Health Updates

ॐ तीन अक्षरों से बना है, पहला अ, जिसका मतलब हैउत्पन्न होना, दूसरा उ, जिसका मतलब है विकास और तीसरा हैम, जिसका अर्थ है मौन यानी ब्रह्म में विलीन हो जाना. ॐ अस्तित्व की आवाज़ कही जाती है और इसके कई हेल्थ बेनीफिट्स भी हैं, आइए आपको ॐ के उच्चारण से होनवाले हेल्थ बेनिफिट्स के बारे में बताते हैं…

– शरीर के टॉक्सिन्स निकल जाते हैं.

– वोकल कॉर्ड और गले की मांसपेशियों को मज़बूती मिलती है.ख़ासतौर से बढ़ती उम्र में यह और भी फ़ायदेमंद है.

– ॐ के नियमित उच्चारण से जो कंपन पैदा होता है, उसकाअसर वोकल कॉर्ड और साइनस पर भी पड़ता है.

– यह रक्तचाप को नियंत्रित करता है. पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है. 

– थकान को मिटाने का बेहतरीन उपाय है कि कुछ देर ॐ का उच्चारण किया जाए.

Health Benefits Of Chanting Om

– कुछ लोगों के निजी अनुभव तो यह भी कहते हैं कि ॐ के जपसे उनका वज़न भी नियंत्रित रहता है, क्योंकि इसके वाइब्रेशन्स पूरे शरीर को प्रभावित करते हैं और बढ़ते वज़न को कम करते हैं.

– थायरॉइड नियंत्रित रहता है.

– यह पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है, 

– थकान दूर करके एनर्जी देता है, विशेष प्रकारके प्राणायाम के साथ इसका जाप करने से यह फेफड़ों को मज़बूत बनाता है, इससे नींद अच्छी आती है, 

– हड्डियां मज़बूत होती हैं, क्योंकि इसकी फ्रीक्वेंसी शरीर में विशेष प्रकार का कंपन्न पैदा करती है. इसके अलावा यह मानसिक शांति प्रदान करता है, 

यही वजह है मंत्रों में ॐ का इतना महत्व है. कई तरह के क्लिनिकल रिसर्च से भी यह पता चलता है कि ॐ के जाप से मस्तिष्क वशरीर में जो वाइब्रेशन होता है, उसका प्रभाव काफ़ी सकारात्मक होता है.

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कोविड-19 का मुक़ाबला करने के लिए वैक्सीन सुरक्षा के सबसे प्रभावशाली तरीक़े के तौर पर सामने आई है. वैक्सीन लगवाने के बाद यदि आप वायरस के संक्रमण का शिकार होते हैं, तो गंभीर प्रभावों की संभावनाएं कम हो जाती हैं. हालांकि, जिन वैक्सीन को मान्यता प्रदान की गई है, उनका सुरक्षा और प्रभावकारिता के लिए बहुत ध्यान से परिक्षण किया जाता है, उन्हें केवल अधिकृत कर्मियों से ही लगवाया जाना चाहिए.

जब आप वैक्सीन लगवाने के लिए जाते हैं, तो आपको इससे होनेवाले अपेक्षित दुष्प्रभावों को समझ लेना चाहिए और वैक्सीन लगवाने से पहले और बाद के सुरक्षा के तौर-तरीक़ों को अपने जीवन का हिस्सा बना लेना चाहिए. यहां पर रोहित शेलतकर, वी.पी., वीटाबायोटिक्स, स्वास्थ्य एवं पोषण विशेषज्ञ द्वारा कुछ सुझाव दिए गए हैं, जो आपको वैक्सीन लगवाने के बाद के दिनों में सहायता करेंगे.
जैसे-जैसे आपका शरीर अपनी रोगप्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है, कुछ मामूली से दुष्प्रभावों के लिए आपको तैयार रहना चाहिए. ये दुष्प्रभाव एक-दो दिनों तक रह सकते हैं. इनमें इंजेक्शन ली जानेवाली जगह पर दर्द और लाल होना, ठंड लगना और हल्का बुखार होना, शरीर में दर्द होना, सिरदर्द होना और थकान महसूस होना शामिल हैं. डॉक्टर की सलाह के अनुसार, आपको पैरासिटामोल या बुखार की कोई और दवा लेनी चाहिए.

  • बहुत ज़्यादा तनाव वैक्सीन के असर और प्रभावशीलता को कमज़ोर कर सकता है. शांत करने वाले व्यायाम, ध्यान लगाना और सुगंध चिकित्सा की सलाह दी जाती है. सांस लेने-छोड़ने का व्यायाम नियमित तौर पर करें.
  • वैक्सीन लेने के बाद बिल्कुल भी धूम्रपान नहीं करना चाहिए और शराब नहीं पीनी चाहिए. धूम्रपान करना बहुत-सी वैक्सीन्स के रोगप्रतिरोधक तत्वों के असर को कम करने के लिए जाना जाता है. यही बात शराब पर भी लागू होती है.
  • भरपूर मात्रा में तरल पदार्थ लें और वैक्सीन की खुराक लेने के बाद अपने शरीर में पानी की कमी न होने दें. कम से कम दो दिनों तक किसी भी तरह का अत्यधिक एक्सरसाइज़ करने से बचना चाहिए. शरीर को समय की ज़रूरत होती है और अधिक एक्सरसाइज़ करने से थकान हो सकती है.
  • वैक्सीन लेने से पहले और बाद में पोषक आहार महत्वपूर्ण होता है. हरी सब्ज़ियां, जैसे- साग, पालक, ब्रोकोली का सेवन करें, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा अधिक होती है. डॉक्टरों का कहना है कि ये चीज़ें वैक्सीन लेने के बाद होनेवाली सूजन का मुक़ाबला करने में मदद कर सकती हैं. ज़िंक, विटामिन सी, बी12, डी और ए शामिल करें. ये छोले, फलियों (लोबिया जैसी विभिन्न प्रकार की बीन्स) और दाल में आसानी से उपलब्ध होते हैं, जो शरीर को कोविड से बेहतर तरीक़े से लड़ने में और वैक्सीन को ठीक तरह से काम करने में भी मदद करते हैं.
  • सही मात्रा में प्रोटीन का सेवन करना यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि आपके ऊर्जा के स्तरों पर प्रभाव कम से कम हो. पनीर, चिकन, अंडे, मछली और राजमा जैसे प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थों को पर्याप्त मात्रा में शामिल करें. सबसे अच्छा है कि आप अपने सभी प्रमुख भोजनों में किसी न किसी रूप में प्रोटीन को ज़रूर शामिल करें.
  • धैर्य रखें. बहुत अधिक लक्षण दिखाई देने पर घबराएं नहीं. वैक्सीन के प्रभाव सामान्य और अपेक्षित होते हैं. अधिकतर मामलों में ये कुछ दिनों के अंदर अपने आप चले जाते हैं. समय-समय पर डॉक्टर से सलाह लेते रहें और वैक्सीन पर भरोसा रखें.
    जैसा कि हमनें दूसरी लहर में देखा, हम कोविड की इस महामारी को हल्के में नहीं ले सकते. दुनियाभर में, इसकी गंभीरता से निपटने के लिए वैक्सीन्स सबसे प्रभावी उपाय के तौर पर सामने आई है. वैक्सीन लेने के बाद हमारे सुझाव आपको उसके प्रभावों से निपटने में मदद करेंगे. अतः वैक्सीन लें और सुरक्षित रहें!
Covid-19 Vaccine


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रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) महिला शरीर में होने वाला एक शारीरिक परिवर्तन है. जब अंडाशय से अंडाणु के स्राव की प्रक्रिया धीमी होने लगती है और अंत में माहवारी यानी पीरियड्स होना बंद हो जाता है. जब लगातार 12 महीनों तक पीरियड्स पूरी तरह न हो, तो यह कहा जाता है कि महिला को मेनोपॉज़ हो गया है. मेनोपॉज़ के कुछ वर्ष पहले स्त्री में कई शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन होने शुरू हो जाते हैं.

मेनोपॉज़ की आयु निश्चित नहीं होती है. भारतीय महिलाओं में 40 साल की उम्र के बाद प्रीमेनोपॉज़ के लक्षण धीरे-धीरे दिखाई देने लगते हैं. 47 वर्ष की उम्र तक महिलाएं मेनोपॉज़ की अवस्‍था में पहुंच जाती हैं. जबकि कुछ महिलाओं में इसका अनुभव कुछ जल्दी अर्थात 42-45 वर्ष की आयु के बीच ही हो सकता है. इसे शीघ्र रजोनिवृत्ति (अर्ली मेनोपॉज़) कहा जाता है. यदि यह 40 साल से पहले होता है, तो इसे प्रीमैच्योर मेनोपॉज़ कहा जाता है. विलंबित रजोनिवृत्ति की स्थिति भी देखने को मिलती है, जब महिलाओं को 50 वर्ष की आयु तक पीरियड्स होता रहता है. हालांकि ऐसी बहुत ही कम महिलाएं होती हैं, जिनमें 51-52 साल की उम्र में पीरियड्स होता है. इस पर और भी कई ज़रूरी बातें नवी मुंबई के रिलायंस हॉस्पिटल की डॉ. बंदिता सिन्हा, जो हेड ऑफ डिपार्टमेंट ऑफ ऑब्‍सटेट्रिक्स एंड गाइनकोलॉजी हैं ने बताई.

भारतीय महिलाओं में पीरियड्स की शुरुआत ज़्यादातर 12-13 साल की उम्र में हो जाती है और वो जल्दी ही प्रजनन अवस्था में पहुंच जाती हैं. पिछले दो दशकों के आंकड़ों के आधार पर 10-11 साल की उम्र में माहवारी की शुरुआत ज़्यादातर देखने को मिली है. यही वजह है कि भारतीय महिलाओं में 45-48 साल की उम्र के बीच पीरियड्स रूक जाता है. इसके विपरीत पश्चिमी देशों की महिलाओं में 16-17 वर्ष की उम्र में पीरियड्स शुरू होता है और इसका कारण प्रजनन तंत्र के विकास में देरी है और और इसका एक कारण उन क्षेत्रों की ठंडी जलवायु हो सकती है. इसलिए औसतन 52 साल तक उनमें पीरियड्स होता है.

