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बीमार न होने दें मन को (Take Care Of Your Emotional Health)

सारी हसरतें पूरी नहीं होतीं, कुछ ख़्वाब अधूरे भी रह जाते हैं, ज़िंदगी में सब कुछ मनचाहा ही हो यह ज़रूरी तो नहीं, ज़िंदगी को भी तो कभी मनमानी करने दें… ख़्वाहिशों पर बंदिशें तो नहीं लग सकतीं, लेकिन उनकी पूरी होने की शर्त क्यों? अगर शर्त रखेंगे, तो जी ही नहीं पाएंगे, भावनाओं में बहते जाएंगे और मन से बीमार हो जाएंगे. मन भी तो बहुत कुछ सहेजकर, संजोकर रखता है… जब सब कुछ मनचाहा नहीं होता, तो उसका सीधा असर मन पर ही तो होता है. ऐसे में ज़रूरी है अपने मन की सेहत का ख़्याल रखें और अपने मन को बीमार न पड़ने दें.

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हम अपने शरीर से बेहद प्यार करते हैं. यही वजह है कि उसे सजाते हैं, संवारते हैं, उसका हर तरह से ख़्याल रखते हैं. जब कभी शरीर में तकलीफ़ हो जाए, तो डॉक्टर के पास भी जाते हैं, एक्स्ट्रा केयर करते हैं. इसी तरह से जब हमारा मन बीमार पड़ता है, तो हम क्या करते हैं? हम में से अधिकांश लोगों का जवाब होगा कि कुछ नहीं, क्योंकि मन भी कभी बीमार पड़ता है?

लेकिन सच तो यही है, जिस तरह तन बीमार पड़ता है, उसी तरह मन भी बीमार पड़ता है. उसे भी उस व़क्त एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन हम शायद समझ ही नहीं पाते कि हमारा मन बीमार हो गया है, इसलिए बेहतर होगा कि अपने मन का भी ख़्याल रखें, उसे बीमार न होने दें और अगर बीमार हो भी जाए, तो मन के डॉक्टर के पास जाकर उसका भी इलाज करवाएं.

क्या हैं मन की बीमारी के लक्षण?

डर और घबराहट: यह एक बड़ा लक्षण है आपके मन की बीमारी का. आपके मन में बेवजह असुरक्षा की भावना आने लगती है. अंजाना डर और घबराहट-सी बनी रहती है. लोगों पर भरोसा कम करने लगते हैं. एक अविश्‍वास की भावना पनपने लगती है.

नाराज़गी, ग़ुस्सा व दोषारोपण: अगर आप अपनी ज़िंदगी की तकलीफ़ों के लिए बार-बार दूसरों पर दोषारोपण करते हैं, नाराज़गी व ग़ुस्सा दिखाते हैं, तो समझ लीजिए कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है. आपको अपनी परिस्थितियों की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेनी होगी. माना, आपके साथ बुरा हुआ होगा, लेकिन दोषारोपण समाधान नहीं है. हम नकारात्मक परिस्थितियों में भी किस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं, यह हम पर निर्भर करता है. ज़िम्मेदारियों से भागना कोई हल नहीं.

अपराधबोध, शर्मिंदगी, पश्‍चाताप: आपने कुछ ग़लतियां की होंगी. ज़ाहिर-सी बात है, ज़िंदगी परफेक्ट नहीं होती, हम सभी ग़लतियों से ही सीखते हैं, लेकिन उसके लिए कब तक अपराधबोध, शर्मिंदगी व पश्‍चाताप की भावना मन में बनाए रखेंगे? आपको ख़ुद को भी माफ़ करना सीखना होगा. आप भगवान नहीं हैं और हो सकता है आपकी वजह से दूसरों को या आपको भी तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ा हो, पर कब तक ख़ुद को दोषी मानते रहेंगे? माफ़ी मांग लें और ख़ुद को भी माफ़ कर दें.

चिड़चिड़ापन और नकारात्मकता: नकारात्मक भावनाएं कई कारणों से हो सकती हैं, लेकिन वह आपका स्वभाव ही बन जाए, तो ये मन के बीमार होने का संकेत है. नकारात्मकता ही चिड़चिड़ेपन को बढ़ाती है. पैसा, जॉब, रिश्ते व सामाजिक दबाव कई कारण हैं, जो नकारात्मक भावनाएं पैदा करते हैं, पर आपको ख़ुद यह निर्णय लेना होगा कि किस तरह से नकारात्मकता के कारणों से आप दूर रह सकते हैं.

एडिक्शन: जब मन और भावनाएं कमज़ोर हो जाती हैं, तो हम कई तरह की लतों के शिकार हो जाते हैं. एडिक्शन हमें कुछ पलों की राहत देते हैं और हमें लगता है हमारे सारे दर्द दूर हो गए, लेकिन एडिक्शन्स जब हमें पूरी तरह से अपनी गिरफ़्त में ले लेते हैं, तो मन और तन दोनों पर भारी पड़ जाते हैं. बेहतर होगा अपने ग़मों का इलाज लतों में न ढूंढ़ें.

उदासीनता व थकान: हमेशा थकान व उदासी महसूस करना शरीर के नहीं, मन के बीमार होने का संकेत है. ऊर्जा महसूस न होना, निराशावादी रवैया अपना लेना… इस तरह की भावनाएं यही इशारा करती हैं कि आपको अब मन के डॉक्टर की ज़रूरत है.

डिप्रेशन और आत्महत्या के ख़्याल: किसी भी गतिविधि में मन न लगना, किसी से बात न करना, सामाजिक क्रियाकलापों से दूर होते जाना, खाना कम कर देना, थका-थका महसूस करना जैसे लक्षण गहरे अवसाद की ओर इशारा करते हैं. यही अवसाद आगे चलकर आत्महत्या के ख़्यालों को जन्म देने लगता है. आपको लगने लगता है कि आपकी किसी को ज़रूरत नहीं, आपसे कोई प्यार नहीं करता… और यदि इस दौरान सही इलाज न करवाया जाए, तो आप ख़ुद अपनी जान के दुश्मन तक बन सकते हैं.

भावनात्मक कमज़ोरी: बात-बात पर रो देना, ख़ुद को असहाय व बेचारा महसूस करना मन की बीमारी का गहरा संकेत है. आपको लगता है कि कोई भी आपको प्यार नहीं कर सकता व अपना नहीं सकता. धीरे-धीरे आप लोगों से दूरी बनाने लगते हैं और अपनी ही परिधि में ़कैद हो जाते हैं. अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करते, ख़ुद मन ही मन घुटते रहते हैं.

सामाजिक गतिविधियों से दूर होना: आप पार्टीज़ में जाना बंद कर देते हैं, दोस्तों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों की ब्याह-शादी में न जाना… इस तरह से ख़ुद को आप समाज से काटने लगते हैं, क्योंकि आपको लगता है सभी आपके दुश्मन हैं और आपको कोई अपनाने को तैयार नहीं. ऑफिस पिकनिक हो या सोसायटी का गेट-टुगेदर, आपका मन कहीं नहीं लगता. हो सकता है आपकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी न हो, पर यह कोई समाधान नहीं.

हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाना: आपका मस्तिष्क पूरी तरह से बंद होने लगता है और हर तरह के निगेटिव ख़्याल ही आपको घेरे रहते हैं. अगर उम्मीद व आशा की किरण हो भी, तब भी आप प्रयास करने बंद कर देते हैं, क्योंकि आप पूरी तरह हताश, निराश व नाउम्मीद हो जाते हैं. आप पहले ही सोच लेते हैं कि प्रयास करने से भी कुछ नहीं होगा और आप कोशिश ही नहीं करते.

शारीरिक तकली़फें: जब आपका मन बीमार होगा, तो ज़ाहिर है शरीर पर भी उसका असर नज़र आने लगेगा. सिरदर्द, पेट की तकली़फें, मांसपेशियों में दर्द व तनाव इसके प्रमुख लक्षण हैं. लेकिन अक्सर लोग शारीरिक लक्षणों के इलाज पर ध्यान देने लगते हैं, जबकि इनकी जो मुख्य वजह है, मन की बीमारी, उसको नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जिससे परेशानी और बढ़ जाती है.

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कारण

मन की बीमारी के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक व ख़ुद का व्यक्तित्व भी ज़िम्मेदार हो सकता है.

–     हो सकता है आपकी नौकरी में समस्या हो या आपकी नौकरी चली गई हो और नई नौकरी अनेक प्रयासों के बाद भी न मिल रही हो, तो कई तरह के डर मन में हावी होने लगते हैं. भविष्य की चिंता, आर्थिक तंगी, समाज में तिरस्कार का डर आदि बातें आपको धीरे-धीरे नकारात्मक बनाने लगती हैं.

–     शादी या प्यार जैसा रिश्ता टूटने पर भी बहुत तकलीफ़ होती है. ऐसे में सामान्य बने रहना बेहद मुश्किल भी है, इसीलिए आप समाज से कटने लगते हैं. ख़ुद को एक दायरे में ़कैद कर लेते हैं. एडिक्शन का शिकार हो जाते हैं.

–     कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही ऐसा होता है कि वो अन्य लोगों के मुक़ाबले भावनात्मक व मानसिक रूप से कमज़ोर होते हैं. वो किसी भी नकारात्मक अनुभव का शिकार होते हैं, तो जल्द ही मानसिक रूप से बीमार हो जाते हैं.

–     बहुत अधिक ईर्ष्या या द्वेष भी आपके मन को बीमार करता है. किसी की कामयाबी से जलना, किसी की लाइफस्टाइल से ईर्ष्या करना सही नहीं. ख़ुद को पॉज़िटिव बनाएं, न कि एक निगेटिव व्यक्ति.

उपाय

–     अगर आप डर व घबराहट का शिकार हो रहे हैं, तो अपने डर के अनहेल्दी कारणों को पहचानें.

–     अनहेल्दी कारणों को हेल्दी बातों से रिप्लेस करना सीखें.

–     कहीं आप यह तो नहीं सोचने लगे कि यह दुनिया विश्‍वास के लायक ही नहीं. यह सोच ही अपने आप में एक्स्ट्रीम है. अपनी सोच को बदलें.

–     लोगों पर विश्‍वास करना सीखें.

–     पॉज़िटिव लोगों के साथ रहें. उन लोगों के संपर्क में रहें, जो आपकी हमेशा मदद करते हैं. आपको यह महसूस होगा कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते.

–     किसी बात को लेकर मन में शंका है, अपराधबोध है, तो बेहतर होगा अपनी शंकाएं बातचीत से दूर कर लें. बातों को मन में रखने से, भीतर ही भीतर कुढ़ने से नकारात्मकता ही बढ़ेगी.

–     माफ़ करना और माफ़ी मांगना सीखें.

–     अपने मन को पहचानें. अपने मन की बीमारी से भागें नहीं, उसका सामना करें और इलाज करवाएं.

–     जब कभी परिस्थितियों से भागने का मन हो, तो अपनी हॉबीज़ में मन लगाएं.

–     स्विमिंग, डान्सिंग, म्यूज़िक, ट्रेकिंग- ये तमाम चीज़ें एक तरह का मेडिटेशन हैं, जो आपको नकारात्मक भावनाओं से बाहर निकालकर पॉज़िटिव बनाने में मदद करती हैं.

–  नए दोस्त बनाएं, उनसे मिलेंगे तो ध्यान निगेटिव बातों से हटेगा.

–     कभी किसी शांत जगह जाकर छुट्टियां बिताएं.

–     मेडिटेशन और योग की शरण लें.

–     रोज़ाना लाइट एक्सरसाइज़ करें.

–     नकारात्मक लोगों से दूरी बनाए रखें.

–     अपने खानपान और इम्यूनिटी पर ख़ासतौर से ध्यान दें.

–     हेल्दी फूड खाएं, ताकि हार्मोंस असंतुलित न हों. हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करनेवाले फूड खाएं.

–     रिसर्च बताते हैं कि घर में पालतू बिल्ली या कुत्ता रखने से फील गुड हार्मोंस रिलीज़ होते हैं और स्ट्रेस हार्मोंस कार्टिसोल कम होते हैं. ये तरीक़ा भी आज़माया जा सकता है.

–     बेहतर होगा कि अपने मन की बात अपनों से शेयर करें. अगर ऐसा संभव न हो, तो बिना देर किए एक्सपर्ट के पास जाएं. फूड, जो बना देते हैं आपका मूड

–     डार्क चॉकलेट मूड ठीक करके डिप्रेशन दूर करता है. यह एंडॉर्फिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाता है और इसमें मौजूद कई अन्य तत्व भी फील गुड के एहसास को बढ़ानेवाले हार्मोंस को बढ़ाकर डिप्रेशन दूर करते हैं.

–     कार्बोहाइड्रेट्स सेरोटोनिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाते हैं और आपके मूड को बेहतर बनाकर हैप्पी हार्मोंस को रिलीज़ करते हैं.

–     विटामिन बी बेहद ज़रूरी है हैप्पी हार्मोंस के रिलीज़ के लिए. शोध बताते हैं कि विटामिन बी6 की कमी से चिड़चिड़ापन, भूलने की समस्या, हाइपरएक्टिव हो जाना जैसी समस्याएं होती हैं. विटामिन बी12 भी ब्रेन बूस्टिंग तत्व है. आप विटामिन बी के लिए अपने डायट में हरी पत्तेदार सब्ज़ियां शामिल करें.

