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मॉनसून में फिटनेस के लिए इंडोर एक्टिविटीज़ (Fitness Special: Indoor Activities For Monsoon)

Fitness Special
मॉनसून में फिटनेस के लिए इंडोर एक्टिविटीज़ (Fitness Special: Indoor Activities For Monsoon)

ख़ुद को फिट रखना आपका पैशन है, लेकिन बारिश की वजह से आप जिम नहीं जा पा रहे हैं. कोई बात नहीं, इंडोर एक्टिविटीज़ करके भी आप फिट रह सकते हैं. ट्रेडमिल, स्किपिंग, सूर्य नमस्कार, ऐरोबिक्स आदि बहुत सारी इंडोर एक्टिविटीज़ हैं, जिनके लिए किसी इक्विपमेंट की ज़रूरत नहीं होती और न ही जिम जाने की.

सूर्य नमस्कार
यह अपने आप में कंप्लीट एक्सरसाइज़ है. सूर्य नमस्कार करने के बाद अन्य वर्कआउट करने की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि इसमें इतने सारे स्टेप्स होते हैं, जिनसे पूरी बॉडी स्ट्रेच होती है और बॉडी भी शेप में रहती है. यदि आप भी मॉनसून में फिट एंड फाइन रहना चाहते हैं, तो प्रतिदिन कम से कम 20 बार सूर्य नमस्कार करें. धीरे-धीरे अपने स्टैमिना के अनुसार सूर्य नमस्कार का समय बढ़ाएं.

ब्रिस्क वॉक
मॉनसून में अगर वर्कआउट करने का मूड नहीं है, तो कोई बात नहीं. कान में ईयर फोन लगाकर म्यूज़िक सुनते हुए आप घर के अंदर ही 15-20 मिनट की ब्रिस्क वॉक कर सकते हैं.

स्किपिंग
मॉनसून में स्किपिंग करके भी आप फिट रह सकते हैं. फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि रोज़ाना 20 मिनट स्किपिंग करने से 700 कैलोरीज़ बर्न होती है. हड्डियां व जोड़ मज़बूत होते हैं और मांसपेशियां लचीली बनती हैं.

पुशअप्स एंड प्लैंक्स
पुशअप और प्लैंक्स करने के लिए किसी इक्विपमेंट की ज़रूरत नहीं होती. इसे करने से पीठ, पेट और पैर मज़बूत होते हैं, साथ ही फिज़िकल स्टैमिना बढ़ता है. मॉनसून में अगर फिट रहना चाहते हैं, तो प्रतिदिन कम से कम 20 पुशअप एंड प्लैंक्स करें. धीरे-धीरे अपने स्टैमिना के अनुसार बढ़ाते जाएं.

ट्रेडमिल
मॉनसून वर्कआउट के बारे में सोचते ही सबसे पहला नाम ट्रेडमिल का आता है. ट्रेडमिल पर रोज़ाना 15 मिनट से 45 मिनट तक चल सकते हैं. इसके अलावा ट्रेडमिल पर आप ब्रिस्क वॉक और जॉगिंग भी कर सकते हैं.

इंडोर साइकिलिंग
पार्क जैसी खुली हवादार जगह पर साइकिलिंग करने का मज़ा ही अलग है, लेकिन बारिश में साइकिलिंग करना थोड़ा ख़तरनाक हो सकता है, पर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. टे्रडमिल की तरह इंडोर साइकिलिंग करके भी आप मॉनसून में एक्टिव रह सकते हैं.

होम कार्डियो वर्कआउट
जिम जाने का मूड नहीं, तो होम कार्डियो वर्कआउट करें. इस वर्कआउट की शुरुआत क्विक वॉर्मअप सेशन से करें, फिर जंपिंग जैक, डंबल्स, बाईसेप्स कर्ल, ट्राईसेप्स कर्ल, स्कवैट्स और माउंटेन क्लाइंबर भी ट्राई कर सकते हैं. इन एक्सरसाइज़ को प्रतिदिन 30 मिनट करने से बांहें और पैर मज़बूत होते हैं.

डांस
इंडोर मॉनसून वर्कआउट को एंजॉय करने का बेस्ट तरीक़ा है डांस. वर्कआउट के लिए ऐसे सॉन्ग का सिलेक्शन करें, जो हाई एनर्जीवाले हों. इन हाई एनर्जीवाले सॉन्ग पर आप सोलो डांस भी कर सकते हैं और पार्टनर के साथ भी. डांस करने से एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न होती है और मांसपेशियां भी स्ट्रेच होती हैं.

ऐरोबिक्स
ऐरोबिक्स करने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि आप जिम गए बिना अपना वज़न कम कर सकते हैं और अपने को फिट रख सकते हैं. इस इंडोर एक्टिविटी को करने से मसल्स टोन्ड होती हैं और आप ख़ुद को भी एक्टिव महसूस करते हैं.

योगा
बारिश के कारण अगर जिम नहीं जा पा रहे हैं, तो आप योगा करके ख़ुद को फिट रख सकते हैं. क्या आप जानते हैं कि रोज़ाना 45 मिनट योगा करने से 700 कैलोरीज़ बर्न होती हैं. इसे करने से बॉडी में फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ती है, इम्यूनिटी स्ट्रॉन्ग होती है और श्‍वसन तंत्र में होनेवाली समस्याएं दूर होती हैं, जो मॉनसून में होना आम बात है.

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Indoor Fitness

हाउसहोल्ड एक्टिविटीज़
मॉनसून में हाउसहोल्ड एक्टिविटीज़ करके आप एक्टिव रह सकते हैं. शेल्फ्स और अलमारियां साफ़ करें, मशीन की जगह हाथों से कपड़े धोएं, पोछा लगाएं आदि. इन एक्टिविटीज़ से आप फिट भी रहेंगे और धीरे-धीरे आपका घर भी क्लीन हो जाएगा.

सीढ़ियां चढ़ना-उतरना
बारिश के मौसम में वॉकिंग या जॉगिंग करना संभव नहीं है, तो रोज़ाना 20 मिनट तक सीढ़ियां चढ़ें और उतरें. इस मौसम में एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करने के लिए यह बेस्ट वर्कआउट है. फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर आप रोज़ाना 15 मिनट भी सीढ़ियां चढ़ते-उतरते हैं, तो आपका 80% तक वर्कआउट होता है. यह ट्रेडमिल पर चलने जैसा ही वर्कआउट है. अगर आपके पास ट्रेडमिल नहीं है, तो ख़रीदने की बजाय सीढ़ियां चढ़ें-उतरें. सीढ़ियां चढ़ने व उतरने से न केवल मांसपेशियां लचीली होती हैं, बल्कि मेटाबॉलिक रेट भी बढ़ता है.

स्पोर्ट्स
अगर आपके घर के आसपास कोई क्लब हाउस या जिम है, तो वहां जाकर इंडोर गेम्स भी खेल सकते हैं, जैसे- बैडमिंटन, टेबल टेनिस, स्न्वैश आदि. स्पोर्ट्स बॉडी में एकत्रित फैट्स को कम करने और ख़ुद को एनर्जेटिक रखने का बेस्ट ऑप्शन है.

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Home Fitness

बच्चों के लिए बेस्ट इंडोर एक्टिविटीज़
आर्ट एंड क्राफ्ट: इसमें बच्चों को कलरफुल क्राफ्ट पेपर की मदद से फ्लावर मेकिंग, ग्रीटिंग कॉर्ड आदि बनाना सिखा सकते हैं.
कार्ड और बोर्ड गेम्स: इन गेम्स में बच्चों को फ्रूट्स, वेजीटेबल्स, अल्फाबेट्स, एनीमल कार्ड को अलग-अलग शेप्स और डिज़ाइन में अरेंज करना सिखा सकते हैं.

फन गेम्स: चेस, कैरम, पज़ल्स, लूडो, मैकेनिकल गेम्स आदि.

मूवी टाइम: बच्चों को एनिमेटेड 3डी/4डी मूवी दिखा सकते हैं. उनके मूवी टाइम को फन टाइम बनाने के लिए स्नैक्स का अरेंजमेंट ज़रूर करें.

इंडोर गार्डनिंग: इसमें बच्चे बैंगन, टमाटर, लहसुन, प्याज़ और हरे धनिया को छोटे गमलों में उगा सकते हैं. ये पौधे मॉनसून के लिए परफेक्ट प्लान्ट्स हैं, क्योंकि इन्हें अधिक सनलाइट की आवश्यकता नहीं होती.

स्टोरी टाइम: बच्चों के लिए ऐसा स्टोरी टाइम प्लान करें, जिसे वे एंजॉय कर सकें. बड़े बच्चों को स्टोरी बुक पढ़ने के लिए कहें और छोटे बच्चों को पिक्चर बुक्स और बोर्ड बुक्स दिखाकर स्टोरी सुनाएं.

