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अकबर जानते थे कि बीरबल के पास हर सवाल का जवाब है और वो बीरबल की बुद्धिमत्ता से भी काफ़ी प्रभावित थे. फिर भी वो समय-समय पर उसे परखते रहते थे और अपने मन में आए सवालों के जवाब मांगते रहते थे. इन दोनों का ऐसा ही एक रोचक किस्सा है,  जिसमें अकबर ने बीरबल से ईश्वर से जुड़े तीन प्रश्न पूछे थे.
वो तीन प्रश्न थे-
1. ईश्वर कहां रहता है ?
2. ईश्वर कैसे मिलता है ?
3. ईश्वर करता क्या है?
जब अकबर ने ये प्रश्न पूछे तो बीरबल बहुत हैरान हुए और उन्होंने कहा कि इन प्रश्नों के उत्तर वह कल बताएंगे. इतना कहकर बीरबल घर लौट आए. बीरबल इन प्रश्नों को लेकर काफ़ी सोच-विचार कर रहे थे, जिसे देख बीरबर के पुत्र ने चिंता का कारण पूछा. बीरबल ने अकबर के तीन प्रश्नों का क़िस्सा बता दिया.

बीरबल के पुत्र ने कहा कि परेशान ना हों वह खुद कल दरबार में बादशाह को इन तीनों प्रश्नों के जवाब देगा और अगले दिन बीरबल अपने पुत्र के साथ दरबार में पहुंचे. बीरबल ने बादशाह से कहा कि आपके तीनों प्रश्नों के जवाब तो मेरा पुत्र भी दे सकता है.

अकबर ने कहा, ठीक है, तो सबसे पहले बताओ कि ईश्वर कहां रहता है?

प्रश्न सुनकर बीरबल के पुत्र ने चीनी मिला हुआ दूध मंगाया और उसने वह दूध अकबर को दिया और कहा कि चखकर बताइए दूध कैसा है?

अकबर ने दूध चखकर बताया कि यह मीठा है.

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इस पर बीरबल के पुत्र ने कहा कि क्या आपको इसमें चीनी दिख रही है?

अकबर ने कहा, नहीं, चीनी तो नहीं दिख रही है, वह तो दूध में घुली हुई है.

बीरबल के पुत्र ने कहा, जहांपनाह, ठीक इसी तरह ईश्वर भी संसार की हर चीज़ में घुला हुआ है, लेकिन दूध में घुली हुई चीनी की तरह दिखाई नहीं देता है.

बादशाह अकबर जवाब से संतुष्ट हो गए.

अकबर ने दूसरा प्रश्न पूछा, ठीक है तो अब ये बताओ कि ईश्वर कैसे मिलता है?

इस प्रश्न का जवाब देने के लिए बीरबल के पुत्र ने इस बार दही मंगवाया और अकबर को दही देते हुए कहा, जहांपनाह, क्या आपको इसमें मक्खन दिखाई दे रहा है?

अकबर ने कहा, दही में मक्खन तो है, लेकिन दही मथने पर ही मक्खन दिखाई देगा.

बीरबल के पुत्र ने कहा, जी हां, ठीक इसी प्रकार ईश्वर भी मन का मंथन करने पर ही मिल सकते हैं.

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बादशाह अकबर इस जवाब से भी संतुष्ट हो गए.

अकबर ने तीसरा प्रश्न पूछा, ईश्वर करता क्या है?

बीरबर के पुत्र ने कहा, इस प्रश्न के जवाब के लिए आपको मुझे गुरु मानना होगा.

बादशाह अकबर ने कहा, ठीक है, अब से तुम मेरे गुरु और मैं तुम्हारा शिष्य.

बीरबल के पुत्र ने आगे कहा, गुरु हमेशा ऊंचे स्थान पर बैठता है और शिष्य हमेशा नीचे बैठता है.

बादशाह अकबर तुरंत ही अपने सिंहासन से उठ गए और बीरबल के पुत्र को सिंहासन पर बैठकर खुद नीचे बैठ गए.

सिंहासन पर बैठते ही बीरबल के पुत्र ने कहा, जहांपनाह, यही आपके तीसरे प्रश्न का जवाब है. ईश्वर राजा को रंक बनाता है और रंक को राजा बना देता है.

बादशाह अकबर इस जवाब से भी संतुष्ट हो गए और बीरबल के पुत्र की बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो उसको ईनाम दिया!

सीख: धैर्य और सूझबूझ से हर प्रश्न का जवाब और हर समस्या का हल पाया जा सकता है!

एक जंगल में महाचतुरक नामक सियार रहता था. वो बहुत तेज़ बुद्धि का था और बेहद चतुर था. एक दिन जंगल में उसने एक मरा हुआ हाथी देखा, अपने सामने भोजन को देख उसकी बांछे खिल गईं, लेकिन जैसे ही उसने हाथी के मृत शरीर पर दांत गड़ाया, चमड़ी मोटी होने की वजह से, वह हाथी को चीरने में नाकाम रहा.
वह कुछ उपाय सोच ही रहा था कि उसे सामने से सिंह आता दिखाई दिया, सियार ने बिना घबराए आगे बढ़कर सिंह का स्वागत किया और हाथ जोड़कर कहा- स्वामी आपके लिए ही मैंने इस हाथी को मारकर रखा है, आप इसका मांस खाकर मुझ पर उपकार करें! सिंह ने कहा- मैं किसी और के हाथों मारे गए जीव को खाता नहीं हूं, इसे तुम ही खाओ.
सियार मन ही मन खुश तो हुआ, पर उसकी हाथी की चमड़ी को चीरने की समस्या अब भी हल न हुई थी. थोड़ी देर में उस तरफ से एक बाघ भी आता नज़र आया. बाघ ने मरे हाथी को देखकर अपने होंठ पर जीभ फिराई, तों सियार ने उसकी मंशा भांपते हुए कहा- मामा, आप इस मृत्यु के मुंह में कैसे आ गए? सिंह ने इसे मारा है और मुझे इसकी रखवाली करने को कह गया है. एक बार किसी बाघ ने उनके शिकार को जूठा कर दिया था, तब से आज तक वे बाघ जाति से नफरत करने लगे हैं. आज तो हाथी को खाने वाले बाघ को वह मार ही गिराएंगे.
यह सुनते ही बाघ डर गया और फ़ौरन वहां से भाग खड़ा हुआ. थोड़ी ही देर में एक चीता आता हुआ दिखाई दिया, तो सियार ने सोचा कुछ तो ऐसा करूं कि यह हाथी की चमड़ी भी फाड़ दे और मांस भी न खा पाए!

Panchatantra Story
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उसने चीते से कहा- मेरे प्रिय भांजे, इधर कैसे? क्या बात है कुछ भूखे भी दिखाई पड़ रहे हो? सिंह ने इस मरे हुए हाथी की रखवाली मुझे सौंपी है, पर तुम इसमें से कुछ मांस खा सकते हो. मैं तुम्हें सावधान कर दूंगा, जैसे ही सिंह को आता हुआ देखूंगा, तुम्हें सूचना दे दूंगा, तुम फ़ौरन भाग जाना. ऐसे तुम्हारा पेट भी भर जाएगा और जान भी बच जाएगी!
चीते को सियार की बात और योजना अच्छी तो लगी लेकिन डर के कारण उसने पहले तो मांस खाने से मना कर दिया, पर सियार के विश्वास दिलाने पर वो तैयार हो गया. सियार मन ही मन प्रसन्न था कि चीते के तेज़ दांत उसका काम कर देंगे! चीते ने पलभर में हाथी की चमड़ी फाड़ दी पर जैसे ही उसने मांस खाना शुरू किया, दूसरी तरफ देखते हुए सियार ने घबराकर कहा- जल्दी भागो सिंह आ रहा है.
इतना सुनते ही चीता बिना देर किए सरपट भाग खड़ा हुआ. सियार बहुत खुश हुआ और उसने कई दिनों तक उस विशाल हाथी का मांस खाकर दावत उड़ाई!

उस सियार ने अपनी चतुराई और सूझ-बूझ से बड़ी ही आसानी से अपने से बलवान जानवरों का सामना करते हुए उन्हीं के ज़रिए अपनी समस्या का हल निकाल लिया!

सीख: बुद्धि का बल शरीर के बल से कहीं बड़ा होता है और अगर सूझबूझ से काम किया जाए तो कठिन से कठिन समस्या आसानी से हल हो सकती है! इसलिए समस्या देखकर या ख़तरा देखकर घबराने की बजाए चतुराई से काम लें!

