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 Jaggery

औषध‍िय गुणों से भरपूर गुड़ एक सुपर फूड है, जो अच्‍छी सेहत के लिए ज़रूरी है. इसके न‍ियमित इस्‍तेमाल से शरीर निरोगी और स्‍वस्‍थ बना रहता है. गुड़ में भरपूर मात्रा में कैल्‍शियम और फास्‍फोरस पाया जाता है. यह दोनों तत्‍व हड्डियों को मज़बूती देने में सहायक हैं. इससे शरीर मज़बूत व एक्टिव भी रहता है. गुड़ स्‍वाद का ही नहीं बल्‍कि सेहत का भी ख़ज़ाना है. इसके फ़ायदों के बारे में लोग कम ही जानते हैं. गुड़ का इस्तेमाल आयुर्वेदिक डॉक्टरों द्वारा कड़वी दवा को मीठा करने और कई बीमारियों में दवा के तौर पर भी किया जाता था. अधिकतर लोग सर्दियों के मौसम में ही इसका प्रयोग करते हैं, जबकि गुड़ सालभर खाया जा सकता है और शरीर को इससे भरपूर लाभ भी मिलते हैं.

घरेलू नुस्ख़े

• खट्टी डकारें आने या पेट की अन्य समस्या में गुड़ में काला नमक मिलाकर चाटने से लाभ होता है.
• जोड़ों में दर्द की समस्या हो, तो गुड़ का अदरक के साथ सेवन लाभदायक है. हर रोज़ गुड़ के एक टुकड़े के साथ अदरक खाने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है.
• अस्थमा के इलाज में गुड़ फ़ायदेमंद है. गुड़ और काले तिल के लड्डू बनाकर खाने से अस्थमा की तकलीफ़ नहीं होती और शरीर में आवश्यक गर्मी भी बनी रहती है.
• पीलिया हो जाने पर पांच ग्राम सोंठ में दस ग्राम गुड़ मिलाकर खाने से लाभ मिलता है.
• काफ़ी थकावट है, तो गुड़ को दूध के साथ लें. यदि आपको दूध नहीं पसंद, तो एक कप पानी में पांच ग्राम गुड़, थोड़ा-सा नींबू का रस और काला नमक मिलाकर सेवन करने से शरीर की थकान दूर होती है.


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• पेट में गैस बनने की समस्या होने पर हर रोज़ एक ग्लास पानी या दूध के साथ गुड़ का सेवन करने से पेट में ठंडक होती है और गैस भी नहीं बनती.
• गला बैठ जाने और आवाज़ जकड़ जाने पर पके हुए चावल में गुड़ मिलाकर खाने से बैठा हुआ गला ठीक होता है व आवाज़ भी खुल जाती है.
• कान में दर्द होने पर गुड़ को घी के साथ मिलाकर खाने से कान में होनेवाले दर्द की समस्या ये निजात मिलती है.
• गुड़ सर्दी-ज़ुकाम भगाने में भी बेहद असरदार है. काली मिर्च और अदरक के साथ गुड़ खाने से सर्दी-ज़ुकाम में आराम मिलता है.
• खांसी की श‍िकायत है, तो गुड़ खाएं. गुड़ को अदरक के साथ गर्म कर खाने से गले की खराश में राहत मिलती है.

Health Benefits Of Jaggery


• सांस संबंधी बीमारियों के लिए पांच ग्राम गुड़ को समान मात्रा में सरसों के तेल में मिलाकर खाने से सांस संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिलता है.
• शारीरिक कमज़ोरी में दूध के साथ गुड़ का सेवन करने से ताक़त आती है और शरीर ऊर्जावान बना रहता है.

सुपर टिप
गुड़ को अदरक के साथ हल्का गर्म कर खाने से गले की जलन दूर होती है. 

– अभिषेक गुप्ता


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बरसात के मौसम में जहां हमें गर्मी से राहत मिलती है, वहीं सेहत से जुड़ी कई तरह की परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है. दरअसल, वातावरण में मौजूद नमी के कारण संक्रमण यानी बैक्टीरिया अधिक सक्रिय हो जाते हैं. यही वजह होती है कि बारिश के दिनों में संक्रमण से होनेवाली बीमारियां अधिक पनपती और तेजी से फैलती हैं, जैसे- डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, हैजा, फूड प्वॉइजनिंग, डायरिया, टायफाॅइड, पीलिया, पेट से संबंधित बीमारियां, खुजली, एलर्जी आदि. इन सभी से बचने के लिए हमें साफ़-सफ़ाई और अपने खाने-पीने पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत होती है. माॅनसून हेल्थ, बीमारियों से बचने पर वीटाबायोटिक्स लिमिटेड के वीपी, फिटनेस और न्यूट्रीशन एक्सपर्ट रोहित शेलतकर ने कई उपयोगी जानकारियां दीं. आइए पहले माॅनसून से होनेवाली बीमारियां और उनके बचाव के बारे में जानें.

  • मच्छरों से पनपनेवाली बीमारियां, जैसे- डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया आदि से बचने के लिए ध्यान दें कि घर के आसपास कहीं भी पानी का जमाव न हों. घर की स्वच्छता को प्राथमिकता दें, क्योंकि ज़्यादातर मौसमी बीमारियां गंदगी से ही होती हैं. घर में पेस्ट कंट्रोल कराना बेहतर उपाय है. इससे मच्छर, अन्य बरसाती जीव-जंतुओं से निजात मिलेगी और बीमार होने की गुंजाइश भी नहीं रहेगी.
Monsoon Health Guide
  • माॅनसून में होनेवाली गंभीर बीमारी में हैजा भी एक है. ऐसे में पीने के पानी की शुद्धता का ख़्याल रखना ज़रूरी है. इसलिए पानी को उबालकर या फिर प्यूरीफायर का पानी पीएं. घर क्लीन रखें. लिक्विड हैंड सोप का इस्तेमाल करें. हैजे का टीका लगवाएं. दूध और दूध से बने खाद्य पदार्थों का कम सेवन करें. बाहर का खाना यानी होटल, स्ट्रीट फूड, फास्ट फूड आदि का खाने से बचें.
  • माॅनसून में पेट की बीमारियां भी तेजी से फैलती हैं, ख़ासकर डायरिया. इसके लिए सफ़ाई, पर्सनल हाइजीन और खानपान का ध्यान रखें. किचन की सफ़ाई में बर्तनों, मिक्सर, कटिंग बोर्ड, माइक्रोवेव, प्लेटफार्म आदि पर विशेष ध्यान दें. टॉयलेट से आने, हाथ गंदे होने, डायपर बदलने, साफ़-सफ़ाई करते समय आदि के बाद हैंडवॉश से हाथ अवश्य धोएं. ऐसे फल-सब्ज़ियां खाएं, जिनके छिलके निकाल सकते हैं. यदि कहीं बाहर सफ़र पर जाना है, तो हेपेटाइटिस ए का टीका अवश्य लगवाएं.


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  • बरसात के दिनों में संक्रामक बीमारी टायफॉइड की समस्या भी अधिक देखने को मिलती है. इसके बचाव के लिए उबला व साफ़ पानी ही पीएं. डिहाइड्रेशन ना हों, उसके लिए अधिक तरल पदार्थ यानी लिक्विड डायट लें. भोजन करने से पहले हाथों को अच्छी तरह धोएं. इसमें होमियोपैथिक दवाएं भी अधिक लाभदायक होती हैं.
  • बारिश में लिवर में वायरल इंफेक्शन की वजह से पीलिया भी लोगों को परेशान करती है. दरअसल, हेपेटाइटिस के वायरस पानी से फैलते हैं. इसलिए हेपेटाइटिस ए व बी का टीका लगवाएं. दूषित भोजन-पानी से बचें और हाइजीन का विशेष ध्यान रखें.
  • बरसात में फूड प्वॉइजनिंग होने का ख़तरा भी अधिक रहता है. इससे बचने के लिए हल्का भोजन करें. अधिक मसालेदार खानपान से बचें. पूरी तरह से पका हुआ भोजन ही खाएं. कच्चा या अधपका खाना ना खाएं. बाहर का खाना अवॉइड करें. ठंडे पदार्थों का सेवन भी ना के बराबर करें. बासी भोजन ना खाएं. फ्रिज में कई दिनों से रखा भोजन भी बिल्कुल ना खाएं. भोजन बनाते समय साफ़-सफ़ाई का अतिरिक्त ध्यान रखें. सब्ज़ियां-फल अच्छी तरह से धोकर इस्तेमाल करें. इन सभी बातों का ख़्याल रखने से फूड प्वॉइजनिंग ही नहीं बरसात से जुड़ी अधिकतर बीमारियों से बचा जा सकता है. कहने का तात्पर्य यह है कि सही खानपान और हेल्‍दी आदतों को अपनाकर बरसाती बीमारियों से आसानी से बचा जा सकता है.

माॅनसून में अपनी इम्यूनिटी को मज़बूत कैसे रखें?
सेहतमंद शरीर के लिए इम्यूनिटी सिस्टम अच्छा होना बेहद ज़रूरी है और बरसात में तो यह और भी ज़रूरी हो जाता है. दरअसल, माॅनसून के दौरान शरीर की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है, क्योंकि इस समय बढ़ी हुई आर्द्रता, प्रदूषण और नमी, शरीर के मेटाबॉलिक रेट व बीमारियों से लड़ने की उसकी क्षमता को कम कर देती है. इसलिए बारिश के मौसम में प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.

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क्या खाएं?

  • इस मौसम में हर किसी को अपनी डायट में अनेक तरह के ताज़े फल और सब्ज़ियों को शामिल करना चाहिए.
  • करेला, नींबू, लहसुन, अदरक, नीम जैसी जड़ी-बूटियां और पत्तेदार सब्ज़ियां कुछ ऐसे प्राकृतिक ख़ज़ाने हैं, जो संक्रमण को रोकने और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत बनाने में मददगार हैं.
  • कैमोमाइल, जैस्मीन और ग्रीन टी शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करते हैं.
  • लीची, पपीता, अनार और नाशपाती जैसे माॅनसूनी फल न सिर्फ़ भोजन को बेहतर ढंग से पचाने में शरीर की मदद करते हैं, बल्कि आर्द्रता स्तर में बढ़ोतरी के कारण होनेवाले संक्रमण से लड़ने में भी मददगार हैं.
  • मौसमी फल एंटीऑक्सिडेंट से भी भरपूर होते हैं, जो ब्लड प्रेशर को ठीक रखने और विभिन्न संक्रमणों को रोकने में मदद करते हैं.
  • बरसात में जामुन एक ऐसा मौसमी फल है, जिसका सेवन ज़रूर करना चाहिए, क्योंकि इसमें आयरन, फोलेट, पोटैशियम और विटामिन्स प्रचुर मात्रा में होते हैं.
  • अंडा हर मौसम के लिए सुपर फूड है, जो प्रोटीन से भरपूर होता है और मसल्स बनाने में मददगार है. अंडे शरीर की इम्यून सिस्टम को भी मज़बूत बनाते हैं और संक्रमण से लड़ने में मदद करते हैं.


