Hindi Kahani

बादशाह अकबर (Akbar) का दरबार लगा हुआ था लेकिन उस दिन बीरबल (Birbal) दरबार में देर से पहुंचा. बादशाह ने बीरबल से देरी का कारण पूछा तो वह बोला- महाराज, मैं क्या करता, मेरे बच्चे आज ज़िद करने लगे, वो जोर-जोर से रोकर कहने लगे कि मैं दरबार न जाऊं. किसी तरह उन्हें बड़ी मुश्किल से समझा-बुझाकर मैं आ पाया और इसी में मुझे देर हो गई.

बादशाह को बीरबल की बात पर भरोसा नहीं हुआ और उनको लगा कि बीरबल बहानेबाजी कर रहा है. वे बोले- मैं तुमसे सहमत नहीं हूं. बच्चों को समझाना इतना भी मुश्किल नहीं होता, इसमें इतनी देर नहीं लग सकती. थोड़ा डांट-फटकार लगाकर उनको शांत किया जा सकता है.

बीरबल ने कहा- महाराज, भले हाई बच्चे को गुस्सा करना या डपटना तो बहुत सरल है, लेकिन उनको कोई बात समझाना या उनकी ज़िद पूरी करना इतना आसान नहीं.

लेकिन अकबर इस बात से भी सहमत नहीं हुए और उन्होंने कहा अगर तुम मेरे पास कोई बच्चा लेकर आओ, तो मैं तुम्हें दिखा सकता हूं कि कितना आसान है.

बीरबल ने कहा कि महाराज मैं ये सिद्ध कर सकता हूं कि मेरी बात ग़लत नहीं लेकिन इसके लिए आपको मेरी एक बात माननी होगी. मैं खुद ही बच्चा बन जाता हूं और बच्चे जैसा ही व्यवहार करता हूं और आप किसी बड़े या पिता की भांति मुझे संतुष्ट करके या समझाकर दिखाएं.

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राजा तैयार हो गए और फिर बीरबल ने छोटे बच्चे की तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया. वो छोटे बच्चे की तरह दरबार में यहां-वहां उछलने-कूदने लगा और तरह-तरह के मुंह बनाकर अकबर को चिढ़ाया. वो रोने-चिल्लाने लगा तो राजा ने उसे मनाने के लिए अपनी गोद में बैठा लिया. अकबर की गोद में बैठने के बाद बच्चा बना बीरबल राजा की मूछों से खेलने व उनको छेड़ने लगा.

अब तक बादशाह शांत थे और वो कहने लगे अच्छे बच्चे ऐसा नहीं करते. बीरबल ने अब जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, तो बादशाह ने कुछ मिठाइयां लाने का आदेश दिया, लेकिन बीरबल चुप नहीं हुआ तो बादशाह ने खिलौने मंगवाए. लेकिन बीरबल रोता हुआ बोला- मैं तो गन्ना खाऊंगा. मुझे गन्ना लाकर दो.

अकबर ने गन्ना लाने का आदेश दिया, पर गन्ना देखकर भी बीरबल का रोना नहीं रुका और वो बोला- मुझे इतना बड़ा गन्ना नहीं चाहिए, छोटे-छोटे टुकड़ों में कटा हुआ गन्ना खाना है.

अकबर ने सेवक को बुलाकर गन्ने के छोटे-छोटे टुकड़े करवाए और बोले कि बेटा अब खा लो इसे और चुप हो जाओ, लेकिन बीरबल और जोर से रोता हुआ बोला- नहीं, ये अच्छा नहीं लग रहा, मुझे तो बड़ा गन्ना ही चाहिए. मैं वही खाऊंगा.

बादशाह ने एक साबूत बड़ा गन्ना उठाया और बीरबल को देते हुए बोले- ये लो पूरा गन्ना, अब रोना बंद करो और इसे खा लो.

लेकिन बीरबल अब भी चुप नहीं हुआ और रोता हुआ ही बोला- नहीं, मुझे तो इन छोटे टुकड़ों से ही साबूत गन्ना बनाकर दो.

बादशाह को अब ग़ुस्सा आने लगा था और वो ज़ोर से बोले- कैसी बात करते हो, ये संभव नहीं है. अब जो है इसे खा लो. पर बीरबल नहीं माना और ज़ोर-ज़ोर से रोता रहा.

बादशाह का धैर्य अब जवाब दे चुका था और वो बुरी तरह खीज उठे. उन्होंने कहा- चुप करो वरना मुझे हाथ उठाना पड़ेगा. ये सुन बीरबल ने और तेज़ आवाज़ में रोना शुरू कर दिया. बादशाह ने हार मान ली और वो हारकर अपनी गद्दी पर सिर पकड़कर बैठ गए.

बीरबल समझ चुका था कि अब बादशाह के धीरज का बांध टूट चुका है, इसलिए उसने अभिनय छोड़ दिया और हंसता हुआ बोला- हुज़ूर मुझे मत मारो, बस इतना बताओ कि क्या अब भी आप यही कहेंगे कि बच्चों को समझाना बड़ा आसान है? या फिर अब आपको पता चल गया कि बच्चे की बेतुकी जिदों को शांत करना कितना मुश्किल काम है ?

बादशाह ने बीरबल की बात से सहमती जताई और अपनी गलती स्वीकारी. दोनों अब मुस्कुरा दिए.

सीख: बच्चे। एकड़ जिज्ञासू होते हैं और उनके मासूम सवालों का जवाब देना इतना आसान नहीं. उनको डांट-फटकार या मार की बजाय प्यार से समझाना चाहिए और उनको हल्के में नहीं लेना चाहिए…

काफ़ी सालों पहले की बात है. एक गांव में किशन नाम का एक गरीब किसान रहता था. वह काफ़ी मेहनत करता था लेकिन फिर भी उसका गुज़र-बसर बड़ी मुश्किल से हो रहा था. वो गांव के एक ज़मींदार के खेत पर काम करके किसी तरह अपना घर चला रहा था.

एक वक्त था जब किशन की हालत ऐसी नहीं थी. पहले किशन के भी खेत थे, लेकिन उसके पिता के बीमार होने के कारण उसे अपने सारे खेत बेचने पड़े. मज़दूरी में मिलने वाले पैसों से पिता का इलाज कराना और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था.

उसका हर दिन इसी सोच में गुज़र जाता कि कैसे घर की स्थिति को बेहतर किया जाए. एक दिन सुबह-सुबह ऐसे ही सोचते-सोचते वो ज़मींदार के खेत पर काम कर रहा था कि अचानक खुदाई करते-करते उसकी कुदाल किसी धातु से टकराई और तेज़ आवाज़ हुई. किशन ने सोचा कि आखिर ऐसा क्या है यहां ज़रा देखा जाए. उसने उस हिस्से को खोदना शुरू किया तो देखा एक बड़ा-सा पतीला है. पतीला देखकर किशन दुखी हो गया, क्योंकि किशन ने सोचा कि पतीले की जगह अगर गहने या ज़ेवरात होते तो उसके घर की हालत थोड़ी सुधर जाती. फिर किशन ने सोचा कि चलो, अब खाना ही खा लेता हूं. खाना खाने के लिए किशन ने अपने हाथ की कुदाल उस पतीले में ही फेंक दी और हाथ-मुंह धोकर खाना खाने लगा. खाना खाने के बाद जब किशन अपनी कुदाल उठाने के लिए उस पतीले के पास पहुंचा, तो वो हैरान हो गया. उस पतीले के अंदर एक नहीं, बल्कि बहुत सारे कुदाल थे. उसे कुछ समझ नहीं आया. तभी उसने अपने पास रखी एक टोकरी को भी उस पतीले में फेंक दिया. वो एक टोकरी भी पतीले के अंदर जाते ही बहुत सारी हो गईं. ये सब देखकर किशन खुश हो गया और उस चमत्कारी जादुई पतीले को अपने साथ घर लेकर चला आया.

अब वो रोज़ उस चमत्कारी पतीले में अपने कुछ औज़ार डालता और जब वो ज़्यादा हो जाते, तब उन्हें बाज़ार जाकर बेच आता. ऐसा करते-करते किशन ने काफ़ी पैसे कमाए और उसके घर की हालत सुधरने लगी. उसने अपने पिता का इलाज भी करवा लिया. एक दिन किशन ने कुछ गहने खरीदें और उन्हें भी पतीले में डाल दिया. वो गहने भी बहुत सारे बन गए. धीरे-धीरे किशन काफ़ी धनवान होने लगा और उसने ज़मींदार के यहां मज़दूरी करना भी छोड़ दिया.

