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Personal Problems: क्या लो स्पर्म काउंट से मां बन पाऊंगी? (Can I Still Get Pregnant With Low Sperm Count?)

मैं 28 साल की शादीशुदा महिला हूं. मेरी शादी को 3 साल हो चुके हैं. मेरी समस्या ये है कि मेरे पति के वीर्य में शुक्राणु (Sperm) कम हैं. क्या मैं मां बन सकती हूं? कृपया, उचित सलाह दें.
– अर्चना भाटिया, दिल्ली.

वीर्य में शुक्राणु की कमी के दो कारण हो सकते हैं- टेस्टकुलर फेलियर यानि अंडग्रंथि द्वारा शुक्राणु का निर्माण करने में असमर्थता और दूसरा अंडग्रंथि शुक्राणु का निर्माण करते हैं, लेकिन मार्ग में कोई रुकावट होती है. अगर दूसरा कारण है तो रुकावट हटाने के लिए छोटी सी सर्जरी करनी पड़ सकती है. अगर इसके बावजूद फ़ायदा नहीं होता या शुक्राणु का निर्माण ही नहीं हो रहा है तो टेस्टीकुलर बायोप्सी करवाई जा सकती है. अगर इसमें कुछ अच्छे शुक्राणु मिल जाते हैं तो आप टेस्टट्यूब बेबी का रास्ता अपना सकती हैं, जिसमें महिला के अंडे को निकाल कर लेज़र टेकनीक द्वारा शुक्राणु को उसमें इंजेक्ट कर दिया जाता है और इसके बाद टेस्टट्यूब बेबी को गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है. अगर बायोप्सी में शुक्राणु नहीं मिलते तो दूसरे का किसी दानकर्ता से शुक्राणु लिया जा सकता है.

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Low Sperm Count

मैं 21 साल की हूं. मेरा मासिक धर्म हमेशा नियमित रहता है, किंतु मासिक धर्म आने के पूर्व मेरा पेट फूल जाता है और अचानक वज़न भी बढ़ जाता है. ऐसा क्यों होता है? कृपया इस बारे में जानकारी दें.
– प्रतिमा सिंह, बिहार.

आपकी समस्याओं के बारे में जानकर ऐसा लगता है कि आप पीएमएस (प्रीमेन्सट्रुअल सिंड्रोम) यानि माहवारी से पहले होनेवाली तकलीफ़ों से गुज़र रही हैं. इस दौरान आपको अपने आप में और भी कई तरह के बदलाव नज़र आ सकते हैं, जैसे- स्तनों के आकार में वृद्धि, स्वभाव में चिड़चिड़ापन आना, अधिक भूख लगना आदि. ये सब माहवारी के दौरान के सामान्य लक्षण हैं, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है. हां, अपने गायनाकोलॉजिस्ट से यह अवश्य जान लें कि आपके वज़न बढ़ने का कारण कहीं कोई और समस्या तो नहीं है.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

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Personal Problems: एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी के बाद कब कंसीव कर पाऊंगी? (How Long Should I Wait After Ectopic Pregnancy?)

हेलो डॉक्टर, १ महीने पहले मुझे एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी हुई थी. मुझे यह पूछना है कि अब मैं कब तक कंसीव कर पाऊंगी? 
– प्रिया सिंह, जयपुर 

एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी के बाद आमतौर पर दूसरी प्रेग्नेंसी के लिए ३-४ महीने का इंतज़ार करना चाहिए. कृपया, ध्यान रखें कि एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी के बादवाली प्रेग्नेंसी में दोबारा एक्टॉपिक होने का ख़तरा बना रहता है. इसलिए आप डॉक्टर से मिलकर उनकी गाइडेंस के साथ प्रेग्नेंसी प्लान करें. नियमित रूप से सोनोग्राफी करवाती रहें, ताकि एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी के बारे में शुरू में ही पता चल सके.

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Personal Problems

मैं २१ वर्षीया हूँ. पिछले कई महीनों से मेरे पीरियड्स ५-६ दिन पहले ही आ जाते हैं और बहुत तेज़ पेटदर्द भी होता है. कृपया बताएं मैं क्या करूं?
– सोनी पांडेय, इंदौर.

४-५ दिन पहले पीरियड्स आना नॉर्मल है. इससे आपको कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए. जहाँ तक दर्द की बात है तो एक सोनोग्राफी करवा लें. इससे दर्द का कारण पता चल जाएगा.  दर्द के कई कारण हो सकते हैं जैसे एंडोमीटीरिऑसिस, ओवरी में सिस्ट, पेल्विक इंफ्लामेटरी डिसीज़ हो सकती है. आप डॉक्टर से कन्सल्टेशन के बाद पेनकिलर्स ले सकती हैं.

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अब डिप्रेशन दूर भगाएगा किराये का बॉयफ्रेंड… रेंट ए बॉयफ्रेंड ऐप, एक अनोखी पहल! (RABF: This App Lets You Rent A Boyfriend To Cure Depression)

RABF App
अब डिप्रेशन दूर भगाएगा किराये का बॉयफ्रेंड… रेंट ए बॉयफ्रेंड ऐप, एक अनोखी पहल! (RABF: This App Lets You Rent A Boyfriend To Cure Depression)

आज की तारीख़ में हर दूसरा व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार हो जाता है. कहीं न कहीं हम भी अपने जीवन में कभी न कभी तो डिप्रेशन यानी अवसाद के दौर से गुज़रते हैं, उस व़क्त ज़िंदगी बेकार लगने लगती है और यही डिप्रेशन यदि बढ़ता जाता है, तो सुसाइड तक पहुंच सकता है.
डिप्रेशन को दूर करने का एक अनोखा तरीक़ा कौशल प्रकाश ने खोज निकाला है. उन्होंने मुंबई में एक ऐप लॉन्च किया है, जो अकेलेपन से जूझ रहे डिप्रेस्ड लोगों को पार्टनर यानी साथी प्रोवाइड करता है. रेंट ए बॉयफ्रेंड (RABF) यह ऐप मुंबई बेस्ड है. इसमें शारीरिक यानी फिज़िकल रिलेशन नहीं होता, इमोशनल स्तर पर आपको बेहतर महसूस करवाया जाता है.
कौशल प्रकाश को यह आइडिया अपने अनुभव के आधार पर ही आया. वो ख़ुद डिप्रेशन का शिकार थे और अब वो दूसरों की मदद करना चाहते हैं.

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RABF App
यही नहीं इस ऐप में टोल फ्री नंबर भी होगा, जहां लोग कॉल करके प्रोफेशनल्स की मदद ले सकेंगे और उनसे अपनी समस्या शेयर कर सकेंगे.

RABF की वेबसाइट पर इससे संबंधित सारी डिटेल्स हैं. आप सेलिब्रिटी, मॉडल से लेकर आम आदमी को चुन सकते हैं. सेलेब्स का रेट 3000 प्रति घंटे के हिसाब से होगा, मॉडल्स 2000, वहीं आम आदमी आपको 300-400 तक में मिल सकेंगे. यह वेबसाइट पूरी तरह से कमिशन बेसिस पर काम करती है, जहां 70% कमाई बॉफ्रेंड्स को दी जाती है.

– गीता शर्मा

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कहीं आप ग़लत समय पर तो विटामिन्स नहीं ले रहे? (Are You Taking Your Vitamins Correctly?)

वॉटर सोल्यूबल विटामिन्स

ये ऐसे विटामिन्स हैं, जो न शरीर में बनते हैं और न ही शरीर में जमा होते हैं, इसलिए इन्हें डायट और सप्लीमेंट के ज़रिए ही लिया जा सकता है.

कौन-से हैं विटामिन्स?

– विटामिन सी और ज़्यादातर विटामिन बी टाइप्स वॉटर सोल्यूबल हैं.

विटामिन बी: बी 1 (थियामिन), बी 2 (राइबोफ्लेविन), बी 3 (नियासिन), बी 5
(पैंटोथेनिक एसिड), विटामिन बी 6, बी 7 (बायोटिन), बी 9 (फॉलिक एसिड) और बी 12 इस गु्रप के विटामिन्स हैं. ये आपके मेटाबॉलिज़्म को बेहतर बनाते हैं, रक्तसंचार को संतुलित रखते हैं और शरीर में ऊर्जा का संचार बनाए रखते हैं.

विटामिन सी: इसे ‘एस्कॉर्बिक एसिड’ भी कहते हैं. विटामिन सी में एंटीऑक्सीडेंट प्रॉपर्टीज़ भी होती हैं. यह हड्डियों के
साथ-साथ कार्टिलेज, दांतों, मसल्स, ब्लड वेसल्स आदि को भी स्ट्रॉन्ग बनाए रखता है. साथ ही यह मसूड़ों और मांसपेशियों की सुरक्षा करता है और घावों को तेज़ी से भरने में मदद करता है.