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क्या परहेज़ करें?
माॅनसून के मौसम में किसी भी तरह के स्ट्रीट फूड, जंक फूड या फास्ट फूड से बचना चाहिए. जिन अनहाइज़ीनिक तरीक़ों से इन फूड्स को तैयार किया जाता है, उससे बीमारियां पैदा होने का ख़तरा अधिक होता है. ज़्यादातर फूड्स को इस्तेमाल हो चुके तेल में फ्राई किया जाता है, जो लंबे समय से रखे हुए होते हैं. फास्ट फूड में ट्रांस-फैट भी होता है, जो मोटापे का प्रमुख कारण है.

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एक्सरसाइज़ की आदत डालें…

  • फिज़िकल फिटनेस बनाए रखने के लिए हफ़्ते में कम से कम तीन-चार बार 25 से 30 मिनट की एक्सरसाइज़ ज़रूर करें.
  • अपने नियमित दिनचर्या में वर्कआउट को अवश्य शामिल करें.
  • एक्सरसाइज़ के रूप में एरोबिक्स पाचन में सुधार करता है, शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने के अलावा इम्यूनिटी बनाने और शरीर की कोशिकाओं के पुनर्निर्माण में भी मदद करता है.
  • माॅनसून का भले ही आपके इम्यून सिस्टम पर प्रतिकूल असर हो, लेकिन एक्सरसाइज़ के माध्यम से इसको बनाए रखना ज़रूरी है.
  • सिंपल स्ट्रेचिंग, स्पॉट जॉगिंग, क्रंचेज, प्लैंक्स और लेग राइज जैसे एक्सरसाइज़ को अपनी इनडोर रूटीन में शामिल करके ऐसा करना संभव है.
  • योग, प्राणायाम और ध्यान भी करें.

स्मार्ट हेल्थ टिप्स

  • अदरक और अजवाइन मिले सरसों के तेल की मालिश त्वचा को संक्रमण से बचाती है.
  • संक्रमण से बचने के लिए एंटी-बैक्टीरियल साबुन के साथ टेलकम पाउडर का उपयोग करें.
  • नाक जाम हो, तो अदरक का पाउडर सूंघें.
  • तुलसी के पत्ते और कालीमिर्च को मिक्स कर चाय पीएं, मौसम के असर से बचे रहेंगे.
  • हॉट बेवरेज, जैसे- ग्रीन टी, लाइम टी, अदरकवाली चाय तरोताज़ा करने के साथ इम्यूनिटी भी बढ़ाते हैं.
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  • बरसात में स्किन व बाल को हेल्दी रखने के लिए एंटी-वायरल व एंटी फंगल गुणों से युक्त कच्चा लहसुन चाय के साथ लें.
  • चूंकि अधिकतर बीमारियां मच्छरों से होती है, इसलिए इनसे बचना भी ज़रूरी है. इसके लिए मच्छरदानी का उपयोग करें. मच्छर भगानेवाले स्प्रे, क्रीम, ड्रॉप, पैच आदि का इस्तेमाल करें.
  • गंदे पानी में न चलें. इसमें कीटाणु हो सकते हैं और संक्रमण पैदा कर सकते हैं. बच्चों को भी गंदे या पानी के जमाव में खेलने न दें.
  • हर रोज़ स्नान ज़रूर करें. कहीं बाहर से घर आने के बाद भी अच्छी तरह से स्नान करें.
  • नाख़ूनों को नियमित रूप से काटें.
  • छींकने-खांसते समय नाक व मुंह ढंकें.
  • माॅनसून में भीगने से बचें. अगर भीग ही जाते हैं, तो ख़ुद को जल्दी से सूखा लें. ध्यान रहे, गीले कपड़ों में या एसी रुम में ना बैठें.
  • फेस मास्क सही तरीक़े से ज़रूर पहनें.


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माॅनसून जहां गर्मी से राहत दिलाता है, वहीं अपने साथ तापमान और आर्द्रता के स्‍तरों में परिवर्तन भी लेकर आता है. बारिश का मौसम शुरू हो चुका है और पैरेंट्स के लिए यह ज़रूरी हो गया है कि वो बच्‍चों की देखभाल से जुड़ी अपनी आदतों और दिनचर्या में बदलाव लाएं, ताकि शिशु की त्‍वचा की अच्‍छी तरह से देखभाल सुनिश्चित हो सके. नवजात शिशु की त्‍वचा बड़ों की तुलना में 40-60 गुना पतली होती है, इसलिए उन्हें कोमल देखभाल एवं पोषण की आवश्‍यकता होती है.
आइए, पुणे के बीवीयू मेडिकल कॉलेज के डॉ. प्रदीप सूर्यवंशी (प्रोफेसर एवं हेड, डिपार्टमेंट ऑफ नियोनेटोलॉजी) से जानें माॅनसून के दौरान शिशुओं की त्‍वचा की सर्वोत्‍तम देखभाल के लिए किन-किन बातों का ख़्याल रखना चाहिए.

मालिश
बच्‍चों की तेल मालिश की तकनीक युगों पुरानी है और भारत के लगभग हर परिवार में यह तकनीक अपनाई जाती है. इसके अनेक लाभ हैं. इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्‍स (आईएपी) के अनुसार, सही तेल से बच्‍चों की उचित तरीक़े से मालिश किए जाने से उनका व्‍यवहार सौम्‍य होता है, कॉर्टिसॉल का स्तर घटता है और शिशु का संज्ञानात्‍मक प्रदर्शन बेहतर होता है.

मालिश करने का सबसे उपयुक्‍त समय तब होता है जब बच्‍चा पूरी तरह से आराम कर चुका हो और भूखा न हो. सुनिश्चित करें कि कमरा गर्म हो और हाथों में थोड़ा-सा तेल लेकर मालिश की शुरुआत करें. उसे आहिस्‍ते-आहिस्‍ते त्‍वचा पर मलते जाएं. मालिश के लिए हल्‍के और चिपचिपाहटरहित मिनरल ऑयल का इस्‍तेमाल करना चाहिए, जिसमें विटामिन ई भरपूर मात्रा में मौजूद हो.

ज़्यादा ज़ोर लगाकर मालिश न करें. ऊपर की ओर प्‍यारभरी थपकी देने के साथ शिशु के सामने और पीठ की ओर गोलाई में हल्‍के-हल्‍के मालिश करें. हल्के स्पर्श के साथ की जानेवाली प्रक्रिया से माता-पिता और बच्चे के बीच रिश्‍ता मज़बूत होगा. बच्चे की त्वचा में गर्माहट आएगी, जो माॅनसून के बदलते तापमान के दौरान फ़ायदेमंद है.

Baby Skin Care

आनंदायक स्‍नान
मालिश की तरह ही नहाने का समय भी बच्‍चे से जुड़ाव बढ़ाने का अच्‍छा मौक़ा होता है. माॅनसून के दौरान, रोज़ाना नहलाना ज़रूरी नहीं होता है. हफ़्ते में दो से तीन बार नहलाना उपयुक्‍त है. शिशु को नहलाने का कमरा गर्म होना चाहिए और गुनगुने पानी से नहलाया जाना चाहिए. पैरेंट्स, शिशु को नहलाने के लिए बेबी क्‍लेन्जर या बेबी सोप का इस्‍तेमाल कर सकते हैं. आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आप बच्‍चे को नहलाने के लिए जिन उत्‍पादों का इस्‍तेमाल कर रहे हैं, उनमें पैराबिन, डाई न हों, उनकी सौम्‍यता चिकित्‍सकीय रूप से प्रामाणिक हो और वो बच्‍चे की त्‍वचा के लिए उपयुक्‍त हों.
मिल्‍क प्रोटीन और विटामिन ई से भरपूर बेबी सोप सर्वोत्‍तम है. ये किटाणुओं को धीरे-धीरे हटाने के साथ त्‍वचा को नर्म-मुलायम भी बनाएंगे. साबुन की तरह ही नेचुरल मिल्‍क एक्‍सट्रैक्‍ट्स, राइस ब्रैन प्रोटीन जैसे तत्‍वों एवं 24 घंटे मॉइश्‍चराइजिंग प्रदान करनेवाले बेबी वॉश भी बाज़ार में आसानीपूर्वक उपलब्‍ध हैं.

नहलाने के बाद, नर्म एवं गर्म तौलिए से शिशु के शरीर को पोंछकर सूखा दें. पानी को अच्‍छी तरह से सूखा लें, जिससे उनके चलते रैशेज न हों.


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मॉइश्‍चराइजिंग ज़रूरी है…
शोध के अनुसार, भारत में तीन में से दो शिशुओं की त्वचा रूखी होती है। एक अच्छी मॉइश्‍चराइजिंग क्रीम या लोशन का उपयोग करने से बच्चे की त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद मिलेगी. एक अच्छा उत्पाद न केवल पोषण देगा, बल्कि बच्चे की त्वचा की रक्षा भी करेगा. ग्लिसरीन या मिल्‍क एक्‍सट्रैक्‍ट्स और राइस ब्रैन प्रोटीन के साथ 24 घंटे के लॉकिंग सिस्टमवाले लोशन का उपयोग किया जा सकता है, ख़ासकर नहाने के बाद.

मॉइश्‍चराइजर लगाते समय दोनों हाथों पर थोड़ा-सा लेकर बच्चे के आगे-पीछे दिल के आकार में लगाएं. विटामिन ई और मिल्‍क एक्‍सट्रैक्‍ट्स के साथ एक बेबी क्रीम चेहरे पर और शरीर के बाकी हिस्सों पर उपयोग किया जा सकता है.

डायपर केयर
डायपर के जगह की देखभाल करना महत्वपूर्ण है. विशेष रूप से आर्द्र मौसम के दौरान, गीले और तंग डायपर से बच्चे को अधिक पसीना हो सकता है, जिससे डायपर वाले स्थान पर डायपर डर्मेटाइटिस और इंफेक्‍शन हो सकता है.

बीच-बीच में डायपर बदलते रहें या जब भी संभव हो बच्चे को बिना डायपर का ही रखें. डायपर एरिया को साफ़ करने के लिए मॉइश्‍चराइजिंग तत्व वाले अल्कोहलमुक्त वाइप्स का उपयोग करें. डायपर एरिया को साफ़ और सूखा रखने से रैशेज से बचा जा सकेगा. अगर रैशेज की समस्या बनी रहती है, तो डॉक्टर से सलाह लें.

आरामदेह पोशाक
माॅनसून के दौरान, लंबाईवाले सूती कपड़े पहनाएं, जिससे त्‍वचा को ताजी हवा लगे, रैशेज एवं मच्‍छरों से बचा जा सके. यदि भारी बारिश के चलते तापमान घटता है, तो बच्‍चे को नर्म ऊनी कपड़े पहनाएं.

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दुनियाभर के लाखों दम्पति अनेक कारणों से प्रजनन की बढ़ती समस्याओं से जूझ रहे हैं और उनमें से एक कारण है तनाव. वर्तमान परिदृश्य में तनाव बढ़ानेवाले विविध कारण हैं, जैसे- कार्य-जीवन संतुलन में गड़बड़ी, शिथिल जीवनशैली, खान-पान की ख़राब आदत और व्यायाम का अभाव. इसके अतिरिक्त बांझपन से जुड़ी निराशा भी चिंता के स्तर में वृद्धि कर सकती है और हताशा की भावनाओं के रूप में हो सकती है. आर्ट फर्टिलिटी क्लिनिक्स, इंडिया की क्लीनिकल डायरेक्टर, डॉ. पारुल कटियार का मानना है कि इन सबसे उबरने के लिए हमें योग को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए. इसी से जुड़ी तमाम बातों पर उन्होंने प्रकाश डाला.

