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प्लास्टिक पॉल्यूशन: कैसे बचाएं ख़ुद को? (Plastic Pollution: Causes, Effects And Solutions)

Plastic Pollution

प्लास्टिक पॉल्यूशन: कैसे बचाएं ख़ुद को? (Plastic Pollution: Causes, Effects And Solutions)

यह माना कि प्लास्टिक ने हमारी ज़िंदगी आसान बना दी है. पिछले दशक में प्लास्टिक ने हमारे रोज़मर्रा के जीवन में इतनी घुसपैठ की है कि उसके बिना अब हमें अपना जीवन अकल्पनीय लगने लगा है, लेकिन जब प्लास्टिक नहीं था, तब भी तो हमारा काम चलता ही था… पर आज बिना प्लास्टिक के हम ख़ुद को अधूरा-सा महसूस करते हैं. बच्चों के टिफिन, वॉटर बॉटल से लेकर हमारे ऑफिस तक का खाना व पानी प्लास्टिक में ही रहता है, क्योंकि प्लास्टिक लाइट वेट, अनब्रेकेबल और सुविधाजनक लगता है.

लेकिन प्लास्टिक की इस सुविधा की हमें बड़ी क़ीमत भी अब चुकानी पड़ रही है, क्योंकि प्लास्टिक अब हमारी सेहत को बुरी तरह प्रभावित करने लगा है. जी हां, पहले भी कई शोधों में यह बात साबित हो चुकी है और अब एक चौंकानेवाला अध्ययन यह कहता है कि हम हर हफ़्ते एक क्रेडिट कार्ड जितना प्लास्टिक खाते हैं.

क्या कहता है शोध?

  • यह स्टडी कहती है कि आप खाने के ज़रिए, पानी के ज़रिए और यहां तक कि सांस के ज़रिए भी लगभग 2,000 प्लास्टिक के कण अपने शरीर में हर हफ़्ते लेते हैं, जो एक क्रेडिट कार्ड के वज़न के बराबर है.
  • हवा और पानी से लेकर हमारा भोजन तक प्लास्टिक की चपेट में है. समुद्री जीवन को भी प्लास्टिक का यह प्रदूषण बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. इसी तरह से हमारी सेहत भी इसके प्रभाव से अछूती नहीं है.
  • स्टडी कहती है कि अधिकांश प्लास्टिक पीने के पानी के ज़रिए हमारे शरीर में प्रवेश करता है, इसके अलावा सी फूड और नमक के ज़रिए भी यह हमारे शरीर में आता है.
  • प्लास्टिक का यह ज़हर माइक्रोप्लास्टिक्स से आता है. माइक्रोप्लास्टिक का मतलब है, प्लास्टिक के वो कण जो 5 मिलीमीटर से छोटे होते हैं.

प्लास्टिक का कचरा है सबसे बड़ी चुनौती…

पर्यावरण विद्वानों के लिए प्लास्टिक के कचरे से निपटना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि हम अधिकांश प्लास्टिक एक बार इस्तेमाल करके फेंक देते हैं, जो पर्यावरण को दूषित करता है और पानी व खाने के ज़रिए हमारे शरीर में पहुंचता है.

प्लास्टिक को नष्ट करना बेहद मुश्किल काम है.  इसे नष्ट होने में हज़ारों साल लग जाते हैं. यदि प्लास्टिक को ज़मीन में दबाया जाता है, तो वह पानी के स्रोतों के ज़रिए हम तक पहुंच ही जाता है और यदि प्लास्टिक को जलाया जाता है, तो उससे ज़हरीले केमिकल्स निकलते हैं, जो हमारे साथ-साथ पूरे पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं.

  • आपकी कोशिश यह होनी चाहिए कि प्लास्टिक  को इस्तेमाल करने के बाद रिसाइकल सेंटर भेज सकें.
  • ख़ुद प्लास्टिक को नष्ट करने का प्रयास न करें.

स्वास्थ्य को किस तरह नुक़सान पहुंचाता है प्लास्टिक?

  • जैसा कि हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि प्लास्टिक हर जगह है और यह सभी स्रोतों से हमारे शरीर में पहुंच ही रहा है.
  • पानी की बोतल से लेकर प्लास्टिक के टिफिन्स, मसाला स्टोर करने के बर्तनों से लेकर माइक्रोवेव तक में अब प्लास्टिक ही यूज़ होता है.
  • यही वजह है कि प्लास्टिक के अंश हम सभी के, जी हां, हम सभी के रक्त से लेकर टिश्यूज़ तक में पाए जाते हैं.
  • लेकिन हार्ड प्लास्टिक में बीपीए होता है, जो एक तरह का टॉक्सिन है.
  • वैज्ञानिकों ने पाया है कि बीपीए का संबंध कैंसर, बर्थ डिफेक्ट्स, इम्यून फंक्शन्स में गड़बड़ी, अर्ली प्यूबर्टी, ओबेसिटी, डायबिटीज़ और हाइपर एक्टिविटी जैसी समस्याओं से है.
  • आजकल मार्केट में माइक्रोवेव सेफ प्लास्टिक आसानी से मिलते हैं, लेकिन माइक्रोवेव में प्लास्टिक का इस्तेमाल न ही करें, तो बेहतर होगा, यहां तक कि माइक्रोवेव सेफ प्लासिक के बर्तन भी नहीं.
  • इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि माइक्रोवेव सेफ का मतलब स़िर्फ यह होता है कि प्लास्टिक मेल्ट नहीं होगा, लेकिन बहुत ज़्यादा हीट की वजह से केमिकल्स ट्रांसफर तेज़ी से होते हैं.
  • एसिडिक फूड प्लास्टिक में स्टोर न करें, क्योंकि वो रिएक्ट कर सकते हैं.
  • इसी तरह से फैटी और ग्रीसी फूड भी प्लास्टिक में स्टोर करना अवॉइड करें.
  • बहुत पुराने, बहुत ज़्यादा यूज़ किए हुए, स्क्रैच पड़े हुए या टूटे-फूटे प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें.
  • हार्ड प्लास्टिक मेलामाइन डिशेज़ का भी इस्तेमाल अवॉइड करें, क्योंकि ये मेलामाइन केमिकल को फॉर्मलडिहाइड के साथ मिलाने से बनता है, जो कैंसरस माना जाता है.
  • एक अन्य रिसर्च यह कहता है कि बीपीए फ्री प्लास्टिक में भी सिंथेटिक केमिकल्स होते हैं, जो खाने में जा सकते हैं.
  • हां, अगर फिर भी आपको प्लास्टिक का इस्तेमाल करना ही है, तो कोशिश करें कि वो बीपीए फ्री और पीवीसी फ्री प्लास्टिक हो.

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कुकिंग व स्टोरेज के लिए सेफ ऑप्शन

  • प्लास्टिक जितना हो सके, कम यूज़ करें.
  • अगर प्लास्टिक कंटेनर्स को स्टोरेज के लिए यूज़ करते हैं, तो इस बात का ज़रूर ध्यान रखें कि स्टोर करने से पहले खाना पूरी तरह से ठंडा हो. उसके बाद उसे फ्रिज में रख दें.
  • प्लास्टिक के उन बर्तनों को माइक्रोवेव में बिल्कुल भी यूज़ न करें, जिन पर माइक्रोसेफ का टैग या लेबल न लगा हो.
  • स्टोरेज के लिए ऐसे बर्तनों को चुनें, जिनमें केमिकल्स का रिसाव व केमिकल रिएक्शन न होता हो.
  • मिट्टी व लोहे के बर्तन सबसे सेफ और हेल्दी होते हैं. आयरन वैसे भी शरीर में रेड ब्लड सेल्स के निर्माण के लिए बहुत ज़रूरी है. ऐसे में आयरन के बर्तन हेल्दी ऑप्शन हैं, लेकिन इसकी अधिकता भी ख़तरनाक हो सकती है.
  • ]स्टेनलेस स्टील, ग्लास, आयरन या सिरामिक भी एक तरह से सेफ माने गए हैं.
  • इसी तरह से सिलिकॉन कुकवेयर भी आजकल काफ़ी पॉप्युलर हो रहे हैं. फूड ग्रेड सिलिकॉन कुकवेयर के कोई साइड इफेक्ट्स नहीं देखे गए. न तो यह खाने के साथ रिएक्ट करता है, न ही इसके धुएं से कोई हानि होती है.
  • ये दरअसल सिंथेटिक रबर होता है, जिसमें बॉन्डेड सिलिकॉन (प्राकृतिक तत्व, जो रेत और पत्थरों में प्रचुर मात्रा में होता है) और ऑक्सीजन होता है.

धीरे-धीरे प्लास्टिक फ्री होम व लाइफ बनाएं

  • बर्थडे पार्टीज़ में इस्तेमाल होनेवाले प्लास्टिक ग्लास व प्लेट्स, सब्ज़ियों के लिए कैरी बैग्स, फ्रिज की बॉटल्स व स्टोरेज के बर्तन आदि को नॉन प्लास्टिक से रिप्लेस करें.
  • कपड़े के कैरी बैग्स यूज़ करें.
  • स्टोरेज के लिए स्टील व कांच के बर्तनों का इस्तेमाल करें.
  • यदि प्लास्टिक यूज़ भी कर रहे हैं, तो ऐसे प्लास्टिक का प्रकार यूज़ करें, जो आसानी से रिसाइकिल हो सके.
  • पॉलिथीन का प्रयोग बंद ही कर दें. इनको रिसाइकिल नहीं किया जा सकता है और यह पर्यावरण व स्वास्थ्य को बहुत अधिक नुक़सान पहुंचाते हैं.
  • दूसरों को भी जागरूक करें, ताकि प्लास्टिक का इस्तेमाल कम हो.
  • बच्चों को भी प्लास्टिक के टिफिन व बॉटल्स की जगह स्टील या अन्य मेटल के बर्तनों में खाना व पानी दें.
  • आप ख़ुद भी यही करें.
  • प्लास्टिक के टॉयज़ भी काफ़ी नुक़सान पहुंचाते हैं और छोटे बच्चे इन्हें अक्सर मुंह में डालते हैं, जो उनके लिए हानिकारक होते हैं.
  • बेहतर होगा कि उनकी जगह अन्य मटेरियल के टॉयज़ यूज़ करें.
  • हार्ड प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम कर दें.
  • मिनरल वॉटर या जूस वगैरह की प्लास्टिक की बोतल को यूज़ करने के बाद उन्हें फ्रिज में पानी के स्टोरेज के लिए न रखें.
  • प्लास्टिक के बर्तनों में जो पैक्ड फूड आता है, उन्हें भी अन्य चीज़ों के स्टोरेज के लिए न रख लें.
  • इस तरह यदि आप प्रयास करेंगे, तो धीरे-धीरे प्लास्टिक का प्रयोग कम कर सकेंगे.
  • प्लास्टिक से होनेवाले नुक़सान के बारे में जानकारी इकट्ठी करें और अपने बच्चों को भी उसके बारे में जागरूक करें.

