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Psychology Of Relationships
मैं फाइनल ईयर की छात्रा हूं. इंदौर में पली-बढ़ी हूं. आगे की पढ़ाई के लिए मुंबई आई हूं. यहां सब कुछ बहुत एडवांस्ड है. लोग काफ़ी खुले विचारों के हैं. मुझे यहां दोस्त बनाने में भी संकोच होता है. बहुत अकेला महसूस करती हूं. सोचती हूं, वापस इंदौर चली जाऊं.
– रोमा त्रिपाठी, मुंबई.

बदलाव कभी आसान नहीं होता. हमें एक रूटीन जीवन जीने की आदत होती है और उसमें थोड़ा भी बदलाव हमें परेशान कर देता है, पर बदलाव ही संसार का नियम है. जिस चीज़ से हमें डर लगता है या तक़लीफ़ होती है, उससे भागने की बजाय उसका सामना करना उचित है. अपनी सोच बदलें, लोगों और चीज़ों को देखने का नज़रिया बदलें. ख़ुद को भी थोड़ा आत्मविश्‍वासी बनाने का प्रयास करें. लोगों से मिलना-जुलना शुरू करें. धीरे-धीरे संकोच समाप्त हो जाएगा और देखते-देखते आप भी मुंबईकर बन जाएंगी, क्योंकि ये शहर किसी को अजनबी नहीं रहने देता. सबको गले लगाकर अपना बना लेता है, लेकिन थोड़ी कोशिश तो आपको भी करनी होगी. अपनी झिझक दूर करें और यह सोचना बिल्कुल छोड़ दें कि आप किसी छोटे या दूसरे शहर से आई हैं, क्योंकि हर शहर की अपनी ख़ूबियां व ख़ूबसूरती होती है.

मैं 35 साल की नौकरीपेशा महिला हूं. कुछ दिनों से अजीब-सी परेशानी में हूं. मेरा मैनेजर मुझे ग़लत तरी़के से परेशान करके, नौकरी छीन लेने की और मुझे बदनाम करने की धमकी दे रहा है. समझ में नहीं आ रहा है, क्या करूं? घर में बताऊं, तो सब नौकरी छोड़कर घर पर बैठने की सलाह देंगे.
– बबीता शर्मा, पुणे.

आप अकेले ही इस समस्या से नहीं जूझ रहीं, काफ़ी महिलाओं को इन बदतमीज़ियों से गुज़रना पड़ता है. आपको आवाज़ उठानी होगी और हिम्मत करनी होगी. आजकल दफ़्तरों में स्पेशल कमिटी होती है. आप उन पर भरोसा कर सकती हैं और मदद ले सकती हैं, पर भविष्य में दोबारा कोई आपके साथ ऐसा ना करे, उसके लिए सतर्क रहें. अपने कम्यूनिकेशन और पर्सनैलिटी में बदलाव लाएं. कॉन्फिडेंट बनें और पूरी तत्परता से अपने साथ हो रहे अन्याय व शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं. अपने अन्य सीनियर्स से भी बात करें और यदि सही राह दिखानेवाला न मिले, तो कोई कठोर कदम उठाने से पीछे न हटें. क़ानून का सहारा लें.

मेरी उम्र 32 साल है. मैं पिछले सात सालों से एक लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में हूं. जब भी शादी की बात करती हूं, वह कोई न कोई बहाना बनाकर मुझे समझा लेते हैं. घरवाले शादी के लिए दबाव डाल रहे हैं, पर मैं किसी और से शादी करने की सोच भी नहीं सकती. क्या करूं?
– नेहा सिंह, प्रयागराज.

आप कब तक इस तरह समय गंवाएंगी? घरवालों की चिंता स्वाभाविक है. आपको अपने प्रेमी से साफ़-साफ़ बात करनी होगी और एक अल्टीमेटम देना होगा. कहीं ऐसा न हो कि वो आपके भरोसे का फ़ायदा उठा रहा हो, इसलिए अपने बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर दें. ख़ुद पर विश्‍वास रखें. आपका जीवन और आपका भविष्य बहुत महत्वपूर्ण और क़ीमती है, किसी भी तरह से उससे समझौता करना नादानी होगी. समय रहते सही फैसला लें.