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रोज़ की तरह बादशाह अकबर के दरबार की कार्यवाही चल रही थी, सभी अपनी-अपनी समस्याएं लेकर आ रहे थे, जिनका समाधान बादशाह कर रहे थे. इसी बीच एक दरबारी हाथ में शीशे का एक मर्तबान लिए वहां आया, तो बादशाह ने हैरानी से पूछा कि क्या है इस मर्तबान में ?

वह बोला, महाराज इसमें रेत और चीनी का मिश्रण है.
बादशाह ने पूछा कि वह किसलिए ?

दरबारी ने कहा महाराज मैं माफी चाहता हूं, लेकिन दरबारी हमने बीरबल की बुद्धिमत्ता की इतनी बातें सुनी हैं तो हम बीरबल की क़ाबिलियत को परखना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि वह रेत से चीनी का दाना-दाना अलग कर दे लेकिन बिना पानी के प्रयोग के.
बादशाह बीरबल से मुखातिब हुए और मुस्कुराते हुए बोले- बीरबल, रोज ही तुम्हारे सामने एक नई समस्या रख दी जाती, तुम्हें बिना पानी में घोले इस रेत में से चीनी को अलग करना है.
बीरबल ने बड़े आराम से कहा- कोई समस्या नहीं जहांपना, यह तो मेरे बाएं हाथ का काम है.
यह कहकर बीरबल ने वह मर्तबान उठाया और दरबार से बाहर का रुख़ किया. बाकी दरबारी भी पीछे थे.

Akbar-Birbal Ki Kahani
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बीरबल बाहर बाग में पहुंचकर रुके और मर्तबान से भरा सारा मिश्रण आम के एक बड़े पेड़ के चारों ओर बिखेर दिया.
इस व्यक्ति ने पूछा कि यह तुम क्या कर रहे हो ?
बीरबल ने कहा- यह तुम्हें कल पता चलेगा. इसके बाद सभी दरबार में लौट आए.
अगले दिन सुबह फिर वे सभी उस आम के पेड़ के निकट जा पहुंचे और सब हैरान थे कि वहां अब केवल रेत पड़ी थी, चीनी के सारे दाने चींटियां बटोरकर अपने बिलों में पहुंचा चुकी थीं. कुछ चींटियां अभी भी चीनी के दाने घसीटकर ले जाती दिखाई दे रही थीं.
उस व्यक्ति ने पूछा कि लेकिन सारी चीनी कहां चली गई ?
बीरबल ने धीरे से उसके कान फुसफुसाकर कहा- रेत से अलग हो गई.

यह सुनकर सभी जोरों से हंस पड़े और वह व्यक्ति छोटा सा मुंह लेकर वहां से खिसक लिया.
बादशाह अकबर समेत सभी दरबारी बीरबल की चतुराई का गुणगानकरने लगे.

सीख: अगर कोई गुणी और चतुर है तो उससे सीख लो, ना कि ईर्ष्या करो, क्योंकि किसी को नीचा दिखाने का प्रयास आपके लिए हानिकारक हो सकता है.

मित्र की सलाह
बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक धोबी रहता था लेकिन वो बहुत कंजूस था. उसका एक गधा था, धोबी दिनभर उससे काम कराता और वो गधा दिनभर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता. धोबी ना सिर्फ़ कंजूस था बल्कि निर्दयी भी था. अपने गधे को वो भूखा ही रखता था और उसके लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था. बस रात को उसे चरने के लिए खुला छोड देता था. लेकिन पास में कोई चरागाह भी नहीं था इसलिए गधा बहुत कमज़ोर और दुर्बल हो गया था.
एक रात वो गधा चारे की तलाश में घूम रहा था तो उसकी मुलाकात एक गीदड़ से हुई. गीदड़ ने उससे पूछा कि वो इतना कमज़ोर क्यों है?
गधे ने अपना दुख उसे बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है और उसका मालिक उसे खाने को कुछ नहीं देता, इसलिए वो रात को अंधेरे में खाने की तलाश करता रहता है.
गीदड़ बोला, मित्र अब तुम्हें घबराने की बात नहीं, समझो अब तुम्हारे दुःख और भुखमरी के दिन ख़त्म. यहां पास में ही एक बड़ा सब्जियों और फलों का बाग़ है. वहां तरह-तरह की सब्जियां और मीठे फल उगे रहते हैं. हर तरह की सब्ज़ी और फल की बहार है. मैंने बाग़ में घुसने का गुप्त मार्ग भी बना रखा है. मैं तो हर रात अंदर घुसकर छककर खाता हूं. तुम भी मेरे साथ आया करो.
बस फिर क्या था गधा भी गीदड़ के साथ हो लिया और बाग़ में घुसकर महीनों के बाद पहली बार गधे ने भरपेट खाना खाया. अब यह हर रात का सिलसिला हो गया था. दोनों रात भर बाग़ में ही रहये और दिन निकलने से पहले गीदड़ जंगल की ओर चला जाता और गधा अपने धोबी के पास आ जाता.
धीरे-धीरे गधे की कमज़ोरी दूर होने लगी, उसका शरीर भरने लगा, बालों में चमक आने लगी और वो खुश रहने लगा, क्योंकि वो अपनी भुखमरी के दिन बिल्कुल भूल गया था.

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एक रात खूब खाने के बाद गधे का मूड काफ़ी अच्छा हो गया और वो झूमने लगा. वो अपना मुंह ऊपर उठाकर कान फडफडाने लगा और लोटने लगा. गीदड़ को शंका हुई तो उसने चिंतित होकर पूछा कि आख़िर तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना?
गधा बोला आज मैं बहुत खुश हूं और फिर आंखें बंद करके मस्त स्वर में बोला कि मेरा दिल गाना गाने का कर रहा हैं. अच्छा भोजन करने के बाद मैं प्रसन्न हूं. एक गाना तो बनता है. सोच रहा हूं ढेंचू राग गाऊँ!
गीदड़ उसकी बात सुन घबरा गया और उसने तुरंत चेतावनी दी मेरे भाई ऐसा न करना, क्योंकि हम दोनों यहां चोरी कर रहे हैं ऐसे में तुम्हारा गाना सुन माली जाग जाएगा और हम मुश्किल में पड़ जाएँगे. मुसीबत को न्यौता मत दो.
गधे ने गीदड़ को देखा और बोला, तुम जंगली के जंगली ही रहोगे. हम ख़ानदानी गायक हैं, तुम संगीत के बारे में क्या जानो?
गीदड़ ने फिर समझाया कि भले ही मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता, लेकिन मैं जान बचाना जानता हूं. तुम ज़िद छोडो, उसी में हम दोनों की भलाई है, वर्ना तुम्हारी ढेंचू सुन के माली जाग जाएगा.

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गधे ने गीदड़ की बात का बुरा मानकर कहा, तुम मेरा अपमान कर रहे हो, तुमको मेरा राग बेसुरा लगता है जबकि हम गधे एक लय में रेंकते हैं, जो तुम जैसे मूर्खों की समझ में नहीं आ सकता.
गीदड़ बोला चलो माना कि मैं मूर्ख जंगली हूं लेकिन एक मित्र के नाते मेरी सलाह मानो और अपना मुंह मत खोलो, वर्ना मालिक भी जाग जाएगा.
गधा हंसकर बोला- अरे मूर्ख गीदड़! मेरा राग सुनकर बाग़ के चौकीदार तो क्या, बाग़ का मालिक भी फूलों का हार लेकर आएगा और मेरे गले में डालकर मेरा सम्मान करेगा.

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गीदड़ ने को लगा इस मूर्ख को समझाने से कोई फायदा नहीं, उसने चतुराई से काम लिया और हाथ जोडकर बोला, मेरे प्यारे गधे भाई, मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है, तुम महान गायक हो और मैं तुम्हारे गले में डालने के लिए फूलों की माला लाना चाहता हूं, तुम मेरे जाने के दस मिनट बाद ही गाना शुरू करना, ताकि मैं गाना समाप्त होने तक फूल मालाएं लेकर लौट सकूं.
गधे ने गर्व से सहमति में सिर हिलाया और गीदड़ वहां से जंगल की ओर भाग गया. गधे ने उसके जाने के कुछ समय बाद मस्त होकर रेंकना शुरू किया. उसकी आवाज़ सुनते ही बाग़ के चौकीदार जाग गए और लाठी लेकर दौडे. वहां पहुंचते ही गधे को देखकर चौकीदार बोला, अच्छा तो तू है, तू ही वो दुष्ट गधा है जो हमारा बाग़ में चोरी से फल सब्ज़ी खाता था.
बस उसके बाद गधे पर डंडों की बरसात होने लगी और कुछ ही देर में गधा अधमरा होकर गिरकर बेहोश हो गया!