– गीता शर्मा

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स्टेरॉइड्स के साइड इफेक्ट्स को कितना जानते हैं आप? (Common Side Effects Of Steroids You Must Know)

गूगल डॉक्टर के इस युग ने दवाओं व बीमारियों के बारे में हमारी जागरुकता बढ़ाई तो ज़रूर है, लेकिन सही व सटीक जानकारी के अभाव ने बहुत-सी ग़लतफ़हमियां व भ्रम भी पैदा किए हैं. इनमें से एक है स्टेरॉइड. जिसका नाम सुनते ही हमारे मन में कई तरह के सवाल आते हैं. यह क्या होता है और किस तरह से काम करता है? इसके बारे में बहुत ही कम लोगों को सही जानकारी है. तो आइए, आमतौर पर इस्तेमाल की जानेवाली इस दवा के इस्तेमाल व इससे होनेवाले साइड इफेक्ट्स के बारे में जानें.

Side Effects Of Steroids

स्टेरॉइड क्या है?

स्टेरॉइड दो प्रकार का होता है. प्राकृतिक व कृत्रिम. प्राकृतिक स्टेरॉइड एक प्रकार का हार्मोन है, जो हमारे शरीर की एडे्रनल ग्रन्थियों में स्वाभाविक रूप से बनता है. यह शरीर के अंगों, कोशिकाओं और ग्रन्थियों के विकास व उन्हें सही तरी़के से काम करने में मदद करता है. वहीं कृत्रिम यानी मानव निर्मित स्टेरॉइड एक प्रकार की दवा होती है, जो शरीर में बननेवाले हार्मोन के गुणों से युक्त होती है. इसके दो प्रकार हैं- कोर्टिको स्टेरॉइड और एनाबॉलिक स्टेरॉइड.

कोर्टिको स्टेरॉइड्स

लैब में बनाई जानेवाली यह दवा किसी बीमारी या इंफेक्शन के कारण शरीर में होनेवाली सूजन व अन्य लक्षणों को कम करने में मदद करती है. कोर्टिको स्टेरॉइड्स का इस्तेमाल गठिया बाय, दमा, रैशेज़, एग्ज़िमा, फेफड़ों की श्‍वासनली में सूजन व म्यूकस के उत्पादन को कम करने व अन्य इंफ्लेमेटरी व ऑटो इम्यून बीमारियों के इलाज के दौरान किया जाता है. यह बीमारी के कारण होनेवाली सूजन, दर्द व स्टिफनेस को नियंत्रित करती है. यह दवा पिल्स, इंहेलर, नेज़ल स्प्रे, लोशन, क्रीम इत्यादि रूपों में उपलब्ध है.

कैसे काम करती है?

हमारा इम्यून सिस्टम बहुत-से स्पेशलाइज़्ड सेल्स से बना हुआ है. ये सेल्स बहुत तरह के काम करते हैं. इनमें से एक है सूजन पैदा करनेवाले केमिकल्स को शरीर में रिलीज़ करना. सूजन बहुत तरह के इंफेक्शन्स से लड़ने के लिए ज़रूरी है, पर इससे कभी-कभी किसी तरह की एलर्जिक व ऑटोइम्यून बीमारियां भी हो जाती हैं. ऐसे में कोर्टिको स्टेरॉइड्स का सेवन करने से यह दवा इम्यून सिस्टम के अंदर प्रवेश करके सूजन पैदा करनेवाले केमिकल्स के जीन्स को निष्क्रिय कर देती है. इस प्रकार ये एलर्जिक व ऑटोइम्यून बीमारियों को नियंत्रित करने में मदद करती है.

कोर्टिको स्टेरॉइड्स के साइड इफेक्ट्सः कोर्टिको स्टेरॉइड्स के साइड इफेक्ट्स इसे ग्रहण करने के तरी़के व अवधि पर निर्भर करते हैं.

इंहेल्ड कोर्टिको स्टेरॉइड्सः यानी नेज़ल स्प्रे द्वारा दवा लेना. लंबे समय तक इसके इस्तेमाल से मुंह में फंगल इंफेक्शन होने का ख़तरा रहता है, इसलिए इंहेल्ड कोर्टिको स्टेरॉइड का इस्तेमाल करने के बाद पानी से कुल्ला कर लें.

इंजेक्टेड कोर्टिको स्टेरॉइड्सः इंजेक्शन द्वारा मांसपेशियों व जोड़ों में कोर्टिको स्टेरॉइड डालने से इंजेक्ट की हुई जगह पर सूजन व दर्द हो सकता है और लंबे समय तक इंजेक्ट करने से मांसपेशियों के कमज़ोर होने का ख़तरा होता है. नसों में कोर्टिको स्टेरॉइड इंजेक्ट करने से मतली, अनिद्रा, मुंह का स्वाद बदलना, मूड स्विंग्स, वज़न बढ़ना, रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ना और हाइपरटेंशन जैसी समस्याएं होती हैं.

ओरल कोर्टिको स्टेरॉइड्सः कम अवधि के लिए भी पिल्स के रूप में इसका सेवन करने से भूख बढ़ना, वज़न बढ़ना, अनिद्रा, मूड स्विंग्स, फ्लूइड रिटेंशन जैसी समस्याएं होती हैं, जबकि लंबे समय तक इनका सेवन करने से हड्डियों का कमज़ोर होना, डायबिटीज़, इंफेक्शन होने का ख़तरा, ग्लूकोमा, मोतियाबिंद, त्वचा का पतला होना व मांसपेशियों का कमज़ोर होना इत्यादि समस्याएं हो सकती हैं.

टॉपिकल कोर्टिको स्टेरॉइड्सः एग्ज़िमा इत्यादि त्वचा संबंधी बीमारी होने पर कोर्टिको स्टेरॉइडयुक्त क्रीम लगाने से त्वचा पतली हो सकती है.

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Side Effects Of Steroids
एनाबॉलिक स्टेरॉइड्स

यह पुरुषों में पाए जानेवाले हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन का कृत्रिम रूप है, जो मसल्स को डेवलप करने में मदद करता है. इसे पिल्स के रूप में या इंजेक्शन के द्वारा लिया जाता है. जब शरीर में पर्याप्त मात्रा में टेस्टोस्टेरॉन नहीं बनता या कैंसर, एड्स व अन्य किसी तरह की बीमारी के कारण मसल मास कम हो जाता है, तो डॉक्टर इसे लेने की सलाह देते हैं.

एनाबॉलिक का दुरुपयोगः चूंकि इस स्टेरॉइड को ग्रहण करने से मसल्स जल्दी डेवलप होते हैं, इसलिए अधिकतर लोग कम समय में मसल्स डेवलप करने, ख़ासतौर पर एथलीट्स शारीरिक क्षमता बढ़ाने, तेज़ गति से दौड़ने, भारी वज़न उठाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. तुरंत फ़ायदा पाने के लिए कुछ लोग इसके बहुत हाई डोज़ेज़ लेते हैं. कुछ तो किसी बीमार के ट्रीटमेंट के लिए डॉक्टर द्वारा दिए जानेवाले डोज़ से सौ गुना अधिक डोज़ लेते हैं.

एनाबॉलिक स्टेरॉइड्स के साइड इफेक्ट्स

इसके इस्तेमाल से मुंहासे, फ्लूइड रिटेंशन की समस्या हो सकती है. लंबे समय तक इसका प्रयोग करने से पुरुषों मे टेस्टोस्टेरॉन बनना बंद हो सकता है. इसके अलावा इसके सेवन से पुरुषों का टेस्टिकल्स सिकुड़ना, शुक्राणुओं की संख्या कम होना, गंजापन, प्रजनन क्षमता कम होना, स्तनों का आकार बढ़ना इत्यादि समस्याएं होती हैं. जबकि महिलाओं को चेहरे पर बाल, आवाज़ भारी होना, माहवारी संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. किशोरावस्था में स्टेरॉइड्स के अत्यधिक सेवन से हड्डियों व हाइट का विकास रुक सकता है.

लॉन्ग टर्म इफेक्ट्सः लंबे समय तक एनाबॉलिक स्टेरॉइड का हाई डोज़ लेने से लिवर, किडनी और दिल के क्षतिग्रस्त होने का ख़तरा बढ़ जाता है. यह स्टेरॉइड शरीर में बैड

कोलेस्ट्रॉल का लेवल बढ़ा देता है, जिसके कारण हार्ट अटैक व स्ट्रोक का ख़तरा बढ़ जाता है.

अन्य समस्याएंः स्टेरॉइड का लंबे समय तक सेवन करने से बहुत-सी साइकोलॉजिकल समस्याएं भी होती हैं. कुछ यूज़र्स बेहद आक्रामक हो जाते हैं. इसके अलावा कुछ लोगों को डर या वहम की समस्या भी होती है. देखा गया है कि जो लोग एनाबॉलिक स्टेरॉइड का सेवन करते हैं, उनके अल्कोहल व कोकीन इत्यादि लेने का ख़तरा भी अधिक होता है.