Yoga To Reduce Stress


शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करना प्रभावशाली सिद्ध हुआ है और इन्ही में से एक है योग. जिसके बारे में सबसे अधिक कहा जाता है. योग व्यायाम और ध्यान का एक रूप है, जो ब्लड प्रेशर को कम करता है, जोड़ों के दर्द से राहत पहुंचाता है, शरीर के पाचन प्रणाली को ठीक करता है, तनाव को कम करता है और किसी ख़ास आयु वर्ग तक सीमित नहीं है.
बांझपन हमेशा मनोवैज्ञानिक संकट और निराशा से जुड़ा रहा है और योग को इन मामलों से मुक्ति पाने के लिए लाभकारी माना गया है. आईवीएफ के उपचार एवं गर्भावस्था के दौरान और उससे पहले भावी माता-पिता तनाव झेलते हैं. हमारे शरीर और मस्तिष्क को विश्राम और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में सुधार करके शांति की स्थिति प्राप्त करने में सहायता करना ही योग का उद्देश्य है. इसे एक प्रभावी जीवनशैली परिवर्तन माना जाता है, जिसका पुरुषों और महिलाओं, दोनों के प्रजनन स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.


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दैनिक जीवन में योग को शामिल करने से कॉर्टिसोल, तनाव प्रेरक हार्मोन के स्तर को कम करने और रोगप्रतिरोधक शक्ति में सुधार लाने में मदद मिल सकती है. कॉर्टिसोल का उच्च स्तर उन हार्मोन के बीच संतुलन को क्षति पहुंचाता है, जो मस्तिष्क, हृदय और प्रजनन प्रणाली को नियंत्रित करते हैं. पुरुषों में तनाव के कारण न केवल शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि इसकी गतिशीलता भी कम हो जाती है. महिलाओं में अत्यधिक तनावपूर्ण स्थिति के दौरान, शरीर का वह तंत्र, जो जीवित रहने के लिए ज़रूरी नहीं है, प्रजनन तंत्र को नियंत्रिक करनेवाले हाइपोथैलमिक-पिट्यूटरी-गोनैडल अक्ष की गतिविधि को भी बंद कर देता है. यह आपके मस्तिष्क और अंडाशय (ओवरी) के बीच संपर्क बाधित कर सकता है, जिसके परिणामस्वरूप रजोस्राव में अनियमितता या चूक और ओव्यूलेशन अनुपस्थित या विलंबित हो हो सकता है.

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योग के ऐसे कई आसन होते हैं, जिसमें तीव्रता के विभिन्न स्तरों के साथ अलग-अलग क्रम और गति से अभ्यास किए जाते हैं. योगासनों के साथ गहरी सांस का संयोजन सर्वाधिक लाभदायक होता हैं.
योग भावनात्मक चुनौतियों से निपटने और आपके शरीर एवं दिमाग़ के बीच संतुलन बनाने में मदद करता है. यह स्वयं से जुड़ने में मदद करता है. योग तनाव और चिंता को कम करने में सहायक होता है, जिसे फर्टिलिटी का दुश्मन माना जाता है. तनाव एवं चिंता दूर होने से आईवीएफ उपचार और गर्भधारण की सफलता की संभावना बढ़ जाती है. डॉक्टर द्वारा उचित डायग्नोसिस और एक स्वस्थ जीवनशैली को इसके साथ संयोजित किया जाना चाहिए. आप योग से जो सीख लेते हैं, वह आपके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में तंदुरुस्ती को प्रोत्साहित कर सकते हैं.

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कंगारू केयर नवजात शिशुओं के देखभाल की एक तकनीक है. ख़ासकर जिन शिशुओं का जन्म के समय वज़न कम होता है, उनके लिए कंगारू केयर का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें बच्चे को माता या पिता के खुले सीने से चिपकाकर रखा जाता, इस तरह से पैरेंट्स की त्वचा से शिशु की त्वचा का सीधा संपर्क होता रहता है. सभी नवजात शिशुओं की देखभाल में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है. बहुत ही प्रभावकारी और इस्तेमाल में बिल्कुल आसान तकनीक से बच्चों का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है. समय से पहले या समय पूरा होने के बाद पैदा हुए सभी बच्चों की अच्छी देखभाल के लिए कंगारू केयर लाभकारी तकनीक है. इसके बारे में डॉ. नवीन बजाज, नियोनेटोलॉजिस्ट (इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स) ने महत्वपूर्ण जानकारियां दीं.

कंगारू केयर कौन दे सकता है?
कंगारू केयर तकनीक से शिशु की देखभाल के लिए सबसे सही व्यक्ति होती है शिशु की मां. लेकिन बच्चे के पिता या परिवार का कोई भी क़रीबी सदस्य (बच्चे को संभाल सकें ऐसे भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी, चाची, मौसी, बुआ, चाचा आदि में से कोई भी) बच्चे को कंगारू केयर देकर मां की ज़िम्मेदारी का कुछ हिस्सा उठा सकते हैं. कंगारू केयर दे रहे व्यक्ति को स्वच्छता के कुछ सामान्य मानकों का पालन करना आवश्यक है, जैसे- हर दिन नहाना, साफ़ कपड़ें पहनना, हाथों को नियमित रूप से धोकर स्वच्छ रखना, हाथों के नाख़ून काटे हुए और साफ़ हो आदि.

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कंगारू केयर को कब शुरू करना चाहिए और इसकी अवधि कितनी होनी चाहिए?
कंगारू केयर यानी त्वचा से त्वचा का संपर्क तकनीक की शुरूआत बच्चे के जन्म से ही करनी चाहिए. इसके इस्तेमाल की अवधि शुरूआत में कम रखी जाएं यानी क़रीब 30 से 60 मिनट तक. और जब धीरे-धीरे मां को इसकी आदत पड़ जाए और इस तकनीक के इस्तेमाल का आत्मविश्वास उसमें आ जाए, तब इसे जितना हो सकें उतने लंबे समय के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. ख़ासकर कम वज़न के शिशुओं के लिए कंगारू केयर की अवधि जितनी ज़्यादा हो, उतनी अच्छा होता है. बच्चे को कंगारू केयर देते हुए मां ख़ुद भी आराम कर सकती है या आधा लेटकर सो सकती है.


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कंगारू केयर की प्रक्रिया
मां के ब्रेस्ट यानी स्तनों के बीच शिशु को इस तरह रखते हैं कि उसका सिर एक तरफ़ झुका हो, ताकि उसे सांस लेने में आसानी हो और मां सदैव आंखों के सामने रहें. बच्चे का पेट मां के पेट के ऊपरी भाग से लगा हो, हाथ और पैर मुड़े हुए हो. शिशु को आधार देने के लिए स्वच्छ, सूती कपड़ा या कंगारू बैग का इस्तेमाल किया जा सकता है.

कंगारू केयर के फ़ायदे

  • समय से पहले पैदा हुए या कम वज़न के बच्चों की देखभाल के लिए कंगारू केयर की शुरूआत हुई. लेकिन समय पूरा होकर पैदा हुए या सही वज़न के बच्चों के लिए भी यह तकनीक लाभकारी है.
  • शिशु की अच्छी देखभाल और उसमें अपनेपन का एहसास निर्माण करने का यह सबसे बेहतरीन तरीक़ा है. देखा गया है कि इस तकनीक से देखभाल किए गए बच्चों का अपने माता-पिता के साथ जुड़ाव काफ़ी क़रीबी रहता है.
  • त्वचा से त्वचा के संपर्क से मस्तिष्क के विकास और भावनिक प्रतिभा के निर्माण को बढ़ावा मिलता है. आंखों से आंखों का कॉन्टेक्ट होते रहने से प्यार, अपनापन और विश्वास भी अच्छी तरह विकसित होते हैं.

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  • इस प्रक्रिया के इस्तेमाल से स्तनपान को भी बढ़ावा मिलता है. बच्चा और मां इन दोनों के स्वास्थ्य की दृष्टी से स्तनपान अत्यंत लाभकारी है. बच्चे के पोषण और विकास में स्तनपान का योगदान महत्वपूर्ण होता है.
  • इससे ख़ासकर कम वज़न के बच्चों में और सर्दियों में बच्चे के शरीर का तापमान स्थिर रखा जा सकता है.
  • इस तकनीक से देखभाल किए गए बच्चों का वज़न अच्छे से बढ़ता है. वे लंबे समय तक शांत सोते हैं. जागने पर भी शांत रहते हैं और कम रोते हैं.
    इस तरह के कई फ़ायदों की वजह से कंगारू केयर तकनीक से देखभाल किए जानेवाले बच्चे अधिक स्वस्थ और बुद्धिमान होते हैं. अपने परिवार के प्रति उनके मन में अपनापन भी अधिक होता है.
Skin Kangaroo Care

पिता के लिए भी उपयोगी
माताओं की तरह, पिता भी कंगारू केयर यानी त्वचा से त्वचा का संपर्क तकनीक से बच्चे की देखभाल कर सकते हैं. यह शिशु और पिता दोनों के लिए फ़ायदेमंद है. पिता के लिए कुछ ख़ास फ़ायदा यह है कि वे बच्चे की देखभाल अच्छी तरह से कर सकेंगे और अपने आपको असहाय महसूस नहीं करेंगे. इससे शिशु और पिता के बीच अपनापन निर्माण होता है और बच्चे की देखभाल में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभा पाने की ख़ुशी भी पिता को मिलती है. यह तकनीक उन्हें बच्चे के भूख और तनाव के संकेतों को समझने में भी मदद करती है. जब पिता कंगारू केयर दे रहे हो, तब मां आराम कर सकती है और बच्चे की अच्छी देखभाल के लिए अपनी ऊर्जा और उत्साह को बनाए रख सकती है.

इस तकनीक के इस्तेमाल से बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में मदद मिलती है. बच्चे अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं और उनकी पूरी ऊर्जा बेहतरीन विकास में लग जाती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और चिकित्सकों का यह मानना है कि सभी बच्चों के लिए कंगारू केयर तकनीक का इस्तेमाल ज़रूर किया जाना चाहिए.

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कोरोना संक्रमण से स्वस्थ हुए लोगों पर अब ब्लैक फंगस का खतरा मंडराने लगा है. देश भर में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. इस बीमारी से कुछ मरीजों की जान जा चुकी है तो कुछ को अपनी आंखें गंवानी पड़ रही हैं. क्या है ये नई बीमारी, क्या है इसके लक्षण और ट्रीटमेंट, आइये जानते हैं.

क्या है ब्लैक फंगस?

