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सेहत पर भारी पड़ता वर्कलोड… (The Effects Of Workload On Your Health)

Effects Of Workload

सेहत पर भारी पड़ता वर्कलोड… (The Effects Of Workload On Your Health)

कैसे हैंडल करें वर्कप्रेशर (Work Pressure) का स्ट्रेस (Stress)? अक्सर हम लोगों के मुंह से यह सुनते हैं कि बहुत बिज़ी हूं, वर्कलोड बहुत ज़्यादा है… यही हाल हमारा ख़ुद का भी है. न नींद पूरी होती है, न समय पर खाना… प्रोफेशनल लाइफ में बढ़ता कॉम्पटीशन, सबसे बेहतर करने का दबाव इस कदर बढ़ता जा रहा है कि हमारी सेहत बिगड़ रही है.

–   कम उम्र में ही हाई ब्लड प्रेशर.

–    बढ़ती हार्ट डिसीज़.

–   टाइप 2 डायबिटीज़.

–   ओबेसिटी यानी मोटापा.

–   सिरदर्द, कमरदर्द, गर्दन में अकड़न.

–    तनाव, डिप्रेशन, अवसाद.

–    अल्कोहल, स्मोकिंग की लत.

–   मन व शरीर में भारीपन आदि… ये तमाम शिकायतें हमारे बढ़ते वर्कलोड की देन हैं.

ज़ाहिर है पैसे कमाना ज़रूरी है. ऑफिस में अपने काम को ईमानदारी से करना भी अच्छी बात है, लेकिन काम का प्रेशर इतना भी न बढ़ जाए कि आप ज़िंदगी जीना ही भूल जाएं.

क्या आप पर भी है वर्कलोड?

यह जानने के लिए इन लक्षणों पर ध्यान दें…

रिलैक्सेशन के लिए आप अल्कोहल की शरण में ज़्यादा जाने लगे हैं: रिसर्च बताते हैं कि हफ़्ते में 40 घंटे से अधिक काम करने पर आपके शराब के सेवन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. आप इतने थक जाते हैं कि रिस्की अमाउंट में अल्कोहल का सेवन करने लगते हैं. वीकेंड में आप बहुत ज़्यादा शराब पी लेते हैं या जिस दिन आपका मूड ख़राब होता है, तो भी आप शराब की शरण में जाते हैं.

यह ट्राई करें: घर लौटते समय लैपटॉप, कंप्यूटर या फोन को न देखें, बल्कि अपने फेवरेट गाने सुनें या ऑडियो बुक भी अच्छा आइडिया है.

आपके काम की क्वालिटी व प्रोडक्टिविटी कम हो रही है: अगर आपका काम समय पर नहीं हो पा रहा, तो इसका मतलब है कि आपकी प्रोडक्टिविटी कम हो रही है. आपने काम करने के घंटे बढ़ा दिए हैं, पर इसका यह अर्थ नहीं कि आप ज़्यादा काम कर रहे हैं. स्टैनफोर्ड रिसर्च पेपर में पाया गया है कि जो लोग 70 घंटे प्रति हफ़्ता काम करते हैं, वो अपने उन साथियों के मुक़ाबले अधिक काम नहीं कर रहे होते, जो 56 घंटे प्रति हफ़्ता काम करते हैं, क्योंकि हम हर रोज़, हर मिनट काम नहीं कर सकते. यह प्रकृति के ख़िलाफ़ है और असंभव भी है.

यह ट्राई करें: टु डू लिस्ट तैयार करें और मल्टी टास्किंग अवॉइड करें. बेहतर होगा कि काम में भी प्राथमिकताएं तय करें. जो काम सबसे ज़रूरी है, वह पहले करें. टाइम मैनेजमेंट करें, टाइम टेबल बनाएं. इससे आप व्यवस्थित रहेंगे और कम प्रेशर महसूस करेंगे.

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आपकी नींद पूरी नहीं हो रही और दिन में थकान महसूस होती है: काम के बढ़ते बोझ के चलते नींद डिस्टर्ब होने लगती है. मन-मस्तिष्क शांत नहीं रहता, जिससे नींद न आने की समस्या व मानसिक तनाव बढ़ता जाता है. नींद पूरी न होने से अगले दिन ऑफिस में भी थकान महसूस होती है और आप काम पर भी फोकस नहीं कर पाते. इन तमाम वजहों से आपको टाइप 2 डायबिटीज़ व हार्ट डिसीज़ होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

यह ट्राई करें: ख़ुद को ब्रेक दें. काम के बीच-बीच में उठकर वॉक पर जाएं. थोड़ा स्ट्रेचिंग करें. इससे नींद व थकान दूर होगी और स्ट्रेस नहीं होगा.

डिप्रेशन महसूस होने लगा है: ज़्यादा काम करने से आपकी मेंटल हेल्थ ख़राब हो सकती है. एक स्टडी में पाया गया है कि जो लोग रोज़ाना 11 घंटे काम करते हैं, वो डिप्रेशन से अधिक जूझ रहे होते हैं, बजाय उन लोगों के जो 7-8 घंटे काम करते हैं.

यह ट्राई करें: आप मेडिटेशन ट्राई करें. यह मानसिक तनाव को दूर करके रिफ्रेश करता है.

आप ही नहीं, आपका दिल भी अधिक काम कर रहा होता है: वर्कलोड स़िर्फ आप पर ही असर नहीं डालता, बल्कि आपके अंगों को भी प्रभावित करता है. आप भले ही यह नोटिस नहीं कर पाते, लेकिन वर्क स्ट्रेस कॉर्टिसोल नाम का हार्मोन रिलीज़ करता है, जो हृदय पर असर डालता है. यह स्ट्रोक, कोरोनरी आर्टरी डिसीज़, टाइप 2 डायबिटीज़ और कैंसर तक को जन्म दे सकता है.

यह ट्राई करें: ज़्यादा देर तक बैठे रहने की बजाय स्टैंड अप मीटिंग्स करें, कॉफी ब्रेक में, लंच में भी डेस्क की बजाय साथियों के साथ खड़े होकर खाना खाएं. टी ब्रेक लें और फोन पर भी खड़े-खड़े या घूमते हुए बात करें.

आपकी गर्दन व कमर में दर्द रहने लगा है: ऑक्यूपेशनल एंड एनवायर्नमेंटल मेडिसिन जरनल ने अपनी स्टडी में यह पाया है कि लोग जितना अधिक काम करते हैं, उनकी कमर में दर्द होने का रिस्क उतना ही बढ़ जाता है. महिलाओं में यह दर्द गर्दन में अधिक होता है, जबकि पुरुषों में लोअर बैक पेन होता है. यह स्ट्रेस का लक्षण है, जो मसल टेंशन की वजह से होता है.

यह ट्राई करें: बेहतर होगा आप थेरेपिस्ट की मदद लें, अपनी तकलीफ़ों व स्ट्रेस के बारे में बात करके आप बेहतर महसूस करेंगे.

आपके रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं: अगर आपके पास रिश्तों के लिए समय होता भी है, तो स्ट्रेस और थकान के कारण आप में वो ऊर्जा नहीं होती कि कुछ बेहतर समय अपनों के साथ बिता सकें. आप डिप्रेशन में या चिढ़े हुए रहते हैं.