Vitamins

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कब और कैसे लें?

– वॉटर सोल्यूबल विटामिन्स खाली पेट शरीर में ज़्यादा अच्छी तरह एब्ज़ॉर्ब होते हैं, इसलिए सुबह-सुबह लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा.

– कुछ भी खाने के आधे घंटे पहले इसे लें या फिर खाने के 2 घंटे बाद लें.

– विटामिन सी और बी 12 कभी एक साथ न लें, वरना बी 12 अच्छी तरह एब्ज़ॉर्ब नहीं हो पाएगा. अगर आप दोनों सप्लीमेंट्स ले रहे हैं, तो दोनों के बीच 2 घंटे का गैप रखें.

– विटामिन बी कॉम्पलेक्स के साथ विटामिन डी ले सकते हैं.

फैट सोल्यूबल विटामिन्स

इनकी बहुत कम मात्रा में शरीर को ज़रूरत होती है. ज़रूरत से ज़्यादा होने पर ये टॉक्सिक लेवल पर पहुंच जाते हैं, जो आपके लिए हानिकारक हो सकता है.

कौन-से हैं विटामिन्स?

– विटामिन ए, विटामिन डी, विटामिन ई और विटामिन के फैट सोल्यूबल विटामिन्स हैं. ये हमारे लिवर और फैटी टिश्यूज़ में जमा होते रहते हैं, इसलिए इनकी ज़रूरत उतनी नहीं होती, जितनी वॉटर सोल्यूबल फैट्स की. ज़रूरत से ज़्यादा इनका इस्तेमाल आपके लिए नुक़सानदेह हो सकता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर आप रोज़ाना पोषण से भरपूर संतुलित भोजन ले रहे हैं, तो आपको सप्लीमेंट्स लेने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन आज हमारी लाइफस्टाइल जिस तरह बदल गई है, ऐसे में ख़ासतौर से शहरी महिलाओं में विटामिन डी की कमी पाई जा रही है, जिसकी पूर्ति उन्हें सप्लीमेंट्स लेकर करनी पड़ रही है.

विटामिन ए: यह बोन ग्रोथ, रिप्रोडक्शन और इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाए रखने में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह बैक्टीरिया और जर्म्स से लड़ने की ताक़त देता है और साथ ही  हेल्दी व़िज़न, स्किन, बोन्स और बॉडी टिश्यूज़ को मेंटेन  रखता है.

कब और कैसे लें?

– विटामिन ए कभी भी सुबह-सुबह खाली पेट न लें. इससे आपको अपच या हार्टबर्न की समस्या हो सकती है.

– क्योंकि यह फैट सोल्यूबल विटामिन है, इसलिए इसे हमेशा फैटवाले खाने के
साथ लें.

– इसे आप दूध, दही, लिवर, ऑलिव ऑयल, साल्मन फिश, एवोकैडो आदि के साथ ले सकते हैं.

– विटामिन ए को एब्ज़ॉर्ब करने के लिए अपने डायट में पर्याप्त ज़िंक शामिल करें. इसके लिए आप काजू, बादाम, चिकन, काबुली चना, किडनी बीन्स आदि लें.

– वेट लॉस के लिए अगर कोई सप्लीमेंट ले रहे हैं, तो अवॉइड करें, वरना लो फैट के कारण विटामिन ए का पूरा फ़ायदा आपको नहीं मिलेगा.

विटामिन ई: ग्लोइंग स्किन और शाइनी हेयर के लिए विटामिन ई बेहद ज़रूरी है. यह एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर है. साथ ही फ्री रैडिकल्स से हमारी सुरक्षा भी करता है.

कब और कैसे लें?

– विटामिन ए की तरह इसे भी खाने के साथ लें.

– आप चाहें, तो लंच या डिनर के साथ इसे ले सकते हैं.

– इसे खाली पेट कभी न लें.

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Vitamins

विटामिन डी: यह ‘सनशाइन विटामिन’ भी कहलाता है, क्योंकि यह हमें सूरज की रोशनी से मिलता है. यह हार्ट डिसीज़ जैसी गंभीर बीमारियों से हमें बचाता है. साथ ही हमारे डिप्रेशन को कम करके वेट लॉस में भी मदद करता है.

कब लें?

– एक्सपर्ट्स की मानें, तो विटामिन डी ऐसा सप्लीमेंट है, जिसे आप खाली पेट, खाने के साथ, सुबह, दोपहर या रात- कभी भी ले सकते हैं.

– हालांकि रात के व़क्त विटामिन डी लेने से कुछ लोग नींद की समस्या की शिकायत करते हैं, अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो आप उसे सुबह के व़क्त लें.

– फैट सोल्यूबल होने के नाते इसे खाने के साथ लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद माना जाता है.

– इसे विटामिन के 2 के साथ लेने से हड्डियां मज़बूत बनती हैं.

विटामिन के: हेल्दी हार्ट, हेल्दी बोन्स, बोन डेन्सिटी में, मेंस्ट्रुअल साइकल में ब्लीडिंग को कम करने में और कैंसर से बचाव में यह काफ़ी मदद करता है. यह ब्लड क्लॉटिंग में फ़ायदेमंद है. हालांकि अक्सर इसे अनदेखा किया जाता है, इसलिए इसे ‘फॉरगॉटेन विटामिन’ भी कहा जाता है.

कब लें?

– फैटयुक्त भोजन के साथ लें.

– इसे विटामिन डी, कैल्शियम, विटामिन सी के साथ लेना ़ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है.

– प्रेग्नेंट या ब्रेस्टफीडिंग करानेवाली महिलाएं बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के इसे न लें.

प्रीनैटल विटामिन्स

महिलाओं के लिए प्रीनैटल विटामिन्स काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होते हैं, इसलिए इनके सेवन, इफेक्ट्स और साइड इफेक्ट्स के बारे में सभी को पता होना चाहिए. कहने को इन्हें विटामिन्स कहते हैं, पर इनमें मिनरल्स भी शामिल हैं.

डॉक्टर्स के मुताबिक़, जो महिलाएं कंसीव करना चाहती हैं, उन्हें प्रेग्नेंसी के एक साल पहले से ही फॉलिक एसिड लेते रहना चाहिए. प्रेग्नेंसी के दौरान भी रोज़ाना उन्हें प्रीनैटल विटामिन्स लेते रहना चाहिए. कभी भी प्रीनैटल विटामिन्स की डबल डोज़ न लें. वैसे तो प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टर्स ख़ुद ही बताते हैं कि कौन-सा विटामिन कब लें, फिर भी प्रेग्नेंसी के दौरान विटामिन्स लेने से पहले डॉक्टर को इन बातों के बारे में बताएं-

– मॉर्निंग सिकनेस है या नहीं.

– उल्टी स़िर्फ सुबह हो रही है या पूरे दिन.

– दिनभर चक्कर आता है या स़िर्फ किसी एक समय पर आदि.

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Correct Vitamins
कौन-से हैं विटामिन्स?

फॉलिक एसिड (विटामिन बी 9), आयरन और कैल्शियम.

फॉलिक एसिड: इसे ‘विटामिन बी 9’ या ‘फोलेट’ भी कहते हैं. जहां यह महिलाओं को बर्थ डिफेक्ट से बचाता है, वहीं गर्भावस्था के दौरान गर्भ के ब्रेन डेवलपमेंट, सेल्स डेवलपमेंट और टिश्यू ग्रोथ में भी मदद करता है. यह रेड सेल्स को बढ़ाने में मदद करता है और साथ ही अल्ज़ाइमर, कैंसर, डायबिटीज़, हार्ट प्रॉब्लम्स जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव में मदद करता है.

कब और कैसे लें?

– सारे प्रीनैटल विटामिन्स खाली पेट लेने चाहिए यानी खाना खाने के 1 घंटा पहले या फिर खाना खाने के 2 घंटे बाद.

– कोशिश करें कि फॉलिक एसिड रोज़ाना निर्धारित एक ही समय पर लें. इसके लिए चाहें तो रिमाइंडर लगा लें.

– कोशिश करें कि फॉलिक एसिड लेने के 2 घंटे पहले और 2 घंटे बाद तक कोई एंटासिड्स या एंटीबायोटिक्स न लें.

आयरन: यह रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करता है, जिससे आप एनीमिया की समस्या से बच जाते हैं. यह आपके इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाता है, जिससे आप जल्दी बीमार नहीं पड़ते. आयरन कई गंभीर बीमारियों से भी आपकी रक्षा करता है. ख़ासतौर से महिलाओं के लिए आयरन बहुत ज़रूरी है, क्योंकि पीरियड्स और प्रेग्नेंसी के दौरान उन्हें ज़्यादा ब्लड की ज़रूरत होती है, इसलिए उनकी डायट आयरन से भरपूर होनी चाहिए.

कब और कैसे लें?

