Tag Archives: health problems

बच्चों में गैजेट एडिक्शन- कितना अच्छा-कितना बुरा? (Gadget Addiction In Kids Good Or Bad?)

 

Gadget Addiction
हाईटेक होते ज़माने में जहां हर चीज़ मोबाइल ऐप पर उपलब्ध होती जा रही है, ऐसे में बच्चों को गैजेट्स से दूर रखना क्या सही है? आज के दौर में हम बच्चों को गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, मगर इनके इस्तेमाल की समयसीमा ज़रूर तय कर सकते हैं. बच्चों में गैजेट एडिक्शन कितना सही या ग़लत है? बता रही हैं प्राची भारद्वाज.

माता-पिता की जागरूकता के बावजूद आज दो साल के बच्चे भी टच स्क्रीन फोन चलाना, स्वाइप करना, लॉक खोलना और कैमरे पर फोटो खींचना जानते हैं. एक नए शोध (82 प्रश्‍नावली के आधार पर) के अनुसार, 87% अभिभावक प्रतिदिन औसतन 15 मिनट अपने बच्चों को स्मार्टफोन खेलने के लिए देते हैं, जबकि 62% ने बताया कि वे अपने बच्चों के लिए ऐप्स डाउनलोड करते हैं. स्मार्टफोन के मालिक हर 10 में से 9 अभिभावकों ने बताया कि उनके नन्हें-मुन्ने फोन स्वाइप करना जानते हैं, 10 में से 5 ने बताया कि उनके बच्चे फोन को अनलॉक कर सकते हैं, जबकि कुछ अभिभावकों ने माना कि उनके बच्चे फोन के अन्य फीचर भी ढूंढ़ते हैं. मनोवैज्ञानिकों की मानें, तो पिछले 3 वर्षों में तकनीक पर आश्रित लोगों की संख्या 30 गुना बढ़ गयी है.

गैजेट के अधिक इस्तेमाल से सेहत पर असर

माइकल कोहेन ग्रुप द्वारा किए गए शोध से पता चला कि टीनएजर्स गैजेट्स से खेलना ज़्यादा पसंद करते हैं. गैजेट्स लेकर दिनभर बैठे रहने के कारण उनमें मोटापे की समस्या बढ़ रही है. साथ ही आईपैड, लैपटॉप, मोबाइल आदि पर बिज़ी रहने के कारण वो समय पर सो भी नहीं पाते, जिससे उन्हें शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. गैजेट के अधिक इस्तेमाल से बच्चों में व्यग्रता, उत्कंठा, अवसाद, आत्मकेंद्रित, मनोरोग व अन्य समस्याएं हो रही हैं.

कुछ फ़ायदे भी हैं

बच्चे विकिपीडिया, गूगल, स्मार्ट वॉइस असिस्टेंट इत्यादि से महत्वूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं. कुछ स्कूलों में तो छोटी क्लास से ही टैबलेट इस्तेमाल किया जाने लगा है. ऐसे ही एक स्कूल की टीचर आशिका भाटिया कहती हैं, “टैबलेट की मदद से बच्चे रंग, आकार, नए शब्दों या अंकों को आसानी से पहचानते हैं और ख़ुशी से सीखते हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल समयसीमा में ही होना चाहिए.” कुछ ऐसा ही कहना है गुड़गांव में क्लीनिक चलाने वाली डॉ. सोनल का. उनके मुताबिक़, बदलते व़क्त में गैजेट में बिज़ी रहने के कारण बच्चे घर में ही रहते हैं, जिससे माता-पिता को उनकी सुरक्षा की चिंता नहीं होती. बस, ज़रूरत है तो गैजेट के इस्तेमाल की समयसीमा तय करने की.

क्या हो समय सीमा?

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की स्टडी के मुताबिक़, दो वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी तरह की स्क्रीन से दूर रखना चाहिए. तीन से पांच वर्ष के बच्चे एक घंटा और टीनएज बच्चों को केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक गैजेट इस्तेमाल की अनुमति दी जानी चाहिए.

कैसे पहचानें बच्चे के गैजेट एडिक्शन को?