 

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Zeenat Jahan

ज़ीनत जहान
एडवांस लाइफ कोच व
सायकोलॉजिकल काउंसलर

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मासूम बचपन….. निश्छल मन में न जाने कितनी सही-ग़लत बातें घर कर जाती हैं. लेकिन जागरुक अभिभावकों के कारण कुछ बच्चे आगे निकल जाते हैं. वहीं ध्यान न देने पर कुछ शर्म-संकोच में उलझ कर रह जाते हैं. अतः बच्चों के बहुमुखी विकास के लिए उनका शर्म-संकोच से उबरना बेहद ज़रूरी है.

संकेत के माता-पिता उसे अनेक बार समझा चुके हैं कि जो प्रश्‍न या विषय क्लास में समझ में नहीं आता, उसे टीचर से दोबारा पूछ लेना चाहिए. चाहता तो संकेत भी यही है, लेकिन वो समझता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सारे बच्चे समझ गए और एक वो ही नहीं समझा है. हो सकता है, अगर वो टीचर से दोबारा समझाने के लिए कहे तो अन्य बच्चे उसे बेवकूफ़ समझने लगें. दुविधा व चिंता से उसका मन टूटने लगता है और उस विषय से मन हटने लगता है. साथ ही तनाव की स्थिति पीछा नहीं छोड़ती.

वार्षिक उत्सव में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए बच्चों का चयन हो रहा था. लगभग सभी बच्चे उत्साह से हर कार्यक्रम में भाग लेने के लिए उतावले हो रहे थे. सुकिता का मन भी हो रहा था, लेकिन संकोच के कारण बोल नहीं पाई. घर पर मां से अपने मन की बात कही. दूसरे दिन मां ने टीचर से बात की. टीचर ने उसे एक नाटक के रोल के लिए चुन लिया और फिर पूछा कि तुमने कल मुझसे क्यों नहीं कहा? इसका उत्तर सुचिता के पास नहीं था, बल्कि टीचर के इस प्रश्‍न से उसके चेहरे पर डर के भाव थे.

बच्चों के साथ अक्सर ऐसा हो जाता है, वे शर्म व संकोच के कारण कई बार पीछे रह जाते हैं. बाद में उन्हें पछतावा होता है, पर हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. फिर पिछड़ने लगते हैं, जिससे उनका आत्मविश्‍वास भी खोने लगता है. संकोची या शर्मीला व्यक्ति लोगों का नुक़सान कम ही करता है, लेकिन कभी-कभी अपना काफ़ी नुक़सान कर बैठता है. डॉ. अजीत दांडेकर कहते हैं, ङ्गङ्घमाता-पिता भी बच्चे के संकोच की तह में छिपी समस्याओं का अंदाज़ा नहीं लगा पाते हैं. शर्म एक भय है. सामाजिक व पारिवारिक स्थितियों से एक दूरी है. कोई भी नहीं चाहता कि वो ऐसी स्थिति से गुज़रे, फिर भी यह हो जाता है और इसकी वजह से ज़िंदगी के अनेक मौ़के हाथ से निकल जाते हैं.फफ कई बच्चे काफ़ी संवेदनशील होते हैं. शर्म व संकोच की भावना के साथ अंदर-ही-अंदर घुटन व पीड़ा झेलते हैं और जिसका नकारात्मक असर मनोवैज्ञानिक समस्याओं को जन्म देता है. शर्म या संकोच की भावना क्यों होती है? मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इसके कुछ सामान्य कारण हैं, जैसे- वंशानुगत. अध्ययनों के अनुसार यह स्वभाव वंशानुगत भी हो सकता है. संकोची स्वभाव के माता-पिता के बच्चे भी संकोची होते हैं. हालांकि अपवाद भी हो सकते हैं.

अधिक सुरक्षा देने वाले अभिभावकः जिन बच्चों को माता-पिता अपनी छत्र-छाया से ज़रा भी अलग नहीं होने देते, स्वतंत्र तौर पर कुछ भी नहीं करने देते, ऐसे बच्चे संकोची होते हैं.