पार्टी टाइम: बिना किसी कारण के बच्चों और उनके दोस्तों के लिए इनहाउस पार्टी प्लान करें, जैसे- गुड़िया का बर्थडे, उसकी शादी, पप्पी का बर्थडे. डांस और यम्मी स्नैक्स के साथ उनकी पार्टी को सफल बनाएं.

असिस्टेंट बनाएं: बच्चों को कुकिंग, क्लीनिंग, डस्टिंग में मदद करने के लिए प्रेरित करें. रिवॉर्ड के तौर पर उन्हें मूवी दिखाएं, फेवरेट गेम और फेवरेट ट्रीट दें.

कुकिंग एंड बेकिंग: इसमें बच्चों को सलाद, सैंडविच, कपकेक बनाना सिखा सकते हैं.

– पूनम कोठारी

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Personal Problems: क्या किडनी ट्रांसप्लांट के बाद प्रेग्नेंसी प्लान कर सकती हूं? (Can I Plan Pregnancy After Kidney Transplant?) )

मैं 28 वर्षीया महिला हूं. 4 साल पहले मेरा सफलतापूर्वक किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था. डॉक्टर ने कहा है कि अब मैं प्रेग्नेंट हो सकती हूं. पर क्या यह मेरे लिए ठीक होगा? मैं 30 साल की होने से पहले मां बनना चाहती हूं, क्या करूं?
– बानी झा, रायपुर.

हां, यह बिल्कुल सच है कि किडनी ट्रांसप्लांट के बाद भी आप प्रेग्नेंसी प्लान कर सकती हैं. पर बच्चे प्लान करने से पहले आप डॉक्टर से मिलकर यूनोसप्रेसेंट थेरेपी के बारे में डिस्कस करें. दरअसल, प्रेग्नेंसी में शुरुआती दो महीने भ्रूण के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. इस दौरान उसके शरीर के ऑर्गन्स बनते हैं. ऐसे में कुछ दवाइयां उसे नुक़सान पहुंचा सकती हैं, इसलिए डॉक्टर से इस बारे में पहले ही बात कर लें.

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Pregnancy

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हाल ही में डॉक्टर ने मेरा पैप स्मियर टेस्ट करने के बाद कॉलपोस्कोपी की सलाह दी है. उनके मुताबिक़ मुझे सर्वाइकल कैंसर तो नहीं है, पर पूरी तरह से तसल्ली करने के लिए यह टेस्ट और सर्वाइकल बायोप्सी भी ज़रूरी है. क्या यह टेस्ट पेनफुल होता है और क्या इसमें एनीस्थिसिया की ज़रूरत पड़ती है? कृपया, मेरा मार्गदर्शन करें.

– आकृति नायर, कोयंबटूर.

कॉलपोस्कोपी एक्ज़ामिनेशन में सामान्य दर्द होता है, इसलिए इसमें एनीस्थिसिया की ज़रूरत नहीं पड़ती. इस टेस्ट में डॉक्टर बारीक़ी से वेजाइना और सर्विक्स की जांच करते हैं, ताकि किसी भी तरह की एब्नॉर्मिलिटी छूट न जाए. आपके पैप स्मियर टेस्ट में डॉक्टर को किसी तरह की असामान्यता नज़र आई होगी, इसलिए इसकी मदद से बायोप्सी करना चाहते हैं. महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर से बचाने के लिए यह टेस्ट किया जाता है. यह एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसमें क़रीब 15-20 मिनट लगता है. आजकल इस मशीन में डिजिटल कैमरा भी लगा होता है, जिससे टेस्ट के बाद किसी तरह की असामान्यता पाए जाने पर डॉक्टर कंप्यूटर की मदद से आपको वो दिखा भी सकते हैं.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

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मॉनसून में कैसे रखें सेहत का ख़्याल? (Monsoon Health Care)

 

Monsoon Health Care
मॉनसून में कैसे रखें सेहत का ख़्याल? (Monsoon Health Care)

गर्मी की तपिश से राहत दिलानेवाली बारिश की फुहारें अपने साथ कई हेल्थ प्रॉब्लम्स भी लेकर आती हैं. सर्दी-ज़ुकाम जैसी आम समस्याओं के अलावा टायफॉइड, हैजा, मलेरिया जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारियां भी इसी मौसम की देन हैं, लेकिन सही खानपान और कुछ हेल्दी आदतें अपनाकर आप बरसात में होनेवाली बीमारियों से बच सकते हैं.

मॉनसून हेल्थ प्रॉब्लम्स

बारिश का मौसम अपने साथ कई आम व गंभीर बीमारियां भी लेकर आता है, इसलिए ज़रूरी है कि हम पहले से ही उसके लिए सावधान रहें. एटलांटा हॉस्पिटल के जनरल फिजिशियन डॉ. फतेह सिंह ने बरसाती बीमारियों से बचाव के बारे में हमें जानकारी दी.

डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया 

जहां डेंगू में तेज़ बुख़ार, बहुत ज़्यादा सिरदर्द और जोड़ों में दर्द होता है, वहीं बुख़ार, ठंड लगना, मांसपेशियों में दर्द और कमज़ोरी आना मलेरिया के लक्षण हैं. चिकनगुनिया के भी लक्षण लगभग यही हैं.

बचाव

–    इससे बचाव का सबसे आसान तरीक़ा यही है कि घर के आसपास कहीं भी पानी का जमाव न होने दें, ताकि मच्छरों को पनपने के लिए जगह न मिले.

–    घर में कबाड़ जमा करके न रखें. जितना हो सके, घर साफ़ रखें.

–    बारिश से पहले घर में पेस्ट कंट्रोल ज़रूर करवाएं.

हैजा

बारिश के मौसम में फैलनेवाली यह एक गंभीर व जानलेवा बीमारी है, जो दूषित भोजन या पानी के कारण होती है. गंदगी और हाइजीन की कमी इस बीमारी को बढ़ावा देती है. उल्टी और पतली दस्त इस बीमारी के शुरुआती लक्षण हैं.

बचाव

–    सबसे ज़रूरी है कि आप हैजे का टीका लगवाएं, इससे 6 महीनों तक आप सुरक्षित रहेंगे.

–   हाथ धोने के लिए लिक्विड हैंड सोप का ही इस्तेमाल करें.

–   साफ़ और शुद्ध पानी के लिए प्यूरिफायर का इस्तेमाल करें अथवा पानी उबालकर पीना सबसे बेहतरीन उपाय है.

–    दूध व दूध से बनी चीज़ें, जैसे- आइस्क्रीम, मलाई वगैरह ज़्यादा न खाएं.

–    स्ट्रीट फूड से दूर रहें.

टायफॉइड

बारिश के दौरान होनेवाली यह एक आम बीमारी है. यह भी दूषित पानी व खाने के कारण ही होती है. इसमें सबसे ख़तरनाक बात यह है कि ठीक होने के बावजूद इसका इंफेक्शन मरीज़ के गॉल ब्लैडर में रह जाता है. बुख़ार, पेटदर्द और सिरदर्द इसके लक्षण हैं.

Monsoon Health Tips

बचाव

यह एक संक्रामक बीमारी है, जो बहुत तेज़ी से फैलती है, इसलिए मरीज़ को अलग कमरे में दूसरों से थोड़ा दूर रखें.

–    उबला व साफ़ पानी ही पीएं.

–    डिहाइड्रेशन से बचने के लिए मरीज़ को लगातार लिक्विड डायट लेते रहना चाहिए.

–    खाना खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह ज़रूर धोएं.

–    होमियोपैथिक ट्रीटमेंट ज़्यादा मददगार होती है.

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डायरिया/ पेट के इंफेक्शन्स

इस मौसम में पेट की बीमारियां, जैसे- डायरिया और गैस्ट्रो सबसे ज़्यादा लोगों को परेशान करती हैं, जो वायरल या बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण हो सकती हैं. पेट के ज़्यादातर इंफेक्शन्स में उल्टी और दस्त होते हैं, जिसके लिए तुरंत डॉक्टर से मिलना बहुत ज़रूरी है.

बचाव

–    खानपान के साथ-साथ पर्सनल हाइजीन का  भी ख़ास ख़्याल रखें. टॉयलेट के बाद और डायपर बदलने पर हैंडवॉश से हाथ ज़रूर धोएं.

–    बर्तनों और कटिंग बोर्ड को अच्छी तरह साफ़ रखें.

–    ऐसे फल और सब्ज़ियां खाएं, जिनके छिलके निकाल सकते हैं.

–   अगर ट्रैवेल करनेवाले हैं, तो हेपेटाइटिस ए का टीका ज़रूर लगवाएं.