Early Menopause

आजकल प्रीमैच्योर मेनोपॉज़ के उदाहरण आम हो रहे हैं, क्योंकि लड़कियों की डिम्बग्रंथि क्षमता कम हो रही है यानी कि ओवेरियन रिजर्व धीरे-धीरे घट रहा है. फर्टिलिटी उपचारों के आंकड़ों से यह बिल्कुल स्पष्ट है. प्रत्येक 10 में से 2-3 महिलाओं में किसी न किसी हद तक बांझपन देखने को मिलता है. महिलाओं के लिए गर्भ धारण करना मुश्किल होता है, क्योंकि प्रजनन क्षमता घट रही है और यह भी अर्ली मेनोपॉज़ का कारण है. जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, उर्वरकों के चलते भोजन और पानी में प्रवेश करने वाले विषाक्त पदार्थ, आनुवांशिक कारक, इन सभी का प्रभाव भी इस पर पड़ सकता है. 40 साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी. कुछ ऐसे भी मामले में देखने को मिले हैं, जिनमें 20-30 वर्ष की उम्र में ही महिलाओं का मेनोपॉज़ हो गया. अर्ली मेनोपॉज़ का कारण तनाव, जीवनशैली, कम नींद आदि भी हैं, क्योंकि ये कारक हॉर्मोन्‍स को प्रभावित करते हैं. जिनके चलते हार्मोनल असंतुलन होता है और इससे भी मेनोपॉज़ के लक्षण बढ़ सकते हैं. अर्ली मेनोपॉज़ आनुवंशिक भी हो सकती है.

विवाह का मेनोपॉज़ की उम्र से कोई लेना-देना नहीं है, यह एक बड़ा मिथक है, लेकिन पीरियड्स की शुरुआत का संबंध विवाह से है. लड़कियों में एक निश्चित/सीमित संख्‍या में अंडाणु मौजूद होते हैं और यदि उनमें पीरियड्स की शुरुआत शीघ्र हो जाती है, तो अंडाणुओं की संख्‍या घटती जाती है. इसके अलावा कैंसर के कारण होने वाले रेडिएशन उपचार से मेनोपॉज़ जल्दी हो जाती है, क्योंकि यह अंडाणुओं को नुक़सान पहुंचाता है. कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव के चलते भी अर्ली मेनोपॉज़ होती है.
कम उम्र अर्थात् 40 वर्ष की उम्र से पहले ही बच्चेदानी निकालने के बढ़ते चलन ने भी अर्ली मेनोपॉज़ बढ़ा दी है.

इसका बेहतर उपाय यह है कि बचपन/किशोरावस्था से ही लड़कियों की जीवनशैली में कुछ बदलाव लाए जाएं. फास्‍ट फूड के कम सेवन, आउटडोर गतिविधियों को प्रोत्‍साहन के ज़रिए पीरियड्स की शुरुआत होने की उम्र थोड़ी बढ़ सकती है, क्‍योंकि वसायुक्‍त भोजन, फास्ट फूड, प्रिजर्वेटिव युक्‍त खाद्य पदार्थ का हॉर्मोन्‍स पर प्रमुख रूप से प्रभाव पड़ता है. यदि जीवनशैली में उचित परिवर्तन करके इन पर्यावरणीय कारकों में बदलाव लाया जाए, तो पीरियड्स शुरू होने की उम्र को बढ़ाया जा सकता है.

– ऊषा गुप्ता

Early Menopause

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Mammogram

कैंसर को लेकर कई लोगों को कुछ भ्रम बना रहता है, ख़ासकर ब्रेस्ट कैंसर के मामले में. इसी से जुड़े मैमोग्राम के बारे में भी महिलाओं को बहुत कम जानकारी होती है. उन्हें इसके बारे में संपूर्ण जानकारी हो, इसलिए यहां इसके बारे में प्रश्नोत्तर के रूप बता रहे हैं. पुणे के जुपिटर हॉस्पिटल की डॉ. प्रांजली गाडगिल, जो ब्रेस्ट कैंसर सर्जन हैं, ने इसके बारे में विस्तारपूर्वक बताया.

मैमोग्राम होता क्या है?
मैमोग्राम यह ब्रेस्ट (स्तन) के मुलायम ऊतक का निकाला गया विशेष प्रकार का एक्स-रे होता है. यह जांच मैमोग्राफी सेंटर में ख़ास उपकरण द्वारा की जाती है. अति सूक्ष्म, कम ऊर्जावाले रेडिएशन द्वारा हर एक ब्रेस्ट के दो एक्स-रे निकाले जाते है. रेडिओलॉजिस्ट इन चित्रों का परिक्षण करके रिजल्ट तैयार करते है.

स्तन की कोई शिकायत न होने पर मैमोग्राम क्यों करवाना?
स्तन का कर्करोग यानी ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में सबसे अधिक होनेवाला कैंसर है, इसीलिए विशेषज्ञों द्वारा सलाह दी जाती है कि महिलाओं को ४० साल की उम्र के बाद इसकी वार्षिक जांच ज़रूर करवानी चाहिए. नियमित जांच करनेवाली महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का निदान, हाथ को गांठ का स्पर्श होने से पहले ही हो सकता है. प्रारंभिक अवस्था में इलाज करने से इसका इलाज आसानी से होता है. साथ ही कोई गम्भीर समस्या या जान का ख़तरा भी नहीं रहता. स्वस्थ महिलाओं में इस उद्देश्य से की गई जांच को स्क्रिनिंग मैमोग्राफी कहा जाता है.

स्तन में गांठ होनेपर मैमोग्राफी करवानी चाहिए या सोनोग्राफी?
४० साल से कम उम्र की महिलाओ के लिए प्रथम स्तन की सोनोग्राफी अर्थात अल्ट्रासाउंड जांच की जाती है. सोनोग्राफी के अंतर्गत एक्स-रे का उपयोग ना करके, ध्वनि तरंग का उपयोग किया जाता है. ४० साल से अधिक उम्र की महिलाओं का, प्रथम मैमोग्राफी उसके बाद आवश्यकतानुसार सोनोग्राफी की जाती है. दोनों ही जांच एक-दूसरे के पूरक होने से, कई बार पूर्ण निदान के लिए दोनों उपकरणों का उपयोग किया जाता है. इन जांच के लिए विशेषज्ञों की सलाह भी अनिवार्य है.

मैमोग्राम में दिखनेवाली हर गांठ, ज़रुरी है कि कैंसर ही हो?
८० प्रतिशत गांठें कैंसर की (मतलब मलिग्नंट) न होकर अन्य कई वजहों से भी हो सकती है. इन दोषों को बिनाइन ब्रेस्ट डिसीज़ कहा जाता है. इसके अंतर्गत ब्रेस्ट सिस्ट फाइब्रोएड़ेनोमा इन्फेक्शन्स तथा अन्य कई क़िस्म के स्तन की बीमारी आती है.


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मैमोग्राफी के लिए जाते समय क्या-क्या तैयारी करनी चाहिए?
सुबह स्नान के बाद पाउडर, क्रीम, डिओड्रेंट आदि का इस्तेमाल किए बिना चेकअप के लिए जाना चाहिए. इस जांच के लिए खाली पेट रहने की ज़रुरत नहीं है. पूर्व में किए गए सभी मैमोग्राफी तथा सोनोग्राफी के रिपोर्ट अपने साथ रखें. नई जांच की तुलना पुरानी फिल्म की रिपोर्ट को देख उसके साथ करना आवश्यक होता है. पहले के बायोप्सी तथा महत्वपूर्ण सर्जरी के रिपोर्ट भी साथ में रखना आवश्यक है.

मैमोग्राफी करते समय दर्द होता है क्या?
एक्स-रे लेते समय स्तन को ५ से १० सेकंड प्लेट्स के बीच में रखा जाता है, जिससे स्तन के ऊपर दबाव महसूस होता है. अनुभवी टेक्निशियन और आधुनिक उपकरण होने से जांच बिल्कुल आसानी से होता है. इसके लिए आई.वी. इंजेक्शन तथा कॉन्ट्रास्ट डाय की आवश्यकता नहीं होती.

मैमोग्राम एब्नार्मल आने पर क्या करना चाहिए?
मैमोग्राम में कुछ अनुचित दिखाए देने पर उसका उचित निदान करने के लिए कुछ और जांच की जाती है. अधिकतर सोनोग्राफी द्वारा ही संदेह को दूर किया जाता है. कभी टोमोसिंथेसिस या ब्रेस्ट एमआरआई तथा विशेष इमेजिंग उपकरणों का उपयोग भी किया जाता है. कैंसर की या उसके प्राथमिक अवस्था की अगर ज़रा भी संभावना है, तो सुई की जांच मतलब बायोप्सी की जाती है. हाथ को स्पर्श न होनेवाली गांठ की बायोप्सी के लिए सोनोग्राफी का उपयोग किया जाता है.

मैमोग्राफी करने से क्या कैंसर से बच सकते है?
नियमित रूप से वार्षिक मैमोग्राम करनेवाली महिलाओं में कैंसर का निदान प्रथम चरण में ही होता है. इस वजह से इलाज आसान होकर किसी गम्भीर ख़तरे को टाला जा सकता है. मैमोग्राफी से कैंसर का प्रजनन रुकता नहीं है, किंतु समयानुसार निदान और उपचार संपन्न करने से नुक़सान कम होता है.