यदि आपके बच्चे में निम्न लक्षण दिखें, तो समझ जाइए कि वो गैजेट एडिक्शन का शिकार हो चुका है.
* गैजेट चलाने की अनुमति न मिलने पर ग़ुस्सा आना, चिड़चिड़ापन, उदास हो जाना आदि.
* गैजेट के इस्तेमाल के कारण खाने, सोने आदि का समय बदलना.
* ध्यान में कमी, याददाश्त कमज़ोर होना, व्यावहारिक दिक्क़तें, कुछ नया सीखने में मुश्किल आदि.
* सोशल होने से आनाकानी करना.

यह भी पढ़े: बच्चे को डांटें नहीं हो जाएगा बीमार 

यह भी पढ़े: कैसा हो 0-3 साल तक के बच्चे का आहार? 

क्या करें पैरेंट्स?

* बच्चों को ख़ुश करने की बजाय उनकी भलाई के बारे में सोचना चाहिए. उन्हें अनुशासन में रखने के साथ ही कुछ अन्य बातों का ध्यान रखकर गैजेट की लत से बचाया जा सकता है.
* टीवी, कंप्यूटर या फोन अपने बच्चों को किसी भी स्क्रीन का उपयोग केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक ही करने दें.
* बच्चों को इनाम में गैजेट की बजाय कुछ और उपयोगी वस्तु दें.
* अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार, खाना खाते समय, होमवर्क करते समय, सोते समय बच्चों को गैजेट से दूर रखें.
* कोशिश करें कि बच्चा जब टीवी, कंप्यूटर पर बिज़ी हो, तो आप उसके साथ रहें ताकि ये देख सकें कि वो स्क्रीन पर क्या देख रहा है.
* मोबाइल पर गेम खेलते देख उसे नज़रअंदाज़ करने की बजाय बच्चे को बाहर जाकर दोस्तों के साथ खेलने के लिए प्रेरित करें.
* बच्चे की फिज़िकल एक्टिविटी बढ़ाएं.
* यदि बच्चा आपकी बात मानते हुए आपके द्वारा तय समय तक ही गैजेट का इस्तेमाल करता है, तो उसे प्रोत्साहित करना न भूलें. आज के दौर में आप उन्हें गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, लेकिन संतुलन बनाकर उन्हें इसका आदी होने से ज़रूर बचा सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

मुंबई की सादिया वंजारा कहती हैं, “छोटे बच्चे झुककर, बैठकर टीवी, कंप्यूटर आदि में खोये रहते हैं, जिससे उनकी गर्दन, पीठ, कंधों में तकलीफ़ हो जाती है.”
साइकोलॉजिस्ट डॉ. हरीश शेट्टी का मानना है कि मोबाइल फोन के द्वारा बच्चा इंटरनेट, ऑनलाइन खेल के साथ-साथ पॉर्न की दुनिया में भी झांक सकता है और ये उसके लिए कतई ठीक नहीं.
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. दलवई एक केस का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि एक 3 वर्षीय बच्चे को सबने आत्मकेंद्रित (ऑटिस्टिक) समझ लिया था, क्योंकि वो किसी से नज़रें नहीं मिलाता था, बातचीत नहीं करता था और अन्य बच्चों के साथ खेलता भी नहीं था, लेकिन इन सबकी असली वजह थी उसका घंटों तक ऑनलाइन शो देखते रहना. डॉ. दलवई के अनुसार, “गैजेट से स़िर्फ एकतरफ़ा संचार संभव है. टच-पैड की बजाय बच्चे को कोई पेट (पालतू जानवर) लाकर दें. गैजेट के आदी बच्चों की दुनिया बस वहीं तक सिमटकर रह जाती है.”

[amazon_link asins=’B01JZ8Z5XE,B06Y67N3JY,B01M7QTX03,B01MAXTH04′ template=’ProductCarousel’ store=’pbc02-21′ marketplace=’IN’ link_id=’d2e980cc-04e5-11e8-aa7e-1f0f01be1c99′]

चेहरे से जानें क्या हेल्थ प्रॉब्लम्स हो सकती हैं आपको? (What your face says about your Health)

face reveals about health

आपका चेहरा न स़िर्फ आपके इमोशन्स को दर्शाता है, बल्कि ये आपके हेल्थ के बारे में भी बताता है. तो आप भी अपने चेहरे को ग़ौर से देखें और जानें कि वो क्या कहता है आपकी सेहत के बारे में?

face reveals about health

माथा

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: पित्ताशय और लिवर की समस्या के अलावा पाचनक्रिया में गड़बड़ी की ओर संकेत करती है.

