टीरियल इंफेक्शन से होनेवाली बीमारियों पर असरदार है. वायरल बीमारियों, जैसे- सर्दी-ज़ुकाम, फ्लू, ब्रॉन्काइटिस, गले में इंफेक्शन आदि में ये कोई लाभ नहीं देती.

* ये वायरल बीमारियां ज़्यादातर अपने आप ठीक हो जाती हैं. हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता इन वायरल बीमारियों से ख़ुद ही निपट लेती हैं. इसलिए अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की  कोशिश करें.

* हां, बैक्टीरियल इंफेक्शन से होनेवाली हेल्थ प्रॉब्लम्स में कई बार एंटीबायोटिक्स लेना ज़रूरी हो जाता है.

* एंटीबायोटिक्स तभी लें, जब ज़रूरी हो और जब डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब किया हो, वरना ऐसा हो जाएगा कि जब आपको सही में एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत होगी, तब वो बेअसर हो जाएगी. दरअसल, एंटीबायोटिक्स लेने से सभी बैक्टीरिया नहीं मरते और जो बच जाते हैं, वे ताक़तवर हो जाते हैं. इन बैक्टीरियाज़ को उस एंटीबायोटिक्स से मारना असंभव हो जाता है. ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट बैक्टीरिया कहलाते हैं.

* ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट बैक्टीरिया ज़्यादा लंबी और गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं और इन बीमारियों से लड़ने के लिए ज़्यादा स्ट्रॉन्ग एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत होती है, जिनके और ज़्यादा साइड इफेक्ट्स होते हैं.

* ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट बैक्टीरिया बहुत तेज़ी से फैलते हैं और आपके परिवार के सदस्य, बच्चे और आपके साथ काम करनेवालों को भी अपना शिकार बनाते हैं. और हो सकता है कि एक स्टेज ऐसा भी आ जाए कि सभी ऐसे इंफेक्शन से घिर जाएं, जिसका इलाज मुश्किल हो.

* एंटीबायोटिक्स दवाएं अनहेल्दी व हेल्दी बैक्टीरिया के बीच फ़र्क़ नहीं कर पातीं, यही वजह है कि ये अनहेल्दी बैक्टीरिया के साथ-साथ हेल्दी बैक्टीरिया को भी मार देती हैं.

* दुनियाभर में नई एंटीबायोटिक्स का विकास रुक गया है और एंटीबायोटिक दवाओं के बहुत ज़्यादा व ग़लत इस्तेमाल से जो एंटीबायोटिक दवाएं उपलब्ध हैं, वे बेअसर हो रही हैं और ये दुनियाभर के मेडिकल एक्सपर्ट्स के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि ऐसी स्थिति में कई बीमारियों का इलाज मुश्किल हो जाएगा.

* ध्यान रखें कि जिन एंटीबायोटिक्स की आपको ज़रूरत नहीं है, उसे लेने से आप अच्छा महसूस नहीं करेंगे, ना ही ये आपकी किसी तकलीफ़ का इलाज है, बल्कि ये आपको नुक़सान ही पहुंचाएंगे.

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एंटीबायोटिक के साइड इफेक्ट्स

* उल्टी महसूस होना या चक्कर आना
* डायरिया या पेटदर्द
* एलर्जिक रिएक्शन. कई बार एलर्जी इतनी गंभीर हो सकती है कि आपको इमर्जेंसी केयर की ज़रूरत पड़ सकती है.
* महिलाओं में वेजाइनल यीस्ट इंफेक्शन की शिकायत भी हो सकती है.

क्यों हैं ख़तरनाक?
* एंटीबायोटिक्स के प्रति हमारा रवैया बेहद लापरवाही भरा है और हम इसे आम दवा समझकर धड़ल्ले से इसका सेवन करते हैं.
* ये सस्ती हैं और आसानी से उपलब्ध भी.
* केमिस्ट बिना किसी डॉक्टर की पर्ची के भी एंटीबायोटिक्स बेचते हैं.
* 70-75% डॉक्टर्स सामान्य सर्दी-ज़ुकाम के लिए भी एंटीबायोटिक्स लिख देते हैं.
* आश्‍चर्यजनक तौर पर 50% मरीज़ ख़ुद एंटीबायोटिक्स दवाएं लेने पर ज़ोर देते हैं.

एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट होने के परिणाम
दुनियाभर में डॉक्टर्स और मरीज़ों द्वारा एंटीबायोटिक्स का दुरुपयोग हो रहा है. नतीजा बैक्टीरिया इन दवाओं के प्रति इतने रेज़िस्टेंट हो रहे हैं कि इन एंटीबायोटिक्स का उन पर कोई असर ही नहीं हो रहा है. आसान शब्दों में बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं से ज़्यादा ताक़तवर हो रहे हैं. ये स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है और इसके परिणाम भी.
क्या हो सकता है?
* गंभीर बीमारियां या विकलांगता
* पूर्व में जिन रोगों का उपचार संभव होता है, वही रोग अब इतने गंभीर हो जाते हैं कि मौत तक का कारण बन सकते हैं.
* बीमारी में ठीक होने में लंबा समय लग सकता है.
* बार-बार डॉक्टर के चक्कर लगाने या हॉस्पिटल में एडमिट होने की नौबत आ सकती है.
* किसी भी ट्रीटमेंट का उतनी जल्दी असर नहीं होता.
* इन सब वजहों से ट्रीटमेंट महंगा भी पड़ सकता है.