Black fungus

ये एक तरह का दुर्लभ फंगल इंफेक्शन है, जो शरीर में बहुत तेजी से फैलता है. इससे आंखों की रोशनी चली जाती है. कई मामलों में मरीज़ की मौत भी हो रही हैं. जिन लोगों की इम्युनिटी कमज़ोर है, उनमें ये संक्रमण तेजी से फैल रहा है. कोरोना से ठीक हुए मरीजों को खास एहतियात बरतने की जरूरत है

ब्लैक फंगस: ज़रूरी फैक्ट्स

Black fungus
  • यह फंगस शरीर में बहुत तेजी से फैलता है. यह इंफेक्शन उन लोगों को ज़्यादा चपेट में ले रहा है जिन लोगों को कोरोना संक्रमण से पहले दूसरी बीमारियां भी थीं.
  • ब्लैक फंगस ऐसे लोगों पर खासतौर पर असर डालता है, जिनकी इम्युनिटी कमजोर होती है. स्ट्रॉन्ग इम्युनिटी वाले लोगों को इस बीमारी का खतरा कम है.
  • डॉक्टर्स का कहना है कि इस इंफेक्शन के मामले अस्पताल में भर्ती या फिर ठीक हो चुके कोरोना के मरीजों में ज्यादा देखने को मिल रही है.
  • स्टेरॉयड का अधिक प्रयोग होने से ब्लैक फंगस का खतरा बढ़ जाता है.

ब्लैक फंगस के लक्षण

Black fungus


अगर आप में भी ये लक्षण दिखें तो तुरन्त ट्रीटमेंट कराएं.

  • आंख-नाक में दर्द या लाल होना.
  • बुखार, सिर दर्द, खांसी, सांस लेने में तकलीफ.
  • आंखों से पानी आना, आंखों के मूवमेंट का बंद हो जाना, आंखों में दर्द के साथ धुंधला दिखाई देना.
  • नाक जाम होना, आंखों और गालों पर सूजन या पूरे चेहरे पर सूजन.
  • कई बार नाक पर काली पपड़ी जमने लग जाती है.
  • खून की उल्टी
  • त्वचा पर चकत्ते
  • एक्सपर्ट्स के अनुसार यह इंफेक्शन नाक से शुरू होकर ऊपरी जबड़े तक जाता है और फिर दिमाग तक पहुंच जाता है.

किन लोगों को है ज़्यादा खतरा

  • जिन लोगों का डायबिटीज बहुत ज्यादा बढ़ा होता है.
  • ज्यादा स्टेरॉयड का इस्तेमाल वाले.
  • आईसीयू में ज्यादा दिनों तक रहने वाले
  • पहले से कई बीमारियों से जूझ रहे लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है.

बचाव के लिए क्या करें

Black fungus
  • इससे बचने के लिए एक्सपर्ट्स मास्क पहनने की सलाह देते हैं.
  • खेत या मिट्टी वाला कोई काम करते हैं तो जूते, लंबे बाजू के शर्ट, फुल पैंट और ग्लव्स पहन कर करें.
  • साफ-सफाई का पूरा ख्याल रखें.
  • एम्बुलेंस, अस्पताल आदि में आक्सीजन मास्क नया लगाएं.
  • किसी के द्वारा इस्तेमाल किया मास्क दुबारा न लगाएं.
  • अगर आप कोरोना से स्वस्थ होकर लौटे हैं तो अपने ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखें.
  • स्टेरॉयड का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह पर ही करें.
  • धूल वाली जगह पर जाएं तो मास्क ज़रूर पहनें.

इन बातों को भी जानें

  • नाक बंद होने के सभी मामलों को बैक्टीरियल इंफेक्शन न समझें.
  • ट्रीटमेंट में बिल्कुल भी देरी न करें. जितनी जल्दी हो सके, डॉक्टरी परामर्श लें.
  • एंटीबायोटिक व एंटीफंगल दवाओं का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह पर करें.
  • अस्पताल में ज्यादा दिन और ज्यादा स्टेरॉयड का मतलब है ब्लैक फंगस का ज्यादा खतरा.

अगर म्यूकोरमाइसिस बीमारी है का समय रहते पता चल जाए तो इलाज संभव है. इसका एक यह है इलाज कि लक्षणों को जल्द से जल्द पहचानें और डॉक्टर से संपर्क करें. कोविड से लड़कर आए लोगों को खासतौर पर इसके लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए. कुछ डॉक्टरों की मानें तो एक बार अगर इंफेक्शन दिमाग तक पहुंच गया तो फिर कोई इलाज कारगर नहीं.

कोरोना फिलहाल इंडिया में अलार्मिंग सिचुएशन पर है. रोज़ाना लाखों लोग कोरोना पॉजिटिव हो रहे हैं. और अब तो ये भी कहा जा रहा है कि एक बार कोरोना से संक्रमित हो चुके व्यक्ति के भी दोबारा संक्रमित होने का रिस्क है. हालांकि वैक्सीन लेने के बाद ये खतरा बहुत कम हो जाएगा, इसलिए वैक्सीन ज़रूर लें. साथ ही अन्य एहतियात भी ज़रूर बरतें.

रखें ओरल हाइजीन का खास खयाल

change toothbrush after Covid-19 recovery

मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोरोना से बचने के लिए हाइजीन संबंधी अन्य आदतों के अलावा ओरल हाइजीन का ख्याल रखना भी बहुत ज़रूरी है, खासकर अगर आप कोरोना से संक्रमित हुए हैं और रिकवर हो चुके हैं, तो आपको फौरन अपना टूथब्रश बदल लेना चाहिए.

दोबारा संक्रमण से बचना चाहते हैं, तो बदलें टूथ ब्रश

change toothbrush after Covid-19 recovery

डेंटिस्ट के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो हाल ही में कोविड-19 से रिकवर हुआ है, उसे नया टूथब्रश इस्तेमाल करना चाहिए. इससे न केवल उस व्यक्ति के दोबारा संक्रमित होने का रिस्क कम हो जाता है, बल्कि उन फैमिली मेंबर्स को भी खतरा कम होता है, जो एक ही वॉशरूम यूज कर रहे हैं.

सर्दी , खांसी और फ्लू से पीड़ित लोग भी रखें ओरल हाइजीन का ख्याल

change toothbrush after Covid-19 recovery

इतना ही नहीं डेंटल एक्सपर्ट्स का ये भी कहना है, सर्दी , खांसी और फ्लू से रिकवर हो चुके लोगों को टूथब्रश बदल लेना चाहिए. इससे दूसरों को इंफेक्शन होने का खतरा कम हो जाएगा.

कोविड होने के कितने दिन बाद बदलें ब्रश

change toothbrush after Covid-19 recovery

अगर किसी को कोविड-19 हुआ है, तो लक्षण दिखने के 20 दिन बाद टूथब्रश और टंग क्लीनर को बदल लेना चाहिए. इससे कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है. डॉक्टर्स का कहना है “हो सकता है टूथब्रश पर बैक्टेरिया या वायरस रह गया हो, जो बाद में रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन का कारण बन सकता है, इसलिए सभी कोविड पेशेंट्स को रिकवर होने के बाद हम ब्रश चेंज करने की सलाह देते हैं.”

इन बातों का भी रखें ख्याल

Covid-19 recovery

डेन्टिस्ट के अलावा कोविड से बचने के लिये इन बातों का भी ख्याल रखें.
– ओरल हाइजीन के लिए माउथवॉश का इस्तेमाल करें.
– माउथवॉश उपलब्ध न हो तो गर्म पानी में नमक मिलाकर गार्गल करें.
– बेताडाइन गार्गल भी मार्केट में उपलब्ध है. ये यूज़ करें.


कोरोना वायरस का नया के फेफड़ों और रेस्पिरेटरी सिस्टम पर अटैक कर रहा है, जिस वजह से 60-65% लोगों का ऑक्सीजन लेवल एकदम कम हो जा रहा है और इमरजेंसी की नौबत आ जा रही है. ऑक्सीजन की कमी होने से कई मरीज जान से हाथ धो रहे हैं. तो क्यों न ऐसी नौबत ही न आने दें. घर में ही कुछ ऐसे योग प्राणायाम करें, जिससे शरीर का ऑक्सीजन लेवल बढ़ जाए. ये योगासन कोरोना संक्रमित भी करें, ताकि आपके शरीर में ऑक्सीजन लेवल कम होने ही न पाए.

1. ताड़ासन

Yoga Asanas To Improve Lung Health


– पैरों के बीच कुछ दूरी रखते हुए सीधे खड़े हो जाएं
– दोनों हाथों अपने शरीर के पास में सीधा रखें.
– अब डीप ब्रीदिंग करते हुए अपनी दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाएं. अपनी उंगलियों को आपस में इंटरलॉक कर लें.
– हाथों को सीधा रखें और स्ट्रेच करें. आपके शरीर में पैरों से लेकर हाथों की उंगलियों तक स्ट्रेच महसूस होना चाहिए.
– 10 सेकेंड के लिए इस स्थिति में रहें और गहरी सांस लेते रहें. अब सांस छोड़ते हुए अपनी शुरुआती अवस्था में आ जाएं.

2. तिर्यक ताड़ासन
– दोनों पैरों में अंतर रखते हुए सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएं. दोनों हाथों को सामने से उठाते हुए कंधे तक ले आएं. हाथों की उंगलियों को इंटर लॉक करें.
– डीप ब्रीदिंग करते हुए हाथों को ऊपर की तरफ स्ट्रेच करें और सांस छोड़ते हुए दाहिनी ओर झुकें.
– अब सांस लेते हुए हाथ ऊपर ले जाएं और सांस छोड़ते हुए बाई ओर झुकें.

3. स्कंध संचालन
यानी शोल्डर रोटेशन क्रिया करने के लिए उंगुलियों के ऊपरी सिरे को कंधे पर रखें. अब दोनों कुहनियों को आपस में मिलाकर हाथों को पीछे की ओर ले जाते हुए बड़ा चक्र बनाने का प्रयास करें. ये क्रिया क्लॉक वाइज और एंटी क्लॉक वाइज दोहराएं. शोल्डर रोटेशन के समय डीप ब्रीदिंग करते रहें.

4. मकरासन

Yoga Asanas To Improve Lung Health

– पेट के बल लेट जाएं और अपने दोनों हाथों को मोड़कर कोहनियों को जमीन पर टिकाएं.
– आरामदायक अवस्था के लिए अपनी ठुड्डी को अपनी दोनों हाथों की हथेलियों पर रखें.
– गहरी सांस लेते हुए अपने दाएं पैर को मोड़ें और फिर सांस को छोड़ते हुए इसे सीधा कर लें.
– इस प्रक्रिया को दूसरे पैर से भी इसी तरह दोहराएं.
– फिर कुछ मिनट बाद धीरे-धीरे सामान्य अवस्था में आ जाएं।


5. विश्रामासन
– पेट के बल लेट कर किए जानेवाले इस आसन से ऑक्सीजन लेवल थोड़ी ही देर में नॉर्मल हो जाता है.
– पेट के बल लेटकर बाएं हाथ को सिर के नीचे ज़मीन पर रखें तथा गर्दन को दाई ओर घुमाते हुए सिर को हाथों पर रखें.
– दाएं पैर को घुटनों से मोड़कर जैसे बालक लेटता है, वैसे लेटकर विश्राम करें.
– डीप ब्रीदिंग करें. कुक देर इस अवस्था मे रहने के बाद पूर्व अवस्था में आ जाएं.