–     गाजर, दही, फिश, ड्रायफ्रूट्स, दालचीनी, अदरक, लहसुन, कालीमिर्च, जीरा, करीपत्ता आदि में भी हार्मोंस को संतुलित रखने के गुण होते हैं. इन सभी को अपने डेली डायट में शामिल करें.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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डायट सीक्रेट: बारिश के मौसम में क्या खाएं, क्या नहीं? (Diet Secret: Foods To Avoid This Monsoon)

Diet Secret

डायट सीक्रेट: बारिश के मौसम में क्या खाएं, क्या नहीं? (Diet Secret: Foods To Avoid This Monsoon)

मॉनसून में इंफेक्शन से जुड़ी बीमारी होने का ख़तरा सबसे ज़्यादा होता है. इनसे बचने के लिए खान-पान में सावधानी बरतना ज़रूरी है. फोर्टिस हॉस्पिटल, कल्याण की डायटीशियन नियति लिखिते बता रही हैं कि बारिश में क्या खाना चाहिए और किन चीज़ों से परहेज़ करना चाहिए?

 

खाएं

–    शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर फल, जैसे-सेब, नाशपाती और अनार इत्यादि का सेवन करें. ये हमारे शरीर में मौजूद फ्री-रेडिकल्स व टॉक्सिन्स से लड़ते हैं और हमें स्वस्थ रखते हैं.

–  इंफेक्शन से बचने के लिए स्टीम्ड सलाद ही खाएं. कच्चा सलाद हानिकारक हो सकता है. सूप और सब्ज़ी में अदरक व लहसुन का इस्तेमाल करें.

–    टमाटर, पालक, गोभी जैसी हरी सब्ज़ियों को इस्तेमाल करने से पहले उन्हें हल्के गर्म पानी से साफ़ कर लें, क्योंकि बारिश के मौसम में सब्ज़ियों को अच्छी तरह साफ़ किए बिना ही इस्तेमाल करने से इंफेक्शन होने का ख़तरा रहता है.

–    हल्दी वाला दूध पीएं. हल्दी में मौजूद करक्यूमिन इंफेक्शन के ख़तरे को कम करता है. गला ख़राब होने या कफ होने पर तुलसी, अदरक, हल्दी मिली हुई चाय या दूध पीने से काफ़ी आराम मिलता है. इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए रोज़ाना एक टीस्पून त्रिफला पाउडर ग्रहण करें.

–    भुना हुआ भुट्टा भी सेहत के लिए अच्छा होता है. साथ ही इस सीज़न में घर का बना हुआ हल्का खाना ही खाएं.

–    बारिश के मौसम में उबला या फिल्टर किया हुआ पानी ही पीएं. शरीर में पानी की कमी न होने दें. चूंकि बारिश में मौसम हल्का ठंडा होता है इसलिए हमें कम प्यास लगती है, लेकिन शरीर में मौजूद टॉक्सिन्स को निकालने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना ज़रूरी होता है.

–    इंफेक्शन से बचने के लिए नाश्ते में गर्मागर्म दलिया, ओट्स, दूध इत्यादि का सेवन करें.

–   पेट के सुचारु  संचालन के लिए प्रोबायोटिक्स जैसे दही या याकुर्ट का सेवन कर सकते हैं.

 न खाएं

–    मछली और सी फूड खाने से बचें, क्योंकि इस मौसम में बासी मछली खाने से गंभीर इंफेक्शन हो सकता है. चिकन और मटन का सेवन करते समय भी सावधानी बरतनी चाहिए. नॉनवेज बनाकर तुरंत खाएं. फ्रिज में रखा हुआ बासी नॉनवेज नुक़सान पहुंचा सकता है. कच्चा और अधपका अंडा खाने से भी बचें.

–    भिंडी, फूलगोभी और ग्वार खाने से परहेज़ करें.

–   अदरक, इलायची, काली मिर्च व दालचीनी युक्त हर्बल टी पीएं.

–   बाज़ार से कटी हुई सब्ज़ियां ख़रीदने और अंकुरित आलू का सेवन करने से बचें.

–    ज़्यादा पानी युक्त खाद्य पदार्थ, जैसे तरबूज और खरबूज का सेवन करने से भी बचें. ऐसी चीज़ें खाने पर आप सुस्त महसूस कर सकते हैं.

–    मसालेदार, तली-भुनी और रोड पर बिकनेवाली चीज़ें न खाएं. इससे आपको एसिडिटी, पेट का इंफेक्शन व मुंहासे इत्यादि की समस्या हो सकती है.

–    बारिश के मौसम में अत्यधिक नमक व रेडी टु ईट चीज़ें खाना नुक़सानदेह हो सकता है. इससे वॉटर रिटेंशन और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

–  अत्यधिक कॉफी का सेवन भी नुक़सान पहुंचा सकता है. यह शरीर को डिहाइड्रेट करता है. अल्कोहॉलिक पेय पदार्थ शरीर को डिहाइड्रेट करने के साथ एंटीऑक्सिडेंट की मात्रा को भी घटाते हैं. हालांकि रेड वाइन एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर होता है इसलिए कभी-कभार इसका सेवन किया जा सकता है.

–    लोकल या सड़क पर मिलनेवाली आइसक्रीम व अन्य ठंडी चीज़ें न खाएं, क्योंकि इनमें इस्तेमाल किया हुआ पानी या दूध ख़राब हो सकता है.

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Personal Problems: पीएमएस के दौरान बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ापन महसूस होता है (I Feel Very Frustrated During PMS)

मैं 23 वर्षीया कॉलेज स्टूडेंट हूं, पर पिछले कुछ महीनों से पीएमएस के दौरान बहुत ज़्यादा थकान, चिड़चिड़ापन, रात में पसीना आना और पेट फूलने से परेशान हूं. क्या मुझे किसी गायनाकोलॉजिस्ट से मिलना चाहिए?
– बरखा झा, पटना.

आपके द्वारा बताए गए लक्षण आपकी उम्र में बहुत आम बात हैं. शरीर में हार्मोंस के बदलाव के कारण ऐसे लक्षण नज़र आते हैं. इस दौरान प्रोजेस्टेरॉन
हार्मोंस के कारण पेट फूलना, छाती में भारीपन, मूड बदलने जैसे लक्षण पाए जाते हैं. पीरियड्स से कुछ दिन पहले से ही खाने में नमक की मात्रा कम कर दें. रोज़ाना थोड़ी देर योग व ध्यान करें. अगर आपको इससे आराम नहीं मिलता, तो गायनाकोलॉजिस्ट से ज़रूर मिलें.

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 PMS Frustrations
मैं 38 वर्षीया स्वस्थ महिला हूं. रोज़ाना संतुलित आहार लेती हूं और हाइजीन का भी पूरा ख़्याल रखती हूं, फिर भी वेजाइनल डिस्चार्ज की समस्या से जूझ रही हूं. इसका क्या कारण हो सकता है. क्या मुझे डॉक्टर से मिलना चाहिए.
– चित्रा मिश्रा, झांसी.