– आयरन सुबह ब्रेकफास्ट के साथ लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है, पर किसी और की बजाय इसे विटामिन सी के साथ लेने से यह पूरी तरह एब्ज़ॉर्ब हो जाता है, इसलिए इसे आप ऑरेंज जूस के साथ लें.

– आयरन-कैल्शियम कभी भी एक साथ न लें, वरना कैल्शियम आयरन को एब्ज़ॉर्ब नहीं होने देगा.

– इसे लेने के दो घंटे पहले और दो घंटे बाद तक कोई डेयरी प्रोडक्ट न लें.

कैल्शियम: हर कोई जानता है कि हड्डियों की मज़बूती के लिए कैल्शियम कितना ज़रूरी है, पर यह स़िर्फ यही काम नहीं करता. कैल्शियम आपके हार्ट, मसल्स और नर्व्स की सही फंक्शनिंग में भी मदद करता है. कुछ स्टडीज़ के मुताबिक कैल्शियम और विटामिन डी साथ में लेने से  कैंसर, डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर की संभावना कम हो जाती है. महिलाओं को पीएमएस की तकलीफ़ों में राहत दिलाने के साथ-साथ ये उन्हें स्लिम-ट्रिम बनाए रखता है.

कब और कैसे लें?

– कैल्शियम मार्केट में दो तरह से मिलता है- कैल्शियम सिट्रेट और कैल्शियम कार्बोनेट. कैल्शियम कार्बोनेट सबसे सस्ता होता है, जिसे खाने के साथ लेना चाहिए.

– कैल्शियम सिट्रेट महंगा आता है, जिसे खाली पेट या खाने के साथ भी ले सकते हैं.

– आमतौर पर कैल्शियम से कब्ज़ की शिकायत नहीं होती, लेकिन अगर आपको हो रही है, तो कैल्शियम सिट्रेट आपके लिए बेहतर विकल्प होगा.

– एक दिन में 500 एमजी कैल्शियम किसी के लिए भी उपयुक्त है, पर अगर डॉक्टर ने 1000 एमजी प्रिस्क्राइब किया है, तो उसे दो बार में सुबह-शाम लें.

– अगर आयरन-कैल्शियम दोनों एक साथ ले रहे हैं, तो आयरन ब्रेकफास्ट में और कैल्शियम लंच या डिनर के साथ लें.

– कैफीन लेने के 3 घंटे बाद ही कैल्शियम लें.

– अनीता सिंह

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Personal Problems: क्या पीरियड्स में सेक्स करने से प्रेग्नेंसी हो सकती है? (Can You Pregnant During Your Periods?)

मेरी एक सहेली ने पीरियड्स के पहले दिन सेक्स किया था, जिसके बाद दूसरे दिन से उसे ब्लीडिंग हुई ही नहीं. पीरियड्स न होने की वजह से वो काफ़ी परेशान है. कहीं वो प्रेग्नेंट तो नहीं?
–  मोहिनी राणा, इलाहाबाद.

अगर पीरियड्स के दौरान ब्लीडिंग फ्लो सही था, तो प्रेगनेंसी के बहुत काम चान्सेस हैं. आपके इस तरह के ब्लड फ्लो का कारण हार्मोन्स का असंतुलन हो सकता है. फिर भी निश्चिन्त होने के लिए यूरिन प्रेग्नेंसी टेस्ट करा लें. या फिर आप अगले पीरियड्स तक इंतज़ार करें, अगर तब भी ब्लीडिंग इस बार की तरह हो तो समझ जाएं की यह नॉर्मल है. प्रेगनेंसी स्टेटस की सही जानकारी के लिए आप बीटा एचसीजी ब्लड टेस्ट भी करा सकती हैं.

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Pregnant in Periods

 

मेरी एक समस्या है कि सेक्स के बाद अक्सर मेरा जी मिचलाने लगता है. सेक्स के बाद उल्टी जैसा फील होना क्या नॉर्मल है?
– सानिका मोरे, पुणे.

ये बेहद ही सामान्य बात है. हार्मोनल बदलाव की वजह से सेक्स से पहले और बाद में इस तरह की समस्या होती है. सेक्सुअल ऐक्टिविटी शुरू करने से पहले पानी पीना अवॉइड करें. सेक्सु्अल ऐक्टिविटी के बाद अपने गुप्तागों को क्लीन करें. रूम का तापमान कम रखें, इन चीज़ों को करने से आपको काफ़ी मदद मिलेगी. आप चिंता न करें, क्योंकि ये चिंता वाली बात ही नहीं है.

 

यह भी पढ़ें:  पीरियड्स देरी से आने के क्या कारण हो सकते हैं? (What Could Be The Reasons For Delayed Periods?)

Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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Personal Problems: कंसीव न कर पाने के क्या कारण हो सकते हैं? (What Could Be Possible Reasons For Non Conception?)

मैं 26 वर्षीया महिला हूं. ढाई साल पहले मेरी शादी हुई थी, पर अभी तक मैं कंसीव नहीं कर पाई हूं. मुझे इसके लिए क्या करना होगा?
– शीतल पटेल, सूरत.

अगर गर्भधारण के लिए ट्राई करते हुए आपको 12 महीने से ज़्यादा का समय हो गया है, तो आपको इसके लिए किसी एक्सपर्ट डॉक्टर, जैसे- गायनाकोलॉजिस्ट या फर्टिलिटी एक्सपर्ट को मिलना होगा. वो कुछ टेस्ट्स करके चेक करेंगे कि आपके केस में सबकुछ ठीक है या नहीं. कंसेप्शन के लिए कुछ बातें ज़रूरी हैं, जैसे- हर महीने महिला के ओवरीज़ से एग का रिलीज़ होना, एग फैलोपियन ट्यूब्स से होकर यूटरस में पहुंचे और इस दौरान एग पुरुष के स्पर्म से फर्टिलाइज़ हो और फिर फर्टिलाइज़्ड एग यूटरस में प्लांट हो. इस पूरी प्रक्रिया में आपके एग्स और ओव्यूलेशन काफ़ी मायने रखता है, इसलिए डॉक्टर टेस्ट के ज़रिए आपके ओवेरियन रिज़र्व को चेक करेंगी. आप चाहें, तो किसी फर्टिलिटी एक्सपर्ट से भी मिल सकती हैं.

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urine infection
मैं 32 वर्षीया महिला हूं. कैसे कहूं, समझ में नहीं आ रहा, पर मुझे बार-बार यूरिन इंफेक्शन की समस्या हो जाती है. मैं क्या करूं, कृपया बताएं.
– उमा पांडे, कानपुर.

जर्म्स और बैक्टीरिया के कारण क्रॉनिक यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन होता है, पर ई-कोली बैक्टीरिया इसका मुख्य कारण हो सकता है. बार-बार यूरिन पास करने की इच्छा होना, यूरिन में ब्लड आना, ब्लैडर एरिया में दर्द और लोअर बैक में दर्द होना इसके लक्षण हैं. अगर यूरिन इंफेक्शन आपकी किडनी तक पहुंच जाए, तो बुख़ार, उल्टी आना, चक्कर आना और थकान जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. कुछ बैक्टीरिया यूरिन के ज़रिए बड़ी तेज़ी से बढ़ते हैं. सेक्सुअल एक्टिविटी के कारण भी महिलाएं इसकी शिकार हो सकती हैं. कम पानी पीना और अनहाइजीनिक पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल भी आपको यह इंफेक्शन दे सकता है, इसलिए सावधान रहें. ख़ूब पानी पीएं, ताकि जर्म्स शरीर से फ्लश आउट हो जाएं. किसी गायनाकोलॉजिस्ट से मिलें.

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मॉनसून में फिटनेस के लिए इंडोर एक्टिविटीज़ (Fitness Special: Indoor Activities For Monsoon)

Fitness Special
मॉनसून में फिटनेस के लिए इंडोर एक्टिविटीज़ (Fitness Special: Indoor Activities For Monsoon)

ख़ुद को फिट रखना आपका पैशन है, लेकिन बारिश की वजह से आप जिम नहीं जा पा रहे हैं. कोई बात नहीं, इंडोर एक्टिविटीज़ करके भी आप फिट रह सकते हैं. ट्रेडमिल, स्किपिंग, सूर्य नमस्कार, ऐरोबिक्स आदि बहुत सारी इंडोर एक्टिविटीज़ हैं, जिनके लिए किसी इक्विपमेंट की ज़रूरत नहीं होती और न ही जिम जाने की.

सूर्य नमस्कार
यह अपने आप में कंप्लीट एक्सरसाइज़ है. सूर्य नमस्कार करने के बाद अन्य वर्कआउट करने की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि इसमें इतने सारे स्टेप्स होते हैं, जिनसे पूरी बॉडी स्ट्रेच होती है और बॉडी भी शेप में रहती है. यदि आप भी मॉनसून में फिट एंड फाइन रहना चाहते हैं, तो प्रतिदिन कम से कम 20 बार सूर्य नमस्कार करें. धीरे-धीरे अपने स्टैमिना के अनुसार सूर्य नमस्कार का समय बढ़ाएं.