6. भुजंगासन

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– जमीन पर पेट के बल लेट जाएं. हथेलियों को सीने के पास कंधों की सीध में रखें.
– गहरी सांस लेते हुए अपनी अपर बॉडी को ऊपर की तरफ उठाएं.

– सिर को जितना हो सके, ऊपर की तरफ उठाएं।
– इस स्थिति में 15-30 सेकेंड के लिए रूकें. गहरी सांस लेते हुए सामान्य अवस्था में आ जाएं.

7. उष्ट्रासन
– घुटनों के बल या वज्रासन में बैठ जाएं.
– ध्यान रहे जांघ तथा पैरों को एक सीधा में हों.
– अब अपने घुटनों पर खड़े हो जाएं और गहरी सांस लेते हुए पीछे की ओर झुकें और दाईं हथेली को दाईं एड़ी पर तथा बाईं हथेली को बाईं एड़ी पर रखें.
– शरीर का वजन बांहों तथा पांवों पर समान रूप से होना चाहिए.
– धीरे-धीरे सांस ले और धीरे धीरे छोड़ें.
– लंबी गहरी सांस छोड़ते पूर्व अवस्था में आ जाएं।

8. धनुरासन

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– पेट के बल लेट जाएं. पैर सटे हुए हों और हाथ पैरों के पास रखें.
– धीरे-धीरे घुटनों को मोड़ें और हाथों से टखने को पकड़ें.
– गहरी सांस लेते हुए सीने को उठाएं और जांघों को भी जमीन से ऊपर उठाएं.
–  शरीर धनुष की तरह खिंचा हुआ रहे. सांस सामान्य गति से लेते रहें.
– कुछ सेकंड इस अवस्था में रुकें फिर पूर्व अवस्था में आ जाएं.

9. शलभासन
– पेट के बल लेट जायें.
– अपने दोनों पैरो को सीधा रखें और पैर के पंजे ऊपर की ओर रखें.
– अपने दोनों पैरों को एक-एक कर ऊपर की ओर उठाने की कोशिश करें. जितना हो सकता है उतना अपनी अधिकतम ऊंचाई तक पैरों को ऊपर करें.
– धीरे धीरे सांस को छोड़ते हुए पैरों को नीचे करते जाएं.

10. त्रिकोणासन

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– ज़मीन पर सीधा खड़े हो जाएं.
– दोनों पैरों के बीच 2 फुट की दूरी रखें.
– दाएं पैर को दाईं तरफ़ मोड़ें.
– दोनों हाथों को कंधों के समांतर फैलाएं.
– सांस लेते हुए धीरे-धीरे दाईं ओर झुकें. ध्यान रखें झुकते समय नज़र सामने की ओर हो.
– दाएं हाथ से दाएं पैर को टच करें.
– बायां हाथ ऊपर की तरफ सीधा रखें और नजर बाएं हाथ की उंगलियों की तरफ़ हो.
– इसी प्रक्रिया को बाएं हाथ से दोहराएं.


11. प्राणायाम

Yoga Asanas To Improve Lung Health

इसके अलावा डीप ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें, भस्त्रिका, अनुलोम विलोम, कपालभांति. ये सारे प्राणायाम लंग्स को ताकत देंगे और ऑक्सीजन का लेवल मेंटेन रखेंगे.





कोरोना पीरियड में सबसे ज़्यादा जिस चीज़ की बात की जा रही है, वो है इम्युनिटी. बार बार इस बात पर ज़ोर दिया जा रहा है कि अपनी इम्युनिटी को स्ट्रॉन्ग बनाएं, ताकि हम बीमारी और संक्रमण से लड़ सकें. कोरोना के आने के बाद से लोग भी अपनी इम्युनिटी को लेकर काफी अलर्ट हो गए हैं. पर इम्युनिटी बढ़ाने के लिए उपाय करने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि क्या वाकई आपकी इम्युनिटी कमज़ोर है. इसके लिए करें ये इम्युनिटी टेस्ट और और जानें कि कहीं आपकी इम्युनिटी भी कमज़ोर तो नहीं.


पहचानें कमज़ोर इम्युनिटी के लक्षण

Immunity Test


– अगर आप ज्यादातर बीमार रहते हैं या बार-बार बीमार पड़ते हैं.

– आपको लगातार कमजोरी रहती है तो समझ जाइए कि आपकी इम्यूनिटी कमजोर है.

– कई लोगों को मौसम बदलते ही सर्दी-जुकाम और बुखार की समस्या हो जाती है, यह भी आपकी कमजोर इम्यूनिटी की ओर इशारा करती है.

– हर वक्त थकान महसूस होना कमजोर इम्यूनिटी का सबसे बड़ा लक्षण है. बहुत अधिक काम करने पर थकान महसूस होना नार्मल बात है, लेकिन बिना कुछ किए ही हर वक्त थकान महसूस करना इस बात का संकेत है कि आपका इम्यून सिस्टम सही तरीके से काम नहीं कर रहा है. 

– अगर आपको शरीर में दर्द बना रहता है, तो यह दर्शाता है कि आपकी इम्यूनिटी कमजोर है.

– इसके अलावा आपको सुबह उठकर भी फ्रेश महसूस नहीं होता और पूरे दिन एनर्जी लेवल कम रहता है तो ये भी कमजोर इम्यूनिटी की ओर इशारा करता है.

– अगर आपके शरीर में कहीं घाव है और उसे भरने में ज़्यादा समय लग रहा है तो समझ जाइए कि आपकी इम्यूनिटी कमजोर है. दरअसल, जिन लोगों की इम्युनिटी अच्छी होती है, उनका घाव जल्दी सूख जाता है.

– अगर किसी व्यक्ति को अक्सर जॉइंट पेन की शिकायत रहती है, तो यह भी कमजोर इम्यूनिटी का एक अहम संकेत माना जाता है. 

– साल में 2 से 3 बार सर्दी-जुकाम होना सामान्य सी बात है. बच्चों को इससे ज़्यादा बार सर्दी हो सकती है. लेकिन अगर किसी व्यक्ति को हर वक्त सर्दी-जुकाम और गले में खराश की समस्या रहती हो तो यह भी कमज़ोर इम्युनिटी का एक लक्षण है. 

– अक्सर ही पेट संबंधी प्रॉबलम्स जैसे कब्ज, गैस, पेट दर्द और पेट फूलने जैसी समस्याएं भी कमजोर इम्यून सिस्टम का संकेत हो सकती हैं.

– इसके अलावा हमेशा चिड़चिड़ापन महसूस होना, किसी चीज़ में ध्यान न लगा पाना, आंखों के नीचे कालापन होना भी कमजोर इम्यूनिटी का लक्षण हो सकते हैं.

ऐसे बढ़ाएं अपनी इम्यूनिटी

Immunity Test


– हफ्ते में 3 दिन टमाटर का जूस पीने से इम्यून सिस्टम को बूस्ट किया जा सकता है.
– लहसुन भी हमारी इम्युनिटी को मजबूत करने में मदद करता है.
– ग्रीन टी एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर होती है, इसे नियमित पीने से भी इम्युनिटी बूस्ट होती है.
– तुलसी के पत्तों का खाली पेट सेवन करें.
– एंटीऑक्सिडेंट और इंफ्लेमिट्री गुणों से भरपूर हल्दी भी इम्युनिटी बढ़ाती है. गर्म दूध में एक चम्मच हल्दी पाउडर डालकर पीना बहुत ही फायदेमंद होता है.
– अदरक, दालचीनी को अपने डायट में शामिल करें.
– पर्याप्त मात्रा में नींद लें.
– लाइफस्टाइल में बदलाव लाएं. एक्टिव लाइफस्टाइल फॉलो करें.

boost Immunity


– हाइजीन का ख्याल रखें.
– स्ट्रेस फ्री रहने की कोशिश करें.
– हेल्दी और बैलेंस डायट लें.
– खूब पानी पीएं.
– जंक फूड खाने से बचें.
– धूम्रपान और अल्कोहल से बचें.


यह एक सच्चाई है कि महिलाओं के स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर जो स्थिति पूरी दुनिया में है, भारत में भी कमोबेश वैसी ही हालत है. यहां भी परिवारों में उनके स्‍वास्‍थ्‍य को पुरुषों के बराबर महत्‍व नहीं दिया जाता है. स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के मामले में भी उनके साथ काफ़ी भेदभाव किया जाता है. अध्‍ययनों के अनुसार, स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के उपचार के लिए अस्‍पताल जानेवाले कम आयु वर्ग के युवकों व बच्‍चों की तुलना में इलाज के लिए अस्‍पताल जानेवाली उसी उम्र की युवतियों व बच्चियों की संख्‍या लगभग आधी है. इसी सन्दर्भ में डॉ. रश्मि तलवार, डिप्युटी लैब हेड (क्लिनिकल रिफ्रेंस लैब, गुड़गांव) और प्रमुख, आनुवंशिकी विभाग, एसआरएल डायग्नोस्टिक्स ने उपयोगी जानकारियां दी.
यह प्रवृत्ति उपचारात्‍मक‍ देखभाल ही नहीं, बल्कि निवारक स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल, जो अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य का प्रथम चरण है की दृष्टि से भी है. ऐसी स्थिति काफ़ी हद तक भेदभावपूर्ण सामाजिक व्‍यवहार, पुरुषों के विशेषाधिकार को वरीयता, वित्‍तीय अनुपयोगिता, और डायग्‍नॉस्टिक एवं स्‍वास्‍थ्‍य सेवा सुविधाओं की अनुपलब्‍धता के कारण है.
इंश्‍योरेंस इंफॉर्मेशन ब्‍यूरो द्वारा वर्ष 2013-14 के आंकड़ों के विश्‍लेषण के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार, उक्‍त अवधि में किए गए कुल बीमा दावों में से लगभग 70% दावे पुरुषों के थे, जबकि बाकी के मात्र 30% दावे महिलाओं के लिए थे. दूसरी बात, वर्ष 2013-14 के दौरान इंडस्‍ट्री द्वारा वितरित की गई कुल दावा राशि का लगभग 72% पुरुषों को और 28% महिलाओं को मिला. पिछले वर्ष भी लगभग ऐसा ही अनुपात रहा. इससे पुरुषों और महिलाओं को प्राप्‍त इस तरह के कवरेज के लाभों में स्‍पष्‍ट अंतर दिखाई देता है, जहां महिलाएं साफ़तौर पर वंचित व उपेक्षित हैं.

