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Personal Problems: क्या कम उम्र की महिलाओं के बच्चों में भी हो सकता है डाउन्स सिंड्रोम? (What Makes You High Risk For Down’s Syndrome Baby?)

मेरी 26 वर्षीया पड़ोसन पहली बार मां बनी है, पर डॉक्टरों ने जांच करके बताया है कि उसके बच्चे को डाउन्स सिंड्रोम (Down’s Syndrome) है. मैं अब तक यही समझती थी कि 40 साल की उम्र के बाद जो महिलाएं मां बनती हैं, उनके ही बच्चों को डाउन्स सिंड्रोम हो सकता है. क्या ऐसा भी होता है?
– आरती सोलंकी, पुणे.

जो महिलाएं 40 साल की उम्र के बाद मां बनती हैं, उनके बच्चों में डाउन्स सिंड्रोम का ख़तरा ज़्यादा होता है, लेकिन कम उम्र की महिलाओं के साथ भी यह ख़तरा बना रहता है. डाउन्स का अर्थ है, शरीर में दो की बजाय एक एक्स्ट्रा यानी तीसरे क्रोमोज़ोम का होना. जिन बच्चों में ये एक्स्ट्रा क्रोमोज़ोम होता है, उन्हें कई गंभीर मानसिक समस्याएं हो सकती हैं, जिनमें से मंदबुद्धि होना एक है. आपको बता दें कि जहां 20-25 साल की महिलाओं के डेढ़ हज़ार बच्चों में से एक बच्चा डाउन्स सिंड्रोम का शिकार हो सकता है, वहीं 40-45 साल की महिलाओं के 130 में से एक बच्चे को यह गंभीर समस्या हो सकती है.

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Down's Syndrome

मैं 22 वर्षीया कॉलेज स्टूडेंट हूं. मैं यह जानना चाहती हूं कि क्या टॉयलेट सीट से भी एचपीवी इंफेक्शन फैल सकता है? इस डर से मैं पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल नहीं करती. कृपया, मेरी मदद करें.
– सरोजनी रॉय, गुवाहटी. 

एचपीवी यानी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस एक तरह का सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन है, जो टॉयलेट सीट इस्तेमाल करने से नहीं फैल सकता. एचपीवी इंफेक्शन के लिए त्वचा का त्वचा से संपर्क होना ज़रूरी है, जो टॉयलेट सीट से मुमकिन नहीं. अगर आपके पार्टनर के गुप्तांगों में किसी तरह की गांठ या मस्सा है या फिर कुछ समय पहले उन्हें एचपीवी हुआ था, तो शारीरिक संबंध न बनाएं. कंडोम भी इससे आपको सौ फ़ीसदी सुरक्षा नहीं दे पाएगा. याद रखें, एचपीवी पब्लिक टॉयलेट से नहीं फैलता.

यह भी पढ़ें: Personal Problems: पीरियड्स में होनेवाले दर्द के लिए क्या कोई ख़ास टेस्ट कराना होगा? (Menstrual Cramps- Diagnosis And Treatments)

Dr. Rajshree Kumar

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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Personal Problems: क्या कभी मां नहीं बन सकूंगी? (How Can I Find Out If I Can Get Pregnant?)

मेरी उम्र 28 वर्ष है. मेरी शादी को पांच वर्ष हो गए हैं. शादी के दो साल के बाद ही मुझे 2 माह का गर्भपात हो गया. एक साल के बाद मैं फिर गर्भवती हुई, लेकिन फिर मुझे ढाई महीने का गर्भपात हो गया. मैं बहुत ही निराश हो गई हूं. क्या मैं अब कभी मां नहीं बन सकूंगी?
– मंजरी शिधोरे, नागपुर

सबसे पहले तो आपको अपना पूरा चेकअप करवाना चाहिए, ख़ासतौर पर तब, जब गर्भधारण करना हो. गर्भपात होने के कई कारण हो सकते हैं. कम समय में ही गर्भपात होने का कारण है बेबी में जेनेटिक प्रॉब्लम का होना. हो सकता है गर्भाशय में सेप्टम होने से, हार्मोन्स की कमी से, इंफेक्शन या इम्यूनोलॉजिकल प्रॉब्लम से भी गर्भपात हुआ हो. गर्भाशय के अंदर की प्रॉब्लम जानने के लिए हीस्टिरोस्कोपी करवा सकती हैं. आप मां बन सकती हैं, बशर्ते कि प्रॉब्लम का कारण जानकर उसका सही इलाज करवाया जाए.

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Pregnancy Test

मेरी उम्र 52 वर्ष है. 2 साल पहले ही मुझे मेनोपॉज़ हो गया था. मेरी समस्या यह है कि मुझे बहुत ज़्यादा गर्मी लगने लगी है, यहां तक कि फैन चालू रहने पर भी मैं पसीने में भीगी होती हूं. मुझे इन दिनों बहुत चिड़चिड़ाहट होने लगी है और ग़ुस्सा भी बहुत आने लगा है, जिसके कारण सब मुझसे परेशान रहने लगे हैं. क्या हर स्त्री ऐसे दौर से गुज़रती है? क्या मेरी समस्या का कोई उपाय है?
– रजनी मल्होत्रा, हिसार.

जब 40 के बाद और 50 के पहले की उम्र में हार्मोन्स का स्तर गिरने लगता है, तब कई स्त्रियों में मेनोपॉज़ के लक्षण नज़र आने लगते हैं. इसी की वजह से ज़्यादा गर्मी महसूस होना, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, ग़ुस्सा, नींद न आना जैसी समस्याएं होने लगती हैं. ऐसे में आपके लिए सबसे अच्छा उपाय है एस्ट्रोजन के साथ हार्मोनल ट्रीटमेंट. इसके अलावा आजकल नॉन हार्मोनल थेरेपी भी ली जा सकती है, जिसमें सोया एक्सट्रैक्ट व विटामिन्स लिए जा सकते हैं. इस समय ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव भी ज़रूरी है. इसके लिए कैल्शियम सप्लीमेंट्स लें.

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Dr. Rajshree Kumar

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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सर्वगुण संपन्न बनने में खो न दें ज़िंदगी का सुकून (How Multitasking Affects Your Happiness)

 

 

Multitasking Side Effects

सर्वगुण संपन्न बनने में खो न दें ज़िंदगी का सुकून (How Multitasking Affects Your Happiness)

परफेक्ट बनने की चाह हर किसी की होती है, ख़ासकर महिलाओं की. लेकिन क्या कभी आपने ग़ौर किया है कि ख़ुद को सर्वगुण संपन्न साबित करने की चाह में आप अपना चैन-सुकून भी खोती जा रही हैं. इसी पहलू पर एक नज़र डालते हैं.

अरे, सुनती हो मेरा रूमाल नहीं मिल रहा.” रवि की आवाज़ पर सीमा दौड़कर गई और उसके हाथों में रूमाल पकड़ा आई. केवल इतना ही नहीं, बल्कि सास-ससुर की चाय और दवाइयां, चिंटू का टिफिन, बैंक और बाज़ार के काम और न जाने क्या-क्या सीमा करती रहती है और अपने घर को परफेक्ट रखती है. सभी रिश्तेदारों में वह चहेती है. सीमा की सास कहते नहीं थकती कि उनकी बहू तो सर्वगुण संपन्न है.

स़िर्फ सीमा ही क्यों ऐसी कई महिलाएं हैं, जो हर जगह परफेक्ट रहना चाहती हैं. इसमें कोई बुराई भी नहीं है, पर साथ ही यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि जीवन की हर कमान को संभालते-संभालते कहीं आपकी कमान आपके हाथ से छूट तो नहीं गई. इसका अर्थ है कि कहीं इस सर्वगुण संपन्नता के प्रमाणपत्र की क़ीमत आपका अपना व्यक्तित्व या आपका स्वास्थ्य तो नहीं.

सर्वगुण संपन्न से जुड़ी कुछ भ्रांतियां

महिलाएं तो मल्टीटास्किंग होती हैं… यह जुमला आपको गाहे-बगाहे सुनने मिल जाएगा, फिर वह ऑफिस हो या घर. और विडंबना यह है कि इस तथ्य को बतानेवाली अमूमन कोई स्त्री ही होती है. मल्टीटास्किंग का मतलब बहुत ग़लत लगाया जाता है. इसका मतलब अपने आप को सुबह से शाम तक कामों के बोझ तले दबा लेना नहीं होता या फिर एक साथ कई काम करना भी नहीं होता है. मल्टीटास्किंग का मतलब होता है कुछ कामों को एक साथ स्मार्ट तरी़के से करना, जिससे समय और ऊर्जा की बचत हो. इसका स्त्री और पुरुष से कोई लेना-देना नहीं है. अतः मल्टीटास्किंग के नाम पर सर्वगुण संपन्नता की प्रतिस्पर्धा ग़लत है.