किशन को इस तरह अमीर होते देख ज़मींदार मोहन को किशन पर शक़ हुआ और वो सीधे किशन के घर जा धमका. वहां उसे जादुई पतीले के बारे में पता चला. उसने किशन से पूछा- तुमने यह पतीला कब और किसके घर से चुराया सच-सच बताओ?

किशन सहम गया और डरी हुई आवाज़ में बोला- ये चमत्कारी पतीला मुझे खेत में खुदाई के समय मिला था. मैंने किसी के घर चोरी नहीं की है. बस फिर क्या था. खेत में खुदाई की बात सुनते ही ज़मींदार बोला- यह पतीला जब मेरे खेत से मिला, तो यह मेरा हुआ.

किशन ने जादुई पतीला ना लेकर जाने की बहुत मिन्नते कीं, लेकिन ज़मींदार मोहन ने उसकी एक नहीं सुनी और वो ज़बरदस्ती अपने साथ वो जादुई पतीला लेकर चला गया.

ज़मींदार ने भी किशन की ही तरह उसमें अलग-अलग सामान डालकर उन्हें बढ़ाना शुरू किया. एक दिन ज़मींदार ने अपने घर में मौजूद सारे गहने एक-एक करके उस पतीले में डाल दिए और रातोंरात वो और भी ज़्यादा धनवान हो गया.

यूं अचानक एकदम से ज़मींदार के इतने अधिक अमीर होने की खबर नगर के राजा तक भी पहुंच गई. पता लगाने पर राजा को भी जादुई पतीले की जानकारी मिली. राजा ने तुरंत अपने लोगों को भेजकर ज़मींदार के पास से वो चमत्कारी पतीला राजमहल मंगवा लिया.

उस जादुई पतीले के राजमहल में पहुंचते ही राजा ने अपने आसपास मौजूद तमाम क़ीमती सामान उसमें डालना शुरू दिया. सामान को बढ़ता देखकर राजा दंग रह गया. राजा ने सोचा कि देखने में तो ये पतीला बड़ा साधारण सा दिखता है, लेकिन इसके अंदर ज़रूर कुछ असाधारण होगा. बस फिर क्या था वो ललची राजा खुद उस पतीले के अंदर चला गया और देखते-ही-देखते उस पतीले से बहुत सारे राजा निकल आए. अब पतीले से निकला हर राजा बोलने लगा- मैं इस नगर का असली राजा हूं, तुम्हें तो इस जादुई पतीले ने बनाया है. ऐसा होते-होते सारे राजा आपस में ही लड़ने लगे और उनकी इस भयानक लड़ाई में सभी राजा लड़कर मर गए. इस लड़ाई के दौरान वो जादुई पतीला भी टूट गया.

जादुई पतीले के कारण राजमहल में हुई इस लड़ाई के बारे में नगर में सबको पता चल गया. जैसे ही ये जानकारी मज़दूर किशन और ज़मींदार को मिली तो उन्होंने राहत की सांस लेकर सोचा कि अच्छा हुआ कि हमने उस जादुई पतीले का इस्तेमाल सही तरीक़े से किया. उस राजा ने अपनी मूर्खता के कारण अपनी जान ही खो दी.

सीख: मूर्खता और लालच का अंत बुरा ही होता है, किसी मूर्ख के पास अच्छी चीज़ कभी नहीं टिकती क्योंकि वो उसका सही इस्तेमाल करने की समझ ही नहीं रखता. इसलिए किसी भी सामान का इस्तेमाल संभलकर करना चाहिए और लालच से बचना चाहिए.

बहुत समय पहले की बात है घने से जंगल में एक शेर और एक शेरनी साथ-साथ रहते थे. उन दोनों में बेहद प्यार, अपनापन और भरोसा था. वे दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे और रोज़ दोनों साथ में ही शिकार करने जाते थे. को भी शिकार मिलता उसको मारकर आपस में बराबर बांट कर खाते थे. ऐसे ही उनका जीवन हंसी-ख़ुशी चल रहा था कि कुछ समय के बाद शेर और शेरनी दो पुत्रों के माता-पिता बन गए.

जब शेरनी ने बच्चों को जन्म दिया, तो शेर ने कहा कि अब से तुम शिकार पर मत जाना. घर पर रहकर अपनी और बच्चों की देखभाल करना. अब से मैं अकेले ही शिकार पर जाऊंगा और हम सब के लिए शिकार लेकर आऊंगा. शेरनी अब घर पर रहकर बच्चों की देखभाल करती और शेर अकेले ही शिकार पर जाता.

उनकी ज़िंदगी मज़े से चल रही थी कि एक दिन शेर को कोई भी शिकार नहीं मिला. उसने बहुत ढूंढ़ा, यहां तक कि वो दूसरे जंगल में भी गया लेकिन उसके हाथ कुछ न लगा. आख़िरकार थक हारकर वह खाली हाथ ही घर की तरफ जा रहा था कि रास्ते में उसे एक लोमड़ी का बच्चा अकेले घूमता हुआ दिखाई दिया. शेर को पहले तो लगा कि ये बहुत ही छोटा बच्चा है, पर फिर उसने सोचा आज उसके पास शेरनी और बच्चों के लिए कोई भोजन नहीं है, तो वह इस लोमड़ी के बच्चे को ही अपना शिकार बनाएगा. शेर ने लोमड़ी का बच्चा पकड़ा, पर वह बहुत छोटा था, जिस वजह से वह उसे मार नहीं सका. वह उसे ज़िंदा ही पकड़कर घर ले गया.

घर जाकर शेरनी उसने सारा क़िस्सा बताया कि आज उसे एक भी शिकार नहीं मिला और वापसी में रास्ते में उसे यह लोमड़ी का बच्चा दिखाई दिया, तो वह उसे ही मारकर खा जाए. शेर की बातें सुनकर शेरनी बोली- जब तुम इसे बच्चे को नहीं मार पाए, तो मैं इसे कैसे मार सकती हूं? मैं इसे नहीं खा सकती है. इसे भी मैं अपने दोनों बच्चों की ही तरह पाल-पोसकर बड़ा करूंगी और यह अब से हमारा तीसरा पुत्र होगा.

उसी दिन से शेरनी और शेर लोमड़ी के बेटे को भी अपने पुत्रों ही तरह प्यार करने लगे और वो बच्चा भी शेर के परिवार के साथ घुल-मिल गया और वो उनके साथ बहुत खुश था. वो अब उनके परिवार उन्हीं के साथ खेलता-कूदता और बड़ा होने लगा. तीनों ही बच्चों को लगता था कि वह सारे ही शेर हैं. लोमड़ी का बच्चा भी इस अंतर को नहीं समझ पाया और न ही शेर के दोनों बच्चे.

जब वो तीनों थोड़े और बड़े हुए, तो खेलने के लिए जंगल में जाने लगे. एक दिन जंगल में खेलते-खेलते उन्होंने वहां एक हाथी को देखा. शेर के दोनों बच्चे उस हाथी के पीछे शिकार के लिए लग गए, लेकिन वहीं लोमड़ी का बच्चा इतने बड़े हाथी को देख डर गया और डर के मारे वापस घर पर शेरनी मां के पास आ गया. लोमड़ी के बच्चे ने अपने भाइयों को भी हाथी के पीछे जाने से मना किया था लेकिन वो दोनों नहीं माने.

कुछ देर बाद जब शेरनी के दोनों बच्चे भी वापस आए, तो उन्होंने जंगल वाली बात अपनी मां को बताई. उन्होंने बताया कि वह हाथी के पीछे गए, लेकिन उनका तीसरा भाई डर कर घर वापस भाग आया. अपने भाइयों की बातें सुनकर लोमड़ी के बच्चे को बहुत ग़ुस्सा आया और वो बहुत ग़ुस्सा हो गया. उसने गुस्से में कहा कि तुम दोनों जो खुद को बहादुर बता रहे हो, मैं तुम दोनों को पटकर ज़मीन पर गिरा सकता हूं.

लोमड़ी के बच्चे की बात सुनकर शेरनी ने उसे समझाया कि उसे अपने भाइयों से इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए. शेरनी मां की बात लोमड़ी के बच्चों को अच्छी नहीं लगी. गुस्से में उसने कहा, तो क्या आपको भी लगता है कि मैं डरपोक हूं और हाथी को देखकर डर गया था?

