Health Update

आपका फिटनेस लक्ष्य जो भी हो, आप इसे आयुर्वेद तरीक़े से प्राप्त कर सकते हैं. सुनने में अच्छा लग रहा है? निश्चित रूप से, यह हो सकता है. करोना के कारण महामारी से उपजी शहरी जीवनशैली संबंधी बीमारियों ने हमें आयुर्वेद के लिए प्रेरित किया ही है. आयुर्वेद के गुणों व लाभों का उपयोग हम ख़ुद को सेहतमंद और चुस्त-दुरुस्त रखने में कर सकते हैं.
आयुर्वेद की प्राचीन स्वास्थ्य प्रणाली जीवन, दीर्घायु और आपके समग्र कल्याण पर केंद्रित है- यह शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक हो. आत्म-चिकित्सा के विज्ञान के रूप में, आयुर्वेद विभिन्न आहार, जीवनशैली, मालिश और औषधीय जड़ी-बूटियों को शामिल करता है, जो आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करते हैं. इस सन्दर्भ में डॉ. दीपेश महेंद्र वाघमारे, जो मिलेनियम हर्बल केयर के चिकित्सा सलाहकार कार्यकारी हैं, ने कई उपयोगी बातें बताई. जानते हैं कि आयुर्वेद फिट रहने में कैसे मदद करता है.

आपको ऊर्जावान बनाए रखता है…
क्या आप दिनभर के काम के बाद सुस्त महसूस करते हैं? क्या आपको सुबह उठने और जिम की क्लास या अपने योग सत्रों को पूरा करने के लिए उत्साह की कमी महसूस होती है? ऐसी स्तिथि में कॉफी या स्टेरॉयड इसका समाधान नहीं है. आपके शरीर को सुस्ती दूर करने के लिए आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की आवश्यकता होती है. अश्वगंधा, ब्राह्मी और तुलसी जैसी जड़ी-बूटियां आपके शरीर के शारीरिक और मानसिक तनाव में लचीलापन बढ़ाकर आपकी ऊर्जा बढ़ा सकती हैं. यह दिनभर अच्छा महसूस करने में भी मदद करती हैं. ऊर्जावान बने रहने के लिए इन जड़ी-बूटियों के गर्म काढ़े से अपने दिन की शुरुआत करें.

बेहतर शारीरिक क्षमता
अगर आप बहुत ज़्यादा एक्सरसाइज़ कर रहे हैं, तो आपके स्टैमिना भी तेजी से कम होता है. मनोवैज्ञानिक तनाव और शारीरिक गतिविधि को पारस्परिक रूप से संबंधित माना जाता है. ध्यान रहे कि स्टैमिना की कमी भी एक तनावग्रस्त दिमाग़ का परिणाम है. अश्वगंधा, ब्राह्मी और शतावरी जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां शक्ति को बढ़ाने और मांसपेशियों को ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ानेे में मदद करती हैं. यह आपको मानसिक रूप से भी आराम देती हैं.
अपने दैनिक आहार में धनिया के बीज, दालचीनी, जीरा और नट्स जैसे बादाम के साथ मसाले मिलाएं. सभी सही और पर्याप्त अनुपात में मिश्रित होते हैं, जो शरीर को ऊर्जावान बनाते हैं.

मेटाबॉलिज्म में वृद्धि
यदि आपके पास एक सेलुलर मेटाबॉलिज्म है, तो आपके फिटनेस के सबसे तेज़ परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं. गुडूची (टीनोस्पोरा कॉर्डिफ़ोलिया) जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां आपके आंत-स्वास्थ्य को ठीक करने में मदद करती हैं. यह आंतों में अच्छी आंत माइक्रोबायोम को बढ़ाती है, जो एक लघु-श्रृंखला फैटी एसिड का उत्पादन करती है और शरीर में वसा के भंडार को विनियमित करने में मदद करती है. सामान्य सीमा के भीतर रक्त शर्करा के स्तर को बनाए रखने में सहायता करती है.
दालचीनी जैसे मसाले आपके शरीर में वसा कोशिकाओं के निर्माण को रोकने में मदद कर सकते हैं, जबकि हल्दी या हल्दी में मौजूद करक्यूमिन वसा कोशिकाओं को प्रभावी ढंग से जलाने और शरीर के मेटाबॉलिज्म को बढ़ाने में मदद करता है.
अपने नियमित आहार में काली मिर्च को शामिल करने से आपके मेटाबॉलिज्म को इसके थर्मोजेनिक प्रभाव होते हैं. एक ग्लास जीरे के पानी के साथ लेनेे सेे मदद मिल सकती है. एक ग्लास पानी में एक चम्मच जीरा उबालें. इसे सुबह लेना अधिक फायदेमंद है.

स्वस्थ शरीर
प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने ‘Balaardh’ की अवधारणा की वकालत की. इसका मतलब है कि किसी भी तरह के कठोर अभ्यास के लिए शरीर की पूरी शक्ति का केवल 50% भाग का उपयोग होता है. आधुनिक फिटनेस विशेषज्ञ भी जोरदार व्यायाम सत्रों के बीच 24 घंटे के आराम की सलाह देते हैं, ताकि शरीर को पूरी तरह से ठीक हो सके.
तिल के बीज के तेल के साथ एक अभ्यंग (आत्म-मालिश) जोड़ों, मांसपेशियों और ऊतकों में दर्द से राहत के लिए एक पारंपरिक प्रक्रिया है.
हल्दी और अदरक जैसी जड़ी-बूटियां सूजन को कम करने में मदद करती हैं.
अश्वगंधा और बाला मांसपेशियों को मज़बूत बनाने और पोषण करने में जादुई हैं.
प्रोटीन से भरपूर फलियों को शामिल करने से आपकी मांसपेशियां मज़बूत होती हैं.
बादाम, खजूर, केसर और घी आपको पर्याप्त रूप से फिर से जीवंत करते हैं. इससे कठिन और कठोर वर्कआउट सत्रों से तेजी से उबरने में मदद कर सकते हैं.

लचीलापन
फिटनेस में हड्डी और जोड़ों के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना होगा. क्रीक्स और दर्द कम उम्र से ही आपके गति में बाधा उत्पन्न करने लगते हैं, मुख्यतः अस्वस्थ जीवनशैली के कारण महिलाओं को तीस की उम्र से ही ध्यान रखना चाहिए. आयुर्वेद कई जड़ी-बूटियों की सलाह देता है, जो पारंपरिक रूप से हड्डी की ताकत, जोड़ों के लचीलेपन में सुधार और दर्द को कम करने के लिए उपयोग किए जाते हैं.
हडजोड, सलाई गुग्गुल, अश्वगंधा और बाला जैसी जड़ी-बूटियां हड्डी की कोशिका के होमियोस्टेसिस को बहाल करने, हड्डी में सुधार और सूजन को कम करने में लाभदायक है.
दशमूल (10 जड़ी-बूटियों की जड़ें) तेल भी जोड़ों और मांसपेशियों की कठोरता को कम करने में सहायक है. इससे लचीलेपन में भी सुधार होता है.