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि अगर कोई हमारा मित्र हमारी भलाई के लिए कुछ समझाता है, तो उसे मान लेना चाहिए. अपने हितैषियों की सलाह पर गौर करना चाहिए ना कि अपने घमंड में ग़लत रास्ता अपनाकर खुद को मुसीबत में डालना चाहिए! अपनी कमज़ोरियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए वर्ना नतीजा बुरा हो सकता है.

काफ़ी समय पहले एक गांव में एक किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था. किसान बूढ़ा था, लेकिन उसकी पत्नी जवान थी और इसी वजह से किसान की पत्नी अपने पति से खुश नहीं थी. वो हमेशा दुखी रहती थी, क्योंकि उसके मन में एक युवा साथी का सपना पल रहा था. यही वजह थी कि वो हमेशा बाहर घूमती रहती थी.

उसकी मन की दशा एक ठग भांप गया और वो उस महिला का पीछा करने लगा और एक दिन उस ठग को मौक़ा मिल ही गया. उसने किसान की पत्नी को ठगने के इरादे से एक झूठी कहानी सुनाई. ठग ने कहा- मेरी पत्नी का देहांत हो चुका है और अब मैं अकेला हूं. मैं तुम्हारी सुंदरता पर मोहित हो गया हूं. मैं तुम्हारे साथ ही जीवन यापन करना चाहता हूं और तुम्हें अपने साथ शहर ले जाना चाहता हूं.

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किसान की पत्नी यह सुनते ही खुश हो गई. वो तैयार हो गई और झट से बोली- मैं तुम्हारे साथ चलूंगी, लेकिन मेरे पति के पास बहुत धन है. पहले मैं उसे ले आती हूं. उन पैसों से हमारा भविष्य सुरक्षित होगा और हम जीवनभर आराम से रहेंगे. यह सुनकर चोर ने कहा कि ठीक है तुम जाओ और कल सुबह इसी जगह आना मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.

किसान की पत्नी ने सारी तैयारी कर ली. जब उसने देखा कि पति गहरी नींद में है तो उसने सारे गहने और पैसों को पोटली में बांधा और ठग के पास चली गई. दोनों दूसरे शहर की ओर निकल गए. इसी बीच ठग के मन में बार बार यही विचार आता रहा कि इस महिला को साथ ले जाने में ख़तरा है, कहीं इसका पति इसे खोजते हुए पीछे ना आ जाए और मुझ तक पहुंच गया तो ये सारा धन भी हाथ से जाएगा.

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ठग अब उस महिला से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचने लगा. तभी रास्ते में एक नदी मिली. नदी को देखते ही ठग को एक तरकीब सूझी और वह महिला से बोला- यह नदी काफ़ी गहरी है, इसलिए इसे मैं तुम्हें पार करवाऊंगा, लेकिन पहले मैं यह पोटली नदी के उस पार रखूंगा फिर तुम्हें साथ ले जाऊंगा, क्योंकि दोनों को साथ ले जाना संभव नहीं. महिला ने ठग पर ज़रा भी शक नहीं किया और वो फ़ौरन मान गई, उसने कहा- हां, ऐसा करना ठीक रहेगा. इसके अलावा ठग ने महिला के पहने हुए गहने भी उतरवा के पोटली में रख लिए, उसने कहा भारी ज़ेवरों के साथ नदी पार करने में बाधा हो सकती है.

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बस फिर क्या था, ठग मन ही मन खुश हुआ और पोटली में बंधा धन लेकर नदी के पार चला गया. किसान की पत्नी उसके लौटने का इंतजार करती रही, लेकिन वो फिर कभी लौटकर नहीं आया. किसान की पत्नी को अपनी बेवक़ूफ़ी पर रोना आने लगा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. पैसे भी गए, इज़्ज़त भी गई और वो कहीं की ना रही.

सीख : ग़लत कर्मों और धोखेबाज़ी का फल हमेशा बुरा ही होता है. रिश्तों में ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी और ख़ुशी होती है. जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है, जैसी करनी वैसी भरनी!

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अकबर-बीरबल की कहानी: सोने के सिक्के (Akbar-Birbal Tale: Gold Coins)

बीरबल की तेज़ बुद्धि के जितने अकबर कायल थे, उतना ही उनसे ईर्ष्या रखनेवाले लोग भी थे. इसी कड़ी में थे अकबर के एक रिश्तेदार भी. उनको बीरबल से बहुत ईर्ष्या थी, उन्होंने एक बार बादशाह अकबर से कहा- क्यों न बीरबल को हटाकर उसकी जगह मुझे नियुक्त किया जाए, क्योंकि मैं बीरबल की तुलना में अधिक सक्षम हूं.

इससे पहले कि बादशाह फैसला ले पाते, बीरबल को इस बात की भनक पड़ गई. बीरबल ने तुरंत ही इस्तीफा दे दिया और बादशाह अकबर के रिश्तेदार को बीरबल की जगह नियुक्त कर दिया गया.

बादशाह ने नए मंत्री परीक्षा लेनी चाही. बादशाह ने उसे 300 सोने के सिक्के दिए और कहा- इन सिक्कों को इस तरह खर्च करो कि 100 सिक्के मुझे इस जीवन में ही मिलें, 100 सिक्के दूसरी दुनिया में मिलें और आखिरी 100 सिक्के न यहां मिलें और न वहां मिलें.

बादशाह की इस पहेली ने मंत्री को असमंजस की स्थिति में डाल दिया. उसकी रातों की नींद हराम हो गई. यह देख मंत्री की पत्नी ने कहा आप परेशान क्यों हैं? मंत्री ने राजा की पहेली वाली बात बताई और कहा कि उनकी इस पहेली ने दुविधा में फंसा दिया है.

मंत्री की पत्नी ने उनको सुझाव दिया कि क्यों न बीरबल से सलाह ली जाए. पत्नी की बात सुनकर वह बीरबल के पास पहुंच गया. बीरबल ने सारा किस्सा सुना तो कहा कि तुम मुझे यह सोने के सिक्के दे दो, बाकी मैं सब संभाल लूंगा.

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बीरबल सोने के सिक्कों से भरी थैली लेकर शहर की गलियों में घूमने लगे. वहां उनकी नज़र एक अमीर व्यापारी पर पड़ी,ल जो अपने बेटे की शादी का जश्‍न मना रहा था. बीरबल ने 100 सोने के सिक्के निकालकर उस व्यापारी को दे दिए और कहा- बादशाह अकबर ने तुम्हारे बेटे की शादी की शुभकामनाएं और आशीर्वाद स्वरूप यह 100 सोने के सिक्के भेंट दिए हैं.

यह सुनकर व्यापारी को बड़ा ही गर्व महसूस हुआ कि राजा ने इतना महंगा उपहार उन्हें दिया है. उस व्यापारी ने बीरबल को सम्मानित किया और उन्हें राजा के लिए उपहार स्वरूप बड़ी संख्या में महंगे उपहार और सोने के सिक्कों से भरा हुआ थैला थमा दिया.

अगले दिन बीरबल शहर के ऐसे क्षेत्र में गए जहां गरीब लोग रहते थे. उन्होंने 100 सोने के सिक्कों से भोजन और कपड़े खरीदे और उन्हें बादशाह अकबर के नाम पर गरीबों में बांट दिया.

जब बीरबल वापस आए, तो उन्होंने संगीत और नृत्य का एक कार्यक्रम आयोजित किया जहां उन्होंने 100 सोने के सिक्के खर्च कर दिए.

अगले दिन बीरबल बादशाह अकबर के दरबार में पहुंचे और घोषणा कर दी कि उसने वह काम किया है जो उनके दामाद नहीं कर पाए. अकबर यह जानना चाहते थे कि बीरबल ने यह सब कैसे किया.