स्टेरॉइड लेना बंद कैसे करें?

अचानक स्टेरॉइड का सेवन बंद करना सही नहीं होता. इससे मूड स्विंग्स, थकान, बेचैनी, मांसपेशियों में दर्द और डिप्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं. एनाबॉलिक स्टेरॉइड का सेवन अचानक बंद करने से कामेच्छा पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. अगर आप किसी बीमारी के इलाज के लिए स्टेरॉइड ले रहे हैं, तो दवा नहीं लेने पर बीमारी फिर से बढ़ सकती है. अतः बेहतर  होगा कि डॉक्टर की सलाह लेकर धीरे-धीरे स्टेरॉइड के डोज़ेज़ घटाएं. बिना डॉक्टर की सलाह लिए स्टेरॉइड का सेवन रोकना ख़तरनाक हो सकता है.

मैक्स सुपर स्पेशालिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग के न्यूरोलॉजी के प्रिसिंपल कंसल्टेंट व यूनिट हेड डॉ. मनोज खनल और ग्लोबल हॉस्पिटल, मुंबई की एंडोक्रोनोलॉजिस्ट डॉ. स्नेहा कोठारी के इनपुट्स पर आधारित.

                               – शिल्पी शर्मा

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Personal Problems: क्या गर्भधारण के पहले कोई टेस्ट कराना ज़रूरी है? (Do I Need Any Pre-Pregnancy Test?)

मेरी उम्र 28 वर्ष है और मेरी शादी को 5 वर्ष हो गए हैं. मुझे मासिक धर्म में काफ़ी दर्द और रक्तस्राव होता है. मेरी सोनोग्राफ़ी से पता चला है कि मुझे चॉकलेट ओवेरियन सिस्ट है और इसकी सर्जरी करवानी होगी. लेकिन मैं अभी तक मां नहीं बन पाई हूं, इसलिए किसी भी तरह के ऑपरेशन से डरती हूं. मुझे क्या करना चाहिए?
– परमजीत कौर, दिल्ली.

एंडोमेट्रियोसिस में हर मासिक चक्र के दौरान ओवरी (अंडाशय) में रक्त इकट्ठा हो जाता है. धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ने लगता है और इकट्ठा हुआ रक्त चॉकलेट सिस्ट बना लेता है. इस कारण मासिक धर्म के दौरान दर्द होता है एवं गर्भधारण करने में भी समस्या हो जाती है. लेप्रोस्कोपिक (कीहोल) सर्जरी ही इसका एकमात्र उपाय है. लेज़र जैसी आधुनिक तकनीक ने अब इस तरह की सर्जरी को और भी आसान बना दिया है.

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Pre-Pregnancy Test

मैं 26 वर्ष की हूं और मेरी शादी को दो साल हो गए हैं. अब हम बच्चे की प्लानिंग कर रहे हैं. क्या गर्भधारण के पहले मुझे कोई टेस्ट कराना ज़रूरी है?
– तराना, मुंबई.

बच्चा प्लान करने के पहले होनेवाले बच्चे की सेहत के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि रेग्युलर चेकअप करा लिए जाएं. आपको कुछ टेस्ट, जैसे- हीमोग्लोबिन, ब्लड शुगर, थायरॉइड लेवल, थेलेसेमिया आदि टेस्ट करवा लेना चाहिए. एक सोनोग्राफ़ी टेस्ट करवाना चाहिए, जिससे ये पता चल सके कि यूटेरस और ओवरीज़ सामान्य हैं. ब्लड प्रेशर अवश्य चेक कराएं. यदि कोई भी समस्या हो, तो गर्भधारण करने के पूर्व ही उसका इलाज करा लेना चाहिए, ताकि जन्म लेनेवाला बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ हो.

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Dr. Rajshree Kumar

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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एलर्जी से बचने के 15 अचूक उपाय (15 Smart Ways To Prevent Allergies)

क्या आपको पता है कि हमारे देश में तक़रीबन 20 से 30 फ़ीसदी लोग एलर्जी (Allergies) से पीड़ित हैं, जबकि अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में एलर्जी के मरीज़ों की संख्या और भी ज़्यादा है. वास्तव में एलर्जी बेहद सामान्य बीमारी है. किसी को खाने की चीज़ से, किसी को किसी ख़ास महक से तो किसी को पालतू जानवरों से एलर्जी होती है. हम आपको एलर्जी से बचने के आसान व कारगर उपाय बता रहे हैं.

Ways To Prevent Allergies

1. बच्चों के इम्यून सिस्टम को मज़बूत करने के लिए उन्हें धूल-मिट्टी और धूप में खेलने दें. ये बच्चों को बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं. उन्हें बारिश या दूसरे पानी से भी खेलने दें. हां, धूल-मिट्टी में खेलने के बाद उनके हाथ-पैर अच्छे से धुलवाना न भूलें.

2. अगर किसी को धूल और धुएं से एलर्जी है तो घर से बाहर निकलने से पहले नाक पर रुमाल रखना चाहिए. बचाव ही एलर्जी का इलाज है.

3. जिन लोगों को ठंड से एलर्जी है, वे ठंडी और खट्टी चीज़ों जैसे कि अचार, इमली, आइस्क्रीम आदि के इस्तेमाल से बचें.

Ways To Prevent Allergies

4. गंदगी से एलर्जी वाले लोगों को समय-समय पर चादर, तकिए के कवर और पर्दे भी बदलते रहना चाहिए. कार्पेट यूज़ न करें या फिर उसे कम से कम 6 महीने में ड्रायक्लीन करवाते रहें.

5. जिस दवा से एलर्जी है, उसे खाने से बचें. डॉक्टर को ऐसी एलर्जी के बारे में ज़रूर बताएं.

6. किचन में एग्जॉस्ट फैन ज़रूर लगवाएं और खाना पकाते समय उसे चलाएं.

7. घर को हमेशा बंद न रखें. घर को खुला और हवादार बनाए रखें, ताकि साफ़ हवा आती रहे.

8. खिड़कियों में महीन जाली लगवाएं और जाली वाली खिड़कियों को हमेशा बंद रखें, क्योंकि खुली खिड़की से कीड़े और मच्छर आपके घर में घुस सकते हैं.

9. दीवारों पर फफूंद और जाले हो गए हों, तो उन्हें साफ़ करते रहें, क्योंकि फफूंद के कारण भी एलर्जी हो सकती है.

10. बारिश के मौसम में फूल वाले प्लांट्स को घर के अंदर न रखें.

Allergies

11. योग और नैचुरोपैथी एलर्जी से लड़ने में काफ़ी कारगर होते हैं. एलर्जी से बचने के लिए पेट साफ़ रखना चाहिए. बहुत गर्म या बहुत ठंडा खाना नहीं खाना चाहिए. हमेशा साफ़ पानी पीना चाहिए. रोज़ाना क़रीब 15 मिनट अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भस्त्रिका प्राणायाम करने से एलर्जी में फ़ायदा होता है, क्योंकि इनसे इम्यून सिस्टम मज़बूत होता है.

12.  योग और नैचुरोपैथी एलर्जी से लड़ने में काफ़ी कारगर होते हैं. एलर्जी से बचने के लिए पेट साफ़ रखना चाहिए. बहुत गर्म या बहुत ठंडा खाना नहीं खाना चाहिए. हमेशा साफ़ पानी पीना चाहिए. रोज़ाना क़रीब 15 मिनट अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भस्त्रिका प्राणायाम करने से एलर्जी में फ़ायदा होता है, क्योंकि इनसे इम्यून सिस्टम मज़बूत होता है.

13. अगर जल्दी-जल्दी सर्दी और ज़ुकाम की एलर्जी हो तो सुबह उठकर गुनगुने पानी में नींबू का रस मिलाकर पीएं.

14. प्रदूषण से होने वाली एलर्जी से बचने के लिए गुनगुने पानी में तुलसी, नींबू, काली मिर्च और शहद डालकर पीएं.

15. बदलते मौसम में होने वाली एलर्जी से बचने के लिए खट्टी चीजें, जैसे- अचार और तली-भुनी चीजें खाने से परहेज़ करें.

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टाइगर श्रॉफ के इस वीडियो को मिल चुके हैं 16 लाख से ज़्यादा व्यूज, शिल्पा शेट्टी भी वीडियो देखकर हैरान (Tiger Shroff latest Gym Video has set internet on fire, Celebrities Are praising him)

फिल्म इंडस्ट्री के स्टार्स फिटनेस के प्रति बेहद सचेत रहते हैं. वे अक्सर फैन्स के साथ फिटनेस वीडियोज़ व टिप्स शेयर करते हैं और अपने आम लोगों को फिट रहने के लिए प्रेरित करते हैं. इन्हीं में से एक हैं टाइगर श्रॉफ (Tiger Shroff). इन दिनों सोशल मीडिया पर टाइगर का जिम वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वह 200 किलोग्राम का वजन उठाते नजर आ रहे हैं. टाइगर ने वीडियो को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, ‘जिम में इस तरह से कड़ी मेहनत करते हुए काफी वक्त हो गया, 200 किलोग्राम. हाई स्कूल के दिनों में बहुत हल्का महसूस किया करता था.” टाइगर के इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर अब तक 16 लाख से भी ज्यादा लोग देख चुके हैं.

Tiger Shroff

टाइगर के इस वीडियो को देखने के बाद ना केवल उनके प्रशंसक बल्कि फिल्म जगत की हस्तियां भी तारीफ करने से खुद को रोक नहीं पाए. यह वीडियो देखकर शिल्पा शेट्टी ने कमेंट किया..बाप रे. जबकि  उनके अलावा डीनो ने भी लिखा- ‘बेहतरीन, मेरे विचार से यह सबसे अच्छा व्यायाम है. वहीं ईशान खट्टर ने कमेंट करते हुए लिखा, सुपरह्यूमन. दूसरी ओर टाइगर श्रॉफ के फैन्स उन्हें हल्क और मास्टर जैसे कमेंट्स दे रहे हैं. आपको बता दें कि टाइगर श्रॉफ अंतिम बार फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2 में नज़र आए थे.  इस फिल्म में उनके अलावा अनन्या पांडे और तारा सुतारिया भी थीं, हालांकि यह फिल्म बेहद चर्चा में थी, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के अनुसार परफॉर्म नहीं कर पाई थी. उनकी अगली फिल्म वॉर है. जिसमें वे रितिक रोशन के साथ नज़र आनेवाले हैं.