वेजाइनल डिस्चार्ज के कई कारण हो सकते हैं, जैसे- बैक्टीरियल वेजिनोसिस, कैंडीडा इंफेक्शन, ट्रिकोमोनस इंफेक्शन आदि. अगर आप डायबिटीज़ या अस्थमा के कारण लंबे समय से स्टेरॉइड थेरेपी पर हैं या फिर लंबे समय से एंटीबायोटिक्स का सेवन कर रही हैं, तो आपको वेजाइनल इंफेक्शन हो सकता है. जैसा कि आपने बताया कि आप हाइजीन का ख़्याल रखती हैं, तो भी गर्मियों में आपको ज़्यादा अलर्ट रहने की ज़रूरत है, क्योंकि गर्मियों में उमस और पसीने के कारण वेजाइनल इंफेक्शन की संभावना और भी बढ़ जाती है. इसलिए हमेशा वेजाइना को साफ़ व सूखा रखने की कोशिश करें.

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Dr. Rajshree Kumar

 

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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Personal Problems: क्या इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स के साइड इफेक्ट्स होते हैं? (Does Emergency Contraceptives Have Any Side Effects?)

 मैं 32 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. मैं इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स के बारे में जानना चाहती हूं. क्या ये आम गर्भनिरोधकों की तरह है या इसके कुछ साइड इफेक्ट्स हैं?
– कुसुम मेहता, मुंबई.

इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स का इस्तेमाल असुरक्षित यौन संबंध के बाद इमरजेंसी में किया जाता है. इसे कभी भी रेग्युलर कॉन्ट्रासेप्टिव्स की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव्स दो तरह के हैं, एक प्रोजेस्टेरॉनयुक्त टैबलेट और दूसरा कॉपर टी. प्रेग्नेंसी टालने के लिए असुरक्षित यौन संबंध के 72 घंटों के भीतर टैबलेट का इस्तेमाल करना चाहिए, जबकि कॉपर टी के लिए 5 दिनों का समय होता है. इसके साइड इफेक्ट्स इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप कौन-सा मेथड इस्तेमाल कर रहे हैं. अनियमित माहवारी और उल्टी आना जैसे साइड इफेक्ट्स दोनों ही मेथड में हो सकते हैं, जबकि कॉपर टी में इंफेक्शन का भी डर रहता है. कभी-कभी मेथड फेल भी हो जाता है.

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Emergency Contraceptives

मैं 27 वर्षीया शादीशुदा महिला हूं और डॉक्टर ने मुझे रूटीन हेल्थ चेकअप में पैप स्मियर टेस्ट करने की सलाह दी है. क्या मुझे यह टेस्ट कराना चाहिए?
– कुमकुम अग्रवाल, देहरादून.

पैप स्मियर एक स्क्रीनिंग टेस्ट है, जिसके ज़रिए सर्विक्स में होनेवाले कैंसर व प्रीकैंसर सेल्स की जांच की जाती है. वैसे तो 21 वर्ष पार कर चुकी सभी महिलाओं को हर साल यह टेस्ट कराना चाहिए, ताकि शुरू में ही किसी समस्या का पता चल सके. अगर लगातार तीन सालों तक स्मियर टेस्ट निगेटिव आता है, तो यह टेस्ट हर तीन साल में 65 साल की उम्र तक कराना चाहिए. इसमें एक स्पेशल ब्रश के ज़रिए सर्विक्स के सेल्स को इकट्ठा कर टेस्ट के लिए लैब भेजा जाता है, ताकि पता चल सके कि कैंसर है या नहीं.

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डॉ. राजश्री कुमार
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Personal Problems: आईवीएफ साइकल फेल होने पर क्या दोबारा ट्राई करूं? (Last IVF Failed, Should I Try Again?)

मैं 33 वर्षीया महिला हूं. मैं कंसीव नहीं कर पा रही थी, इसलिए हमने आईवीएफ की मदद लेने का विचार बनाया, पर मेरा आईवीएफ साइकल भी फेल हो गया है. अब मैं क्या करूं? कृपया, मार्गदर्शन करें.
– रोहिणी देशपांडे, पुणे.

आईवीएफ ट्रीटमेंट करा रहे लोगों के लिए यह काफ़ी हतोत्साहित करनेवाला है, पर आपको इतनी आसानी से हार नहीं माननी चाहिए. इसके फेल होने के पीछे स्टेरॉइड, एस्पिरीन, प्लैटलेट युक्त प्लाज़्मा, इंट्रालिपिड इंफ्यूज़न आदि कारण हैं. आईवीएफ में सफलता के लिए आजकल इंट्रासिटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन (आईसीएसआई), एम्ब्रायोस्कोप, इंट्रासिटोप्लाज़्मिक मॉर्फोलॉजिकली सिलेक्टेड स्पर्म (आईएमएसआई) और विट्रिफिकेशन जैसी तकनीक के कारण आईवीएफ के सक्सेस रेट बढ़े हैं. कुछ लोगों के आईवीएफ 5-6 बार भी फेल हो जाते हैं, इसलिए आप निराश न हों.
अपने फर्टिलिटी एक्सपर्ट से बात करें. चाहें तो किसी और एक्सपर्ट से सेकंड ओपिनियन लें.

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Personal Problems

मेरी उम्र 29 वर्ष है. हाल ही में मेरे ओवेरियन ट्यूब्स का पोटेंसी टेस्ट हुआ, जिसमें दोनों ही ट्यूब्स ब्लॉक हैं. ऐसे में मैं किस तरह मां बन सकती हूं?
– उर्मिला मिश्रा, जमशेदपुर.

जैसा कि आपने बताया आपकी दोनों ही ट्यूब्स ब्लॉक हैं, तो आपके पास प्रेग्नेंसी के लिए दो विकल्प हैं. पहला विकल्प है सर्जरी, जहां सर्जरी के ज़रिए ट्यूब्स के ब्लॉक्स निकाले जाएंगे. इसके बाद आप नेचुरली कंसीव कर सकती हैं, पर इसमें एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी के चांसेज़ ज़्यादा रहते हैं. दूसरा विकल्प है आईवीएफ. लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के कारण आईवीएफ में सफलता की संभावना पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बढ़ गई है. आईवीएफ की प्रक्रिया भी काफ़ी आसान और पेशेंट फ्रेंडली है. इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आप अपने गायनाकोलॉजिस्ट से बात कर सकती हैं, वो आपका सही मार्गदर्शन करेंगे.