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लेकिन अधिक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि इसका कारण शिक्षा या जागरूकता की कमी और प्रथम अधिकार के रूप में निवारक एवं उपचारात्‍मक स्‍वास्‍थ्‍य सेवा की मांग की प्रेरणा का अभाव है. इसलिए अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस का एक प्रमुख उद्देश्‍य महिलाओं की सहायता करना है, ताकि वो अपने स्‍वास्‍थ्‍य के बारे में सोच-विचार कर निर्णय लेने में सक्षम हो सकें.
स्‍वास्‍थ्‍य सेवा को वित्‍तीय रूप से लाभपूर्ण बनाकर इस सशक्‍त स्थिति को हासिल किए जाने की प्रबल संभावना है. हालांकि जैसा कि ज्ञात है कि ज्ञान में ही शक्ति है, इससे स्‍वस्‍थ जीवनशैली विकल्‍पों एवं स्‍वास्‍थ्‍य सेवा के बारे में जागरूकता व जानकारी बढ़ाने में मदद मिलेगी.
बीमारियों से बचाव या बीमारियों को गंभीर रूप लेने से रोकने की दिशा में पहले कदम के रूप में, यह अत्‍यावश्‍यक है कि सार्वजनिक संवाद में निवारक स्‍वास्‍थ्‍य सेवा पर प्रमुखता से ज़ोर दिया जाए. भारत की महिलाओं में शिक्षा एवं प्रेरणा का अभाव चिंताजनक है और इसके कई कारण हैं.
दृष्‍टांत के तौर पर भारत की महिलाओं में ब्रेस्‍ट, सर्वाइकल और ओरल कैंसर के मामले चौंकानेवाले हैं. उसके बावजूद, चौथे राष्‍ट्रीय परिवार स्‍वास्‍थ्‍य सर्वेक्षण (एनएचएफएस-5 राष्‍ट्रीय आंकड़े- प्रतीक्षित हैं), 15-49 वर्ष के आयु वर्ग की मात्र 22%, 10%, और 12% महिलाओं ने ही अब तक सर्वाइकल, ब्रेस्‍ट और ओरल कैविटी की जाचं कराई है.
इससे हमें यह पता चलता है कि अत्‍यावश्‍यक निवारक स्‍वास्‍थ्‍य जांच के बारे में महिलाओं को जागरूक करना कितना ज़रूरी है. हर दस वर्ष में मानव शरीर में महत्‍वपूर्ण रूप से बदलाव होता है और इस बदलाव को ध्‍यान में रखते हुए निवारक स्‍वास्‍थ्‍य जांच आवश्‍यकताएं भी बदलती हैं. आयु समूह के आधार पर कुछ निवारक स्‍वास्‍थ्‍य जांच संबंधी राय नीचे दी गई है.

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  • बच्चियों का प्रथम दशक (जन्‍म से 12 वर्ष). यह किसी भी बच्‍चे की वृद्धि और विकास की अवस्‍था होती है और इस अवस्‍था में निवारक स्‍वास्‍थ्‍य जांच मोटे तौर पर एक जैसे ही होते हैं. जन्म के समय, जेनेटिक टेस्‍ट- न्‍यू बोर्न स्‍क्रीनिंग से शिशुओं में संभावित मेटाबॉलिक विकारों का शीघ्र पता चल सकता है, जिससे जल्‍द इलाज के ज़रिए बच्‍चों व उनके परिवारों के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है. इसके अलावा विभिन्‍न रोगों के लिए संपूर्ण प्रतिरक्षण प्रक्रिया को समान महत्‍व दिया जाना चाहिए. इस अवस्‍था के लिए परामर्शित कुछ वार्षिक जांचों में ईएसआर के साथ कंप्‍लीट ब्‍लड काउंट (सीबीसी), मल-मूत्र जांच, हीमोग्‍लोबिन जैसे प्रमुख मानकों का ध्‍यान रखा जाना चाहिए. इस प्री-प्‍यूबर्टी (यौवनारंभ-पूर्व) आयु वर्ग में विशेष पोषण आवश्‍यकताओं का ध्‍यान रखा जाना बेहद ज़रूरी होता है, क्‍योंकि प्री-प्‍यूबर्टी और किशोरवास्‍था के दौरान आहार में प्रोटीन एवं कैल्शियम सहित अनेक पोषक तत्‍वों की आवश्‍यकता बढ़ जाती है, ताकि शारीरिक परिपक्‍वता में सहायता मिल सके.
  • किशोरियों के लिए (13-20 वर्ष). यह लड़कियों के लिए महत्‍वपूर्ण समय होता है, क्‍योंकि प्‍यूबर्टी के बाद, शरीर में बहुत अधिक बदलाव आता है. साथ ही इस अवस्‍था में ही जीवनशैली से जुड़ी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं जैसे कि किशोरवय मोटापा (टीनएज ओबेसिटी) और उच्‍च कोलेस्‍ट्राल लेवल व अन्‍य प्रभावित करने लगती हैं, इसलिए फीजिशियन और गायनोकनॉजिस्‍ट से वार्षिक सलाह लेना चाहिए. वार्षिक सीबीसी और अन्‍य टेस्‍ट्स के साथ-साथ, thyroid, endocrinology, रैंडम सुगर टेस्‍ट एवं Vitamin B12, Vitamin D एवं Iron deficiency tests कराना चाहिए.
  • वयस्‍कावस्‍था के शुरुआती दो दशक (20-40 वर्ष की आयु). इस अवस्‍था में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के शुरुआती लक्षण दिखने लगते हैं. चूंकि इस अवस्‍था में अधिकांश युवतियों की शादी हो जाती है और वो गर्भधारण करती हैं, इसलिए स्‍त्री रोग एवं मातृत्‍व संबंधी देखभाल पर प्रमुखता से ध्‍यान दिया जाना चाहिए. स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल से जुड़ी सामान्‍य देखभाल के अलावा शादीशुदा महिलाओं को समय-समय पर पीएपी-स्‍मीयर टेस्‍ट कराते रहना चाहिए. प्रत्‍येक पांच वर्ष पर यह टेस्‍ट कराना चाहिए. उन्‍हें बीच-बीच में स्‍तन जांच भी कराना चाहिए, जैसे कि वो मैमोग्राम टेस्‍ट करा सकती हैं और प्रत्‍येक मासिक चक्र के बाद घर पर ही अपने स्‍तन की जांच कर सकती हैं कि उसमें कहीं कोई गांठ तो नहीं बन रही है.
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  • 40 और 50 के दशक में पहुंच चुकी महिलाएं. 45 वर्ष से 55 वर्ष की अधिकांश महिलाओं में रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) शुरू हो जाती है. इसका अर्थ यह भी है कि 40 से 45 वर्ष की महिलाओं को अनियमित मासिक धर्म का अनुभव होने लगता है. मेनोपॉज़ को हल्‍के में नहीं लिया जाना चाहिए और महिलाओं को चाहिए कि वो गर्भाशय, स्‍तन और अण्‍डाशय के ख़तरों से सतर्क रहें. यही नहीं मेनोपॉज़ का संबंध यूरिनरी कैल्शियम के अत्‍यधिक उत्‍सर्जन से भी है, जिसके चलते किडनी स्‍टोन्‍स हो सकते हैं. मेनोपॉज़ की अवस्‍था में हड्डियां बनने की प्रक्रिया भी बाधित होने लगती है और हडि्डयों का स्‍वास्‍थ्‍य धीरे-धीरे बिगड़ने लगता है. इस प्रकार महिलाओं में आर्थराइटिस, ओस्टियोपोरोसिस एवं हड्डियों से जुड़ी अन्‍य बीमारियों के लक्षण धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं. उम्र अधिक हो जाने के चलते इस अवस्‍था में डायबिटीज़, लीवर एवं किडनी फंक्‍शंस और हृदय के स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ी जांच सामान्‍य हो जाती है. डॉक्‍टर्स द्वारा पूरक आहार लेने की सलाह दी जाती है. आसान रक्‍त जांच के लिए ज़रिए इन स्‍तरों पर नियमित रूप से निगरानी रखनी चाहिए.
  • बुजुर्ग अवस्‍था (60 वर्ष और इससे अधिक की उम्र)। इस अवस्‍था में संज्ञानात्‍मक (कॉग्निटिव) बीमारियों के लक्षण दिखने लगते हैं. संज्ञानात्‍मक क्षमताओं के घटने की गति को धीमे करने में योग, पैदल टहलने या अन्‍य गतिविधियों को करने से मदद मिल सकती है. इस अवस्‍था में प्रतिरोधी क्षमता भी काफ़ी घट जाती है, इसलिए महिलाएं कंप्रिहेंसिव डायग्‍नॉस्टिक चेकअप के अलावा समय-समय पर इम्‍यूनिटी टेस्‍ट करा सकती हैं.
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  • चूंकि हम जीवन के स्‍वर्णिम वर्षों में प्रवेश कर चुके होते हैं, इसलिए महिलाओं को चाहिए कि वो पॉजिटिव एजिंग पर ध्‍यान दें. इसका अर्थ है कि हमारी संज्ञानात्‍मक एवं शारीरिक क्षमता घटने के बावजूद, हमें अधिक आनंदायक, चिंतामुक्‍त एवं संवादपूर्ण जीवनशैली अपनानी चाहिए और साथ ही सालभर या छह महीने पर हेल्थ चेकआlप कराते रहना चाहिए.
    स्‍वयं को स्‍वस्‍थ रखना बहुत कठिन काम नहीं है, लेकिन इसके लिए थोड़ी कोशिश और सतर्कता आवश्‍यक है. उम्र और जीवनशैली संबंधी कारकों के अनुसार समय से जांच कराने से आपको अपने स्‍वास्‍थ्‍य की स्थिति को जानने में मदद मिल सकती है और संभावित समस्‍याओं की शीघ्र पहचान हो सकती है, जिससे कि उनका आसानीपूर्वक उपचार भी संभव होता है. हर उम्र की महिलाओं को चाहिए कि वो खानपान की आदतों, एलर्जी, एनिमिया, विटामिन डी, विटामिन बी 12, कैल्शियम और सोडियम लेवल को नियंत्रित रखें, क्‍योंकि सामान्‍यतौर पर महिलाओं में इसकी कमी देखी जाती है.
    अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस 2021 के मद्देनज़र महिलाओं के लिए यह उपयुक्‍त समय है कि वो समय-समय पर स्‍वास्‍थ्‍य की देखभाल और डायग्‍नॉस्टिक चेकअप के अधिकार की मांग करें. और याद रखें, हो सकता है कि निवारक स्‍वास्‍थ्‍य जांच से आपमें कोई बदलाव न हो, लेकिन यह आपकी उम्र बढ़ने के स्‍वरूप में ज़रूर बदलाव ला सकता है.
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यह भी पढ़ें: महिलाएं ऐसे दूर करें अपना तनाव, अपनाएं ये 10 आसान उपाय (10 Simple Ways To Relieve Stress Immediately)

पूरी दुनिया में ही नहीं, बल्कि हमारे देश में भी कैंसर तेज़ी से फैल रहा है. हालिया सर्वे के अनुसार भारत में हर साल 14.5 लाख कैंसर के मामले आ रहे हैं. क्या है कैंसर के इतनी तेज़ी से फैलने की वजह, कैंसर से सुरक्षित कैसे रहा जा सकता है और इसका इलाज कैसे संभव है, इस बारे में पूरी जानकारी जुटाने की कोशिश की है हमने.

 
क्यों बढ़ रहा है कैंसर?

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– केमिकल और टॉक्सिक एक्सपोज़र, लगातार रेडिएशन का प्रभाव, अनियमित लाइफस्टाइल, असंतुलित खान-पान, बढता मोटापा, पोल्यूशन, जेनेटिक कारण, तंबाकू और अल्कोहल का सेवन, आनुवांशिक कारण, इंफेक्शन, जागरूकता की कमी. इसके अलावा रेड मीट का ज़्यादा सेवन, इनएक्टिव लाइफस्टाइल,

इस तरह से देखा जाए तो हममें से हर कोई कैंसर के रिस्क ज़ोन में है, क्योंकि हम सब कैंसर बढाने वाले वातावरण में ही रह रहे हैं. इसलिए ज़रूरी है रोग होने से पहले ही एलर्ट हो जाएं, कुछ सावधानयां बरतें, कुछ बातों का ध्यान रखें.