लोमड़ी के बच्चे की इस बात को सुनकर शेरनी उसे अकेले में ले गई और उसे उसके लोमड़ी होने का सच बताया. हमने तुम्हें भी अपने दोनों बच्चों की तरह ही बड़ा किया है, उन्हीं के साथ तुम्हारी भी परवरिश की है और तुमसे हम बहुत प्यार करते हैं, लेकिन तुम लोमड़ी वंश के हो और अपने वंश के कारण ही तुम हाथी जैसे बड़े जानवर को देखकर डर गए और घर वापस भाग आए. वहीं, तुम्हारे दोनों भाई शेर वंश के हैं, जिस वजह से वह हाथी का शिकार करने के लिए उसके पीछे भागे थे.

शेरनी ने आगे कहा कि अभी तक तुम्हारे दोनों भाईयों को तुम्हारे लोमड़ी होने का पता नहीं है. लेकिन जिस दिन उन्हें यह पता चलेगा वह तुम्हारा भी शिकार कर सकते हैं. इसलिए, तुम्हारे लिए भी अच्छा होगा कि तुम यहां से जल्द ही चले जाओ और अपने वंश के लोगों के साथ रहो… तुम यहां से भागकर अपनी जान बचा लो.

शेरनी से अपने बारे में अपना सच सुनकर लोमड़ी का बच्चा वाक़ई डर गया और मौका मिलते ही वह रात में वहां से छिपकर भाग गया.

सीख: जंगल का अपना क़ानून है और हर जानवर का स्वभाव व आदत अपने वंश पर ही होती है फिर भले ही वो निडर और बहादुर लोगों के बीच रहें. वहीं दूसरी ओर ये कहानी यह भी बताती है कि शेर होने बाद भी लोमड़ी के बच्चे से प्यार व उसका पालन-पोषण करना यही दर्शाता है कि जानवरों के मन में भी प्यार और दया का भाव होता है.

बहुत समय पहले की बात है, हिम्मतनगर नाम के एक गांव में दो मित्र रहते थे, जिनका नाम धर्मबुद्धि और पापबुद्धि था. धर्मबुद्धि सीधा-साधा ईमानदार और नेक इंसान था और पापबुद्धि बेहद धूर्त और चालाक था. पापबुद्धि के चालक मन में एक दिन ये ख्याल आया कि मैं धर्मबुद्धि के साथ दूसरे नगर जाकर ढेर सारा धन कमाऊंगा और किसी ना किसी तरीके से वह सारा धन धर्मबुद्धि से हड़प लूंगा और आगे का सारा जीवन बड़े ही सुख-चैन से बिताऊंगा.

उसने किसी ना किसी तरीके से धर्मबुद्धि को अपने साथ चलने के लिए तैयार कर लिया और फिर दोनों अन्य नगर के लिए निकल गए. जाते समय वे अपने साथ ढेर सारा सामान लेकर गए थे और उसे अन्य नगरी में मुंह मांगे दामों में बेचकर खूब पैसा और स्वर्ण मुद्राएं इकट्ठी कर ली. दोनों ख़ुशी-ख़ुशी अपने गांव की ओर लौटने लगे.

गांव से पास पहुंचने पर बस कुछ दूर पहले ही पाप बुद्धि ने धर्म बुद्धि से कहा- अगर हम इतना सारा धन एक साथ गांव में ले जाएंगे तो हो सकता है कि गांव वाले हमसे कुछ धनराशि कर्ज के रूप में ले लें या हो सकता है कि लोग हमसे जलने लगें या फिर कोई चोर इस धन को हमसे चुरा ले. इसलिए हमें इस धन को किसी सुरक्षित स्थान पर छुपा देना चाहिए. इतना सारा धन एक साथ देखने पर तो किसी साधु-संन्यासी, योगी-महात्मा का मन भी डोल सकता है.

धर्मबुद्धि ने पापबुद्धि की बात से सहमति जताई और दोनों ने जंगल में एक सुरक्षित जगह खोजी और एक पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर उसमें धन को छिपा दिया. इसके बाद दोनों गांव चले गए.

एक रात पापबुद्धि ने मौका पाकर जंगल में जाकर वो सारा धन निकाल लिया और अपने साथ ले गया. धर्मबुद्धि इस बात से अनजान था और कई दिन बीत जाने के बाद वो पापबुद्धि के पास आया और बोला- भाई मुझे धन की आवश्यकता आ पड़ी है, आप चलो मेरे साथ तो हम दोनों उस गाढ़े हुए धन को निकाल लाते हैं. पापबुद्धि तैयार हो गया.

दोनों ने जब इस पेड़ के पास से मिट्टी हटाई तो वहां पर कुछ नहीं था. पापबुद्धि ने सीधे-सीधे धर्मबुद्धि पर धन चुराने का आरोप लगा दिया. इस बात पर दोनों में बहस होने लगी और फिर जब दोनों में झगड़ा बढ़ा तो दोनों न्यायाधीश के पास पहुंचे.

दोनों से कहा गया कि वो अपना पक्ष रखें. इसके बाद न्यायाधीश ने सच्चाई का पता लगाने के लिए दिव्य परीक्षा लेने का निर्णय लिया और दोनों से कहा कि वो जलती हुई आग में हाथ डालें. पापबुद्धि ने इसका विरोध किया और कहा कि आग में हाथ डालने की ज़रूरत नाहीं है, सच्चाई की गवाही तो वन देवता देंगे. न्यायाधीश तैयार हो गए.

धूर्त पापबुद्धि ने पहले ही एक खोखले वृक्ष के तने में अपने पिता को बैठा दिया था. जब उस पेड़ के पास पहुंच कर न्यायाधीश ने वन देवता से पूछा कि दोनों में से चोर कौन है तो पेड़ के तने से आवाज़ आई कि चोर धर्मबुद्धि है.

धर्मबुद्धि ने जब यह सुना तो उसने उस पेड़ के नीचे आग लगा दी. थोड़ी देर में जब आग बढ़ने लगी तो पापबुद्धि का पिता भी जलने लगा और कुछ देर में आग से झुलसने के कारण पापबुद्धि का पिता रोने-चिल्लाने लगा और वो तड़पते हुए उस पेड़ से बाहर निकल आया वो भी एकदम झुलसा हुआ और उसने न्यायाधीश के सामने पापबुद्धि की सारी योजना का खुलासा कर दिया.

सच्चाई सामने आने पर न्यायाधीश ने पापबुद्धि को मौत कि सज़ा सुनाई.

सीख: लालच बुरी बला है और उससे भी बुरा है अपनों के साथ धोखा और विश्वासघात करना. इन बुराइयों से दूर रहें और ईमानदारी व सच्चाई के साथ चलें.

एक घने जंगल में एक उल्लू रहता था. उसे दिन में कुछ भी दिखाई नहीं देता था, इसलिए वह दिनभर पेड़ में ही छिपकर रहता और रात होने पर बाहर भोजन ढूंढ़ने निकलता था. वो इसी तरह नियमित रूप से अपनी दिनचर्या का पालन करता था.

एक रोज़ भरी दोपहर में कहीं से एक बंदर उस पेड़ पर आया. उस दिन बहुत तेज गर्मी थी. गर्मी से बचने के लिए वो बंदर पेड़ पर ही बैठ गया और कहने लगा कि कितनी तेज़ गर्मी है. ऐसा लग रहा है मानो आसमान में सूरज नहीं कोई आग का गोला चमक रहा है जो आग बरसा रहा है.

बंदर की बातें सुनकर उल्लू से रहा नहीं गया और वो बोला कि ये तुम क्या कह रहे हो? ये तो सरासर झूठी बात है. हां, अगर तुम सूरज नहीं चांद के चमकने की बात कहते तो मैं मान भी लेता.

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उल्लू की बातें सुन बंदर ने कहा- अरे भाई, दिन में भला चंद्रमा कैसे चमक सकता है, वो तो रात को ही आता है. दिन के समय के तो सूरज ही होता है और उसी की वजह से इतनी गर्मी भी हो रही है. बंदर ने उल्लू को अपनी बात समझाई. लेकिन उल्लू था कि अपनी ज़िद पर अड़ा रहा और बंदर से लगातार बहस किए जा रहा था.