यह ट्राई करें: अपने काम के बीच में ही नॉन वर्क एक्टिविटीज़ के लिए भी समय निकालें. टाइम टेबल बनाएं- फ्रेंड्स के साथ गेट-टुगेदर रखें, मूवी जाएं, म्यूज़िक सुनें, एक्सरसाइज़, लॉन्ग ड्राइव या जो भी आपको अच्छा लगे, उसके लिए टाइम निकालें.

– गीता शर्मा

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सर्दियों में यूं रखें सेहत का ख़्याल (Winter Health Care)

Winter Health Care

सर्दियों में यूं रखें सेहत का ख़्याल (Winter Health Care)

ठंड का मौसम अपने साथ सर्दी-ज़ुकाम और कई तरह की एलर्जी (Allergies) और इंफेक्शन्स (Infections) लेकर आता है. ऐसे में ज़रूरी है कि आप अपना और अपनों का ख़ास ख़्याल रखें, ताकि सर्दियों (Winter) के सुहाने मौसम का लुत्फ़ उठा सकें.

विंटर हेल्थ प्रॉब्लम्स

सर्दी के मौसम में गठिया और अस्थमा के मरीज़ों की द़िक्क़तें काफ़ी बढ़ जाती हैं. किसी को सालभर पुरानी चोट परेशान करने लगती है, तो किसी को मसल पेन. इनके अलावा और

कौन-कौन-सी बीमारियां हैं, जो सर्दियों के मौसम में आपको परेशान कर सकती हैं, आइए जानें.

सर्दी-खांसी

सर्दी-खांसी एक आम समस्या है, लेकिन सर्दी के मौसम में यह आपको काफ़ी परेशान कर सकती है. यह  रोग काफ़ी संक्रामक होता है, इसलिए अगर घर में किसी को सर्दी है, तो वह  छींकते-खांसते व़क्त रुमाल का इस्तेमाल करे. बहती नाक, सीने में जकड़न, छींकें आना, सिरदर्द, गले में खराश और हल्का बुख़ार इसके लक्षण हैं.

होम रेमेडीज़

–    जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है, वे बार-बार सर्दी-ज़ुकाम से परेशान रहते हैं. ऐसे लोगों को, ख़ासतौर से सर्दियों में, आंवले का मुरब्बा खाना चाहिए.

–     आधा टीस्पून शहद में कुछ बूंदें नींबू का रस और चुटकीभर दालचीनी पाउडर मिलाकर दिन में दो बार लें.

–    गुनगुने नींबू पानी में शहद मिलाकर लेने से सर्दी-खांसी से राहत मिलती है.

–     सर्दी-खांसी से राहत पाने के लिए एक कप पानी में थोड़ी-सी अलसी मिलाकर उबालें. पांच मिनट बाद आंच से उतार लें. छानकर उसमें नींबू का रस और शहद मिलाकर पीएं.

–    घी में लहसुन की कुछ कलियां गरम करके खाएं. गरम-गरम लहसुन खाने से खांसी में काफ़ी राहत मिलती है.

–     रात को सोने पर खांसी की समस्या बढ़ जाती है, क्योंकि लेटने पर नाक में मौजूद कफ़ धीरे-धीरे गले तक जाने लगता है, जिससे खांसी बढ़ जाती है. इसके लिए बेहतरीन उपाय है कि आप सिर को थोड़ा ऊंचा रखें. इससे खांसी कम होगी और आप सो भी पाएंगे.

गले में इंफेक्शन

गले में खिचखिच और ड्राईनेस, जो धीरे-धीरे दर्द का कारण बनता है, यह गले के इंफेक्शन के कारण होता है. मौसम में आई ठंडक और इंफेक्शन्स के कारण ऐसा होता है.

होम रेमेडीज़

–    इसके लिए हमारी दादी-नानी का फेवरेट नुस्ख़ा है गरारा करना. गुनगुने पानी में चुटकीभर नमक डालकर गरारा करने से बैक्टीरिया निकल जाते हैं, जिससे गले की खराश से छुटकारा मिलता है. इसे दिन में दो-तीन बार करें.

–     हल्दीवाला दूध भी एक ऐसा ही रामबाण नुस्ख़ा है. यह गले की सूजन और दर्द से राहत दिलाता है. बार-बार होनेवाली खांसी में भी हल्दीवाला दूध काफ़ी राहत पहुंचाता है.

–     एप्पल साइडर विनेगर को आप हर्बल टी या गरारेवाले पानी में डालकर इस्तेमाल करें.

–     लहसुन की एक कली चूसने से भी गले के इंफेक्शन और दर्द से राहत मिलती है.

–     इसके अलावा हर्बल टी और गरमागरम सूप आपके लिए काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होगा.

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अस्थमा

यह फेफड़े की बीमारी है, जिसमें श्‍वासनली में जलन और दर्द होने लगता है. सीने में जकड़न, छींकें आना, खांसी और सांस फूलना इसके लक्षण हैं. यह दो तरह का होता है, एलर्जिक और नॉन एलर्जिक. एलर्जिक अस्थमा धूल, धुएं, पेंट आदि के कारण होता है, जबकि नॉन एलर्जिक अस्थमा कोल्ड, फ्लू, स्ट्रेस और ख़राब मौसम के कारण होता है.

होम रेमेडीज़

–    एक कप पानी में आधा टीस्पून मुलहठी पाउडर और आधा टीस्पून अदरक मिलाकर चाय बनाकर पीएं.

–     एक ग्लास दूध में आधा टीस्पून कद्दूकस अदरक और आधा टीस्पून हल्दी पाउडर डालकर दिन में दो बार लें.

–     एक कप उबलते पानी में एक टीस्पून दालचीनी पाउडर और 1/4 टीस्पून कालीमिर्च, पिप्पली और सोंठ का समान मात्रा में मिलाया हुआ चूर्ण मिलाकर 10 मिनट तक उबालें. पीने से पहले एक टीस्पून शहद मिलाएं. यह अस्थमा अटैक्स से काफ़ी राहत देता है.

–    एक बाउल गरम पानी में पांच-छह बूंदें लैवेंडर ऑयल डालकर भाप लें.

इन्फ्लूएंज़ा

सर्दियों के मौसम में सर्दी और फ्लू कभी भी किसी को भी अपनी गिरफ़्त में ले सकते हैं. यह एक ऐसी समस्या है, जिसमें आपकी सारी एनर्जी ख़त्म हो जाती है. नाक बहना, सिरदर्द, बदनदर्द, बुख़ार और थकान फ्लू के आम लक्षण हैं.

–     आधा टीस्पून गिलोय को पीसकर एक कप पानी में उबालकर पीएं. इससे फ्लू के लक्षणों से काफ़ी राहत मिलती है.

–     समान मात्रा में शहद और प्याज़ का रस मिलाकर दिन में तीन बार फ्लू जाने तक लें.

–     एक टीस्पून शहद में 10-12 तुलसी की पत्तियों का रस मिलाकर दिन में एक बार लेने से भी राहत मिलती है.

–     गरम पानी में कुछ बूंदें नीलगिरी तेल की डालकर भाप लेने से काफ़ी राहत मिलेगी.

–    एक कप पानी में कालीमिर्च पाउडर, जीरा और गुड़ डालकर उबालें. यह चाय फ्लू के लक्षणों से राहत दिलाती है. आप चाहें, तो गुड़ में तिल मिलाकर उसके लड्डू बनाकर खाएं.