फैमिली हिस्ट्री में मां, बहन, मौसी, बुआ आदि इनमें से किसी को कैंसर हो, तो क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
ब्रेस्ट कैंसर यह ५ से १० प्रतिशत मरीज़ों में आनुवांशिक होता है. ऐसी संभावना होने पर उचित स्तन रोग चिकित्सक/ब्रेस्ट सर्जन से सलाह लेकर जेनेटिक टेस्टिंग करवाना चाहिए. आप की आयु, अब तक के स्तन की जांच के रिपोर्ट, फैमिली हिस्ट्री, जेनेटिक रिपोर्ट इन सभी का अध्ययन करके योग्य चेकअप और उपचार की सलाह दी जाती है.


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हाथों को गांठ का स्पर्श महसूस हो, किंतु मैमोग्राफी में दिखाई न दे तो क्या करना चाहिए?
स्तन की कोई भी शिकायत होने पर मैमोग्राफी करने से पहले डॉक्टर द्वारा चेकअप करवाना चाहिए. मैमोग्राफी में गांठ न दिखाई देने के और भी कई कारण हो सकते है. जांच के समय ठीक से पोजीशन न दी गई हो, तो स्तन का पूर्ण भाग चित्र में नहीं आता है. कुछ महिलाओं में स्तन का गहन घनिष्ठ (डेन्स ब्रेस्ट) होने पर सिर्फ़ एक्स-रे की जांच पर्याप्त नहीं होती, इसीलिए सोनोग्राफी या अन्य उपकरण की सहायता ली जाती है. जांच द्वारा संतुष्टि न होने पर स्तन रोग चिकित्सक या ब्रेस्ट सर्जन की सलाह अवश्य ले.

जिस महिला का ब्रेस्ट कैंसर का निदान होने के बाद उपचार हुआ हो, तो क्या उसे भी मैमोग्राफी करवानी चाहिए?
मास्टेक्टॉमी की ऑपरेशन द्वारा स्तन का पूर्ण हिस्सा अगर निकाला गया हो, फिर भी दूसरे स्तन की वार्षिक जांच आवश्यक है. स्तन का कुछ ही हिस्सा रखकर लम्पेक्टॉमी की गई हो, तो शुरुआती एक-दो साल हर छह महीने में मैमोग्राफी की जाती है और उसके बाद वार्षिक जांच की जाती है. कैंसर के मरीज़ों को ऑन्कोलॉजिस्ट की सलाहनुसार नियमित जांच करवाते रहना ज़रूरी है.

– ऊषा गुप्ता


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Natural Stress Reduction

इस कोरोना महामारी के दौर में हम सभी बेहद मानसिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहे हैं. एनसीबीआई के अनुसार, इस महामारी के दौरान भारतीय आबादी में तनाव, चिंता, अवसाद, अनिद्रा और आत्महत्या की प्रवृत्ति में बढ़ोतरी हुई है. अब यह स्थिति और भी भयावह हो गई है, क्योंकि बच्चे, बुज़ुर्ग, फ्रंटलाइन कार्यकर्ता और पुराने बीमारी से ग्रस्त मरीज़ भी इसके चपेट में अधिक आ रहे हैं. इसी सन्दर्भ में मिलेनियम हर्बल केयर के सीईओ चिंतन गांधीजी के आयुर्वेद के महत्व को बताया और कई उपयोगी जानकारियां दीं.
आयुर्वेद के अनुसार, एक स्वस्थ दिमाग़ महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. एक समग्र विज्ञान होने के नाते आयुर्वेद मन, शरीर, आत्मा, इंद्रियों और उनके कामकाज के बीच संबंध की खोजता रहा है और बताता रहा है.
एकबारगी देखें तो तनाव प्रतिरक्षा प्रणाली को दबा सकता है, रक्तचाप बढ़ा सकता है, याददाश्त में कमी कर सकता है, अवसाद, चिंता और अन्य विकारों को भी बढ़ा सकता है. ऐसे में मन और शरीर को ठीक करने में मदद करने के लिए आयुर्वेद के सिद्धांत सदियों से प्रचलन में हैं. आइए संक्षेप में इसके बारे में जानें.

मालिश
आयुर्वेद में, अभ्यंग (तेल मालिश) दैनिक स्व-देखभाल अनुष्ठान है. जिसे शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए नियोजित किया गया है. अश्वगंधा और चंदन जैसे विभिन्न हर्बल तेल के साथ तेल मालिश सेरोटोनिन और डोपामाइन के उत्पादन को प्रोत्साहित कर सकते हैं और तनाव को कम करते हैं.

Natural Stress Reduction

योग
योग एक आत्म-सुखदायक तकनीक है, जो तनाव प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है. साथ ही तंत्रिका तंत्र को आराम करने में मदद करता है. योग अनुशासन तीन पहलुओं पर केंद्रित है- मन, शरीर और आत्मा. अनूठे मन-शरीर अभ्यास यानी आसन और नियंत्रित सांस पैटर्न के साथ योग वर्तमान मूवमेंट के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद करता है. साथ ही भावनात्मक स्थिरता को बढ़ावा देता है.
वैज्ञानिक रूप से योग (गामा-एमिनो ब्यूटिरिक एसिड), सेरोटोनिन, डोपामाइन और ट्रिप्टोफैन जैसे ख़ुश न्यूरोट्रांसमीटर के स्तर को बढ़ाता है और कोर्टिसोल स्तर (तनाव हार्मोन) को कम करता है. आयुर्वेद शरीर और मन को नियंत्रित करने की शक्ति को बढ़ाने के लिए योग के नियमित रूप से अभ्यास की सलाह देता है.

सात्विक आहार
सात्विक आहार शुद्ध शाकाहारी भोजन है, जिसमें मौसमी ताज़े फल, पर्याप्त ताज़ी सब्ज़ियां, साबुत अनाज, दालें, अंकुरित अनाज, सूखे मेवे, बीज, शहद, ताज़ी जड़ी-बूटियां, दूध, डेयरी उत्पाद आदि शामिल हैं.
ये खाद्य पदार्थ सत्व या हमारी चेतना के स्तर को बढ़ाते हैं. सात्विक भोजन प्रेम, कृतज्ञता और जागरूकता के साथ पकाया और खाया जाता है.
आयुर्वेदिक क्लासिक्स के अनुसार, दैनिक आधार पर इस तरह के आहार को शामिल करनेवाला व्यक्ति शांत, सौहार्दपूर्ण और ऊर्जा से भरा होता है. वो उत्साह, स्वास्थ्य, आशा, आकांक्षाएं, रचनात्मकता और संतुलित व्यक्तित्व का धनी होता है.

Natural Stress Reduction

हर्ब्स
जड़ी-बूटियों की अंतर्निहित शक्ति प्राकृतिक और स्वस्थ तरीक़े से बीमारियों को दूर करने में मदद करती है. आयुर्वेद मेध्या या नॉट्रोपिक जड़ी-बूटियों का एक समूह प्रदान करता है, जो मस्तिष्क की क्षमताओं को बेहतर बनाने में फ़ायदेमंद होते हैं. इन जड़ी बूटियों को हमारे रोज़मर्रा के जीवन में शामिल करना चाहिए.
ब्राह्मी एक एडाप्टोजेनिक जड़ी बूटी है. यह न्यूरोट्रांसमीटर जैसे सेरोटोनिन, डोपामाइन और गाबा को संशोधित करके तंत्रिका तंतुओं के कुशल संचरण में सुधार करके तनाव में लचीलापन बढ़ाता है, जो बदले में भावनाओं को संतुलित करता है.
इसके अलावा जटामांसी, मंडुकपर्णी, शंखपुष्पी आदि भी कोर्टिसोल के स्तर और तनाव को कम करती है. यह तंत्रिका तंत्र को शांत करते हैं और अनिद्रा की समस्या को दूर करने में भी बेहद प्रभावी है.
आयुर्वेद प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशिष्ट जीवनशैली, आहार, हर्बल और योगिक समाधान प्रदान करता है, जो न केवल तनाव को फैलने से रोकता है, बल्कि मन की स्थायी शांति के लिए एक आधार बनाने में भी मदद करता है.

– ऊषा गुप्ता


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धूम्रपान और सेकंड हैंड स्मोकिंग से होनेवाले ख़तरों के बारे में तो सभी लोग जानते हैं. लेकिन थर्ड हैंड स्मोकिंग से आज भी कई लोग अंजान हैं. इसलिए वे आसानी से इनकी गिरफ़्त में आ जाते हैं. लेकिन एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने थर्ड हैंड स्मोकिंग के ख़तरों के बारे में भी आगाह किया है. कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी का यह अध्ययन बताता है कि थर्ड हैंड स्मोकिंग से इंसान की डीएनए संरचना को नुक़सान पहुंच सकता है.

थर्ड हैंड स्मोकिंग होता कैसे हैं?
विशेषज्ञ बताते हैं कि सिगरेट पीने के दौरान उससे निकलनेवाला ज़हरीला पदार्थ कपड़ों, दीवार, फ़र्नीचर, कारपेट, बाल, बच्चों के खिलौने आदि चीज़ों पर चिपक जाते हैं. धूम्रपान करनेवाले व्यक्ति की त्वचा और कपड़े निकोटिन और अन्य हानिकारक केमिकल्स के अवशेषों को चिपका लेती है, जो घर से अंदर-बाहर जाने पर भी उसी के साथ चिपकी रहती है. इन्हीं अवशेषों को थर्ड हैंड स्मोक कहा जाता है. जो भी व्यक्ति इसके संपर्क में आता है, ख़ासकर छोटे बच्चे, इसके संपर्क में आने से कई बीमारियों के चपेट में आ सकते हैं. इसके चलते बच्चों में सांस की बीमारियों के साथ कैंसर जैसी ख़तरनाक बीमारी भी हो सकती है. इससे शरीर की आनुवांशिक संरचना को भी नुक़सान पहुंचता है. इससे आनेवाली पीढ़ियां भी प्रभावित हो सकती हैं.