पीलिया

मॉनसून के दौरान लिवर में वायरल इंफेक्शन काफ़ी आम बात है. हेपेटाइटिस के वायरस पानी के ज़रिए तेज़ी से फैलते हैं. यह इंफेक्शन गंभीर हो सकता है, क्योंकि हेपेटाइटिस का कारण पीलिया होता है, जिससे आंखें और यूरिन आदि पीले पड़ जाते हैं.

बचाव

–    हेपेटाइटिस ए और बी का वैक्सीन लें.

–    दूषित खाने और पानी से बचें.

–    हाइजीन का ख़ास ख़्याल रखें.

हेल्थ अलर्ट्स

–    अगर तीन दिन से बुख़ार आ रहा है, तो ख़ुद से दवा खाने की बजाय डॉक्टर को दिखाएं, क्योंकि यह कोई गंभीर बुख़ार भी हो सकता है.

–   शरीर पर किसी भी तरह के रैशेज़ या फोड़े-फुंसी नज़र आएं, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं, यह कोई इंफेक्शन भी हो सकता है.

–    अगर आपको अस्थमा या कोई और ब्रीदिंग प्रॉब्लम है, तो ध्यान रखें कि सीलनवाली दीवार से चिपककर न बैठें. घर की दीवारें गीली न रखें, वरना फंगस के कारण आपको तकलीफ़ हो सकती है.

–    अस्थमा और डायबिटीज़ के मरीज़ ज़्यादा तीखा और मसालेदार खाना न खाएं, वरना उन्हें हेल्थ प्रॉब्लम्स हो सकती हैं.

–   डायबिटीज़ के मरीज़ नंगे पांव गीली ज़मीन पर न चलें, वरना जर्म्स और बैक्टीरिया से आपको इंफेक्शन हो सकता है.

मॉनसून डायट

मॉनसून में हमारी पाचन क्रिया धीमी हो जाती है, इम्यून सिस्टम कमज़ोर हो जाती है और शारीरिक क्षमता पर भी इसका असर पड़ता है. इस मौसम में खाना ठीक तरी़के से पचता नहीं, जिससे एसिडिटी और गैस जैसी समस्याएं होने लगती हैं. ऐसे में आपको खानपान का ख़ास ध्यान रखना चाहिए.

–    बारिश में उबालकर छाना हुआ पानी ही पीएं, वरना दूषित पानी के कारण बीमार पड़ सकते हैं.

–    मॉनसून में हरी पत्तेदार सब्ज़ियां खाने से बचें, क्योंकि बारिश में उनमें कीड़े लगने लगते हैं, जो आपके खाने के साथ पेट में जा सकते हैं.

–    मसालेदार और तले हुए खाने से अपच, उबकाई आना, वॉटर रिटेंशन आदि की समस्या हो सकती है.

–    रोज़ाना गर्म दाल या सूप ज़रूर पीएं. उसमें हल्दी, लौंग, कालीमिर्च और सौंफ ज़रूर डालें. यह इंफेक्शन से लड़ने में आपकी मदद करेगा.

–    खाने के बाद सौंफ का पानी पीने से गैस और एसिडिटी की समस्या नहीं होती. घर के सभी सदस्यों को खाने के बाद ये पानी दें.

–    उबला व अच्छी तरह पका हुआ खाना मॉनसून में आपकी सेहत की देखभाल करेगा.

–   एंटीबैक्टीरियल और एंटीऑक्सीडेंट के गुणों से भरपूर हर्बल टी और ग्रीन टी इस मौसम में काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होती हैं. इसे डेली डायट का हिस्सा बनाएं.

–    गाय का दूध पीएं. यह हल्का व सुपाच्य होता है, जिससे आपको इंस्टेंट एनर्जी मिलती है.

–    खाने में गेहूं के आटे और मैदा की जगह जौ और चने के आटे का इस्तेमाल करें.

–    रोज़ाना अरहर की दाल की बजाय मूंगदाल का इस्तेमाल करें.

–    फ्रेश फ्रूट्स में आप सेब, अनार, मोसंबी और केला खाएं. ड्रायफ्रूट्स को अपने डेली डायट का हिस्सा बनाएं.

–    इस मौसम में जितना हो सके, प्रोसेस्ड फूड अवॉइड करें.

–   नॉन वेज के शौक़ीन बरसात में इसका सेवन कम कर दें.

–    अगर आप दही खाना पसंद करते हैं, तो ज़रूर खाएं, पर उसमें नमक या शक्कर मिला लें.

–    इस मौसम में गाय का घी खाना काफ़ी फ़ायदेमंद होता है, क्योंकि वो न स़िर्फ आपकी पाचन क्रिया  को दुरुस्त रखता है, बल्कि रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर आपकी याद्दाश्त को बेहतर बनाता है.

–   कच्ची सब्ज़ियां और सलाद खाने से बचें. अगर घर पर खा रहे हैं, तो सब्ज़ियों को अच्छी तरह धोकर ही इस्तेमाल करें.

हेल्दी लाइफस्टाइल

–   बहुत ज़्यादा भीड़भाड़वाली जगह पर जाना अवॉइड करें, क्योंकि वहां वायरल इंफेक्शन होने की संभावना ज़्यादा रहती है.

–    फुल स्लीव शर्ट और फुल पैंट पहनें, ताकि मच्छर काट न सकें.

–    जिन्हें एलर्जी और इंफेक्शन्स की समस्या है, वो नीम की पत्तियों को उबालकर उसे नहाने के पानी में मिलाकर नहाएं.

–    एक्सरसाइज़ इस मौसम में भी उतनी ही ज़रूरी है, जितनी हर मौसम में.

–    हो सके तो शाम को घर पहुंचने पर नहाएं.

अपनाएं ये होम रेमेडीज़

–    सर्दी-खांसी से राहत के लिए एक कप पानी में सोंठ पाउडर उबालकर पीएं, राहत मिलेगी.

–    गले में ख़राश या दर्द है, तो गुनगुने पानी में नमक और हल्दी मिलाकर गरारे करें.

–    सर्दी से नाक बंद हो गई हो, तो गर्म पानी में नीलगिरी तेल कीकुछ बूंदें डालकर भाप लें या फिर रुमाल में उसकी कुछ बूंदें छिड़ककर सूंघें.

–    अगर वायरल फीवर है, तो एक कप पानी में तुलसी और अदरक मिलाकर उबाल लें. आंच से उतारकर शहद मिलाएं और चाय की तरह पीएं.

–    अपच व बदहज़मी से बचने के लिए हर बार खाने से पहले अदरक के एक छोटे से टुकड़े पर सेंधा नमक लगाकर खाएं.

–    रोज़ाना हल्दीवाला दूध न स़िर्फ आपको दूषित पानी के कारण होनेवाली बीमारियों से बचाएगा, बल्कि आपकी रोगप्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाएगा.

– सुनीता सिंह

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Personal Problems: पैप स्मियर टेस्ट क्यों कराया जाता है? (Why Do I Need A Pap Smear Test?)

मैं 32 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. मैं इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स के बारे में जानना चाहती हूं. क्या ये आम गर्भनिरोधकों की तरह है या इसके कुछ साइडइफेक्ट्स हैं?
– कुसुम मेहता, मुंबई.

इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स का इस्तेमाल असुरक्षित यौन संबंध के बाद इमरजेंसी में किया जाता है. इसे कभी भी रेग्युलर कॉन्ट्रासेप्टिव्स की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स दो तरह के हैं, एक प्रोजेस्टेरॉनयुक्त टैबलेट और दूसरा कॉपर टी. प्रेग्नेंसी टालने के लिए असुरक्षित यौन संबंध के 72 घंटों के भीतर टैबलेट का इस्तेमाल करना चाहिए, जबकि कॉपर टी के लिए 5 दिनों का समय होता है. इसके साइडइफेक्ट्स इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप कौन-सा मेथड इस्तेमाल कर रहे हैं. अनियमित माहवारी और उल्टी आना जैसे साइडइफेक्ट्स दोनों ही मेथड में हो सकते हैं, जबकि कॉपर टी में इंफेक्शन का भी डर रहता है. कभी-कभी मेथड फेल भी हो जाता है.

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Pap Smear Test

मैं 27 वर्षीया शादीशुदा महिला हूं और डॉक्टर ने मुझे रूटीन हेल्थ चेकअप में पैप स्मियर टेस्ट करने की सलाह दी है. क्या मुझे यह टेस्ट कराना चाहिए?
– कुमकुम अग्रवाल, देहरादून.