अच्छी नींद
अच्छी नींद हमेशा ही शरीर के लिए महत्वपूर्ण है. जब आपका शरीर ख़ुद को ठीक करने और उसकी मरम्मत करने में सक्षम हो, तो आपकी फिटनेस व्यवस्था को अच्छी नींद के साथ संतुलित करना चाहिए, ताकि आप अगले दिन एक बार फिर से मैट हिट करने के लिए दौड़ें.
ब्राह्मी, शंखपुष्पी, सर्पगंधा, वचा और अश्वगंधा ऐसी आवश्यक जड़ी-बूटियां हैं, जो आपके नर्वस सिस्टम को आराम देती हैं, मानसिक थकान से राहत दिलाती हैं और आपके दिमाग़ पर शांत प्रभाव डालती हैं. आयुर्वेद स्वास्थ्य की अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए एक प्राचीन लेकिन अत्यंत प्रासंगिक प्रणाली है, सही लक्ष्य निर्धारित करें और सभी फिट रहें.

– ऊषा गुप्ता

यह भी पढ़ें: पुरुष बांझपन के कारण और उन्हें कैसे दूर किया जाए? (Male Infertility- Symptoms, Causes And Treatment)

आयरन की कमी से होनेवाला एनीमिया दुनियाभर में ख़तरनाक रूप से चिंता का विषय बनता जा रहा है. आमतौर पर ज्यादातर बीमारियों की जड़ें भोजन की मात्रा या उनमें आवश्यक पोषक तत्वों की कमी से जुड़ी होती हैं. विकासशील दुनिया में खानपान में अनियमितता काफ़ी देखने को मिलती है. इस संबंध में भारत में 52 फीसदी गर्भवती महिलाएं आयरन की कमी से पीड़ित हैं. यह संख्या भारत जैसे देश के लिए बहुत ज्यादा है.

आयरन की कमी और एनीमिया पर कई गायनाकोलॉजिस्‍ट, ऑब्‍सटेट्रिशियन, इंफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉक्टरों ने महत्वपूर्ण जानकारियां दीं.
डॉ. शिल्पी सूद का कहना है कि जितनी बड़ी संख्या में आयरन की कमी से जूझ रही गर्भवती महिलाएं मेरे पास इलाज के लिए आती हैं, यह वाकई अफ़सोसजनक है. लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि इस संख्या में पिछले दो दशकों से कोई भी सुधार नहीं हुआ है. अब समय आ गया है, जब बड़े पैमाने पर फैलते जा रहे इस मुद्दे के समाधान के लिए एक निर्णायक जन स्वास्थ्य नीति बनाई जाए. कई दशकों से सरकारें इस संबंध में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए कई अभियान चलाने और इस समस्या पर शुरुआत से ही लगाम लगाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन अभी तक इस दिशा में पर्याप्त सफलता नहीं मिल पाई है. जब हम आयरन की कमी से निपटने के नज़रिए की जांच करें, तो इस कार्यक्रम के मुख्य केंद्रबिंदुओं में से एक लक्षणों की जल्दी पहचान होना चाहिए. आयरन की कमी के लक्षणों को पहचानना अक्सर काफ़ी मुश्किल होता है, क्योंकि यह दूसरी बीमारियों के भेष में छिपकर सामने आ सकता है. आयरन की कमी से होनेवाली बीमारी सामान्य रोग के लक्षणों में मिल सकती है.

थकान और भूख ना लगना…
डॉ. राजुल त्यागी का भी मानना है कि शरीर में लौह तत्व की कमी आमतौर पर सबसे अधिक देखे जानेवाला लक्षण बहुत ज़्यादा थकान होना और कमज़ोरी है. मरीज़ों को अक्सर यह शिकायत रहती है कि लंबे समय से रहनेवाली थकान की वजह से उन्हें नियमित दिनचर्या का पालन करने में भी परेशानी होती है. हालांकि लोग इसे सहज रूप से गर्भावस्था से जोड़ देते हैं. इसे अक्सर एनीमिया का लक्षण माना जाता है.
थकान के अलावा एनीमिया से पीड़ित गर्भवती महिलाओं की त्वचा का रंग पीला हो जाता है.
वह अक्सर सीने में दर्द या सांस लेने में तकलीफ़ होने की शिकायत करती हैं.
इसके अलावा पुराना सिरदर्द, चक्कर आना और बेहोशी आना है.
मरीज़ को महसूस हो सकता है कि उसके सिर में पर्याप्त रक्त का प्रवाह नहीं हो रहा है.
जब ये सभी लक्षण एक समूह में पाए जाते हैं, तो सबसे पहला कदम मरीज़ का हीमोग्लोबिन लेवल चेक करने के लिए हीमोग्लोबिन (एचबी) टेस्ट करना होता है. जब एनीमिया के अन्य बीमारियों के लक्षणों से मिलने की पुष्टि होती है, तो एनीमिया की जांच अलग से की जा सकती है. हमने यह भी पाया है कि सूजन, जीभ में दर्द और नाजुक होकर नाख़ूनों का टूटना भी आयरन की कमी से होनेवाले एनीमिया रोग के लक्षण है.
थकान के साथ एनीमिया का दूसरा लक्षण, जो आमतौर पर सभी मरीज़ों में पाया जाता है, वह है उनकी भूख में कमी.

डॉ. माधुरी पटेल के अनुसार, आयरन की कमी से जूझ रहे मरीज़ों में यह देखा गया है कि उनकी भूख काफ़ी कम हो जाती है. यह काफ़ी ख़तरनाक संकेत है. इस स्थिति से निपटने के लिए हमें तुरंत कदम उठाने चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन मरीज़ों में आयरन की कमी हो जाती है, उनका हीमोग्लोबिन लेवल बढ़ाने में हम मदद करते हैं. इसके लिए ज़रूरी है कि वह पौष्टिक भोजन करें, क्योंकि उन्हें कुछ निश्चित मात्रा में ही सप्लिमेंट्स दिए जा सकते हैं. लेकिन यहां यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब गर्भवती महिलाओं को भूख कम लगती है, तो वे पर्याप्त मात्रा में आवश्यकतानुसार पौष्टिक भोजन नहीं कर पातीं, जो आयरन की कमी को दूर करने के लिए ज़रूरी है. तब यह और गंभीर चिंता का विषय बन जाता है कि गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी का उनके भ्रूण में पल रहे शिशु पर हानिकारक प्रभाव हो सकता है. सबसे ख़राब स्थिति यह भी हो सकती है कि नवजात शिशु भी एनीमिया से पीड़ित हो.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्‍लूएचओ) ने हीमोग्‍लोबिन के स्‍वस्‍थ स्‍तर के लिए बेंचमार्क के तौर पर 12 ग्राम रहने की अनुशंसा की है.