जब दोनों के बीच तर्क-वितर्क का कोई परिणाम नहीं निकला तो उल्लू ने कहा कि ऐसा करते हैं मेरे मित्र के पास चलते हैं और उससे पूछते हैं. वही सच बताएगा.

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उल्लू की बात मानकर बंदर उसके साथ चल पड़ा. वो दोनों एक दूसरे पेड़ पर गए जहां एक-दो नहीं, बल्कि कई सारे उल्लुओं का झुंड था. उल्लू ने उन सबसे कहा कि ये बताओ आसमान में क्या सूरज चमक रहा है?

सभी उल्लू ज़ोर से हंस पड़े और बोले अरे तुम मूर्खों वाली बात क्यों कर रहे हो? आसमान में तो चांद ही चमक रहा है. बंदर काफ़ी हैरान था लेकिन वो भी अपनी बात पर अड़ा रहा. सभी उल्लू ने उसका खूब मज़ाक़ उड़ाया, लेकिन जब बंदर ने उनकी बात नहीं मानी तो उन सबको ग़ुस्सा आ गया और वो बंदर को मारने के लिए एक साथ उस पर झपट पड़े.

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दिन का समय था और इसी वजह से उल्लुओं को कम दिखाई दे रहा था, इसलिए बंदर किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से भागने में कामयाब हो पाया.

सीख: मूर्खों से बहस करना बेवक़ूफ़ी है क्योंकि वो कभी भी बुद्धिमान लोगों की बातों को सच नहीं मानते और ऐसे लोग बहुमत के चलते सत्य को भी झुठला कर असत्य साबित कर देते हैं. इसलिए ऐसे लोगों को समझने या उनसे तर्क करने का कोई फायदा नहीं.

 

short Story, Aur Woh Chala Gaya

स्वप्निल अब उसके लिए इस तरह हो गया था, जिस पर न कोई अधिकार है, न उलाहना. प्रेम अब भी उसे ही करती है, पर इस तरह नहीं जैसे एक औरत मर्द को प्रेम करती है, बल्कि इस तरह जैसे कोई इंसान ईश्‍वर से प्रेम करता है.

यह कहानी है एक औरत की, जिसमें वही चेतना बसती थी, जो आम औरतों में होती है. बस, उसकी क़िस्म अलग थी… उसका नाम था ‘तितिक्षा’. उसने प्रहर सचदेवा के साथ घर बसाया था, लेकिन एक अबूझ कसक हमेशा उसके मन में बनी रहती. कैसा विचित्र जुड़ाव था वो? काया का संपूर्ण समर्पण भाव था, पर मन फिर रह-रहकर इस कदर उचाट क्यों हो जाता था? पति के सारे काम करना, लोगों से बातें करना, पति के मित्रों से मिलना- ये सारे काम आराम से करती थी. पर ये सब करते हुए भी एक बेचैनी-सी पूरे अस्तित्व पर छाई ही रहती थी.
तितिक्षा अति संवेदनशील थी- ख़ुद के प्रति भी और दूसरों के प्रति भी. उसका मानना था कि भावनाओं की अभिव्यक्ति एक कला है, जो जीवन से धीरे-धीरे सीखी जा सकती है.
अक्सर वह एक सपना देखती है कि वो दौड़ रही है, उसके पीछे लोग दौड़ रहे हैं और अंत में सामने समंदर है, लोग हंस रहे हैं और पूछते हैं, “अब कहां जाओगी?” घबराकर वह पानी पर पैर रखती है, तो देखती है कि पानी तो नर्म बिछौने जैसा है और वो बड़ी सहजता से पानी पर चलती जा रही है. उस पार कोई है, जो बांहें फैलाए उसकी प्रतीक्षा में खड़ा है, लेकिन उसका चेहरा साफ़-साफ़ नज़र नहीं आ रहा है.
शुरू-शुरू में वह इस सपने से चौंक पड़ती थी, फिर धीरे-धीरे उसे लगने लगा था कि उसके शरीर में एक नहीं, दो स्त्रियां हैं. एक- जिसका नाम तितिक्षा था, जो किसी की बेटी थी, श्री प्रहर सचदेवा की पत्नी थी, जिसकी जाति हिंदू थी, देश भारत था और जिस पर कई नियम-क़ानून लागू होते थे. और दूसरी- जिसका नाम औरत के सिवा और कुछ न था, जो धरती की बेटी थी और आकाश का वर ढूंढ़ रही थी, जिसका धर्म प्रेम था और देश-दुनिया थी और जिस पर एक ‘तलाश’ को छोड़ कोई नियम-क़ानून लागू नहीं होता था. फिर धीरे-धीरे उसे इस स्वप्न में आनंद आने लगा.