आलोचनाः अधिक आलोचना भी बच्चे में संकोची भाव उत्पन्न करती है. उन्हें हर व़क़्त यही डर रहता है कि उनसे कोई ग़लती न हो जाए. ऐसे बच्चों में नकारात्मक भावना घर कर लेती है. अतः बच्चों को हर समय डराना-धमकाना या चिढ़ाना उचित नहीं है.
अभ्यास व अनुभव की कमीः पढ़ाई हो या कोई अन्य काम, अभ्यास व अनुभव की कमी बच्चों में आत्मविश्‍वास कम करती है, लिहाज़ा संकोच होने लगता है.

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संकोच व शर्म के कारण बच्चों को नई प्रकार की द़िक़्क़तों का सामना करना पड़ सकता है.

* प्रायः इन बच्चों के लिए दोस्ती निभा पाना मुश्किल होता है. ऐसे बच्चों के मन की बात मुश्किल से जानी जा सकती है. भावनाओं को व्यक्त करना  कठिन होता है.

* प्रभावशाली यानी, इफेक्टिव कम्युनिकेशन में इन बच्चों को कठिनाई होती है. सामाजिक स्थितियों का सामना करने से घबराते हैं.

* चूंकि स्वयं को भलीभांति व्यक्त नहीं कर पाते, अतः अक्सर ही मूर्ख व बेवकूफ़ माने जाते हैं, जो इनके आत्मविश्‍वास को कम करता है.
* स्कूल के माहौल में भी अपने से बेहतर बच्चों या टीचर के सामने बोलने से कतराते हैं. कक्षा में प्रश्‍न पूछने या प्रश्‍न का उत्तर मालूम होने के बावजूद  भी नहीं बोल पाते हैं. इस वजह से इनकी ओर शिक्षक का ध्यान कम हो जाता है. उपेक्षित महसूस करते हैं. कभी-कभी पढ़ाई में भी पिछड़ जाते हैं.

* अन्य क्रियाएं जैसे खेल-कूद या दूसरे कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं ले पाते हैं.

इसके लिए ज़रूरी है बच्चे को संकोच या शर्म से बाहर निकाला जाए. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यदि बच्चा अपने संकोच को खुलकर स्वीकार करता है तो संभवतः दूसरे लोग उसकी मदद कर सकते हैं. बच्चों को हर किसी के साथ बातचीत करने के लिए उत्साहित कीजिए. लेकिन हां, सही भाषा व सही शैली के लिए टोकते रहें, इससे उसमें आत्मविश्‍वास बढ़ेगा और संकोच कम होगा, इस प्रकार की शुरुआत बच्चे की आरंभिक अवस्था से ही शुरू कर देनी चाहिए. सही सामाजिक व्यवहार को विकसित कर उचित कार्यों के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए.
कभी भी सबके सामने उनसे ऐसे वाक्य जैसे, ङ्गङ्घक्यों शर्मा रहे होफफ आदि न कहें. ऐसे वाक्य सुन बच्चे और भी संकोची हो उठते हैं. ना ही दूसरों के सामने यह कहें कि बच्चा संकोची है. यदि कहना ही है तो इस तरह कह सकते हैं, “इसे सबके साथ मिक्स होने में थोड़ा व़क़्त लगता है.” कभी भी बच्चे की ड्रेस, हेयर स्टाइल या आदत का मज़ाक न बनाएं.

उसके साथ विश्‍वास का रिश्ता बनाएं. ईमानदारी व खुलापन रिश्तों को प्रगाढ़ बनाता है. जिन बच्चों को माता-पिता का विश्‍वास प्राप्त है, वो कम संकोची होते हैं. माता-पिता की आंखों में प्यार व स्नेह की भावना उनका आत्मविश्‍वास बढ़ाती है, सुरक्षा प्रदान करती है.
यह बहुत ज़रूरी है कि बच्चों को प्रभावशाली बातचीत का तरीक़ा सिखाया जाए. क्रोध व प्रशंसा को व्यक्त करने का सही ढंग सिखाया जाए. सही तरी़के से बातचीत करना एक सोशल स्किल है, जो सफलता के हर क़दम का अहम् हिस्सा है. सही भाषा व शब्दों का प्रयोग आवाज़ का उचित उतार-चढ़ाव, व्यवहार व आचरण संबंधी शब्द ये सभी बच्चों में सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं.
अमूमन बच्चों के विकास में अभिभावकों का व्यवहार महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. बच्चे अपने माता-पिता का अनुकरण करते हैं, इसलिए बच्चों की हर ख़ूबी या कमी के लिए माता-पिता ही ज़िम्मेदार हैं. वे ही उनके सामने सही या ग़लत उदाहरण पेश कर सकते हैं.