किसी काम के लिए ना कहना असमर्थता का प्रमाण है

यह भी एक भ्रांति है कि अगर आपने घर में या ऑफिस में किसी को कोई काम करने से मना कर दिया, तो वह आपकी कमी होगी. साथ ही सामनेवाला नाराज़ हो जाएगा. इस कशमकश में हम कई ऐसे काम कर जाते हैं, जिनकी या तो ज़रूरत नहीं होती या जो हमारी सामर्थ्य के बाहर होता है. कोई भी काम या ज़िम्मेदारी तभी उठाएं, जब वह आवश्यक हो और आपके सामर्थ्य के अंदर हो. इसका सर्वगुण संपन्नता से कोई लेना-देना नहीं है.

जो ख़ुद के लिए कम-से-कम समय निकाले, वही सर्वगुण संपन्न है

हमारे समाज में अगर स्त्री ख़ुद के लिए स्पेस रखती है या अपने लिए कुछ समय निकालती है, तो वह सर्वगुणता के पैमाने पर खरी नहीं उतरती. इस भ्रांति को बदलने की ज़रूरत है. स़िर्फ स्त्री ही नहीं, हर किसी को अपने लिए समय निकालने की आवश्यकता होती है. अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करते हुए ऐसा करना कोई अपराध नहीं है. समाज या परिवार क्या कहेगा, इस डर से अपनी किसी रुचि या अपने लिए समय निकालना ना छोड़ें.

अगर आपसे सब ख़ुश हैं, तो ही आप सर्वगुण संपन्न हैं

सबको ख़ुश करना मुश्किल ही नहीं असंभव है, लेकिन सर्वगुण संपन्न बनने की चाह में हम हर किसी को ख़ुश करने की कोशिश करते रहते हैं. इसमें पूरी तरह से सफल कम ही हो पाते हैं, साथ ही कई बार निराशा भी हाथ लगती है. इससे अच्छा है कि हम यह कोशिश करें कि हमारी वजह से कोई दुखी ना हो.

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Multitasking Side Effects

कैसे पहचानें कि सर्वगुण संपन्न बनने की चाहत में आप ख़ुद को खो रही हैं?

अक्सर छोटी छोटी बातें ही हमें किसी बड़े बदलाव का इशारा देती हैं-

*    अगर आपको अपने कामों को पूरा करने के लिए दिनभर का समय कम पड़ता है.

*    समय के साथ आप अपनी पसंद-नापसंद भूलती जा रही हैं.

*    आपकी अपनी कोई हॉबी नहीं है.

*    हमेशा थकान महसूस होती है.

*    अक्सर चिड़चिड़ापन और निराशा होती है.

*    आपके आसपास सब ख़ुश हैं, पर आपको अंदर से ख़ुशी का अनुभव नहीं होता है.

*    हमेशा तनाव और दबाव महसूस होता है.

*    अगर आपके दोस्त या सहेलियां नहीं हैं.

*    आप दिन का कोई भी समय अपने मन मुताबिक़ नहीं बिता पाती हैं.

*    आपको लोगों के बीच अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता है.

समाधान के लिए इन बातों पर ध्यान दें

*    सबसे पहले और ज़रूरी है अपने लिए कुछ क्वालिटी समय निकालना.

*    अपने आसपास कुछ सहेलियां हमेशा रखें.

*    अपनी किसी भी रुचि को जीवित रखें.

*    अगर आप अपने बारे में सोच रही हैं, तो इसके लिए किसी भी प्रकार का अपराधबोध ना रखें.

*    कम-से-कम 15 दिनों में एक बार बाहर घूमने ज़रूर जाएं.

*    अपने बचपन का अलबम, कॉलेज के ज़माने की फोटोज़ ज़रूर देखें.

*    घर में हर किसी की ख़ुशी का ध्यान रखें, पर अपनी ख़ुशी को दांव पर ना लगाएं.

*    घर हो या ऑफिस, कामों को मिल-बांटकर करें. काम करने के लिए किसी की मदद लेने में कोई बुराई नहीं है.

सर्वगुण संपन्न नहीं स्मार्ट बनें

*    सर्वगुण संपन्न होना असल में किसी और के पैमाने पर ख़ुद को सिद्ध करना है.

*    यह तमगा लेने के लिए अपने स्व को खो देने से अच्छा है कि आप स्मार्ट बनें.

*    दिन के चौबीस घंटे का इस्तेमाल चतुराई और पूरी प्लानिंग से करें.

*    अपने रिश्तों में मधुरता बनाएं रखने के लिए किसी बड़े प्रयास की ज़रूरत नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी बातों को याद रखें.

*    दिन में थोड़ा समय ख़ुद को ज़रूर दें, फिर चाहे वह योग हो या फिर डांस. तो स्मार्ट बनें और जीवन की हर कमान को कुशलता से संभालें.

 – माधवी कठाले निबंधे

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कैंसर से बचाएंगी ये किचन रेमेडीज़ (Cancer Prevention: Best Home Remedies To Lower Your Risk)

Cancer Prevention

कैंसर से बचाएंगी ये किचन रेमेडीज़ (Cancer Prevention: Best Home Remedies To Lower Your Risk)

पूरी दुनिया में ही नहीं, भारत में भी कैंसर (Cancer) के रोगी लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन हमारे किचन में ही ऐसी बहुत सारी चीज़ें उपलब्ध हैं, जिनका नियमित सेवन कैंसर से लड़ने में सहायता कर सकता है. एक नजर किचन में मौजूद कुछ ऐसी ही एंटी कैंसर चीज़ों पर.

हल्दीः खाने में हल्दी का इस्तेमाल ज़रूर करें. इसमें मौजूद करक्यूमिन तत्व कैंसर से लड़ने में मदद करता है. हल्दी ख़ासकर ब्रेस्ट कैंसर, पेट के कैंसर और त्वचा के कैंसर में ज़्यादा प्रभावी है.

केसरः केसर में क्रोसेटिन नाम का तत्व होता है, जो कैंसर से लड़ने में प्रभावी है. ये ना स़िर्फ कैंसर को स्प्रेड होने से रोकता है, बल्कि ट्यूमर के साइज़ को भी कम करता है.

जीराः जीरा खाने का स्वाद बढ़ाने के साथ ही कैंसर से भी बचाता है. इसमें थाइमोक्वीनोन नाम का पदार्थ होता है, जो प्रोस्टेट कैंसर बनानेवाले सेल्स को बढ़ने से रोकता है. लिहाज़ा अगर कैंसर से बचना है और हेल्दी रहना है, तो अपने डेली डायट में जीरा शामिल करें.

दालचीनीः आयरन और कैल्शियम से भरपूर दालचीनी शरीर में ट्यूमर के साइज़ को कम करने में मदद करती है. हर रोज़ अपने दिन की शुरुआत दालचीनी की चाय से करें और सोने से पहले शहद और दालचीनी के साथ एक ग्लास दूध का सेवन करें. इससे आप कैंसर से सुरक्षित रहेंगे.

ऑरिगेनोः ऑरिगेनो का इस्तेमाल स़िर्फ पिज़्ज़ा, पास्ता की टॉपिंग के रूप में ही नहीं होता, बल्कि ये प्रोस्टेट कैंसर के ख़िलाफ़ भी एक सशक्त एजेंट का काम करता है.

Cancer Prevention

अदरक: औषधीय गुणों से भरपूर अदरक के सेवन से कोलेस्ट्रॉल कम होता है, मेटाबॉलिज़्म बढ़ता है और कैंसर सेल्स भी ख़त्म होते हैं. अदरक का अर्क कीमोथेरेपी या रेडियोथेरेपी से होनेवाली परेशानी को भी कम कर सकता है. ये अन्य कई बीमारियों से भी बचाता है.

तुलसीः तुलसी की पत्तियों में यूजेनॉल नामक तत्व होता है, जो कैंसर से सुरक्षा देता है. इस तत्व का इस्तेमाल एंटी कैंसर दवाएं बनाने के लिए भी किया जाता है.

नारियल तेलः रोज़ खाली पेट एक चम्मच नारियल तेल का सेवन करने से कैंसर से बचाव होता है. इसमें मौजूद लॉरिक एसिड कैंसर की कोशिकाओं को ख़त्म करने में सहायक होता है.

लहसुन और प्याज़ः लहसुन और प्याज़ में मौजूद सल्फर कंपाउंड बड़ी आंत, बे्रस्ट कैंसर, लिवर और प्रोस्टेट कैंसर की कोशिकाओं को मार देते हैं. यह इंसुलिन के प्रोडक्शन को कम करके शरीर में ट्यूमर नहीं बनने देते.