एहतियात व उपाय…
डॉ. मीना सामंत का मानना है कि जब आयरन की कमी से निपटने की बात आती है, तो भारत को एक साथ कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. हालांकि इस संबंध में नीति निर्धारित करने के लिए पहला कदम यह होगा कि लोगों में हरी पत्तेदार सब्ज़ियों, चुकंदर और गाजर जैसे शरीर में ख़ून बनानेवाली लाल सब्ज़ियों से भरपूर संतुलित भोजन करने की ज़रूरत के संबंध में जागरूकता फैलाई जाए. यहां यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारत में उन मुद्दों से भी निपटना पड़ता है, जो ख़ासतौर पर यहीं पाए जाते हैं. इसका एक प्रमुख उदाहरण यह है कि हमें गर्भवती महिलाओं की आंतों को कीड़ों के संक्रमण से बचाने के लिए भी सक्रिय रहने की ज़रूरत है. यह भारत में आयरन की कमी का सामान्य कारण है. बड़े पैमाने पर पर्याप्त एहतियात व उपाय अपनाना ही आयरन की कमी को दूर करने का एकमात्र रास्ता है. जब कभी किसी को अपने शरीर में आयरन की कमी से जुड़ा कोई सामान्य लक्षण महसूस हो, तो ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर की सलाह लें, क्योंकि जल्दी जांच से हमेशा बेहतर इलाज का रास्ता खुलता है.

हालांकि यह स्थिति डरानेवाली प्रतीत होती है, लेकिन एनीमिया पर जीत हासिल करना संभव है. हमें मज़बूती से इस चुनौती का मुक़ाबला करना चाहिए. एनीमियामुक्त भारत बनाने की दिशा में महिलाओं को इस दिशा में पहला कदम उठाना याद रखना चाहिए. उन्हें अपना हीमोग्लोबिन टेस्ट कराना चाहिए और अपना हीमोग्लोबिन लेवल 12 ग्राम से ज़्यादा बरक़रार रखना चाहिए.

– ऊषा गुप्ता

यह भी पढ़ें: महिलाओं के स्‍वास्‍थ्‍य और तंदुरुस्ती से जुड़ी ज़रूरी बातें… (Important Information About Women’s Health And Fitness)

Iron Deficiency Anaemia

कोरोना की मौजूदा महामारी हमारे समय के सबसे बड़े स्वास्थ्य संकट में से एक है, जिसने इस वर्ष की शुरुआत से ही हमें शारीरिक और भावनात्मक रूप से काफ़ी प्रभावित किया. अपने ही घरों में बंद हो जाने जैसी स्थितियों ने हमारी नियमित गतिविधियों, जैसे- खानपान की आदतों, नींद, सोने-उठने के समय, जीवनशैली और अन्य शारीरिक कार्य प्रणाली को प्रभावित किया. कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन में महिलाओं में तनाव का स्तर भी अधिक रहा. इसी दर्द व तनाव के अत्याधिक बढ़ने पर स्त्रियों में हार्मोनल विकार पीसीओएस (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) की समस्या बढ़ने लगी. इसी संबंध में इंदिरा आईवीएफ की आईवीएफ और इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. क्षितिज़ मुर्डिया ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं.

पीसीओएस मातृत्व उम्र की स्त्रियों में आम समस्या है. महिलाओं में यह स्थिति पुरुष हार्मोन (एंड्रोजन) के उत्पादन स्तर को बढ़ाकर हार्मोनल संतुलन को बाधित करती है, जो पीरियड्स में देरी या अनियमितता का कारण बनता है. वैसे भी इस अभूतपूर्व प्रभाव में तनाव का जुड़ जाना, महिलाओं के बीच पहले से मौजूद या ऐसी नई स्थितियों को पैदा कर सकता है, जो भविष्य में प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है.
यह अपरिपक्व अंडे के साथ पीसीओएस फॉलिकल्स का कारण बनता है, जो सिस्ट बनाते हैं. वे अंडाशय के अंदर बढ़ने लगते हैं और परिपक्व नहीं होते हैं. परिपक्व अंडे का उत्पादन करने में विफलता ओव्यूलेशन पर असर डालते हुए बांझपन जैसी समस्याओं को जन्म दे सकती है.

हालांकि पीसीओएस के लिए कोई विशेष कारण नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से डॉक्टरों ने इसके लिए मुख्य रूप से कुछ कारण बताए हैं.

पारिवारिक इतिहास
अगर परिवार के किसी सदस्य में पीसीओएस की समस्या है, तो इसकी संभावना ५० प्रतिशत बढ़ जाती है.

इंसुलिन प्रतिरोध
पीसीओएस से पीड़ित ८० प्रतिशत महिलाओं में इंसुलिन प्रतिरोध आम है. शरीर शर्करा को तोड़ने के लिए अतिरिक्त इंसुलिन का उत्पादन करता है, जिसके परिणामस्वरूप टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ जाता है, जो फॉलिकल्स के विकास को बाधित करता है.

जीवनशैली
पीसीओएस को अक्सर व्यक्ति की जीवनशैली के लिए भी ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. ज़रूरत से ज़्यादा मोटापा और बॉडी मास इंडेक्स इंसुलिन प्रतिरोध और हार्मोनल असंतुलन को जन्म देता है.

इन कारणों को ध्यान में रखते हुए यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय करना चाहिए कि पीसीओएस उनसे दूर ही रहें. यदि किसी को भी इस तरह के लक्षण दिखें, तो डॉक्टरी सलाह ज़रूर लें.

लक्षण
• पीरियड्स की समस्याएं, जैसे- अनियमित मासिक चक्र, असामान्य रक्तस्राव या मासिक धर्म के दौरान स्पॉटिंग या पीरियड्स न होना
• गंजापन, बालों का पतला होना या शरीर के अन्य भागों पर बालों के सामान्य विकास की तुलना में सिर के बालों का झड़ना
• अधिक गर्भपात होना
• अवसाद का अनुभव करना
• डार्क स्किन पैच
• मनोदशा में बदलाव और गर्भधारण में समस्या
• अन्य स्वास्थ्य समस्याएं, जैसे- उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल के स्तर में वृद्धि.