फिर एक दिन अचानक एक घटना घटी. वह किसी के घर गई थी. वहीं एक व्यक्ति से मुलाक़ात हुई. शक्ल-सूरत, क़द-काठी सामान्य थी, मगर उसकी आंखें बिल्कुल उसके सपनोंवाले बुत की तरह थीं- गहरी और बोलती हुई. वह कितनी देर उसे देखती रही थी. फिर पता चला कि उसका नाम स्वप्निल था. तितिक्षा ने चिकोटी काटी ख़ुद को कि कहीं यह सपना तो नहीं था. मेरा मन शायद वर्षों से कुछ मांग रहा था. सूखे पड़े जीवन के लिए मांग रहा था- थोड़ा पानी और अचानक बिन मांगे ही सुख की मूसलाधार बारिश मिल गई.
अब उसमें बदलाव आने लगा था. जब एक तितिक्षा अपने पति के पास बैठी होती, दूसरी स्वप्निल के पास बैठी होती. एक तितिक्षा के पास शरीर का अस्तित्व था, दूसरी तितिक्षा के पास कल्पनाओं की अपनी दुनिया थी.
अब वह कल्पना की जगह सचमुच स्वप्निल से बातें करना चाहती थी, उससे मिलना चाहती थी. फिर एक दिन उसने दोस्तों के साथ स्वप्निल को भी चाय पर बुलाया. सभी गपशप कर रहे थे, तभी एक मित्र ने कहा, “मेज़बान की तारीफ़ में सभी लोग एक-एक वाक्य काग़ज़ पर लिखकर दें. देखें, कौन कितना अच्छा लिखता है?” सभी ने लिखकर दिया, जब स्वप्निल की बारी आई, तो उसने हाथ में ली हुई क़लम से खेलते हुए तितिक्षा की तरफ़ देखा और धीरे से तितिक्षा के कान के पास आकर बोला, “मुझे लिखना नहीं आता, क्योंकि किसी के दिल की कोई भाषा नहीं होती. मुझे तो बस आंखों की भाषा पढ़नी आती है.” और तितिक्षा ने पहली बार जाना कि आंखें मौन रहकर भी कितनी स्पष्ट बातें कर जाती हैं और वह कांप गई थी. मगर उसने महसूस किया कि बचपन से जिस उदासी ने उसके अंदर डेरा जमा रखा था, वो आज दूर चली गई थी. एक उत्साह, एक उमंग-सी भर गई थी उसके रोम-रोम में.
सबके चले जाने के बाद तितिक्षा ने स्वप्निल के जूठे प्याले में बची हुई ठंडी चाय का घूंट लेकर सोचा कि क्या मैं दीवानी हो गई हूं? जैसे उसने एक ऐसी वस्तु का आस्वादन कर लिया था, जो पहले कभी नहीं पी थी. फिर ख़ामोशी से कितने ही दिन बीत गए.
एक शाम वो घर में अकेली थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई, दरवाज़ा खोला तो सामने स्वप्निल खड़ा था. उसकी जो दृष्टि तितिक्षा की ओर उठी थी, वह असावधान नहीं थी, वह मूक भी नहीं थी. आंखों में ज़ुबान उग आई थी. वह एक पुरुष की मुग्ध दृष्टि थी, जो नारी के सौंदर्य के भाव से दीप्त थी. दृष्टि तितिक्षा की आंखों पर टिकी थी. उसकी आंखें झुक गईं, पर वह इस तथ्य के प्रति पूरी सचेत थी कि स्वप्निल की दृष्टि ने अब संकोच छोड़ दिया है. वह ढीठ हो गई है. उसकी दृष्टि जैसे देखती नहीं थी, छूती थी. वह जहां से होकर बढ़ती थी जैसे रोम-रोम को सहला जाती थी. तितिक्षा का शरीर थर-थर कांप रहा था. उसकी समझ में बिल्कुल नहीं आ रहा था कि उसका मन इतना घबरा क्यों रहा है? वह पहली बार किसी पुरुष से नहीं मिली थी, न ही पहली बार किसी पुरुष के सान्निध्य में आई थी. उसने पुरुष दृष्टि का न जाने कितनी बार सामना किया था, मगर ये दृष्टि उसे व्याकुल कर रही थी. स्वप्निल की दृष्टि में प्रशंसा थी और वह प्रशंसा तितिक्षा के शरीर को जितना पिघला रही थी, उसका मन उतना ही घबरा रहा था.
“आप बहुत सुंदर हैं, तन और मन दोनों से.” स्वप्निल ने धीरे-से मुस्कुराते हुए कहा. अपने रूप की प्रशंसा सबको अच्छी लगती है. युवक उसके रूप की प्रशंसा कर रहा था और वह ऐसे भयभीत थी, जैसे कोई संकट आ गया हो. वह सम्मोहित-सी देखती रही. पर उसका विवेक लगातार हाथ में चाबुक लिए उसे पीट रहा था, ‘यह ठीक नहीं है तितिक्षा! ये ठीक नहीं है! संभल जा.’
तभी स्वप्निल ने कहा, “उस दिन ग़लती से आपकी क़लम मेरे पास रह गई थी.” उसने कलम निकालकर तितिक्षा की ओर बढ़ा दी. मुहब्बत में सारी शक्तियां होती हैं, एक बस बोलने की शक्ति नहीं होती! तितिक्षा ने इतना ही कहा, “यह जहां है, इसे वहीं रहने दीजिए ना!”
“तभी इतने दिनों तक लौटाने नहीं आया था.” उसने शरारतभरी निगाहों से कहा. थोड़ा आगे झुककर उसे ध्यान से देखा और बोला, “आप अपना महत्व नहीं जानतीं, कैसे जानेंगी? आपके पास अपनी नज़र है मेरी नहीं. मेरी नज़रों से देखेंगी तो जानेंगी कि आप क्या हैं? पता है, आपको देखा तो मुझे यह समझ में आया कि मां की आवश्यकता पुरुष को तभी तक होती है, जब तक वो अबोध होता है. बोध होने पर उसे मां नहीं, प्रियतमा की आवश्यकता होती है, जिससे वो अपने वयस्क प्रेम की प्रतिध्वनि पा सके.” और हाथ की सिगरेट बुझाकर उसने तितिक्षा की ओर इतनी उदास नज़रों से देखा कि तितिक्षा को लगा था- वह एक औरत नहीं थी, एक सिगरेट थी, जिसको स्वप्निल ने एक ही नज़र से सुलगा दिया था और वह चला गया.
उस दिन के बाद से तितिक्षा तितिक्षा नहीं रही, एक सुलगती सिगरेट बन गई थी, जिसे स्वप्निल ने सुलगा दिया था, पर पीने का अधिकार नहीं लिया था. वह कला में निपुण नर्तकी की तरह अपने यथार्थ और कल्पना दोनों के साथ खेल रही थी और फिर एक दिन उसे पता चला कि स्वप्निल को कोई दूसरी नौकरी मिल गई है और वो मुंबई जा रहा है. वो स्वप्निल से मिलने गई और पूछा, “तुम्हें इसी तरह चले जाना था? मुझे बता नहीं सकते थे?” जाने उसकी आवाज़ किन गहराइयों से निकल रही थी कि उसे ख़ुद भी सुनाई न दी थी.
“मैं रात को आया था आपके घर, कमरे की लाइट ऑफ थी. मैंने सोचा, आप लोग सो रहे होंगे, सो मैं बाहर से ही लौट आया.”
“काश! आप मिले ही न होते.” तितिक्षा के मुंह से अनायास ही निकल गया. वो देखता रह गया और फिर बोला, “इसीलिए तो जा रहा हूं, क्योंकि यहां रहना अब मेरे लिए बहुत मुश्किल है.” और वो विदा लेकर घर लौट आई.
उस रात तितिक्षा अपने पति के साथ बस लेटी हुई थी. उसके शरीर को अपने शरीर से सटाकर ये पलंग पर लेटा हुआ कौन-सा आदमी था? यह वही रात थी, उसे अच्छी तरह याद है कि जब एक मासूम उसकी कोख में आया. उसकी चेतना में स्वप्निल ही था. इसके बाद उसने डायरी लिखनी शुरू की और फिर ये डायरी उसकी ऐसी आवश्यकता बन गई थी जैसे दर्पण, जिसमें वह ख़ुद को देख सकती थी. एक दिन अचानक ये ख़याल आया कि अगर ये डायरी किसी ने पढ़ ली तो…?
उसने निश्‍चय किया कि वो डायरी को पराए हाथों से बचाने के लिए जला देगी. मगर जब वो डायरी को तीली लगाने लगी, तो उसके हाथ बिलख उठे- अगर कभी एक बार इस डायरी को स्वप्निल पढ़ लेता- मैं भले ही मर जाऊं, तब भी कभी उसे ध्यान आता और सोचता… एक थी तितिक्षा.
फिर एक दिन वो भी आया, जब तितिक्षा ने एक सुंदर बच्चे को जन्म दिया. और एक अजीब इत्तेफ़ाक हुआ कि स्वप्निल का कल्पित मुख और बच्चे का यथार्थ मुख मिलकर एक हो गया था. बच्चे की शक्ल हूबहू स्वप्निल से मिलती थी. उसके अंदर की प्रेमिका और मां मिलकर एक हो रही थीं. एक संतुष्टि थी, जिससे अंदर की दरार मिटती जा रही थी. वह सोचने लगी थी कि अब वो पति के साथ न्याय कर सकेगी. आख़िर वो एक नेक आदमी था और वो उसके बच्चे का बाप था. भले ही वो और उसका पति कभी उलझे नहीं थे. दोनों एक-दूसरे की बातों में सहमति देते थे. और दिखने में दोनों का जीवन शांत पानी-सा दिखता था, पर अंदर ही अंदर दोनों को पता था कि ये शांत ठहरा पानी गंदलाने पर आ गया है. इस पानी पर ख़ामोशी की काई जमने लगी थी, क्योंकि पति को अभिव्यक्ति की कला आती ही नहीं थी.
विभोर- यही नाम रखा था उसने अपने बच्चे का! विभोर जब स्कूल जाने लगा तो तितिक्षा की विकलता बढ़ गई. धीरे-धीरे वो ख़ुद से बातें करने लगी थी. एक दिन अचानक स्वप्निल उसके दरवाज़े पर खड़ा था. उसे महसूस हुआ जैसे उसके पैरों के नीचे ज़मीन नहीं है.
“कब आए?” कुछ देर बाद तितिक्षा ने कहा.
“कल आया.”