एंटी कैंसर सब्ज़ियां: फूलगोभी और ब्रोकोली कैंसर की कोशिकाओं को मारती हैं और ट्यूमर को बढ़ने से रोकती हैं. ये लिवर, प्रोस्टेट, मूत्राशय और पेट के कैंसर के ख़तरे को कम करती हैं.

फलियां और दाल: दाल और फलियां प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत होने के साथ ही फाइबर और फोलेट से भरपूर होती हैं, जो पैंक्रियाज़ के कैंसर के ख़तरे को कम कर सकती हैं.

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बॉडी पर भी दिखते हैं ब्रेकअप के साइड इफेक्ट्स (How Your Body Reacts To A Breakup?)

Breakup Effects
बॉडी पर भी दिखते हैं ब्रेकअप के साइड इफेक्ट्स (How Your Body Reacts To A Breakup?)

शरीर में दर्द होने पर जैसे आप कोई काम सही ढंग से नहीं कर पाते हैं, ठीक वैसे ही दिल के टूटने पर भी दिल सही तरह से काम नहीं कर पाता है. ब्रेकअप का संबंध केवल भावनाओं से ही नहीं होता, शरीर से भी होता है, इसलिए ब्रेकअप (Breakup) के दौरान जब व्यक्ति बुरी तरह से आहत होता है, तो उसका दुष्प्रभाव (Side Effects) मन के साथ-साथ शरीर पर भी इस प्रकार से दिखाई देने लगता है-

आंखों में सूजन: जब दिल दुखी होता है, तो आंखों में आंसू आना लाज़िमी है. लोग पूरी-पूरी रात रोते रहते हैं, जिसके कारण अगले दिन आंखों में सूजन आ जाती है. यहां पर एक दिलचस्प बात बता दें कि ब्रेकअप, तलाक़ या किसी अन्य बात से आहत होने के बाद रोने पर जो आंसू निकलते हैं, वो केवल वॉटरी होते हैं, उनमें नमक की मात्रा बहुत कम होती है, जबकि चोट लगने या अन्य किसी कारण से रोने पर निकलनेवाले आंसुओं में नमक की मात्रा अधिक होती है. दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो जब कोई भावनात्मक रूप से आहत होकर रोता है, तो उसकी आंखों में अधिक सूजन आती है.

सीने में दर्द: क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि जब भी आप किसी बे्रकअप और तलाक़ जैसी गंभीर बात से आहत होते हैं, तो आपको ऐसा महूसस होता है, जैसे- सिर घूम रहा है, चक्कर आ रहा है, सांस लेने में तकलीफ़ हो रही है, सीने में हवा पूरी तरह से नहीं पहुंच रही है, जिसके कारण बेचैनी महसूस होती है. इसका कारण है कि भावनात्मक पीड़ा होने के साथ सीने में शारीरिक पीड़ा भी महसूस होती है. कई बार तो ऐसा दर्द महसूस होता है जैसे किसी ने छाती में मुक्का मारा हो या फिर छाती में भारीपन-सा महसूस होता है.

नींद न आना: ब्रेकअप के बाद अधिकतर लोग नींद न आने की समस्या से परेशान रहते हैं, जिसका कारण प्यार में नाकाम होना है. परिणामस्वरूप तनाव बढ़ने लगता है. तनाव बढ़ने के कारण कार्टिसोल का उत्पादन शरीर में बढ़ने लगता है और बॉडी क्लॉक पर भी बुरा असर पड़ता है. इन्हीं कारणों से ब्रेकअप के समय लोगों को नींद नहीं आती है.

मांसपेशियों में दर्द: यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में हुए एक शोध के अनुसार, बेक्रअप के बाद मांसपेशियों में सूजन आ सकती है, सिरदर्द बढ़ सकता है और गर्दन में अकड़न आ सकती है. कई बार पैर भी इतने स्थिर (स्टिफ) हो जाते हैं कि सीढ़ियां चढ़ना दूभर हो जाता है. यहां तक कि थोड़ी दूर पैदल चलना भी मुश्किल होता है. इसके अतिरिक्त इस शोध में यह भी साबित हुआ है कि 23% तलाक़शुदा लोगों को कुछ दिन तक चलने में परेशानी हो रही थी और कुछ लोगों को मांसपेशियों में दर्द हो रहा था.

पाचन तंत्र में गड़बड़ी: ब्रेकअप के बाद मांसपेशियों में दर्द हो सकता है, जिसके कारण शरीर में मौजूद कार्टिसोल हार्मोन की सप्लाई पाचन संबंधी अंगों की तऱफ़ डायवर्ट हो जाती है. जब कार्टिसोल की सप्लाई पाचन संबंधी अंगों की तरफ़ ज़रूरत से ज़्यादा होती है, तो भूख कम होना, डायरिया और पेट में मरोड़ जैसी समस्याएं होती हैं. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में हुए एक शोध के अनुसार, जब आप ब्रेकअप के दौर से गुज़र रहे होते हैं, तो आपका मस्तिष्क भूख मिटानेवाले हार्मोन का उत्पादन अधिक करता है.

वज़न बढ़ना: कुछ लोग जब तनावग्रस्त होते हैं, तो उनका वज़न धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. इसका कारण है कि तनावग्रस्त होने पर उनके शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील होने लगती हैं और शरीर इसकी क्षतिपूर्ति करने के लिए अधिक इंसुलिन का उत्पादन करने लगता है. परिणामस्वरूप शरीर में शुगर फैट के रूप में एकत्रित होने लगता है और उनका वज़न धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. जब वे ब्रेकअप से आहत होते हैं, तो उस समय उनका मन शुगर और फैटवाली चीज़ें खाने का करता है और इन चीज़ों को खाने से वज़न बढ़ता है.

मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव: एक्सपर्टस का मानना है कि जब आप किसी अपने को खो देते हैं, तो दिल में दर्द के साथ-साथ मस्तिष्क पर भी उसका असर पड़ता है. यानी कि दिल के बुरी तरह से आहत होने पर मस्तिष्क में भी तकलीफ़ होती है.

स्किन संबंधी समस्याएं: ब्रेकअप के बाद तनाव होता ही है. तनाव होने पर शरीर में स्ट्रेस हार्मोन का स्तर काफ़ी बढ़ जाता है, जिसके कारण त्वचा की चमक ख़त्म हो जाती है. अगर आप पहले से ही मुंहासे, सोरायसिस और एग्ज़ीमा जैसी त्वचा संबंधी समस्याओं से परेशान हैं, तो बे्रकअप के बाद आपकी त्वचा की रंगत और भी ख़राब होने लगती है.

दिल संबंधी परेशानियां: कार्डियोलॉजिस्ट्स का मानना है कि ब्रेकअप के समय व्यक्ति भावनात्मक रूप से टूटा हुआ होता है, इसलिए उस व़क्त उसे हार्ट संबंधी तकलीफ़ या दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा अधिक होता है. इसका कारण है कि ब्रेकअप के दौरान व्यक्ति के शरीर में एंड्रेनालाइन का स्तर बढ़ा हुआ होता है.

इम्यूनिटी कमज़ोर होना: ब्रेकअप के दौरान अक्सर मन में नकारात्मक ख़्याल आते हैं. इन नकारात्मक ख़्यालों के कारण अवसाद, अकेलापन, तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ता है, जिसके कारण इम्यून सिस्टम कमज़ोर पड़ने लगता है और व्यक्ति बार-बार बीमार पड़ता है.

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Breakup Effects

ब्रेकअप से जुड़े कुछ तथ्य
  • ब्रेकअप के दौरान महिलाएं भावनात्मक रूप से अधिक आहत होती हैं, लेकिन उनकी तुलना में पुरुषों को नॉर्मल होने में अधिक समय लगता है, क्योंकि वे अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करते.
  • ब्रेकअप से पहले व्यक्ति अपने रिश्ते के प्रति जितना प्रतिबद्ध होता है, रिश्ता टूटने के बाद उसमें बदलाव की संभावना भी उतनी अधिक होती है. यानी बे्रकअप के बाद व्यक्ति अपने आप को पूरी तरह से बदला हुआ महसूस करता है.
  • सोशल मीडिया रिश्तों टूटने, मानसिक व शारीरिक शोषण और तलाक़ का एक प्रमुख कारण बन गया है.