पैप स्मियर एक स्क्रीनिंग टेस्ट है, जिसके ज़रिए सर्विक्स में होनेवाले कैंसर व प्रीकैंसर सेल्स की जांच की जाती है. वैसे तो 21 वर्ष पार कर चुकी सभी महिलाओं को हर साल यह टेस्ट कराना चाहिए, ताकि शुरू में ही किसी समस्या का पता चल सके. अगर लगातार तीन सालों तक स्मियर टेस्ट निगेटिव आता है, तो यह टेस्ट हर तीन साल में 65 साल की उम्र तक कराना चाहिए. इसमें एक स्पेशल ब्रश के ज़रिए सर्विक्स के सेल्स को इकट्ठा कर टेस्ट के लिए लैब भेजा जाता है, ताकि पता चल सके कि कैंसर है या नहीं.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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बीमार न होने दें मन को (Take Care Of Your Emotional Health)

सारी हसरतें पूरी नहीं होतीं, कुछ ख़्वाब अधूरे भी रह जाते हैं, ज़िंदगी में सब कुछ मनचाहा ही हो यह ज़रूरी तो नहीं, ज़िंदगी को भी तो कभी मनमानी करने दें… ख़्वाहिशों पर बंदिशें तो नहीं लग सकतीं, लेकिन उनकी पूरी होने की शर्त क्यों? अगर शर्त रखेंगे, तो जी ही नहीं पाएंगे, भावनाओं में बहते जाएंगे और मन से बीमार हो जाएंगे. मन भी तो बहुत कुछ सहेजकर, संजोकर रखता है… जब सब कुछ मनचाहा नहीं होता, तो उसका सीधा असर मन पर ही तो होता है. ऐसे में ज़रूरी है अपने मन की सेहत का ख़्याल रखें और अपने मन को बीमार न पड़ने दें.

Family Health

हम अपने शरीर से बेहद प्यार करते हैं. यही वजह है कि उसे सजाते हैं, संवारते हैं, उसका हर तरह से ख़्याल रखते हैं. जब कभी शरीर में तकलीफ़ हो जाए, तो डॉक्टर के पास भी जाते हैं, एक्स्ट्रा केयर करते हैं. इसी तरह से जब हमारा मन बीमार पड़ता है, तो हम क्या करते हैं? हम में से अधिकांश लोगों का जवाब होगा कि कुछ नहीं, क्योंकि मन भी कभी बीमार पड़ता है?

लेकिन सच तो यही है, जिस तरह तन बीमार पड़ता है, उसी तरह मन भी बीमार पड़ता है. उसे भी उस व़क्त एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन हम शायद समझ ही नहीं पाते कि हमारा मन बीमार हो गया है, इसलिए बेहतर होगा कि अपने मन का भी ख़्याल रखें, उसे बीमार न होने दें और अगर बीमार हो भी जाए, तो मन के डॉक्टर के पास जाकर उसका भी इलाज करवाएं.

क्या हैं मन की बीमारी के लक्षण?

डर और घबराहट: यह एक बड़ा लक्षण है आपके मन की बीमारी का. आपके मन में बेवजह असुरक्षा की भावना आने लगती है. अंजाना डर और घबराहट-सी बनी रहती है. लोगों पर भरोसा कम करने लगते हैं. एक अविश्‍वास की भावना पनपने लगती है.

नाराज़गी, ग़ुस्सा व दोषारोपण: अगर आप अपनी ज़िंदगी की तकलीफ़ों के लिए बार-बार दूसरों पर दोषारोपण करते हैं, नाराज़गी व ग़ुस्सा दिखाते हैं, तो समझ लीजिए कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है. आपको अपनी परिस्थितियों की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेनी होगी. माना, आपके साथ बुरा हुआ होगा, लेकिन दोषारोपण समाधान नहीं है. हम नकारात्मक परिस्थितियों में भी किस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं, यह हम पर निर्भर करता है. ज़िम्मेदारियों से भागना कोई हल नहीं.

अपराधबोध, शर्मिंदगी, पश्‍चाताप: आपने कुछ ग़लतियां की होंगी. ज़ाहिर-सी बात है, ज़िंदगी परफेक्ट नहीं होती, हम सभी ग़लतियों से ही सीखते हैं, लेकिन उसके लिए कब तक अपराधबोध, शर्मिंदगी व पश्‍चाताप की भावना मन में बनाए रखेंगे? आपको ख़ुद को भी माफ़ करना सीखना होगा. आप भगवान नहीं हैं और हो सकता है आपकी वजह से दूसरों को या आपको भी तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ा हो, पर कब तक ख़ुद को दोषी मानते रहेंगे? माफ़ी मांग लें और ख़ुद को भी माफ़ कर दें.

चिड़चिड़ापन और नकारात्मकता: नकारात्मक भावनाएं कई कारणों से हो सकती हैं, लेकिन वह आपका स्वभाव ही बन जाए, तो ये मन के बीमार होने का संकेत है. नकारात्मकता ही चिड़चिड़ेपन को बढ़ाती है. पैसा, जॉब, रिश्ते व सामाजिक दबाव कई कारण हैं, जो नकारात्मक भावनाएं पैदा करते हैं, पर आपको ख़ुद यह निर्णय लेना होगा कि किस तरह से नकारात्मकता के कारणों से आप दूर रह सकते हैं.

एडिक्शन: जब मन और भावनाएं कमज़ोर हो जाती हैं, तो हम कई तरह की लतों के शिकार हो जाते हैं. एडिक्शन हमें कुछ पलों की राहत देते हैं और हमें लगता है हमारे सारे दर्द दूर हो गए, लेकिन एडिक्शन्स जब हमें पूरी तरह से अपनी गिरफ़्त में ले लेते हैं, तो मन और तन दोनों पर भारी पड़ जाते हैं. बेहतर होगा अपने ग़मों का इलाज लतों में न ढूंढ़ें.

उदासीनता व थकान: हमेशा थकान व उदासी महसूस करना शरीर के नहीं, मन के बीमार होने का संकेत है. ऊर्जा महसूस न होना, निराशावादी रवैया अपना लेना… इस तरह की भावनाएं यही इशारा करती हैं कि आपको अब मन के डॉक्टर की ज़रूरत है.

डिप्रेशन और आत्महत्या के ख़्याल: किसी भी गतिविधि में मन न लगना, किसी से बात न करना, सामाजिक क्रियाकलापों से दूर होते जाना, खाना कम कर देना, थका-थका महसूस करना जैसे लक्षण गहरे अवसाद की ओर इशारा करते हैं. यही अवसाद आगे चलकर आत्महत्या के ख़्यालों को जन्म देने लगता है. आपको लगने लगता है कि आपकी किसी को ज़रूरत नहीं, आपसे कोई प्यार नहीं करता… और यदि इस दौरान सही इलाज न करवाया जाए, तो आप ख़ुद अपनी जान के दुश्मन तक बन सकते हैं.

भावनात्मक कमज़ोरी: बात-बात पर रो देना, ख़ुद को असहाय व बेचारा महसूस करना मन की बीमारी का गहरा संकेत है. आपको लगता है कि कोई भी आपको प्यार नहीं कर सकता व अपना नहीं सकता. धीरे-धीरे आप लोगों से दूरी बनाने लगते हैं और अपनी ही परिधि में ़कैद हो जाते हैं. अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करते, ख़ुद मन ही मन घुटते रहते हैं.

सामाजिक गतिविधियों से दूर होना: आप पार्टीज़ में जाना बंद कर देते हैं, दोस्तों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों की ब्याह-शादी में न जाना… इस तरह से ख़ुद को आप समाज से काटने लगते हैं, क्योंकि आपको लगता है सभी आपके दुश्मन हैं और आपको कोई अपनाने को तैयार नहीं. ऑफिस पिकनिक हो या सोसायटी का गेट-टुगेदर, आपका मन कहीं नहीं लगता. हो सकता है आपकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी न हो, पर यह कोई समाधान नहीं.

हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाना: आपका मस्तिष्क पूरी तरह से बंद होने लगता है और हर तरह के निगेटिव ख़्याल ही आपको घेरे रहते हैं. अगर उम्मीद व आशा की किरण हो भी, तब भी आप प्रयास करने बंद कर देते हैं, क्योंकि आप पूरी तरह हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाते हैं. आप पहले ही सोच लेते हैं कि प्रयास करने से भी कुछ नहीं होगा और आप कोशिश ही नहीं करते.

शारीरिक तकली़फें: जब आपका मन बीमार होगा, तो ज़ाहिर है शरीर पर भी उसका असर नज़र आने लगेगा. सिरदर्द, पेट की तकली़फें, मांसपेशियों में दर्द व तनाव इसके प्रमुख लक्षण हैं. लेकिन अक्सर लोग शारीरिक लक्षणों के इलाज पर ध्यान देने लगते हैं, जबकि इनकी जो मुख्य वजह है, मन की बीमारी, उसको नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जिससे परेशानी और बढ़ जाती है.