जोड़ों में दर्द

ठंड के कारण मसल्स और हड्डियों में अकड़न-सूजन के कारण यह मौसम कुछ लोगों के लिए कष्टदायक बन जाता है. इसके लिए सबसे अच्छा उपाय है कि सोकर उठने पर आप स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज़ करें.

हल्की-फुल्की एक्सरसाइज़ आपको जोड़ों के दर्द से छुटकारा दिला सकती है.

–     आधी बाल्टी गरम पानी में दो कप सेंधा नमक मिलाकर उसमें टॉवेल डुबोकर प्रभावित जोड़ की सिंकाई करें.

–    रोज़ाना सुबह एक टीस्पून मेथी पाउडर फांककर एक ग्लास गुनगुना पानी पीएं.

–     नीलगिरी के तेल से जोड़ों पर मालिश करें. इससे दर्द और जलन दोनों में आराम मिलता है.

–    रात को सोने से पहले गुनगुने सरसों के तेल से जोड़ों पर मसाज करें. यह प्रभावित जोड़ों में रक्तसंचार बढ़ाता है, जिससे दर्द और अकड़न से राहत मिलती है.

–     एक कप गुनगुने पानी में एक टीस्पून एप्पल साइडर विनेगर और थोड़ा-सा शहद मिलाकर दिन में दो बार खाने से पहले लें.

हार्ट प्रॉब्लम्स

आपको जानकर हैरानी होगी कि ठंड में हार्ट अटैक्स के मामले बढ़ जाते हैं, क्योंकि ठंड के कारण हार्ट की कोरोनरी आर्टरीज़ सिकुड़ने लगती हैं, जिससे ब्लड प्रेशर कम हो जाता है.

–     जिन्हें हार्ट प्रॉब्लम्स हैं, उन्हें ख़ासतौर से सर्दियों में रोज़ाना चार-पांच लहसुन की कलियां खानी चाहिए. यह खून को पतला करने का काम करता है, जिससे ब्लड फ्लो सही तरी़के से होता है.

–     एक ग्लास गुनगुने पानी में आधा टीस्पून अर्जुन की छाल का पाउडर और शहद मिलाकर लें. इससे आपको काफ़ी राहत मिलेगी.

–     अदरक-लहसुन के रस में शहद या गुड़ मिलाकर खाने से भी हार्ट प्रॉब्लम्स में राहत मिलती है.

–     इसके अलावा खानपान का ध्यान रखें. दो बार में हैवी खाने की बजाय चार-पांच बार में थोड़ा-थोड़ा खाएं. अपने वज़न को नियंत्रित रखें. अगर वज़न अचानक से बढ़ने लगे, तो डॉक्टर को बताएं.

– सुनीता सिंह

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Personal Problems: क्या मेडिकल एबॉर्शन सेफ और इफेक्टिव है? (Is The Medical Abortion Safe?)

मेरी नौ महीने की बेटी है, जिसे मैं ब्रेस्ट फीडिंग करती हूं. मेरी प्रेग्नेंसी रिपोर्ट पॉज़ीटिव (Pregnancy Report Positive) आई है और सोनोग्राफी में 5 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी का पता चला है. मेरे डॉक्टर ने मुझे सर्जिकल एबॉर्शन (Surgical Abortion) की बजाय मेडिकल एबॉर्शन (Medical Abortion) की सलाह दी है. क्या यह सेफ और इफेक्टिव है?
– महिमा झा, हिसार.

स्टडीज़ में यह बात साबित हो चुकी है कि मेडिकल एबॉर्शन सेफ और इफेक्टिव तरीक़ा है. इसमें दो गोलियां दी जाती हैं. सर्जिकल प्रोसीजर भले ही कितना भी छोटा हो, फिर भी उसमें एनीस्थिसिया दिया जाता है और प्रोसीजर में कॉम्प्लीकेशंस की संभावना भी बनी रहती है, क्योंकि आपके डॉक्टर ने आपको मेडिकल एबॉर्शन की सलाह दी है, तो उन्होंने इसके बारे में आपको पूरी जानकारी भी दी होगी. इसलिए बेफिक्र रहें. ये बिल्कुल सेफ है.

यह भी पढ़ें: Personal Problems: क्या ब्रेस्ट कैंसर की गांठ में दर्द होता है? (Is Breast Cancer Lump Painful?)

Medical Abortion
मेरी उम्र 27 साल है और रेग्युलर एक्सरसाइज़ व डायटिंग के बावजूद मेरा वज़न बढ़ रहा है. मेरे बाल बहुत झड़ गए हैं और पीरियड्स भी अनियमित हो गए हैं. साथ ही मुझे बहुत ज़्यादा ठंड भी लगती है. डॉक्टर ने पॉलिसिस्टिक ओवेरियन डिसीज़ की जांच के लिए टेस्ट भी करवाया, पर रिपोर्ट्स नॉर्मल आईं. अब उन्हें थायरॉइड की आशंका है और वे मेरा ब्लड टेस्ट कराना चाहते हैं, लेकिन क्या यह थायरॉइड हो सकता है?
– वानी त्रिवेदी, बीकानेर.

थायरॉइड ग्लैंड हमारे गले में स्थित सबसे बड़ा एंडोक्राइन ग्लैंड है, जो थायरॉइड हार्मोंस- टी3 और टी4 का निर्माण करता है. आपके द्वारा बताए गए लक्षणों को देखकर लगता है कि आपको हाइपोथायरॉइडिज़्म है. इसे कंफर्म करने का तरीक़ा स़िर्फ ब्लड टेस्ट ही है, तभी आपके टी3 और टी4 हार्मोंस के लेवल्स का पता चल पाएगा. इसके बाद ही डॉक्टर आपको दवाइयों आदि के बारे में बता पाएंगे.

यह भी पढ़ें: Personal Problems: मेनोपॉज़ के क्या लक्षण होते हैं? (What Are The Signs And Symptoms Of Menopause?)

Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

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Personal Problems: क्या ब्रेस्ट कैंसर की गांठ में दर्द होता है? (Is Breast Cancer Lump Painful?)

मैं 27 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. 4 महीने पहले मेरी मां की ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) के कारण सर्जरी (Surgery) हुई है. पिछले कुछ हफ़्तों से मेरी बाईं छाती में गांठ जैसी महसूस हो रही है, जिसे छूने पर दर्द होता है. क्या मुझे गायनाकोलॉजिस्ट (Gynecologist) को मिलना चाहिए?
– गहना उपाध्याय, हावड़ा.

अगर आपको गांठ महसूस हो रही है, तो आपको तुरंत किसी गायनाकोलॉजिस्ट को मिलना चाहिए. आमतौर पर कैंसरयुक्त गांठ में दर्द नहीं होता, पर क्योंकि हाल ही में आपकी मां ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित थीं, इसलिए आपके लिए रिस्क बढ़ जाता है. मैमोग्राफी या सोनोमैमोग्राफी के ज़रिए डॉक्टर आपकी गांठ की जांच कर सकते हैं. इसके अलावा हर महिला को माहवारी के 8वें दिन सेल्फ ब्रेस्ट एक्ज़ामिनेशन करना चाहिए. इसके लिए आइने के सामने खड़े होकर अपने हाथों को पुट्ठों पर रखकर दोनों ब्रेस्ट्स का आकार देखें. निप्पल्स से किसी प्रकार का स्राव तो नहीं हो रहा. उसके बाद उंगलियों से दबाकर देखें कि कहीं कोई गांठ तो नहीं. 40 साल के बाद सभी महिलाओं को हर साल मैमोग्राफी करानी चाहिए.