माथा हमारे नर्वस सिस्टम और पाचनतंत्र से जुड़ा होता है, जिससे किसी भी तरह का स्ट्रेस या पाचनक्रिया में गड़बड़ी का सीधा असर माथे पर आड़ी रेखाओं या पिंपल्स के रूप में नज़र आता है
हेल्थ टिप: रोज़ाना सुबह गुनगुने पानी में नींबू निचोड़कर पीएं. खाने में प्रोसेस्ड फूड और फैट्स की मात्रा कम कर दें. स्ट्रेस से दूर रहने के लिए ध्यान व योग करें.

 

आंखें

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: आंतों या जोड़ों की समस्याओं के अलावा, लिवर-किडनी और थायरॉइड की समस्या बयां करती हैं.

कहते हैं आंखें बोलती हैं, तभी तो आंखों का रंग, उनमें होनेवाले बदलाव, किसी तरह का धब्बा हमें हमारी सेहत के प्रति सचेत करता है.

आंखों की पुतली: पुतली अगर सिकुड़ रही है, तो उसका कारण जोड़ों की समस्याएं हो सकती हैं, वहीं अगर उसमें स़फेद धब्बे दिखाई दे रहे हैं, तो शरीर में विटामिन्स की कमी हो सकती है और अगर पुतली के अगल-बगल में स़फेद रिंग दिखाई दे, तो वह ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का इशारा है. इसके लिए खाने में नमक व शक्कर की मात्रा कम कर दें.
बदलता रंग: आंखें अगर लाल हो जाएं, तो इसका मतलब आपको कोई ऑटो इम्यून डिसीज़ है या फिर आप डिप्रेशन के शिकार हैं. आंखों के पीलेपन का कारण कमज़ोर लिवर या लिवर की बीमारी हो सकती है.
आंखों के नीचे डार्क सर्कल्स: डार्क सर्कल्स या फिर पफी या बैगी आईज़ का कारण नींद पूरी न होना, ख़ून में आयरन की कमी, किडनी में गड़बड़ी आदि हो सकता है.
हेल्थ टिप: आंखोें की पुतली की सेहत के लिए खाने में नमक व शक्कर की मात्रा कम कर दें. बदलते रंग के लिए तुरंत आंखों के डॉक्टर से संपर्क करें. पफी और बैगी आईज़ के लिए पानी ज़्यादा पीएं. भोजन को ख़ूब चबा-चबाकर खाएं और 6-8 घंटे की भरपूर नींद लें. डार्क सर्कल्स के लिए डेयरी प्रोडक्ट्स और गेहूं से कुछ दिन दूर रहें.

गाल

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: धीमा मेटाबॉलिज़्म, पोषक तत्वों की कमी, हृदय व फेफड़ों की समस्याएं आदि की ओर संकेत करते हैं.

गालों की रंगत: गालों का रंग उड़ जाना या फिर गालों के पैची नज़र आने का कारण मेटाबॉलिज़्म का धीमा होना या फिर फॉलिक एसिड और आयरन जैसे पोषक तत्वों की कमी हो सकता है. इसके अलावा गाल फेफड़ों व हृदय की क्रियाओं से जुड़े होते हैं, इसलिए इनकी स्थिति गालों पर नज़र आती है, जैसा कि अगर आप हैवी वर्कआउट करें, तो गाल लाल हो जाते हैं.

कील-मुंहासे: फेफ़ड़ों की कमज़ोरी, हार्मोनल बदलाव, एलर्जी, पाचनक्रिया में गड़बड़ी और ब्लड प्यूरिफिकेशन सही न होने के कारण भी गालों पर कील-मुंहासे आ जाते हैं. इसके अलावा गंदे मोबाइल फोन, गंदा तकिया और बेडशीट भी मुंहासे के कारण हो सकते हैं.
हेल्थ टिप: गाल फेफड़ों को दर्शाते हैं, इसलिए गालों की गुलाबी रंगत बनाए रखना चाहते हैं, तो फेफड़ों को हेल्दी बनाए रखने पर ध्यान दें. खाने में गुड फैट्स को शामिल करें. रोज़ाना ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ करें. मोबाइल फोन कोे साफ़ रखें, ज़्यादा देर बात करनी है, तो ईयरफोन इस्तेमाल करें. तकिये और बेडशीट्स को साफ़ रखें और बार-बार चेहरे को न छूएं.