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 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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मरीज़ जानें अपने अधिकार (Know Your Patients Rights)

 
Patients Rights
बात कुछ साल पहले की है, जब एक सरकारी अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों ने तारा को बताया कि उन्हें बे्रस्ट कैंसर है, जिसके लिए उन्हें तुरंत मैसेक्टॉमी करवानी होगी. डॉक्टरों को भगवान का दूसरा रूप माननेवाले उनके पति ने किसी और अस्पताल या एक्सपर्ट डॉक्टर से  सेकंड ओपिनियन की ज़रूरत नहीं समझी और बिना डॉक्टर से उसके बारे में अधिक जानकारी लिए सर्जरी की मज़ूरी दे दी. सर्जरी के बाद जब डॉक्टर्स ने जांच के लिए ब्रेस्ट की गांठ लैब भेजी, तो पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर था ही नहीं. बेवजह तारा ने न स़िर्फ सर्जरी की पीड़ा झेली, बल्कि उनके परिवार को भी मानसिक कष्ट हुआ. उस समय अगर तारा को या उनके पति को अपने अधिकारों का पता होता या वो थोड़े सतर्क होते, तो उन्हें यह सब न झेलना पड़ता. यह किसी एक तारा की कहानी नहीं है. आज देश में हज़ारों ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपने अधिकारों की न तो जानकारी है और न ही वो इस दिशा में पहल कर रहे हैं. माना कि डॉक्टर्स अपनी पूरी कोशिश करके व्यक्ति को स्वस्थ करने का प्रयास करते हैं, पर कुछ ऐसे भी हैं, जो इस नोबल प्रोफेशन को बदनाम कर रहे हैं. ऐसे में आपको अपने पेशेंट्स राइट्स के बारे में पता होना चाहिए, ताकि आपके साथ ऐसा न हो.

क्या हैं आपके पेशेंट्स राइट्स?

– मरीज़ या उसके गार्जियन को बीमारी या रोग के बारे में पूरी जानकारी मिलनी चाहिए.
– उस हेल्थ प्रॉब्लम के क्या-क्या साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, उसका आपकी सेहत पर क्या प्रभाव पड़ेगा, आपके साथ क्या आपके परिवार को भी किसी तरह की सावधानी की ज़रूरत है आदि की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए.
– हर मरीज़ को यह अधिकार है कि पूरे मान-सम्मान के साथ उसका इलाज
हो. उसके साथ कोई बदसलूकी नहीं कर सकता.
– अगर ऐसी कोई सरकारी योजना है, जिससे आपको फाइनेंशियल मदद मिल सकती है, तो डॉक्टर या हॉस्पिटल अथॉरिटीज़ उसके बारे में आपको सूचित करें.
– इलाज के दौरान भी ट्रीटमेंट या बीमारी के बारे में सेकंड ओपिनियन के लिए आप अपनी रिपोर्ट्स किसी और डॉक्टर को दिखा सकते हैं. इसके लिए आपको डॉक्टर से कुछ छिपाने की ज़रूरत नहीं है. आप उन्हें नि:संकोच बता सकते हैं कि आप किसी और एक्सपर्ट से राय लेना चाहते हैं.
इलाज के लिए डायग्नोसिस, ट्रीटमेंट और दवाइयों की पूरी जानकारी समय-समय पर आपको दी जानी चाहिए.
– यह अस्पताल की ज़िम्मेदारी और आपका अधिकार है कि आपकी बीमारी से जुड़ी सभी रिपोर्ट्स की जानकारी गोपनीय रखी जाए.
– इमर्जेंसी में जल्द से जल्द आपको इलाज मुहैया कराया जाए.
– आपके मेडिकल रिकॉर्ड्स की फोटोकॉपी आपको भी दी जाए.
– अस्पताल के सभी नियम-क़ायदे के साथ-साथ उनकी सभी सुविधाओं की जानकारी भी आपको दी जाए.
– अगर आपको लगता है कि कोई सबस्टैंडर्ड दवा अस्पताल ने आपको दी है, तो आप उसकी शिकायत लोकल फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन से कर सकते हैं.
– अगर डॉक्टर आपकी बीमारी के रिकॉर्ड्स को किसी मेडिकल कॉन्फ्रेंस में इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो उसमें आपकी सहमति ज़रूरी है. ऐसा न करने पर आप उन पर गोपनीयता भंग करने का आरोप लगा सकते हैं.
– किसी भी महिला मरीज़ की जांच करते समय डॉक्टर के साथ नर्स/सिस्टर का होना ज़रूरी है.  अगर ऐसा नहीं है और आप असहज महसूस कर रही हैं, तो आप सिस्टर को साथ रखने की मांग कर सकती हैं.
– आपको पूरा अधिकार है कि आप वर्तमान डॉक्टर से इलाज न लेकर किसी और से इलाज करवा सकते हैं, पर जानलेवा बीमारियों में ऐसा करना आपके लिए ही ख़तरनाक हो सकता है.
– अगर डॉक्टर आपको एक्सपेरिमेंटल ट्रीटमेंट की सलाह देते हैं, जिसमें एक्सपेरिमेंटल थेरेपीज़, एक्सपेरिमेंटल दवाइयां या फिर अलग लाइन ऑफ ट्रीटमेंट शामिल हो, तो आप उससे इंकार कर सकते हैं.
Patients Rights
कर्त्तव्यों का भी करें पालन
– पूरी ईमानदारी से डॉक्टर द्वारा बताए गए निर्देशों का पालन करें.
डॉक्टर्स और सभी मेडिकल प्रोफेशनल्स का सम्मान करें.
– अपनी बीमारी से जुड़ी सभी रिपोर्ट्स, बिल्स और डॉक्यूमेंट्स संभालकर रखें.
– मेडिकल इंश्योरेंस है, तो ट्रीटमेंट से पहले कैशलेस या रीफंड के बारे में ज़रूरी बातें समझ लें.
– अगर ट्रीटमेंट, टेस्ट्स या दवाइयों आदि से संबंधित कोई शिकायत है, तो पहले अपने डॉक्टर से बात करें. हो सकता है कम्यूनिकेशन में कहीं प्रॉब्लम के कारण आपको ग़लतफ़हमी हुई हो. अगर डॉक्टर की लापरवाही के कारण ऐसा हुआ है, तो अस्पताल के पेशेंट रिड्रेसल सेल से संपर्क करें.
– किसी भी तरह की क़ानूनी कार्रवाई से पहले अस्पताल प्रबंधन के पास अपनी शिकायत दर्ज कराएं, क्योंकि अक्सर लोकल लेवल पर ही मामले आसानी से सुलझ जाते हैं.
– कोई भी एक्शन लेने से पहले एक बार इस बात पर ज़रूर ग़ौर करें कि डॉक्टर्स भी हमारी तरह इंसान हैं.
मेडिकल लापरवाही में यहां लगाएं गुहार
मेडिकल काउंसिल
यह एक क़ानूनी संस्था है, जो मेडिकल प्रोफेशन को मॉनिटर करने के लिए बनाई गई है. यहां पर आप शिकायत दर्ज करा सकते हैं, पर यहां आपको कोई मुआवज़ा नहीं मिल सकता. वो स़िर्फ डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन रद्द कर सकते हैं. पर यह काउंसिल साल में स़िर्फ 2 बार लगती है.
कंज़्यूमर कोर्ट
इस मामले में यह सबसे फास्ट और स्पीडी ट्रायल कोर्ट है. मेडिकल प्रोफेशन में किसी भी तरह की शिकायत के लिए आप कंज़्यूमर कोर्ट जा सकते हैं. यहां आपको स़िर्फ मुआवज़ा मिलेगा. आपको एक सादे से पेपर पर अपनी शिकायत लिखकर मुआवज़े की मांग की रक़म के साथ जमा करनी होती है.
मुआवज़े की रक़म के मुताबिक़ आपको कोर्ट चुनना पड़ेगा.
– डिस्ट्रिक्ट कंज़्यूमर कोर्ट: 20 लाख तक का मुआवज़ा
– स्टेट कमीशन: 20 लाख से 1 करोड़
– नेशनल कमीशन: 1 करोड़ से ज़्यादा
सिविल कोर्ट
मेडिकल लापरवाही की शिकायत के लिए यहां भी केस फाइल कर सकते हैं, पर यहां पहले से ही इतने केसेस पेंडिंग हैं कि आपका केस लंबा खिंच सकता है. अगर आपके इलाज में किसी तरह की लापरवाही बरती गई, जिसके कारण आपको शारीरिक या मानसिक कष्ट हुआ, तो कंज़्यूमर कोर्ट जाना सबसे सही फैसला होगा.
रेलवे में मरीज़ों को स्पेशल छूट
– कैंसर के मरीज़ों को ट्रीटमेंट या रूटीन चेकअप के लिए जाना है, तो उन्हें स्लीपर कोच और 3 टायर एसी में 100% कंसेशन मिलता है, जबकि 2 टायर एसी और फर्स्ट क्लास में 50% तक की छूट की सुविधा है. मरीज़ के साथ के अटेंडेंट को भी स्लीपर कोच और 3 टायर एसी में 75% तक की छूट मिलती है, जबकि 2 टायर और फर्स्ट क्लास में दोनों को समान छूट मिलती है.
– अगर आप हार्ट पेशेंट हैं और हार्ट सर्जरी के लिए एक शहर से दूसरे शहर जा रहे हैं, तो
आपको सभी टिकट्स पर 50-75% तक की छूट मिलती है. आपके अटेंडेंट को भी उतनी ही छूट मिलेगी.
– किडनी के मरीज़ जो डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी के लिए ट्रैवेल कर रहे हैं, उन्हें और उनके अटेंडेंट को भी 50-75% तक की छूट मिलती है.
– इसके अलावा ट्यूबरकुलोसिस, थैलेसेमिया, सिकल सेल एनीमिया, नॉन इंफेक्शियस लेप्रोसी और हीमोफीलिया के मरीज़ों को भी रेलवे में 50-75% की छूट मिलती है.
– अनीता सिंह