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कारण

मन की बीमारी के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक व ख़ुद का व्यक्तित्व भी ज़िम्मेदार हो सकता है.

–     हो सकता है आपकी नौकरी में समस्या हो या आपकी नौकरी चली गई हो और नई नौकरी अनेक प्रयासों के बाद भी न मिल रही हो, तो कई तरह के डर मन में हावी होने लगते हैं. भविष्य की चिंता, आर्थिक तंगी, समाज में तिरस्कार का डर आदि बातें आपको धीरे-धीरे नकारात्मक बनाने लगती हैं.

–     शादी या प्यार जैसा रिश्ता टूटने पर भी बहुत तकलीफ़ होती है. ऐसे में सामान्य बने रहना बेहद मुश्किल भी है, इसीलिए आप समाज से कटने लगते हैं. ख़ुद को एक दायरे में ़कैद कर लेते हैं. एडिक्शन का शिकार हो जाते हैं.

–     कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही ऐसा होता है कि वो अन्य लोगों के मुक़ाबले भावनात्मक व मानसिक रूप से कमज़ोर होते हैं. वो किसी भी नकारात्मक अनुभव का शिकार होते हैं, तो जल्द ही मानसिक रूप से बीमार हो जाते हैं.

–     बहुत अधिक ईर्ष्या या द्वेष भी आपके मन को बीमार करता है. किसी की कामयाबी से जलना, किसी की लाइफस्टाइल से ईर्ष्या करना सही नहीं. ख़ुद को पॉज़िटिव बनाएं, न कि एक निगेटिव व्यक्ति.

उपाय

–     अगर आप डर व घबराहट का शिकार हो रहे हैं, तो अपने डर के अनहेल्दी कारणों को पहचानें.

–     अनहेल्दी कारणों को हेल्दी बातों से रिप्लेस करना सीखें.

–     कहीं आप यह तो नहीं सोचने लगे कि यह दुनिया विश्‍वास के लायक ही नहीं. यह सोच ही अपने आप में एक्स्ट्रीम है. अपनी सोच को बदलें.

–     लोगों पर विश्‍वास करना सीखें.

–     पॉज़िटिव लोगों के साथ रहें. उन लोगों के संपर्क में रहें, जो आपकी हमेशा मदद करते हैं. आपको यह महसूस होगा कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते.

–     किसी बात को लेकर मन में शंका है, अपराधबोध है, तो बेहतर होगा अपनी शंकाएं बातचीत से दूर कर लें. बातों को मन में रखने से, भीतर ही भीतर कुढ़ने से नकारात्मकता ही बढ़ेगी.

–     माफ़ करना और माफ़ी मांगना सीखें.

–     अपने मन को पहचानें. अपने मन की बीमारी से भागें नहीं, उसका सामना करें और इलाज करवाएं.

–     जब कभी परिस्थितियों से भागने का मन हो, तो अपनी हॉबीज़ में मन लगाएं.

–     स्विमिंग, डान्सिंग, म्यूज़िक, ट्रेकिंग- ये तमाम चीज़ें एक तरह का मेडिटेशन हैं, जो आपको नकारात्मक भावनाओं से बाहर निकालकर पॉज़िटिव बनाने में मदद करती हैं.

–  नए दोस्त बनाएं, उनसे मिलेंगे तो ध्यान निगेटिव बातों से हटेगा.

–     कभी किसी शांत जगह जाकर छुट्टियां बिताएं.

–     मेडिटेशन और योग की शरण लें.

–     रोज़ाना लाइट एक्सरसाइज़ करें.

–     नकारात्मक लोगों से दूरी बनाए रखें.

–     अपने खानपान और इम्यूनिटी पर ख़ासतौर से ध्यान दें.

–     हेल्दी फूड खाएं, ताकि हार्मोंस असंतुलित न हों. हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करनेवाले फूड खाएं.

–     रिसर्च बताते हैं कि घर में पालतू बिल्ली या कुत्ता रखने से फील गुड हार्मोंस रिलीज़ होते हैं और स्ट्रेस हार्मोंस कार्टिसोल कम होते हैं. ये तरीक़ा भी आज़माया जा सकता है.

–     बेहतर होगा कि अपने मन की बात अपनों से शेयर करें. अगर ऐसा संभव न हो, तो बिना देर किए एक्सपर्ट के पास जाएं. फूड, जो बना देते हैं आपका मूड

–     डार्क चॉकलेट मूड ठीक करके डिप्रेशन दूर करता है. यह एंडॉर्फिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाता है और इसमें मौजूद कई अन्य तत्व भी फील गुड के एहसास को बढ़ानेवाले हार्मोंस को बढ़ाकर डिप्रेशन दूर करते हैं.

–     कार्बोहाइड्रेट्स सेरोटोनिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाते हैं और आपके मूड को बेहतर बनाकर हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करते हैं.

–     विटामिन बी बेहद ज़रूरी है हैप्पी हार्मोंस के रिलीज़ के लिए. शोध बताते हैं कि विटामिन बी6 की कमी से चिड़चिड़ापन, भूलने की समस्या, हाइपरएक्टिव हो जाना जैसी समस्याएं होती हैं. विटामिन बी12 भी ब्रेन बूस्टिंग तत्व है. आप विटामिन बी के लिए अपने डायट में हरी पत्तेदार सब्ज़ियां शामिल करें.

–     गाजर, दही, फिश, ड्रायफ्रूट्स, दालचीनी, अदरक, लहसुन, कालीमिर्च, जीरा, करीपत्ता आदि में भी हार्मोंस को संतुलित रखने के गुण होते हैं. इन सभी को अपने डेली डायट में शामिल करें.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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डायट सीक्रेट: बारिश के मौसम में क्या खाएं, क्या नहीं? (Diet Secret: Foods To Avoid This Monsoon)

Diet Secret

डायट सीक्रेट: बारिश के मौसम में क्या खाएं, क्या नहीं? (Diet Secret: Foods To Avoid This Monsoon)

मॉनसून में इंफेक्शन से जुड़ी बीमारी होने का ख़तरा सबसे ज़्यादा होता है. इनसे बचने के लिए खान-पान में सावधानी बरतना ज़रूरी है. फोर्टिस हॉस्पिटल, कल्याण की डायटीशियन नियति लिखिते बता रही हैं कि बारिश में क्या खाना चाहिए और किन चीज़ों से परहेज़ करना चाहिए?

 

खाएं

–    शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर फल, जैसे-सेब, नाशपाती और अनार इत्यादि का सेवन करें. ये हमारे शरीर में मौजूद फ्री-रेडिकल्स व टॉक्सिन्स से लड़ते हैं और हमें स्वस्थ रखते हैं.

–  इंफेक्शन से बचने के लिए स्टीम्ड सलाद ही खाएं. कच्चा सलाद हानिकारक हो सकता है. सूप और सब्ज़ी में अदरक व लहसुन का इस्तेमाल करें.

–    टमाटर, पालक, गोभी जैसी हरी सब्ज़ियों को इस्तेमाल करने से पहले उन्हें हल्के गर्म पानी से साफ़ कर लें, क्योंकि बारिश के मौसम में सब्ज़ियों को अच्छी तरह साफ़ किए बिना ही इस्तेमाल करने से इंफेक्शन होने का ख़तरा रहता है.

–    हल्दी वाला दूध पीएं. हल्दी में मौजूद करक्यूमिन इंफेक्शन के ख़तरे को कम करता है. गला ख़राब होने या कफ होने पर तुलसी, अदरक, हल्दी मिली हुई चाय या दूध पीने से काफ़ी आराम मिलता है. इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए रोज़ाना एक टीस्पून त्रिफला पाउडर ग्रहण करें.

–    भुना हुआ भुट्टा भी सेहत के लिए अच्छा होता है. साथ ही इस सीज़न में घर का बना हुआ हल्का खाना ही खाएं.

–    बारिश के मौसम में उबला या फिल्टर किया हुआ पानी ही पीएं. शरीर में पानी की कमी न होने दें. चूंकि बारिश में मौसम हल्का ठंडा होता है इसलिए हमें कम प्यास लगती है, लेकिन शरीर में मौजूद टॉक्सिन्स को निकालने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना ज़रूरी होता है.

–    इंफेक्शन से बचने के लिए नाश्ते में गर्मागर्म दलिया, ओट्स, दूध इत्यादि का सेवन करें.

–   पेट के सुचारु  संचालन के लिए प्रोबायोटिक्स जैसे दही या याकुर्ट का सेवन कर सकते हैं.