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Breast Cancer

मैं 32 वर्षीया महिला हूं. मेरा एक साल का बेटा भी है. मेरे पति विदेश में रहते थे, इसलिए मैंने कभी कोई फैमिली प्लानिंग (Family Planning) नहीं की थी, लेकिन पिछले महीने मेरे पति विदेश से लौटे, तो मैंने कंसीव कर लिया था, पर चूंकि मेरा बेटा बहुत छोटा है, इसलिए मैंने एबॉर्शन करा लिया. अभी मैं एक साल और कंसीव नहीं करना चाहती. कृपया, मुझे फैमिली प्लानिंग की सही सलाह दें.
– कविता गुप्ता, इंदौर.

 

एबॉर्शन के 10-12 दिनों बाद ही महिलाओं में फर्टिलिटी लौट आती है, इसलिए आपको कोई गर्भनिरोधक विकल्प ज़रूर अपनाना चाहिए. आज मार्केट में कई प्रकार के गर्भनिरोधक मिलते हैं. आपकी मेडिकल हिस्ट्री, सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ की हिस्ट्री आदि देखने के बाद ही आपका डॉक्टर आपको सही सलाह दे पाएगा. इसलिए तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें और अपनी सुविधानुसार सही विकल्प चुनें.

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Dr. Rajshree Kumar
डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

 

 

 

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Personal Problems: 40 की उम्र में महिलाओं को कौन-से टेस्ट्स कराने चाहिए? (Medical Tests For Women in Their 40s)

मैं 39 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. मैं यह जानना चाहती हूं कि मेरे लिए इस उम्र में कौन-से टेस्ट्स करवाने ज़रूरी हैं?
– पल्लवी राणा, इंदौर.

 

किसी भी हेल्थ प्रोफेशनल से आप अपना जनरल चेकअप करवा सकती हैं, जिसमें ब्लड प्रेशर, पल्स रेट, चेस्ट व हार्ट की जांच के अलावा सिर से पैर तक की जांच की जाती है. इसके साथ ही पैप स्मियर टेस्ट व पेल्विक की जांच भी ज़रूर करवाएं. अगर कुछ डिटेक्ट हुआ, तो आपको सोनोग्राफी भी करानी पड़ सकती है. इसके अलावा साल में एक बार बेसिक एक्ज़ामिनेशन, जैसे ब्लड टेस्ट, लिपिड प्रोफाइल, लिवर और किडनी प्रोफाइल, चेस्ट एक्स-रे और ईसीजी ज़रूर करवाएं. अगर आप फिट और हेल्दी हैं, फिर भी हर साल आंख और दांत की जांच ज़रूर करवाएं.

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Medical Tests For Women

पिछले हफ़्ते मेरी ऑफिस की सहेली अचानक बेहोश हो गई, जो प्रेग्नेंट थी. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी इमर्जेंसी सर्जरी करनी पड़ी. डॉक्टर ने बताया कि वह एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी (Ectopic Pregnancy) की शिकार हुई है. यह क्या है? क्या भविष्य में उसकी प्रेग्नेंसी नॉर्मल होगी?
– सरला पटेल, रोहतक.

 

इस अवस्था में भू्रण यूटेरस के अंदर रहने की बजाय बाहर आमतौर पर ट्यूब्स में रह जाता है, जिससे भू्रण 5-6 हफ़्तों से ज़्यादा सुरक्षित नहीं रहता. आमतौर पर महिलाओं को पेट में मरोड़, वेजाइनल ब्लीडिंग, कंधों आदि में दर्द होता है. एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी सर्विक्स, ओवरीज़ या एब्डोमेन में भी हो सकती है. अगर उनका दूसरा ट्यूब ठीक है, तो भविष्य में वह प्रेग्नेंट हो सकती हैं.

यह भी पढ़ें:  Personal Problems: क्या पति का स्पर्म काउंट टेस्ट कराना ज़रूरी है? (Should You Get Your Husband’s Sperm Count Checked?)

Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

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Personal Problems: कहीं फिर बच्चे का वज़न कम न हो? (Top Reasons For Low Birth Weight In New Born?)

पिछली डिलीवरी में मेरे बच्चे (Child) का वज़न (Weight) स़िर्फ 2 किलो था, पर डॉक्टर ने इसका कारण नहीं बताया. अब मैं दोबारा प्रेग्नेंट हूं और मुझे डर लग रहा है कि कहीं इस बार भी मेरे बच्चे का वज़न कम (Low Weight) न हो. पिछली बार मैं स़िर्फ 3 बार चेकअप के लिए गई थी. इस बार क्या करूं?
– आरोही हांडे, नासिक.

जन्म के बाद जिन बच्चों का वज़न ढाई किलो से कम होता है, उन्हें लो वेट बर्थ कहते हैं. इसका एक अहम् कारण प्री मैच्योर डिलीवरी हो सकती है. इसके अलावा प्रेग्नेंसी में मां का ग़लत खानपान, बार-बार इंफेक्शन, धूम्रपान और अल्कोहल भी इसके कारण हो सकते हैं. जैसा कि आपने बताया कि पिछली बार आप स़िर्फ 3 बार चेकअप के लिए गई थीं, इससे साफ़ पता चलता है कि पिछली प्रेग्नेंसी के दौरान आपने कितनी लापरवाही बरती. इस दौरान सही खानपान और नियमित रूप से डॉक्टर से चेकअप बहुत ज़रूरी होता है. नियमित चेकअप से डॉक्टर समय-समय पर आपके और बच्चे की सही स्थिति के बारे में जानकारी देते रहते हैं. वैसे भी गर्भावस्था के दौरान खानपान, परहेज़, ज़रूरी सावधानियों के अलावा नियमित चेकअप करवाना बेहद ज़रूरी है.

यह भी पढ़ें: क्या विटामिन डी3 लेवल चेक कराने की ज़रूरत है? (Do You Need To Go For A Vitamin D3 Test?)

Reasons For Low Birth Weight

मैं 35 वर्षीया दो बच्चों की मां हूं. हम तीसरा बच्चा नहीं चाहते थे, पर चूंकि मैंने कंसीव कर लिया था, इसलिए एबॉर्शन करवाना पड़ा. एबॉर्शन के तुरंत बाद डॉक्टर ने गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने की सलाह दी. पर अगर इनका इस्तेमाल मैं कुछ दिनों बाद करूं, तो क्या इस बीच कंसीव करने की संभावना है?
– कुसुम जोशी, जबलपुर.

एबॉर्शन के 10-12 दिनों बाद ही महिलाओं में ओव्यूलेशन शुरू हो जाता है, इसलिए अगर आपको बच्चे नहीं चाहिए, तो तुरंत किसी गर्भनिरोधक का इस्तेमाल शुरू कर दें. बार-बार एबॉर्शन से पेल्विक इंफेक्शन, एब्नॉर्मल डिस्चार्ज और पेट में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं, इसलिए तुरंत किसी गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करें.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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Personal Problems: ट्रिपल टेस्ट क्या होता है? (What Is Triple Test?)

मैं 35 वर्षीया महिला हूं, पर अभी तक मां नहीं बन पाई हूं. कुछ समय पहले मैंने कंसीव किया था, पर ट्यूब में प्रेग्नेंसी होने के कारण तुरंत सर्जरी करवानी पड़ी थी. मुझे यह जानना है कि क्या इसके बाद मैं नेचुरली कंसीव कर पाऊंगी?
– राजेश्‍वरी पांडेय, पालमपुर.