 

ब्रेकअप के बाद कैसे करें अपनी बॉडी को हील?
  1. ब्रेकअप के बाद सबसे पहले अपना फिज़िकल चेकअप कराएं. फिज़िकल चेकअप के दौरान डॉक्टर से पूछें- ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल का स्तर कितना है? क्या शरीर में रक्तसंचार सुचारू रूप से हो रहा है? कई बार तनाव और अवसाद के कारण इस तरह की समस्याएं हो सकती हैं.
  2. अगर आप किसी भावनात्मक समस्या से परेशान हैं, तो उसे भी अपने डॉक्टर से शेयर करें और उससे निबटने के तरी़के पूछें.
  3. अकेलेपन, अवसाद और तनाव से छुटकारा पाने के लिए किसी अच्छे स्पा में जाकर बॉडी मसाज कराएं. बॉडी मसाज से माइंड और बॉडी दोनों रिलैक्स होती हैं.
  4. ब्रेकअप के बाद बॉडी मसाज कराने से शारीरिक व मानसिक शांति मिलती है. मांसपेशियों का दर्द, सिरदर्द और तनाव दूर होता है. अच्छी नींद आती है और एकाग्रता बढ़ती है.
  5. नकारात्मक विचारों को दूर करने के लिए प्रकृति के क़रीब जाएं.
  6. ब्रेकअप में खाना-पीना छोड़ने की बजाय अपनी डायट पर ध्यान दें और हेल्दी फूड हैबिट्स फॉलो करें.
  7. ब्रेकअप के बाद शरीर में होनेवाले साइड इफेक्ट्स को दूर करने के लिए वर्कआउट करें. वर्कआउट और एक्सरसाइज़ करने से एंड्रॉर्फिन हार्मोन रिलीज़ होता है, जो तनाव और अवसाद को दूर करता है.
  8. योग और प्राणायाम करके अपने अशांत मन को शांत करने का प्रयास करें.
  9. अपने बीते हुए कल को भुलाने के लिए ख़ुद को व्यस्त करें, जैसे- अच्छी किताबें पढ़ें, सकारात्मक सोचवाले दोस्तों के साथ समय बिताएं.
  10. मन और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए डांस, साइकिलिंग, स्विमिंग, फिटनेस क्लास और स्पोर्ट्स खेलें.

– पूनम नागेंद्र शर्मा

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प्रतिबंधित दवाओं पर प्रतिबंध क्यों नहीं? (Banned Drugs Available In India)

Banned Drugs In India
प्रतिबंधित दवाओं पर प्रतिबंध क्यों नहीं…? (Banned Drugs Available In India)

मर्यादा, नियम-क़ायदा, क़ानून, अनुशासन या रूल्स… ये तमाम शब्द काफ़ी सख़्त लगते हैं, लेकिन अक्सर जब इन्हें कार्यान्वित या यूं कहें कि लागू करने की बारी आती है, तो ये बेबस और लाचार लगने लगते हैं… वजह! लालच, मुनाफ़ा, कालाबाज़ारी, भ्रष्टाचार… हर किसी को कम समय में अधिक से अधिक पैसे कमाने हैं, पर वो पैसे किस क़ीमत पर कमाए जा रहे हैं इस पर शायद ही ध्यान जाता है. अगर हम बात करें दवाओं के बिज़नेस की, तो भारत में एफडीसी दवाओं का बिज़नेस लगभग 3000 करोड़ रुपए का है, इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यदि इन दवाओं पर प्रतिबंध लगता है, तो इससे मुनाफ़ा कमानेवालों को कितना नुक़सान हो सकता है. यही कारण है कि दवा कंपनियां नहीं चाहतीं कि नुक़सान करनेवाली ये दवाएं प्रतिबंधित हों और इनका बेहतर विकल्प उन्हें तलाशने में पैसा व समय ख़र्च करना पड़े.

इसके अलावा कुछ ऐसी भी दवाएं हैं, जो अपने गंभीर साइड इफेक्ट्स के चलते अन्य देशों में तो प्रतिबंधित हैं, पर भारत में नहीं. क्या हैं वजहें, क्या होती हैं एफडीसी दवाएं और सरकार का क्या रवैया है, इसका जायज़ा लेते हैं.

वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने 300 से अधिक दवाओं पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था, जिनमें से अधिकतर एफडीसी दवाएं हैं.

क्या होती हैं एफडीसी दवाएं?

इसका अर्थ है फिक्स्ड डोज़ कॉम्बिनेशन यानी वे दवाएं, जो दो या अधिक दवाओं के कॉम्बिनेशन से बनी हों. भारत में बिना क्लीनिकल ट्रायल के ये दवाएं बिकती हैं, लेकिन इनका शरीर पर काफ़ी दुष्प्रभाव होता है. अन्य देशों के मुक़ाबले भारत में ही सबसे अधिक ये दवाएं बिकती हैं.

डॉक्टर्स कहते हैं कि बैन इन दवाओं पर नहीं, इनके कॉम्बिनेशन पर लगा है यानी यही दवाएं अलग-अलग सॉल्ट में बाज़ार में अभी भी उपलब्ध हैं, पर वो सिंगल सॉल्ट हैं. अमेरिका व अन्य विकसित देशों में एफडीसी दवाएं काफ़ी कम व सीमित मात्रा में ही बिकती हैं, जबकि भारत में ये सबसे अधिक बिकती हैं. अन्य देशों में सख़्त नियम व क़ानून तथा प्रशासन की जागरूकता इसकी बड़ी वजह है. भारत में इन चीज़ों के अभाव के चलते अब तक सब कुछ चल रहा था. हालांकि वर्ष 2016 में भी सरकार ने इन दवाओं को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया था, लेकिन दवा कंपनियां इस ़फैसले के ख़िलाफ़ कोर्ट में चली गई थीं.

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2017 में आदेश दिया, जहां  दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड ने मामले की समीक्षा की और अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. सरकार ने कमेटियां बनाईं और दवा कंपनियों से जवाब मांगा कि एफडीसी दवाओं की ज़रूरत क्यों है, क्योंकि इनमें ऐसी दवाओं का मिश्रण होता है, जो कई देशों में प्रतिबंधित हैं. दवा कंपनियां इस पर संतोषजनक जवाब नहीं दे पाईं. भारत में अब केंद्र सरकार द्वारा 328 दवाओं को बैन कर दिया गया है.

क्यों बनाती हैं कंपनियां ऐसी दवाएं?

दवा कंपनियों को इन दवाओं से भारी मुनाफ़ा होता है, क्योंकि इन्हें बनाना सस्ता व आसान होता है. ये पहले से टेस्ट किए गए सॉल्ट पर बनती हैं, ऐसे में नया सॉल्ट ढूंढ़ने की मश़क्क़त व ज़रूरत नहीं पड़ती. साथ ही ये बिकती भी अधिक हैं, क्योंकि ओवर द काउंटर इन्हें ख़रीदा जाता है, जहां डॉक्टरी प्रिस्क्रिप्शन की ज़रूरत नहीं.

सख़्त नियमों की कमी भी है एक वजह

नियमों की बात की जाए, तो क्लीनिकल टेस्ट व ड्रग कंट्रोलर की मंज़ूरी के बाद ही इन दवाओं को बाज़ार में उतारा जाना चाहिए. परंतु केंद्र से मंज़ूरी न मिलने के डर से ये कंपनियां राज्य सरकार के ड्रग कंट्रोलर से मंज़ूरी ले लेती हैं, क्योंकि हर राज्य के नियम अलग-अलग हैं, जिससे इन्हें परमिशन आसानी से मिल जाती है. हालांकि केंद्र की मंज़ूरी के बिना इनका बाज़ार में खुलेआम बिकना ग़ैरक़ानूनी ही है.

बेहद नुक़सानदेह होती है एफडीसी दवाएं

आपको अपनी समस्या के लिए एक ही दवा की ज़रूरत है, लेकिन यदि आप एफडीसी दवा लेते हैं, तो बेवजह दूसरे सॉल्ट यानी दवाएं भी आपके शरीर में जा रही हैं. एक दवा से किडनी या लिवर पर यदि प्रभाव पड़ता है, तो अन्य दवाओं के साथ में शरीर में जाने से यह नुक़सान बढ़ जाता है.

इसी तरह से यदि आपको दवा से एलर्जी हो रही है, तो यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कॉम्बिनेशन में इस्तेमाल कौन-सी दवा के कारण ऐसा हो रहा है.

एक दवा के साइड इफेक्ट हमें पता होते हैं, इसी तरह से दूसरी दवा के भी साइड इफेक्ट्स की जानकारी होती है, लेकिन इनके मिश्रण से होनेवाले प्रभाव व साइड इफेक्ट्स का डाटा उपलब्ध नहीं होता, जिससे पता नहीं लगाया जा सकता कि इनके क्या साइड इफेक्ट्स हैं. लेकिन स्टडीज़ बताती हैं कि एफडीसी दवाओं को लेने से शरीर को नुक़सान की आशंका लगभग 40 फ़ीसदी बढ़ जाती है.