 

नाक

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: हृदय संबंधी समस्याएं व फेफड़ों की समस्याएं. कील-मुंहासे: नाक पर होनेवाले कील-मुंहासों का कारण हाइ ब्लड प्रेशर या हार्ट प्रॉब्लम्स हो सकती हैं.

लाल नाक: अगर नाक बार-बार लाल हो जाती है या बहती रहती है, तो उसका कारण हार्ट प्रॉब्लम्स, हाइ ब्लड प्रेशर या लिवर डिसऑर्डर हो सकता है.

 

हेल्थ टिप: खाने में फैटी एसिड युक्त एवोकैडो, अलसी, ऑलिव ऑयल आदि शामिल करें. अल्कोहल और मसालेदार खाने से दूर रहें.

 

जीभ

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: टॉक्सिन की बढ़त व फेफड़ों की समस्याएं. जीभ पर बहुत ज़्यादा स़फेद धब्बों का मतलब है कि शरीर में टॉक्सिन की मात्रा बढ़ गई है.

 

हेल्थ टिप: ख़ुद को डिटॉक्स करें.

 

ठुड्डी

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: हार्मोंस का असंतुलन.

पीरियड्स के दौरान बहुत-सी महिलाओं की ठुड्डी के आस-पास कील-मुंहासे हो जाते हैं. यह शरीर में होनेवाले हार्मोंस के असंतुलन के कारण हो सकता है.

 

हेल्थ टिप: स्टे्रस से दूर रहें. भरपूर नींद लें और एक्सरसाइज़ को अपने रूटीन में शामिल करें.

 

होंठ

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: आंतों की समस्याएं, विटामिन बी की कमी, ख़ून की कमी, डिहाइड्रेशन, फेफड़ों व हृदय संबंधी समस्याएं आदि.

होंठों में सूजन: इसका कारण आंतों में सूजन व जलन हो सकती है. इसके अलावा यह फूड सेंसिटिविटी के कारण भी हो सकता है.

सूखे होंठ: आपके रूखे-सूखे होंठ साफ़ इशारा करते हैं कि आपको डिहाइड्रेशन, विटामिन बी की कमी या फिर आयरन की कमी हो सकती है. होंठ जब गुलाबी की बजाय पीले पड़ने लगें, तो समझ जाएं कि यह शरीर में ख़ून की कमी का परिणाम है. कमज़ोर फेफड़ों के कारण जब हृदय तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाता, तब भी उसका असर रूखे-सूखे होंठों के रूप में दिखाई देता है.

फटे होंठ: होंठों के फटने का कारण किसी तरह की एलर्जी हो सकती है या फिर कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स के साइड इफेक्ट्स.

 

हेल्थ टिप: रोज़ाना 8-10 ग्लास पानी पीएं. अगर आपको लगता है कि ये डिहाइड्रेशन के कारण नहीं है, तो अपने फैमिली डॉक्टर को इस बारे में बताएं.

 

मुंह

क्या हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स: कमज़ोर लिवर, डायबिटीज़, पाचनक्रिया में गड़बड़ी, स्ट्रेस आदि.

सांसों की बदबू: अगर सही ओरल केयर के बावजूद आप सांसों की बदबू से परेशान हैं, तो हो सकता है, इसका कारण ख़राब पेट, अपच या फिर लिवर की समस्या हो.

मुंह का सूखा रहना (ड्राय माउथ): वैसे तो मुंह के सूखे रहने या सलाइवा की कमी के कई कारण हैं,जैसे- डिहाइड्रेशन, बहुत ज़्यादा अल्कोहल,धूम्रपान आदि, पर साथ ही यह डायबिटीज़ के शुरुआती लक्षणों में से एक है.