Tiger Shroff

कुछ दिनों पहले इस फिल्म का पोस्टर सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए टाइगर श्रॉफ ने लिखा था, ” इस लड़ाई में सिर्फ एक ही जीतेगा. रितिक रोशन, क्या आप हारने को तैयार हैं?’ रितिक ने भी शानदार अंदाज में टाइगर को जवाब दिया है, ऋतिक ने लिखा, ”यह एक जंग है. मेरा एक्शन मेरे शब्दों से ज्यादा धमाकेदार होगा. 2 अक्टूबर को तुमसे मिलता हूं.” आपको बता दें कि टाइगर श्रॉफ अपनी पर्सनल लाइफ के कारण भी खबरों में बने रहते हैं. सूत्रों के अनुसार वे बॉलीवुड एक्ट्रेस दिशा पटानी को डेट कर रहे हैं और दोनों को अक्सर एक साथ लंच डेट पर देखा जाता है.
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क्यों पुरुषों के मुक़ाबले महिला ऑर्गन डोनर्स की संख्या है ज़्यादा? (Why Do More Women Donate Organs Than Men?)

जब किडनी ख़राब होने से बेटे की जान ख़तरे में थी, तो उसके सिरहाने उसकी मां खड़ी थी, जब उसे लिवर ट्रांसप्लांट की ज़रूरत पड़ी, तो उसकी पत्नी ने अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा दी, जब-जब उसे ज़रूरत पड़ी तब-तब कभी मां, कभी पत्नी, कभी बहन, तो कभी बेटी बनकर उसने उसकी ज़िंदगी के लिए लड़ाई लड़ी, लेकिन जब उसे ज़रूरत पड़ी, तो दूर तक कहीं कोई न था…

Women Donate Organs Than Men

अजीब विडंबना है हमारे समाज की कि महिलाओं की जान की क़ीमत आज भी पुरुषों से कम आंकी जाती है. हम मानें या न मानें, लेकिन जब बात ज़िंदगी और मौत की आती है, तो लोग आज भी महिलाओं की सेहत और जान के मुक़ाबले पुरुषों की सेहत और जान को ज़्यादा तवज्जो देते हैं. ये हम नहीं कहते, बल्कि वो आंकड़े बताते हैं कि हर साल लाइव ऑर्गन डोनर्स यानी जीवित अंगदान के मामले में महिलाएं पुरुषों से कहीं आगे हैं. जीवित अंगदान में महिलाओं के आगे होने के कारण क्या हैं और क्या है इसके पीछे की हक़ीक़त और मानसिकता? आइए, जानते हैं.

एक नज़र आंकड़ों पर

–     वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन के अनुसार, साल 2011 में अमेरिका के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश था, जहां लिविंग ऑर्गन डोनेशन सबसे ज़्यादा हुआ.

–     आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया के पहले सबसे ज़्यादा लिविंग ऑर्गन डोनेशनवाले देश अमेरिका के मुक़ाबले में भी ज़्यादा महिला डोनर्स हमारे देश में हैं, जबकि ट्रांसप्लांट सबसे ज़्यादा अमेरिका में होते हैं.

–     जहां अमेरिका में 62% महिलाएं किडनी डोनर्स हैं, वहीं भारत में यह आंकड़ा 74% है, जहां अमेरिका में 53% लिवर डोनर्स  महिलाएं हैं, वहीं हमारे देश में यह संख्या 60.5% है.

–     जबकि ऑर्गन लेने के मामले में हमारे देश में यह आंकड़ा कम है. जहां अमेरिका में किडनी के 39% और लिवर का 35% डोनेशन महिलाओं को मिलता है, वहीं भारत में यह आंकड़ा 24% और 19% है.

–     हमारे देश में सालाना लगभग 4,000 किडनी ट्रांसप्लांट होते हैं, जिसमें से 80% ऑर्गन डोनेट करनेवाली महिलाएं होती हैं. इसमें से भी 90% मामलों में पत्नियों ने किडनी देकर अपने पति की जान बचाई है.

–     यहां यह ध्यान देनेवाली बात है कि 80% मामलों में ऑर्गन लेनेवाले पुरुष हैं, क्योंकि महिलाओं की संख्या बहुत कम है.

–    वहीं इस मामले को दूसरे एंगल से देखें, तो जहां किसी पुरुष की जान बचाने के लिए पांच महिलाएं डोनेशन के लिए आगे आती हैं, वहीं केवल एक पुरुष किसी महिला को ऑर्गन डोनेट करने को राज़ी होता है.

–     अगर पुरुषों के अनुसार देखें, तो 64% किडनी ट्रांसप्लांट के मामलों में डोनर महिलाएं ही थीं, जबकि महज़ 8% मामलों में पुरुषों ने महिलाओं को किडनी डोनेट की.

–     आंकड़ों के मुताबिक़ जहां पांच पुरुषों को आसानी से किडनी मिल जाती है, वहीं दो में से केवल एक महिला को ज़रूरत पड़ने पर किडनी मिल पाती है.

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महिलाओं की संख्या अधिक होने के पीछे का कारण व मानसिकता

–     पुरुषों द्वारा डोनेशन या ट्रासप्लांट के लिए मना करने का सबसे बड़ा कारण उनका कमाऊ होना है. क्योंकि महिलाएं कमाऊ नहीं हैं, घर पर रहती हैं, इसलिए वो पहली चॉइस बन जाती हैं.

–     ऐसा माना जाता है कि घरेलू महिलाएं सर्जरी के बाद जितने दिन चाहें, आराम कर सकती हैं, जबकि पुरुष ऐसा नहीं कर सकते.

–     हमारे देश में आज भी पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को कम तनख़्वाह मिलती है. यह भी एक कारण है कि अगर वर्किंग महिला को अपनी नौकरी भी छोड़नी पड़ी, तो परिवार की आर्थिक स्थिति ज़्यादा प्रभावित नहीं होगी, जबकि पुरुष कुछ दिनों की छुट्टी भी परिवार को प्रभावित कर सकती है.

–     ज़्यादातर मामलों में देखा गया है कि पुरुष ऑर्गन डोनेट करने से साफ़-साफ़ मना कर देते हैं, पर महिलाएं डर, लिहाज़ या फिर संकोच के कारण मना करने से हिचकिचाती हैं.

–    भारतीय महिलाएं भावुक होती हैं, इसलिए ऐसे फैसले दिमाग़ से नहीं, दिल से लेती हैं. किसी अपने को बचाने में अगर उनकी जान पर भी बन आए, तो वो ख़ुद की परवाह नहीं करतीं.

–     ज़्यादातर महिलाएं स्वेच्छा से डोनेट करती हैं, क्योंकि उन्हें अपनों की जान ज़्यादा प्यारी होती है.

–     बहुत बार ऐसा भी देखा गया है कि अगर घर की बहू का मैच डोनेशन के लिए हो जाए, तो सब यह उम्मीद करते हैं कि वो ट्रांसप्लांट के लिए मना नहीं करेगी, चाहे उसकी मर्ज़ी हो या न हो.

–     महिलाओं पर अपनों की जान बचाने के लिए एक तरह का सामाजिक दबाव भी होता है, जो पुरुषों पर नहीं होता.

–     डोनेशन या ट्रांसप्लांट के 0.5% मामलों में डोनर की जान जाने का ख़तरा भी होता है. यह भी एक बड़ा कारण है कि पुरुष डोनेशन के लिए आगे नहीं आते.

–     महिलाओं में त्याग की भावना इतनी प्रबल होती है कि अपने परिवार के लिए वो कुछ भी कर सकती हैं.

–     बहुत-से पुरुष डॉक्टर से झूठे-मूठे मेडिकल कारण बताकर डोनेशन से बच जाते हैं, जबकि महिलाएं ऐसा नहीं करतीं.

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Healthy Life
दिल को आहत करनेवाले कुछ मामले

–    पहला मामला 2016 में नवी मुंबई का है. दरअसल, दो साल की बच्ची को लिवर ट्रांसप्लांट की ज़रूरत थी. हॉस्पिटल प्रबंधन ने सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर पैसों का इंतज़ाम किया और बच्ची के पिता डोनर के तौर पर फिट पाए गए. फिर भी ट्रांसप्लांट आठ महीने बाद किया गया, क्योंकि उस व़क्त बच्ची की मां प्रेग्नेंट थी, उसका गर्भपात कराया गया, ताकि वो जल्द से जल्द डोनर बनने के लिए फिट हो जाए. बाद में डॉक्टर्स को पता चला कि पिता पर बच्ची के दादा-दादी का दबाव था कि बेटी के लिए उनका बेटा अपनी जान ख़तरे में न डाले, इसलिए पिता डोनर नहीं बना.

–     वहीं दूसरा मामला राजधानी दिल्ली का है. कामकाजी रितु को बचपन से एक किडनी में प्रॉब्लम थी. प्रेग्नेंसी के दौरान उसकी दूसरी किडनी में भी प्रॉब्लम हो गई. डॉक्टरों ने कहा, रितु को बचाने का तरीक़ा स़िर्फ ट्रांसप्लांट है. पति का ब्लड ग्रुप मैच होने से सभी को उससे उम्मीदें बंधी थीं, पर उसने सीधे-सीधे मना कर दिया. संयोग से एक 14 साल के बच्चे की मौत होने से रितु को किडनी मिल गई.

–     ऐसे मामलों को देखकर ही समझ आता है कि क्यों जब पति को ज़रूरत होती है, तो 80% महिलाएं तुरंत राज़ी हो जाती हैं, पर जब बारी उसकी आती है, तो स़िर्फ 20% मामलों में ही पति आगे आते हैं.