बी अलर्ट

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स्ट्रेस से बचें: लंदन में हुए एक रिसर्च के अनुसार लंबे समय तक स्ट्रेस में रहने से शरीर एक तरह का केमिकल रिलीज़ करता है, जिससे कैंसर होने का ख़तरा बढ जाता है. इसलिए स्ट्रेस से बचें और ख़ुश रहने की कोशिश करें.

प्रदूषण से बचें: बढता प्रदूषण भी हमारे शरीर को बीमार बना रहा है, ख़ासकर हवा में तय मात्रा से ज़्यादा मौजूद कार्बन डाई ऑक्साइड, ओजोन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, लेड, सिगरेट-बीड़ी का धुआं हमारे शरीर में कैंसर का रिस्क बढानेवाले केमिकल पैदा कर रहा है. बेहतर होगा कि प्रदूषण से बचें. घर से बाहर निकलते व़क्त मुंह पर मास्क लगा लें. सिगरेट-बीड़ी पीनेवाले के संपर्क में ज़्यादा न रहें, क्योंकि सेकंडहैंड स्मोक ज़्यादा ख़तरनाक होता है.

तंबाकू का सेवन न करें: कैंसर के 40 प्रतिशत मामले तंबाकू सेवन से ही होते हैं. गला, मुंह और फेफड़े तीनों कैंसर की सबसे बड़ी वजह तंबाकू, पानमसाला, गुटका का सेवन है. स्मोकिंग भी इसकी एक बड़ी वजह है. इसलिए कैंसर से बचना है तो सबसे पहले गुटका, तंबाकू और स्मोकिंग से तौबा करें.

प्लास्टिक के इस्तेमाल से बचें: अमेरिका में हुए एक रिसर्च से पता चला है कि सभी तरह के प्लास्टिक एक समय के बाद केमिकल रिलीज़ करने लगते हैं, ख़ासकर बार-बार गरम होने के कारण ये केमिकल्स टूटने शुरू हो जाते हैं और हमारे खाने में मिक्स हो जाते हैं, जो धीरे-धीरे हमें बीमार बनाने लगते हैं. लंबे समय तक इनका इस्तेमाल कैंसर की वजह भी बन सकता है.

वज़न को रखें कंट्रोलः मोटापा कैंसर के रिस्क को बढा देता है.  शरीर में फैट बढने से फैट में मौजूद एंजाइम्स फीमेल हार्मोन एस्ट्रोजेन के स्तर को बढ जाता है, जिससे ब्लड कैंसर, प्रोस्टेट, ब्रेस्ट और सर्विक्स कैंसर होने का ख़तरा बढ जाता है. जो लोग जंक फूड, नॉन वेज, डिब्बाबंद फूड ज़्यादा खाते हैं. उनको ये ख़तरा और भी बढ जाता है. इसलिए कैंसर से बचना चाहते हैं तो वज़न पर काबू रखें.

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अल्कोहल से करें तौबाः ज़्यादा अल्कोहल पीने से मुंह, गले और लिवर का कैंसर होने का ख़तरा बढ जाता है. कैंसर से बचना चाहते हैं तो शराब से तौबा करें.

इंफेक्शन से बचें: हेपेटाइटिस बी, सी और एचपीवी जैसे इंफेक्शन भी कैंसर के रिस्क को बढाते हैं. हेपेटाइटिस सी से लिवर का कैंसर होने  का ख़तरा होता है, जबकि एचपीवी से महिलाओं को सर्वाइकल और पुरुषों को मुंह का कैंसर हो सकता है.

एक्सरे, स्कैन से बचें: एक्सरे, अल्ट्रा साउंट, सीटी स्कैन आदि से निकलनेवाली रेडियोएक्टिव किरणें हमारे शरीर में सेल्स की केमिकल गतिविधियां बढा देती हैं, जिससे स्किन कैंसर का रिस्क बढ जाता है. इसलिए बहुत ज़रूरी हो तभी ये टेस्ट्स कराएं. अगर आप बहुत बार  एक्सरे, अल्ट्रा साउंट, सीटी स्कैन करवा चुकी हों, तो डॉक्टर को इस बारे में ज़रूर बताएं, ताकि वो बहुत ज़रूरी होने पर ही ये टेस्ट्स कराएं.

फैमिली हिस्ट्री हो तो सतर्क रहें: अगर आपके परिवार यानी पैरेंट्स, ग्रैंड पैरेंट्स में से किसी को कैंसर है, तो आपको कैंसर होने का ख़तरा 10 प्रतिशत बढ जाता है. ब्रेस्ट, ओवेरियन, प्रोस्टेट जैसे कुछ कैंसर परिवार से अगली पीढी को आ सकते हैं, लेकिन सतर्क रहकर इस रिस्क को कम किया जा सकता है. बेहतर लाइफस्टाइल अपनाएं, हेल्दी डायट लें और अपने हेल्थ पर रेग्युलर नज़र रखकर आप कैंसर से बच सकते हैं.

 

कैंसर के लक्षणों को पहचानें

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कैंसर के लक्षण या तो शुरुआत में नज़र नहीं आते या फिर ये लक्षण इतने आम से होते हैं कि इसे हम नॉर्मल मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं और जब तक हम इन लक्षणों को गंभीरता से लेते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. इसलिए बेहतर होगा कि छोटी सी छोटी हेल्थ प्रॉब्लम और शरीर में आए बदलाव को अनदेखा न करें.

अचानक अकारण वज़न घटनाः अगर अचानक बिना किसी वजह के वज़न कम होने लगे, तो तुरंत डॉक्टर से चेकअप करवाएं. ये कैंसर का संकेत हो सकता है.

गांठ महसूस होनाः अगर शरीर में कहीं भी गांठ जैसा महसूस हो, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें. हालांकि हर गांठ कैंसर का लक्षण नहीं होता, फिर भी डॉक्टर को ज़रूर दिखाएं.

कफ के साथ खून आनाः वैसे ये ब्रोंकाइटिस या साइनस का लक्षण होते हैं, लेकिन यह फेफड़े, सर और गले के कैंसर का संकेत भी हो सकता है. अगर एक महीने से ज़्यादा आपको कफ की शिकायत हो और कफ के साथ ब्लड भी आता हो, तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं.

पेट की समस्याः पेट में किसी भी तरह की गड़बड़ी को आमतौर पर खानपान से संबंधित अनियमितता समझकर हम नज़रअंदाज़ कर देते हैें. लेकिन पेंसिल जितना पतला स्टूल कोलोन कैंसर का संकेत हो सकता है, बार-बार डायरिया भी कैंसर का लक्षण हो सकता है. इसी तरह अगर स्टूल पास करने के बाद भी हमेशा कब्ज़ जैसा महसूस हो, तो भी डॉक्टरी जांच की ज़रूरत है. इसके अलावा स्टूल से ब्लड आए तो भी फौरन जांच करवाएं.

एनीमियाः लगातार एनीमिया की शिकायत हो तो कैंसर का रिस्क हो सकता है. ऐसे में डॉक्टरी जांच ज़रूरी है.

ब्रेस्ट में गांठ या असामान्य डिस्चार्जः ज़रूरी नहीं कि ब्रेस्ट की हर गांठ कैंसर ही हो, कई बार सामान्य गांठ या फायब्रॉइड होती है. लेकिन फिर भी इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए. इसी तरह ब्रेस्ट से असामान्य डिस्चार्ज को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए.

टेस्टिकल में गांठः कैंसर पीड़ित 90 % पुरुषों को टेस्टिकल में पेनलेस गांठ होती है या उनके टेस्टिकल्स बड़े हो जाते हैं या उन्हें वहां न्फेक्शन हो जाता है. इसलिए ज़रूरी है कि किसी तरह का रिस्क न लें और समय-समय पर पुरुष अपने टेस्टिकल का सेल्फ एक्ज़ामिनेशन करते रहें. इसी तरह बार-बार पेशाब आना या कम पेशाब होना- इन लक्षणों को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए. ये प्रोस्टेट, ब्लैडर या पेल्विक ट्यूमर के लक्षण हो सकते हैं.

अन्य लक्षण

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– इसी तरह यूरिन में ब्लड आए तो भी फौरन जांच करानी चाहिए.
– शरीर के किसी भी हिस्से में गांठ हो तो फौरन पूरी जांच कराएं.
– मल्टीकलर मोल, जिनसे ब्लीडिंग हो या जिनका आकार अनियमित हो, कैंसर का संकेत हो सकते हैं. इसी तरह बड़े मोल, जिनकी साइज़ बड़ी हो रही है, को भी गंभीरता से लें.
– असामान्य वेजाइनल ब्लीडिंग, लंबे समय तक बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग या पोस्ट मेनोपॉज़ ब्लीडिंग भी कैंसर के रिस्क का संकेत हो सकते हैं.
– अचानक वज़न कम होना, रात में अक्सर पसीना आना या हमेशा बुखार-सा महसूस होना भी कैंसर का लक्षण हो सकता है.
– इसी तरह बैक पेन. पेल्विक पेन और डायजेशन की प्रॉब्लम्स हमेशा ही रहती हो, तो जांच अवश्य कराएं.

 

बीमारी का पता कैसे लगाएं

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रेग्युलर टेस्ट कराएं: 20-30 की उम्र में महिलाएं ब्रेस्ट का सेल्फ एक्ज़ामिनेशन करें. 30-40 की उम्र की महिलाएं डॉक्टर से जांच कराएं. ब्रेस्ट कैंसर की फैमिली हिस्ट्री हो ज़्यादा सतर्क रहें और डॉक्टर से कंसल्ट करके मैमोग्राफी कराएं. अगर गुटखा-तंबाकू खाते हैं तो ईएनटी से रेग्युलर चेकअप कराते रहें.

जागरूक बनें, सतर्क रहें: किसी भी हेल्थ प्रॉब्लम को छोटा समझने की भूल न करें. अगर शरीर में कहीं कोई गांठ या फोड़ा है जो तीन हफ्ते से ठीक नहीं हो रहा, अचानक वेटलॉस हो, बार-बार बुखार आए, ब्लीडिंग हो, लगातार एनीमिया की शिकायत हो या शरीर में कोई और असामान्यता दिखाई दे, तो फौरन डॉक्टर से मिलकर जांच कराएं. ज़रूरी नहीं कि ये कैंसर के लक्षण हों, लेकिन जांच कराकर एक बार तसल्ली कर लें.

फेफड़े के कैंसर के लिए सीटी स्कैनः अगर आप कई सालों से स्मोकिंग कर रहे हैं, तो आप रिस्क ज़ोन में हैं और फेफड़ों का सीटी स्कैन करा लेना चाहिए. अगर आप रिस्क ज़ोन में नहीं हैं, तो भी 40 की उम्र के बाद एक बार सीटी स्कैन ज़रूर करवा लें.