हवा से नहीं हटाया जा सकता
सिगरेट में 4000 से ज़्यादा केमिकल्स होते हैं, जिसमे 50 से ज़्यादा कैंसरकारी तत्व होते हैं. इन केमिकल्स को आसानी से नहीं हटाया जा सकता है. इन केमिकल्स की परतों को पंखे की हवा या खिड़कियों के खोल देने मात्र से नहीं हटाया जा सकता है.

बच्चों को पहुंचता है नुक़सान
सिगरेट के केमिकल्स कमरे में मौजूद ओजोन के संपर्क में आकर ख़तरनाक कैंसरकारी केमिकल कंपाउंड बनाते हैं, साथ ही ये एनएनए का कंपाउंड डीएनए और बच्चों की ग्रोथ को प्रभावित करता है. सभी केमिकल्स बच्चों के खिलौने, कपड़े, दीवार आदि पर फैलने के साथ ही जमा हो जाते हैं. बच्चे खिलौने के साथ खेलते-खेलते उन्हें मुंह में भी ले लेते हैं, वे कारपेट, स्मोक किए हुए व्यक्ति के पास जाते हैं, जिससे बच्चे में कैंसर अस्थमा और सांस संबंधी जैसी कई बीमारियों होने का ख़तरा बढ़ा देता हैं. इसके अलावा गर्भ में पल रहे शिशु को भी यह नुक़सान पहुंचा सकता है.

घर में धूम्रपान न करें…
फर्स्ट व सेकंड हैंड स्मोकिंग के मुक़ाबले थर्ड हैंड स्मोकिंग कितना प्रभावित कर सकता है, इस पर कई शोध किए जा रहे हैं. लेकिन यह साफ़ है कि इसका दुष्प्रभाव होता हैं. कई शोधों में इसकी पुष्टि हो चुकी है. इसलिए लोगों को घर में धूम्रपान करने से ख़ुद को रोकना चाहिए. उन्हें समझना चाहिए कि उनके धूम्रपान करने से उनके आसपास के लोगों के स्वास्थ्य पर कितना बुरा असर पड़ रहा है.
धूम्रपान करके आप तो अपने आप का नुक़सान कर ही रहे हैं. मगर आपके बगलवाला बिना किसी ग़लती के ही अपने स्वास्थ्य का नुक़सान कर रहा है. केवल आपके साथ होने की क़ीमत आपके अपने चुका रहे हैं. शोध के अनुसार, थर्ड हैंड स्मोक करनेवाले को फर्स्ट हैंड स्मोकर माना जाता है.

सावधानी ज़रूरी
दिल्ली स्थित वैदिकग्राम के डॉक्टर का कहना है कि सिगरेट पीना छोड़ देना चाहिए. यदि संभव न हो, तो बंद कमरों और गाड़ियों के अंदर सिगरेट न पीएं. धूम्रपान के बाद बच्चों के संपर्क में आने से पहले कपड़े बदल लें. ऐसा ना करने से बच्चों में कई तरह की परेशानियां हो सकती है.

Third Hand Smoke

जानलेवा…
थर्ड हैंड स्मोक के मामले पर जानवरों पर स्टडी करने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की साइंटिस्ट्र्स मैन्युला मार्टिन्स ग्रीन ने कहा कि स्मोकिंग मत कीजिए और ख़ुद को सेकंड हैंड और थर्ड हैंड स्मोक के ख़तरे से भी बचाइए, क्योंकि ये भी फर्स्ट हैंड स्मोक की तरह जानलेवा है. थर्ड हैंड स्मोक, मानव शरीर पर क्या प्रभाव डाल सकती है इसके लिए चूहों पर स्टडी की गई, पता चला कि इस तरह के स्मोक का असर लीवर और फेफड़ों पर काफ़ी ख़तरनाक होता है.
अगर स्मोक करनेवाले इस लत से तौबा कर लें, तो अपनी जान के साथ-साथ वह कई ज़िंदगियों को भी बचा सकते हैं. धूम्रपान छोड़ने के तमाम तरकीबें बताई जाती रही है. लेकिन सबसे अच्छा तरीक़ा है, दृढ़ इच्छाशक्ति. इसके बिना कोई भी तरकीब काम नहीं करेगी.
ऐसे कई उदाहरण है, जिन्होंने अपनी धूम्रपान की आदत छोड़ दी. जो लोग थोड़ी देर भी धूम्रपान के बिना नहीं रह पाते थे, जब उन्होंने इस लत से किनारा कर लिया, तो फिर आप क्यों नहीं कर सकते हैं. अपने मन से इस बात को निकाल दीजिए कि यह लत आपसे नहीं छूटेगी, क्योंकि दुनिया में कोई ऐसी बुरी आदत नहीं जो इंसान चाहे, तो छोड़ नहीं सकता. बस ठान लेने की ज़रूरत है.

यदि आप स्मोकिंग नहीं छोड़ पा रहे हैं, तो कम-से-कम इतना ज़रूर करें
• बच्चे, गर्भवती महिलाओं, पालतू जानवर, ऑफिस, बंद कमरे में, कार में स्मोकिंग करने से बचें.
• स्मोकिंग के बाद हाथ धोकर कपड़े बदल लेने के बाद ही बच्चे को गोद में उठाएं. नहीं तो इससे थर्ड हैंड स्मोकिंग का ख़तरा बढ़ जाता है.
• अगर आपके आसपास ऐसा कोई व्यक्ति खड़ा है, जो स्मोकिंग नहीं करता है, तो प्लीज़, सिगरेट सुलगाने से पहले एक बार उनसे इजाज़त ले लें. अगर उन्हें ऐतराज़ है, तो स्मोक कहीं और जाकर करें.
• सिगरेट पीते समय आप इतनी दूरी बनाकर खड़े हो कि सामनेवाले को धुआं न लगे.
• कभी भी आंखें बंद कर सिगरेट की राख को न झाड़ें और न ही उसके फिल्टर को यहां-वहां फेंके. इसके लिए ऐश-ट्रे का ही इस्तेमाल करें.
• कभी भी किसी को सिगरेट पीने के लिए बाध्य न करें.
• यदि किसी को आपके सिगरेट पीने से प्राॅब्लम है, तो उसे साॅरी ज़रूर बोले.
•ध्यान रहे कि आपके स्मोकिंग का धुआं किसी के चेहरे पर न पड़े.

मिनी सिंह

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जब तक COVID-19 महामारी जारी है, हम एक बड़े स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहे हैं. विश्व स्तर पर महामारी ने पूरी मानव आबादी को अस्त-व्यस्त कर दिया है. चूंकि लोग कम शारीरिक गतिविधि के साथ अपने घरों तक ही सीमित हैं, वहां तेजी से हड्डी का हानि हो रहा है, क्योंकि मांसपेशियों और हड्डियों को पर्याप्त उत्तेजना नहीं मिल रही है. इसके अलावा महामारी के दौरान सूरज के संपर्क में कमी से हमारे शरीर में गंभीर रूप से विटामिन डी का स्तर प्रभावित होता है. ऊर्जा और शक्ति की कमी से लोग अक्सर थकान महसूस करते हैं. हर किसी को अपनी हड्डियों की सेहत को लेकर उतना ही सतर्क रहने की ज़रूरत है, जितनी कि उनकी अन्य ज़रूरतों की. हड्डी स्वास्थ्य हमेशा एक प्राथमिकता है और हम हमेशा इसे अनदेखा करते है. हड्डी घनत्व (Bone density) समस्या एक मूक अभिव्यक्ति है और समय की अवधि में एक प्रमुख चिकित्सा मुद्दे को जन्म दे सकती है. जबकि ऑस्टियोपोरोसिस पुरुषों और महिलाओं के बीच उम्र के साथ होता है, महिलाओं को उनके 30 के दशक से पहले की तरह खामियाजा भुगतना पड़ता है. स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ और अनावश्यक हड्डियों के मुद्दों से बचने के लिए, आइए अब हम कुछ उपायों पर ध्यान दें, जो महामारी के दौरान आपकी हड्डियों की देखभाल कर सकते हैं. इसके बारे में मिलेनियम हर्बल केयर के चिकित्सा सलाहकार डॉ. दीपेश महेंद्र वाघमारे.

कैल्शियम और विटामिन डी से भरपूर अच्छी तरह से संतुलित आहार लें…
कैल्शियम के अच्छे स्रोतों में कम वसावाले डेयरी उत्पाद, हरी पत्तेदार सब्जियाँ और सूखे मेवे शामिल हैं। विटामिन डी के अच्छे स्रोतों में गढ़वाले अनाज, अंडे की जर्दी, समुद्री मछली और दूध शामिल हैं। कैल्शियम और विटामिन डी आपकी हड्डियों की रक्षा के लिए एक साथ काम करते हैं – कैल्शियम हड्डियों को बनाने और बनाए रखने में मदद करता है; जबकि विटामिन डी आपके शरीर को कैल्शियम को प्रभावी रूप से अवशोषित करने में मदद करता है।

पर्याप्त विटामिन डी बनाने के लिए सूर्य के प्रकाश के संपर्क में रहें…
पर्याप्त विटामिन डी प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से सूरज का संपर्क सबसे प्राकृतिक तरीका है। सूर्य की अल्ट्राव्हायोलेट बी (यू वी बी) किरणें त्वचा की कोशिकाओं में कोलेस्ट्रॉल को हिट करती हैं, जिससे विटामिन डी संश्लेषण के लिए ऊर्जा मिलती है। अखिल भारतीय अध्ययन के अनुसार सूर्य के संपर्क में आने का सबसे अच्छा समय सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच होता है क्योंकि अल्ट्राव्हायोलेट बी (यूवीबी) किरणों की तरंग दैर्ध्य इस अवधि के दौरान 290-320 nm होती है जो कि त्वचा को विटामिन डी बनाने के लिए आवश्यक है.