मरीज़ अपने डॉक्टर से पूछें ये सवाल…

  • आपको जो भी दवाएं लिखी जाती हैं, आपका हक़ है कि अपने डॉक्टर से उसकी पूरी जानकारी लें.
  • उनसे पूछ लें कि ये किस तरह की दवाएं हैं?
  • क्या इनमें से कोई एफडीसी भी हैं? यदि हां, तो इन्हें लेना कितना ज़रूरी है?
  • उनके विकल्प के बारे में पूछें.
  • दवाओं के साइड इफेक्ट्स की जानकारी लें.
  • आपको किन चीज़ों से एलर्जी है, यह भी डॉक्टर को बता दें.
  • यदि दवा से कोई समस्या महसूस हो रही हो, तो फ़ौरन डॉक्टर को बताएं.
  • यदि आप किसी अन्य बीमारी के लिए पहले से कोई दवा ले रहे हैं, तो उसके बारे में भी डॉक्टर को बताएं और उससे पूछें कि उस दवा के साथ आप इन दवाओं का सेवन कर सकते हैं या नहीं.

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Banned Drugs

विदेशों में प्रतिबंधित, पर भारत में नहीं…

कुछ दवाएं हैं, जो प्रतिबंध होने के बाद भी बिक रही हैं और कुछ ऐसी भी हैं, जिन पर अन्य देशों में तो प्रतिबंध है, लेकिन भारत में वो काफ़ी पॉप्युलर हैं. उनकी जानकारी भी ज़रूरी है…

निमेस्यूलाइड: यह प्रतिबंधित दवा है, इसके बावजूद बिक रही है. यह दर्द, शोथ व बुख़ार के लिए दी जाती है. पैरासिटामॉल जहां 4-6 घंटे तक ही असर दिखाती है, वहीं निमेस्यूलाइड 12-18 घंटे तक असरकारक होती है, लेकिन लिवर पर इसके दुष्प्रभाव को देखते हुए यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री ने वर्ष 2011 में इस पर रोक लगाई थी, पर यह अब भी आसानी से उपलब्ध है.

एनाल्जिन: यह पेनकिलर है और विश्‍वभर में प्रतिबंधित है, पर भारत में नहीं. बोन मैरो पर इसका बुरा प्रभाव देखते हुए इस पर रोक लगी हुई है, पर भारत में इस पर रोक नहीं है.

फिनाइलप्रोपनॉलअमाइन (ब्रांड – डिकोल्ड/ विक्स):  वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन द्वारा विक्स वेपोरब को टॉक्सिक घोषित किया गया है. इससे अस्थमा व टीबी जैसे रोग तक होने की आशंका रहती है. यही वजह है कि नॉर्थ अमेरिका व यूरोप के कई देशों में इस पर प्रतिबंध लगया हुआ है. इसी तरह से डिकोल्ड व विक्स एक्शन 500 भारत में छोड़कर कई जगहों पर बैन्ड है, क्योंकि इनसे ब्रेन हैमरेज का ख़तरा रहता है.

डिस्प्रिन: ब्रेन व लिवर में सूजन की एक वजह बन सकती है यह दवा, इसीलिए अमेरिकी सरकार ने वर्ष 2002 में इस पर प्रतिबंध लगाया था. इसकी वजह से नींद की ख़ुमारी, मतली, उल्टी जैसे लक्षण भी उभर सकते हैं. लेकिन यह भारत में सबसे फेवरेट पेनकिलर है.

नाइट्रोफ्यूराज़ोन: यह एंटीबैक्टीरियल मेडिसिन है, लेकिन इससे कैंसर का ख़तरा हो सकता है.

ड्रॉपेरिडॉल: एंटीडिप्रेसेंट मेडिसिन है यह, जिससे अनियमित हार्ट बीट की समस्या हो सकती है और यही इसके प्रतिबंध का कारण है.

इसी तरह से और भी कुछ दवाएं हैं, जो ग्लोबली बैन्ड हैं, पर भारत में उपलब्ध हैं.

भारत में प्रतिबंधित कुछ कॉमन दवाएं

सैरिडॉन: यह प्रॉपीफैनाज़ॉन, पैरासिटामॉल और कैफीन के कॉम्बिनेशन से बनती है. यह एकमात्र पेनकिलर है, जो तीन एक्टिव केमिकल के मिश्रण से बनी है, जिसमें कैफीन भी एक है. प्रॉपीफैनाज़ॉन ब्लड सेल्स को कम कर सकता है. बोन मैरो पर बुरा असर डाल सकती है यह दवा.

डोलामाइड: यह जॉइंट पेन के लिए यूज़ होती है, जिसमें प्रतिबंधित निमेस्यूलाइड भी है.

रिलीफ/एलकोल्ड: किडनी व लिवर पर बुरा प्रभाव, साथ ही सिरदर्द व कब्ज़ जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं.

एज़िथ्रोमाइसिन के 6 कॉम्बिनेशन्स को भी बैन किया गया है. इसी तरह से कैल्शियम ग्लूकोनेट और कैफीन के भी कुछ कॉम्बिनेशन्स हैं. निमेस्यूलाइड और पैरासिटामॉल के बहुत सारे कॉम्बिनेशन्स पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. लिस्ट बहुत लंबी है और सभी प्रतिबंधित दवाओं की जानकारी आप सीडीएससीओ यानी सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन की साइट पर जाकर चेक कर सकते हैं.

Banned Drugs

आप क्या कर सकते हैं?

  • प्रतिबंधित दवाओं की जानकारी हासिल करें.
  • मामूली सिरदर्द व बुख़ार के लिए सिंगल सॉल्टवाली दवा लें. बेतहरीन विकल्प है- पैरासिटामॉल.
  • बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक्स न लें.
  • डॉक्टर द्वारा बताई दवा का पूरा कोर्स करें.
  • दवा लेते समय एक्सपायरी डेट चेक करें.
  • दवाओं को स्टोर करने के नियमों का भी सही पालन करें.
  • ओवर द काउंटर यानी अपनी मर्ज़ी से बिना डॉक्टरी सलाह के दवा लेना बंद कर दें.

ओवर द काउंटर सस्ता व आसान विकल्प लगता है…

केमिस्ट शॉप ओनर विकी सिंह का कहना है कि एक फार्मासिस्ट को सभी बैन्ड ड्रग्स के बारे में पता होता है, लेकिन छोटे केमिस्ट बैन्ड ड्रग्स को भी बेचने से हिचकिचाते नहीं और वो भी मनचाहे दाम पर.

भारत में दूसरी ओर लोगों की प्रवृत्ति कुछ ऐसी है कि वो ओवर द काउंटर मेडिसिन्स पर ही अधिक निर्भर रहते हैं, क्योंकि उन्हें यह आसान और सस्ता विकल्प लगता है.

  • अधिकांश ग़रीब व सामान्य वर्ग के लोग सीधे केमिस्ट से दवाएं लेते हैं, क्योंकि बड़े डॉक्टर के पास जाना उन्हें महंगा लगता है और उनकी सोच यही होती है कि जितना गली-नुक्कड़ के क्लीनिक में बैठे डॉक्टर को जानकारी है, उतनी तो केमिस्ट को भी होती है, ऐसे में डॉक्टर की फीस व भीड़ आदि से बचने के लिए वो सीधे मेडिकल से दवा लेना पसंद करते हैं.
  • ऐसे लोगों को दवाओं के साइड इफेक्ट्स के बारे में पता नहीं होता और न ही वो जानने के इच्छुक होते हैं, उनमें उतनी जागरूकता ही नहीं होती. इसी का फ़ायदा केमिस्ट उठाते हैं. वो भी उन्हें बैन्ड ड्रग्स व दवाओं के साइड इफेक्ट्स के बारे में कुछ नहीं बताते. अपनी बातों से घुमा देते हैं और कहते हैं कि ये दवाएं काफ़ी असरकारी हैं.
  • अधिकांश लोगों की यह भी प्रवृत्ति होती है कि उन्हें यदि पता भी हो कि दवा का कुछ साइड इफेक्ट है, तब भी वो जल्दी आराम पाने के लिए उन दवाओं के सेवन से हिचकिचाते नहीं. उनका मक़सद तुरंत आराम पाना होता है.
  • जहां तक क़ानून की बात है, तो वो काफ़ी सख़्त है. बैन्ड ड्रग्स को बेचने पर फार्मासिस्ट का लाइसेंस तक रद्द हो सकता है, लेकिन ज़्यादा कमाने की भूख के चलते क़ानून को भी नज़रअंदाज़ करके केमिस्ट ग़लत काम करते हैं.
  • कुल मिलाकर सभी चीज़ों के तार मुना़फे से जुड़े हैं. आपको अंदाज़ा भी नहीं कि नशीली दवाओं यानी नार्कोटिक ड्रग्स की बिक्री भी ख़ूब चलती है, जैसे- कोडिन, ट्रामाडोल, लोराज़ेपाम, स्पास्मो प्रॉक्सिवॉन, जो आसानी से मिल जाते हैं और जिनका इस्तेमाल बहुत-से युवा नशे के लिए करते हैं. जो बैन्ड भी हैं, पर उनका व्यापार भी ख़ूब ज़ोरों पर चलता है.
  • कुछ ख़ास तरह की बीमारियों में कुछ ड्रग्स ज़रूरी होते हैं, जिसके चलते डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर वो मिल जाते हैं.
  • इसके अलावा जिस तरह अन्य चीज़ों की ब्लैक मार्केटिंग होती है, उसी तरह बैन्ड मेडिसिन्स की भी होती है, जिससे वो आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं.