चूंकि पीसीओएस प्रजनन क्षमता में बाधा डालता है, इसलिए पीसीओएस के साथ कई महिलाएं गर्भवती होने के दौरान चुनौतियों का सामना करती हैं. लेकिन जीवनशैली में उचित बदलाव, इलाज या आईवीएफ विकल्प के साथ गर्भधारण करना संभव है.

उपचार
मासिक धर्म चक्र की निगरानी करना और ओव्यूलेशन पैटर्न पर नज़र रखना…
शरीर के बुनियादी तापमान की निगरानी के दौरान एक परीक्षण किट के साथ ओव्यूलेशन को ट्रैक करने के लिए चार्ट बनाए.
यदि कोई अनियमितता देखी जाती है, तो इससे ओव्यूलेशन की संभावना कम हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप गर्भधारण की संभावना कम होती है. इस ट्रैकिंग को कम-से-कम छह महीने तक करने की आवश्यकता है, ताकि डॉक्टर सही इलाज के लिए सलाह दे सके.

एक उपयुक्त बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) बनाए रखें…
इसमें मोटापा एक प्रमुख चिंता का विषय है. इसके लिए संतुलित भोजन और एक्सरसाइज़ बेहद ज़रूरी है. एक स्वस्थ जीवनशैली बाधित हार्मोन को संतुलित करने में मदद करेगा और स्वस्थ गर्भावस्था के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा. नियमित व्यायाम से शरीर को विटामिन डी का स्तर प्राप्त करने में भी मदद मिलेगी.

स्वस्थ रहने के लिए स्वस्थ खाएं…
पौष्टिक संतुलित भोजन शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है. पीसीओएस शरीर में इंसुलिन को प्रभावित करता है, इसलिए यह ज़रूरी है कि फाइबर और प्रोटीन से भरपूर उचित आहार लें. शरीर में कम क्रोमियम और मैग्नीशियम का स्तर बांझपन का कारण बन सकता है, इसलिए इन दोनों महत्वपूर्ण खनिजों का सेवन सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है. शरीर में हार्मोन के स्तर को बनाए रखने के लिए शक्कर और प्रोसेस किए गए खाद्य पदार्थों के सेवन से दूर रहें.

इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ)
चूंकि पीसीओएस से शरीर में अंडा कोशिकाओं और ओव्यूलेशन के उत्पादन पर असर पड़ता है, इसलिए यह गर्भवती होने में मुश्किलें पैदा कर सकता है. यदि दवा से स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो डॉक्टर गर्भधारण के लिए आईवीएफ जैसे वैकल्पिक तरीक़ों की सलाह देते हैं.

गर्भाधान पश्चात देखभाल
गर्भाधान के पूर्व और बाद में देखभाल के स्तर को समान बनाए रखना आवश्यक है, क्योंकि पीसीओएस गर्भपात की संभावना को बढ़ा सकता है. ऐसे में डॉक्टरों की सलाह द्वारा एक स्वस्थ गर्भावस्था और प्रसव सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित दवाओं को गर्भाधान के बाद जारी रखना चाहिए.
सितंबर के महीने को पीसीओएस जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता रहा है. भारत में से लगभग हर पांच में चार यानी 20 फ़ीसदी महिलाएं इस समस्या से ग्रस्त हैं. ऐसे में इस पर चर्चा करना और जागरूकता फैलाना अत्यावश्यक है. विशेषज्ञों ने कोविड-19 के दौरान पीसीओएस के बढ़ते मामलों पर अपनी चिंताओं को ज़ाहिर किया. पहले से चल रहे पीसीओएस मामलों के बिगड़ने का भी अनुमान जताया है. वास्तव में स्वस्थ जीवन विकल्पों को अपनाने के साथ न केवल पीसीओएस के साथ एक पूर्ण जीवन जीना संभव है, बल्कि गर्भधारण करना और स्वस्थ गर्भावस्था पाना भी संभव है.

ऊषा गुप्ता

Polycystic Ovary Syndrome

यह भी पढ़ें: महिलाओं के स्‍वास्‍थ्‍य और तंदुरुस्ती से जुड़ी ज़रूरी बातें… (Important Information About Women’s Health And Fitness)

Psoriasis

सोरायसिस से पीड़ित हैं! यात्रा के दौरान रखें इन बातों का ख्‍याल (Travel Guide: Easy Tips For Traveling With Psoriasis)

हरी-भरी वादियों, बर्फ से ढंके पहाड़ों और सूरज की रोशनी से भरपूर, सुनहरे समुद्रतटों पर जाने का मजा ही कुछ और है, लेकिन यदि आपको सोरायसिस हो तो? ऐसे लोगों को यात्रा करने के दौरान असहजता हो सकती है. यदि वे मामूली से लेकर गंभीर प्रकार के सोरायसिस से ग्रस्‍त हैं. खासकर लंबी यात्रा में.सोरायसिस एक स्व-प्रतिरक्षित रोग है, जिसमें त्वचा की नई कोशिकाएं सामान्य की तुलना में अधिक तेजी से विकसित होती हैं.

आमतौर पर हमारा शरीर पुरानी कोशिकाओं की जगह भरने के लिये प्रत्येक 10 से 30 दिन में त्वचा की नई कोशिकाएं बनाता है. सोरायसिस में त्वचा की नई कोशिकाएं 3 से 4 दिन में ही बन जाती हैं और शरीर को पुरानी कोशिकाएं हटाने का समय नहीं मिलता है. इससे त्वचा की सतह पर परत आ जाती है और त्वचा शुष्क, खुजली वाली, पपड़ीदार दिखाई देने लगती है और उस पर लाल चकत्ते या चमकीली परत आ जाती है.

सोरायसिस से पीड़ित लोगों को यदि बिना किसी परेशानी के एक आरामदायक यात्रा का आनंद उठाना है तो उन्‍हें बस पहले से योजना बनाना जरूरी है. चिकित्सा विशेषज्ञों ने संकेत दिया है कि सोरायसिस से पीड़ित लोगों के लिये यात्रा सम्बंधी कोई विशेष मनाही नहीं हैं, उनके लिए हल्की धूप वाला मौसम ठंडे और शुष्क मौसम की तुलना में बेहतर रहता है.  डॉ. शेहनाज़ अरसीवाला, त्वचा रोग विशेषज्ञ, सैफी हॉस्पिटल एवं प्रिंस अली खान हॉस्पिटल और मेडिकल डायरेक्टर, रीन्यूडर्म सेंटर स्किन हेयर लेजर्स एंड एस्थेटिक्स सोरायसिस से पीड़ित लोगों के लिये यात्रा सम्बंधी कुछ उपयोगी टिप्स दे रही हैं, जिनके बारे में आपको पता होना चाहिए.