क़ानून ने जब दिया महिलाओं को अधिकार

–     साल 1995 में ‘द ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एक्ट’ में पत्नियों को भी लीगल डोनर्स की लिस्ट में शामिल करते ही महिला लाइव ऑर्गन डोनर्स की लाइन लग गई. इससे पहले महिलाओं को डोनर्स की लिस्ट में शामिल नहीं किया गया था.

–     द ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एंड टिश्यूज़ रूल्स, 2014 के अनुसार, कोई भी नाते-रिश्तेदार या फिर जिसे उस व्यक्ति से भावनात्मक लगाव हो, उसे ऑर्गन डोनेट कर सकता है, पर यह कमर्शियल इस्तेमाल के लिए नहीं होना चाहिए.

–     महिलाओं को ज़बर्दस्ती डोनेशन के लिए राज़ी तो नहीं कराया गया है, यह जानने के लिए डॉक्टर डोनर से अकेले में बात करते हैं. डोनेशन से पहले उन्हें इससे जुड़े ख़तरों के बारे में भी बताया जाता है. इस दौरान काउंसलिंग बहुत मायने रखती है.

हमारी बहादुर शीरोज़

–     कुछ समय पहले पूजा श्रीराम बिजारनिया की कहानी सोशल मीडिया के ज़रिए काफ़ी लोकप्रिय हुई थी, जहां पूजा ने अपने पिता को अपना लिवर देकर एक नई ज़िंदगी उपहार में दी थी. यह अपने आप में बहुत बड़ी ख़बर थी, क्योंकि पूजा की उम्र बहुत कम थी और ऐसे में इतना बड़ा ़फैसला लेकर उन्होंने एक मिसाल कायम की थी.

–     कुछ साल पहले रांची शहर की ख़बर ने सबको एक बार फिर बेटियों के गुणगान का मौक़ा दिया, जब परिवार की सबसे बड़ी बेटी ने अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए अपने पिता के लिए लिवर डोनेट किया था.

– अनीता सिंह

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Personal Problems: क्या गर्भनिरोधक गोलियों से पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं? (Can Birth Control Make My Periods Irregular?)

मैं 27 वर्षीया महिला हूं. पिछले महीने मेरी डॉक्टर ने मुझे गर्भनिरोधक गोलियां (Birth Control Pills) लेने की सलाह दी. गोलियां शुरू करने के बाद भी बीच-बीच में मुझे ब्लीडिंग हो रही है. इस बारे में मेरी गायनाकोलॉजिस्ट ने कुछ बताया नहीं था. क्या मैं गर्भनिरोधक गोलियां लेना बंद कर दूं?
– काशी मौर्या, मुंबई.

आमतौर पर गर्भनिरोधक गोलियों के सेवन से ब्लीडिंग अनियमित हो जाती है और इसे नियमित होने में कम-से-कम तीन महीने का समय लगता है. इस दौरान आपको ब्रेस्ट में भारीपन महसूस होना, चक्कर आना और सिरदर्द जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं. अगर तीन महीने बाद भी ये लक्षण दिखाई दें, तो अपनी गायनाकोलॉजिस्ट से संपर्क करें.

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Birth Control Pills
मेरी बेटी की उम्र 20 साल है. उसकी शादी अभी नहीं हुई है. मेरी कुछ सहेलियां कह रही थीं कि भले ही कोई समस्या न हो, फिर भी एक बार गायनाकोलॉजिस्ट को मिल लेना चाहिए. क्या मैं अपनी बेटी को गायनाकोलॉजिस्ट के पास ले जाऊं?
– मयूरी यादव, नैनीताल.

आजकल बहुत-सी महिलाएं अपनी टीनएज बेटियों को गायनाकोलॉजिस्ट के पास लेकर आती हैं, ताकि वो उन्हें प्यूबर्टी के दौरान होनेवाले
हार्मोनल बदलावों, मेंस्ट्रुअल प्रॉब्लम्स, फैमिली प्लानिंग, सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ेस आदि के बारे में समझा सकें. गायनाकोलॉजिस्ट को मिलना, न मिलना आपका व्यक्तिगत मामला है, लेकिन अगर आपकी बेटी को कोई मेंस्ट्रुअल या फीमेल प्रॉब्लम नहीं है, तो उसे डॉक्टर के पास ले जाने की ज़रूरत नहीं. ज़्यादातर जागरूक मांएं किसी समस्या के आने से पहले उसके बारे में बेटी को आगाह करना सही समझती हैं. वैसे देखा जाए, तो अपनी सेहत के प्रति जागरूक रहना अच्छी बात है.

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Dr. Rajshree Kumar

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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डिप्रेशन को ऐसे करें मैनेज (Self Help: Tips For Managing Depression)

Tips For Managing Depression
डिप्रेशन को ऐसे करें मैनेज (Self Help: Tips For Managing Depression)

डिप्रेशन ऐसी नकारात्मक भावना, जहां आपकी सारी ऊर्जा लगभग ख़त्म हो जाती है, उम्मीदें, आशाएं, ख़ुशियां… सब कुछ धूमिल-सी नज़र आती हैं. ज़िंदगी बेकार लगने लगती है… ऐसा महसूस होता है जैसे इन परिस्थितियों से निकलना अब नामुमकिन है, ज़िंदा रहना मुश्किल लगने लगता है. ऐसे में बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आप ख़ुद कुछ प्रयास करें, ताकि अपने इस डिप्रेशन को मैनेज कर सकें और पॉज़िटिव सोच अपना सकें.

बाहर जाएं, कनेक्टेड रहें: यह सच है कि डिप्रेशन के दौरान बाहर जाना और लोगों से मिलना-जुलना बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि आपमें वो ऊर्जा नहीं रहती, लेकिन थोड़ा-सा प्रयास आपकी मदद कर सकता है. सोशल गैदरिंग्स में जाएं, दोस्तों से मिलें, रिश्तेदारों से कनेक्टेड रहें. अकेलापन आपकी तकलीफ़ और बढ़ाएगा. बेहतर होगा, नए दोस्त बनाएं और पुरानों से मिलना-जुलना शुरू करें. आपके क़रीबी हमेशा आपकी मदद करने को तत्पर रहेंगे, इसलिए अपनी तकलीफ़ उनसे शेयर करें, इससे आपका मूड बदलेगा और मन हल्का होगा.

किस तरह से कनेक्ट करें?

  • जिनके साथ आप सुरक्षित महसूस करते हों और जिन पर विश्‍वास करते हों, उनसे मिलें.
  • मिलने का अर्थ है आमने-सामने मिलना. यह सही है कि सोशल नेटवर्किंग और फोन कॉल्स से भी कनेक्ट किया जा सकता है, लेकिन फ़ायदा अधिक तभी होगा, जब फेस टु फेस मिलेंगे.
  • दूसरों की सहायता करने का मन बनाएं. दूसरों के लिए कुछ करेंगे, तो आपको कहीं न कहीं संतुष्टि महसूस होगी. मदद चाहे छोटी ही क्यों न हो, किसी के काम आने की भावना आपको पॉज़िटिव बनाएगी.
  • पेट्स रखें और उसके साथ समय बिताएं. यह काफ़ी कारगर तरीक़ा है डिप्रेशन से निपटने का. जानवरों से प्यार करते हैं, तो उनकी केयर करें, इससे आप बेहतर महसूस करेंगे.
  • एक्सरसाइज़, वर्कआउट, योग व मेडिटेशन करें. यह काफ़ी अच्छा उपाय है. इससे आप ऊर्जा व नई शक्ति महसूस करेंगे. मेडिटेशन व योग से मन शांत होगा और नकारात्मक भाव बाहर निकलेंगे.
  • एक्सपर्ट की मदद लें. हिचकिचाएं नहीं. आप सच में अच्छा महसूस करेंगे. ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बदलेगा और डिप्रेशन से बाहर आने में मदद मिलेगी.

कनेक्शन के बेस्ट टिप्स

  • किसी क़रीबी या भरोसेमंद से अपनी तकलीफ़ व दुख का कारण शेयर करें.
  • किसी दोस्त के साथ कॉफी या टी डेट पर जाएं.
  • मूवी या डिनर प्लान करें.
  • किसी पुराने दोस्त को कॉल करें.
  • कोई हॉबी क्लास जॉइन कर लें.

अच्छा महसूस करानेवाली गतिविधियां करें: जिन बातों से, जिन गतिविधियों से आप रिलैक्स्ड और ऊर्जावान महसूस करते हों, उन पर ध्यान दें. हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं. शेड्यूल बनाएं और दिनभर में फन एक्टिविटीज़ के लिए टाइम फिक्स करें.

कैसे करें?

  • जो चीज़ें आपको पहले मज़ेदार लगती थीं, उन्हें फिर करना शुरू करें.
  • यह सच है कि आपका मन नहीं करेगा, ये तमाम चीज़ें करने का, लेकिन ख़ुद को फोर्स करें, क्योंकि एक बार आप इस तरह की फन एक्टिविटीज़ में ख़ुद को व्यस्त कर लेंगे, तो आपको विश्‍वास ही नहीं होगा कि कितना बेहतर महसूस करेंगे.
  • हो सकता है कि एक बार में आप डिप्रेशन से बहुत ज़्यादा बाहर न आ पाएं, लेकिन धीरे-धीरे आप ख़ुद को अधिक सकारात्मक व ऊर्जावान महसूस करने लगेंगे.
  • आप कोई स्पोर्ट्स एक्टिविटी या स्विमिंग, डांस व साइकिलिंग जैसे शौक अपना सकते हैं.