– प्रसून भार्गव

कुछ रस्में अब न निभाएं तो अच्छा है, थोड़े-से अपने रूल्स बनाएं तो अच्छा है… कभी बचपने में खो जाएं तो अच्छा है, कभी एकदम से बड़े हो जाएं तो अच्छा है… टुकड़ों में जीना अब छोड़ दिया है… परंपराओं को अब अपने हिसाब से मोड़ दिया है… छोड़ो ये शर्म-संकोच, कुछ पल अपने लिए भी चुराओ… जी लो खुलकर ज़रा अब, थोड़े बिंदास और बोल्ड हो जाओ.

लाज, हया, शर्म, संकोच, नज़ाकत, नफ़ासत… और भी न जाने किन-किन अलंकारों से महिलाओं को अब तक अलंकृत किया जाता रहा है. ख़ासतौर से भारत जैसे देश में- ‘शर्म तो स्त्री का गहना है…’ इस तरह के जुमले आम हैं. ऐसे में तमाम पारंपरिक दायरों और सदियों से चली आ रही सो कॉल्ड परंपराओं के ढांचे को तोड़कर, बोल्ड-बिंदास महिलाएं जब सामने आती हैं, तो उन पर कई तरह के प्रश्‍नचिह्न भी लगा दिए जाते हैं. लेकिन चूंकि अब व़क्त बदल चुका है, तो महिलाओं की भूमिका और अंदाज़ भी बदल गए हैं. यही वजह है कि आज आपको हर दूसरी महिला बिंदास नज़र आएगी. वहीं दूसरी ओर पुरुष शायद भूमिकाओं के इस बदलते दौर में ख़ुद को एडजस्ट करने के प्रयास में थोड़े संकोची हो रहे हैं.

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क्यों महिलाएं हो रही हैं बिंदास?

–  सबसे बड़ी वजह है कि वो पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं. इससे उनमें आत्मविश्‍वास और ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का एहसास बढ़ा है.
“अगर स्त्री-पुरुष एक समान हैं, तो स्त्रियों को संकोची होने की ज़रूरत ही क्या है?” यह कहना है 19 वर्षीया मुंबई की एक कॉलेज स्टूडेंट दिव्या का. दिव्या के अनुसार, “महिलाएं अपने हक़ के लिए लड़ना सीख गई हैं. वो आर्थिक रूप से सक्षम हो रही हैं. अपनी ज़िम्मेदारी ख़ुद उठाना चाहती हैं और अपनी ज़िंदगी से जुड़े बड़े-बड़े फैसले भी आसानी से लेती हैं. यह सकारात्मक बदलाव है, जिसका सबको स्वागत करना चाहिए.”

– एक सर्वे से यह बात सामने आई है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं अधिक एडल्ट जोक्स अपने पुरुष दोस्तों के साथ मैसेजेस के ज़रिए शेयर करती हैं. उनका मानना है कि एक मैसेज या जोक ही तो है, उसे शेयर करने में हर्ज़ ही क्या है? आजकल महिलाएं न स़िर्फ अपने निजी रिश्तों पर, बल्कि अपने अफेयर्स पर भी बात करने से नहीं हिचकिचातीं. अपने बॉयफ्रेंड्स और ब्रेकअप्स के बारे में बात करने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. इस संदर्भ में 28 वर्षीया शीतल का कहना है, “अब वो ज़माना नहीं रहा कि लोग आपको इन चीज़ों पर परखकर आपके चरित्र पर उंगली उठाएंगे. आख़िर हम भी इंसान हैं. इंसानी कमज़ोरियां व ख़ूबियां हम में भी हैं, तो भला दुनिया हमें क्यों जज करे? और दूसरी तरफ़ अगर कोई हम पर उंगली भी उठाए, तो हमें परवाह नहीं.”