मुंह में बार-बार छाले हो जाना: मुंह के अगल-बगल में कटना या मुंह में बार-बार छाले हो जाना आपकी रोगप्रतिरोधक शक्ति का कमज़ोर होना और शरीर में विटामिन बी की कमी दर्शाता है. इसके अलावा पाचन क्रिया में गड़बड़ी भी इसका कारण हो सकता है.

 

हेल्थ टिप: सांसों की बदबू के लिए जहां आपको अपने डेंटिस्ट से मिलना होगा, वहीं डायबिटीज़ का सही-सही पता लगाने के लिए अपने फैमिली फिज़िशियन से मिलें. मुंह के छालों और कट के लिए विटामिन बी से भरपूर साबूत अनाज, हरी सब्ज़ियां और मीट को अपने डायट में शामिल करें.

– अनीता सिंह

एंटीबायोटिक्स क्यों हैं ख़तरनाक? (Why Antibiotics are Harmful for Your Health)

Antibiotics side effects

Antibiotics side effects

बीमारियों में तुरंत आराम के चक्कर में एंटीबायोटिक्स (Antibiotics side effects) का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन ये स्थिति कई प्रॉब्लम्स की वजह बन सकती है. कई रोगों के इलाज के लिए उपयोग होनेवाली एंटीबायोटिक्स ख़ुद बीमारी की वजह बन सकती है.

एंटीबायोटिक एक ऐसी दवा है, जो इंफेक्शन व कई गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती है. लेकिन एंटीबायोटिक्स का अगर सही तरी़के से इस्तेमाल नहीं किया गया, तो लाभ की जगह ये नुक़सान पहुंचा सकती है. अगर आप जान लें कि एंटीबायोटिक्स कब इस्तेमाल करनी चाहिए और कब नहीं, तो आप ख़ुद को व अपने परिवार को इसके ख़तरे से बचा सकते हैं.

एंटीबायोटिक्स की ए बी सी…
* आज एंटीबायोटिक्स सबसे ज़्यादा प्रिस्क्राइब की जानेवाली दवा बन गई है और चूंकि इससे तुरंत आराम मिलता है, इसलिए हम भी चाहते हैं कि डॉक्टर एंटीबायोटिक ज़रूर दे. कई डॉक्टर भी ज़रूरी न होने पर भी एंटीबायोटिक्स लिख देते हैं. कुल मिलाकर दुनियाभर में एंटीबायोटिक्स का उपयोग की बजाय दुरुपयोग हो रहा है.

* सबसे पहले तो ये जान लें कि एंटीबायोटिक्स बेहद इफेक्टिव दवा ज़रूर है, लेकिन ये हर बीमारी का इलाज नहीं है.

* ये भी ध्यान रखें कि एंटीबायोटिक्स सिर्फ़ बैक्टीरियल इंफेक्शन से होनेवाली बीमारियों पर असरदार है. वायरल बीमारियों, जैसे- सर्दी-ज़ुकाम, फ्लू, ब्रॉन्काइटिस, गले में इंफेक्शन आदि में ये कोई लाभ नहीं देती.

* ये वायरल बीमारियां ज़्यादातर अपने आप ठीक हो जाती हैं. हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता इन वायरल बीमारियों से ख़ुद ही निपट लेती हैं. इसलिए अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की  कोशिश करें.

* हां, बैक्टीरियल इंफेक्शन से होनेवाली हेल्थ प्रॉब्लम्स में कई बार एंटीबायोटिक्स लेना ज़रूरी हो जाता है.

* एंटीबायोटिक्स तभी लें, जब ज़रूरी हो और जब डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब किया हो, वरना ऐसा हो जाएगा कि जब आपको सही में एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत होगी, तब वो बेअसर हो जाएगी. दरअसल, एंटीबायोटिक्स लेने से सभी बैक्टीरिया नहीं मरते और जो बच जाते हैं, वे ताक़तवर हो जाते हैं. इन बैक्टीरियाज़ को उस एंटीबायोटिक्स से मारना असंभव हो जाता है. ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट बैक्टीरिया कहलाते हैं.

* ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट बैक्टीरिया ज़्यादा लंबी और गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं और इन बीमारियों से लड़ने के लिए ज़्यादा स्ट्रॉन्ग एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत होती है, जिनके और ज़्यादा साइड इफेक्ट्स होते हैं.