ब्रिस्क वॉक
मॉनसून में अगर वर्कआउट करने का मूड नहीं है, तो कोई बात नहीं. कान में ईयर फोन लगाकर म्यूज़िक सुनते हुए आप घर के अंदर ही 15-20 मिनट की ब्रिस्क वॉक कर सकते हैं.

स्किपिंग
मॉनसून में स्किपिंग करके भी आप फिट रह सकते हैं. फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि रोज़ाना 20 मिनट स्किपिंग करने से 700 कैलोरीज़ बर्न होती है. हड्डियां व जोड़ मज़बूत होते हैं और मांसपेशियां लचीली बनती हैं.

पुशअप्स एंड प्लैंक्स
पुशअप और प्लैंक्स करने के लिए किसी इक्विपमेंट की ज़रूरत नहीं होती. इसे करने से पीठ, पेट और पैर मज़बूत होते हैं, साथ ही फिज़िकल स्टैमिना बढ़ता है. मॉनसून में अगर फिट रहना चाहते हैं, तो प्रतिदिन कम से कम 20 पुशअप एंड प्लैंक्स करें. धीरे-धीरे अपने स्टैमिना के अनुसार बढ़ाते जाएं.

ट्रेडमिल
मॉनसून वर्कआउट के बारे में सोचते ही सबसे पहला नाम ट्रेडमिल का आता है. ट्रेडमिल पर रोज़ाना 15 मिनट से 45 मिनट तक चल सकते हैं. इसके अलावा ट्रेडमिल पर आप ब्रिस्क वॉक और जॉगिंग भी कर सकते हैं.

इंडोर साइकिलिंग
पार्क जैसी खुली हवादार जगह पर साइकिलिंग करने का मज़ा ही अलग है, लेकिन बारिश में साइकिलिंग करना थोड़ा ख़तरनाक हो सकता है, पर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. टे्रडमिल की तरह इंडोर साइकिलिंग करके भी आप मॉनसून में एक्टिव रह सकते हैं.

होम कार्डियो वर्कआउट
जिम जाने का मूड नहीं, तो होम कार्डियो वर्कआउट करें. इस वर्कआउट की शुरुआत क्विक वॉर्मअप सेशन से करें, फिर जंपिंग जैक, डंबल्स, बाईसेप्स कर्ल, ट्राईसेप्स कर्ल, स्कवैट्स और माउंटेन क्लाइंबर भी ट्राई कर सकते हैं. इन एक्सरसाइज़ को प्रतिदिन 30 मिनट करने से बांहें और पैर मज़बूत होते हैं.

डांस
इंडोर मॉनसून वर्कआउट को एंजॉय करने का बेस्ट तरीक़ा है डांस. वर्कआउट के लिए ऐसे सॉन्ग का सिलेक्शन करें, जो हाई एनर्जीवाले हों. इन हाई एनर्जीवाले सॉन्ग पर आप सोलो डांस भी कर सकते हैं और पार्टनर के साथ भी. डांस करने से एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न होती है और मांसपेशियां भी स्ट्रेच होती हैं.

ऐरोबिक्स
ऐरोबिक्स करने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि आप जिम गए बिना अपना वज़न कम कर सकते हैं और अपने को फिट रख सकते हैं. इस इंडोर एक्टिविटी को करने से मसल्स टोन्ड होती हैं और आप ख़ुद को भी एक्टिव महसूस करते हैं.

योगा
बारिश के कारण अगर जिम नहीं जा पा रहे हैं, तो आप योगा करके ख़ुद को फिट रख सकते हैं. क्या आप जानते हैं कि रोज़ाना 45 मिनट योगा करने से 700 कैलोरीज़ बर्न होती हैं. इसे करने से बॉडी में फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ती है, इम्यूनिटी स्ट्रॉन्ग होती है और श्‍वसन तंत्र में होनेवाली समस्याएं दूर होती हैं, जो मॉनसून में होना आम बात है.

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Indoor Fitness

हाउसहोल्ड एक्टिविटीज़
मॉनसून में हाउसहोल्ड एक्टिविटीज़ करके आप एक्टिव रह सकते हैं. शेल्फ्स और अलमारियां साफ़ करें, मशीन की जगह हाथों से कपड़े धोएं, पोछा लगाएं आदि. इन एक्टिविटीज़ से आप फिट भी रहेंगे और धीरे-धीरे आपका घर भी क्लीन हो जाएगा.

सीढ़ियां चढ़ना-उतरना
बारिश के मौसम में वॉकिंग या जॉगिंग करना संभव नहीं है, तो रोज़ाना 20 मिनट तक सीढ़ियां चढ़ें और उतरें. इस मौसम में एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करने के लिए यह बेस्ट वर्कआउट है. फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर आप रोज़ाना 15 मिनट भी सीढ़ियां चढ़ते-उतरते हैं, तो आपका 80% तक वर्कआउट होता है. यह ट्रेडमिल पर चलने जैसा ही वर्कआउट है. अगर आपके पास ट्रेडमिल नहीं है, तो ख़रीदने की बजाय सीढ़ियां चढ़ें-उतरें. सीढ़ियां चढ़ने व उतरने से न केवल मांसपेशियां लचीली होती हैं, बल्कि मेटाबॉलिक रेट भी बढ़ता है.

स्पोर्ट्स
अगर आपके घर के आसपास कोई क्लब हाउस या जिम है, तो वहां जाकर इंडोर गेम्स भी खेल सकते हैं, जैसे- बैडमिंटन, टेबल टेनिस, स्न्वैश आदि. स्पोर्ट्स बॉडी में एकत्रित फैट्स को कम करने और ख़ुद को एनर्जेटिक रखने का बेस्ट ऑप्शन है.

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Home Fitness

बच्चों के लिए बेस्ट इंडोर एक्टिविटीज़
आर्ट एंड क्राफ्ट: इसमें बच्चों को कलरफुल क्राफ्ट पेपर की मदद से फ्लावर मेकिंग, ग्रीटिंग कॉर्ड आदि बनाना सिखा सकते हैं.
कार्ड और बोर्ड गेम्स: इन गेम्स में बच्चों को फ्रूट्स, वेजीटेबल्स, अल्फाबेट्स, एनीमल कार्ड को अलग-अलग शेप्स और डिज़ाइन में अरेंज करना सिखा सकते हैं.

फन गेम्स: चेस, कैरम, पज़ल्स, लूडो, मैकेनिकल गेम्स आदि.

मूवी टाइम: बच्चों को एनिमेटेड 3डी/4डी मूवी दिखा सकते हैं. उनके मूवी टाइम को फन टाइम बनाने के लिए स्नैक्स का अरेंजमेंट ज़रूर करें.

इंडोर गार्डनिंग: इसमें बच्चे बैंगन, टमाटर, लहसुन, प्याज़ और हरे धनिया को छोटे गमलों में उगा सकते हैं. ये पौधे मॉनसून के लिए परफेक्ट प्लान्ट्स हैं, क्योंकि इन्हें अधिक सनलाइट की आवश्यकता नहीं होती.

स्टोरी टाइम: बच्चों के लिए ऐसा स्टोरी टाइम प्लान करें, जिसे वे एंजॉय कर सकें. बड़े बच्चों को स्टोरी बुक पढ़ने के लिए कहें और छोटे बच्चों को पिक्चर बुक्स और बोर्ड बुक्स दिखाकर स्टोरी सुनाएं.

पार्टी टाइम: बिना किसी कारण के बच्चों और उनके दोस्तों के लिए इनहाउस पार्टी प्लान करें, जैसे- गुड़िया का बर्थडे, उसकी शादी, पप्पी का बर्थडे. डांस और यम्मी स्नैक्स के साथ उनकी पार्टी को सफल बनाएं.

असिस्टेंट बनाएं: बच्चों को कुकिंग, क्लीनिंग, डस्टिंग में मदद करने के लिए प्रेरित करें. रिवॉर्ड के तौर पर उन्हें मूवी दिखाएं, फेवरेट गेम और फेवरेट ट्रीट दें.

कुकिंग एंड बेकिंग: इसमें बच्चों को सलाद, सैंडविच, कपकेक बनाना सिखा सकते हैं.

– पूनम कोठारी

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Personal Problems: क्या किडनी ट्रांसप्लांट के बाद प्रेग्नेंसी प्लान कर सकती हूं? (Can I Plan Pregnancy After Kidney Transplant?) )

मैं 28 वर्षीया महिला हूं. 4 साल पहले मेरा सफलतापूर्वक किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था. डॉक्टर ने कहा है कि अब मैं प्रेग्नेंट हो सकती हूं. पर क्या यह मेरे लिए ठीक होगा? मैं 30 साल की होने से पहले मां बनना चाहती हूं, क्या करूं?
– बानी झा, रायपुर.