 

  1. सबसे पहले योजना बनाएं : चाहे आप छोटी यात्रा पर जा रहे हों या फिर लंबे समय के लिए, आपको दो सप्ताह पहले से तैयारी आरम्‍भ कर देनी चाहिए. ठहरने के दौरान की गतिविधियों को निश्चित करना और यात्रा के लिये आवश्यक चीजों को रखना अच्छा होता है. इन चीजों में आपकी दवाएं भी शामिल हैं और वे आपके सामान में सरलता से शामिल होनी चाहिए. यात्रा के दौरान अपनी भोजन सम्बंधी आदतों का नियमित ध्यान रखें और शराब से बचें. इस बारे में आपके त्वचा रोग विशेषज्ञ बेहतर सलाह दे सकते हैं. तनाव से सोरियासिस की पीड़ा बढ़ जाती है, इसलिये अपने यात्राक्रम की पहले से योजना बनाकर आप अंतिम मिनट की परेशानियों से बच सकते हैं. सोरियासिस के रोगियों को यात्रा पर जाने से पहले खूब आराम करने और अपनी त्वचा को अधिक से अधिक नम रखने की सलाह भी दी जाती है.

 

  1. अपने त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास अवश्य जाएं: छुट्टियों पर जाने से पहले यह सुनिश्चित करना अच्छा होता है कि आपकी त्वचा की स्थिति अच्छी हो, इसलिए यात्रा की योजना बनाने से पहले अपने त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास जाना महत्वपूर्ण है. सुनिश्चित करें कि आपकी दवाओं के सभी पर्चे व्यवस्थित हों और लिखित पर्चों की प्रति भी मांगें, ताकि यात्रा के समय जरूरत पड़ने पर वे काम आ सकें. यदि आपको बायोलॉजिक्स के इंजेक्शन लगते हैं, तो इसके बारे में अपने त्वचा रोग विशेषज्ञ से पूरी जानकारी प्राप्‍त कर लें. इस जानकारी में वह महत्वपूर्ण वर्णन भी होना चाहिये, जो आपकी यात्रा के स्थान पर वहाँ के त्वचा रोग विशेषज्ञ से मदद लेने में काम आ सके.

 

  1. पैकिंग सावधानी से करें और जरूरी सामान व्‍यवस्थित रखें : आपके गंतव्य के लिये उपयुक्त कपड़े, जूते और अन्य चीजें रखें. उदाहरण के लिए यदि आप गर्म, आर्द्र क्षेत्र में जा रहे हैं, तो हल्के, ढीले, पसीने को बाहर निकालने वाले कपड़े रखें. यदि आप ठंडे स्थान पर जा रहे हैं, तो टोपी, दस्ताने और स्कार्फ रखें, ताकि आपकी त्वचा सुरक्षित रहे. त्वचा रोग विशेषज्ञ द्वारा बताए गए मेडिकैटेड शैम्पू, मॉइश्चराइजर और साबुन या क्लींजर रखें और उनके द्वारा बताया गया सनस्क्रीन ले जाना कतई न भूलें. यात्रा के समय दवाएं लेना न भूलें. किसी भी तरह के दर्द से बचने के लिये अच्छी नींद लें.

 

  1. संक्रमण के जोखिम से बचें: कुछ प्रकार के संक्रमण सोरियासिस की पीड़ा बढ़ा सकते हैं. अपने त्वचा रोग विशेषज्ञ के निर्देशानुसार उपचार के क्रम में रक्त की आवश्यक जांचें करवाएं. इससे यह सुनिश्चित होगा कि आपको संक्रमण का जोखिम नहीं है. यात्रा के दौरान स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करें और वायरल संक्रमण वाले व्यक्ति से दूरी बनाकर रखें. स्वच्छ रहने के लिए अपने हाथ धोएं और त्वचा रोग विशेषज्ञ द्वारा बताए गए सैनिटाइजर का उपयोग करें. शरीर में पानी की पर्याप्त मात्रा होना भी बहुत जरूरी है.

यह भी पढ़ें: अक्टूबर में करें इन इंडियन डेस्टिनेशन की सैर (Best Places To Visit In October In India)

 

 

जाने-अनजाने में ही प्लास्टिक (Plastic) की बनी चीज़ें हमारे जीवन की अभिन्न हिस्सा बन गई हैं, पर इससे होनेवाले ख़तरों (Dangers) को अनदेखा नहीं किया जा सकता. यदि समय रहते हमने प्लास्टिक का इस्तेमाल (Use of Plastic) कम नहीं किया, तो हमें भविष्य में इसके ख़तरनाक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.

Side Effect Of Plastic

क्या आप उन लोगों में से हैं, जो प्लास्टिक टिफिन में लंच ले जाते हैं या अपनी कार में प्लास्टिक बॉटल में पानी भरकर रखते हैं? क्या आप भी प्लास्टिक के बर्तनों के शौक़ीन स़िर्फ इसलिए हैं कि वो ज़्यादा चलते हैं, टूटते नहीं हैं व आसानी से इसकी देखरेख हो सकती है? या आप उन लोगों में से हैं, जो माइक्रोवेव में प्लास्टिक के बर्तन में खाना गर्म करते हैं… अगर इनमें से एक या सभी सवालों के जवाब ‘हां’ है तो संभल जाएं, क्योंकि प्लास्टिक का इतना अधिक इस्तेमाल आपके शरीर को और पर्यावरण को बीमार बना सकता है.

हेल्थियंस फर्म से जुड़ी डॉ. धृति वत्स यहां हमें बता रही हैं कि प्लास्टिक हमारे लिए किस तरह घातक है और इसके दुष्परिणाम से कैसे बचा जा सकता है.

प्लास्टिक के साइड इफेक्ट्स

* घातक डाइऑक्सिन केमिकल प्लास्टिक बॉटल, पैक्ड फूड, डिब्बे आदि में आसानी से घुल जाती है व शरीर में हार्मोन व कोशिकाओं पर सीधे दुष्प्रभाव डालती है.