– गीता शर्मा

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क्या आप भी बहुत जल्दी डर जाते हैं? (Generalized Anxiety Disorder: Do You Worry Too Much?)

किसी ने बहुत सही कहा है कि डर आपका सबसे बड़ा दुश्मन है. एक बार आपका डर आप पर हावी हो गया, तो बड़ी मुश्किल से पीछा छोड़ता है. रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जो हर छोटी-छोटी बात को लेकर डर या चिंता में रहते हैं, जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें अपनी सेहत से चुकाना पड़ता है. आप डर से न डरें और ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीएं, इसके लिए ज़रूरी है कि इस डर को समझें. क्या है यह एंज़ायटी डिसऑर्डर (Anxiety Disorder), आइए जानते हैं.

Generalized Anxiety Disorder

इन 10 बातों से सबसे ज़्यादा डरते हैं लोग?

हम सभी डरते हैं और डरना मानव स्वभाव भी है, पर क्या आप भी किसी बीमारी के बारे में सुनकर इतना डर जाते हैं कि लगता है कि अब बचेंगे नहीं या फिर कोई छोटी-सी समस्या आने पर ऐसा लगता है, जैसे सब बर्बाद हो गया, अब कुछ नहीं बचा?  इस तरह डरनेवाले लोग ढर्रे पर चलना पसंद करते हैं. ज़रा-सी परिस्थितियां प्रतिकूल हुई नहीं कि सब बेकार लगने लगता है. डर तो कई तरह के हैं, पर देखते हैं कि सबसे आम डर क्या हैं?

  1. कहीं मैं लेट न हो जाऊं?
  2. कहीं कुछ बुरा न हो जाए?
  3. अगर कोई इमर्जेंसी आ गई, तो कैसे संभालेंगे?
  4. कहीं मैं मोटी न हो जाऊं?
  5. अगर टेस्ट करवा लिया, तो कहीं कोई बीमारी न निकल आए?
  6. कहीं ज़िंदगी यूं ही धक्के खाते-खाते न निकल जाए?
  7. अगर मुझे सही जीवनसाथी नहीं मिला तो?
  8. मुझे कुछ हो गया, तो परिवार का क्या होगा?
  9. कहीं हमारे बीच कोई तीसरा ना आ जाए?
  10. क्या मुझे इससे अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी?
डर का होता है केमिकल रिएक्शन

आजकल हर व्यक्ति किसी न किसी बात से चिंतित या डरा हुआ रहता है, चाहे वो काम को लेकर हो, परिवार, पैसा, सेहत या फिर भविष्य की ही बात क्यों न हो. माना कि कुछ चीज़ों की चिंता करना ज़रूरी है, पर हर चीज़ को लेकर हमेशा मन को सशंकित रखना आपकी सेहत के लिए बिल्कुल ठीक नहीं. दरअसल, जब हम चिंताग्रस्त होते हैं, तो हमारे शरीर में कार्टिसोल नामक केमिकल का स्राव होता है, जो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करता है, जिससे हम आसानी से किसी इंफेक्शन या बीमारी की चपेट में आ जाते हैं.

ख़तरनाक है कार्टिसोल

रिसर्च में यह बात साबित हो गई है कि कार्टिसोल का डायबिटीज़, हार्ट प्रॉब्लम्स और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गंभीर बीमारियों से गहरा संबंध है. स्ट्रेस और डर के कारण आप न स़िर्फ डिप्रेशन और पैनिक डिसऑर्डर, बल्कि बाई पोलार डिसऑर्डर के शिकार भी हो सकते हैं.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ हम जिन बातों को लेकर डरे हुए रहते हैं या हमें जिनकी चिंता सताती रहती है, 96% मामलों में देखा गया है कि वह समस्या कभी हक़ीक़त में होती ही नहीं. हम बेवजह अपने दिमाग़ में ही उस समस्या को पालते-पोसते रहते हैं.

क्या है जनरलाइज़्ड एंज़ायटी डिसऑर्डर?

– छोटी-मोटी बातों पर घबराना या चिंता करना आम बात है, लेकिन जब व्यक्ति हर छोटी-से-छोटी बात पर घबराने या डरने लगे, तो उसे जनरलाइज़्ड एंज़ायटी डिसऑर्डर (जीएडी) कहते हैं. इससे पीड़ित व्यक्ति अपनी घबराहट या डर को कंट्रोल नहीं कर पाता, जिससे उसका मन किसी काम में नहीं लगता.

पहचानें इसके लक्षण

–     रोज़मर्रा के कामों को लेकर भी चिंता करना.

–     घबराहट और चिंता पर कंट्रोल न होना.

–     उन्हें भी पता होता है कि वो ज़रूरत से ज़्यादा परेशान हो रहे हैं.

–     असहज बने रहते हैं, जिससे जल्दी रिलैक्स नहीं हो पाते.

–     एकाग्र नहीं हो पाते.

–     बहुत जल्दी चौंक जाते हैं.

–     जल्दी नींद नहीं आती या फिर सुकूनभरी नींद नहीं ले पाते.

–     बहुत जल्दी थक जाते हैं या फिर हर व़क्त थका हुआ महसूस करते हैं.

–     सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, पेटदर्द या फिर शरीर के किसी हिस्से में बेवजह का दर्द.

–     खाना खाते समय निगलने में परेशानी होना.

–     चिड़चिड़ापन.

–     चक्कर आना.

–     बार-बार टॉयलेट जाना.

लक्षणों को देखकर बहुत से लोगों को लगेगा कि उनमें भी जीएडी है, पर ज़रूरी नहीं कि आप इससे पीड़ित हों. अगर हैं भी, तो कौन-सी बड़ी बात हो गई, हर किसी की तरह इसका भी तो समाधान है.

क्या हैं जीएडी के प्रमुख कारण?

एक्सपर्ट्स की मानें तो कुछ मामलों में इसका एक प्रमुख कारण आनुवांशिकता भी है. आपके मस्तिष्क और बायोलॉजिकल प्रोसेस डर और एंज़ायटी को तैयार होने में अहम् भूमिका निभाते हैं, हालांकि अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि क्यों कुछ परिवारों में ही लोग ज़्यादा डरते हैं, जबकि दूसरे परिवारवाले उतना नहीं डरते. इसके अलावा स्ट्रेस और बाहरी माहौल भी आपको डराने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

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Generalized Anxiety Disorder

कैसे कम करें अपने डर को?

एक बात अच्छी तरह समझ लें कि आप अपने डर को जितना ज़्यादा अनदेखा करेंगे, वह आपके सब कॉन्शियस माइंड में उतनी ही गहरी पैठ जमाएगा. अगर अपने डर से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो उसका सामना करें. डर से नज़रे मिलाएं और पूछें कि ज़्यादा से ज़्यादा वो क्या कर सकता है. यहां हम आपको अपने डर पर काबू पाने के कुछ स्मार्ट ट्रिक्स बता रहे हैं, तो आप भी इन्हें अपनाकर निडर, साहसी व सकारात्मक बनें.

– पेपर थेरेपी आज़माएं

सबसे पहले तो आपको जिस भी चीज़ या बात से डर लग रहा है, उसे डायरी में लिखें. लिखने से डर दिमाग़ से निकलकर पेपर पर आ जाता है, जिससे आपका दिमाग़ शांत होता है. अब उसे चार-पांच बार पढ़ें और फिर फाड़कर जला दें. आपको बहुत अच्छा महसूस होगा. यह एक तरह की थेरेपी भी है, जो आपके अंदर के डर को ख़त्म करती है.

–  बांट दें अपने डर को

जिस तरह लिखने से डर कमज़ोर लगने लगता है, वही हाल उसे बांट देने से भी होता है. किसी भी तरह का डर क्यों न हो, अपने किसी बड़े-बूढ़े या फिर दोस्तों से डिस्कस करें. बांटने से आपको बहुत से समाधान एक साथ मिल जाते हैं, जो शायद ही आपके दिमाग़ में आए हों.