“अब तो शादी कर ली होगी?” अचानक सोफे पर बैठते हुए तितिक्षा ने पूछा.
“जिसके साथ शादी करना चाहता था, उसने मुझसे पहले ही किसी के साथ शादी कर ली है… फिर मैं किससे शादी करूं?” तितिक्षा ने संभलकर उसकी तरफ़ देखा. न जाने क्यूं उसकी आंखों का सामना न कर सकी और सिर झुका लिया. दोनों के बीच गहरी ख़ामोशी छाई रही. तितिक्षा को पता ही नहीं चला कि स्वप्निल कब उसके पीछे आकर खड़ा हो गया था और उसकी सांसें उसकी गर्दन को छू रही थीं. उसने कोशिश की, मगर उससे कुछ बोला न गया. तितिक्षा के होंठों पर स्वप्निल के होंठ झुके हुए थे और तितिक्षा, उसे तो जैसे याद ही नहीं कि उसके शरीर में किसी और के प्यार की स्मृति है भी या नहीं!
“यह तुमने मेरे साथ क्या किया?” तितिक्षा की आवाज़ कांप रही थी. स्वप्निल ने उसे उठाकर पलंग पर बैठा दिया था और ख़ुद पलंग के एक कोने पर बैठ गया. “तुमने मुझसे कभी भी बात नहीं की. मैं इतने सालों तक ख़ुद से बातें करती रही हूं.” तितिक्षा ने धीरे-से कहा.
“मैं सोचता था तुम्हारी शादी हो चुकी है… एक बसे हुए घर को उजाड़ना नहीं चाहता था.”
“पर जब कोई किसी की कल्पना में आ जाए और जीवन में न आए, तो मेरे ख़याल से वो एक बसता हुआ घर नहीं रह जाता. आंखें बंदकर जब कोई औरत किसी और को याद करती है, पर आंखें खोलकर किसी दूसरे का चेहरा देखती है तो इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है?” तितिक्षा ने नज़रें स्वप्निल के चेहरे पर गड़ा दीं. “मैं क़ानून नहीं समझती, धर्म नहीं समझती, समझती हूं तो स़िर्फ इंसान को और इंसान के सरल स्वभाव को.”
“मैंने ये सोचा ही नहीं था कि तुम भी मुझसे प्यार कर सकती हो, क्योंकि समाज के इस ढांचे को तोड़ना सरल नहीं होता. मैंने कई वर्ष सोचने में ही बिता दिए. मैं अंदर और बाहर से एक होकर जीना चाहता हूं, पर आज मेरा सब्र टूट गया है.” स्वप्निल बोलते-बोलते मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गया. उसके हाथ तितिक्षा के घुटनों पर थे और आंखें जैसे तरल होकर उसकी आंखों में समाई जा रही थीं. उसे हैरानी हो रही थी- विश्‍वास नहीं हो रहा था कि यह उसके जीवन से जुड़ा कोई दृश्य है. उसे अच्छा लग रहा था. ऐसा पल उसकी कल्पना में ही था. कहीं कोई पुरुष अहं नहीं! प्रेम आदमी को और ज़्यादा इंसान बनाता है.
स्वप्निल के निर्मल प्रेम ने उसे ये एहसास कराया था.
वो एक रूढ़िवादी परिवार की लड़की थी और उससे भी ज़्यादा रूढ़िवादी परिवार की बहू! वो ख़ुद यह नहीं समझ पा रही है कि उसके लिए यह कैसे संभव है कि घर में सक्षम-संपन्न पति के रहने के बावजूद वो ग़ैर मर्द के स्पर्श को उत्सुक हो रही है? कहां गए वर्षों पुराने संस्कार, जिन्हें खून में संचारित करते हुए इतने वर्षों में किसी पुरुष के प्रति कोई आकर्षण तक न जागा था? आंखें मूंदकर उसने अनुभव किया कि ये कोई अपरिचित पुरुष नहीं है, बल्कि उसका स्वप्न पुरुष है.


तितिक्षा ने पाया कि एक हाथ सिरहाने रखकर दूसरे हाथ से स्वप्निल ने उसे आलिंगन में लेना चाहा, “नहीं स्वप्निल, नहीं.” तितिक्षा ने हाथ पकड़कर उसे रोक दिया.
“क्यों…?” स्वप्निल की आवाज़ अटक गई. मगर उसने कोई उत्तर नहीं दिया. उसकी विचारशक्ति स्तब्ध थी. वह धीरे-से उठा और खिड़की के पास खड़ा हो गया, उसकी तप्त श्‍वासों को शीतल वायु की ज़रूरत थी. फिर वहीं खड़े-खड़े बोला, “चलो तितिक्षा, मुझे दरवाज़े तक छोड़ आओ.” उसने देखा स्वप्निल का रंग स़फेद पड़ गया था. उसकी आवाज़ आज्ञा की तरह थी. तितिक्षा उसके साथ बाहर तक आ गई और वो चला गया. अंदर आकर वो सोफे पर गिर पड़ी. उसे लगा मिनटों में ये क्या से क्या हो गया? क्या यह किसी का अपराध है? मेरा या स्वप्निल का? या फिर यह मेरी विवेकहीनता थी? या फिर अचानक होनेवाली कोई भूल? कोई दुर्घटना…? क्या कहेंगे इसे? यह मैंने क्या कर दिया? जिन हाथों की इतने वर्षों तक प्रतीक्षा करती रही, आज खाली लौटा दिया? देह के भीतर अच्छा लगने की इतनी तीव्र अनुभूति क्यों? अब क्या करूं इस शरीर का? इसे पवित्र रखकर मैंने क्या संवार लिया? क्या पवित्रता यही होती है? यह शरीर उसको अर्पित न हुआ, जिसके लिए बना था. स्त्रियों के चरित्र और चरित्रहीनता का मामला स़िर्फ शारीरिक घटनाओं से क्यूं तय किया जाता है? कितना विचित्र नियम है? सोचते-सोचते उसकी आंख लग गई, जैसे उसमें हिलने की भी शक्ति नहीं रही थी.

अचानक विभोर की आवाज़ से वो हड़बड़ाकर उठी और उसे गले लगा लिया और सोचा कि इसे लेकर उसके पास जाऊंगी और कहूंगी कि देखो, बिल्कुल तुम्हारी अपनी सूरत है विभोर में. मगर दूसरे ही क्षण उसे लगा कि भला वह किस तरह मेरी बात मानेगा? आज से पहले तो मैंने कभी उसका हाथ भी नहीं छुआ था, कौन-सा विज्ञान ये मानेगा भला? और आज भी कौन-सा छुआ है? मैंने उसके स्वाभिमान को बहुत चोट पहुंचाई है. सालों से उसने जब्त किया था. ये प्रेम में कुछ पाना नहीं था, बल्कि ख़ुद को समर्पित करना था. वो ये क्यूं नहीं समझ सका कि औरत के इंकार में उसके संस्कार भी तो होते हैं. औरत जब किसी से प्यार करती है तो पूरा प्रेम करती है. फिर वह अपने पास कुछ नहीं रखती. आगे के कुछ दिन याद नहीं कैसे बीते थे. दिल की बात किसी से कह नहीं सकती थी. और एक दिन पता चला कि स्वप्निल शहर छोड़कर कहीं और चला गया. उस रात अधिकांशतः नींद तितिक्षा के सिरहाने ही बैठी रही.
तितिक्षा को अपनी पराजय को स्वीकार करने का एक अजीब साहस हुआ. उसने सोचा कि कम से कम मैं अपने पति से सच तो बोल सकती हूं.
एक रात तितिक्षा ये साहस अपने होंठों पर ले आई, “मैं यहां नहीं रहना चाहती.”
“क्यों?” उसके पति ने आश्‍चर्य से पूछा.
“मैं सदा आपका आदर करती हूं, पर सोचती हूं कि किसी का आदर करना ही काफ़ी नहीं होता.” प्रहर पथराई आंखों से उसे देख रहा था.
“तुम्हें क्या तकलीफ़ है तितिक्षा?”
“आपकी दी हुई कोई तकलीफ़ नहीं है.”
“फिर…? ये सब क्या है?”
“बस, इतना कि मुझे यहां सब कुछ निर्जीव-सा लगता है.” और फिर अपनी ही बात पर मुस्कुराकर तितिक्षा बोली, “यहां मुझे ऐसा लगता है कि मैं जीये बिना ही मर जाऊंगी. मुझे मरने से डर नहीं लगता, पर मैं मरने से पहले कुछ दिन जीकर देखना चाहती हूं. भले ही वो थोड़े-से दिन हों.” तितिक्षा ने थके हुए स्वर में कहा.
प्रहर को किसी प्रश्‍न या उत्तर से डर नहीं लगा था, लेकिन आज तितिक्षा से प्रश्‍न करने में उसे डर लग रहा था. उसने डरते-डरते पूछा, “तुम्हारे जीवन में कोई और है?”
“है भी और नहीं भी.” तितिक्षा ने जवाब दिया. “क्योंकि वह आदमी मेरे जीवन में उतना नहीं है, जितना मेरी कल्पना में है.”
“मैं स़िर्फ इतना जानना चाहता हूं कि वो कौन है?”
“स्वप्निल…” तितिक्षा जैसे नींद में बोल रही थी.
“उसे तो शहर से गये कई वर्ष हो गए हैं..”
“हां..”
“इन सालों में कभी वो यहां आया है?”
“एक बार. मुझे नहीं पता वो कितने दिन रहा, बस मैं उससे 2 घंटे के लिए मिली थी.”
“क्या वो तुम्हें पत्र लिखता है?”
“कभी नहीं..” प्रहर को ये बड़ा अजीब लगा. उसने ये भी पूछ लिया जो उसने सोचा भी न था.
“तुम और स्वप्निल कभी…?”
“जिन अर्थों में आप पूछना चाह रहे हैं, उन अर्थों में कभी नहीं.”