हां, यह बिल्कुल सच है कि किडनी ट्रांसप्लांट के बाद भी आप प्रेग्नेंसी प्लान कर सकती हैं. पर बच्चे प्लान करने से पहले आप डॉक्टर से मिलकर यूनोसप्रेसेंट थेरेपी के बारे में डिस्कस करें. दरअसल, प्रेग्नेंसी में शुरुआती दो महीने भ्रूण के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. इस दौरान उसके शरीर के ऑर्गन्स बनते हैं. ऐसे में कुछ दवाइयां उसे नुक़सान पहुंचा सकती हैं, इसलिए डॉक्टर से इस बारे में पहले ही बात कर लें.

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Pregnancy

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हाल ही में डॉक्टर ने मेरा पैप स्मियर टेस्ट करने के बाद कॉलपोस्कोपी की सलाह दी है. उनके मुताबिक़ मुझे सर्वाइकल कैंसर तो नहीं है, पर पूरी तरह से तसल्ली करने के लिए यह टेस्ट और सर्वाइकल बायोप्सी भी ज़रूरी है. क्या यह टेस्ट पेनफुल होता है और क्या इसमें एनीस्थिसिया की ज़रूरत पड़ती है? कृपया, मेरा मार्गदर्शन करें.

– आकृति नायर, कोयंबटूर.

कॉलपोस्कोपी एक्ज़ामिनेशन में सामान्य दर्द होता है, इसलिए इसमें एनीस्थिसिया की ज़रूरत नहीं पड़ती. इस टेस्ट में डॉक्टर बारीक़ी से वेजाइना और सर्विक्स की जांच करते हैं, ताकि किसी भी तरह की एब्नॉर्मिलिटी छूट न जाए. आपके पैप स्मियर टेस्ट में डॉक्टर को किसी तरह की असामान्यता नज़र आई होगी, इसलिए इसकी मदद से बायोप्सी करना चाहते हैं. महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर से बचाने के लिए यह टेस्ट किया जाता है. यह एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसमें क़रीब 15-20 मिनट लगता है. आजकल इस मशीन में डिजिटल कैमरा भी लगा होता है, जिससे टेस्ट के बाद किसी तरह की असामान्यता पाए जाने पर डॉक्टर कंप्यूटर की मदद से आपको वो दिखा भी सकते हैं.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

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मॉनसून में कैसे रखें सेहत का ख़्याल? (Monsoon Health Care)

 

Monsoon Health Care
मॉनसून में कैसे रखें सेहत का ख़्याल? (Monsoon Health Care)

गर्मी की तपिश से राहत दिलानेवाली बारिश की फुहारें अपने साथ कई हेल्थ प्रॉब्लम्स भी लेकर आती हैं. सर्दी-ज़ुकाम जैसी आम समस्याओं के अलावा टायफॉइड, हैजा, मलेरिया जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारियां भी इसी मौसम की देन हैं, लेकिन सही खानपान और कुछ हेल्दी आदतें अपनाकर आप बरसात में होनेवाली बीमारियों से बच सकते हैं.

मॉनसून हेल्थ प्रॉब्लम्स

बारिश का मौसम अपने साथ कई आम व गंभीर बीमारियां भी लेकर आता है, इसलिए ज़रूरी है कि हम पहले से ही उसके लिए सावधान रहें. एटलांटा हॉस्पिटल के जनरल फिजिशियन डॉ. फतेह सिंह ने बरसाती बीमारियों से बचाव के बारे में हमें जानकारी दी.

डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया 

जहां डेंगू में तेज़ बुख़ार, बहुत ज़्यादा सिरदर्द और जोड़ों में दर्द होता है, वहीं बुख़ार, ठंड लगना, मांसपेशियों में दर्द और कमज़ोरी आना मलेरिया के लक्षण हैं. चिकनगुनिया के भी लक्षण लगभग यही हैं.

बचाव

–    इससे बचाव का सबसे आसान तरीक़ा यही है कि घर के आसपास कहीं भी पानी का जमाव न होने दें, ताकि मच्छरों को पनपने के लिए जगह न मिले.

–    घर में कबाड़ जमा करके न रखें. जितना हो सके, घर साफ़ रखें.

–    बारिश से पहले घर में पेस्ट कंट्रोल ज़रूर करवाएं.

हैजा

बारिश के मौसम में फैलनेवाली यह एक गंभीर व जानलेवा बीमारी है, जो दूषित भोजन या पानी के कारण होती है. गंदगी और हाइजीन की कमी इस बीमारी को बढ़ावा देती है. उल्टी और पतली दस्त इस बीमारी के शुरुआती लक्षण हैं.

बचाव

–    सबसे ज़रूरी है कि आप हैजे का टीका लगवाएं, इससे 6 महीनों तक आप सुरक्षित रहेंगे.

–   हाथ धोने के लिए लिक्विड हैंड सोप का ही इस्तेमाल करें.

–   साफ़ और शुद्ध पानी के लिए प्यूरिफायर का इस्तेमाल करें अथवा पानी उबालकर पीना सबसे बेहतरीन उपाय है.

–    दूध व दूध से बनी चीज़ें, जैसे- आइस्क्रीम, मलाई वगैरह ज़्यादा न खाएं.

–    स्ट्रीट फूड से दूर रहें.

टायफॉइड

बारिश के दौरान होनेवाली यह एक आम बीमारी है. यह भी दूषित पानी व खाने के कारण ही होती है. इसमें सबसे ख़तरनाक बात यह है कि ठीक होने के बावजूद इसका इंफेक्शन मरीज़ के गॉल ब्लैडर में रह जाता है. बुख़ार, पेटदर्द और सिरदर्द इसके लक्षण हैं.

Monsoon Health Tips

बचाव

यह एक संक्रामक बीमारी है, जो बहुत तेज़ी से फैलती है, इसलिए मरीज़ को अलग कमरे में दूसरों से थोड़ा दूर रखें.

–    उबला व साफ़ पानी ही पीएं.

–    डिहाइड्रेशन से बचने के लिए मरीज़ को लगातार लिक्विड डायट लेते रहना चाहिए.

–    खाना खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह ज़रूर धोएं.

–    होमियोपैथिक ट्रीटमेंट ज़्यादा मददगार होती है.

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डायरिया/ पेट के इंफेक्शन्स

इस मौसम में पेट की बीमारियां, जैसे- डायरिया और गैस्ट्रो सबसे ज़्यादा लोगों को परेशान करती हैं, जो वायरल या बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण हो सकती हैं. पेट के ज़्यादातर इंफेक्शन्स में उल्टी और दस्त होते हैं, जिसके लिए तुरंत डॉक्टर से मिलना बहुत ज़रूरी है.

बचाव

–    खानपान के साथ-साथ पर्सनल हाइजीन का  भी ख़ास ख़्याल रखें. टॉयलेट के बाद और डायपर बदलने पर हैंडवॉश से हाथ ज़रूर धोएं.

–    बर्तनों और कटिंग बोर्ड को अच्छी तरह साफ़ रखें.

–    ऐसे फल और सब्ज़ियां खाएं, जिनके छिलके निकाल सकते हैं.

–   अगर ट्रैवेल करनेवाले हैं, तो हेपेटाइटिस ए का टीका ज़रूर लगवाएं.

पीलिया

मॉनसून के दौरान लिवर में वायरल इंफेक्शन काफ़ी आम बात है. हेपेटाइटिस के वायरस पानी के ज़रिए तेज़ी से फैलते हैं. यह इंफेक्शन गंभीर हो सकता है, क्योंकि हेपेटाइटिस का कारण पीलिया होता है, जिससे आंखें और यूरिन आदि पीले पड़ जाते हैं.

बचाव

–    हेपेटाइटिस ए और बी का वैक्सीन लें.

–    दूषित खाने और पानी से बचें.

–    हाइजीन का ख़ास ख़्याल रखें.

हेल्थ अलर्ट्स

–    अगर तीन दिन से बुख़ार आ रहा है, तो ख़ुद से दवा खाने की बजाय डॉक्टर को दिखाएं, क्योंकि यह कोई गंभीर बुख़ार भी हो सकता है.

–   शरीर पर किसी भी तरह के रैशेज़ या फोड़े-फुंसी नज़र आएं, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं, यह कोई इंफेक्शन भी हो सकता है.

–    अगर आपको अस्थमा या कोई और ब्रीदिंग प्रॉब्लम है, तो ध्यान रखें कि सीलनवाली दीवार से चिपककर न बैठें. घर की दीवारें गीली न रखें, वरना फंगस के कारण आपको तकलीफ़ हो सकती है.

–    अस्थमा और डायबिटीज़ के मरीज़ ज़्यादा तीखा और मसालेदार खाना न खाएं, वरना उन्हें हेल्थ प्रॉब्लम्स हो सकती हैं.