–     थैंक्यू कहें, ख़ुश रहें

सुबह सोकर उठने पर और रात को सोने से पहले आपके पास जो भी है, उसके लिए ईश्‍वर को धन्यवाद कहने और आभार प्रकट करने से आत्मिक संतोष मिलता है, जिससे दिमाग़ में मौजूद डर की ओर आपका ध्यान नहीं जाता. धीरे-धीरे इसे रोज़मर्रा की आदत में शामिल करें. आपकी सोच सकारात्मक होने लगेगी और डर दूर होगा.

–    वर्तमान में जीने की आदत डालें

डर का अस्तित्व भूत या भविष्य से होता है. जितना ज़्यादा आप वर्तमान में जीने की कोशिश करेंगे, उतने ही ज़्यादा ख़ुश रहेंगे. इस व़क्त मैं कैसा महसूस कर रहा हूं? यह जो सांस चल रही है, कितनी अनमोल है, यह वातावरण में घुली ख़ुशबू, ये मधुर आवाज़, सब कुछ कितना अच्छा है. इसे अपनी आदत में शुमार करें. रोज़ाना थोड़ी देर, ख़ुद को महसूस करें. इसमें मेडिटेशन आपकी बहुत मदद करेगा.

–     अनिश्‍चितताओं को स्वीकारें

ज़िंदगी अगले क़दम क्या मोड़ लेगी, आप इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते. हमें पता नहीं कि कल हमारी सेहत कैसी होगी, कौन हमें प्यार करेगा, कौन अनदेखा करेगा, हमारे अपनों के क्या हालात होंगे- हमें कुछ भी नहीं पता. हमें स़िर्फ इतना पता है कि ज़िंदगी के हर पल को एंजॉय करना है. जब कुछ पता ही नहीं कि कल क्या होगा, तो डर किस बात का? क्या पता जिस चीज़ से हम डर रहे हैं, कल उसका अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए, इसलिए अनिश्‍चितताओं को स्वीकार करें और हर डर को ख़ुद से दूर कर दें.

–     नर्वस सिस्टम को शांत करें

जब हम लगातार डरे हुए रहते हैं, तो हमारा नर्वस सिस्टम हाई अलर्ट पर रहता है. मानसिक डर हमारे शरीर को बुरी तरह से प्रभावित करता है, इसलिए बेवजह मसल पेन होना, चक्कर आना और घबराहट जैसी भावनाएं महसूस होती हैं. इससे बचने का बेहतरीन तरीक़ा है फिज़िकल एक्टीविटीज़, एक्सरसाइज़, मेडिटेशन आदि.

–     छोड़ दें कंट्रोल

एक बात ध्यान में रखें कि आप जिस चीज़ के लिए डर रहे हैं और जिस तरह का माहौल है, उस पर आपका कोई कंट्रोल नहीं है. और जब कोई कंट्रोल ही नहीं, तो छोड़ दें उन्हें. उन पर कब्ज़ा जमाकर न रखें. याद रहे, जितना कम दिमाग़ में रखेंगे, उतना ज़्यादा हल्का महसूस करेंगे.

– अनीता सिंह

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Personal Problems: क्या कंसीव करते ही गायनाकोलॉजिस्ट को मिलना चाहिए? (What’s The Right Time To See A Gynecologist After Conception?)

मैं 22 वर्षीया हूं और मेरी शादी को अभी एक साल ही हुआ है. हमने कभी कोई फैमिली प्लानिंग मेथड का इस्तेमाल नहीं किया. इस महीने दो हफ़्ते तक मेरे पीरियड्स नहीं आए, तो मैंने घर पर ही यूरिन प्रेग्नेंसी टेस्ट (Pregnancy Test) किया, जो पॉज़िटिव आया. मुझे यह जानना है कि क्या मुझे तुरंत गायनाकोलॉजिस्ट (Gynecologist) को मिलना होगा?
– सत्या शर्मा, वाराणसी.

पहली बार गायनाकोलॉजिस्ट से मिलने के लिए आप 8वें से 10वें हफ़्ते के बीच कभी भी जा सकती हैं. याद रखें, प्रेग्नेंसी के पहले तीन महीने महिलाओं के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए अपना ख़ास ख़्याल रखें, लेकिन अगर आपको इस बीच कभी असामान्य रक्तस्राव हो या पेट के निचले हिस्से में मरोड़ के साथ दर्द हो या फिर बुख़ार हो, तो तुरंत गायनाकोलॉजिस्ट को मिलें.

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Gynecological Problems

मैं 25 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. पीरियड्स के दौरान मुझे काफ़ी तकलीफ़ होती है. मैं कभी पेनकिलर नहीं खाती, पर मेरी सहेलियां हमेशा पेनकिलर लेती हैं और मुझे भी लेने की सलाह देती हैं. क्या मुझे पेनकिलर लेना चाहिए? कृपया, सलाह दें.
– शालिनी ओझा, पटना.

अगर पीरियड्स के दौरान आपको दर्द और मरोड़ ज़्यादा हो रहा हो, तभी पेनकिलर लेना चाहिए, वरना घरेलू नुस्ख़ों और गरम पानी की थैली से भी आपको काफ़ी राहत मिल सकती है. पीरियड्स के दौरान भी जितना हो सके फिज़िकली एक्टिव रहें. अगर आपको पेट फूला हुआ महसूस हो रहा हो, तो पानी पीएं, इससे आपको काफ़ी राहत मिलेगी. इस दौरान फलों का जूस और सब्ज़ियों के सूप आपके लिए काफ़ी हेल्दी और दर्द कम करनेवाले ऑप्शन हैं. खाने में फल और सलाद की मात्रा बढ़ा दें. नमक और चाय-कॉफी की मात्रा कम कर दें.

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Dr. Rajshree Kumar

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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Personal Problems: योनि में ढीलापन महसूस होता है (Loose Vagina: What Causes It And How To Tighten Up?)

मैं 37 वर्षीय महिला हूं और मेरी दो सामान्य डिलीवरी हो चुकी है. कुछ दिनों से मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरी योनि (Vagina) से कुछ बाहर आ रहा है. इसके अलावा मुझे योनि में ढीलापन भी महसूस होता है. क्या ऐसी कोई एक्सरसाइज़ (Exercise) है, जिससे इस स्थिति में सुधार हो सके?
– मनाली, छत्तीसगढ़

नॉर्मल डिलीवरी के बाद गर्भाशय का लटकना और योनि में ढीलापन दोनों ही सामान्य बातें हैं. इस स्थिति से उबरना मुश्किल है, बल्कि मेनोपॉज़ के बाद तो स्थिति और भी ख़राब होती चली जाती है. आप चाहें तो पेल्विक फ्लोर यानी कीगल एक्सरसाइज़ कर सकती हैं. यदि परमानेंट इलाज चाहती हैं तो सर्जरी ही सबसे अच्छा इलाज है. पेरीनियल रिपेयर विधि द्वारा योनि में कसाव लाया जा सकता है. यह बहुत ही छोटी व आसान-सी विधि है. इसके अलावा कीहोल सर्जरी द्वारा यूटेरस को फिक्स किया जा सकता है.

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How To Tighten Up Vagina

मेरी उम्र 38 वर्ष है और मेरे दो बच्चे हैं. पिछले एक साल से मुझे माहवारी के समय बहुत ज़्यादा दर्द और रक्तस्राव होता है. सोनोग्राफ़ी करवाने पर मुझे पता चला कि मेरेे गर्भाशय में 1-2 बड़े फायब्रॉइड (गांठ) हैं. मुझे डॉक्टर ने सलाह दी है कि यूटेरस निकलवा दूं, पर मैं इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं हूं. क्या इसके अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं है?
– रंजीता, लखनऊ.

यदि गर्भाशय के बीच में अंदर की ओर फायब्रॉइड हो तो यह माहवारी के समय बहुत तकलीफ़ देता है. आधुनिक टेकनीक के चलते अब हीस्टिरोस्कोपिक व लेप्रोस्कोपिक सर्जरी (कीहोल सर्जरी) द्वारा फायब्रॉइड को आसानी से हटाया जा सकता है. आप चाहें तो इस ट्रीटमेंट का सहारा ले सकती हैं. ऐसे केस में यदि महिला की उम्र कम हो तो कोशिश की जानी चाहिए कि यूटेरस को बगैर हटाए फायब्रॉयड को निकाला जा सके.

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Dr. Rajshree Kumar

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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Personal Problems: वज़न बहुत ज़्यादा और चेहरे पर काफ़ी बाल भी हैं (What Does Obesity And Facial Hair Indicate?)