 न खाएं

–    मछली और सी फूड खाने से बचें, क्योंकि इस मौसम में बासी मछली खाने से गंभीर इंफेक्शन हो सकता है. चिकन और मटन का सेवन करते समय भी सावधानी बरतनी चाहिए. नॉनवेज बनाकर तुरंत खाएं. फ्रिज में रखा हुआ बासी नॉनवेज नुक़सान पहुंचा सकता है. कच्चा और अधपका अंडा खाने से भी बचें.

–    भिंडी, फूलगोभी और ग्वार खाने से परहेज़ करें.

–   अदरक, इलायची, काली मिर्च व दालचीनी युक्त हर्बल टी पीएं.

–   बाज़ार से कटी हुई सब्ज़ियां ख़रीदने और अंकुरित आलू का सेवन करने से बचें.

–    ज़्यादा पानी युक्त खाद्य पदार्थ, जैसे तरबूज और खरबूज का सेवन करने से भी बचें. ऐसी चीज़ें खाने पर आप सुस्त महसूस कर सकते हैं.

–    मसालेदार, तली-भुनी और रोड पर बिकनेवाली चीज़ें न खाएं. इससे आपको एसिडिटी, पेट का इंफेक्शन व मुंहासे इत्यादि की समस्या हो सकती है.

–    बारिश के मौसम में अत्यधिक नमक व रेडी टु ईट चीज़ें खाना नुक़सानदेह हो सकता है. इससे वॉटर रिटेंशन और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

–  अत्यधिक कॉफी का सेवन भी नुक़सान पहुंचा सकता है. यह शरीर को डिहाइड्रेट करता है. अल्कोहॉलिक पेय पदार्थ शरीर को डिहाइड्रेट करने के साथ एंटीऑक्सिडेंट की मात्रा को भी घटाते हैं. हालांकि रेड वाइन एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर होता है इसलिए कभी-कभार इसका सेवन किया जा सकता है.

–    लोकल या सड़क पर मिलनेवाली आइसक्रीम व अन्य ठंडी चीज़ें न खाएं, क्योंकि इनमें इस्तेमाल किया हुआ पानी या दूध ख़राब हो सकता है.

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Personal Problems: पीएमएस के दौरान बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ापन महसूस होता है (I Feel Very Frustrated During PMS)

मैं 23 वर्षीया कॉलेज स्टूडेंट हूं, पर पिछले कुछ महीनों से पीएमएस के दौरान बहुत ज़्यादा थकान, चिड़चिड़ापन, रात में पसीना आना और पेट फूलने से परेशान हूं. क्या मुझे किसी गायनाकोलॉजिस्ट से मिलना चाहिए?
– बरखा झा, पटना.

आपके द्वारा बताए गए लक्षण आपकी उम्र में बहुत आम बात हैं. शरीर में हार्मोंस के बदलाव के कारण ऐसे लक्षण नज़र आते हैं. इस दौरान प्रोजेस्टेरॉन
हार्मोंस के कारण पेट फूलना, छाती में भारीपन, मूड बदलने जैसे लक्षण पाए जाते हैं. पीरियड्स से कुछ दिन पहले से ही खाने में नमक की मात्रा कम कर दें. रोज़ाना थोड़ी देर योग व ध्यान करें. अगर आपको इससे आराम नहीं मिलता, तो गायनाकोलॉजिस्ट से ज़रूर मिलें.

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 PMS Frustrations
मैं 38 वर्षीया स्वस्थ महिला हूं. रोज़ाना संतुलित आहार लेती हूं और हाइजीन का भी पूरा ख़्याल रखती हूं, फिर भी वेजाइनल डिस्चार्ज की समस्या से जूझ रही हूं. इसका क्या कारण हो सकता है. क्या मुझे डॉक्टर से मिलना चाहिए.
– चित्रा मिश्रा, झांसी.

वेजाइनल डिस्चार्ज के कई कारण हो सकते हैं, जैसे- बैक्टीरियल वेजिनोसिस, कैंडीडा इंफेक्शन, ट्रिकोमोनस इंफेक्शन आदि. अगर आप डायबिटीज़ या अस्थमा के कारण लंबे समय से स्टेरॉइड थेरेपी पर हैं या फिर लंबे समय से एंटीबायोटिक्स का सेवन कर रही हैं, तो आपको वेजाइनल इंफेक्शन हो सकता है. जैसा कि आपने बताया कि आप हाइजीन का ख़्याल रखती हैं, तो भी गर्मियों में आपको ज़्यादा अलर्ट रहने की ज़रूरत है, क्योंकि गर्मियों में उमस और पसीने के कारण वेजाइनल इंफेक्शन की संभावना और भी बढ़ जाती है. इसलिए हमेशा वेजाइना को साफ़ व सूखा रखने की कोशिश करें.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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Personal Problems: क्या इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स के साइड इफेक्ट्स होते हैं? (Does Emergency Contraceptives Have Any Side Effects?)

 मैं 32 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. मैं इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स के बारे में जानना चाहती हूं. क्या ये आम गर्भनिरोधकों की तरह है या इसके कुछ साइड इफेक्ट्स हैं?
– कुसुम मेहता, मुंबई.

इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स का इस्तेमाल असुरक्षित यौन संबंध के बाद इमरजेंसी में किया जाता है. इसे कभी भी रेग्युलर कॉन्ट्रासेप्टिव्स की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स दो तरह के हैं, एक प्रोजेस्टेरॉनयुक्त टैबलेट और दूसरा कॉपर टी. प्रेग्नेंसी टालने के लिए असुरक्षित यौन संबंध के 72 घंटों के भीतर टैबलेट का इस्तेमाल करना चाहिए, जबकि कॉपर टी के लिए 5 दिनों का समय होता है. इसके साइड इफेक्ट्स इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप कौन-सा मेथड इस्तेमाल कर रहे हैं. अनियमित माहवारी और उल्टी आना जैसे साइड इफेक्ट्स दोनों ही मेथड में हो सकते हैं, जबकि कॉपर टी में इंफेक्शन का भी डर रहता है. कभी-कभी मेथड फेल भी हो जाता है.

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Emergency Contraceptives

मैं 27 वर्षीया शादीशुदा महिला हूं और डॉक्टर ने मुझे रूटीन हेल्थ चेकअप में पैप स्मियर टेस्ट करने की सलाह दी है. क्या मुझे यह टेस्ट कराना चाहिए?
– कुमकुम अग्रवाल, देहरादून.

पैप स्मियर एक स्क्रीनिंग टेस्ट है, जिसके ज़रिए सर्विक्स में होनेवाले कैंसर व प्रीकैंसर सेल्स की जांच की जाती है. वैसे तो 21 वर्ष पार कर चुकी सभी महिलाओं को हर साल यह टेस्ट कराना चाहिए, ताकि शुरू में ही किसी समस्या का पता चल सके. अगर लगातार तीन सालों तक स्मियर टेस्ट निगेटिव आता है, तो यह टेस्ट हर तीन साल में 65 साल की उम्र तक कराना चाहिए. इसमें एक स्पेशल ब्रश के ज़रिए सर्विक्स के सेल्स को इकट्ठा कर टेस्ट के लिए लैब भेजा जाता है, ताकि पता चल सके कि कैंसर है या नहीं.

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Personal Problems: आईवीएफ साइकल फेल होने पर क्या दोबारा ट्राई करूं? (Last IVF Failed, Should I Try Again?)

मैं 33 वर्षीया महिला हूं. मैं कंसीव नहीं कर पा रही थी, इसलिए हमने आईवीएफ की मदद लेने का विचार बनाया, पर मेरा आईवीएफ साइकल भी फेल हो गया है. अब मैं क्या करूं? कृपया, मार्गदर्शन करें.
– रोहिणी देशपांडे, पुणे.

आईवीएफ ट्रीटमेंट करा रहे लोगों के लिए यह काफ़ी हतोत्साहित करनेवाला है, पर आपको इतनी आसानी से हार नहीं माननी चाहिए. इसके फेल होने के पीछे स्टेरॉइड, एस्पिरीन, प्लैटलेट युक्त प्लाज़्मा, इंट्रालिपिड इंफ्यूज़न आदि कारण हैं. आईवीएफ में सफलता के लिए आजकल इंट्रासिटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन (आईसीएसआई), एम्ब्रायोस्कोप, इंट्रासिटोप्लाज़्मिक मॉर्फोलॉजिकली सिलेक्टेड स्पर्म (आईएमएसआई) और विट्रिफिकेशन जैसी तकनीक के कारण आईवीएफ के सक्सेस रेट बढ़े हैं. कुछ लोगों के आईवीएफ 5-6 बार भी फेल हो जाते हैं, इसलिए आप निराश न हों.
अपने फर्टिलिटी एक्सपर्ट से बात करें. चाहें तो किसी और एक्सपर्ट से सेकंड ओपिनियन लें.