Personal Problems: पीरियड्स देरी से आने के क्या कारण हो सकते हैं? (What Could Be The Reasons For Delayed Periods?)

Personal Problems: पीरियड्स देरी से आने के क्या कारण हो सकते हैं? (What Could Be The Reasons For Delayed Periods?)
मैं 47 साल की महिला हूं. मुझे कई महीनों से पीरियड्स नहीं आ रहे हैं. इसकी क्या वजह हो सकती है? कहीं मुझे मेनोपॉज़ तो नहीं हो गया है. कृपया, मेरी समस्या का समाधान करें.
– रेषा गुप्ता, ठाणे.

मेनोपॉज़ होने पर पीरियड्स पहले की तरह रेग्युलर नहीं रहते हैं. कभी ब्लीडिंग ज़्यादा होती है, कभी कम और कई बार केवल स्पॉट नज़र आता है. कई बार पीरियड्स ज़्यादा दिनों के लिए रहते हैं, तो कभी कम दिनों में ही ख़त्म हो जाते हैं. अगर आपके पीरियड्स मिस हो रहे हैं, तो सबसे पहले प्रेग्नेंसी टेस्ट करें. अगर आप प्रेग्नेंट नहीं हैं, तो हो सकता है कि यह मेनोपॉज़ के संकेत हों. अगर लगातार 12 महीनों तक आपको पीरियड्स नहीं आते हैं और उसके बाद भी स्पॉटिंग ही दिखाई देती है, तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि ये कैंसर जैसी गंभीर समस्या भी हो सकती है.
मेनोपॉज़ को आप स्वयं पहचान सकती हैं. मेनोपॉज़ के कॉमन लक्षण हैं- वेजाइनल ड्रायनेस, नींद की कमी या नींद डिस्टर्ब हो जाना, ज़्यादा पसीना आना आदि. इन सारे लक्षणों की वजह से आप चिंता या अवसाद महसूस कर सकती हैं. मेनोपॉज़ है या नहीं ये जानने के लिए आप गायनाकोलॉजिस्ट से संपर्क करें. एक ब्लड टेस्ट के ज़रिए आसानी से इसका पता लगाया जा सकता है. इसके अलावा आप पैप स्मीयर यानी सरवाइकल कैंसर स्क्रीनिंग टेस्ट भी करवा सकती हैं.

यह भी पढ़ें: शारीरिक संबंध के बाद १-२ दिन तक ब्लीडिंग क्यों होती है?

Delayed Periods

पिछले 2-3 महीने से मेरे पीरियड्स देरी से आ रहे हैं. कृपया, मुझे बताएं कि पीरियड्स देरी से आने के क्या-क्या कारण हो सकते हैं.
– दीपिका शिंदे, जलगांव.  

स्ट्रेस, कुपोषण, थाइरॉइड प्रॉब्लम, कोई बीमारी, कंट्रासेप्टिव पिल्स, ईटिंग डिसऑर्डर, अर्ली मेनोपॉज़, ब्रेस्ट फीडिंग, मोटापा, पीसीओडी और अचानक से वज़न काम होने पर भी पीरियड्स देरी से आते हैं. आप अपने डॉक्टर से मिलें वो आपके पीरियड्स देरी से आने का कारण ज़्यादा सही तरीक़े से बता पाएंगे.

यह भी पढ़ें:  कंडोम के इस्तेमाल से प्राइवेट पार्ट में खुजली व जलन क्यों होती है?

 Dr. Rajshree Kumar

 

 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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Personal Problems: 10-15 दिन में पीरियड्स आने के क्या कारण हो सकते हैं? (Possible Reasons For Periods In 10-15 Days?)

Reasons For Periods
Personal Problems: 10-15 दिन में पीरियड्स आने के क्या कारण हो सकते हैं? (Possible Reasons For Periods In 10-15 Days?)

महिलाओं की कई व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं, जिनके बारे में वो मेरी सहेली के Personal Problems में जान सकती हैं. हो सकता है आपकी समस्या, किसी और की भी समस्या हो. तो महिलाओं की ऐसी ही पर्सनल प्रॉब्लम्स के बारे में जानने के लिए यहाँ पढ़ें.

मेरी उम्र 22 साल है. मेरी समस्या यह है कि हर 10 से 15 दिन में मेरे पीरियड्स आ जाते हैं. ऐसा क्यों होता है? कृपया बताएं मुझे क्या करना चाहिए?
– कुसुम कुमारी, नागपुर.