* प्लास्टिक की बॉटल बिसफिनॉल से बनी होती है, जो शरीर में पहुंचकर शरीर के सभी अंगों को प्रभावित करती है, ख़ासकर दिमाग़ की नसों को. इसके अलावा यह स्मरणशक्ति को भी कमज़ोर करती है.

* इससे पेट भी ख़राब होता है और अपच, कब्ज़ की समस्या बनी रहती है.

* यदि प्लास्टिक की बॉटल्स को लंबे समय तक न धोएं, तो इसमें हानिकारक बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं. यदि प्रेग्नेंट महिलाएं इस तरह के बॉटल से पानी पीती हैं, तो ये बैक्टीरिया भ्रूण को क्षतिग्रस्त भी कर सकते हैं.

* प्लास्टिक का लंबे समय तक इस्तेमाल कैंसर की वजह भी बन सकता है. रिसर्च के अनुसार प्लास्टिक से 32 तरह के कैंसर हो सकते हैं.

* प्लास्टिक के कप में चाय या कोई भी गर्म पेय पीना नुक़सानदायक है. इसमें उच्च मात्रा में बीपीए होता है, जिसके कारण शुक्राणुओं का उत्पादन कम होने लगता है. इससे पुरुषों में इंफर्टिलिटी की समस्या होने लगती है.

* प्लास्टिक के कप में चाय पीने से इम्यूनिटी प्रभावित होती है. प्रजनन व मस्तिष्क के विकास में बाधा उत्पन्न होती है.

* यह इंसुलिन के उत्पादन के लिए ज़िम्मेदार एल्फा कोशिकाओं को भी प्रभावित करता है, जिसके कारण शरीर में ग्लूकोज़ का लेवल प्रभावित होता है.

* प्लास्टिक पैक्ड फूड गर्मी, धूप, अन्य तरीक़ों से गर्म होने पर कई तरह के विषैले केमिकल्स छोड़ते हैं, जो हमें बीमार बनाते हैं.

* प्लास्टिक बर्तन के इस्तेमाल से बच्चों में भूख की कमी, मानसिक तनाव, शारीरिक ग्रोथ में बाधा के साथ-साथ कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं.

यह भी पढ़े: कैंसर से जु़ड़े 17 एेसे तथ्य, जो आपको जानने चाहिए ( 17 Important And Interesting Facts About Cancer)

हेल्थ अलर्ट

– लो क्वालिटी के प्लास्टिक की वस्तुएं बाज़ार में मौजूद हैं, जिनके उपयोग से बचें. यदि ज़रूरी ही हो, तो हमेशा सुरक्षित मानक मार्कवाले प्लास्टिक वस्तुएं ही लें.

– प्लास्टिक बर्तनों की जगह तांबे, स्टील, चीनी मिट्टी, कांच, लोहे के बर्तनों का इस्तेमाल करना अधिक सेफ रहता है.

– टूथब्रश भी तीन महीने में बदल दें, क्योंकि पुराना टूथब्रश भी दांतों के लिए हानिकारक होता है.

– बच्चों के पानी व दूध के बॉटल, स्कूल टिफिन आदि के लिए प्लास्टिक की बजाय स्टील के टिफिन, बॉटल आदि का इस्तेमाल अधिक करें.

– गर्भवती महिलाएं प्लास्टिक के बर्तनों व वस्तुओं का इस्तेमाल बिल्कुल न करें.

ये न करें

* कभी भी एक बार इस्तेमाल करने के बाद उसी प्लास्टिक की बॉटल में दोबारा पानी न पीएं.

* चाय, कॉफी, सूप, गर्म पानी, गर्म पेय, गर्म भोजन तथा अन्य तरह के गर्म खाने-पीने की वस्तुओं के लिए प्लास्टिक के ग्लास, कटोरी, प्लेट्स, कप, बर्तन आदि का उपयोग न करें.

* पॉलीथीन में खाने-पीने की चीज़ें पैक न करें.

* छोटे बच्चों को प्लास्टिक की बॉटल से दूध न पिलाएं.

* बच्चों के मुंह में प्लास्टिक के खिलौने, रबर टीथर जैसी चीज़ें न दें, क्योंकि प्लास्टिक के खिलौने, वस्तुएं बच्चों के मुंह में जाने से दांत, मसूड़ों व सेहत को नुक़सान पहुंच सकता है.

* गर्मी के मौसम में प्लास्टिक के जूते-चप्पल न पहनें, क्योंकि प्लास्टिक फुटवेयर का दुष्प्रभाव आसानी से त्वचा के माध्यम से शरीर पर होता है.

यह भी पढ़े: लघु उद्योग- चॉकलेट मेकिंग- छोटा इन्वेस्टमेंट बड़ा फायदा (Small Scale Industry- Chocolate Making- Small Investment Big Returns)

इन बातों का भी ख़्याल रखें

– प्लास्टिक का चयन ध्यान से करें. यदि आप भोजन पैक करने के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हैं, तो स़िर्फ बीपीए फ्री बॉक्स और बॉटल का इस्तेमाल करें.

– माइक्रोवेव में प्लास्टिक के इस्तेमाल को पूरी तरह से बंद कर दें.

– सिंथेटिक कपड़ों से बचकर रहें. ये भी प्रायः प्लास्टिक के रिफाइंड और केमिकली ट्रीटेड स्वरूप ही होते हैं.

– शॉपिंग के लिए अपने पास कपड़े का बैग रखें, इससे पर्यावरण पर प्लास्टिक का बोझ भी कम होगा.

– कचरा फेंकने के लिए विघटित हो जानेवाला (बायो डिग्रेडेबल) काला पॉलीथीन इस्तेमाल करें.

– शरीर से बीपीए के अवशेष बाहर करने के लिए शरीर को डिटॉक्स करें.

– भोजन में हल्दी, राई, आंवला और ताज़े हरे धनिया का इस्तेमाल करें, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट्स प्रचुर मात्रा में होते हैं.

अतः अपने घर में प्लास्टिक के इस्तेमाल को नियंत्रित करें और जहां तक संभव हो सके, इनके प्रयोग से बचकर रहें. ध्यान रहे, आपकी थोड़ी-सी सावधानी निश्‍चित रूप से इस स्थिति में बदलाव ला सकती है.

– ऊषा गुप्ता

रात की ये 10 आदतें बना सकती हैं आपको मोटा (10 Nighttime Habits That Make You Fat)

क्या आप मोटापा कम करने के लिए जिम में पसीना बहा रहे हैं या फिर डायटिंग के नाम पर अपने शरीर को टार्चर कर रहे हैं, फिर भी आपका मोटापा कम नहीं हो रहा है, तो एक नज़र अपनी लाइफस्टाइल संबंधी आदतों पर डालिए. जी हां, आपके मोटापे का एक अन्य और महत्वपूर्ण कारण है रात की   ग़लत आदतें, जो आपके मोटापे को कम नहीं होने देती हैं. आइए जानें, कैसे?