अपनी हेल्थ को ज़रूर सपोर्ट करें

  • डिप्रेशन सबसे पहले आपकी नींद पर असर डालता है. या तो आप बहुत कम या बहुत अधिक सोने लगते हैं. अच्छी नींद लेने की कोशिश करें. हेल्दी स्लीप टेक्नीक्स के बारे में जानें और नींद पूरी लें. इससे आपको रेस्ट मिलेगा और आप फ्रेश फील करेंगे.
  • स्ट्रेस को बढ़ने न दें, क्योंकि स्ट्रेस से डिप्रेशन और बढ़ सकता है. उन तमाम तत्वों पर ध्यान दें, जो स्ट्रेस बढ़ाते हैं, जैसे- काम का प्रेशर, आर्थिक समस्या, ख़राब रिलेशनशिप… बेहतर होगा इन सबसे निपटने के तरीक़ों पर ध्यान दें. एक्सपर्ट की सहायता भी ले सकते हैं.
  • रिलैक्सेशन तकनीकों को अपनाएं. ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ करें, ध्यान करें, म्यूज़िक सुनें, मसल रिलैक्सेशन तकनीक सीखें.

वेलनेस टूलबॉक्स

  • अपने बारे में सकारात्मक बातें लिखें.
  • लिस्ट बना लें कि आपको अपनी कौन-सी बातें और आदतें सबसे ज़्यादा पसंद हैं.
  • कोई फनी मूवी या टीवी सीरीज़ देखें.
  • म्यूज़िक सुनें.
  • नेचर में समय बिताएं. समंदर के किनारे या किसी पार्क में सुबह-शाम जाएं.
  • हॉट बाथ लें. जल्दबाज़ी न करके आराम से गर्म पानी से नहाएं, इससे शरीर हल्का लगेगा.
  • ख़ुद को किसी न किसी काम में बिज़ी रखें. हेल्दी डायट लें. मनपसंद डिश बनाएं.

एक्टिव रहने की कोशिश करें: एक्सरसाइज़ डिप्रेशन से लड़ने का सबसे बेहतर तरीक़ा है. शोध कहते हैं कि एक्सरसाइज़ डिप्रेशन से लड़ने में उतनी ही कारगर है, जितनी दवा. इसके अलावा एक्सरसाइज़ से डिप्रेशन के दोबारा होने की संभावना भी कम हो जाती है.

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एक्सरसाइज़ से मूड को बूस्ट कैसे करें?

  • यह सच है कि डिप्रेशन के चलते एक्सरसाइज़ का मन बनाना बेहद मुश्किल है, लेकिन एक बार आप इच्छाशक्ति दिखा देंगे, तो यह बेहद फ़ायदा पहुंचाएगी.
  • रिसर्च बताते हैं कि डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति को एक्सरसाइज़ से ऊर्जा मिलती है और हताशा कम होती है.
  • रिदमवाली एक्सरसाइज़ अधिक फ़ायदेमंद होती है, जैसे- वॉकिंग, वेट ट्रेनिंग, स्विमिंग या डान्सिंग.
  • किसी क्लब के मेंबर बनकर अन्य लोगों के साथ एक्सरसाइज़ करना और बेहतर परिणाम देगा.
  • घर में अगर पेट्स हैं, तो उनके साथ ईवनिंग वॉक पर जाएं.

हेल्दी खाएं, डिप्रेशन से लड़नेवाली डायट फॉलो करें: जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन… ये कहावत यूं ही नहीं बनी है. हम जो खाते हैं, उसका सीधा असर हमारे शरीर व मन पर पड़ता है. फैटी, ऑयली, कैफीन या अल्कोहल जैसी चीज़ों का सेवन कम करें, क्योंकि ये आपके हार्मोंस पर असर करते हैं और मूड पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं.

कैसी हो आपकी डायट?

  • शुगर और रिफाइंड कार्ब्स का सेवन कम कर दें. फ्रेंच फ्राइज़, पास्ता, एरिएटेड ड्रिंक्स कुछ समय के लिए ही बेहतर महसूस करवाते हैं. आगे चलकर ये आपके मूड को प्रभावित कर सकते हैं.
  • दिन में 3-4 बार थोड़ा-थोड़ा खाएं. खाने में बहुत ज़्यादा अंतर रखेंगे, तो चिड़चिड़ापन बढ़ेगा.
  • विटामिन बी ज़रूर लें, क्योंकि फॉलिक एसिड और विटामिन बी 12 की कमी से डिप्रेशन बढ़ता है. हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, अंडा, बींस, सिट्रस फ्रूट्स अधिक लें.
  • ओमेगा 3 फैटी एसिडयुक्त भोजन लें. मूड को संतुलित रखने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. फैटी फिश और ठंडे पानी की मछलियों के तेल का सेवन करें.

ज़रूरी है सनलाइट का डेली डोज़: सनलाइट सेरोटोनिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाकर मूड बेहतर करने में मददगार है. जब भी मौक़ा मिले, रोज़ाना 15 मिनट की धूप ज़रूर लें.

कब और कैसे लें यह डेली डोज़?

  • आप लंच टाइम में बाहर जा सकते हैं, कुछ देर टहलें.
  • आसपास कोई गार्डन वगैरह हो, तो वहां जा सकते हैं.
  • अपने घर पर और वर्कप्लेस में जितना संभव हो, नेचुरल लाइट में रहने की कोशिश करें.
  • छुट्टी के दिन सुबह-सुबह की धूप लेने के लिए छत का इस्तेमाल कर सकते हैं या फिर रोज़ाना वॉक के लिए भी जा सकते हैं.

विंटर ब्लूज़ से कैसे निपटें?

  • सर्दियों के मौसम में सनलाइट वैसे भी कम होती है और इस मौसम में डिप्रेशन अधिक महसूस होता है, जिसे सीज़नल इफेक्टिव डिसऑर्डर कहते हैं. लेकिन यदि आप प्रयास करें, तो सालभर आपका मूड बेहतर बना रह सकता है.

नकारात्मक सोच को चुनौती दें: ज़िंदगी से ऊब महसूस होना, कमज़ोरी-थकान लगना, निराशा महसूस होना… इस तरह के नकारात्मक भाव डिप्रेशन के चलते आते हैं. आपको यह बात मन में बैठा लेनी होगी कि ये तमाम नकारात्मक विचार असल में हैं ही नहीं. आपको अपने माइंड को पॉज़िटिव सोचने के लिए प्रशिक्षित करना होगा. हालांकि यह मुश्किल है, लेकिन लगातार प्रयास से यह संभव हो सकता है.

इस तरह के विचारों से रहें दूर

बहुत कुछ या कुछ भी नहीं सोचना: ब्लैक एंड व्हाइट में चीज़ों को न देखें. ये सही है और ये ग़लत… ऐसा नहीं होता. बीच का रास्ता भी होता है.

बुरे अनुभव को मन में बैठा लेना: एक जगह अगर असफलता हाथ लगी हो, तो इसका यह मतलब नहीं कि हर बार और हर जगह ही असफलता मिलेगी. अपने बुरे अनुभवों को मन में बैठा न लें.

पॉज़िटिव बातों को भूलकर स़िर्फ निगेटिव ही याद रखना: आपके साथ बहुत कुछ अच्छा होता है, लेकिन आप उसे अधिक समय तक याद नहीं रखते, लेकिन कोई एक बात ग़लत हो, तो उसे बार-बार याद करते हैं. इस सोच से बाहर निकलें. अच्छा-बुरा सभी के साथ होता है और दोनों को ही समान रूप से लें और जब मन निराश हो, तो पॉज़िटिव बातों को याद करें.

पॉज़िटिव बातों को कम आंकना: कुछ अच्छा हो, तो उसके बारे में भी यह सोचना कि ये तो सामान्य-सी बात है, इसमें कुछ ख़ास क्या है… इस तरह के विचारों से दूर रहें और हर छोटी-छोटी बात में ख़ुशियां ढूंढ़ें.

फ़ौरन निष्कर्ष पर पहुंच जाना: प्रयास करने से पहले ही यह सोच लेना कि परिणाम ग़लत ही होगा या हमें असफलता ही मिलेगी… ग़लत व नकारात्मक पहलू है. इससे दूर रहें.

अपने बारे में इमोशनली निगेटिव सोचना: ‘मैं ज़िंदगी में कुछ नहीं कर सकता’ या ‘मेरे साथ कभी भी कुछ अच्छा नहीं हो सकता’… इस तरह की बातों से अपने बारे में निगेटिविटी न बढ़ाएं. हम जो सोचते हैं हम वही बन जाते हैं, इसलिए अपनी सोच को पॉज़िटिव बनाएं.

बहुत अधिक नियमों में ख़ुद को बांध लेना: अपने लिए बहुत स्ट्रिक्ट रूल्स बना लेना, जिससे आप ज़िंदगी जीना ही भूल जाएं, आपको नकारात्मकता की ओर ले जाएंगे. फ्लेक्सिबल बनें.

कब लें एक्सपर्ट एडवाइस?

जब तमाम सेल्फ हेल्प टेक्नीक्स के बाद भी आपको लग रहा हो कि आपका डिप्रेशन ठीक नहीं हो रहा, तब आपको एक्सपर्ट के पास जाने से हिचकिचाना नहीं चाहिए. आपको अपनी मदद ख़ुद ही करनी होगी. ये न सोचें कि एक्सपर्ट के पास जाना किसी कमज़ोरी की निशानी है. अगर शरीर में तकलीफ़ हो, तो आप डॉक्टर के पास जाते ही हैं, तो मन की तकलीफ़ के लिए क्यों नहीं जाना चाहते?

हां, एक बात का ध्यान रहे कि प्रोफेशनल हेल्प के बाद भी ये सेल्फ हेल्प टेक्नीक्स फॉलो करते रहें और यह बात भी मन में बैठा लें कि डिप्रेशन ठीक हो सकता है और आप इससे निकलकर बेहतर व हैप्पी लाइफ जी सकते हैं.

– गीता शर्मा

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एसिडिटी से हैं परेशान? तो अपनाएं ये उपाय (Home Remedies To Get Rid Of Acidity)

एसिडिटी (Acidity) की समस्या (Problem) बहुत आम होती जा रही है. गलत खानपान और अनियमित दिनचर्या के कारण अक्सर लोगों को एसिडिटी की समस्या से दोचार होना पड़ता है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम आपको एसिडिटी दूर करने के आसान घरेलू उपाय (Easy Home Remedies) बता रहे हैं.