प्रहर को क्रोध की बजाय निराशा ने घेर लिया. तितिक्षा को लगा, यदि प्रहर सख़्ती से पेश आते तो अच्छा होता, क्योंकि जो आदमी सख़्ती करे, उससे घृणा की जा सकती है और जिससे घृणा हो जाए, उससे टूटने में देर नहीं लगती.
घर में एक ख़ामोशी ने घर कर लिया था और इस माहौल में तितिक्षा को घुटन होती थी. अपनी घुटन से निकलने के लिए एक दिन वो अपनी सहेली के घर गई, जहां उसे पता चला कि यहां से जाने के बाद स्वप्निल का नर्वस ब्रेक डाउन हो गया था और वह अभी तक बीमार है, सुनकर तितिक्षा कांप गई थी. उसे लगा उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वही है. वह घर आकर अपनी बेबसी पर बहुत रोई. रोते-रोते उसका ध्यान विभोर की तरफ़ गया, जो उसके आंसू पोंछने की कोशिश कर रहा था. उसे लगा वो एक बच्चे का मुंह नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली और जवान मर्द का मुंह है. एक सच्चे दोस्त का मुंह, जो इस समय एक मां को ढाढ़स नहीं बंधा रहा था, एक औरत की मजबूरी से बातें कर रहा था. बच्चे को मां के दुख का ज्ञान नहीं था. उससे केवल मां के आंसू न देखे गए और वह एक शाश्‍वत मर्द बनकर एक शाश्‍वत औरत के आंसू पोंछ देना चाहता था. तितिक्षा ने तड़पकर विभोर को आलिंगन में कस लिया.
समाज में हर स्त्री को घुट-घुटकर मर जाना तो आता है, पर सांस लेने के लिए किसी भी खिड़की या दरवाज़े को तोड़ देना नहीं आता है.
उसने अपनी डायरी में लिखा, ‘अगर कहीं मुझे स्वप्निल न मिलता, तो मैं कल्पना की दुनिया में जीती और मर जाती. स्वप्निल! अपने जीवन की राह पर चलते-चलते उस स्थान पर आ गई हूं, जहां से कई राहें अलग-अलग दिशाओं में जाती हैं. मैं नहीं समझ पा रही कि मैं किधर जाऊं? मुझे लगता है, सभी राहें तुम्हारी तरफ़ जाती हैं. आज किसी एक राह में खड़ा कोई मुझे पुकार रहा है और किसी राह से कोई आवाज़ नहीं आती, इसीलिए मैं उस एक राह की ओर मुड़ रही हूं…!’
उसकी ज़िंदगी ने एक और नया मोड़ ले लिया था. अब उसकी शेष आयु स़िर्फ पानी का बहाव बन गई थी. इस बहाव में कुछ पल सांस लेने के लिए दो किनारे थे… एक विभोर और दूसरी दुनियाभर की क़िताबें, जो उसके हाथ में आकर छूटने का नाम नहीं लेती थीं. स्वप्निल अब उसके लिए इस तरह हो गया था, जिस पर न कोई अधिकार है, न उलाहना. प्रेम अब भी उसे ही करती है, पर इस तरह नहीं जैसे एक औरत मर्द को प्रेम करती है, बल्कि इस तरह जैसे कोई इंसान ईश्‍वर से प्रेम करता है. वह अब प्रेम से प्रेम करने लगी थी. उसका प्रेम वहां पहुंच चुका था, जहां वो ख़ुद ईश्‍वर बन जाता है.

      ज्योत्सना ‘प्रवाह’

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एक गांव में एक ब्राह्मण और उसकी पत्‍नी बड़े प्रेम से रहते थे, लेकिन ब्राह्मणी का व्यवहार ब्राह्मण के परिवार के लोगों के साथ अच्छा़ नहीं था. इसी वजह से परिवार में कलह रहता था. रोज़-रोज़ के झगड़े और कलह से मुक्ति पाने के लिए ब्राह्मण ने मां-बाप, भाई-बहन को छो़ड़कर पत्‍नी को लेकर दूर किसी दूसरे नगर में जाकर अकेले रहने का निश्चय किया.

दोनों निकल पड़े. यात्रा लंबी थी. जंगल में पहुंचने पर ब्राह्मणी को बहुत प्यास लगी. ब्राह्मण ने पानी का इंतज़ाम करने की सोची, लेकिन पानी का स्रोत दूर था, इसलिए ब्राह्मण को आने में देर हो गई. पानी लेकर वापिस आया तो ब्राह्मण ने देखा कि ब्राह्मणी तो मर चुकी है. ब्राह्मण बहुत दुखी होकर भगवान से प्रार्थना करने लगा. उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे ब्राह्मण! यदि तू अपने प्राणों का आधा भाग इसे देना स्वीकार करे तो ब्राह्मणी जीवित हो सकती है. ब्राह्मण ने यह स्वीकार कर लिया और ब्राह्मणी फिर से जीवित हो गई. दोनों ने आगे की यात्रा शुरु कर दी.

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दोनों यात्रा करते हुए एक नगर के द्वार पर पहुंचे. ब्राह्मण ने पत्नी से कहा- प्रिय, तुम यहीं ठहरो, मैं अभी भोजन लेकर आता हूं. ब्राह्मण के जाने के बाद ब्राह्मणी अकेली रह गई. थोड़ी देर बाद वहां एक लंगड़ा व्यक्ति आया. भले ही वो लंगड़ा था किन्तु सुन्दर जवान और तंदुरुस्त था. उसने ब्राह्मणी से हंसकर बात की और ब्राह्मणी भी उससे हंसकर बोली. दोनों में काफ़ी बात हुई और दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित हो गए. दोनों ने ये महसूस किया कि वो एक दूसरे को चाहने लगे और इसलिए उन्होंने जीवन भर एक साथ रहने का प्रण कर लिया.

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ब्राह्मण जब भोजन लेकर लौटा तो ब्राह्मणी ने कहा, ये बेचारा लंगड़ा व्यक्ति भी भूखा है, इसे भी अपने हिस्से में से दे दो. भोजन के बाद जब वहां से वो लोग आगे चलने लगे तो ब्राह्मणी ने ब्राह्मण से अनुरोध किया कि इस लंगड़े व्यक्ति को भी साथ ले लो. रास्ता अच्छा़ कट जाएगा, क्योंकि तुम जब कहीं जाते हो तो मैं अकेली रह जाती हूं. बात करने को भी कोई नहीं होता, ये रहेगा तो मेरा अकेलापन दूर हो जाएगा और इसके साथ रहने से कोई बात करने वाला तो रहेगा.
ब्राह्मण ने कहा, हमें अपना भार उठाना ही मुश्किल हो रहा है, इसका भार कैसे उठायेंगे भला?

ब्राह्मणी ने कहा, हम इसे पिटारी में रख लेंगे.
ब्राह्मण को पत्‍नी की बात माननी पड़ी. कुछ़ दूर जाकर ब्राह्मणी और लंगड़े ने मौक़ा पाते ही मिलकर ब्राह्मण को धोखे से कुएं में धकेल दिया और उसे मरा समझ कर वे दोनों आगे बढ़ गए.

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नगर की सीमा पर राज्य-कर वसूल करने की चौकी थी. राजपुरुषों ने ब्राह्मणी की पिटारी को खोला तो उस में वह लंगड़ा छिपा था. यह बात राज-दरबार तक पहुंची. राजा के पूछ़ने पर ब्राह्मणी ने कहा कि यह मेरा पति है. हम अपने परिवारवालों के झगड़े और कलह से परेशान होकर देश छोड़ चुके हैं और यहां रहने आए हैं. राजा ने उन्हें अपने देश में बसने की आज्ञा दे दी. 

कुछ़ दिन बाद, एक साधु ने उस ब्राह्मण को कुएं से निकाल लिया. ब्राह्मण फ़ौरन उस राज्य में पहुंच गया जहां उसकी पत्नी और वो लंगड़ा रहते थे. ब्राह्मणी ने जब उसे वहां देखा तो राजा से कहा कि यह मेरे पति का पुराना बैरी है, इसे यहां से निकालवा दीजिए या फिर इसे मरवा दिया जाए. राजा ने उसके वध का आदेश सुना दिया.

ब्राह्मण ने इस आदेश को सुनकर कहा, महाराज! इस स्त्री ने मेरा कुछ लिया हुआ है, बस वह मुझे दिलवा दीजिए. राजा ने ब्राह्मणी को कहा, देवी! तूने इसका जो कुछ लिया हुआ है, सब वापस दे दे.