1 क्या आप हैवी डिनर करते हैं?

क्या आप जानते हैं कि आपकी इस आदत से आपका मोटापा बढ़ सकता है? आपकी यह आदत आपको अपने फिटनेस गोल से भटका सकती है? अगर फिट रहना चाहते हैं, तो अपनी इस आदत को तुरंत बदल डालिए. सुबह के समय हम अधिक एक्टिव रहते हैं. शाम होने पर थकावट के कारण शरीर का एनर्जी लेवल कम होने लगता है, जिसके कारण शरीर को कम कैलोरी की आवश्यकता होती है. पर हैवी डिनर करने से पाचन तंत्र पर अनावश्यक लोड बढ़ने लगता है, जिसके कारण अतिरिक्त कैलोरी अतिरिक्त फैट में बदलने लगती है और धीरे-धीरे मोटापा बढ़ने लगता है.

2 क्या आप टीवी देखते हुए खाना खाते हैं?

अधिकतर लोगों को टीवी के सामने बैठकर भोजन करना अच्छा लगता है. यह जानते हुए कि उनकी इस आदत से न स़िर्फ ओवरईटिंग होती है, बल्कि मोटापा भी बढ़ता है. अमेरिकन जनरल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रीशन (2013) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, खाने के प्रति जागरूक न होने पर आप ज़रूरत से ज़्यादा खा सकते हैं और आपको पता भी नहीं चलेगा. अगर अपना ध्यान खाने पर केन्द्रित करके खाते हैं, तो आप निश्‍चित तौर पर कम खाएंगे. यदि टीवी देखते हुए खाते हैं, तो आप खाने के स्वाद को दिमाग़ी तौर पर महसूस नहीं कर पाएंगे और ओवरइंटिंग कर लेंगे.

3 रात के समय आप क्या खाते हैं?

मोटापा इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि आप कितना (कम/ज़्यादा) खाते हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि रात के समय आप किस तरह का खाना खाते हैं यानी आपकी फूड चॉइस पर निर्भर करता है. अगर आप रात को क्रीम बेस्ड सूप और ग्रेवी, फ्राइड फूड, डेज़र्ट आदि खाते हैं, तो पचने में थोड़ा मुश्किल होता है, इसलिए रात के समय हाई कैलोरी फूड का सेवन नहीं करना चाहिए.

4 क्या आप डिनर के बाद ब्रश नहीं करते हैं?

डिनर के बाद ब्रश करना बहुत बोरिंग काम है. अपनी इस आदत से आप ख़ुद को न केवल अतिरिक्त स्नैक्स खाने से रोक सकते हैं, बल्कि मोटापा भी कंट्रोल कर सकते हैं. डायटीशियन्स के अनुसार, डिनर के बाद ब्रश करने की आदत से आप पोस्ट डिनर स्नैकिंग से बच सकते हैं. बहुत से लोग डिनर के बाद डेज़र्ट और कैलोरीवाले फूड खाते हैं, चाहे उन्हें भूख न हो तो भी. ब्रश करने के बाद वे ख़ुद को ऐसी चीज़ें खाने से रोक सकते हैं, क्योंकि ब्रशिंग जैसा बोरिंग काम दोबारा नहीं करना चाहते. परिणामस्वरूप मोटापा नहीं बढ़ेगा.

यह भी पढ़ें: वेट लॉस टिप ऑफ द डे: 8 इटिंग हैबिट्स फॉर वेट लॉस 

यह भी पढ़ें: 7 फू़ड, जिन्हें खाने से हो सकता है कैंसर

5 खाने के बाद क्या आप वॉक पर नहीं जाते हैं?

अगर नहीं जाते हैं, तो जाना शुरू करें. एक अध्ययन के अनुसार, अगर आप रात को खाने के बाद वॉक करते हैं या फिर 5 मिनट तक वज्रासन में बैठते हैं, तो निश्‍चित रूप से आपका वज़न नियंत्रित रहेगा. यदि आप अपनी पाचन प्रक्रिया और मेटाबॉलिज़्म में सुधार करना चाहते हैं, तो डिनर के बाद वॉक ज़रूर करें. इससे आपका मोटापा नियंत्रित रहेगा और आपका मूड भी फ्रेश होगा.

6 क्या आप रात को मोबाइल या लैपटॉप पर व्यस्त रहते हैं?

अधिकतर लोगों में यह आदत होती है सोने से पहले मोबाइल-लैपटॉप पर अपने ईमेल चेक करना, अगले दिन की टु डू लिस्ट बनाना, अगले प्रोजेक्ट या असाइनमेंट का ड्राफ्ट तैयार करना आदि, जिसकी वजह से अनावश्यक रूप से तनाव बढ़ता है. अधिक तनाव होने से कार्टिसोल नामक हार्मोन का उत्पादन होता है. इस हार्मोन में ऐसे गुण होते हैं कि तनाव की तीव्रता स्वत: ही बढ़ जाती है, जिसके कारण फैट के स्तर में वृद्धि होने लगती है. इसके अलावा कार्टिसोल मेटाबॉलिज़्म को धीमा कर देता है, जिसके कारण खाना सही तरह से नहीं पचता है और मोटापा बढ़ने लगता है.

7 क्या आप रात को देर से सोते हैं?

देर रात तक जागने से मंचिंग करने के चांस काफ़ी बढ़ जाते हैं. मंचिंग के दौरान भूख बढ़ानेवाले हार्मोंस (घ्रेलीन- जिसे हंगर हार्मोन भी कहा जाता है) का स्तर बढ़ जाता है और वो स्ट्रेस बढ़ानेवाले हार्मोंस (लेप्टिन) के स्तर को कम करता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि बदलती लाइफस्टाइल और बढ़ते वर्कलोड के कारण अधिकतर लोग रात को देर से खाना खाते हैं, जिससे उनके शरीर का मेटाबॉलिज़्म बिगड़ने लगता है और धीरे-धीरे मोटापा हावी होने लगता है.

8 क्या आप सायकियाट्रिक मेडिसिन लेते हैं

रात को सोने से पहले कुछ लोग एंटीडिप्रेशन और सायकियाट्रिक मेडिसिन लेते हैं, जिससे मोटापा बढ़ता है. अगर आप अपने मोटापे को कंट्रोल करना चाहते हैं, तो इन दवाओं को अपनी मर्ज़ी से बंद न करें, बल्कि अपने डॉक्टर से बात करके इनके डोज में बदलाव करें. ऐसी कोई एक मेडिसिन नियमित रूप से न खाएं, जिसका कोई साइड इफेक्ट हो.