ये समस्या ज़्यादातर हार्मोनल असंतुलन या थायरॉइड की वजह से होती है. अगर महिला मेनोपॉज़ की ओर बढ़ रही है, तो ये लक्षण सामान्य हैं, क्योंकि इस दौरान पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं. लेकिन आप 22 साल की हैं, तो मेनोपॉज़ नहीं हो सकता है. कुछ हार्मोनल टेस्ट्स और अल्ट्रासोनोग्राफी के ज़रिए इसके कारण का पता लगाया जा सकता है. आपको अपने हीमोग्लोबिन पर भी नज़र बनाए रखनी होगी, क्योंकि बार-बार पीरियड्स होने की वजह से एनीमिया और कमज़ोरी हो सकती है. कुछ घरेलू उपचार, जैसे- गुड़, खजूर, फल व हरी पत्तेदार सब्ज़ियों का सेवन करने से आपकी समस्या काफ़ी हद तक कम हो सकती है.

यह भी पढ़ें: Personal Problems: ओवरी के सिस्ट को लेकर परेशान हूं

Reasons For Periods

मेरी शादी को डेढ़ साल हो गए हैं. इस साल फरवरी में मेरा मिसकैरेज हो गया था. अब मैं दोबारा कंसीव करना चाहती हूं, लेकिन कंसीव नहीं हो पा रहा है. क्या इसकी वजह मिसकैरेज है? कृपया बताएं मुझे क्या करना चाहिए?
– रेखा यादव, इलाहाबाद. 

गर्भपात या ऐब्नॉर्मल प्रेगनेंसी को नेचर्स लॉ कह सकते हैं, क्योंकि यह हमारे हाथ में नहीं होता. आप दोबारा प्रेगनेंसी की कोशिश कर सकती हैं.
किसी इंफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलें. किसी तरह की मेडिकल प्रॉब्लम, दवाई रोज़ाना लेती हैं, तो वो भी हमें बताएं. अगर पिछली बार आपने नेचुरली कंसीव किया था तो इस बार भी नेचुरली कंसीव करने की संभावना है. फिर भी ओवेरियन रिज़र्व, ट्यूब की पोटेंसी, थाइरॉइड आदि के बारे में चेक करना होगा.

यह भी पढ़ें: पर्सनल प्रॉब्लम्स: गर्भधारण नहीं कर पा रही हूं, क्या मुझमें कोई प्रॉब्लम है?

 

 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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Personal Problems: ओवरी के सिस्ट को लेकर परेशान हूं (Worried About Cyst In Ovary)

Cyst In Ovary

Personal Problems: ओवरी के सिस्ट को लेकर परेशान हूं (Worried About Cyst In Ovary) 

मैं 27 वर्षीया वर्किंग वु.मन हूं. पिछले दिनों पेट के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत के कारण डॉक्टर की सलाह पर सोनोग्राफी करवाई. रिपोर्ट में मेरी ओवरीज़ में 5 से.मी. का सिस्ट दिखा है. मेरे गायनाकोलॉजिस्ट ने कहा है कि घबराने की कोई बात नहीं और 3 महीने बाद फॉलोअप करने की सलाह दी है. मैं बहुत परेशान हूं, कृपया मार्गदर्शन करें
– रेणु वर्मा 

आपकी रिपोर्ट में जिस सिस्ट के बारे में लिखा गया है, उसे फिज़ियोलॉजिकल सिस्ट कहते हैं. महिलाओं की रिप्रोडक्टिव एज में यह आम बात है. अगर घबराने की कोई बात होती, तो डॉक्टर आपको ब्लड टेस्ट्स करने की सलाह देतीं, क्योंकि आपको 3 महीने बाद फॉलोअप के लिए बुलाया गया है, इससे पता चलता है कि कोई गंभीर बात नहीं है. सिस्ट के आकार में कोई बदलाव आया या नहीं, यह जानने के लिए फॉलोअप बहुत ज़रूरी है.

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Cyst In Ovary

मैं 23 वर्षीय स्त्री हूं. छह माह पूर्व ही मेरा विवाह हुआ है. हम अगले दो सालों तक बच्चा नहीं चाहते, इसलिए कंडोम इस्तेमाल करते हैं. लेकिन मुझे इससे असहजता महसूस होती है और दर्द भी होता है. किसी ने मुझे बताया कि कंडोम या उसके जेल से मुझे एलर्जी हो सकती है. क्या वाकई मुझे इससे एलर्जी हो रही है? कृपया मेरी समस्या का समाधान बताएं.
 – अर्चना ढढवाल, देहरादून.

आपको कंडोम के रबर या फिर इसके जेल से एलर्जी होने की संभावना है. चूंकि अभी आपकी उम्र भी काफ़ी कम है और अगले दो साल तक आप परिवार बढ़ाना नहीं चाहतीं, तो ऐसे में आप गर्भनिरोधक दवाइयों का इस्तेमाल कर सकती हैं. बेहतर होगा कि आप किसी गायनाकोलॉजिस्ट से संपर्क करें, जो आपको बताएंगे कि आपके लिए कौन–सा गर्भनिरोधक उपयुक्त होगा.

यह भी पढ़ें: पर्सनल प्रॉब्लम्स: गर्भधारण नहीं कर पा रही हूं, क्या मुझमें कोई प्रॉब्लम है?

 

 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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Personal Problems: सिर्फ़ 2 दिन पीरियड्स आना क्या मेनोपॉज़ की निशानी है? (Can Periods For 2 Days Mark Sign Of Menopause?)

Periods, Sign Of Menopause
Personal Problems: सिर्फ़ 2 दिन पीरियड्स आना क्या मेनोपॉज़ की निशानी है? (Can Periods For 2 Days Mark Sign Of Menopause?)
मेरी उम्र 39 साल है. 1 साल पहले मैं डिप्रेशन में थी और पिछले 7 महीनों से मेरे पीरियड्स सिर्फ़ 2 दिन ही रहते हैं और ब्लीडिंग भी बहुत कम होती है. क्या यह मेनोपॉज़ की निशानी है या फिर मुझे किसी तरह का ट्रीटमेंट लेना होगा?      
– विमला चंदेला, देहरादून.    

पीरियड्स के दौरान कम ब्लीडिंग के कई कारण हो सकते हैं, जैसे- हार्मोंस का असंतुलन, पोषण की कमी, पीसीओएस, थायरॉइड प्रॉब्लम्स आदि. अपनी मां से इस बारे में पूछें कि आपके परिवार में अर्ली मेनोपॉज़ की हिस्ट्री तो नहीं. आपको कुछ ब्लड टेस्ट भी कराने होंगे. साथ ही अपना ओवेरियन रिज़र्व भी चेक कराएं और सोनोग्राफी करवाएं, ताकि पता चल सके कि कितने साल और रुक सकते हैं. इसके अलावा अगर आपको किसी तरह की तकलीफ़ हो रही है, तो आप अपने गायनाकोलॉजिस्ट से मिलें, वो आपको इस बारे में बेहतर बता पाएंगे.

Periods, Sign Of Menopause
पिछले एक साल से हर पीरियड्स के बाद मुझे यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन हो जाता है, जिसके लिए मुझे एंटीबायोटिक्स लेनी पड़ती हैं और पीरियड्स भी समय पर नहीं आते. मैं बहुत परेशान हो गई हूं, कृपया, मेरी मदद करें. 
– सुहानी बत्रा, चंडीगढ़.  