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Personal Problems

मेरी उम्र 29 वर्ष है. हाल ही में मेरे ओवेरियन ट्यूब्स का पोटेंसी टेस्ट हुआ, जिसमें दोनों ही ट्यूब्स ब्लॉक हैं. ऐसे में मैं किस तरह मां बन सकती हूं?
– उर्मिला मिश्रा, जमशेदपुर.

जैसा कि आपने बताया आपकी दोनों ही ट्यूब्स ब्लॉक हैं, तो आपके पास प्रेग्नेंसी के लिए दो विकल्प हैं. पहला विकल्प है सर्जरी, जहां सर्जरी के ज़रिए ट्यूब्स के ब्लॉक्स निकाले जाएंगे. इसके बाद आप नेचुरली कंसीव कर सकती हैं, पर इसमें एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी के चांसेज़ ज़्यादा रहते हैं. दूसरा विकल्प है आईवीएफ. लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के कारण आईवीएफ में सफलता की संभावना पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बढ़ गई है. आईवीएफ की प्रक्रिया भी काफ़ी आसान और पेशेंट फ्रेंडली है. इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आप अपने गायनाकोलॉजिस्ट से बात कर सकती हैं, वो आपका सही मार्गदर्शन करेंगे.

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 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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मरीज़ जानें अपने अधिकार (Know Your Patients Rights)

 
Patients Rights
बात कुछ साल पहले की है, जब एक सरकारी अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों ने तारा को बताया कि उन्हें बे्रस्ट कैंसर है, जिसके लिए उन्हें तुरंत मैसेक्टॉमी करवानी होगी. डॉक्टरों को भगवान का दूसरा रूप माननेवाले उनके पति ने किसी और अस्पताल या एक्सपर्ट डॉक्टर से  सेकंड ओपिनियन की ज़रूरत नहीं समझी और बिना डॉक्टर से उसके बारे में अधिक जानकारी लिए सर्जरी की मज़ूरी दे दी. सर्जरी के बाद जब डॉक्टर्स ने जांच के लिए ब्रेस्ट की गांठ लैब भेजी, तो पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर था ही नहीं. बेवजह तारा ने न स़िर्फ सर्जरी की पीड़ा झेली, बल्कि उनके परिवार को भी मानसिक कष्ट हुआ. उस समय अगर तारा को या उनके पति को अपने अधिकारों का पता होता या वो थोड़े सतर्क होते, तो उन्हें यह सब न झेलना पड़ता. यह किसी एक तारा की कहानी नहीं है. आज देश में हज़ारों ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपने अधिकारों की न तो जानकारी है और न ही वो इस दिशा में पहल कर रहे हैं. माना कि डॉक्टर्स अपनी पूरी कोशिश करके व्यक्ति को स्वस्थ करने का प्रयास करते हैं, पर कुछ ऐसे भी हैं, जो इस नोबल प्रोफेशन को बदनाम कर रहे हैं. ऐसे में आपको अपने पेशेंट्स राइट्स के बारे में पता होना चाहिए, ताकि आपके साथ ऐसा न हो.

क्या हैं आपके पेशेंट्स राइट्स?

– मरीज़ या उसके गार्जियन को बीमारी या रोग के बारे में पूरी जानकारी मिलनी चाहिए.
– उस हेल्थ प्रॉब्लम के क्या-क्या साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, उसका आपकी सेहत पर क्या प्रभाव पड़ेगा, आपके साथ क्या आपके परिवार को भी किसी तरह की सावधानी की ज़रूरत है आदि की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए.
– हर मरीज़ को यह अधिकार है कि पूरे मान-सम्मान के साथ उसका इलाज
हो. उसके साथ कोई बदसलूकी नहीं कर सकता.
– अगर ऐसी कोई सरकारी योजना है, जिससे आपको फाइनेंशियल मदद मिल सकती है, तो डॉक्टर या हॉस्पिटल अथॉरिटीज़ उसके बारे में आपको सूचित करें.
– इलाज के दौरान भी ट्रीटमेंट या बीमारी के बारे में सेकंड ओपिनियन के लिए आप अपनी रिपोर्ट्स किसी और डॉक्टर को दिखा सकते हैं. इसके लिए आपको डॉक्टर से कुछ छिपाने की ज़रूरत नहीं है. आप उन्हें नि:संकोच बता सकते हैं कि आप किसी और एक्सपर्ट से राय लेना चाहते हैं.
इलाज के लिए डायग्नोसिस, ट्रीटमेंट और दवाइयों की पूरी जानकारी समय-समय पर आपको दी जानी चाहिए.
– यह अस्पताल की ज़िम्मेदारी और आपका अधिकार है कि आपकी बीमारी से जुड़ी सभी रिपोर्ट्स की जानकारी गोपनीय रखी जाए.
– इमर्जेंसी में जल्द से जल्द आपको इलाज मुहैया कराया जाए.
– आपके मेडिकल रिकॉर्ड्स की फोटोकॉपी आपको भी दी जाए.
– अस्पताल के सभी नियम-क़ायदे के साथ-साथ उनकी सभी सुविधाओं की जानकारी भी आपको दी जाए.
– अगर आपको लगता है कि कोई सबस्टैंडर्ड दवा अस्पताल ने आपको दी है, तो आप उसकी शिकायत लोकल फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन से कर सकते हैं.
– अगर डॉक्टर आपकी बीमारी के रिकॉर्ड्स को किसी मेडिकल कॉन्फ्रेंस में इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो उसमें आपकी सहमति ज़रूरी है. ऐसा न करने पर आप उन पर गोपनीयता भंग करने का आरोप लगा सकते हैं.
– किसी भी महिला मरीज़ की जांच करते समय डॉक्टर के साथ नर्स/सिस्टर का होना ज़रूरी है.  अगर ऐसा नहीं है और आप असहज महसूस कर रही हैं, तो आप सिस्टर को साथ रखने की मांग कर सकती हैं.
– आपको पूरा अधिकार है कि आप वर्तमान डॉक्टर से इलाज न लेकर किसी और से इलाज करवा सकते हैं, पर जानलेवा बीमारियों में ऐसा करना आपके लिए ही ख़तरनाक हो सकता है.
– अगर डॉक्टर आपको एक्सपेरिमेंटल ट्रीटमेंट की सलाह देते हैं, जिसमें एक्सपेरिमेंटल थेरेपीज़, एक्सपेरिमेंटल दवाइयां या फिर अलग लाइन ऑफ ट्रीटमेंट शामिल हो, तो आप उससे इंकार कर सकते हैं.
Patients Rights
कर्त्तव्यों का भी करें पालन
– पूरी ईमानदारी से डॉक्टर द्वारा बताए गए निर्देशों का पालन करें.
डॉक्टर्स और सभी मेडिकल प्रोफेशनल्स का सम्मान करें.
– अपनी बीमारी से जुड़ी सभी रिपोर्ट्स, बिल्स और डॉक्यूमेंट्स संभालकर रखें.
– मेडिकल इंश्योरेंस है, तो ट्रीटमेंट से पहले कैशलेस या रीफंड के बारे में ज़रूरी बातें समझ लें.
– अगर ट्रीटमेंट, टेस्ट्स या दवाइयों आदि से संबंधित कोई शिकायत है, तो पहले अपने डॉक्टर से बात करें. हो सकता है कम्यूनिकेशन में कहीं प्रॉब्लम के कारण आपको ग़लतफ़हमी हुई हो. अगर डॉक्टर की लापरवाही के कारण ऐसा हुआ है, तो अस्पताल के पेशेंट रिड्रेसल सेल से संपर्क करें.
– किसी भी तरह की क़ानूनी कार्रवाई से पहले अस्पताल प्रबंधन के पास अपनी शिकायत दर्ज कराएं, क्योंकि अक्सर लोकल लेवल पर ही मामले आसानी से सुलझ जाते हैं.
– कोई भी एक्शन लेने से पहले एक बार इस बात पर ज़रूर ग़ौर करें कि डॉक्टर्स भी हमारी तरह इंसान हैं.
मेडिकल लापरवाही में यहां लगाएं गुहार
मेडिकल काउंसिल
यह एक क़ानूनी संस्था है, जो मेडिकल प्रोफेशन को मॉनिटर करने के लिए बनाई गई है. यहां पर आप शिकायत दर्ज करा सकते हैं, पर यहां आपको कोई मुआवज़ा नहीं मिल सकता. वो स़िर्फ डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन रद्द कर सकते हैं. पर यह काउंसिल साल में स़िर्फ 2 बार लगती है.
कंज़्यूमर कोर्ट
इस मामले में यह सबसे फास्ट और स्पीडी ट्रायल कोर्ट है. मेडिकल प्रोफेशन में किसी भी तरह की शिकायत के लिए आप कंज़्यूमर कोर्ट जा सकते हैं. यहां आपको स़िर्फ मुआवज़ा मिलेगा. आपको एक सादे से पेपर पर अपनी शिकायत लिखकर मुआवज़े की मांग की रक़म के साथ जमा करनी होती है.
मुआवज़े की रक़म के मुताबिक़ आपको कोर्ट चुनना पड़ेगा.
– डिस्ट्रिक्ट कंज़्यूमर कोर्ट: 20 लाख तक का मुआवज़ा
– स्टेट कमीशन: 20 लाख से 1 करोड़
– नेशनल कमीशन: 1 करोड़ से ज़्यादा
सिविल कोर्ट
मेडिकल लापरवाही की शिकायत के लिए यहां भी केस फाइल कर सकते हैं, पर यहां पहले से ही इतने केसेस पेंडिंग हैं कि आपका केस लंबा खिंच सकता है. अगर आपके इलाज में किसी तरह की लापरवाही बरती गई, जिसके कारण आपको शारीरिक या मानसिक कष्ट हुआ, तो कंज़्यूमर कोर्ट जाना सबसे सही फैसला होगा.
रेलवे में मरीज़ों को स्पेशल छूट
– कैंसर के मरीज़ों को ट्रीटमेंट या रूटीन चेकअप के लिए जाना है, तो उन्हें स्लीपर कोच और 3 टायर एसी में 100% कंसेशन मिलता है, जबकि 2 टायर एसी और फर्स्ट क्लास में 50% तक की छूट की सुविधा है. मरीज़ के साथ के अटेंडेंट को भी स्लीपर कोच और 3 टायर एसी में 75% तक की छूट मिलती है, जबकि 2 टायर और फर्स्ट क्लास में दोनों को समान छूट मिलती है.
– अगर आप हार्ट पेशेंट हैं और हार्ट सर्जरी के लिए एक शहर से दूसरे शहर जा रहे हैं, तो
आपको सभी टिकट्स पर 50-75% तक की छूट मिलती है. आपके अटेंडेंट को भी उतनी ही छूट मिलेगी.
– किडनी के मरीज़ जो डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी के लिए ट्रैवेल कर रहे हैं, उन्हें और उनके अटेंडेंट को भी 50-75% तक की छूट मिलती है.
– इसके अलावा ट्यूबरकुलोसिस, थैलेसेमिया, सिकल सेल एनीमिया, नॉन इंफेक्शियस लेप्रोसी और हीमोफीलिया के मरीज़ों को भी रेलवे में 50-75% की छूट मिलती है.
– अनीता सिंह