महिलाओं में दो ट्यूब्स होती हैं, जिन्हें फैलोपियन ट्यूब्स कहते हैं. ये क़रीब 10 सेंटीमीटर लंबी होती हैं. ट्यूबरकुलोसिस (टीबी), प्रमेह, सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ और अन्य यौन रोगों के कारण ट्यूब्स में इंफेक्शन हो सकता है या वो पूरी तरह ख़राब भी हो सकती हैं. जैसा कि आपने बताया कि आपकी इमर्जेंसी में सर्जरी की गई थी, दरअसल उसमें आपकी डैमेज्ड ट्यूब निकाल दी गई होगी. सबसे पहले आपकी दूसरी ट्यूब को चेक करना होगा कि उसमें कोई इंफेक्शन तो नहीं, क्योंकि अगर आपकी एक ट्यूब भी सही-सलामत है, तो आपके नेचुरली कंसीव करने के अभी भी 50% चांसेस हैं. इस बारे में अधिक जानकारी के लिए किसी फर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलें.

यह भी पढ़ें: क्या विटामिन डी3 लेवल चेक कराने की ज़रूरत है? (Do You Need To Go For A Vitamin D3 Test?)

Triple Test

मैं 36 वर्षीया महिला हूं और मेरी पहली प्रेग्नेंसी को 2 महीने हो गए हैं. सोनोग्राफी के बाद डॉक्टर ने सब नॉर्मल बताया, पर चौथे महीने में ट्रिपल टेस्ट कराने की सलाह भी दी है. यह टेस्ट किसलिए है?
– चेतना पटवा, आगरा.

यह प्रेग्नेंसी की दूसरी तिमाही में किया जानेवाला एक ब्लड टेस्ट है. दरअसल, आपकी उम्र 35 साल से ज़्यादा है और इस उम्र के बाद प्रेग्नेंसी में कुछ असामान्यताएं आ सकती हैं, इसलिए डॉक्टर ने आपको यह टेस्ट कराने की सलाह दी है. ट्रिपल टेस्ट के ज़रिए यह जानने की कोशिश की जाती है कि कहीं गर्भवती मां को कोई क्रोमोज़ोमल असामान्यताएं या फिर न्युरल ट्यूब डिफेक्ट्स की संभावना तो नहीं. आमतौर पर इस टेस्ट के साथ अल्ट्रासाउंड भी किया जाता है. अगर किसी तरह की असामान्यता पाई गई और टेस्ट पॉज़ीटिव आया तो,  आपको एक और टेस्ट कराने की सलाह दी जा सकती है.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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क्या विटामिन डी3 लेवल चेक कराने की ज़रूरत है? (Do You Need To Go For A Vitamin D3 Test?)

मैं 39 वर्षीया महिला हूं और कमरदर्द से परेशान हूं. पेनकिलर्स लेने पर थोड़ी देर के लिए आराम हो जाता है, पर फिर स्थिति वही हो जाती है. डॉक्टर ने मुझे विटामिन डी3 लेवल (Vitamin D3 Level) चेक कराने की सलाह दी है. क्या यह ज़रूरी है? कृपया मेरा मार्गदर्शन करें. 
– ज्योति पांडे, भोपाल.

विटामिन डी दो प्रकार के होते हैं, डी2 और डी3. जहां डी2 भोजन और सप्लीमेंट से प्राप्त होता है, वहीं डी3 भोजन के अलावा सूरज की रोशनी से भी मिलता है. कैल्शियम मेटाबॉलिज़्म और बोन रिमॉडलिंग में इसका इस्तेमाल होता है. विटामिन डी हमारे इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाने के साथ-साथ, ब्रेन को डेवलप करने और हार्ट को हेल्दी बनाने का काम करता है. हड्डियों की मज़बूती के लिए यह बहुत ज़रूरी है, इसलिए अपना डी3 लेवल चेक कराएं, ताकि पता चल सके कि कहीं आपमें इसकी कमी तो नहीं.

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Vitamin D3 Test

मैं 17 साल की कॉलेज स्टूडेंट हूं. 13 साल की उम्र में मेरे पीरियड्स शुरू हो गए थे, पर कभी नियमित रूप से पीरियड्स आए नहीं. पिछले दो साल में स़िर्फ दो बार पीरियड्स आए हैं. डॉक्टर का कहना है कि इस उम्र में ऐसा होना सामान्य है, पर मेरी सभी सहेलियों के पीरियड्स नियमित हैं, इसलिए मुझे चिंता हो रही है. कृपया, मार्गदर्शन करें.
– रूपल मेहता, सूरत.

आमतौर पर पीरियड्स शुरू होने के दो साल तक अनियमित रहते हैं. कभी-कभार तो डेढ़ या दो महीने बाद पीरियड्स आते हैं, पर ज़्यादातर मामलों में 2 साल के बाद पीरियड्स नियमित हो जाते हैं, जबकि आपके मामले में ऐसा नहीं हुआ. आपको डरने की ज़रूरत नहीं. डॉक्टर से मिलकर आपको जनरल चेकअप के साथ-साथ कुछ ब्लड टेस्ट्स कराने होंगे, ताकि किसी भी तरह के हार्मोनल इश्यूज़ के बारे में पता चल सके. हो सकता है, इसका कारण थायरॉइड या पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिसीज़ हो, पर आप घबराएं नहीं, क्योंकि हर महिला का शरीर अलग होता है, इसलिए तुलना न करें, बल्कि डॉक्टर से मिलें.

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किस हेल्थ प्रॉब्लम में क्या खाएं, क्या न खाएं? (Health Problems Associated With Foods)

Health Problems

किस हेल्थ प्रॉब्लम में क्या खाएं, क्या न खाएं? (Health Problems Associated With Foods)

रोज़मर्रा की व्यस्त जीवनशैली में हम अक्सर कुछ न कुछ ऐसा खा लेते हैं, जो संतुलित तो बिल्कुल नहीं होता, लेकिन उसे खाने से कोई न कोई स्वास्थ्य समस्या (Health Problems) ज़रूर खड़ी हो जाती है. न चाहते हुए डॉक्टर के पास जाना ही पड़ता है. यदि आप डॉक्टर के पास नहीं जाना चाहते हैं, तो आपके लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि किस बीमारी में क्या खाएं और क्या न खाएं?

डायबिटीज़

क्या खाएं?

–    हरी सब्ज़ियां, सोया, मूंग, काला चना, ब्राउन राइस, राजमा और अंडे का  स़फेदवाला भाग- ये लो ग्लाइसेमिक इंडेक्सवाली चीज़ें होती हैं, जो शरीर में जाकर धीरे-धीरे ग्लूकोज़ में बदलती हैं.

–    प्रोटीन और फाइबर से भरपूर चीज़ें खाएं, जैसे- लोबिया और स्प्राउट्स आदि.

–    फलों में चेरी, स्ट्रॉबेरी, सेब, संतरा, अनार, पपीता आदि और सब्ज़ियों में करेला, लौकी, तोरई, कद्दू, खीरा, टमाटर आदि खाएं.

–    रोज़ाना एक मुट्ठी मिक्स ड्रायफ्रूट्स ज़रूर खाएं.

–    करेला, लौकी, टमाटर, ऐलोवीरा का जूस डायबिटीज़ में बहुत फ़ायदेमंद होता है.