–   डायबिटीज़ के मरीज़ नंगे पांव गीली ज़मीन पर न चलें, वरना जर्म्स और बैक्टीरिया से आपको इंफेक्शन हो सकता है.

मॉनसून डायट

मॉनसून में हमारी पाचन क्रिया धीमी हो जाती है, इम्यून सिस्टम कमज़ोर हो जाती है और शारीरिक क्षमता पर भी इसका असर पड़ता है. इस मौसम में खाना ठीक तरी़के से पचता नहीं, जिससे एसिडिटी और गैस जैसी समस्याएं होने लगती हैं. ऐसे में आपको खानपान का ख़ास ध्यान रखना चाहिए.

–    बारिश में उबालकर छाना हुआ पानी ही पीएं, वरना दूषित पानी के कारण बीमार पड़ सकते हैं.

–    मॉनसून में हरी पत्तेदार सब्ज़ियां खाने से बचें, क्योंकि बारिश में उनमें कीड़े लगने लगते हैं, जो आपके खाने के साथ पेट में जा सकते हैं.

–    मसालेदार और तले हुए खाने से अपच, उबकाई आना, वॉटर रिटेंशन आदि की समस्या हो सकती है.

–    रोज़ाना गर्म दाल या सूप ज़रूर पीएं. उसमें हल्दी, लौंग, कालीमिर्च और सौंफ ज़रूर डालें. यह इंफेक्शन से लड़ने में आपकी मदद करेगा.

–    खाने के बाद सौंफ का पानी पीने से गैस और एसिडिटी की समस्या नहीं होती. घर के सभी सदस्यों को खाने के बाद ये पानी दें.

–    उबला व अच्छी तरह पका हुआ खाना मॉनसून में आपकी सेहत की देखभाल करेगा.

–   एंटीबैक्टीरियल और एंटीऑक्सीडेंट के गुणों से भरपूर हर्बल टी और ग्रीन टी इस मौसम में काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होती हैं. इसे डेली डायट का हिस्सा बनाएं.

–    गाय का दूध पीएं. यह हल्का व सुपाच्य होता है, जिससे आपको इंस्टेंट एनर्जी मिलती है.

–    खाने में गेहूं के आटे और मैदा की जगह जौ और चने के आटे का इस्तेमाल करें.

–    रोज़ाना अरहर की दाल की बजाय मूंगदाल का इस्तेमाल करें.

–    फ्रेश फ्रूट्स में आप सेब, अनार, मोसंबी और केला खाएं. ड्रायफ्रूट्स को अपने डेली डायट का हिस्सा बनाएं.

–    इस मौसम में जितना हो सके, प्रोसेस्ड फूड अवॉइड करें.

–   नॉन वेज के शौक़ीन बरसात में इसका सेवन कम कर दें.

–    अगर आप दही खाना पसंद करते हैं, तो ज़रूर खाएं, पर उसमें नमक या शक्कर मिला लें.

–    इस मौसम में गाय का घी खाना काफ़ी फ़ायदेमंद होता है, क्योंकि वो न स़िर्फ आपकी पाचन क्रिया  को दुरुस्त रखता है, बल्कि रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर आपकी याद्दाश्त को बेहतर बनाता है.

–   कच्ची सब्ज़ियां और सलाद खाने से बचें. अगर घर पर खा रहे हैं, तो सब्ज़ियों को अच्छी तरह धोकर ही इस्तेमाल करें.

हेल्दी लाइफस्टाइल

–   बहुत ज़्यादा भीड़भाड़वाली जगह पर जाना अवॉइड करें, क्योंकि वहां वायरल इंफेक्शन होने की संभावना ज़्यादा रहती है.

–    फुल स्लीव शर्ट और फुल पैंट पहनें, ताकि मच्छर काट न सकें.

–    जिन्हें एलर्जी और इंफेक्शन्स की समस्या है, वो नीम की पत्तियों को उबालकर उसे नहाने के पानी में मिलाकर नहाएं.

–    एक्सरसाइज़ इस मौसम में भी उतनी ही ज़रूरी है, जितनी हर मौसम में.

–    हो सके तो शाम को घर पहुंचने पर नहाएं.

अपनाएं ये होम रेमेडीज़

–    सर्दी-खांसी से राहत के लिए एक कप पानी में सोंठ पाउडर उबालकर पीएं, राहत मिलेगी.

–    गले में ख़राश या दर्द है, तो गुनगुने पानी में नमक और हल्दी मिलाकर गरारे करें.

–    सर्दी से नाक बंद हो गई हो, तो गर्म पानी में नीलगिरी तेल कीकुछ बूंदें डालकर भाप लें या फिर रुमाल में उसकी कुछ बूंदें छिड़ककर सूंघें.

–    अगर वायरल फीवर है, तो एक कप पानी में तुलसी और अदरक मिलाकर उबाल लें. आंच से उतारकर शहद मिलाएं और चाय की तरह पीएं.

–    अपच व बदहज़मी से बचने के लिए हर बार खाने से पहले अदरक के एक छोटे से टुकड़े पर सेंधा नमक लगाकर खाएं.

–    रोज़ाना हल्दीवाला दूध न स़िर्फ आपको दूषित पानी के कारण होनेवाली बीमारियों से बचाएगा, बल्कि आपकी रोगप्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाएगा.

– सुनीता सिंह

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Personal Problems: रूटीन हेल्थ चेकअप में क्या पैप स्मियर टेस्ट कराना चाहिए? (Should I Go For A Pap Smear Test In Routine Health Checkup?)

मैं 32 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. मैं इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स के बारे में जानना चाहती हूं. क्या ये आम गर्भनिरोधकों की तरह है या इसके कुछ साइडइफेक्ट्स हैं?
– कुसुम मेहता, मुंबई.

इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स का इस्तेमाल असुरक्षित यौन संबंध के बाद इमरजेंसी में किया जाता है. इसे कभी भी रेग्युलर कॉन्ट्रासेप्टिव्स की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स दो तरह के हैं, एक प्रोजेस्टेरॉनयुक्त टैबलेट और दूसरा कॉपर टी. प्रेग्नेंसी टालने के लिए असुरक्षित यौन संबंध के 72 घंटों के भीतर टैबलेट का इस्तेमाल करना चाहिए, जबकि कॉपर टी के लिए 5 दिनों का समय होता है. इसके साइडइफेक्ट्स इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप कौन-सा मेथड इस्तेमाल कर रहे हैं. अनियमित माहवारी और उल्टी आना जैसे साइडइफेक्ट्स दोनों ही मेथड में हो सकते हैं, जबकि कॉपर टी में इंफेक्शन का भी डर रहता है. कभी-कभी मेथड फेल भी हो जाता है.

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Pap Smear Test

मैं 27 वर्षीया शादीशुदा महिला हूं और डॉक्टर ने मुझे रूटीन हेल्थ चेकअप में पैप स्मियर टेस्ट करने की सलाह दी है. क्या मुझे यह टेस्ट कराना चाहिए?
– कुमकुम अग्रवाल, देहरादून.

पैप स्मियर एक स्क्रीनिंग टेस्ट है, जिसके ज़रिए सर्विक्स में होनेवाले कैंसर व प्रीकैंसर सेल्स की जांच की जाती है. वैसे तो 21 वर्ष पार कर चुकी सभी महिलाओं को हर साल यह टेस्ट कराना चाहिए, ताकि शुरू में ही किसी समस्या का पता चल सके. अगर लगातार तीन सालों तक स्मियर टेस्ट निगेटिव आता है, तो यह टेस्ट हर तीन साल में 65 साल की उम्र तक कराना चाहिए. इसमें एक स्पेशल ब्रश के ज़रिए सर्विक्स के सेल्स को इकट्ठा कर टेस्ट के लिए लैब भेजा जाता है, ताकि पता चल सके कि कैंसर है या नहीं.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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बीमार न होने दें मन को (Take Care Of Your Emotional Health)

सारी हसरतें पूरी नहीं होतीं, कुछ ख़्वाब अधूरे भी रह जाते हैं, ज़िंदगी में सब कुछ मनचाहा ही हो यह ज़रूरी तो नहीं, ज़िंदगी को भी तो कभी मनमानी करने दें… ख़्वाहिशों पर बंदिशें तो नहीं लग सकतीं, लेकिन उनकी पूरी होने की शर्त क्यों? अगर शर्त रखेंगे, तो जी ही नहीं पाएंगे, भावनाओं में बहते जाएंगे और मन से बीमार हो जाएंगे. मन भी तो बहुत कुछ सहेजकर, संजोकर रखता है… जब सब कुछ मनचाहा नहीं होता, तो उसका सीधा असर मन पर ही तो होता है. ऐसे में ज़रूरी है अपने मन की सेहत का ख़्याल रखें और अपने मन को बीमार न पड़ने दें.