बीरबल ने सिलसिलेवार पूरी बात व घटना बताई और कहा कि जो धन मैंने व्यापारी को उसके बेटे की शादी में दिया था वह वापस आप तक पहुंच गया और जो धन मैंने गरीबों में बांटा, वह धन आपको दूसरी दुनिया में जाकर मिलेगा और जो धन मैंने नृत्य और संगीत में खर्च कर दिया, वह आपको ना यहां मिलेगा और न वहां मिलेगा.

यह सुनकर अकबर के दामाद को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और बीरबल को अपना स्थान वापस मिल गया.

सीख: नेक कार्य व दान में खर्च किया गया धन ईश्‍वर के आशीर्वाद में परिवर्तित हो जाता है और उसका फल हमें ज़रूर मिलता है, जबकि ऐशो-आराम या गलत उद्देश्यों कार्यों में खर्च हुआ पैसा किसी काम का नहीं होता.

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Panchtantra Story

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पंचतंत्र की कहानी: जब शेर जी उठा… (Panchtantra Story: The Lion That Sprang To Life)

एक नगर में चार दोस्त रहते थे. उनमें से तीन बड़े वैज्ञानिक थे, किन्तु बुद्धिरहित थे, जबकि चौथा वैज्ञानिक नहीं था, पर वह बहुत समझदार और बुद्धिमान था. चारों ने सोचा कि उनकी विद्या का लाभ तभी मिल सकता है, जब वे देश-विदेश में जाकर धन संग्रह करें. यही सोचकर वे यात्रा पर निकल पड़े.

कुछ दूर जाकर उनमें से सबसे बड़े ने कहा- हम चारों में एक विद्या-शून्य है, वह स़िर्फ बुद्धिमान है, पर हमारी तरह वैज्ञानिक नहीं. धनोपार्जन के लिये विद्या आवश्यक है. हम अपनी विद्या के चमत्कार से लोगों को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए हम अपने धन का कोई भी भाग इस विद्याहीन को नहीं देंगे. वह चाहे तो घर वापिस जा सकता है.

दूसरे ने भी इस बात का समर्थन किया, किन्तु, तीसरे ने कहा- नहीं, यह बात उचित नहीं है. बचपन से ही हम एक-दूसरे के सुख-दुःख के सहभागी रहे हैं. हम जो भी धन कमायेंगे, उसमें इसका हिस्सा रहेगा. अपने-पराये की गणना छोटे दिल वालों का काम है. हमें उदारता दिखलानी चाहिये.

उसकी बात मानकर चारों आगे चल पड़े. थोड़ी दूर जाकर उन्हें जंगल में एक शेर का मृत-शरीर मिला. उसके अंग-प्रत्यंग बिखरे हुए थे. तीनों वैज्ञानिकों ने कहा- क्यों न हम अपनी शिक्षा की परीक्षा करें. विज्ञान के प्रभाव से हम इस मृत-शरीर में नया जीवन डाल सकते हैं. यह कह कर तीनों उसकी हड्डियां बटोरने और बिखरे हुए अंगों को मिलाने में लग गये. एक ने अस्थियां इकट्ठी कीं, दूसरे ने चमड़ी, मांस आदि, तो तीसरे ने प्राणों के संचार की प्रक्रिया शुरू की.

इतने में चौथे मित्र ने उन्हें सावधान करते हुए कहा- तुम लोग अपनी विद्या के प्रभाव से शेर को जीवित कर रहे हो, इसलिए सोच लो. वह जीवित होते ही तुम्हें मारकर खा जायेगा.

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Panchtantra Story

वैज्ञानिक मित्रों ने उसकी बात को अनसुना कर दिया. तब वह बुद्धिमान बोला- यदि तुम्हें अपनी विद्या का चमत्कार दिखलाना ही है तो दिखलाओ, लेकिन एक क्षण ठहर जाओ, मैं वृक्ष पर चढ़ जाऊं… यह कहकर वह पेड़ पर चढ़ गया.

इतने में तीनों वैज्ञानिकों ने शेर को जीवित कर दिया. जीवित होते ही शेर ने तीनों पर हमला कर दिया और तीनों मारे गये.

सीख: केवल शास्त्रों में कुशल होना ही पर्याप्त नहीं है, लोक-व्यवहार को समझने की बुद्धि भी होनी चाहिये. मात्र विद्या या ज्ञान की ज़रूरी नहीं, सामान्य ज्ञान व बुद्धि भी आवश्यक है, वरना विद्वान भी मूर्ख ही साबित होता है.

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Tenalirama Stories

तेनालीराम की कहानी: मटके में मुंह (Tenalirama And Pot Mask)

यूं तो महाराज कृष्णदेव राय तेनालीरामा को बेहद पसंद करते थे, पर एक बार महाराज कृष्णदेव किसी बात पर तेनालीराम से नाराज़ हो गए. गुस्से में आकर उन्होंने तेनालीराम से भरी राजसभा में कह दिया कि कल से मुझे दरबार में अपना में अपना मुंह मत दिखाना. उसी समय तेनालीराम दरबार से चला गया. तेनालीरामा से जलनेवाले लोग बेहद ख़ुश हुए.

अगले दिन जब महाराज राजसभा की ओर जा रहे थे, तभी एक चुगलखोर ने उन्हें यह कहकर भड़का दिया कि आपने तेनालीरामा को दरबार में न आने का आदेश दिया था, लेकिन तेनालीराम आपके आदेश के खिलाफ दरबार में उपस्थित है.
यह सुनते ही महाराज आग-बबूला हो गए. चुगलखोर दरबारी आगे बोला- आपने साफ कहा था कि दरबार में आने पर कोड़े पड़ेंगे, इसकी भी उसने कोई परवाह नहीं की. अब तो तेनालीराम आपके हुक्म की भी अवहेलना करने में जुटा है.

राजा दरबार में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि सिर पर मिट्टी का एक घड़ा ओढ़े तेनालीराम विचित्र प्रकार की हरकतें कर रहा है. घड़े पर चारों ओर जानवरों के मुंह बने थे.

महाराज ने गुस्से में कहा- तेनालीराम! ये क्या बेहुदगी है. तुमने हमारी आज्ञा का उल्लंघन किया हैं. तुमको इसकी सज़ा मिलेगी. दंडस्वरूप कोड़े खाने के तैयार हो जाओ.

तेनालीरामा ने कहा- मैंने कौन-सी आपकी आज्ञा नहीं मानी महाराज? घड़े में मुंह छिपाए हुए तेनालीराम आगे बोला- आपने कहा था कि कल मैं दरबार में अपना मुंह न दिखाऊं तो क्या आपको मेरा मुंह दिख रहा है? हे भगवान! कहीं कुम्हार ने फूटा घड़ा तो नहीं दे दिया?

यह सुनते ही महाराज की हंसी छूट गई. वे बोले- तुम जैसे बुद्धिमान और हाज़िरजवाब से कोई नाराज़ हो ही नहीं सकता. अब इस घड़े को हटाओ और सीधी तरह अपना आसन ग्रहण करो.

तेनालीरामा से महाराज के विशेष प्रेम के चलते बहुत लोग उससे जलते थे, लेकिन तेनालीरामा हर बार अपनी बुद्धिमता से उनको मात दे देता है. इस बार भी यही हुआ.

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Kids Story

Kids Story: कंजूस भेड़िया और शिकारी (The Hunter And The Miser Wolf)

एक जंगल में एक बेहद ही कंजूस भेड़िया रहता था. वो इतना ज़्यादा कंजूस था कि अपने खाने में भी कंजूसी करता था. वो जो भी शिकार करता, उसका मांस कई दिनों तक बचाकर रखता, ताकि बाद में खा सके, जैसे- एक बार उसने हिरण का शिकार किया, तो पहले दिन स़िर्फ उसके कान खाए, अगले दिन कोई दूसरा अंग…

इस तरह वो हमेशा ही कंजूसी करता. इसकी वजह से वो बहुत ही कमज़ोर हो गया था. उसकी मरियल हालत देखकर जंगल के अन्य पशु भी उसका मज़ाक बनाते, पर उस पर कोई असर न होता.

कई बार तो उसके शिकार का मांस कई दिन तक पड़े रहने के कारण सड़ जाता, जिससे वो उसे खा ही नहीं पाता था. पर फिर भी कंजूसी की आदत वो छोड़ नहीं रहा था.