9 क्या आप पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं?

पर्याप्त नींद न लेना और आवश्यकता से अधिक नींद लेने से मोटापा बढ़ता है. इसका कारण है कि आपका शरीर कैलोरी को बर्न करने में सक्षम नहीं है. अगर आप 7-8 घंटे से कम सोते हैं या फिर ज़रूरत से ज़्यादा सोते हैं, तो इसका मतलब है कि आपका मेटाबॉलिज़्म ठीक तरह से काम नहीं कर रहा है.

हाल ही में हुए एक अध्ययन से यह साबित हुआ है कि जो लोग केवल 6 घंटे की नींद लेते हैं, उनका वज़न, उन लोगों की तुलना में अधिक होता है, जो 8-10 घंटे की पर्याप्त नींद लेते हैं. जो लोग 6 या 6 से कम घंटे सोते हैं, उनमें मोटापे के लक्षण दिखाई देते हैं. इसके अलावा पूरी नींद न लेने के कारण डायबिटीज़ और इंसोम्निया के होने की संभावना भी बढ़ जाती है.

10 क्या आप कैफीन या अल्कोहल का सेवन करते हैं?

अगर आप रात के व़क्त कैफीन और अल्कोहल का सेवन करते हैं, तो अपनी इस आदत को तुरंत सुधार लें. आपकी यह आदत धीरे-धीेरे आपके बढ़ते वज़न की ओर संकेत करती है. कैफीन और अल्कोहल में बहुत अधिक कैलोरी होती है. इनका सेवन करने से नींद में रुकावट आती है. नींद में बाधा आने के कारण मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है और शरीर में अतिरिक्त फैट जमने लगता है.

रात को जल्दी खाने के फ़ायदे

  • लंच और डिनर के बीच में बहुत अधिक अंतर होने के कारण भूख अधिक लगती है. इस अंतराल को कम करें. टी टाइम में स्नैक्स खाएं.
  • डिनर के दौरान टीवी न देखें, क्योंकि टीवी देखते हुए ओवरईटिंग की संभावना बढ़ जाती है.
  • कोशिश करें कि डिनर रात 9 बजे से पहले कर लें.
  • अगर यह संभव न हो, तो टी टाइम पर लाइट स्नैक्स लें और डिनर में हल्का भोजन करें.
  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डिनर अवॉइड न करें. कम से कम सूप, सलाद या फ्रूट्स ज़रूर खाएं.
  • डिनर बैलेंस्ड लेकिन लाइट होगा, तो अगले दिन भी आप फ्रेश महसूस करेंगे.
  • डिनर में लो कार्ब और हाई प्रोटीन फूड लें. इन्हें पचने में अधिक समय लगता है.
  • लगातार कई दिनों तक डिनर में फ्राइड फूड और डेज़र्ट न लें. अगर इन्हें खाने की बहुत अधिक क्रेविंग हो, तो सुबह नाश्ते में लें.
  • डिनर के बाद तुरंत सोने की बजाय 5 मिनट वज्रासन में ज़रूर बैठें.
  • रात के समय चाय, कॉफी और चॉकलेट के सेवन से बचें.
  • इसकी बजाय गरम दूध में इलायची पाउडर डालकर पीएं.

– देवांश शर्मा

कहीं आप भी अक्सर बाथरूम में अपना मोबाइल फोन तो नहीं ले जाते हैं. अगर ऐसा है तो सावधान हो जाइए, क्योंकि बाथरूम में फोन ले जाना आपकी सेहत के लिए ख़तरनाक हो सकता है.  

mobile phone use in bathroom

एनल्स ऑफ क्लिनिक माइक्रोबायोलॉजी में छपी हुई एक स्टडी में ये बात सामने आई है कि 95 फ़ीसदी हेल्थ केयर वर्क्स के मोबाइल फोन पर बैक्टीरिया के जमा होने के प्रमाण पाए गए हैं. ऐसे बैक्टीरिया से गंभीर इंफेक्शन हो सकता है.

कई लोगों दिन भर के बिज़ी शेड्यूल में अक्सर न्यूज़ या मैसेजेस नहीं पढ़ पाते हैं. ऐसे में घर जाकर आराम से बाथरूम में बैठकर फोन चेक करते हैं. पर ऐसा करके वो जाने अनजाने में कई बीमारियों को दावत दे बैठते हैं.

रेस्टरूम में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस फोन पर चिपक जाते हैं. जो फिर हर उस जगह फैलते हैं, जहां-जहां आप फोन को रखते हैं, जैसे- आपकी जेब में, पर्स में, हाथ में. इसके अलावा जितनी बार आप अपना फोन मैसेज टाइप करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, उतनी बार ये बैक्टीरिया आपके कीपैड पर चिपक जाते हैं. एक रिसर्च के मुताबिक़ मोबाइल इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति अपने फोन को एक दिन में कम से कम 2600 बार टच करता है यानी ढेर सारा इंफेक्शन.

ये हैं ज़्यादा ख़तरे में

इन लोगों को ख़ास ख़्याल रखने की ज़रूरत है.

  • डायबिटिक 
  • कीमोथेरेपी लेने वाले
  • जिसे गंभीर बीमारी हो
  • किसी प्रकार का ट्रीटमेंट लेने वाले मरीज़

यह भी पढ़ें: स्वस्थ व सफ़ेद दांत पाने के आसान तरीक़े

इन बातों का ख़्याल रखें

अगर आप फोन से होने वाली इन बीमारियों को रिस्क को कम करना चाहते हैं, तो इन बातों का ख़ास ख़्याल रखें.

  • फोन टॉयलेट में न ले जाएं.
  • बाथरूम यूज़ करने के बाद या टॉयलेट से आने का बाद हाथ अच्छी तरह से हैंड वॉश से धो लें.
  • बाथरूम की सफ़ाई के बाद भी सीधे फोन को टच न करें. हाथों को अच्छी तरह से धोकर ही फोन यूज़ करें.
  • अल्कोहल बेस्ड सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें.
  • फोन और स्क्रीन का फोन के बनाए गए स्पेशल क्लींज़र से ही क्लीन करें.

टॉयलेट सीट से ज़्यादा बैक्टीरिया

यूनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना ने भी अपनी रिसर्च में पाया है कि फोन पर टॉयलेट सीट से 10 गुना ज़्यादा बैक्टीरिया पाए जाते हैं.