Family Health

हम अपने शरीर से बेहद प्यार करते हैं. यही वजह है कि उसे सजाते हैं, संवारते हैं, उसका हर तरह से ख़्याल रखते हैं. जब कभी शरीर में तकलीफ़ हो जाए, तो डॉक्टर के पास भी जाते हैं, एक्स्ट्रा केयर करते हैं. इसी तरह से जब हमारा मन बीमार पड़ता है, तो हम क्या करते हैं? हम में से अधिकांश लोगों का जवाब होगा कि कुछ नहीं, क्योंकि मन भी कभी बीमार पड़ता है?

लेकिन सच तो यही है, जिस तरह तन बीमार पड़ता है, उसी तरह मन भी बीमार पड़ता है. उसे भी उस व़क्त एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन हम शायद समझ ही नहीं पाते कि हमारा मन बीमार हो गया है, इसलिए बेहतर होगा कि अपने मन का भी ख़्याल रखें, उसे बीमार न होने दें और अगर बीमार हो भी जाए, तो मन के डॉक्टर के पास जाकर उसका भी इलाज करवाएं.

क्या हैं मन की बीमारी के लक्षण?

डर और घबराहट: यह एक बड़ा लक्षण है आपके मन की बीमारी का. आपके मन में बेवजह असुरक्षा की भावना आने लगती है. अंजाना डर और घबराहट-सी बनी रहती है. लोगों पर भरोसा कम करने लगते हैं. एक अविश्‍वास की भावना पनपने लगती है.

नाराज़गी, ग़ुस्सा व दोषारोपण: अगर आप अपनी ज़िंदगी की तकलीफ़ों के लिए बार-बार दूसरों पर दोषारोपण करते हैं, नाराज़गी व ग़ुस्सा दिखाते हैं, तो समझ लीजिए कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है. आपको अपनी परिस्थितियों की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेनी होगी. माना, आपके साथ बुरा हुआ होगा, लेकिन दोषारोपण समाधान नहीं है. हम नकारात्मक परिस्थितियों में भी किस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं, यह हम पर निर्भर करता है. ज़िम्मेदारियों से भागना कोई हल नहीं.

अपराधबोध, शर्मिंदगी, पश्‍चाताप: आपने कुछ ग़लतियां की होंगी. ज़ाहिर-सी बात है, ज़िंदगी परफेक्ट नहीं होती, हम सभी ग़लतियों से ही सीखते हैं, लेकिन उसके लिए कब तक अपराधबोध, शर्मिंदगी व पश्‍चाताप की भावना मन में बनाए रखेंगे? आपको ख़ुद को भी माफ़ करना सीखना होगा. आप भगवान नहीं हैं और हो सकता है आपकी वजह से दूसरों को या आपको भी तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ा हो, पर कब तक ख़ुद को दोषी मानते रहेंगे? माफ़ी मांग लें और ख़ुद को भी माफ़ कर दें.

चिड़चिड़ापन और नकारात्मकता: नकारात्मक भावनाएं कई कारणों से हो सकती हैं, लेकिन वह आपका स्वभाव ही बन जाए, तो ये मन के बीमार होने का संकेत है. नकारात्मकता ही चिड़चिड़ेपन को बढ़ाती है. पैसा, जॉब, रिश्ते व सामाजिक दबाव कई कारण हैं, जो नकारात्मक भावनाएं पैदा करते हैं, पर आपको ख़ुद यह निर्णय लेना होगा कि किस तरह से नकारात्मकता के कारणों से आप दूर रह सकते हैं.

एडिक्शन: जब मन और भावनाएं कमज़ोर हो जाती हैं, तो हम कई तरह की लतों के शिकार हो जाते हैं. एडिक्शन हमें कुछ पलों की राहत देते हैं और हमें लगता है हमारे सारे दर्द दूर हो गए, लेकिन एडिक्शन्स जब हमें पूरी तरह से अपनी गिरफ़्त में ले लेते हैं, तो मन और तन दोनों पर भारी पड़ जाते हैं. बेहतर होगा अपने ग़मों का इलाज लतों में न ढूंढ़ें.

उदासीनता व थकान: हमेशा थकान व उदासी महसूस करना शरीर के नहीं, मन के बीमार होने का संकेत है. ऊर्जा महसूस न होना, निराशावादी रवैया अपना लेना… इस तरह की भावनाएं यही इशारा करती हैं कि आपको अब मन के डॉक्टर की ज़रूरत है.

डिप्रेशन और आत्महत्या के ख़्याल: किसी भी गतिविधि में मन न लगना, किसी से बात न करना, सामाजिक क्रियाकलापों से दूर होते जाना, खाना कम कर देना, थका-थका महसूस करना जैसे लक्षण गहरे अवसाद की ओर इशारा करते हैं. यही अवसाद आगे चलकर आत्महत्या के ख़्यालों को जन्म देने लगता है. आपको लगने लगता है कि आपकी किसी को ज़रूरत नहीं, आपसे कोई प्यार नहीं करता… और यदि इस दौरान सही इलाज न करवाया जाए, तो आप ख़ुद अपनी जान के दुश्मन तक बन सकते हैं.

भावनात्मक कमज़ोरी: बात-बात पर रो देना, ख़ुद को असहाय व बेचारा महसूस करना मन की बीमारी का गहरा संकेत है. आपको लगता है कि कोई भी आपको प्यार नहीं कर सकता व अपना नहीं सकता. धीरे-धीरे आप लोगों से दूरी बनाने लगते हैं और अपनी ही परिधि में ़कैद हो जाते हैं. अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करते, ख़ुद मन ही मन घुटते रहते हैं.

सामाजिक गतिविधियों से दूर होना: आप पार्टीज़ में जाना बंद कर देते हैं, दोस्तों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों की ब्याह-शादी में न जाना… इस तरह से ख़ुद को आप समाज से काटने लगते हैं, क्योंकि आपको लगता है सभी आपके दुश्मन हैं और आपको कोई अपनाने को तैयार नहीं. ऑफिस पिकनिक हो या सोसायटी का गेट-टुगेदर, आपका मन कहीं नहीं लगता. हो सकता है आपकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी न हो, पर यह कोई समाधान नहीं.

हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाना: आपका मस्तिष्क पूरी तरह से बंद होने लगता है और हर तरह के निगेटिव ख़्याल ही आपको घेरे रहते हैं. अगर उम्मीद व आशा की किरण हो भी, तब भी आप प्रयास करने बंद कर देते हैं, क्योंकि आप पूरी तरह हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाते हैं. आप पहले ही सोच लेते हैं कि प्रयास करने से भी कुछ नहीं होगा और आप कोशिश ही नहीं करते.

शारीरिक तकली़फें: जब आपका मन बीमार होगा, तो ज़ाहिर है शरीर पर भी उसका असर नज़र आने लगेगा. सिरदर्द, पेट की तकली़फें, मांसपेशियों में दर्द व तनाव इसके प्रमुख लक्षण हैं. लेकिन अक्सर लोग शारीरिक लक्षणों के इलाज पर ध्यान देने लगते हैं, जबकि इनकी जो मुख्य वजह है, मन की बीमारी, उसको नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जिससे परेशानी और बढ़ जाती है.

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Family Care
कारण

मन की बीमारी के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक व ख़ुद का व्यक्तित्व भी ज़िम्मेदार हो सकता है.

–     हो सकता है आपकी नौकरी में समस्या हो या आपकी नौकरी चली गई हो और नई नौकरी अनेक प्रयासों के बाद भी न मिल रही हो, तो कई तरह के डर मन में हावी होने लगते हैं. भविष्य की चिंता, आर्थिक तंगी, समाज में तिरस्कार का डर आदि बातें आपको धीरे-धीरे नकारात्मक बनाने लगती हैं.

–     शादी या प्यार जैसा रिश्ता टूटने पर भी बहुत तकलीफ़ होती है. ऐसे में सामान्य बने रहना बेहद मुश्किल भी है, इसीलिए आप समाज से कटने लगते हैं. ख़ुद को एक दायरे में ़कैद कर लेते हैं. एडिक्शन का शिकार हो जाते हैं.

–     कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही ऐसा होता है कि वो अन्य लोगों के मुक़ाबले भावनात्मक व मानसिक रूप से कमज़ोर होते हैं. वो किसी भी नकारात्मक अनुभव का शिकार होते हैं, तो जल्द ही मानसिक रूप से बीमार हो जाते हैं.

–     बहुत अधिक ईर्ष्या या द्वेष भी आपके मन को बीमार करता है. किसी की कामयाबी से जलना, किसी की लाइफस्टाइल से ईर्ष्या करना सही नहीं. ख़ुद को पॉज़िटिव बनाएं, न कि एक निगेटिव व्यक्ति.

उपाय

–     अगर आप डर व घबराहट का शिकार हो रहे हैं, तो अपने डर के अनहेल्दी कारणों को पहचानें.

–     अनहेल्दी कारणों को हेल्दी बातों से रिप्लेस करना सीखें.