भरपूर शारीरिक गतिविधि करें…
मांसपेशियों की तरह, व्यायाम से हड्डियां मजबूत बनती हैं। स्वस्थ हड्डियों के लिए सबसे अच्छा व्यायाम शक्ति निर्माण और वजन बढ़ाने वाले व्यायाम हैं जैसे चलना, सीढ़ियां चढ़ना, वजन उठाना और नृत्य करना। प्रत्येक दिन 30 मिनट का व्यायाम करने की कोशिश करें.

स्वस्थ जीवनशैली जिये…
धूम्रपान और अत्यधिक शराब का सेवन हड्डियों के नुकसान और कमजोर हड्डियों में योगदान देता है। ये हानिकारक आदतें अनजाने में हड्डियों को रक्त की आपूर्ति को कम कर देती हैं, हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं के उत्पादन को धीमा कर देती हैं और कैल्शियम के अवशोषण को बिगाड़ देती हैं। इन आदतों से बचकर, आप अपनी हड्डियों के नुकसान की दर को कम कर सकते हैं और अपनी हड्डियों को नकारात्मक प्रभावों से बचा सकते हैं।

हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद और फाइटो-दवाएं…
हड्डियों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए आयुर्वेदिक में कई जड़ी-बूटियों और फाइटो-दवाओं का उल्लेख है। हडजोड, सलाई गुग्गुल, अश्वगंधा और बाला जैसी जड़ी-बूटियां चिकित्सकीय रूप से सेल होमियोस्टेसिस (ऑस्टियोब्लास्ट और ऑस्टियोक्लास्ट) को बहाल करने और हड्डी खनिज घनत्व (Bone density) में सुधार करने के लिए सिद्ध होती हैं। जबकि अर्जुन, मेथी, लाखा जैसी जड़ी-बूटियां जैव-उपलब्ध कैल्शियम, फॉस्फोरस, विटामिन सी, म्यूकोपॉलीसेकेराइड, खनिज और फाइटोएस्ट्रोजन के कार्बनिक स्रोत के रूप में कार्य करती हैं, जिनमें से सभी स्वस्थ हड्डियों के लिए आवश्यक घटक हैं.
हड्डी के स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छा तरीका उचित जीवनशैली को अपनाना है और हड्डी बनानेवाली कोशिकाओं (ओस्टियोब्लास्ट) और हड्डी के पुनर्जीवन कोशिकाओं (ओस्टियोक्लास्ट) के स्वस्थ संतुलन को बहाल करना है। उम्र बढ़ने के साथ यह संतुलन एक नकारात्मक दिशा में बदल जाता है, जिससे हड्डियों का नुकसान अधिक होता है। आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों से हड्डी के द्रव्यमान का निर्माण होता है और इसकी प्राकृतिक चिकित्सा क्षमता बढ़ती है। प्राकृतिक या फाइटो-दवाएं किसी भी प्रकार के दुष्प्रभावों से मुक्त हैं, लंबे समय तक जारी रखी जा सकती हैं और आपके हड्डी के स्वास्थ्य के समग्र कल्याण के लिए निरंतर लाभ हैं.

Health Tips

– ऊषा गुप्ता

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कोरोनावायरस अब भारत पहुंच गया है, लेकिन आपको कोरोनावायरस से डरने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है. भारत में कोरोनावायरस के जो मामले पाए गए हैं, उनमें कई लोगों की रिपोर्ट निगेटिव पाई गई है, फिर भी सावधानी के तौर पर स्वास्थ्य मंत्रालय कोरोनावायरस से बचाव की जानकारी लगातार दे रहा है. कोरोनावायरस से बचने के लिए कई लोगों ने एन-95 मास्क पहनना शुरू कर दिया है. कोरोना वायरस को लेकर जो भ्रांतियां और डर का माहौल पैदा किया जा रहा है, आप उससे घबराएं नहीं. कोरोना वायरस एक आम सीज़नल वायरस की तरह ही है, जो थोड़ी-सी सावधानी और इलाज से ठीक हो जाता है. हम आपको बता रहे हैं कोरोना वायरस से बचने के आसान घरेलू उपाय, जिनसे आप कोरोना वायरस से बचे रह सकते हैं.

कोरोनावायरस से बचाव के लिए लोग ले रहे हैं इन चीज़ों का सहारा
कोरोनावायरस की ख़बर से लोग इस कदर डरे हुए हैं कि बचाव के लिए उन्हें जो भी जानकारी मिल रही है, वो उसका प्रयोग करना शुरू कर रहे हैं. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के एक बयान के अनुसार, अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि फेस मास्क कोरोनावायरस से बचाव करने में लाभदायक है या नहीं, फिर भी सावधानी के तौर पर लोग फेस मास्क का प्रयोग कर रहे हैं. दिल्ली, आगरा आदि शहरों में लोग इतने डरे हुए हैं कि हर कोई सावधानी के तौर पर मास्क खरीद रहा है. इसके चलते एन-95 मास्क की डिमांड इतनी बढ़ गई है कि मार्केट में एन-95 मास्क की कमी हो गई है. इसी तरह मार्केट में हैंड सैनिटाइज़र की भी डिमांड बढ़ गई है और इनकी भी कमी पाई जाने लगी है.

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कोरोनावायरस से बचने के लिए करें ये 10 घरेलू उपाय

1) विटामिन-सी युक्त फल, जैसे संतरा, मौसमी, नींबू, आंवला आदि का नियमित रूप से सेवन करें.

2) रोज़ाना नियमित रूप से योग, प्राणायाम और सूर्य नमस्कार करें. इससे आपका श्‍वसनतंत्र और फेफड़े मजबूत होंगे.

3) कपूर, लौंग, इलाइची और जावित्री को पीसकर अपने साथ रखें और समय-समय पर इस मिश्रण को सूंघते रहें.

4) बासी खाना खाने से बचें. ताज़ा और गरम भोजन ही खाएं.

5) फ्रिज में रखी ठंडी और बासी चीज़ों का सेवन न करें.

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6) बाज़ार में बिकनेवाली अनहेल्दी और खुली जगहों पर बिकनेवाली चीज़ें न खाएं.

7) सर्दी, खांसी, कफ, बुखार होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं.

8) नमक मिले गरम पानी से गरारे करें. इससे वायरस आपके फेफड़ों तक नहीं पहुंच सकेगाा.

9) तुलसी, लौंग, अदरक और हल्दी वाला दूध पीएं.

10) सार्वजनिक स्थानों और भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें.

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लेखक- डॉ. सौरभ जोशी (मुंबई स्थित द वेन सेंटर में वैस्न्युलर रोगों के इंटरवेंशनल और रेडियोलॉजी उपचारों से संबद्ध)
Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

उपचार से पहले और बाद की तस्वीर

स्पाइडर वेन्स पतली, लाल-बैंगनी रंग की नसें होती हैं. ये त्वचा के बहुत करीब होती हैं इसलिए काफ़ी उभरी हुई नज़र आती हैं. ये नसें बहुत भद्दी दिख सकती हैं. स्पाइडर वेन्स आमतौर पर उन लोगों में देखी जाती हैं जो लंबे समय खड़े रहने या बैठने का काम करते हैं, धूम्रपान व तंबाकू का सेवन करते हैं, इसके अलावा वंशानुगत, ज़्यादा वज़न उठाना, गर्भावस्था, बढ़ती उम्र आदि के कारण भी स्पाइडर वेन्स की तकलीफ़ हो सकती है. देशभर में 10 मिलियन से अधिक लोग अपनी टांगों/शरीर पर ब्लू वेन्स होने के रोग से पीड़ित हैं, लेकिन इससे अनजान रहते हैं. चूंकि प्रारंभिक चरण में ब्लू वेन्स का रोग दर्दरहित होता है, इसलिए 99% लोग उपचार ही नहीं करवाते हैं. इन ब्लू वेन्स को वैरिकोज़ वेन्स कहा जाता है जो एक हानिकारक रोग है. भारत में महिलाएं लंबे कपड़े पहनकर इस समस्या को छुपाने की कोशिश करती हैं और अपनी वैरिकोज़ व स्पाइडर वेन्स को छुपाने के लिए फिल्मी सितारे शूटिंग के दौरान आमतौर पर कोई बॉडी कंसीलर लगा लेते हैं.
समय बीतने के साथ वैरिकोज़ वेन्स के उपचार ने लंबी छलांग लगाई है, जिसमें खुली शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं से लेकर ऊष्मा का उपयोग करके नसों को अंदर से बंद करनेवाली न्यूनतम इनवेसिव लेज़र एवं रेडियो फ्रिक्वेंसी एब्लेशन तक के उपचार शामिल हैं. हाल ही में जलाने के बजाए नस को चिपकाकर बंद करने के लिए गोंद जैसी सामग्री का उपयोग किया जाने लगा है, जिससे रोगी का कष्ट और प्रक्रिया संबंधी जटिलताएं और भी कम हो जाती हैं.

Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

नवीनतम गैर-इनवेजिव और वीडियो की मदद से संचालित एक्सोथर्म जैसी अत्यधिक प्रभावी तकनीक बिना कोई इंजेक्शन लगाए ही टॉपिकल लेज़र का उपयोग करके इन स्पाइडर वेन्स का उपचार कर सकती है. यह पहले इस्तेमाल होनेवाली स्न्लेरोथेरेपी के ठीक विपरीत प्रक्रिया है, जो रोगियों के लिए प्रायः दर्दनाक सिद्ध होती थी.

स्पाइडर वेन्स का उपचार करने हेतु लेज़र उपचार रोगियों के लिए बेहद उपयुक्त है और ये नवीनतम विधियां बहुत कम कष्ट और न्यूनतम जोखिम के साथ इच्छित परिणाम देती हैं. लेज़र का उपयोग गर्भवती महिलाओं तथा उन रोगियों के उपचार क्षेत्र में नहीं किया जा सकता है, जिनकी त्वचा पर वायरल अटैक या संक्रमण हो चुका है. ऊपरी वैस्न्युलर घाव त्वचीय वाहिकाओं के विस्तारण के चलते होते हैं और ये किसी शिरापरक विकृति का परिणाम हैं. सबसे आम ऊपरी वैस्न्युलर घावों को टेलांजिएक्टीजिया और एंजियोमा कहा जाता है.