Personal Problems: पीरियड्स देरी से आने के क्या कारण हो सकते हैं? (What Could Be The Reasons For Delayed Periods?)

Personal Problems: पीरियड्स देरी से आने के क्या कारण हो सकते हैं? (What Could Be The Reasons For Delayed Periods?)
मैं 47 साल की महिला हूं. मुझे कई महीनों से पीरियड्स नहीं आ रहे हैं. इसकी क्या वजह हो सकती है? कहीं मुझे मेनोपॉज़ तो नहीं हो गया है. कृपया, मेरी समस्या का समाधान करें.
– रेषा गुप्ता, ठाणे.

मेनोपॉज़ होने पर पीरियड्स पहले की तरह रेग्युलर नहीं रहते हैं. कभी ब्लीडिंग ज़्यादा होती है, कभी कम और कई बार केवल स्पॉट नज़र आता है. कई बार पीरियड्स ज़्यादा दिनों के लिए रहते हैं, तो कभी कम दिनों में ही ख़त्म हो जाते हैं. अगर आपके पीरियड्स मिस हो रहे हैं, तो सबसे पहले प्रेग्नेंसी टेस्ट करें. अगर आप प्रेग्नेंट नहीं हैं, तो हो सकता है कि यह मेनोपॉज़ के संकेत हों. अगर लगातार 12 महीनों तक आपको पीरियड्स नहीं आते हैं और उसके बाद भी स्पॉटिंग ही दिखाई देती है, तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि ये कैंसर जैसी गंभीर समस्या भी हो सकती है.
मेनोपॉज़ को आप स्वयं पहचान सकती हैं. मेनोपॉज़ के कॉमन लक्षण हैं- वेजाइनल ड्रायनेस, नींद की कमी या नींद डिस्टर्ब हो जाना, ज़्यादा पसीना आना आदि. इन सारे लक्षणों की वजह से आप चिंता या अवसाद महसूस कर सकती हैं. मेनोपॉज़ है या नहीं ये जानने के लिए आप गायनाकोलॉजिस्ट से संपर्क करें. एक ब्लड टेस्ट के ज़रिए आसानी से इसका पता लगाया जा सकता है. इसके अलावा आप पैप स्मीयर यानी सरवाइकल कैंसर स्क्रीनिंग टेस्ट भी करवा सकती हैं.

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Delayed Periods

पिछले 2-3 महीने से मेरे पीरियड्स देरी से आ रहे हैं. कृपया, मुझे बताएं कि पीरियड्स देरी से आने के क्या-क्या कारण हो सकते हैं.
– दीपिका शिंदे, जलगांव.  

स्ट्रेस, कुपोषण, थाइरॉइड प्रॉब्लम, कोई बीमारी, कंट्रासेप्टिव पिल्स, ईटिंग डिसऑर्डर, अर्ली मेनोपॉज़, ब्रेस्ट फीडिंग, मोटापा, पीसीओडी और अचानक से वज़न काम होने पर भी पीरियड्स देरी से आते हैं. आप अपने डॉक्टर से मिलें वो आपके पीरियड्स देरी से आने का कारण ज़्यादा सही तरीक़े से बता पाएंगे.

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 Dr. Rajshree Kumar

 

 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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Personal Problems: 10-15 दिन में पीरियड्स आने के क्या कारण हो सकते हैं? (Possible Reasons For Periods In 10-15 Days?)

Reasons For Periods
Personal Problems: 10-15 दिन में पीरियड्स आने के क्या कारण हो सकते हैं? (Possible Reasons For Periods In 10-15 Days?)

महिलाओं की कई व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं, जिनके बारे में वो मेरी सहेली के Personal Problems में जान सकती हैं. हो सकता है आपकी समस्या, किसी और की भी समस्या हो. तो महिलाओं की ऐसी ही पर्सनल प्रॉब्लम्स के बारे में जानने के लिए यहाँ पढ़ें.

मेरी उम्र 22 साल है. मेरी समस्या यह है कि हर 10 से 15 दिन में मेरे पीरियड्स आ जाते हैं. ऐसा क्यों होता है? कृपया बताएं मुझे क्या करना चाहिए?
– कुसुम कुमारी, नागपुर.

ये समस्या ज़्यादातर हार्मोनल असंतुलन या थायरॉइड की वजह से होती है. अगर महिला मेनोपॉज़ की ओर बढ़ रही है, तो ये लक्षण सामान्य हैं, क्योंकि इस दौरान पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं. लेकिन आप 22 साल की हैं, तो मेनोपॉज़ नहीं हो सकता है. कुछ हार्मोनल टेस्ट्स और अल्ट्रासोनोग्राफी के ज़रिए इसके कारण का पता लगाया जा सकता है. आपको अपने हीमोग्लोबिन पर भी नज़र बनाए रखनी होगी, क्योंकि बार-बार पीरियड्स होने की वजह से एनीमिया और कमज़ोरी हो सकती है. कुछ घरेलू उपचार, जैसे- गुड़, खजूर, फल व हरी पत्तेदार सब्ज़ियों का सेवन करने से आपकी समस्या काफ़ी हद तक कम हो सकती है.

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Reasons For Periods

मेरी शादी को डेढ़ साल हो गए हैं. इस साल फरवरी में मेरा मिसकैरेज हो गया था. अब मैं दोबारा कंसीव करना चाहती हूं, लेकिन कंसीव नहीं हो पा रहा है. क्या इसकी वजह मिसकैरेज है? कृपया बताएं मुझे क्या करना चाहिए?
– रेखा यादव, इलाहाबाद. 

गर्भपात या ऐब्नॉर्मल प्रेगनेंसी को नेचर्स लॉ कह सकते हैं, क्योंकि यह हमारे हाथ में नहीं होता. आप दोबारा प्रेगनेंसी की कोशिश कर सकती हैं.
किसी इंफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलें. किसी तरह की मेडिकल प्रॉब्लम, दवाई रोज़ाना लेती हैं, तो वो भी हमें बताएं. अगर पिछली बार आपने नेचुरली कंसीव किया था तो इस बार भी नेचुरली कंसीव करने की संभावना है. फिर भी ओवेरियन रिज़र्व, ट्यूब की पोटेंसी, थाइरॉइड आदि के बारे में चेक करना होगा.

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 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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