ब्रेस्ट टेस्ट भी करें: वैसे तो सभी महिलाओं को ब्रेस्ट सेल्फ एक्ज़ामिनेशन करते रहना चाहिए. लेकिन अगर आपकी फैमिली में किसी को ब्रेस्ट कैंसर हो, तो आपको ज़्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है. आपको ब्रेस्ट कैंसर जीन टेस्ट ब्रेका करा लेना चाहिए. इस टेस्ट से ये पता लग जाता है कि आपको भविष्य में कैंसर होने का रिस्क कितना है. ये टेस्ट किसी भी उम्र में कराया जा सकता है और  ज़िंदगी में एक ही बार कराना होता है. अगर टेस्ट में गड़बड़ी आती भी है, तो लाइफस्टाइल में सुधार कर आप कैंसर से बच सकती हैं.

प्रोस्टेट की जांच भी है ज़रूरीः 50 की उम्र के पुरुषों को पीएसए टेस्ट करा लेना चाहिए. अगर परिवार में किसी को प्रोस्टेट कैंसर हुआ हो, तो ये टेस्ट 40 की उम्र में ही करा लेना बेहतर होता है, ताकि किसी तरह का रिस्क न हो और समय रहते इलाज किया जा सके. इसके अलावा प्रोस्टेट का सेल्फ एक्ज़ामिनेशन भी करते रहना चाहिए.

– इसके अलावा ब्लड कैंसर, मल्टीपल मायलोमा और अन्य कैंसर के लिए डॉक्टर्स ब्लड टेस्ट की भी सलाह देते हैं.

– बायोप्सी, एमआरआई, मैमोग्राफी, पैप स्मीयर टेस्ट जैसे कई टेस्ट हैं, जो कैंसर के लिए ज़रूरी हैं.

बेहतर यही होगा कि बीमारी होने के बाद नहीं, उसके होने से पहले ही सतर्क हो जाएं. डॉक्टर से मिलें, किसी भी तकलीफ को छोटा समझकर उसे नज़रअंदाज़ करने की गलती न करें. रेग्युलर टेस्ट्स कराएं, ताकि आप कैंसर जैसी बीमारी से दूर रहें.




कोरोना वायरस से लड़ने के लिए भारत ने वैक्सीन लगाने की मुहिम शुरू तो कर दी है, पर अब भी कई पहलुओं पर ध्यान देना है. तकनीक बातों के अलावा वैक्सीन को लेकर अफ़वाह और भ्रम से संभलना होगा. इसलिए बड़े पैमाने पर टीका देने हेतु तकनीक के उपयोग करने में भारत की ताकत और अनुभव का लाभ उठाते हुए सरकार ने अपने टीकाकरण अभियान पर हर समय निगरानी रखने के लिए कोविड वैक्सीन इंटेलिजेंस नेटवर्क (को-विन) बनाया और इसे लॉन्च किया.
हर किसी को टीका देने के लिए यह डिजिटल प्लेटफॉर्म एक आधार बनाता है. को-विन ऐप को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि अनूठे डिजिटल प्लेटफॉर्म को डिज़ाइन करते समय विशिष्टता, गति और प्रसार को ध्यान में रखा गया है, जिसके साथ ही यह बहुत ज़्यादा और अनावश्यक निर्भरता के बिना पोर्टेबल, सिक्रोनस होगा. जैसा कि टीकाकरण शुरू हो गई है और यह पाया गया कि डिजिटल सिस्टम में कुछ गड़बड़ियां हैं और इस पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत है.
मज़बूत वैक्सीन वितरण इकोसिस्टम बनाने हेतु सभी हितधारकों के बीच एकजुट सहयोग के लिए सरकार द्वारा डिज़ाइन और विकसित किए गए, को-विन ऐप में हाल ही में कुछ गड़बड़ी हुई. भारत में 1.3 अरब लोगों को वैक्सीन देना एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम है. इसकी सफलता काफ़ी हद तक लोगों की सक्रिय भागीदारी और कई हितधारकों के जुड़ने पर निर्भर होगी. दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू करने से पहले सरकार को एहसास था कि इसे सफल बनाने के लिए तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.
शुरुआत में यह पाया गया कि सरकार ने पहले कुछ दिनों में टीकाकरण के लिए पंजीकरण करनेवाले लोगों को शामिल नहीं किया था, बल्कि उन्हें प्रकट भी नहीं किया था. अनुपस्थित लोगों के प्रबंधन के लिए प्रावधान की कमी से संबंधित तकनीकी गड़बड़ियां सामने आईं. अनुपस्थित लोगों की जगह लेने हेतु किसी अन्य व्यक्ति को जोड़ने के लिए एक डिजिटल पंजीकरण सिस्टम बनाने की ज़रूरत थी. अनुपस्थित लोगों को कवर करने के लिए सूची को रियल टाइम में अपडेट और प्रमाणित करने की ज़रूरत है. अब आधार के माध्यम से रियल टाइम प्रमाणीकरण भी इस सुविधा के लिए पेश किया जा रहा है.

Covid Vaccination

इसके बारे में एपीएसी रीजन- डे टूडे हेल्थ के प्रेसिडेंट राजीव मिश्रा का कहना है कि वैक्सीन के निर्माण की लोकेशन से लेकर नागरिकों के टीकाकरण तक वैक्सीन की खुराक की ट्रैकिंग और ट्रेसेबिलिटी दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान को सफल बनाने के लिए ज़रूरी है. इस प्रोग्राम की लाइव ट्रैकिंग होने चाहिए और हर कदम पर इस पर निगरानी रखी जानी चाहिए. पहले दिन से लेकर 21वें दिन के अगले राउंड तक ट्रैकिंग, डेटा प्रबन्धन, एनालिटिक्स के लिए बहुत ज़रूरी है. यह किसी भी तरह की खामियों से बचने के लिए भी महत्वपूर्ण है. इसके अलावा सुरक्षा और गुणवत्ता का सुनिश्चित करने तथा कालाबाज़ारी और भ्रष्टाचारी को रोकने के लिए भी ट्रैकिंग और ट्रेसिंग ज़रूरी है. हालांकि सरकार सही दिशा में प्रयास कर रही है. प्रभावी और अनुकूल परिस्थितियों के लिए मज़बूत आर्टीफिशियल इंटेलीजेन्स और मशीन लर्निंग सिस्टम को मज़बूत बनाना आवश्यकत है. पैमाना बढ़ाने के लिए सरकार को अपनी प्रभाविता के लिए थर्ड पार्टी सेवा प्रदाताओं पर ध्यान देना चाहिए और ऐसे उत्पाद के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए, जो अपना प्रयोजन पूरा करने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को उत्कृष्ट अनुभव प्रदान करे.‘’
को-विन प्लेटफॉर्म निश्चित तौर पर इलेक्ट्रॉनिक वैक्सीन इंटेलिजेंस नेटवर्क (eVIN) का विस्तार है. यह नेटवर्क वैक्सीन स्टॉक को डिजिटाइज़ करता है और स्मार्टफोन एप्लिकेशन के माध्यम से कोल्ड चेन के तापमान पर नज़र रखता है. साल 2012 में इसकी शुरुआत की गई थी, तब कोल्ड चेन पॉइंट्स पर कुशल वैक्सीन लॉजिस्टिक्स प्रबंधन का समर्थन करने के लिए बारह राज्यों में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया गया था. इनोवेटिव नेटवर्क भारत के यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम का समर्थन करता है और देशभर में सभी कोल्ड चेन पॉइंट्स पर वैक्सीन स्टोरेज, स्टॉक और फ्लो और स्टोरेज के तापमान पर रियल टाइम डेटा प्रदान करता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, टीकाकरण करवानेवाले व्यक्ति की स्पष्ट रूप से पहचान करना और यह सुनिश्चित करना बहुत महत्वपूर्ण है कि किसे, किसने, कब और कौन-सा टीका लगाया. पहले चरण में, निर्धारित किए गए प्राथमिकतावाले समूह- स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों (70 लाख) और फ्रंटलाइन वर्कर्स (2.1 करोड़) को टीका लगाया जाएगा. 21 अगस्त तक केवल पहले चरण में ही 30 करोड़ लोगों को टीका लगाया जाएगा, जिसमें 50 वर्ष से ज़्यादा उम्रवाले लोग (26 करोड़) और किसी अन्य बीमारीवाले अन्य लोग (1.2 करोड़) शामिल होंगे. कुल मिलाकर दो साल में सभी वयस्क आबादी (60%) को कवर करना इसका लक्ष्य है.

Covid Vaccination

दो साल की लंबी टीकाकरण मुहिम की सफलता के लिए भारत को न केवल ट्रैकिंग उद्देश्यों के लिए, बल्कि लाभार्थियों को प्राथमिकता देने, लक्षित इलाकों की पहचान करने, अनुपस्थित लोगों का प्रबंधन करने, और लक्षित सेगमेंट में पूरे टीका वितरण सिस्टम को बेहतर बनाने हेतु एक योजना बनाने और पूर्वानुमान लगाने के एनालिटिक्स के लिए भी एक मज़बूत एनालिटिक्स इंजन में निवेश करना होगा.
स्वास्थ्य पेशेवरों और फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं सहित आम जनता वैक्सीन लगवाने के लिए भयभीत हैं. इस डर का मुख्य कारण यह है कि भारतीय नियामक ने कैंडिडेट्स आपातकालीन उपयोग के लिए दो वैक्सीन उम्मीदवारों कोविशिल्ड (Covidshield) और कोवैक्सीन (Covexin) को मंज़ूरी दे दी है. इसका तीसरा चरण परीक्षण डेटा अभी भी सार्वजनिक नहीं किया गया है, इसलिए लोग इसकी प्रभावकारिता पर असंबद्ध हैं. टीके को विकसित होने में लम्बा समय लग जाता है और इसमें एक दशक भी लगता है. मानव पैपिलोमावायरस (सर्वाइकल कैंसर के लिए) और रोटावायरस के लिए 25 साल (गैस्ट्रोएंटेरिटिस के ख़िलाफ) के लिए एक टीका विकसित करने में 26 साल लग गए. पिछले 40 वर्षों में पैंतीस मिलियन लोगों की एड्स से मृत्यु हो गई है. 1987 से 30 वैक्सीन उम्मीदवारों का मानव नैदानिक परीक्षणों में परीक्षण किया गया है, लेकिन किसी भी उम्मीदवार ने तीसरे चरण के परीक्षण को आज तक मंज़ूरी नहीं दी है. भारी निवेश के बावजूद मलेरिया और SARS और MERS जैसे अन्य कोरोनविरस के लिए कोई टीका नहीं है.
सरकार टीकाकरण (AEFI) के बाद प्रतिकूल घटना के ख़िलाफ जांच पर स्पष्ट रुख के साथ नहीं आई है, इसलिए टीकाकरण के प्रभावों पर आम जनता को संदेह और डर है. हालांकि वे मामूली प्रभावों या दुष्प्रभावों के बारे में जानते हैं, जो किसी भी टीकाकरण के साथ आते हैं. जहां पहले काफ़ी लोग टीका लगाने से हिचक रहे थे, अब बड़ी तादाद में लोग आगे आकर लगवा रहे हैं.

ऊषा गुप्ता

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