शिरापरक रोग एक विकसित होता रहने वाला रोग है, बिना उपचार के यह ठीक ही नहीं होता.अपने शिरापरक निदान के लिए सही चिकित्सक से परामर्श करें और जितनी जल्दी हो सके इस विकृति का उपचार कराएं. यह नए ऊपरी वैस्न्युलर घावों के उभार को सीमित करेगा.

Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

लेजर उपचार कैसे काम करता है?
लेजर सिद्धांत एक तापीय क्रिया के उत्पादन पर आधारित है. लेज़र प्रकाश एपिडर्मिस के माध्यम से त्वचा को भेदते हुए प्रवेश करेगा, ताकि डर्मिस के अंदर मौजूद नस को स्पर्श कर सके. इसके बाद ऊष्मा में तब्दील हुआ प्रकाश नस को अवरोधित करेगा और धीरे-धीरे उसे गायब कर देगा. लेज़र उपचार को स्न्लेरोथेरेपी के अतिरिक्त इस्तेमाल किया जा सकता है और यह घुटने, एड़ी या पैर के भीतरी हिस्सों जैसे प्रवेश करने में कठिनाई वाले क्षेत्रों पर कार्य करता है.

किसी लेज़र उपचार से पहले और बाद में बरती जानेवाली सावधानियां:
* उपचार शुरू होने के 2 सप्ताह पहले से धूप में नहीं निकलना है.
* उपचार के बाद उपचार किए गए क्षेत्र पर कोई मॉइश्‍चराइज़िंग क्रीम लगाएं और अगले दो हफ्ते तक धूप में हर्गिज़ न निकलें.

Laser Treatments For Superficial Vascular Lesions

एक्सोथर्म लेज़र, कुशल और बिल्कुल नया  
स्पाइडर वेन्स, जो वैरिकोज़ वेन्स की आरंभिक अवस्था होती हैं, जो एक किस्म की कॉस्मेटिक समस्या होती हैं, उन्हें लक्षित ट्रांसक्यूटेनियस लेज़र का इस्तेमाल करके ठीक किया जा सकता है. इस तकनीक में इन स्पाइडर वेन्स पर एक विशिष्ट तरंग का लेज़र प्रकाश डाला जाता है. यह प्रकाश त्वचा के करीब स्थित 2 मिमि व्यास से कम आकार वाली स्पाइडर वेन्स को वहीं का वहीं जला डालता है. ऐसे विभिन्न उपकरण उपलब्ध हैं जो यह नतीजा प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं. चिकित्सा का वर्तमान मानक एक्सोथर्म डिवाइस है, जिसमें स्पाइडर वेन्स को 10 गुना ज़ूम करने के लिए एक इन-बिल्ट कैमरा लगा हुआ है, जो नसों को आसान निशाना बनाने के साथ-साथ आसपास की त्वचा को 5 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा रखने में मदद करता है. यह एक बहु-उपयोगी और पेटेंट की हुई तकनीक है, जो आसपास के ऊतकों को सर्वोत्तम दक्षता और उच्च सुरक्षा प्रदान करती है. पररणाम धीरे-धीरे दिखाई पड़ते हैं और 4 से 6 सप्ताह के भीतर स्थायी हो जाते हैं. चिकित्सक आपको आवश्यक उपचार सत्रों के बारे में उचित परामर्श देंगे.

प्रक्रिया को  http://bit.ly/2N6q7DX  लिंक पर देखा जा सकता है. 

हम सभी जानते हैं कि संक्रमण से बचने का सबसे बेहतरीन उपाय है अपने हाथों को अच्छी तरह से धोते रहना. लेकिन जर्म्स (Germs) यानी रोगाणु को लेकर बहुतों के मन में कई तरह की भ्रांतियां रहती हैं. इन्हीं बातों पर एक नज़र डालते हैं.

Myths About Germs

जर्म्स दरअसल, सूक्ष्म जीव होते हैं, जो यदि हमारे शरीर में प्रवेश कर जाएं, तो संक्रमण व बीमारियों को जन्म दे सकते हैं. जर्म्स सामान्यतया संक्रमित लोगों को छूने, इंफेक्टेड एरिया के संपर्क में आने से अधिक फैलते हैं. छींक, खांसी, हवा में मौजूद धूल-मिट्टी से अधिक जर्म्स फैलते हैं, जैसे- सर्दी-ज़ुकाम, फ्लू आदि. आइए, इससे जुड़े मिथक व सच्चाई के बारे में जानते हैं.

मिथक: पब्लिक टॉयलेट सीट से आप जल्दी बीमारी की चपेट में आते हैं.

सच्चाई: यह सही है कि पब्लिक टॉयलेट हाइजीन के दृष्टिकोण से उतना सुरक्षित नहीं माना जाता है. लेकिन इससे आप बीमार पड़ जाएंगे, इसकी संभावना बहुत कम होती है. टॉयलेट सीट की बजाय टॉयलेट के दरवाज़े का हैंडल अधिक संक्रमित होता है.

मिथक: किचन की सफ़ाई के लिए स्पंज अच्छा है.

सच्चाई: यह सही है कि स्पंज से किचन की सफ़ाई आसानी से हो जाती है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि स्पंज में भी अनगिनत बैक्टीरिया होते हैं. वे प्लेटफॉर्म पर जमा गंदगी को केवल साफ़ कर सकते हैं, पर उसे पूरी तरह से कीटाणुमुक्त नहीं कर सकते. फिर भी यदि स्पंज इस्तेमाल ही करना है, तो इसे रोज़ अच्छी तरह से क्लीन करना बहुत ज़रूरी है. वैसे पेपर टॉवेल इस्तेमाल करना बेहतर विकल्प है.

मिथक: बैक्टीरिया से बचने के लिए जर्म्स फ्री सोप फ़ायदेमंद रहता है.

सच्चाई: यह सच है कि साफ़-सुथरे हाथ से आप ख़ुद को रोगमुक्त रख सकते हैं, पर इसके लिए जर्म्स फ्री साबुन का इस्तेमाल करना अधिक लाभदायक रहता है, ये सच नहीं है. नियमित रूप से इस्तेमाल किए जानेवाले सोप से भी आप हाथों को अच्छी तरह से क्लीन कर सकते हैं.

यह भी पढ़ेप्लास्टिक पॉल्यूशन: कैसे बचाएं ख़ुद को? (Plastic Pollution: Causes, Effects And Solutions)

मिथक: सार्वजनिक सतहों को छूने से बचना चाहिए.

सच्चाईः बिल्कुल, ऐसा करना सेहत के लिए लाभदायक रहता है, क्योंकि हरेक व्यक्ति बार-बार हाथ धोने जैसे नियमों का पालन कम ही करता है. पब्लिक प्लेस के दरवाज़ों के हैंडल, कार, टेबल आदि पर जर्म्स के अधिक रहने की संभावना भी रहती है. इससे बचने के लिए टिश्यू पेपर, ग्लव्स आदि का उपयोग कर सकते हैं या फिर उन्हें अच्छी तरह से पोंछकर इस्तेमाल कर सकते हैं.

Myths About Germs

मिथक: ऑर्गेनिक फ्रूट्स को धोने की ज़रूरत नहीं होती.

सच्चाई: ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. इन पर भी जर्म्स हो सकते हैं. माना कि ऑर्गेनिक फल सेहत के लिए फ़ायदेमंद रहते हैं, लेकिन बाज़ार से घर तक आने की प्रक्रिया में वे कई स्तरों से गुज़रते हैं, जिससे उनके संक्रमित होने व जर्म्स फैलने की गुंजाइश अधिक रहती है.

मिथक: सभी जर्म्स नुक़सानदायक होते हैं.

सच्चाई: सभी जर्म्स हानिकारक नहीं होते. यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट जॉर्ज (लंदन) के

डॉ. टिम प्लांच सभी जर्म्स को ख़राब नहीं मानते. उनके अनुसार, हमारी बॉडी में अनगिनत बैक्टीरिया मौजूद हैं, इसके बावजूद हम हेल्दी हैं. माना कि जर्म्स बीमारी का कारण बनते हैं, पर सभी बैक्टीरिया नुक़सानदायक नहीं होते. विश्‍वभर में हज़ारों तरह के बैक्टीरिया हैं, जिनमें से बहुत से इंसान के लिए हानिरहित हैं.

मिथक: यदि आपको बुख़ार है, तो एंटीबायोटिक मेडिसिन का कोर्स ज़रूर करना है.

सच्चाई: इस बात में कोई सच्चाई नहीं है, क्योंकि एंटीबायोटिक्स केवल बैक्टीरियल इंफेक्शन का इलाज करते हैं. आमतौर पर सभी बुख़ार बैक्टीरिया की वजह से नहीं होते. उनका आम सर्दी, फ्लू या वायरल इंफेक्शन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेता.

मिथक: वैक्सीन (टीके) सुरक्षित नहीं होते. इनसे ख़तरा रहता है.

सच्चाई: सभी टीकों को पूरी तरह से जांच-परखकर इस्तेमाल में लाया जाता है, इसलिए यह सेफ होते हैं. वैसे भी गंभीर संक्रमित बीमारियों से बचने का बेहतरीन व सेफ तरीक़ा है वैक्सीन.

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Myths About Germs

मिथक: एंटीबायोटिक्स से होनेवाले किसी भी तरह के साइड इफेक्ट का मतलब है कि आपको एलर्जी है और इसे फिर कभी नहीं ले सकते.