क्या न खाएं?

–    गुड़, शक्कर, शहद, चॉकलेट, केक, पेस्ट्री आदि मीठी चीज़ें न खाएं.

–    मैदा, सूजी, स़फेद चावल, स़फेद ब्रेड, नूडल्स, पिज़्ज़ा, बिस्किट्स न खाएं. ये हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्सवाली चीज़ें होती हैं, जो शरीर में जाकर जल्दी-जल्दी ग्लूकोज़ में परिवर्तित होती हैं.

–    तली हुई चीज़ें, मक्के का आटा, पैक्ड फूड बिल्कुल न लें.

–    आम, चीकू, केला, अंगूर, अनन्नास में ज़्यादा शक्कर होता है, इसलिए इन्हें न खाएं.

–    स्टार्च और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर सब्ज़ियां- आलू, अरवी, जिमीकंद, कटहल, शकरकंद, चुकंदर न खाएं, क्योंकि इनमें ग्लूकोज़ अधिक होता है.

हार्ट अटैक

क्या खाएं?

–    हरी सब्ज़ियां, दालें, स्ट्रॉबेरी, संतरा, केला, सीताफल- इनमें कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटैशियम होता है.

–    सूप, सलाद, खट्टे फल, आड़ू, सोया, नींबू पानी, काला चना, लोबिया खाना बहुत फ़ायदेमंद होता है.

–    ओमेगा3 से भरपूर- बादाम, अलसी, फिश ऑयल और अखरोट ज़रूर लें.

क्या न खाएं?

–    हाई फैट डायट (मक्खन, घी, मलाई आदि) में सैचुरेटेड फैट होता है, इसलिए इनका सेवन कम करें.

–    खाने में नमक की मात्रा कम रखें. टेबल सॉल्ट का इस्तेमाल बिल्कुल न करें.

–    अजीनोमोटो, बेकिंग पाउडर, सॉस, अचार, पैक्ड फूड, बेकरी फूड न खाएं.

अस्थमा

क्या खाएं?

–    नींबू, कीवी, आंवला, ब्रोकोली, टमाटर, शिमला मिर्च में विटामिन सी अधिक होता है.

–    डायट में जौ और चोकर सहित गेहूं के आटे की रोटियां, दलिया, मूंग दाल ज़रूर लें.

–    चेरी, खुबानी, शकरकंद, हरी मिर्च, गाजर में बीटा कैरोटिन होता है, इन्हें ज़रूर खाएं.

–    प्रोटीन, विटामिन बी और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ, जैसे- दाल, सोयाबीन, अंडा, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां आदि खाएं.

–    भिगोई हुई मूंगफली अस्थमा में बहुत फ़ायदेमंद होती है.

क्या न खाएं?

–    तला हुआ भोजन, जंक फूड, पैक्ड फूड, बासी खाना, मक्खन न लें.

–    तली हुई मूंंगफली बिल्कुल न खाएं.

–    डेयरी प्रोडक्ट्स, खट्टी व ठंडी चीज़ें न खाएं.

–    केला, पका हुआ चुकंदर, कटहल, लोबिया आदि न लें.

कब्ज़

क्या खाएं?

–    कब्ज़ होने पर बिना नमक और बटरवाले पॉपकॉर्न खाएं. कम कैलोरीवाले इस फूड आइटम में फाइबर बहुत अधिक होता है.

–    आलूबुखारे में फाइबर के साथ-साथ सोर्बिटोल (विशेष तरह का कार्बोहाइड्रेट) होता है, जो कब्ज़ से राहत दिलाता है.

–    सब्ज़ियों की तुलना में बीन्स में दोगुना फाइबर होता है. बीन्स को सब्ज़ी के तौर पर ही नहीं, सूप, पास्ता और पुलाव में भी डालकर खा सकते हैं.

–    खुबानी, अंजीर, खजूर और किशमिश में फाइबर अधिक मात्रा में होते हैं, जो कब्ज़ दूर करते हैं.

–    ब्रोकोली, साबूत अनाज, होल गे्रन ब्रेड, पका हुआ केला, फल और फाइबरयुक्त चीज़ें विशेष रूप से खानी चाहिए.

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क्या न खाएं?

–    पनीर, आइस्क्रीम आदि डेयरी प्रोडक्ट्स दूध से बने होते हैं और दूध कब्ज़ बढ़ाता है.

–    फैट बढ़ानेवाले स्नैक्स, विशेष रूप से पोटैटो वेफर्स, फे्रंचफ्राइज कब्ज़ की समस्या और बढ़ा सकते हैं.

–    बेकरी प्रोडक्ट्स, जैसे- कुकीज़, पेस्ट्री और केक न खाएं, क्योंकि इनमें रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं.

–    कच्चा केला, प्याज़, मूली, रेड मीट, प्रोसेस्ड फूड (व्हाइट राइस, व्हाइट ब्रेड, व्हाइट पास्ता आदि) से कब्ज़ बढ़ता है.

–    उड़द दाल, अरवी, बैंगन, मसूर, मैदा से बनी चीज़ें, ठंडा व बासी खाना न खाएं.

डायरिया

क्या खाएं?

–    केला, दही-चावल, मूंग दाल खिचड़ी, धुली मसूर या मूंग दाल का सूप, लौकी का रायता जैसी हल्की चीज़ें खाएं.

–    ककड़ी, खीरा, तरबूज़, खरबूजा आदि वॉटरी फ्रूट्स ज़्यादा लें.

–    पपीता, बेल का मुरब्बा, मीठा सेब, अनार आदि फलों का सेवन करें.

–    नारियल पानी, छाछ, नींबू पानी, लस्सी, गन्ने का रस या फलों का जूस पीएं.

–    दही में केला मिलाकर नाश्ते, दोपहर और शाम को खाने से डायरिया में आराम मिलता है.

क्या न खाएं?

–    आलू, इमली, बैंगन, अरवी, ब्रोकोली, प्याज़, बीन्स, पत्तागोभी, अचार न खाएं.

–    तला, मसालेदार, बासी और गरिष्ठ भोजन खाने से बचें.

–    बिना ढकी हुई या बहुत देर से काटकर रखी हुई चीज़ें न खाएं.

–   सड़क के किनारे खड़े हॉकर्स या

शादी-पार्टी में पहले से कटा हुआ फ्रूट चाट-सलाद न खाएं.

सर्दी-ज़ुकाम

क्या खाएं?

–    सेब, चीकू, पपीता, अंजीर, शहतूत, अनार, कीवी, अंगूर आदि विटामिन सी से भरपूर फल व सब्ज़ियां खाएं.

–    सब्ज़ियों में पालक, चुकंदर, ब्रोकोली, लाल शिमला मिर्च, मशरूम, शलगम और गाजर ज़रूर खाएं.

–    गुड़ की तासीर गरम होती है, इसलिए गुड़ से बनी हुई चीज़ें खाएं.

क्या न खाएं?

–    यदि आपको सर्दी-ज़ुकाम जल्दी-जल्दी होता है, तो दही, पनीर, चीज़ कम खाएं. ये चीज़ें कफ़बढ़ाती हैं. सर्दी-ज़ुकाम सीज़नल प्रॉब्लम है, तो रात को दही न खाएं.

–    फ्राइड फूड, मसालेदार खाना, ठंडी चीज़ें, व्हाइट ब्रेड, पास्ता, नूडल्स न खाएं.