मैं 18 साल की हूं और मेरा वज़न 75 किलो है. पिछले 1 साल से डायटिंग और एक्सरसाइज़ द्वारा मैं अपना वज़न कम करने की कोशिश कर रही हूं, लेकिन वह घटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है. मेरे चेहरे पर भी काफ़ी बाल हैं. मैं काफ़ी तनावग्रस्त रहती हूं. कृपया, मेरी मदद करें.
– रीना, रांची.

आपने यह नहीं बताया कि इन समस्याओं के साथ क्या आपको अनियमित माहवारी की भी समस्या है. आपको पॉलिसिस्टिक ओवेरियन सिन्ड्रोम की प्रबल संभावना लगती है, जिसके कारण वज़न बढ़ना, हिरसुट़िज़्म (अधिक बाल होना), कील-मुंहासे और अनियमित माहवारी होती है. लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि सभी मरीज़ों में ये सभी लक्षण हों. यह एक सामान्य हार्मोनल समस्या है, जिसका पता सोनोग्राफ़ी और हार्मोन टेस्ट से चल जाता है. कुछ ऐसी दवाइयां हैं, जिनसे आपका मेटाबॉल़ि़ज़म बेहतर होने में मदद मिल सकती है. इससे चेहरे के बाल भी कम होंगे और माहवारी भी नियमित होगी.

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 Facial Hair
मेरी उम्र 48 वर्ष है. 2 साल पहले मेरी रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) हो गयी थी. मेरी समस्या ये है कि मुझे डिप्रेशन, अचानक बहुत ़ज़्यादा गर्मी लगना, योनि में सूखापन जैसी तकलीफ़ रहती है. कृपया, इस समस्या का उपाय बताएं.
– रचना, दिल्ली

आपको बहुत जल्दी मेनोपॉज़ हो गया है, अत: आपको इस बात का ख़ास ध्यान रखना चाहिए कि कहीं आपको ऑस्टियोपोेेेरोसिस की तकलीफ़ न हो जाए. अमूमन मेनोपॉज़ के बाद ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों में कमज़ोरी की शिकायत होती है. इसके लिए आप नियमित एक्सरसाइज़ व कैल्शियमयुक्त डायट ले सकती हैं. सोया प्रोडक्ट से भी आपको फ़ायदा हो सकता है.

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Dr. Rajshree Kumar

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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Personal Problems: क्या पॉलिप बहुत ख़तरनाक होता है? (Is Polyp In Uterus Dangerous?)

मैं 36 वर्ष की शादीशुदा महिला हूं. मुझे पिछले 6 महीने से पीरियड (Periods) के दौरान बहुत ज़्यादा रक्तस्राव होता है. मैंने सोनोग्राफ़ी टेस्ट (Sonography Test) करवाया, जिससे पता चला कि मेरे यूटेरस (Uterus) में गांठ (पॉलिप) है. यह क्या है? क्या यह बहुत ख़तरनाक (Dangerous) है? क्या इसके लिए मुझे यूटेरस हटाना पड़ सकता है?
– ज्योति, अहमदाबाद

सबसे पहली बात जो हर महिला को ध्यान में रखना चाहिए वह ये कि जब भी माहवारी के समय हैवी ब्लीडिंग हो तो सबसे पहले इसका कारण जानने के लिए चेकअप करवाएं. साथ ही कैंसर के लिए पीएपी स्मीयर और सोनोग्राफ़ी टेस्ट भी करवाएं. आपने बताया कि सोनोग्राफ़ी टेस्ट में पॉलिप (गांठ) बताया गया है. यह भी अनियमित और भारी रक्तस्राव का कारण है. पॉलिप एक तरह का ट्यूमर है जो कि यूटेरस में पाया जाता है. इसे हीस्टिरोस्कोपी सर्जरी द्वारा हटाया जा सकता है. यदि यह ट्यूमर कैंसर का नहीं है तो सर्जरी के बाद फिर से ट्यूमर आने की संभावना नहीं होती.

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Polyp In Uterus

मैं 30 वर्षीय महिला हूूंं और पिछले साल मेरा दो बार तीन-तीन महीने का गर्भपात हो चुका है. मैं मां बनना चाहती हूं, लेकिन डरती हूं कि कहीं फिर से कोई परेशानी न आ जाए. क्या मुझे नॉर्मल प्रेगनेंसी हो पाएगी?
– संजना, मुरादाबाद

वैसे तो दो बार गर्भपात होने के बाद तीसरी बार गर्भपात होने की संभावना और ़ज़्यादा बढ़ जाती है. आप यदि गर्भधारण करने के बारे में सोच रही हैं तो बेहतर होगा कि सबसे पहले सारे टेस्ट करवा लें, ताकि यह पता चल जाए कि आपका यूटेरस सामान्य है या नहीं. कोई बर्थ ड़िफेक्ट, जैसे- सेप्टम या डबल यूटेरस की समस्या तो नहीं है आदि. यदि इस तरह के ड़िफेक्ट्स हैं भी तब भी कीहोल सर्जरी, जैसे- लेप्रोस्कोपी, हीस्टिरोस्कोपी से इसका इलाज संभव है. इसके अलावा जेनेटिक टेस्टिंग और इम्यूनोलॉजी प्रॉब्लम्स के लिए विशेष तरह का ब्लड टेस्ट भी किया जाता है. गर्भधारण के पहले फोलिक एसिड और हार्मोन्स की टेबलेट लेने की आवश्यकता पड़ सकती है.

यह भी पढ़ें: Personal Problems: पीरियड्स में होनेवाले दर्द के लिए क्या कोई ख़ास टेस्ट कराना होगा? (Menstrual Cramps- Diagnosis And Treatments)

Dr. Rajshree Kumar

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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Personal Problems: चॉकलेट सिस्ट से बहुत परेशान हूं (Chocolate Cyst: Causes, Symptoms And Treatment)

मेरी उम्र 28 वर्ष है और मेरी शादी को 5 वर्ष हो गए हैं. मुझे मासिक धर्म में काफ़ी दर्द और रक्तस्राव होता है. मेरी सोनोग्राफ़ी से पता चला है कि मुझे चॉकलेट ओवेरियन सिस्ट (Chocolate Ovarian Cyst) है और इसकी सर्जरी करवानी होगी. लेकिन मैं अभी तक मां नहीं बन पाई हूं, इसलिए किसी भी तरह के ऑपरेशन से डरती हूं. मुझे क्या करना चाहिए?
– परमजीत कौर, दिल्ली.

एंडोमेट्रियोसिस में हर मासिक चक्र के दौरान ओवरी (अंडाशय) में रक्त इकट्ठा हो जाता है. धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ने लगता है और इकट्ठा हुआ रक्त चॉकलेट सिस्ट बना लेता है. इस कारण मासिक धर्म के दौरान दर्द होता है एवं गर्भधारण करने में भी समस्या हो जाती है. लेप्रोस्कोपिक (कीहोल) सर्जरी ही इसका एकमात्र उपाय है. लेज़र जैसी आधुनिक तकनीक ने अब इस तरह की सर्जरी को और भी आसान बना दिया है.

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 Chocolate Cyst
मेरी उम्र 52 वर्ष है. 2 साल पहले ही मुझे मेनोपॉज़ हो गया था. मेरी समस्या यह है कि मुझे बहुत ़ज़्यादा गर्मी लगने लगी है, यहां तक कि फैन चालू रहने पर भी मैं पसीने में भीगी होती हूं. मुझे इन दिनों बहुत चिड़चिड़ाहट होने लगी है और ग़ुस्सा भी बहुत आने लगा है, जिसके कारण सब मुझसे परेशान रहने लगे हैं. क्या हर स्त्री ऐसे दौर से गुज़रती है? क्या मेरी समस्या का कोई उपाय है?
– रजनी मल्होत्रा, हिसार.

जब 40 के बाद और 50 के पहले की उम्र में हार्मोन्स का स्तर गिरने लगता है, तब कई स्त्रियों में मेनोपॉज़ के लक्षण नज़र आने लगते हैं. इसी की वजह से ़ज़्यादा गर्मी महसूस होना, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, ग़ुस्सा, नींद न आना जैसी समस्याएं होने लगती हैं. ऐसे में आपके लिए सबसे अच्छा उपाय है एस्ट्रोजन के साथ हार्मोनल ट्रीटमेंट. इसके अलावा आजकल नॉन हार्मोनल थेरेपी भी ली जा सकती है, जिसमें सोया एक्सट्रैक्ट व विटामिन्स लिए जा सकते हैं. इस समय ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव भी ज़रूरी है. इसके लिए कैल्शियम सप्लीमेंट्स लें.

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Dr. Rajshree Kumar

डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
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