सच्चाई: ऐसा नहीं है. एंटीबायोटिक दवाओं के बहुत सारे साइड इफेक्ट्स हैं, पर इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि एलर्जी हो.

मिथक: गर्म पानी जर्म्स को अच्छी तरह से साफ़ कर देता है.

सच्चाई: शोधों से यह पता चला है कि ठंडा पानी भी गर्म पानी की तरह ही जर्म्स को दूर कर देता है. साथ ही साबुन का इस्तेमाल भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पानी की अपेक्षा अधिक बैक्टीरिया को दूर करता है.

उपयोगी टिप्स

* हाथ को नियमित रूप से कम-से-कम 20 सेकंड्स तक पानी से अच्छी तरह से धोएं.

* इसके अलावा साबुन या फिर लिक्विड सोप से हाथों को साफ़ करें.

* हर रोज़ छुई जानेवाली सतहें, जैसे- नल, दरवाज़े के हत्थे, टीवी के रिमोट, फोन आदि को साफ़ करके उपयोग करें.

* सफ़ाई के लिए इस्तेमाल होनेवाले नैपकीन, कपड़े, स्पंज आदि को भी नियमित रूप से अच्छी तरह से गर्म पानी से साफ़ करते रहें.

रिसर्च

एक रिसर्च के दौरान इकट्ठा किए गए किचन

नैपकीन्स में से 49% नैपकीन्स में बैक्टीरिया अधिक पाए गए. दरअसल, किचन नैपकीन या तौलिया बर्तन पोंछने से लेकर हाथ पोंछने तक कई तरह के कामों में उपयोग में लाया जाता है. इसके द्वारा कई तरह के जर्म्स या बैक्टीरिया से इंफेक्शन फैलने की संभावनाएं अधिक होती हैं. कई तरह के जर्म्स से दूषित नैपकीन उनके फैलने का कारण बन जाते हैं. फिर वो नुक़सानदायक जर्म्स भोजन तक फैल जाता है. इसलिए किचन में इस्तेमाल किए जानेवाले नैपकीन को नियमित रूप से धोना व साफ़ किया जाना बेहद ज़रूरी है. ध्यान रहे, इसे दोबारा उपयोग में लाए जाने से पहले इसे अच्छी तरह से पूरी तरह सुखाना भी बेहद ज़रूरी है.

Dr. Ajay Rana

इंस्टिट्यूट ऑफ लेज़र एंड एस्थेटिक मेडिसिन के संस्थापक डॉ. अजय राणा के अनुसार, “जर्म्स हर जगह होते हैं और वे डरावने भी हो सकते हैं, ख़ासकर जब आप उन्हें एक माइक्रोस्कोप के ज़रिए देखते हैं. लेकिन ये छोटे बैक्टीरिया, जो आम सर्दी-ज़ुकाम से लेकर जीवन के लिए ख़तरनाक संक्रमण तक सब कुछ पैदा कर सकते हैं, को अक्सर ग़लत समझा जाता है. हमारे मुंह, त्वचा और यहां तक कि हमारी इंटेस्टाइन में मौजूद बैक्टीरिया के रूप में जर्म्स का हमारे साथ गहरा संबंध है. हमारे शरीर में ऐसे बहुत सारे जर्म्स भी होते हैं, जो हमारी अच्छी सेहत के लिए ज़रूरी हैं. ये गुड बैक्टीरिया ख़तरनाक बीमारियों से भी हमारी रक्षा करते हैं, हमारे इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाते हैं, ताकि वे उनसे लड़ सकें. जब सहायक बैक्टीरिया हमारे शरीर में बढ़ते हैं, तो वे हमारे रक्षक के रूप में काम करते हैं, लेकिन अक्सर हम इंफेक्शन का इलाज करने के लिए एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल करके गुड बैक्टीरिया को मार डालते हैं. जब कि ये गुड बैक्टीरियाज़ कई बीमारियों से लड़ने में हमारी मदद करते हैं. इसलिए कह सकते हैं कि जर्म्स से हर कोई डरता है, पर यह भी उतना ही सच है कि कई जर्म्स हमारे सेहत के साथी भी होते हैं.”

– ऊषा गुप्ता

यह भी पढ़ेसमझें सूजन के संकेत (Everything You Need To Know About Swelling)

सूजन (Swelling) अपने आपमें कोई बीमारी नहीं है, लेकिन ये शरीर में किसी असामान्यता या बीमारी का संकेत हो सकती है, इसलिए सूजन के कुछ संकेतों को ज़रूर जानें-समझें, ताकि सही समय पर इलाज करा सकें.

Back Problems

कभी-कभी शरीर के किसी ख़ास हिस्से में या पूरे शरीर में सूजन आ जाती है. कई बार सूजन के साथ दर्द भी होता है, पर अक्सर सूजन को हम नॉर्मल बात मानकर पेनकिलर खाकर या घर पर ही मसाज वगैरह करके इसकी अनदेखी कर देते हैं, लेकिन आप ऐसी लापरवाही न बरतें. शरीर में सूजन कई बीमारियों का संकेत भी हो सकती है. इन संकेतों को समझें और सही इलाज करवाएं.

क्यों होती है सूजन?

सूजन को मेडिकल भाषा में एडीमा कहते हैं. शरीर में एक्स्ट्रा फ्लूइड जमा होने या वॉटर रिटेंशन होने से सूजन आने लगती है. हालांकि सूजन शरीर के किसी भी हिस्से में आ सकती है, लेकिन अधिकतर ये हाथ-पैर, कंधे, टखने या पंजे में ही दिखाई देती है.

लक्षण

* मांसपेशियों में सूजन या पफीनेस, ख़ासकर पैरों और कंधों पर.

* स्किन तनी हुई दिखाई देना.

* शाइनी स्किन.

* कुछ सेकंड के लिए दबाकर रखने पर वहां गड्ढे-सा बनना.

* पेट फूला हुआ लगना.

कब जाएं डॉक्टर के पास?

वैसे तो किसी भी तकलीफ़ को छोटा समझकर घर बैठना समझदारी नहीं है, इसलिए निम्न स्थिति होने पर डॉक्टर से कंसल्ट करें.

* चेहरे या शरीर के किसी भी हिस्से में लंबे समय से बनी हुई सूजन को अनदेखा करना समझदारी नहीं है.

* यदि शरीर में बार-बार पानी एकत्र हो रहा है, तो यह हृदय, लिवर या किडनी की किसी समस्या का संकेत हो सकता है

* शरीर के किसी भी अंग में एक सप्ताह से ज़्यादा सूजन रहने पर डॉक्टर से संपर्क करें.

* पुरुषों की तुलना में महिलाओं में सूजन की समस्या ज़्यादा देखने को मिलती है. ऐसा इसलिए होता है कि पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं में वसा का अनुपात ज़्यादा होता है और वसा कोशिकाएं अतिरिक्त पानी संचित कर लेती हैं.

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सूजन के कारण

* दिल से जुड़ी बीमारियों, किडनी प्रॉब्लम, हार्मोनल इम्बैलेंस और स्टेरॉयडयुक्त दवाओं के सेवन की वजह से सूजन की समस्या हो सकती है.

* दरअसल, इन सभी स्थितियों में हमारी किडनी सोडियम को संचित करने लगती है, जिससे सूजन की समस्या बढ़ जाती है.

* हालांकि कुछ महिलाओं को पीरियड्स के एक सप्ताह पहले भी सूजन की प्रॉब्लम हो जाती है. इस दौरान शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन की मात्रा बढ़ जाती है, जिसकी वजह से वॉटर रिटेंशन होने लगता है और सूजन हो जाती है.

* इसके अलावा अनियमित लाइफस्टाइल और खानपान संबंधी गड़बड़ी भी इसकी बड़ी वजह है.

कहां सूजन का क्या हो सकता है मतलब?

चेहरे पर सूजन

इसके कई कारण हो सकते हैं, मसलन- फ्लूइड इकट्ठा होना, चोट लगना, किसी तरह का संक्रमण या फिर कैंसर. यह सूजन गाल, आंख व होंठों के पास भी होती है. इसे मेडिकल साइंस में फेशियल एडिमा कहते हैं. यदि चेहरे की सूजन थोड़े समय के लिए हो, तो ऐसा किसी संक्रमण के कारण हो सकता है, पर बार-बार ऐसा होने के साथ-साथ चेहरा लाल हो जाए, बुख़ार या सांस लेने में भी परेशानी हो, तो यह गंभीर स्थिति का संकेत हो सकता है. ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टरी सलाह लें.

पैरों में सूजन

पैरों में सूजन के भी कई कारण हो सकते हैं, जैसे- मोच, लंबी दूरी तक सैर या यात्रा करना, ज़्यादा देर तक खड़े रहना या पैर लटकाकर बहुत देर तक बैठना, बहुत ज़्यादा एक्सरसाइज़ या फिर खेल-कूद आदि. लेकिन अचानक एक या दोनों पैरों में भारी सूजन हो जाए, साथ में लाली और जलन हो तथा चलने-फिरने पर पैर में खिंचाव जैसे लक्षण भी दिखाई दें. तो ये डीप वेन थ्रोम्बोसिस का संकेत हो सकता है. इसमें पैरों की नसों में ब्लड क्लॉट हो जाता है. पुरुषों की तुलना में महिलाएं इसकी शिकार ज़्यादा होती हैं. नियमित व्यायाम न करना, गर्भनिरोधक दवाओं का अधिक सेवन, हार्मोनल असंतुलन, हाई हील पहनना आदि इसके कारण हैं.

हाथों में सूजन

बड़ी उम्र में मेटाबॉलिज़्म कम होने के कारण हाथों व उंगलियों में सूजन होना एक आम समस्या है, जो कुछ स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज़ से ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ स्थितियों में यह सूजन लिवर व किडनी रोग का संकेत भी होती है. इसके अतिरिक्त ये हृदय रोग, गठिया, रक्त विकार, हाइपोथायरॉइड, रुमेटाइड आर्थराइटिस के ख़तरे का भी संकेत है. इस स्थिति में शरीर के विभिन्न जोड़ों में सूजन आ जाती है. अगर सूजन लंबे समय तक रहे और सामान्य व्यायाम व मसाज से आराम न मिले, तो फौरन डॉक्टर से संपर्क करें.