* ये एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट बैक्टीरिया बहुत तेज़ी से फैलते हैं और आपके परिवार के सदस्य, बच्चे और आपके साथ काम करनेवालों को भी अपना शिकार बनाते हैं. और हो सकता है कि एक स्टेज ऐसा भी आ जाए कि सभी ऐसे इंफेक्शन से घिर जाएं, जिसका इलाज मुश्किल हो.

* एंटीबायोटिक्स दवाएं अनहेल्दी व हेल्दी बैक्टीरिया के बीच फ़र्क़ नहीं कर पातीं, यही वजह है कि ये अनहेल्दी बैक्टीरिया के साथ-साथ हेल्दी बैक्टीरिया को भी मार देती हैं.

* दुनियाभर में नई एंटीबायोटिक्स का विकास रुक गया है और एंटीबायोटिक दवाओं के बहुत ज़्यादा व ग़लत इस्तेमाल से जो एंटीबायोटिक दवाएं उपलब्ध हैं, वे बेअसर हो रही हैं और ये दुनियाभर के मेडिकल एक्सपर्ट्स के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि ऐसी स्थिति में कई बीमारियों का इलाज मुश्किल हो जाएगा.

* ध्यान रखें कि जिन एंटीबायोटिक्स की आपको ज़रूरत नहीं है, उसे लेने से आप अच्छा महसूस नहीं करेंगे, ना ही ये आपकी किसी तकलीफ़ का इलाज है, बल्कि ये आपको नुक़सान ही पहुंचाएंगे.

Antibiotics side effects

एंटीबायोटिक के साइड इफेक्ट्स

* उल्टी महसूस होना या चक्कर आना
* डायरिया या पेटदर्द
* एलर्जिक रिएक्शन. कई बार एलर्जी इतनी गंभीर हो सकती है कि आपको इमर्जेंसी केयर की ज़रूरत पड़ सकती है.
* महिलाओं में वेजाइनल यीस्ट इंफेक्शन की शिकायत भी हो सकती है.

क्यों हैं ख़तरनाक?
* एंटीबायोटिक्स के प्रति हमारा रवैया बेहद लापरवाही भरा है और हम इसे आम दवा समझकर धड़ल्ले से इसका सेवन करते हैं.
* ये सस्ती हैं और आसानी से उपलब्ध भी.
* केमिस्ट बिना किसी डॉक्टर की पर्ची के भी एंटीबायोटिक्स बेचते हैं.
* 70-75% डॉक्टर्स सामान्य सर्दी-ज़ुकाम के लिए भी एंटीबायोटिक्स लिख देते हैं.
* आश्‍चर्यजनक तौर पर 50% मरीज़ ख़ुद एंटीबायोटिक्स दवाएं लेने पर ज़ोर देते हैं.

एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट होने के परिणाम
दुनियाभर में डॉक्टर्स और मरीज़ों द्वारा एंटीबायोटिक्स का दुरुपयोग हो रहा है. नतीजा बैक्टीरिया इन दवाओं के प्रति इतने रेज़िस्टेंट हो रहे हैं कि इन एंटीबायोटिक्स का उन पर कोई असर ही नहीं हो रहा है. आसान शब्दों में बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं से ज़्यादा ताक़तवर हो रहे हैं. ये स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है और इसके परिणाम भी.
क्या हो सकता है?
* गंभीर बीमारियां या विकलांगता
* पूर्व में जिन रोगों का उपचार संभव होता है, वही रोग अब इतने गंभीर हो जाते हैं कि मौत तक का कारण बन सकते हैं.
* बीमारी में ठीक होने में लंबा समय लग सकता है.
* बार-बार डॉक्टर के चक्कर लगाने या हॉस्पिटल में एडमिट होने की नौबत आ सकती है.
* किसी भी ट्रीटमेंट का उतनी जल्दी असर नहीं होता.
* इन सब वजहों से ट्रीटमेंट महंगा भी पड़ सकता है.