कफ़

क्या खाएं?

–    जिन चीज़ों की तासीर गरम हो, वे अधिक खाएं, जैसे- गरम सूप, गरम चाय आदि.

–    सिट्रस फल, अनन्नास, अनार, सेब, मौसंबी, बेरीज़, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, सोयाबीन, फलियां ज़्यादा से ज़्यादा खाएं.

–    तुलसी, सोंठ, शहद और अदरक का सेवन अधिक करना चाहिए.

क्या न खाएं?

–    दूध, बटर, पनीर, फैट बढ़ानेवाले फूड और नॉनवेेज फूड कम खाएं.

–    ठंडी चीज़ें खाने से कफ़ बढ़ता है, इसलिए उन्हें अवॉइड करें.

– देवांश शर्मा

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Personal Problems: मेनोपॉज़ के क्या लक्षण होते हैं? (What Are The Signs And Symptoms Of Menopause?)

मैं 40 वर्षीया महिला हूं और मेरे पीरियड्स बहुत अनियमित हो गए हैं. क्या ये मेनोपॉज़ (Menopause) की शुरुआत है? कृपया, बताएं कि आमतौर पर मेनोपॉज़ के क्या लक्षण (Symptoms) होते हैं?
– कुमकुम दुबे, नई दिल्ली.

मेनोपॉज़ हर महिला के जीवन में आनेवाला वह स्टेज है, जब उसका मासिक धर्म आना बंद हो जाता है. आमतौर पर यह 40 से 50 की उम्र में होता है. इस स्टेज को पेरीमेनोपॉज़ कहते हैं, जो लगभग 4 सालों तक रहता है, पर किसी-किसी के लिए यह स़िर्फ कुछ महीनों का होता है. इस दौरान पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं और जब सालभर पीरियड्स नहीं आते, तो समझ जाएं कि पेरीमेनोपॉज़ ख़त्म हो गया है. इस दौरान हॉट फ्लैशेज़ (अचानक से पूरे शरीर से पसीना आना), रात में पसीना आना, योनि में सूखापन, बार-बार यूरिन पास करने की इच्छा होना, नींद न आना, मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन, त्वचा का ड्राई हो जाना, मुंह सूखना जैसे लक्षण उभर सकते हैं.

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Symptoms Of Menopause

मैं 31 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. हाल ही में मेरे ओवेरियन ट्यूब्स का पोटेंसी टेस्ट हुआ, जिसमें दोनों ही ट्यूब्स ब्लॉक हैं. ऐसे में मैं किस तरह मां बन सकती हूं?
– राजेश्‍वरी वर्मा, पणजी.

जैसा कि आपने बताया कि आपकी दोनों ही ट्यूब्स ब्लॉक हैं, तो आपके पास प्रेग्नेंसी के लिए दो विकल्प हैं. पहला विकल्प है सर्जरी, जहां सर्जरी के ज़रिए ट्यूब्स के ब्लॉक्स निकाले जाएंगे. इसके बाद आप नेचुरली कंसीव कर सकती हैं, पर इसमें एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी के चांसेज़ ज़्यादा रहते हैं. दूसरा विकल्प है आईवीएफ. लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के कारण आईवीएफ में सफलता की संभावना पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बढ़ गई है. आईवीएफ की प्रक्रिया भी काफ़ी आसान और पेशेंट फ्रेंडली है. इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आप अपने गायनाकोलॉजिस्ट से बात कर सकती हैं, वो आपका सही मार्गदर्शन करेंगे.

यह भी पढ़ें:  पीरियड्स देरी से आने के क्या कारण हो सकते हैं? (What Could Be The Reasons For Delayed Periods?)

Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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इन 15 आदतों से बढ़ता है मोटापा (15 Bad Habits That Make You Fat)

अक्सर मोटापे (Obesity) से बचने के चक्कर में लोग ऐसी आदतें अपना लेते हैं, जो मोटापा कम करने की बजाय बढ़ा देती हैं. भूखे रहना, ठीक से खाना न खाना, फैट्स अवॉइड करना, लो फैटवाली चीज़ें खाना आदि ऐसी आदतें हैं, जो अनजाने में ही आपका मोटापा बढ़ा रही हैं. तो सावधान हो जाइए और इन आदतों (Habits) से बचने की कोशिश कीजिए.

Habits That Make You Fat

1. ब्रेकफास्ट न करना

ज़्यादातर लोग यह ग़लती करते हैं. ब्रेकफास्ट न करने से शरीर का मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है, जिससे दोपहर के बाद आप ओवर ईटिंग करना शुरू कर देते हैं. रिसर्च में यह बात साबित हो चुकी है कि जो लोग ब्रेकफास्ट नहीं करते, वो बाकी लोगों के मुक़ाबले 5 गुना तेज़ी से मोटापे के शिकार होते हैं.

2. नींद कम लेना या ज़्यादा

वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स के अनुसार, अगर आप 5 घंटे या उससे कम नींद लेते हैं या फिर 8 घंटे से ज़्यादा सोते हैं, तो बाकी लोगों के मुक़ाबले आपका बेली फैट ढाई गुना तेज़ी से बढ़ेगा.

3. बहुत तेज़ी से खाना

अगर आप खाना देखते ही कंट्रोल नहीं कर पाते और जल्दी-जल्दी खाना खा लेते हैं, तो आप अन्य लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा ओवरईटिंग करते हैं. दरअसल, हमारे ब्रेन को यह सिग्नल देने में कि पेट भर गया है 20 मिनट लगते हैं, इसलिए 10 मिनट में खाना ख़त्म न करें, बल्कि धीरे-धीरे चबा-चबाकर 20 मिनट तक खाएं. इससे आप ओवरईटिंग से बच जाएंगे.

4. लो फैटवाली चीज़ें खाना

वेट लॉस करने के लिए ज़्यादातर लोग लो फैटवाली चीज़ें खाना शुरू कर देते हैं, पर उन्हें यह जानकर हैरानी होगी कि कुछ कैलोरीज़ बचाने के चक्कर में वो ज़्यादा कैलोरीज़ खा लेते हैं. दरअसल, लो फैट प्रोडक्ट्स में मैन्युफैक्चरर्स फैट को शक्कर और दूसरे फैट्स से रिप्लेस करते हैं. ज़्यादा शक्कर के कारण आपको तुरंत भूख लग जाती है, जिससे आप आमतौर से डबल खा लेते हैं.

5. रोज़ाना सॉफ्ट ड्रिंक का सेवन

आपको शायद मालूम नहीं होगा कि एक सॉफ्ट ड्रिंक या सोडा में 11-15 ग्राम तक शक्कर होती है. सैन एंटोनियो के रिसर्चर्स ने इस बात का खुलासा किया है कि जो लोग रोज़ाना एक या दो सोडा पीते हैं, बाकी लोगों के मुक़ाबले उनका बेली फैट पांच गुना तेज़ी से बढ़ता है.

6. बहुत ज़्यादा टीवी देखना

जो लोग ज़्यादा टीवी देखते हैं, वो बाकी लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा स्नैक्स खाते हैं. फैटी और फ्राइड ये स्नैक्स चुपके-चुपके आपका वज़न बढ़ाते हैं और आपका ध्यान भी नहीं जाता.