–  एक अन्य सर्वे के मुताबिक़, पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं कमिटमेंट से ज़्यादा डरती हैं यानी रिलेशनशिप में अब वो बहुत जल्दी भावुक होकर शादी के लिए तैयार नहीं होतीं. डेटिंग के बाद भी वो पुरुषों की अपेक्षा शादी के लिए या तो मना कर देती हैं या फिर अधिक समय लेती हैं निर्णय लेने में.

– महिलाओं के बिंदास होने की एक और बड़ी मिसाल है कि आजकल लड़कियां शादी के मंडप में भी दहेज के विरोध में उठ खड़ी होने का साहस दिखाने लगी हैं. उन्हें अब यह डर नहीं रहा कि कल को कोई उनसे शादी के लिए तैयार होगा या नहीं, पर वो अपने व अपने परिवार के स्वाभिमान की ख़ातिर क़दम उठाने में संकोच नहीं करतीं.

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क्या मर्द संकोची हो रहे हैं?

कई महिलाओं का यह भी मानना है कि भारतीय पुरुषों में आत्मविश्‍वास की कमी है और उन्हें ग्रूमिंग की ज़रूरत है. उन्हें यह भी नहीं पता कि महिलाओं के साथ किस तरह से व्यवहार करना चाहिए. इस संदर्भ में अधिक जानकारी के लिए हमने बात की सायकोथेरेपिस्ट डॉ. चित्रा मुंशी से-

–  दरअसल महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता बढ़ी है. इसे आप उनका बिंदास होना कहें या फिर अपने लिए ज़मीन तलाशने की कोशिश की सफलता की शुरुआत. जहां तक संकोच की बात है, तो संकोच दोनों में ही होता है और यह कोई नकारात्मक भाव नहीं है, जब तक कि वो आपके रिश्ते या प्रोफेशन को प्रभावित नहीं कर रहा. संकोच या लिहाज़ के कारण ही हम मर्यादा व अनुशासन में रहने की कोशिश करते हैं और अपनी सीमाएं बहुत जल्द नहीं लांघ पाते.

– पुरुषों को संकोची कहना यहां सही नहीं होगा, क्योंकि वो संकोची नज़र आ रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि उनमें शेयरिंग की आदत नहीं होती, अपने सीक्रेट्स से लेकर तमाम बातें वो दिल में ही रखते हैं. दरअसल, पुरुषों की तार्किक शक्ति काफ़ी अच्छी होती है, उनके लिए 2+2=4 ही होगा, लेकिन महिलाएं भावुक होती हैं. वो हर बात को भावनाओं से जोड़कर देखती हैं. जबकि पुरुषों को लगता है कि अगर कोई बात नहीं भी बताई या शेयर नहीं की, तो भी क्या फ़र्क़ पड़ता है. ऐसे में उनके लिए कहीं-कहीं संकोच एक बचाव का काम करता है.

– मेरे पास कुछ ऐसे पुरुष भी आते हैं, जो यह तर्क भी देते हैं कि मैं छिपा नहीं रहा, बस, मैं बता नहीं रहा यानी मैंने झूठ नहीं बोला, बल्कि मैंने तथ्य (फैक्ट्स) नहीं बताया.

– पुरुष ज़िंदगी का 80% समय ऑफिस व अपने काम में बिताते हैं, इसलिए वो घरवालों से भी उसी तरह डील करने लगते हैं, जैसे अपने कलीग्स या सबऑर्डिनेट्स से.

– दूसरी ओर लड़कियों को हमारे समाज व परिवार में पारंपरिक व सांस्कृतिक तौर पर ही प्रशिक्षित किया जाता है, ऐसे में जब आज की लड़कियां आत्मनिर्भर व आत्मविश्‍वासी हो रही हैं, तो वो पुरुषों की तरह सोचना चाहती हैं. चाहे ज़िंदगी हो या रिश्ते- हर स्तर पर पुरुषों से ही मुक़ाबला कर रही हैं, क्योंकि मुख्य रूप से वो बराबरी की तलाश में हैं. ऐसे में वो सबसे पहले उन बंदिशों को अपनी ज़िंदगी से हटाना चाहती हैं, जो अब तक उन्हें बराबरी की तलाश से रोक रही थीं.