तो क्या करें?
जिस तरह नई एंटीबायोटिक्स का विकास नहीं हो रहा है और जो एंटीबायोटिक्स हैं, वे बेअसर हो रहे हैं, उसे देखते हुए बेहद ज़रूरी हो गया है कुछ क़दम उठाना, ताकि इन एंटीबायोटिक्स की उम्र को बढ़ाया जा सके और लोगों को एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट इंफेक्शन्स से बचाया जा सके. इसके लिए कई हॉस्पिटल और मेडिकल एसोसिएशन ज़रूरी क़दम उठा रहे हैं और एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को लेकर गाइडलाइन भी बना रहे हैं, लेकिन आपको व हमें भी कुछ क़दम उठाने होंगे, तभी हम और हमारा परिवार हेल्दी रह सकता है. इसके लिए आप निम्न क़दम उठा सकते हैं-

* एंटीबायोटिक्स तभी लें, जब डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब किया हो.

* बल्कि अगर डॉक्टर आपको एंटीबायोटिक्स लिखकर दें, तो उनसे पूछें कि क्या आपको सचमुच एंटीबायोटिक्स की ज़रूरत है.

* रोज़ाना नियमित समय पर गोलियां लें और कोर्स ज़रूर पूरा करें.

* अगर कोर्स पूरा करने के बाद एंटीबायोटिक गोलियां बच गई हों, तो उन्हें फ़ौरन फेंक दें. ये सोचकर उन्हें रखे न रहें कि अगली बार बीमार होने पर खा लेंगे, क्योंकि ज़रूरी नहीं कि अगली बार बीमार होने पर वही एंटीबायोटिक्स असर करे.

* किसी और व्यक्ति के लिए प्रिस्क्राइब की गई एंटीबायोटिक ख़ुद कभी न लें. भले ही रोग के लक्षण एक समान हों, पर वही एंटीबायोटिक आपकी तकलीफ़ भी दूर करेगी, ये ज़रूरी नहीं.

* डॉक्टर पर कभी एंटीबायोटिक्स देने के लिए दबाव न डालें. डॉक्टर को ज़रूरी लगेगा, तो वे ख़ुद आपको एंटीबायोटिक्स का कोर्स देंगे.

* बैक्टीरिया के अटैक से बचने की कोशिश करें. इसके लिए हाइजीन का ख़्याल रखें. अपने हाथ अच्छी तरह धोएं, ख़ासकर टॉयलेट यूज़ करने के बाद और कुछ भी खाने-पीने से पहले. सब्ज़ियां और फल इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह धो लें. किचन को साफ़-सुथरा रखें.

* बच्चों को ज़रूरी टीके लगवाना न भूलें. कुछ टीके बैक्टीरियल इंफेक्शन से भी सुरक्षा देते हैं.

Antibiotics side effects

 इन लक्षणों को अनदेखा न करें
* आमतौर पर एंटीबायोटिक्स 24-48 घंटों में असर दिखाने लगती हैं. अगर एंटीबायोटिक्स लेने के बाद भी आपको आराम नहीं आ रहा है या निम्न लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो फ़ौरन डॉक्टर से संपर्क करेंः
* एंटीबायोटिक्स लेने के बावजूद तीन दिन से ज़्यादा बुख़ार.
* बढ़ता-घटता बुख़ार, तेज़ कंपकंपी, लो ब्लड प्रेशर आदि बैक्टीरिया के इंफेक्शन के संकेत हैं.
* डायरिया या पेचिश.
* गर्दन, जांघ के ऊपरी हिस्से या बगल में सूजन भरी गांठ.
* तेज़ सिरदर्द.
* स्किन रैशेज़ या फुंसियां, जिन्हें छूने पर दर्द हो. डॉक्टर से ये बातें ज़रूर बताएं-
* डॉक्टर आपको एंटीबायोटिक्स प्रिस्क्राइब कर रहे हैं और अगर आप पहले से कोई और दवाएं ले रहे हैं.
* अगर आप कोई डायट प्लान फॉलो कर रहे हैं या कोई हर्बल सप्लीमेंट्स ले रहे हैं.
* अगर आपको किसी एंटीबायोटिक्स की एलर्जी है. तो इस बारे में अपने डॉक्टर को ज़रूर बताएं, ताकि डॉक्टर उस हिसाब से आपको एंटीबायोटिक्स लिखकर दे.

– प्रतिभा तिवारी