–     कहीं आप यह तो नहीं सोचने लगे कि यह दुनिया विश्‍वास के लायक ही नहीं. यह सोच ही अपने आप में एक्स्ट्रीम है. अपनी सोच को बदलें.

–     लोगों पर विश्‍वास करना सीखें.

–     पॉज़िटिव लोगों के साथ रहें. उन लोगों के संपर्क में रहें, जो आपकी हमेशा मदद करते हैं. आपको यह महसूस होगा कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते.

–     किसी बात को लेकर मन में शंका है, अपराधबोध है, तो बेहतर होगा अपनी शंकाएं बातचीत से दूर कर लें. बातों को मन में रखने से, भीतर ही भीतर कुढ़ने से नकारात्मकता ही बढ़ेगी.

–     माफ़ करना और माफ़ी मांगना सीखें.

–     अपने मन को पहचानें. अपने मन की बीमारी से भागें नहीं, उसका सामना करें और इलाज करवाएं.

–     जब कभी परिस्थितियों से भागने का मन हो, तो अपनी हॉबीज़ में मन लगाएं.

–     स्विमिंग, डान्सिंग, म्यूज़िक, ट्रेकिंग- ये तमाम चीज़ें एक तरह का मेडिटेशन हैं, जो आपको नकारात्मक भावनाओं से बाहर निकालकर पॉज़िटिव बनाने में मदद करती हैं.

–  नए दोस्त बनाएं, उनसे मिलेंगे तो ध्यान निगेटिव बातों से हटेगा.

–     कभी किसी शांत जगह जाकर छुट्टियां बिताएं.

–     मेडिटेशन और योग की शरण लें.

–     रोज़ाना लाइट एक्सरसाइज़ करें.

–     नकारात्मक लोगों से दूरी बनाए रखें.

–     अपने खानपान और इम्यूनिटी पर ख़ासतौर से ध्यान दें.

–     हेल्दी फूड खाएं, ताकि हार्मोंस असंतुलित न हों. हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करनेवाले फूड खाएं.

–     रिसर्च बताते हैं कि घर में पालतू बिल्ली या कुत्ता रखने से फील गुड हार्मोंस रिलीज़ होते हैं और स्ट्रेस हार्मोंस कार्टिसोल कम होते हैं. ये तरीक़ा भी आज़माया जा सकता है.

–     बेहतर होगा कि अपने मन की बात अपनों से शेयर करें. अगर ऐसा संभव न हो, तो बिना देर किए एक्सपर्ट के पास जाएं. फूड, जो बना देते हैं आपका मूड

–     डार्क चॉकलेट मूड ठीक करके डिप्रेशन दूर करता है. यह एंडॉर्फिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाता है और इसमें मौजूद कई अन्य तत्व भी फील गुड के एहसास को बढ़ानेवाले हार्मोंस को बढ़ाकर डिप्रेशन दूर करते हैं.

–     कार्बोहाइड्रेट्स सेरोटोनिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाते हैं और आपके मूड को बेहतर बनाकर हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करते हैं.

–     विटामिन बी बेहद ज़रूरी है हैप्पी हार्मोंस के रिलीज़ के लिए. शोध बताते हैं कि विटामिन बी6 की कमी से चिड़चिड़ापन, भूलने की समस्या, हाइपरएक्टिव हो जाना जैसी समस्याएं होती हैं. विटामिन बी12 भी ब्रेन बूस्टिंग तत्व है. आप विटामिन बी के लिए अपने डायट में हरी पत्तेदार सब्ज़ियां शामिल करें.

–     गाजर, दही, फिश, ड्रायफ्रूट्स, दालचीनी, अदरक, लहसुन, कालीमिर्च, जीरा, करीपत्ता आदि में भी हार्मोंस को संतुलित रखने के गुण होते हैं. इन सभी को अपने डेली डायट में शामिल करें.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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डायट सीक्रेट: बारिश के मौसम में क्या खाएं, क्या नहीं? (Diet Secret: Foods To Avoid This Monsoon)

Diet Secret

डायट सीक्रेट: बारिश के मौसम में क्या खाएं, क्या नहीं? (Diet Secret: Foods To Avoid This Monsoon)

मॉनसून में इंफेक्शन से जुड़ी बीमारी होने का ख़तरा सबसे ज़्यादा होता है. इनसे बचने के लिए खान-पान में सावधानी बरतना ज़रूरी है. फोर्टिस हॉस्पिटल, कल्याण की डायटीशियन नियति लिखिते बता रही हैं कि बारिश में क्या खाना चाहिए और किन चीज़ों से परहेज़ करना चाहिए?

 

खाएं

–    शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर फल, जैसे-सेब, नाशपाती और अनार इत्यादि का सेवन करें. ये हमारे शरीर में मौजूद फ्री-रेडिकल्स व टॉक्सिन्स से लड़ते हैं और हमें स्वस्थ रखते हैं.

–  इंफेक्शन से बचने के लिए स्टीम्ड सलाद ही खाएं. कच्चा सलाद हानिकारक हो सकता है. सूप और सब्ज़ी में अदरक व लहसुन का इस्तेमाल करें.

–    टमाटर, पालक, गोभी जैसी हरी सब्ज़ियों को इस्तेमाल करने से पहले उन्हें हल्के गर्म पानी से साफ़ कर लें, क्योंकि बारिश के मौसम में सब्ज़ियों को अच्छी तरह साफ़ किए बिना ही इस्तेमाल करने से इंफेक्शन होने का ख़तरा रहता है.

–    हल्दी वाला दूध पीएं. हल्दी में मौजूद करक्यूमिन इंफेक्शन के ख़तरे को कम करता है. गला ख़राब होने या कफ होने पर तुलसी, अदरक, हल्दी मिली हुई चाय या दूध पीने से काफ़ी आराम मिलता है. इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए रोज़ाना एक टीस्पून त्रिफला पाउडर ग्रहण करें.

–    भुना हुआ भुट्टा भी सेहत के लिए अच्छा होता है. साथ ही इस सीज़न में घर का बना हुआ हल्का खाना ही खाएं.

–    बारिश के मौसम में उबला या फिल्टर किया हुआ पानी ही पीएं. शरीर में पानी की कमी न होने दें. चूंकि बारिश में मौसम हल्का ठंडा होता है इसलिए हमें कम प्यास लगती है, लेकिन शरीर में मौजूद टॉक्सिन्स को निकालने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना ज़रूरी होता है.

–    इंफेक्शन से बचने के लिए नाश्ते में गर्मागर्म दलिया, ओट्स, दूध इत्यादि का सेवन करें.

–   पेट के सुचारु  संचालन के लिए प्रोबायोटिक्स जैसे दही या याकुर्ट का सेवन कर सकते हैं.

 न खाएं

–    मछली और सी फूड खाने से बचें, क्योंकि इस मौसम में बासी मछली खाने से गंभीर इंफेक्शन हो सकता है. चिकन और मटन का सेवन करते समय भी सावधानी बरतनी चाहिए. नॉनवेज बनाकर तुरंत खाएं. फ्रिज में रखा हुआ बासी नॉनवेज नुक़सान पहुंचा सकता है. कच्चा और अधपका अंडा खाने से भी बचें.

–    भिंडी, फूलगोभी और ग्वार खाने से परहेज़ करें.

–   अदरक, इलायची, काली मिर्च व दालचीनी युक्त हर्बल टी पीएं.

–   बाज़ार से कटी हुई सब्ज़ियां ख़रीदने और अंकुरित आलू का सेवन करने से बचें.

–    ज़्यादा पानी युक्त खाद्य पदार्थ, जैसे तरबूज और खरबूज का सेवन करने से भी बचें. ऐसी चीज़ें खाने पर आप सुस्त महसूस कर सकते हैं.

–    मसालेदार, तली-भुनी और रोड पर बिकनेवाली चीज़ें न खाएं. इससे आपको एसिडिटी, पेट का इंफेक्शन व मुंहासे इत्यादि की समस्या हो सकती है.

–    बारिश के मौसम में अत्यधिक नमक व रेडी टु ईट चीज़ें खाना नुक़सानदेह हो सकता है. इससे वॉटर रिटेंशन और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

–  अत्यधिक कॉफी का सेवन भी नुक़सान पहुंचा सकता है. यह शरीर को डिहाइड्रेट करता है. अल्कोहॉलिक पेय पदार्थ शरीर को डिहाइड्रेट करने के साथ एंटीऑक्सिडेंट की मात्रा को भी घटाते हैं. हालांकि रेड वाइन एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर होता है इसलिए कभी-कभार इसका सेवन किया जा सकता है.

–    लोकल या सड़क पर मिलनेवाली आइसक्रीम व अन्य ठंडी चीज़ें न खाएं, क्योंकि इनमें इस्तेमाल किया हुआ पानी या दूध ख़राब हो सकता है.

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