आंखों के आसपास सूजन

आंखों की सूजन ज़्यादातर इंफेक्शन, एलर्जी, कॉर्नियल अल्सर, कंजक्टिवाइटिस, ट्यूमर बनने या वायरल इंफेक्शन के कारण होती है. इसके अलावा नींद की कमी, घंटों कंप्यूटर पर काम करना, स्ट्रेस, सोडियम का अत्यधिक सेवन, थायरॉइड की समस्या आदि के कारण भी आंखों में सूजन हो जाती है. आंखों के आसपास सूजन के साथ बुख़ार आना, वज़न घटना. सिरदर्द, शरीर के अन्य भागों में चकत्ते निकलना आदि लक्षण भी दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर को कंसल्ट करें.

पेट में सूजन

पेट में सूजन पेट संबंधी गड़बड़ी, जैसे- कब्ज़, गैस और फूड एलर्जी के कारण हो सकती है. महिलाओं को पीरियड्स के दौरान पेट में सूजन की शिकायत रहती है. अधिक फास्ट व जंक फूड के सेवन से भी ऐसा होता है. वैसे अधिकतर मामलों में पेट में सूजन बड़ी समस्या नहीं है, लेकिन पेट में सूजन के साथ उल्टी-बुख़ार भी हो, पेट का आकार अचानक बहुत बड़ा लगने लगा हो, अक्सर डायरिया की शिकायत रहती हो, स्टूल के साथ ब्लड जाता हो और पेशाब का रंग पीला हो, तो ये किसी बीमारी का संकेत हो सकते हैं. ऐसे में बिना देर किए डॉक्टर को दिखाएं.

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क्या करें?

* नॉर्मल सूजन की स्थिति में लाइफस्टाइल व खानपान में बदलाव करके सूजन से राहत पाई जा सकती है.

* अधिक नमक खाने से बचें. नमक से वॉटर रिटेंशन होता है, जिससे सूजन बढ़ सकती है.

* वज़न पर नियंत्रण रखें. इसके लिए खानपान का ख़ास ख़्याल रखें और नियमित एक्सरसाइज़ की आदत डालें.

* कई बार पोषण की कमी भी सूजन का कारण बनती है, इसलिए अपनी डायट में हरी सब्ज़ियां और फल शामिल करें.

* कैफीन से बचें. चाय-कॉफी का सेवन कम करें. इसकी बजाय अजवायन की चाय पीएं.

* शरीर में पानी के संतुलन को बनाए रखें. इसमें विटामिन बी-6 मददगार है. ब्राउन राइस व रेड मीट विटामिन बी-6 के अच्छे स्रोत हैं, इन्हें अपनी डायट में शामिल करें.

* विटामिन बी-5, कैल्शियम और विटामिन डी सूजन को कम करने में फ़ायदेमंद हैं. नियमित रूप से कुछ देर धूप में बैठें.

* कैल्शियम टेस्ट कराएं. कैल्शियमयुक्त आहार दूध, दही, मछली, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, अंजीर आदि को डायट में शामिल करें.

* अगर ज़रूरत हो, तो डॉक्टरी सलाह पर कैल्शियम सप्लिमेंट लें.15

सूजन के लिए होम रेमेडीज़

* एक ग्लास गर्म दूध में एक चम्मच हल्दी और मिश्री मिलाकर पीने से दो-तीन दिन में सूजन कम हो जाती है. अगर अक्सर सूजन की समस्या रहती है, तो लगातार छह महीने तक रोज़ाना हल्दीवाला दूध पीएं.

* जौ का पानी पीने से वॉटर रिटेंशन से छुटकारा मिलता है और सूजन कम होती है. एक लीटर पानी में एक कप जौ उबाल लें और ठंडा करके दिनभर थोड़ा-थोड़ा पीएं.

* 10 ग्राम सोंठ और पुराना गुड़ मिलाकर खाते रहने से कुछ ही दिनों में सूजन से राहत मिलती है.

* नियमित रूप से खजूर और केला खाएं. इससे सूजन कम होती है.

* गुनगुने पानी के साथ 1/4 चम्मच हल्दी पाउडर फांकें.

* जीरा और शक्कर को समान मात्रा में लेकर पीस लें. दिनभर में तीन-चार बार इसकी फंकी लेने से सूजन में आराम आता है.

* पानी में गेहूं डालकर उबाल लें. इससे सूजनवाली जगह धोएं. कुछ ही दिनों में सूजन से छुटकारा मिल जाएगा.

* गोबर के उपलों को जलाकर उसकी राख का लेप करने से भी सूजन कम होती है.

* गर्म पानी में नमक मिलाकर इसमें कपड़ा डुबोकर सूजनवाली जगह पर सेंक करें. सूजन कम हो जाएगी.

– प्रतिभा तिवारी

How To Get Relief From Pain

अक्सर हम कई तरह के दर्द (Pain) से परेशान रहते हैं. जहां चोट या अन्य कारणों से उत्पन्न दर्दवाली त्वचा, मांसपेशी व तंत्रिकाओं की क्षति में उपचार, दवाइयों आदि से आराम मिलता है, वहीं मांसपेशियों में उत्पन्न दर्द में मालिश और सेंक से भी लाभ होता है, क्योंकि इससे वात दोष का शमन होता है.

सेंक के लिए सादा गर्म पानी, नमक, कपूर या तारपीन के तेल मिले गर्म पानी से स्नान करना फ़ायदेमंद रहता है. यह सेंक दवा या मरहम लगाने के बाद ही करना चाहिए. सेंक करने से रक्तवाहिनियां फैल जाती हैं और प्रकुपित तंत्रिकाएं शांत हो जाती हैं. इस प्रकार हमारे शरीर का दर्द शांत हो जाता है. इसके अलावा यहां पर हम कुछ उपयोगी घरेलू नुस्ख़े दे रहे हैं, जिनके प्रयोग से तमाम तरह के दर्द से राहत मिलती है.

* घुटनों, हाथों की उंगलियों या बांहों के जोड़ों में टीस भरा दर्द उठता हो और कोई भी काम करने में या वज़न उठाने पर जोड़ों में दर्द होता हो, तो दिन में चार-पांच बार टमाटर का सेवन करते रहें या टमाटर का एक ग्लास रस सुबह-शाम लें. इससे कुछ दिनों में ही आपको आश्‍चर्यजनक रूप से लाभ होगा.

* चूना व शहद मिलाकर लेप करने से पसली के दर्द से राहत मिलती है या फिर सरसों को पानी में पीसकर गरम करके इसका लेप दर्दवाले स्थान पर बार-बार लगाएं.

* इसके अलावा एक ग्लास पानी में दो चम्मच जीरा डालकर गरम करें और उस गरम पानी में तौलिया भिगोकर अच्छी तरह निचोड़ें और उसकी भाप से सेंक करें. कुछ ही घंटों में आराम मिल जाएगा.

* 100 ग्राम मेथीदाना हल्का-सा भूनें. फिर इसे हल्का-सा कूटकर उसमें चौथाई भाग काला नमक मिला लें. सुबह-शाम दो चम्मच गरम पानी के साथ इसकी फंकी लें. इस प्रयोग को निरंतर 15 दिनों तक करने से कैसा भी असहय दर्द हो, दूर हो जाएगा.

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* शरीर के किसी अंग में दर्द की टीस उठती हो, तो आप सुबह-शाम पीसे हुए आंवले का चूर्ण गुनगुने पानी के साथ फांक लें. फिर कुछ देर बाद पिसी हुई इलायची दूध में डालकर पीएं. इस प्रयोग से अंगों में चुस्ती-स्फूर्ति बनी रहेगी और शरीर के किसी भी अंग में दर्द की टीस नहीं उठेगी.

* लहसुन पीसकर लगाने से बदन के हर अंग का दर्द जाता रहेगा. किंतु इसे जल्द हटा लेना चाहिए, नहीं तो फफोले पड़ने का डर रहता है.

* राई यानी सरसों का लेप करने से हर प्रकार का दर्द मिट जाता है.

* गठिया के दर्द में एरंडी का छिला हुआ बीज पहले दिन एक, दूसरे दिन दो, इस प्रकार सात बीज तक खाएं. फिर प्रतिदिन एक-एक कम करके एक बीज पर ले आएं. इससे गठिया का दर्द हमेशा के लिए गायब हो जाएगा.

* जोड़ों के दर्द में अजवायन को पानी में डालकर पका लें और उस पानी की भाप दर्दवाले स्थान पर दें. देखते ही देखते दर्द दूर हो जाएगा.

* लहसुन की दो कलियां कुचलकर तिल के तेल में डालकर तेल गर्म करें और उससे जोड़ों पर मालिश करें. इससे भी बहुत लाभ होता है.

पथ्य-अपथ्यः जोड़ों के दर्द से बचने व इससे पीड़ित मरीज़ को दर्द से छुटकारा दिलाने के लिए रोग उत्पादक कारणों को टालना चाहिए. खट्टा, तीखा, ठंडा, रूखा भोजन नहीं करना चाहिए. चर्बी बढ़ानेवाले खाद्य पदार्थों से परहेज़ करना चाहिए. पौष्टिक और पचने में आसान चीज़ों को आहार में शामिल करें. शारीरिक श्रमवाले कामों से बचना चाहिए. साथ ही जागरण व मानसिक तनावों से भी दूर रहना चाहिए.

सुपर टिप

कड़वे तेल में अजवायन और लहसुन जलाकर उस तेल से मालिश करने से हर प्रकार के दर्द से छुटकारा मिलता है.

– मूरत पन्नालाल गुप्ता

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