Acidity

– जब भी एसिडिटी का अटैक हो, तो सबसे बेहतर उपाय है एक पका केला खा लें. केला थोड़ा ज़्यादा पका होगा, तो असर अच्छा होगा. केले में मौजूद पोटैशियम के कारण इसमें पीएच अधिक होता है, जो एसिडिटी को ख़त्म करता है.
– तुलसी के कुछ पत्ते चबा लें. तुलसी पेट में पेप्टिक एसिड के प्रभाव को कम करके एसिडिटी को कम करती है. यह पाचन क्रिया को भी बेहतर बनाती है.
– ठंडा दूध पीने से भी एसिडिटी कम होती है. इसमें मौजूद कैल्शियम एसिडिटी को कम करता है. ठंडा होने के कारण यह जलन को कम करता है. ध्यान रहे कि इसमें शक्कर न मिलाएं. अगर अधिक एसिडिटी है, तो इसमें 1 चम्मच देसी घी मिलाकर लें.
– सौंफ न स़िर्फ पाचक होती है, बल्कि ठंडक देकर एसिडिटी और कब्ज़ को भी दूर करती है. इसके अलावा यह मुंह के छालों में भी लाभदायक है.

Home Remedies To Get Rid Of Acidity
– एसिडिटी होने पर जीरा चबा-चबाकर खाएं या फिर उसे पानी में उबालें और ठंडा होने पर यह पानी पिएं.
– लौंग भी बहुत फ़ायदेमंद है. जब भी एसिडिटी हो, तो एक लौंग को चबाकर उसका तेल मुंह में ही कुछ देर रखें. इससे एसिडिटी भी दूर होती है, सलाइवा बढ़ता है, जिससे पाचन क्रिया भी बेहतर होती है.
– इलायची के लिए वर्षों से आयुर्वेद में भी यह माना जाता रहा है कि इसमें तीनों दोषों- वात, पित्त और कफ़ को संतुलित करने के गुण हैं. एसिडिटी होने पर दो इलायची चबाकर खाएं (छिलके के साथ भी खा सकते हैं) या फिर फ़ौरन राहत के लिए इलायची के दानों का पाउडर पानी में मिलाकर उबालें और इस जूस को ठंडा होने पर पिएं.

Home Remedies To Get Rid Of Acidity
– पुदीने के पत्तों को काटकर पानी में उबालें और ठंडा करके इस पानी को पिएं. यह एसिडिटी के कारण होनेवाले दर्द व जलन को भी कम करता है.
– अदरक न स़िर्फ पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है, बल्कि पेट को एसिड के प्रभाव से भी बचाता है. अदरक के टुकड़े को चबाने से एसिडिटी से राहत मिलती है. अगर आपके लिए उसे चबाना संभव नहीं, तो उसे पानी के साथ उबालकर पिएं या फिर क्रश करके गुड़ के साथ चूसें.
– आंवला कफ़ और पित्त से राहत देता है. एसिडिटी को दूर रखने का सबसे अच्छा उपाय है कि रोज़ाना 1 टीस्पून आंवला पाउडर लें.

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जानिए छवि मित्तल ने कैसे लूज़ किया अपना पोस्ट प्रेग्नेंसी वेट (Weight loss: We tell you how exactly actress Chhavi Mittal lost all the post-pregnancy weight!)

कुछ महीनों पहले टीवी एक्ट्रेस छवि मित्तल दूसरी बार मां बनी हैं. उन्होंने 13 मई को बेटे को जन्म दिया. छवि सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. उन्होंने प्रेग्नेंसी के दौरान भी अपने फैन्स के साथ अपनी पूरी जर्नी शेयर की. वे प्रेग्नेंसी के समय वर्कआउट वीडियोज़ शेयर करके फैन्स को फिट व ऐक्टिव रहने के लिए प्रोत्साहित करती रहती थीं. छवि ने प्रेग्नेंसी से जुड़े कई मिथक से पर्दा हटाया. छवि ने मां बनने की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया. गर्भावस्था के दौरान महिलाएं किस तरह की समस्याओं से गुजरती हैं, छवि ने उस पर भी कई पोस्ट लिखे और इसके लिए उन्हें बहुत सराहा गया. बेटे के जन्म के बाद भी छवि अपनी लाइफ के बारे में व बच्चे के जन्म के बाद आनेवाली परेशानियों का जिक्र करती रहती थीं.  हाल ही में छवि ने इंस्टाग्राम पर बिफोर एंड आफ्टर प्रेग्नेंसी की कोलाज पिक्चर शेयर की. इस फोटो को देखकर साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि छवि ने अपनी प्रेग्नेंसी वेट से पूरी तरह छुटकारा पा लिया है. फोटो में वे  काफी हॉट व फ्रेश दिख रही हैं.

Chhavi Mittal

 

इंस्टाग्राम पर यह फोटो शेयर करते हुए छवि ने पोस्ट लिखा. उन्होंने बताया पोस्ट प्रेग्नेंसी वेट लॉस एक कभी न खत्म होनेवाला सफर है. इस पिक्चर को देखकर मुझे एहसास हो रहा है कि मैं तो अब भूल भी चुकी हूं कि मेरा बेबी बम्प कितना बड़ा था. उस दौरान मैं बहुत थकी हुई महसूस करती थी. अब मैं फिर से प्रेग्नेंसी के बाद वजन कम करने की बात करती हूं. बहुत महिलाएं मुझसे पूछती हैं कि मैंने इतना वजन कम कैसे किया. वैसे मैं फिलहाल बहुत ज़्यादा नहीं कर रही हूं, क्योंकि बच्चा छोटा है. लेकिन फिलहाल में सिर्फ एक ही चीज़ पर ध्यान देती हूं वो है अनुशासन. मैं शक्कर नहीं खाती और मैंने डेयरी प्रोडक्ट्स लेना बंद कर दिया है. हां, दूध पीने से दूध नहीं बनता, जैसे अंडे खाने से कोई अंडे नहीं दे सकता. मुझे 4 किलो और कम करना है, हालांकि सी सेक्शन के बाद बॉडी पहले जैसी नहीं रहती. सर्जरी के तीन महीने बाद भी मैं स्ट्रगल कर रही हूं. लेकिन जल्द ही सब ठीक हो जाएगा और अच्छे दिन वापस आएंगे. दो सिर्फ डायट में दो चीज़ें अवॉइड से किलो से ज़्यादा इंचेज में लूज कर रही हूं. इसलिए मैं खुश हूं. यानी छवि मित्तल ने साफ-साफ बताया कि शक्कर छोड़ने और डेयरी प्रोडक्ट्स का त्याग करके आसानी से वजन कम किया जा सकता है.

Chhavi Mittal

35 साल की छवि ने साल 2005 में टीवी डायरेक्टर मोहित हुसैन से शादी की थी । साल 2012 में छवि ने एक बेटी अरीजा को जन्म दिया था.

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स्पर्म काउंट बढ़ाने के आसान देसी उपाय (Super Foods That Increase Sperm Count)

एक स्वस्थ पुरुष के शरीर में प्रति सेकेंड 1,500 स्पर्म्स यानी शुक्राणु बनते हैं, लेकिन आजकल की भागदौड़ भरी तनावपूर्ण ज़िंदगी व आधुनिक जीवनशैली के कारण बहुत से पुरुष शुक्राणुओं की कमी की समस्या का सामना कर रहे हैं. इतना ही नहीं, शुक्राणुओं की गुणवत्ता भी घट रही है. स्पर्म काउंट कम होने से उनकी फर्टिलिटी पर बुरा असर पड़ता है. एक अध्ययन के अनुसार, पुरुषों की फर्टिलिटी से जुड़ी 90 फ़ीसदी समस्याएं शुक्राणुओं की कमी के कारण होती हैं.  आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि आपके स्पर्म काउंट का सीधा संबंध आपके खानपान से है. आपकी डायट जितनी अच्छी होगी, स्पर्म काउंट उतना बेहतर ही होगा. इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम आपको कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों की जानकारी दे रहे हैं, जो  शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ आपकी सेक्सलाइफ बेहतर बनाने में मददगार सिद्ध होंगे. यदि आप अपना परिवार बढ़ाने की सोच रहे हैं तो अपने मेनू में इन चीज़ों को शामिल कीजिए.

Foods That Increase Sperm Count

स्पर्म प्रोडक्शन के लिए ऑयस्टर
शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने में ज़िंक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ऑयस्टर यानी घोंघा ज़िंक का उत्तम स्रोत है. यह स्पर्म प्रोडक्शन यानी शुक्राणुओं का उत्पादन बढ़ाने में मदद करता है. अतः रोज़ाना 50 ग्राम ऑयस्टर का सेवन करें.

स्वस्थ स्पर्म के लिए अंडे
प्रोटीन व विटामिन ई से भरपूर अंडे स्वस्थ शुक्राणुओं के उत्पादन में मदद करते हैं. स़िर्फ इतना ही नहीं, यह स्पर्म काउंट बढ़ाने के साथ-साथ प्रजनन क्षमता को कम करने वाले फ्री रैडिकल्स से लड़ने में भी मदद करते हैं. इसलिए रोज़ाना दो अंडे खाएं.

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एंटीऑक्सीडेंट्स के लिए डार्क चॉकलेट
डार्क चॉकलेट्स में अमीनो एसिड्स पाए जाते हैं जो स्पर्म काउंट को दोगुना करने के साथ ही सीमन (वीर्य) को गाढ़ा बनाने में भी मदद करते हैं. इसके अलावा डार्क चॉकलेट में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो पुरुषों की फर्टिलिटी को प्रभावित करने वाले फ्री रैडिकल्स को दूर करने में मददगार होते हैं. लेकिन बहुत ज़्यादा चॉकलेट नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इससे वज़न बढ़ सकता है, जिसकी वजह से शरीर में टेस्टोस्टेरॉन नामक सेक्स हार्मोन कासंतुलन बिगड़ जाता है, नतीजतन स्पर्म काउंट कम होता है. दिनभर में एक टुकड़ा डार्क चॉकलेट काफ़ी है. चॉकलेट जितना डार्क होगा, स्पर्म काउंट बढ़ाने में उतना ही फ़ायदेमंद होगा.