एक बार जंगल में एक शिकारी आया. उसने एक जंगली सुअर का शिकार करने के लिए तीर मारा, जैसे ही तीर सुअर को लगा, क्रोधित सुअर ने तेज़ी से दौड़ते हुए अपने नुकीले दांत शिकारी के पेट में गड़ा दिए, जिससे सुअर व शिकारी दोनों की ही मौत हो गई. कंजूस भेड़िया यह सब देख रहा था. उसे बड़ी ख़ुशी हुई कि उसके कई दिनों के खाने का बंदोबस्त हो गया. उसने सोचा इस मांस को तो मैं कम से कम दो महीने तक चलाऊंगा.

इसी बीच उसकी नज़र पास पड़े धनुष पर गई. उसने देखा कि धनुष के कोनों पर चमड़े की पट्टी लगी है. उसने सोचा कि क्यों न आज इस पट्टी को खाकर ही काम चला लूं, ताकि मांस बच जाए. कंजूस भेड़िए ने पट्टी को एक तरफ़ से काटा, उसके काटते ही धनुष सीधा हो गया और सीधे उसकी गर्दन को चीरता हुआ बाहर हुआ. वो भेड़िया वहीं मर गया.

सीख: ज़रूरत से ज़्यादा कंजूसी और लालच हमेशा नुकसान ही देती है. किफायती होना अलग होता है, पर कंजूसी होना फ़ायदेमंद नहीं.

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Hindi Short Story

मानसिक तनाव से मुक्ति के प्रयास में पत्नी तक को भूल जाने वाला व्यक्ति तब भले ही स्वयं को छलता रहा हो, पर आज उसके पास कोई जवाब नहीं है. तब भले ही लोगों ने पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी अश्रुविहीन आंखें देखकर अध्यात्म प्रदत्त उदासीनता की संज्ञा दी हो, किन्तु वे जानते हैं कि यह सच नहीं था.

एकाएक उन्हें लगा कि पत्नी आवाज़ देकर बुला रही है. उनकी तन्द्रा टूट गई. दृष्टि घुमाकर उन्होंने चारों ओर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था.

पिछले कुछ दिनों से उन्हें बार-बार लगता है कि पत्नी उनसे हिसाब मांग रही है. मानसिक तनाव से मुक्ति के प्रयास में पत्नी तक को भूल जाने वाला व्यक्ति तब भले ही स्वयं को छलता रहा हो, पर आज उसके पास कोई जवाब नहीं है. तब भले ही लोगों ने पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी अश्रुविहीन आंखें देखकर अध्यात्म प्रदत्त उदासीनता की संज्ञा दी हो, किन्तु वे जानते हैं कि यह सच नहीं था. सच यह था कि पत्नी से जुड़ाव इतना कम हो गया था उनका कि आंसू आंखों में आये ही नहीं.

बाबा ने तब उन्हें गुरुमंत्र दिया था. द़फ़्तर के अलावा उनका सारा समय बाबा के दिखाए रास्ते पर चलने में गुज़रने लगा था. सुबह उठकर दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर स्नान करके कुछ देर भजन-पूजन में लगाकर वे डॉक्टर परमानन्द के पास चले जाते. वहां से द़फ़्तर और द़फ़्तर से सीधे बाबा के पास-आश्रम में. आश्रम में वे सत्संग सुनते. वहां चलने वाले ग्रन्थों के अखण्ड पाठ में लगभग दो घण्टे का समय देते. घर पहुंचकर रात्रि को भोजन करते-करते ग्यारह बज चुके होते, तब भी वे न सोते. होमियोपैथी की पुस्तकों का अध्ययन करके बारह-साढ़े बारह बजे बिस्तर पर जाते.

इस दिनचर्या से उनको सन्तुष्टि मिली हो या न मिली हो, किन्तु तनाव से उन्हें छुटकारा मिल गया था. सुबह से लेकर देर रात तक कुछ-न-कुछ करते रहने के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से वे इतने थक चुके होते कि कुछ और सोचने का समय उन्हें मिल ही नहीं पाता था. नींद अच्छी आने लगी थी. मुक्त, निर्द्वन्द्व मस्तिष्क, मन की नई अवस्था ने उन्हें आश्‍वस्त किया था कि होमियापैथी में पारंगत हो जाने के बाद बाबा के निर्देशानुसार निःशुल्क चिकित्सालय खोलकर वे आत्मसंतोष का वरण भी कर सकेंगे.

आत्मसंतुष्टि की खोज की इस प्रक्रिया में जो कुछ उनसे छूटता जा रहा था, उसके दुष्परिणाम उनकी दृष्टि से ओझल थे. पत्नी की अस्वस्थता को यदि संकेत मानकर वे सजग हो गए होते तो बाद में संभवतः नौबत ऐसी न आती. किन्तु आत्मसंतुष्टि के मार्ग की यात्रा का नशा इतना ज़्यादा था कि बाकी सब कुछ गैरज़रूरी लगता था उन्हें. पहले वे पत्नी को मासिक व्यय के लिए  एक बंधी राशि देकर गृह व्यवस्था से निश्‍चिंत होकर अपने कमरे में एकान्त का रसास्वादन किया करते थे. रहते चाहे अलग-थलग थे, मगर होते घर में ही थे. गृहस्थी की आवश्यकताओं की पूर्ति में पत्नी की मदद भले न करते हों, किन्तु घर में उनकी उपस्थिति मात्र पर्याप्त होती थी. पत्नी मानसिक रूप से उनके साथ बहुत गहराई तक जुड़ी हुई थी. दिनचर्या का निर्वाह वह भले ही अकेली कर लेती हो, किन्तु पति की निकटता उसकी मानसिक आवश्यकता थी. सब कुछ करके भी वह पति को ही घर का सर्वेसवा व प्रमुख मानती थी. पति उससे बहुत अधिक योग्य, बहुत अधिक सक्षम हैं, इस बात को सम्मानपूर्वक  अपने हृदय में आसीन किया हुआ था उसने.

अब जबकि व्यस्तताओं ने उन्हें घर से दूर कर दिया था, ऊपर से पूर्ववत् होते हुए भी सब कुछ सामान्य नहीं रहा था, फिर भी घर पहले की तरह चल रहा था. बच्चों के पालन-पोषण, उनकी देखभाल में कोई अन्तर नहीं आया था. भोजन भी आवश्यकतानुसार उन्हें वांछित समय पर परोस दिया जाता था. पहले की तरह ये सारे काम उनकी पत्नी करती जा रही थी, किन्तु उसके व्यवहार में एक विशेष प्रकार का परिवर्तन आता जा रहा था. वह बैठी होती तो बैठी ही रह जाती, हंसती तो बहुत देर तक हंसती रहती. आने-जाने वालों, नाते-रिश्तेदारों के साथ व्यवहार में या तो अनुपात से अधिक सौजन्य होता था या फिर एकदम रूखापन.

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इस परिवर्तन को वे कई दिनों तक लक्ष्य नहीं कर पाए. जब ध्यान आया भी तो अपने बाहर बने रहने के साथ वे इसका संबंध नहीं समझ पाए. परिणामतः सुघड़, बुद्धिमती और व्यवस्था निपुण उनकी पत्नी मानसिक और स्नायुविक शिथिलता का शिकार होती चली गई.

प्रारम्भ में वे इस आशा से निष्क्रिय बने रहे कि पत्नी स्वयं ठीक हो जाएगी. उन्होंने नहीं सोचा था कि पत्नी सिरदर्द, ज़ुकाम या खांसी से पीड़ित नहीं है कि पांच-सात दिन में अपने आप ठीक हो जाएगी. परिणामस्वरूप धीरे-धीरे वह क्या और क्यों का स्वाभाविक ज्ञान भी खो बैठी. वे सचेत तब हुए जब पत्नी की हरकतों में, बातचीत में, व्यवहार में और क्रियाकलापों में बेतुकापन बहुत ज़्यादा बढ़ गया.

तब कहीं जाकर उन्होंने चिकित्सकों से परामर्श किया. मानसिक चिकित्सालय में भर्ती कराकर पत्नी का उपचार कराया. चिकित्सकों का मत था कि पत्नी के हृदय पर कोई चोट पड़ी है, जिसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण उनके मस्तिष्क पर असर हुआ है. पत्नी के उपचार के लिए समय चाहिए, इसलिए उन्होंने बाबा से बातचीत करके आश्रम से सम्बन्धित अपनी गतिविधियां बन्द ज़रूर कर दीं, किन्तु तब भी यह एहसास उन्हें नहीं हुआ कि पत्नी की वर्तमान स्थिति के कारण वे स्वयं हैं, उनकी अनुपस्थिति ही इसका कारण है.