– लेकिन जिस तेज़ी से किसी लड़की की सोच बदल रही है, हमारा समाज उस तेज़ी से नहीं बदल रहा, इसलिए अचानक बराबरी कर लेना संभव नहीं. इसमें लंबा व़क्त लगेगा और बराबरी की इस चाह में कोई ग़लत रास्ता चुनना या ज़िंदगी को जीने का ग़लत अंदाज़ चुन लेना भी सही नहीं है. कई बार वो जोश में ऐसे निर्णय भी ले लेती हैं, जो ख़ुद उनके लिए सही नहीं होते और असुरक्षित भी होते हैं. इसलिए सतर्क रहने में कोई बुराई नहीं.

– कई बार न चाहते हुए भी समाज की सोच के अनुरूप व्यवहार करना पड़ता है, स्वयं अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए भी, क्योंकि हम अचानक सबकी सोच व आसपास का माहौल नहीं बदल सकते. संतुलन बेहद ज़रूरी है और हमें अपनी सीमारेखा ख़ुद तय करनी होगी. समाज, परिवार और अनुशासन भी ज़रूरी हैं, क्योंकि हमारी अपनी सुरक्षा भी ज़रूरी है.

– कई बार बात स्त्री-पुरुष की होती ही नहीं, स़िर्फ आसपास के वातावरण, माहौल और परिस्थितियों को जांच-परखकर समझदारी से व्यवहार करने की होती है.

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ऐसे काम जो महिलाओं को और भी बिंदास बनाते हैं-

– बस कंडक्टर से लेकर लोकल ट्रेन और ऑटो ड्राइव करने से भी लड़कियां पीछे नहीं हटतीं. करियर से लेकर अपनी पर्सनल लाइफ में वो एक्सपेरिमेंट करने से अब डरती नहीं. कोई क्या कहेगा या क्या सोचेगा, इससे उन्हें अब अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ता.  इस संदर्भ में 32 वर्षीया मोना शर्मा का कहना है, “मुझे अपनी ज़िंदगी कैसे जीनी है, यह मैं तय करूंगी, कोई और नहीं. मैं अक्सर अपने फ्रेंड्स के साथ वीकेंड पर पब जाती हूं या पार्टी करती हूं. मुझे देखकर लोगों को यह लगता है कि मैं लापरवाह क़िस्म की हूं. मेरी एक बेटी है और मेरे पति भी मुझे कहते हैं कि कुछ व़क्त अपने लिए भी निकालना ज़रूरी है. मेरे परिवार को मेरी लाइफस्टाइल से समस्या नहीं है, इसके बाद भी लोगों की मेरे बारे में कोई अच्छी राय नहीं है. पर मेरी बेटी और पति हमेशा मुझे समझाते हैं कि दूसरों की राय पर अपनी ज़िंदगी के रूल्स मत बनाओ.”

– कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि जहां समाज का एक बड़ा तबका आज भी महिलाओं को लेकर रूढ़िवादी सोच रखता है, वहीं ऐसे लोगों की तादाद बढ़ भी रही है, जो व़क्त के साथ बदलना और ढलना पसंद करते हैं. अब पुरुष भी घर का काम करने में संकोच नहीं करते. अगर पत्नी का करियर अच्छा है, तो अपने करियर को पीछे रखकर उन्हें आगे बढ़ाने का हौसला भी रखने लगे हैं. हालांकि कम हैं ऐसे लोग, लेकिन हैं ज़रूर. इसलिए महिलाएं भी बिंदास हो रही हैं, बिंदास होने में बुराई नहीं, पर संतुलन का नियम तो हर जगह लागू होता है. जहां संकोच की ज़रूरत हो, ज़रूर संकोच करें. ध्यान रहे, समझदारी व परिपक्वता से व्यवहार करना किसी भी बिंदास महिला को आउटडेटेड नहीं बना देगा.

– गीता शर्मा