7. प्लास्टिक की बॉटल से पानी पीना

इस ओर शायद ही आपने ध्यान दिया हो कि आपकी प्लास्टिक की वॉटर बॉटल कई बीमारियों के साथ-साथ मोटापा भी दे सकती है. प्लास्टिक बॉटल्स में मौजूद बीपीए इसे बढ़ावा देते हैं, इसलिए जल्द से जल्द अपनी प्लास्टिक की वॉटर बॉटल को स्टेनलेस स्टील या तांबे से रिप्लेस करें.

8. छोटी-छोटी बातों पर स्ट्रेस

स्ट्रेस होने पर अक्सर लोगों को अनहेल्दी चीज़ें खाने की क्रेविंग होती है. इस चक्कर में वे ओवरईटिंग कर लेते हैं. इसे स्ट्रेस ईटिंग कहते हैं. स्ट्रेस ईटिंग कब आपकी आदत में शुमार हो जाता है, आपको पता भी नहीं चलता और आप मोटापे के शिकार हो जाते हैं.

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Habits That Make You Fat

9. बड़ी प्लेट में खाना

एक स्टडी में यह पाया गया कि अगर ऑप्शन दिया जाए, तो 98.6% लोग खाने के लिए बड़ी प्लेट उठाते हैं. बड़ी प्लेट यानी ज़्यादा खाना और ज़्यादा कैलोरीज़ यानी कुल मिलाकर आपका बढ़ता मोटापा. कोशिश करें कि छोटी प्लेट में खाएं, चाहें, तो दोबारा ले लें, पर बड़ी प्लेट अवॉइड करें.

10. पर्याप्त पानी न पीना

पर्याप्त पानी पीने से हमारे बॉडी के सभी फंक्शन्स सुचारु रूप से चलते रहते हैं, पर कम पानी पीने से इनमें समस्या आती है. जब शरीर में पानी की कमी होती है, तो उसकी जगह बॉडी फैट लेने लगता है, जो मोटापे का कारण बनता है.

11. एक्सरसाइज़ न करना

अगर आप सही तरी़के से डायट नहीं फॉलो कर पा रहे हैं, तो कम से कम हफ़्ते में 5 दिन रोज़ाना 45 मिनट तक एक्सरसाइज़ करें. अगर आप यह भी नहीं करेंगे, तो रोज़ाना की एक्स्ट्रा कैलोरीज़ से बढ़नेवाले मोटापे के लिए किसी को दोष नहीं दे पाएंगे.

12. हेल्दी फैट्स से भी दूरी

मोटापे से बचने के लिए बहुत से लोग फैट्स से एकदम दूर रहते हैं, जबकि फ्लैक्स सीड्स और ड्रायफ्रूट्स से मिलनेवाले फैट्स न स़िर्फ हेल्दी होते हैं, बल्कि स्लिम बने रहने में भी आपकी मदद करते हैं, इसलिए अपने रोज़ाना के डायट में हेल्दी फैट्स को शामिल करें.

13. नमक को अनदेखा करना

रिसर्च में यह बात सामने आई है कि बहुत से लोग ज़रूरत से ज़्यादा क़रीब 50% अधिक नमक का सेवन रोज़ाना करते हैं. पैक्ड फूड, प्रोसेस्ड फूड और वेफर्स जैसे स्नैक्स में सोडियम की मात्रा बहुत अधिक होती है. नमक हमारे शरीर में न स़िर्फ वॉटर रिटेंशन बढ़ाता है, बल्कि मोटापे को भी बढ़ाता है.

14. न्यूट्रीशन लेबल न देखना

मार्केट में कुछ भी ख़रीदते व़क्त हम पैकेट के आगे देखते हैं, कभी पलटकर पैकेट के पीछे नहीं देखते, वरना हमें पता चल जाए कि उस प्रोडक्ट में कितनी शक्कर, कितना सोडियम, कितना फैट और कितनी कैलोरीज़ हैं. अगली बार कोई भी स्नैक्स का पैकेट ख़रीदें, तो उसमें मौजूद शक्कर, कैलोरीज़ की मात्रा यकीनन आपको चौंका देगी. आपने सोचा भी नहीं होगा कि अनजाने में आपने कितनी कैलोरीज़ का ओवरडोज़ कर लिया.

15. खाने के तुरंत बाद सो जाना

ज़्यादातर लोग खाना खाते ही बिस्तर पर लुढ़क जाते हैं, जबकि डॉक्टर्स भी कहते हैं कि खाने के 2 घंटे बाद सोएं. इससे हमारे शरीर को खाने को पचाने के लिए समय मिल जाता है, लेकिन ऐसा न करने से हम ख़ुद अपना ही नुक़सान कर बैठते हैं.

– सुनीता सिंह

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Personal Problems: क्या मुझे डायग्नॉस्टिक लैप्रोस्कोपी टेस्ट की ज़रूरत है? (Do I Need Diagnostic Laparoscopy Test?)

मेरी उम्र 35 साल है. शादी को 5 साल हो गए हैं, पर अभी तक मैं कंसीव नहीं कर पाई हूं. मेरी और मेरे पति की सभी रिपोर्ट्स नॉर्मल हैं, फिर भी डॉक्टर ने मुझे डायग्नॉस्टिक लैप्रोस्कोपी (Diagnostic Laparoscopy) की सलाह दी है, मुझे इस टेस्ट (Test) की ज़रूरत है?
– रजनी जोगी, भागलपुर.

मैं समझ सकती हूं कि आप ऑपरेशन की प्रक्रिया को लेकर परेशान हैं. डायग्नॉस्टिक लैप्रोस्कोपी टेस्ट एनीस्थिसिया की मदद से किया जाता है, जिसमें पेट, गर्भाशय, ट्यूब्स, ओवरीज़, पिछला कोई पेल्विक इंफेक्शन या फिर एंडोमिटिरियोसिस की संभावना की जांच की जाती है. कुछ मामलों में देखा गया है कि ओवरीज़ में एग तो बनते हैं, पर किसी इंफेक्शन के कारण ट्यूब्स के सिकुड़न या टेढ़ेपन की वजह से महिलाएं कंसीव नहीं कर पातीं. इसलिए यह टेस्ट ज़रूरी है, ताकि सही तरी़के से आपकी जांच हो सके.

Diagnostic Laparoscopy Test

मेरी पिछली प्रेग्नेंसी बहुत कष्टदायक थी. डिलीवरी के बाद नाल अपने आप नहीं निकली, इसलिए एनीस्थिसिया देकर निकालना पड़ा. इसके बाद खून की कमी हो गई और मुझे ब्लड चढ़ाना पड़ा. उसके बाद कई दिनों तक मुझे बहुत कमज़ोरी महसूस हुई. मैं दोबारा प्रेग्नेंट हूं और मुझे डर है कि कहीं पिछली बार वाली प्रॉब्लम दोबारा न हो जाए?
– ममता मेहता, चंडीगढ़.

जिस प्रकिया से आप गुज़री हैं, उसे नाल का मैन्युअल रिमूवल कहते हैं. इसका कारण गर्भाशय के आकार का असामान्य होना हो सकता है. असामान्य आकार के कारण नाल को निकलना मुश्किल हो जाता है, इसलिए उसे डॉक्टर को मैन्युअली निकालना पड़ता है. ऐसा दोबारा होने की भी संभावना है. अपने ऑब्सट्रेटीशियन को इस बारे में बता दें, ताकि वो पहले से ही ब्लड का इंतज़ाम कर सकें और ज़्यादा परेशानी न हो.

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