आत्मसंतोष की चाह ने कैसा मंददृष्टि बना दिया था उन्हें? उन दिनों वे लगातार पत्नी के साथ बने रहे थे. द़फ़्तर से छुट्टी ले ली थी. पूरा ध्यान चिकित्सा पर केंद्रित करके हर समय पत्नी की सुश्रुषा हेतु प्रस्तुत रहते. वह शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करने लगी तो उन्होंने श्रेय उपचार को दिया. तब भी वे समझ नहीं पाए कि पति की निकटता का योगदान उपचार से भी अधिक रहा है उनकी पत्नी को ठीक करने में.

लगभग दो माह के निरन्तर सान्निध्य और चिकित्सा के बाद उनकी पत्नी प्रत्यक्ष रूप से तो स्वस्थ हो गई, किन्तु उसकी बुद्धि की कुशाग्रता वापस न लौट सकी. चुप्पी, सुस्ती और अपना मत प्रकट न करना उसके स्वभाव के स्थायी अंग बन गए. घर में जहां वह बैठ गई तो बैठी ही रह जाती. लेटी तो लेटी रह जाती. इच्छा हुई तो नमस्ते कर दी, नमस्ते का जवाब दे दिया या मन में आया तो किसी से बात कर ली. किसी ने पूछा तो भोजन कर लिया, अन्यथा भूखी बैठी रही. एक ख़ास तरह की तटस्थता या कहा जाए निष्क्रियतापूर्ण तटस्थता और अवसाद उसे सदैव घेरे रहता.

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जैसा कि सामान्यतः होता है, प्रयत्नों के बावजूद पत्नी में गुणात्मक परिवर्तन  न पाकर उनकी  सुग्राहिता धीरे-धीरे कम होती चली गई. उनकी बन्द गतिविधियां पुनः प्रारम्भ हो गईं. डॉक्टर परमानन्द के पास जाकर होमियोपैथी चिकित्सा सीखने का क्रम फिर चल पड़ा. अलबत्ता रात को वे घर कुछ जल्दी लौटने लगे, किन्तु पत्नी के बारे में उनकी चिन्ता मात्र औपचारिक पूछताछ व औपचारिक बातचीत तक सिमट कर रह गई.

बाद में जब उनकी पत्नी का देहान्त हुआ, तो उनकी आंखों से आंसू का एक कतरा भी बाहर नहीं आया. वे पत्नी की मृत्यु से किंचित मात्र भी विचलित नहीं हुए. पत्नी की स्मृति में उनकी एक रात भी उनींदी नहीं गुज़री. अब अगर पत्नी उनसे हिसाब मांग रही है, तो वे क्या जवाब दें? जो भूल वे उस समय कर बैठे थे, उसका परिष्कार अब कैसे करें? अपना जीवन वे आत्मसंतोष के सुख से भर पाए हों या नहीं, किन्तु एक भरे-पूरे जीवन को मानसिक यंत्रणा के कगार पर ले जाकर मृत्यु के मुख में धकेल देने का जो काम अनजाने में उनसे हो गया, उसका क्या स्पष्टीकरण दें?

चौंककर उन्होंने फिर आंखें खोल दी हैं. कहीं कोई नहीं है. चालीस साल पुरानी समय की खोह में से निकलकर उनके स्नायुओं पर दस्तक देने के बाद पत्नी फिर अदृश्य हो गई है.

– भगवान अटलानी

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Akbar Aur Birbal

अकबर-बीरबल की कहानी: जोरू का गुलाम (Akbar-Birbal Tale: Joru Ka Ghulam)

बादशाह अकबर और बीरबल आपस में बातें कर रहे थे. बातों ही बातों में बात मियां-बीवी के रिश्ते पर चल निकली तो बीरबल ने कहा- अधिकतर मर्द जोरू के गुलाम ही होते हैं और अपनी बीवी से डरते हैं.

यह सुनकर बादशाह ने असहमति जताई और कहा कि मैं नहीं मानता.

यह सुन बीरबल ने कहा कि हुजूर, मैं यह बात सिद्ध कर सकता हूं.

बादशाह भी तैयार हो गए और कहा कि सिद्ध करो.

बीरबल ने कहा कि आप आज ही से आदेश जारी करें कि किसी के भी अपने बीवी से डरने की बात साबित हो जाती है तो उसे एक मुर्गा दरबार में बीरबल के पास में जमा करना होगा. बादशाह ने आदेश जारी कर दिया.

कुछ ही दिनों में बीरबल के पास ढेरों मुर्गे जमा हो गए, तब उसने बादशाह से कहा- अब तो इतने मुर्गे जमा हो गए हैं कि आप मुर्गीखाना खोल सकते हैं. अब तो मानते हैं न कि मेरी बात सिद्ध हो गई? अतः अब आप अपना आदेश वापस ले लें.

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बादशाह को न जाने क्या मज़ाक सूझा कि उन्होंने अपना आदेश वापस लेने से इंकार कर दिया. खीजकर बीरबल लौट आया और अगले दिन बीरबल दरबार में आया तो बादशाह अकबर से बोला- हुजूर, विश्‍वसनीय सूत्रों से पता चला है कि पड़ोसी राजा की पुत्री बेहद खूबसूरत है, आप कहें तो आपके विवाह का प्रस्ताव भेजूं?

यह क्या कह रहे हो तुम, कुछ तो सोचो, जनानाखाने में पहले ही दो हैं, अगर उन्होंने सुन लिया तो मेरी खैर नहीं.
बादशाह की यह बात सुनकर बीरबल ने कहा- हुजूर, दो मुर्गे आप भी दे ही दें अब.

बीरबल की बात सुनकर बादशाह झेंप गए और उन्होंने तुरंत अपना आदेश वापस ले लिया.

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“रितु, वर्जिनिटी से बड़ा लिंग भेद कुछ भी नहीं आज हमारे समाज में. एक ओर जहां लड़कों से कुछ भी नहीं पूछा जाता, वहीं दूसरी ओर लड़कियों के चरित्र को प्रमाणित करने के लिए न जाने कैसे-कैसे शब्द और तरी़के इजाद कर दिए गए हैं. यह पुरुषों की सत्ता और झूठे अहंकार को बनाए व बचाए रखने की बातें हैं और कुछ भी नहीं. पर सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते.”