तो क्या करें?
जिस तरह नई एंटीबायोटिक्स का विकास नहीं हो रहा है और जो एंटीबायोटिक्स हैं, वे बेअसर हो रहे हैं, उसे देखते हुए बेहद ज़रूरी हो गया है कुछ क़दम उठाना, ताकि इन एंटीबायोटिक्स की उम्र को बढ़ाया जा सके और लोगों को एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट इंफेक्शन्स से बचाया जा सके. इसके लिए कई हॉस्पिटल और मेडिकल एसोसिएशन ज़रूरी क़दम उठा रहे हैं और एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को लेकर गाइडलाइन भी बना रहे हैं, लेकिन आपको व हमें भी कुछ क़दम उठाने होंगे, तभी हम और हमारा परिवार हेल्दी रह सकता है. इसके लिए आप निम्न क़दम उठा सकते हैं-

* एंटीबायोटिक्स तभी लें, जब डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब किया हो.

* बल्कि अगर डॉक्टर आपको एंटीबायोटिक्स लिखकर दें, तो उनसे पूछें कि क्या आपको सचमुच एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत है.

* रोज़ाना नियमित समय पर गोलियां लें और कोर्स ज़रूर पूरा करें.

* अगर कोर्स पूरा करने के बाद एंटीबायोटिक गोलियां बच गई हों, तो उन्हें फ़ौरन फेंक दें. ये सोचकर उन्हें रखे न रहें कि अगली बार बीमार होने पर खा लेंगे, क्योंकि ज़रूरी नहीं कि अगली बार बीमार होने पर वही एंटीबायोटिक्स असर करे.

* किसी और व्यक्ति के लिए प्रिस्क्राइब की गई एंटीबायोटिक ख़ुद कभी न लें. भले ही रोग के लक्षण एक समान हों, पर वही एंटीबायोटिक आपकी तकलीफ़ भी दूर करेगी, ये ज़रूरी नहीं.

* डॉक्टर पर कभी एंटीबायोटिक्स देने के लिए दबाव न डालें. डॉक्टर को ज़रूरी लगेगा, तो वे ख़ुद आपको एंटीबायोटिक्स का कोर्स देंगे.

* बैक्टीरिया के अटैक से बचने की कोशिश करें. इसके लिए हाइजीन का ख़्याल रखें. अपने हाथ अच्छी तरह धोएं, ख़ासकर टॉयलेट यूज़ करने के बाद और कुछ भी खाने-पीने से पहले. सब्ज़ियां और फल इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह धो लें. किचन को साफ़-सुथरा रखें.

* बच्चों को ज़रूरी टीके लगवाना न भूलें. कुछ टीके बैक्टीरियल इंफेक्शन से भी सुरक्षा देते हैं.

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 इन लक्षणों को अनदेखा न करें
* आमतौर पर एंटीबायोटिक्स 24-48 घंटों में असर दिखाने लगती हैं. अगर एंटीबायोटिक्स लेने के बाद भी आपको आराम नहीं आ रहा है या निम्न लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो फ़ौरन डॉक्टर से संपर्क करेंः
* एंटीबायोटिक्स लेने के बावजूद तीन दिन से ज़्यादा बुख़ार.
* बढ़ता-घटता बुख़ार, तेज़ कंपकंपी, लो ब्लड प्रेशर आदि बैक्टीरिया के इंफेक्शन के संकेत हैं.
* डायरिया या पेचिश.
* गर्दन, जांघ के ऊपरी हिस्से या बगल में सूजन भरी गांठ.
* तेज़ सिरदर्द.
* स्किन रैशेज़ या फुंसियां, जिन्हें छूने पर दर्द हो. डॉक्टर से ये बातें ज़रूर बताएं-
* डॉक्टर आपको एंटीबायोटिक्स प्रिस्क्राइब कर रहे हैं और अगर आप पहले से कोई और दवाएं ले रहे हैं.
* अगर आप कोई डायट प्लान फॉलो कर रहे हैं या कोई हर्बल सप्लीमेंट्स ले रहे हैं.
* अगर आपको किसी एंटीबायोटिक्स की एलर्जी है. तो इस बारे में अपने डॉक्टर को ज़रूर बताएं, ताकि डॉक्टर उस हिसाब से आपको एंटीबायोटिक्स लिखकर दे.

– प्रतिभा तिवारी