शुक्राणुओं की गतिशीलता के लिए लहसुन
अगर लहसुन की तेज़ महक से आपको कोई परेशानी नहीं है तो इसका सेवन शुरू कर दीजिए. इसमें दो जादुई तत्व पाए जाते हैं- पहला है एलिसिन, जो पुरुषों के सेक्सुअल ऑर्गन में ब्लड फ्लो को बढ़ाता है और स्पर्म को क्षतिग्रस्त होने से बचाता है और दूसरा है सेलेनियम- यह एक प्रकार का एंटीऑक्सिडेंट है, जो शुक्राणुओं की गतिशीलता को बढ़ाता है. प्रतिदिन दो लहसुन की कलियां खाना पर्याप्त होगा.

कामेच्छा के लिए केला

Banana
यह फल पुरुषों के सेक्सुअल हेल्थ के लिए अच्छा होता है. केले में ब्रोमेलिन नामक एंज़ाइम पाया जाता है, जो पुरुषों की कामेच्छा बढ़ाने व सेक्स हार्मोन्स को नियंत्रित करने में मदद करता है. इसके अलावा इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी, ए और बी 1 पाया जाता है, जो पुरुषों के शरीर में शुक्राणु पैदा करने की क्षमता को बढ़ाता है.

सेक्स हार्मोन्स के लिए कद्दू के बीज
इसमें मौजूद ओमेगा 3 फैटी एसिड मेल ऑर्गन्स में रक्त संचार बढ़ाते हैं. रोज़ाना एक मुट्ठी कद्दू के बीज खाने से शरीर में टेस्टोस्टेरॉन नामक सेक्स हार्मोन का स्राव व स्पर्म काउंट बढ़ता है.

ऐक्टिव शुक्राणुओं के लिए ब्रोकोली
शरीर में विटामिन ए की कमी से प्रजनन क्षमता कम होती है, क्योंकि इसकी कमी से स्पर्म्स सुस्त हो जाते हैं. इससे बचने के लिए अपने खाने में विटामिन ए से भरपूर ब्रोकोली शामिल करें. इसका सेवन करने से शुक्राणु ऐक्टिव व हेल्दी बनेंगे.

स्पर्म काउंट के लिए अखरोट
Walnuts for sperm count

ओमेगा 3 फैटी एसिड स्पर्म काउंट व मेल ऑर्गन्स में ब्लड फ्लो बढ़ाने में मदद करता है. अखरोट ओमेगा 3 फैटी एसिड का बढ़िया स्रोत है. रोज़ाना एक मुट्ठीअखरोट खाने से स्पर्म की संख्या बढ़ेगी और उनका आकार भी बेहतर होगा.

टेस्टोस्टेरॉन के लिए जिनशेंग
सालों से इनफर्टिलिटी की समस्या को दूर करने के लिए इस चमत्कारी पौधे का प्रयोग किया जा रहा है. यह शरीर में टेस्टोस्टेरॉन के लेवल को बढ़ाता है और पुरुषों के जननांगों में ब्लड सर्कुलेशन को तेज़ करता है. अतः जिनशेंग युक्त चाय पीएं या रात में सोने से पहले आधा टीस्पून जिनशेंग पाउडर ग्रहण करें.

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ब्लड प्रेशर से जुड़े मिथक और उनकी सच्चाई (Myths And Facts About Blood Pressure)

हाइपरटेंशन (Hypertension) यानी हाई ब्लड प्रेशर (High Blood Pressure), बदलते लाइफस्टाइल के चलते होने वाली एक आम स्वास्थ्य समस्या है. हालांकि अधिकांश लोग इस बात से बेख़बर होते हैं कि वो ब्लड प्रेशर से संबंधित बीमारी की गिरफ़्त में हैं. चूंकि इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होते हैं, इसलिए इस रोग को साइलेंट किलर भी कहा जाता है. आंकड़ों के मुताबिक़, दुनिया में हर तीसरा व्यक्ति इस बीमारी से ग्रसित है. हालांकि कई लोग इस रोग से जुड़ी कुछ भ्रांतियों को सच मानकर टेंशन में आ जाते हैं, तो चलिए जानते हैं ब्लड प्रेशर से जुड़ी 10 भ्रांतियां और उनकी वास्तविकता.

Myths About Blood Pressure
भ्रम- अगर ब्लड प्रेशर कम हो जाए, तो नमक खाने से वह नॉर्मल हो जाता है.
सच– अगर आप यह सोचते हैं कि ब्लड प्रेशर कम होने पर नमक खाने से वह नॉर्मल हो जाता है, तो आपकी यह धारणा बिल्कुल ग़लत है. ब्लड प्रेशर कम है या ज़्यादा यह हम ख़ुद तय नहीं कर सकते. इसके बारे में हमें सही जानकारी स़िर्फ डॉक्टर ही दे सकता है. हालांकि जिन लोगों का ब्लड प्रेशर ज़्यादा रहता है, उन्हें कम नमक खाना चाहिए.

भ्रम- ब्लड प्रेशर कम हो जाने पर दवाइयों का सेवन बंद कर देना चाहिए.
सच- ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ एक ऐसी बीमारी है जो जीवनभर व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ती. इससे पूरी तरह से निजात पाना नामुमक़िन है, लेकिन इसे कंट्रोल किया जा सकता है. इसलिए अगर दवाइयों के सेवन से ब्लड प्रेशर कम हो गया हो, तब भी दवाइयां बंद नहीं करनी चाहिए. ऐसी स्थिति में डॉक्टर द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए.

भ्रम- वाइन दिल के लिए सेहतमंद होती है, इसलिए अत्यधिक मात्रा मंें इसका सेवन करने पर भी यह नुकसान नहीं पहुंचाती.
सच- वाइन फ़ायदा तभी पहुंचाती है, जब इसका सेवन सीमित मात्रा में किया जाए. ख़ासकर जिन लोगों को हाइपरटेंशन की समस्या है उन लोगों को अल्कोहल का सेवन करने से बचना चाहिए या फिर बहुत सीमित मात्रा में पीना चाहिए. ऐसे लोग अगर ज़्यादा शराब पीते हैं तो उन्हें हार्ट फेल, स्ट्रोक, अनियमित हार्टबीट जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

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भ्रम– हाई ब्लड प्रेशर ज़िंदगी भर ठीक नहीं हो सकता.
सच- हां, यह सच है कि ब्लड प्रेशर ज़िंदगी भर व्यक्ति के साथ रहता है, लेकिन हेल्दी लाइफस्टाइल की मदद से इस समस्या को काफ़ी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है. इसे कंट्रोल करने के लिए हेल्दी डायट लें, वेट कंट्रोल करें व खाने में कम नमक का इस्तेमाल करें. इसके अलावा शराब और सिगरेट से परहेज़ करें.

भ्रम- जब ब्लड प्रेशर हाई होता है तो सिरदर्द होता है.
सच- यह धारणा बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि सिरदर्द से ये पता नहीं चलता कि ब्लड प्रेशर बढ़ गया है, लेकिन यह सच है कि अगर आपको किसी तरह का दर्द महसूस होता है, तो इससे हार्ट रेट बढ़ जाती है.

भ्रम- हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों को केला नहीं खाना चाहिए.
सच- यह बिल्कुल भी सच नहीं है कि ब्लड प्रेशर के मरीज़ केला नहीं खा सकते. सच्चाई तो यह है कि अगर आपको हाई ब्लड प्रेशर है तो आपको केले का सेवन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि केला ब्लड प्रेशर के स्तर को कम करने में मदद करता है.

भ्रम- शरीर में किसी तरह की परेशानी या बीमारी महसूस नहीं होने का अर्थ यह है कि आपको ब्लड प्रेशर की समस्या नहीं है.
सच- अगर आप भी ऐसा सोचते हैं तो यह ग़लत है, क्योंकि हाई ब्लड प्रेशर होने पर शरीर में तुरंत किसी तरह की परेशानी महसूस नहीं होती है. यह रोग धीरे-धीरे शरीर के अंगों को नुक़सान पहुंचाना शुरू करता है और आगे चलकर यह हार्ट व किडनी फेल होने के अलावा हार्ट स्ट्रोक जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है.

भ्रम- एक्सरसाइज़ व डायट से बीपी कंट्रोल हो जाए तो इससे डरने की ज़रूरत नहीं है.
सच- वेट कंट्रोल, हेल्दी डायट और एक्सरसाइज़ की मदद से हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल किया जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह समस्या जड़ से ख़त्म हो गई है. यह समस्या कंट्रोल में रहे इसके लिए अनुशासित जीवनशैली का पालन करने के साथ समय-समय पर बीपी चेक करवाना आवश्यक है.

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भ्रम– हाई ब्लड प्रेशर के मरीज़ रक्तदान नहीं कर सकते.
सच- हाई ब्लड प्रेशर के मरीज़ भी रक्तदान कर सकते हैं, बशर्ते रक्तदान के समय आपका बीपी 180 सिस्टोलिक से कम और 100 डायस्टोलिक तक होना चाहिए. बीपी की गोलियों का रक्तदान से कोई संबंध नहीं है, लेकिन हां, सर्दी-ज़ुकाम, पेट की समस्या या एंटीबायोटिक्स लेते समय रक्तदान करने
से बचें.

भ्रम- गर्भावस्था में ब्लड प्रेशर होना आम है, इससे कोई गंभीर समस्या नहीं होती.
सच– गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर की संभावना उन महिलाओं में अधिक होती है, जिन्हें पहले से हाई बीपी की समस्या होती है. ज़्यादातर मामलों में गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर ज़्यादा होना परेशानी पैदा नहीं करता, जबकि कुछ मामलों में यह विकासशील भ्रूण और मां के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण भी बन सकता है.