Short Story- Virgin Ladki

मेरे तकिये के नीचे अब भी तुम्हारी यादें दुबकी पड़ी हैं… मेरे सिरहाने तुम्हारे वो ढेरों चुंबन अंकित हैं, जो कभी ख़्वाबों में तुमने मुझे दिए, तो कभी रू-ब-रू… मेरे दरीचों से अब भी तुम्हारा अक्स मुस्कुराता नज़र आता है… मेरे आंगन में तुम्हारी धड़कनें अब भी बिखरी रहती हैं… फिर क्यों तुम यहां नहीं हो मेरे पास? ऐसी क्या मजबूरी थी कि बिना कुछ कहे यूं ही चले गए मेरी ज़िंदगी से अचानक… ठीक उसी तरह, जिस तरह अचानक तुम मेरी ज़िंदगी में आए थे.
तुम्हें शायद ये एहसास ही नहीं कि मैं अब भी ज़िंदगी के उसी मोड़ पर खड़ी हूं, जहां तुम मुझे छोड़कर चले गए थे. तुम नहीं लौटकर आओगे अब शायद, यह मैं समझ चुकी हूं, लेकिन मेरा दिल नहीं समझ रहा… इसे कहीं न कहीं अब भी तुमसे उम्मीदें हैं… ये अब भी तुम्हारे ख़्वाब संजोता है, अब भी तुम्हारे ख़्यालों से इसे सिहरन होती है… तुम्हारी वो पहली छुअन अब भी मुझे भीतर तक भिगो देती है. कितना अपनापन था उस छुअन में… बहुत पाक-साफ़ था वो एहसास, ख़ालिस प्रेम था उसमें. क्या तुम्हें याद नहीं आते हमारे प्यार के वो पल? वो घंटों बैठकर बातें करना, वो तुम्हारा मेरे लिए कॉफी बनाना… वो अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड के क़िस्से सुनाना…!
और हर बार मेरा यही सवाल होता था, इतना प्यार करते थे, तो शादी क्यों नहीं की… और तुम कहते थे, “कितनी बार बताया, गांव में जाति-गोत्र सब देखे जाते हैं, सो शादी नहीं हो पाई.”
“मुझसे तो करोगे न…?” और तुम हंस देते बस… उस हंसी की खनक अब भी कानों में गूंजती है… मैं भी कितनी पागल थी, शादी तो तुमको मुझसे भी नहीं करनी थी, सो नहीं की… यूं ही एक दिन अचानक तुमने बिना कुछ कहे, बिना बताए ख़ुद को समेट लिया. कितनी बार फोन किया, कितने मैसेज किए… तुमने पढ़कर भी जवाब नहीं दिया.
पर मेरा दिल था कि मान ही नहीं रहा था… तुम्हारा इंतज़ार करने के सिवा कोई चारा भी तो नहीं था मेरे पास. तुम्हारी होने के बाद किसी और की होने की हिम्मत भी नहीं थी. ख़ैर, किसी तरह ख़ुद को संभाल रही हूं. ज़िंदगी को जितना संभव हो सामान्य बनाए रखने की पुरज़ोर कोशिश में थी मैं.
“रितु, तैयार नहीं होना क्या आज तेरी दिल्ली की फ्लाइट है. छूट न जाए कहीं.” मम्मी की आवाज़ से ख़्यालों का सिलसिला टूटा.
“हां मम्मी, बस तैयार ही हूं.”
संडे था, इसलिए ट्रैफिक नहीं था रोड़ पर. एयरपोर्ट जल्दी ही पहुंच गई थी मैं. सिक्योरिटी चेक से बाहर निकलकर सोचा कुछ शॉपिंग कर लूं… बैग्स की एक शॉप की तरफ़ नज़र गई, तो एक पल को ठिठक गई. अरे! क्या मेरी नज़रें धोखा खा रही हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं. तुम ही तो हो. तुम्हें पहचानने में भला कैसे भूल कर सकती हूं मैं.
“कैसे हो राजवीर?” मैंने गंभीरता से कहा, तो वो थोड़ा असहज हो गया, फिर संभलते हुए बोला, “अरे, रितु तुम. मैं बिल्कुल ठीक हूं. तुम कैसी हो?”
“कमाल है, तुम्हें क्या लगता है कि मैं कैसी होऊंगी?”
“सॉरी रितु, पर मैं यहां कोई सीन क्रिएट नहीं करना चाहता. बेहतर होगा हम आराम से बात करें इस मुद्दे पर.”
“यूं अचानक मुझे ज़िंदगी के मोड़ पर अकेला छोड़कर चले गए तुम, बिना कोई वजह बताए, तो इतना हक़ बनता है मेरा कि जान सकूं आख़िर क्या कारण था, जो इतना बड़ा धोखा दिया तुमने मुझे.”
“धोखे की क्या बात है यार इसमें. हम दोनों एडल्ट हैं, हम एक-दूसरे की तरफ़ आकर्षित थे, जो कुछ भी हमने किया प्यार में किया.”
“और अब क्या प्यार ख़त्म हो गया? तुमने मुझसे शादी का वादा किया था. तुम्हारे उस वादे पर भरोसा था मुझे.”

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“तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो रितु कि मैं तुम जैसी लड़की से शादी करूंगा? ज़रा ख़ुद सोचो, जो लड़की इतनी आसानी से किसी लड़के के साथ… तुम समझ रही हो न. बीवी कैसे बन सकती हो तुम. हां, चाहो तो हम अब भी… क्योंकि तुम बहुत अट्रैक्टिव हो…”
एक ज़ोरदार तमाचा जड़ते-जड़ते रह गई थी मैं तुम्हारी इस घटिया सोच पर, लेकिन रोक लिया ख़ुद को, क्योंकि मैं भी कोई सीन क्रिएट नहीं करना चाहती थी एयरपोर्ट पर.
हां, तुम्हारा असली रंग ज़रूर देख चुकी थी. लड़कियों को स़िर्फ इस्तेमाल करके ज़िंदगी से बाहर निकाल फेंकना तुम्हारी आदत ही नहीं, शौक़ भी था यह भी समझ चुकी थी. ख़ैर, किसी तरह ख़ुद को संभाला मैंने और दिल्ली पहुंची. बाहर निकलते समय तुम्हारे चेहरे की कुटिल मुस्कान को कभी नहीं भूल सकती मैं.
समय बीत रहा था. तुम्हारे दिए ज़ख़्म भर तो रहे थे, लेकिन कहीं न कहीं उनमें दर्द था, वो भी बहुत ज़्यादा. मैंने अपना पूरा ध्यान प्रैक्टिस पर लगा दिया. मम्मी-पापा का सपना था कि मैं एक कामयाब डॉक्टर बनूं. उनका सपना आकार ले रहा था.
आज इतने सालों बाद तुम फिर मेरे सामने हो, बेहद मजबूर, लाचार और ग़मगीन से… कहां गया तुम्हारा वो ग़ुरूर? कहां गई वो कुटिल मुस्कान? शायद ये कायनात का ही एक फैसला था, तुम्हारे पाप की सज़ा तुम्हारी बेटी भुगत रही थी. हालांकि एक स्त्री होने के नाते मैं कभी नहीं चाहूंगी कि किसी भी लड़की के साथ ऐसा हो, लेकिन समय न जाने कब किसको क्या दिखा दे.
“डॉक्टर रितु, कैसी है मेरी बेटी अब?”
“जी, वो अब बेहतर है. पर होश में नहीं आई अब तक. थोड़ा इंतज़ार कीजिए और हौसला रखिए मिसेज़ राजवीर.”
“कैसे रखूं हौसला, न जाने कौन था वो लड़का, जिसने मेरी बेटी का ये हाल बना दिया. कैसे संस्कार रहे होंगे उसके, जो एक लड़की को ज़िंदगी के ऐसे मोड़ पर लाकर धोखा देकर भाग गया. कायर कहीं का, कभी सुखी नहीं रहेगा वो… ”
राजवीर की पत्नी बोले जा रही थी और रजवीर की नज़रें झुकी जा रही थीं.
“राजवीर और मैंने डॉली को इतने लाड़-प्यार से पाला था. मेरी फूल जैसी बच्ची का ये हाल बना दिया कि आज उसने आत्महत्या की कोशिश जैसा क़दम उठा लिया…”
मुझे बुरा इसलिए लग रहा था कि ऊपरवाले ने राजवीर की बेटी को ही ज़रिया क्यों बनाया उसे अपने किए का एहसास दिलाने के लिए… ख़ैर बेटी किसी की भी हो, ऐसा किसी के साथ न हो. इतने में ही डॉली को होश आ गया. हम सब अंदर गए. बच्ची बुरी तरह डरी हुई थी. मैंने उसे प्यार से पूछा, “बेटा, डरो मत. खुलकर अपनी बात कहो. क्यों किया तुमने ऐसा? अगर किसी ने तुम्हारे साथ ज़्यादती की, तो तुम्हें ज़रूर न्याय मिलेगा.”
“मम्मी-पापा, आई एम सॉरी. सब मेरी ही ग़लती है. मुझे नहीं पता था कि मेरे आज़ाद ख़्यालों को, मेरी मॉडर्न लाइफस्टाइल को कोई मेरे चरित्र से जोड़कर देखेगा और मेरा फ़ायदा उठाएगा.”
“बेटा मैं और तेरे पापा इतने आज़ाद ख़्यालों के हैं, कम से कम ऐसा कोई भी क़दम उठाने से पहले एक बार अपनी परेशानी हमसे शेयर तो की होती… तुझे कुछ हो जाता तो, किसके लिए जीते हम.” मिसेज़ राजवीर का दर्द छलक पड़ा.
“सॉरी मॉम, मैं इतनी डिप्रेशन में थी कि पता ही नहीं चला कि मेरे साथ हो क्या रहा है… रोहित ने इस तरह से छला मुझे…”
“डॉली अपने मन से अब सारी निगेटिव बातें निकाल दो और सारा क़िस्सा
साफ़-साफ़ बताओ…” मैंने डॉली को समझाते हुए कहा. राजवीर इस पूरे मसले पर चुप्पी ही साधे हुए था… ख़ैर, डॉली ने अपनी बात आगे बढ़ाई.
“आंटी, रोहित मेरे ही ऑफिस में मेरा सीनियर है. बहुत दिनों से वो मुझे लगातार अपने प्यार का भरोसा दिला रहा था. हम डेट कर रहे थे एक-दूसरे को. इतना समझदार, इतना मैच्योर लगा मुझे वो, बिल्कुल पापा की तरह. मेरा ख़्याल रखता था, मेरी हर ज़रूरत पर साथ खड़ा रहता था. मुझे पूरा भरोसा हो गया था कि इससे बेहतर जीवनसाथी मुझे नहीं मिलेगा.
दो महीने पहले हम आउटिंग पर गए थे. बस वो एक कमज़ोर पल था, जिसमें हमसे ग़लती हो गई थी. रोहित ने कहा था जल्द ही घर आकर शादी की बात करेगा. पर…” यह कहते ही डॉली फूट-फूटकर रोने लगी.
“धैर्य रखो डॉली, ग़लतियां ही हमें ज़िंदगी जीने का सबक और हौसला देती हैं.”
“आप ठीक कह रही हैं आंटी. रोहित पर भरोसा करना एक बहुत बड़ी भूल थी. उसने धीरे-धीरे मुझसे दूरी बनानी शुरू कर दी. मेरे फोन उठाने और मेरे मैसेजेस के जवाब देने भी बंद कर दिए. फिर मुझे पता चला कि उसकी एंगेजमेंट हो रही है और उसने रिक्वेस्ट करके दूसरे शहर में ट्रांसफर ले लिया.
मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था. विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. मैंने किसी तरह रोहित से बात करने की कोशिश की, तो उसने कहा ऑफिस में सीन क्रिएट मत करो, शाम को कॉफी हाउस में बात करते हैं.
हम शाम को गए. मैंने उसकी एंगेजमेंट की बात पूछी, तो उसने कहा कि प्यार और शादी दो अलग-अलग चीज़ होती हैं. तुम जैसी लड़कियों को गर्लफ्रेंड तो बनाया जा सकता है, पर शादी… शादी के लिए संस्कारी और वर्जिन लड़की ही सही होती है. तुम मेरे साथ शादी से पहले ही इतनी कंफर्टेबल हो गई, तो न जाने और किस-किस के साथ… एक चांटा मारकर मैं वहां से चली आई. ऐसे गंदी सोच और बुरी नीयतवाले लड़के से मुझे अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट नहीं चाहिए था.”
“वो सब तो ठीक है डॉली, तुम एक स्ट्रॉन्ग और कॉन्फिडेंट लड़की हो, तुमने भला सुसाइड जैसा ग़लत क़दम क्यों उठाया? अपने मम्मी-पापा से मदद लेनी चाहिए थी.”
“आप ठीक कह रही हैं. पर मेरी हिम्मत नहीं थी, क्योंकि मैं प्रेग्नेंट हो गई थी. रोहित को बताया भी था यह सोचकर कि शायद बच्चे की बात सुनकर वो सही क़दम उठाएगा, पर उसने कहा कि ये उसका बच्चा है ही नहीं… पापा, आप कुछ बोलो न, आप ही तो कहते थे कि लड़की किसी लड़के से कम नहीं होती, तो क्यों उसे हर किसी को अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट देना होता है… कभी अपने कपड़ों के माध्यम से, कभी नज़रें झुकाकर, कभी शर्माकर, तो कभी मर्दों के सामने गिड़गिड़ाकर.
मुझे लगा कौन मुझे और मेरे बच्चे को अपनाएगा. एबॉर्शन करवाकर मैं अपने बच्चे की जान नहीं लेना चाहती थी, तो सोचा ख़ुद ही अपनी जान लेकर अपने बच्चे को भी इस फरेबी दुनिया में आने से बचा लूं. पर देखो डॉक्टर मेरी जान आपने बचा ली, पर मेरा बच्चा…” डॉली रोने लगी.