यह बहुत ही कॉमन हेल्थ प्रॉब्लम है.  ज़्यादातर यूरिन इंफेक्शन्स का कारण बैक्टीरिया होते हैं, जो हमारी ही आंतों से आते हैं. ये आंतों को तो कोई नुक़सान नहीं पहुंचाते, लेकिन जब शरीर के दूसरे हिस्सों में पहुंच जाते हैं, तब इंफेक्शन का कारण बनते हैं. कुछ बैक्टीरिया आपके गुदा द्वार में रहते हैं, जो ब्लैडर तक पहुंचकर यूरिन इंफेक्शन का कारण बनते हैं. सेक्सुअल एक्टिविटी और अनहाइजीनिक पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल करने के कारण भी महिलाओं को इंफेक्शन हो सकता है. भरपूर पानी पीएं और साथ ही क्रैनबेरी का जूस और नींबू पानी लें. और हां, पीरियड्स का यूटीआई से कोई कनेक्शन नहीं है. इस बारे में अपने गायनाकोलॉजिस्ट को बताएं.

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 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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घुटनों के दर्द से राहत दिलाएगा ये घरेलू नुस्ख़ा, देखें वीडियो:

 

 

 

Personal Problems: पीरियड्स में कम ब्लीडिंग का क्या कारण हो सकता है? (What Could Be Possible Reasons For Light Periods?)

Reasons For Light Periods
मेरी शादी को दो साल हो रहे हैं. मेरी उम्र 26 साल है. हमने 3 साल बाद बच्चे की प्लानिंग की थी, लेकिन अब मुझे पीरियड्स में कम ब्लीडिंग हो रही है. कहीं इसके कारण आगे चलकर मुझे बच्चे पैदा करने में कोई दिक्कत तो नहीं होगी?
– महिमा रेड्डी, हैदराबाद.

पीरियड्स के दौरान कम ब्लीडिंग के कई कारण हो सकते हैं, जैसे- हार्मोन्स का असंतुलन, पोषण की कमी, पीसीओएस, थायरॉइड प्रॉब्लम्स. अपने परिवार में पता करें कि अर्ली मेनोपॉज़ की हिस्ट्री तो नहीं.  आपको कुछ ब्लड टेस्ट कराने होंगे. टेस्ट में ओवेरियन रिज़र्व चेक कराएं और सोनोग्राफी करवाएं ताकि पता चल सके कि कितने साल और रुक सकते हैं. किसी फर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलें.

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Reasons For Light Periods

मेरे बाएं ब्रेस्ट में गांठ है. इस गांठ की वजह से मुझे अब तक कोई प्रॉब्लम नहीं हुई है. लेकिन मेरे बाएं ब्रेस्ट का साइज़ दाएं वाले ब्रेस्ट से बड़ा है. क्या इससे मुझे भविष्य में कोई समस्या हो सकती है? मुझे क्या करना चाहिए?
– रोशनी पटवा, पटना.

ब्रेस्ट में छोटे लम्प्स फाइब्रोएडीनोमा हो सकते हैं. पर अच्छा होगा कि आप एक बार डॉक्टर से अपने ब्रेस्ट की कंप्लीट जांच करा लें. एक बार पारिवारिक इतिहास देख लें, कहीं किसी को परिवार में ब्रेस्ट कैंसर तो नहीं था. जॉक्टर की जांच के बाद आप बायलैट्रल ब्रेस्ट की सोनो-मैमोग्राफी करा लें. यह निदान का सबसे बेहतर टूल है.

यह भी पढ़ें: क्या कंसीव करने की संभावना को जानने के लिए कोई टेस्ट है?

 

 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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Personal Problems: पैप स्मियर टेस्ट क्यों किया जाता है? (What Do They Check For In A Pap Smear Test?)

पैप स्मियर टेस्ट, Pap Smear Test
मैं 33 वर्षीया कामकाजी महिला हूं और मेरी 7 महीने की एक बच्ची है. कुछ दिनों पहले ही मुझे पता चला कि प्रेग्नेंसी के दौरान अगर मां को थायरॉइड हो, तो वो बच्चे को भी हो सकता है. हालांकि प्रेग्नेंसी के दौरान दवाई लेने के कारण मेरा थायरॉइड नॉर्मल था, पर क्या इसकी संभावना है? कृपया, मेरा मार्गदर्शन करें.
– सरोजनी भारद्वाज, पटना.

सबसे पहले तो आपको डरने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि प्रेग्नेंसी में थायरॉइड की शिकायत होना कोई बड़ी बात नहीं. यह किसी तरह का इंफेक्शन नहीं है, जो मां से बच्चे को हो जाएगा. थायरॉइड डिसफंक्शन प्रेग्नेंसी के दौरान भी हो सकता है, पर ज़्यादातर मामलों में डिलीवरी के 6 हफ़्तों के भीतर ही इसका समाधान कर दिया जाता है. इसलिए ज़रूरी है कि आप डिलीवरी के बाद थायरॉइड का लेवल चेक करते रहें. अगर मां को थायरॉइड डिसफंक्शन है, तो इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं कि भविष्य में यह बच्चे को हो सकता है. आमतौर पर डिलीवरी के बाद नियोनैटोलॉजिस्ट बच्चे के थायरॉइड हार्मोंस लेवल चेक करते हैं, ताकि किसी भी तरह की असामान्यता को तुरंत ठीक किया जा सके.

यह भी पढ़ें: कंडोम के इस्तेमाल से प्राइवेट पार्ट में खुजली व जलन क्यों होती है?

पैप स्मियर टेस्ट, Pap Smear Test

 

मैं 26 वर्षीया शादीशुदा महिला हूं. हाल ही में मैंने पैप स्मियर टेस्ट के बारे में सुना. यह क्या है और क्यों किया जाता है?
– वृंदा नलावडे, नागपुर.

पैप स्मियर एक स्क्रीनिंग टेस्ट है, जो सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती जांच के लिए किया जाता है. वैसे हर शादीशुदा महिला को यह टेस्ट साल में एक बार और लगातार तीन सालों तक ज़रूर कराना चाहिए. अगर तीनों सालों की रिपोर्ट निगेटिव आती है, तो फिर हर तीन साल में एक बार यह टेस्ट कराना चाहिए. इस टेस्ट का मुख्य उद्देश्य सर्विक्स के सेल्स में होनेवाले बदलावों को देखकर कैंसर की संभावना को तुरंत ख़त्म करना है. दरअसल, शरीर के किसी भी हिस्से में कैंसर अचानक से नहीं हो जाता, बल्कि सालों पहले उसके लक्षण दिखाई देते हैं, इसलिए रेग्युलर चेकअप से कैंसर की किसी भी आशंका को दूर किया जा सकता है.

यह भी पढ़ें: क्या कंसीव करने की संभावना को जानने के लिए कोई टेस्ट है?

 

 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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