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राजवीर के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. वो कुछ न बोल सका.
“डॉली, तुम्हारी जान बच गई ये भी कम बात नहीं. पर अफ़सोस कि तुम्हारे बच्चे को हम बचा नहीं सके. रही बात रोहित जैसे लड़कों की, तो तुम्हें किसी को अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट देने की ज़रूरत नहीं है. दरसअल, समस्या हमारे समाज की सोच में ही है. वो बेटों को संस्कार देने की बजाय बेटियों के तन ढांकने में ज़्यादा विश्‍वास रखता है. बेटों को बेलगाम छोड़ देता है और बेटियों को तमाम तरह की बेड़ियों में जकड़ने की नसीहतें देता है. यही वजह है कि तुम जैसी स्ट्रॉन्ग लड़की भी हक़ की लड़ाई लड़ने की बजाय पलायन का रास्ता चुनती है.
हम सभी ऐसे ही हैं. मैं भी भले ही बड़ी-बड़ी बातें कर लूं, लेकिन अगर मेरे साथ ग़लत होता, तो मैं भी लड़ने का हौसला नहीं रख पाती, पर अब मैं तुमसे वादा करती हूं कि तुम्हारी लड़ाई मैं लड़ूंगी.”
डॉली और उसके पैरेंट्स के साथ जाकर पुलिस स्टेशन में रोहित के ख़िलाफ़ कंप्लेन दर्ज करवाई और डॉली को इंसाफ़ भी ज़रूर मिल जाएगा.
“रितु, मैं तुमसे माफ़ी भी मांगने लायक नहीं हूं. तुमने मेरे लिए जो कुछ भी किया…”
“राजवीर, मैंने तुम्हारे लिए नहीं, जो भी किया, डॉली के लिए किया.”
“मैं तुम्हारा अपराधी हूं… मैंने तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद की… ”
“राजवीर, मैं तुम्हें साफ़-साफ़ बता दूं कि न मेरी ज़िंदगी बर्बाद हुई और न मैं अपने बीते हुए कल में जीती हूं. मैं तो तुम्हें ‘थैंक्स’ कहना चाहती हूं कि तुम जैसे इंसान की पत्नी बनने से बच गई… रही बात मेरी, तो हां शादी और प्यार जैसी पवित्र भावनाओं पर आज भी मेरा विश्‍वास है. और मैं चाहती हूं कि डॉली भी मानसिक रूप से ऐसी ही सोच के साथ आगे बढ़े. इसीलिए तुम्हें घर पर बुलाया कि उसकी काउंसलिंग पर थोड़ा ध्यान देना होगा. उसके मन से नकारात्मक विचार निकालने ज़रूरी हैं, तभी वो एक सकारात्मक जीवन जी पाएगी.”
राजवीर चला गया. मेरे मन को आज एक तसल्ली थी, जो मैं अपने लिए न कर सकी, वो डॉली के लिए करने की हिम्मत जुटा पाई. कितनी मासूम और प्यारी बच्ची है डॉली, बिल्कुल मेरी रानी की तरह…
“रितु मैडम, क्या बात है, किन ख़्यालों में खोई हो.”
“अरे, अजय आप आ गए हॉस्पिटल से. मैं बस राजवीर और डॉली के बारे में सोच रही थी.”
“तुमने बहुत अच्छा काम किया. रोहित जैसे लड़कों को यूं ही छोड़ने का मतलब है किसी और लड़की की ज़िंदगी दांव पर लगाना. तुमने भी तो बरसों पहले यही ग़लती की थी, पर कोई बात नहीं, देर आए, दुरुस्त आए.”
“आप जैसा जीवनसाथी पाकर सच में मैं ख़ुद को ख़ुशनसीब समझती हूं, वरना जीवन के एक मुकाम पर तो शादी और प्यार से भरोसा ही उठ गया था मेरा. पर मैं आज तक नहीं समझ पाई, आपके मन में उस व़क्त ये बात नहीं आई कि आपको भी शादी किसी वर्जिन लड़की से ही करनी चाहिए.”
“रितु, वर्जिनिटी से बड़ा लिंग भेद कुछ भी नहीं आज हमारे समाज में. एक ओर जहां लड़कों से कुछ भी नहीं पूछा जाता, वहीं दूसरी ओर लड़कियों के चरित्र को प्रमाणित करने के लिए न जाने कैसे-कैसे शब्द और तरी़के इजाद कर दिए गए हैं. यह पुरुषों की सत्ता और झूठे अहंकार को बनाए व बचाए रखने की बातें हैं और कुछ भी नहीं. पर सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते.”
“जी हां, समझ गई मिस्टर हसबैंड, कुछ लोग आपकी तरह भी होते हैं. चलिए अब खाना खा लेते हैं. मैंने आपके लिए और आपकी लाड़ली बेटी रानी के लिए कुछ स्पेशल बनाया है.”

Geeta Sharma

         गीता शर्मा

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