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ब्राह्मणी बोली, राजन, मैंने कुछ भी नहीं लिया, ये आदमी झूठ बोल रहा है.

ब्राह्मण ने याद दिलाया कि तूने मेरे प्राणों का आधा हिस्सा लिया हुआ है. सभी देवता इसके साक्षी हैं. ब्राह्मणी ने देवताओं के डर से वह भाग वापिस करने का वचन दे दिया, किन्तु वचन देने के साथ ही वह मर गई. ब्राह्मण ने सारा वृतांत राजा को सुना दिया.

सीख: धोखा देनेवालों और विश्वासघात करने वालों का अंजाम बुरा ही होता है. किसी का विश्वास न तोड़ें और सच्चा प्यार करनेवाले को कभी धोखा न दें.

एक जंगल में एक चालाक लोमड़ी और सारस रहते थे. दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे. साथ घूमते, साथ ही खाते-पीते थे. सारस लोमड़ी को तालाब से मछली पकड़ कर खाने के लिए देता था. उनके दिन मज़े से कट रहे थे.

सारस बहुत भोला था, पर लोमड़ी शैतान भी थी और चालाक भी. उसे दूसरों का मजाक उड़ाने में बहुत मजा आता था, इसलिए वह हमेशा दूसरों को परेशान करती रहती थी.

एक दिन उसने सोचा कि क्यों न इस भोले से सारस का भी मजाक उड़ाया जाए. उसने सारस को अपने घर दावत पर बुलाया और जान बूझकर खीर एक प्लेट में परोसी. उसे पता था कि सारस प्लेट में खीर को नहीं खा पाएगा, क्योंकि उसकी लंबी चोंच है. उसे इस तरह परेशान देख लोमड़ी मन ही मन बहुत खुश हुई और झूठी चिंता दिखाते हुए सारस से पूछने लगी कि क्या बात है दोस्त, खीर पसंद नहीं आई? जल्द ही लोमड़ी अपनी पूरी खीर चट कर गई और बेचारा सारस मन ही मन ग़ुस्से और अपमान का घूंट पीकर रह गया. पर जाते-जाते सारस ने भी उसे मज़ा चखाने की सोची.

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कुछ दिन बाद उसने भी लोमड़ी को अपने घर दावत पर बुलाया और उसने भी खीर बनाई. सारस ने दो सुराही में खीर परोस दी और लोमड़ी से खाने को कहा. सुराही ऊपर से पतली थी जिसकी वजह से लोमड़ी कुछ न खा सकी और सारस की अपनी लंबी चोंच से पूरी खीर मज़े से खा गया.

लोमड़ी को एहसास हुआ कि उसने जैसा सारस के साथ किया, खुद उसके साथ भी वैसा ही हुआ. पर वो कुछ बोली नहीं और मन ही मन अपने किए पर पछताने लगी.

सीख: किसी को छोटा या कमजोर मानकर उसका मज़ाक़ उड़ाना या अपमानित करना ग़लत है, हम जैसा करेंगे हमारे साथ भी वैसा ही होगा.

बीरबल की तेज़ बुद्धि और बादशाह अकबर का उनके प्रति विशेष स्नेह देख कई लोग ईर्ष्या करते थे बीरबल से. एक दिन दरबार में बादशाह अकबर बीरबल की तारीफ़ कर रहे थे, तो बादशाह ने देखा कि एक दरबारी खुश नहीं था, उन्होंने कारण पूछा, तो उस मंत्री ने कहा कि महाराज, माना बीरबल बड़ा ही तेज़ बुद्धि वाला है, लेकिन वो खुद को इतना ही होशियार समझता है और इतना ही अक्लमंद है वो, तो उसे कहिए कि वो आपके लिए बैल का दूध लेकर आए.

बादशाह ने पहले तो कहा कि भला बैल का दूध कैसे हो सकता है? फिर उस मंत्री ने कहा कि ये तो बीरबल जैसे होशियार व्यक्ति के लिए बड़ी चुनौती नहीं है, तो अकबर ने भी बीरबल की अक्लमंदी की परीक्षा लेने की सोची. अकबर बोले- बीरबल, क्या तुम मानते हो कि दुनिया में कोई कार्य असंभव नहीं?

बिल्कुल हुज़ूर, बीरबल ने कहा.

ठीक है, तो क्या तुम हमें बैल का दूध लाकर दे सकते हो?

बीरबल के पास हां कहने के अलावा कोई चारा नहीं था, लेकिन वो गहरी चिंता में थे कि आख़िर कैसे वो इस चुनौती को पूरा करें. घर आकर उन्होंने अपनी पत्नी व पुत्री से भी इसकी चर्चा की.

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रात हुई और बीरबल की पुत्री अकबर के महल के पीछे स्थित कुएं पर गई और पीट-पीटकर कपड़े धोने लगी. कपड़े पीटने की आवाज़ सुनकर बादशाह की नींद खुल गई. खिड़की से देखा कि कोई लड़की कुएं पर कपड़े धो रही है.

अकबर ने सिपाही को भेजा और उस लड़की से पूछा- इतनी रात गए कपड़े क्यों धो रही हो बच्ची?

बीरबल की पुत्री बोली, महाराज, मेरी माता घर पर नहीं है. वे कुछ महीनों से मायके में हैं. उनकी अनुपस्थिति में आज मेरे पिता ने एक बच्चे को जन्म दिया. दिन-भर मुझे उनकी सेवा-पानी करनी पड़ी इसलिए समय नहीं मिला, तो अब कपड़े धोने रात को यहां आई हूं!

लड़की की बात सुन अकबर को ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने कहा- नादान लड़की, आदमी बच्चे पैदा करते हैं क्या? इसलिए जो सच है वो बता, तुझे माफ़ी मिल जाएगी, वर्ना सज़ा भुगतने के लिए तैयार रहना.

लड़की ने कहा, यही सच है. क्यों नहीं करते आदमी बच्चे पैदा, ज़रूर करते हैं हुज़ूर! जब बैल दूध दे सकता है, तो आदमी भी बच्चे पैदा कर सकते हैं.

ये सुनते ही अकबर का ग़ुस्सा ठंडा पड़ गया और उन्होंने पूछा- तुम हो कौन?

इतने में ही पेड़ के पीछे छिपे बीरबल ने सामने आकर कहा- ये मेरी पुत्री है महाराज.

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ओह, तो ये सब तुमने किया? बादशाह ने कहा.

ज़ी हुज़ूर, माफ़ी चाहता हूं पर और कोई रास्ता भी नहीं था अपनी बात समझाने का.

एक बार फिर अकबर ने बीरबल की अक्लमंदी और चतुराई का लोहा माना और अगले दिन दरबारियों को पूरा क़िस्सा सुनाते हुए बीरबल की खूब प्रशंसा की और उनकी पुत्री की भी, साथ ही इनाम भी दिया, जिसे देख बीरबल से ईर्ष्या रखनेवालों के मुंह लटक गए और वो जलभुन कर रह गए!

सीख: ऐसी कोई समस्या या सवाल नहीं जिसका हल या समाधान नहीं, बस शांत मन से अपने दिमाग़ का सही इस्तेमाल करने की ज़रूरत है, जिससे जलनेवाले चारों खाने चित्त हो जाएंगे और आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे!

यह भी पढ़ें: अकबर-बीरबल की कहानी: हथेली पर बाल क्यों नहीं उगते? (Akbar-Birbal Story: Why Is There No Hair On The Palm?)

एक दिन बादशाह अकबर के दरबार की कार्यवाही चल रही थी कि अचानक बादशाह को न जाने क्या सूझी और वो बीरबल के मज़े लेने की सोचने लगे. उन्होंने बीरबल से मसखरी में एक टेढ़ा सवाल पूछा कि बीरबल, बताओ ज़रा कि हथेली पर बाल क्यों नहीं उगते?

सवाल सुनते ही बीरबल की समझ में आ गया कि बादशाह मजाक करना चाहते हैं और उनके मज़े लेना चाहते हैं.

बीरबल फ़ौरन जवाब न देकर सोच में डूबे हुए थे कि बादशाह ने उनको टोका- आज क्या बात है बीरबल, वैसे तो तुम हर सवाल का जवाब तपाक से दे देते हो. आज क्या हो गया?

बीरबल ने शांत मन से कहा- कुछ नहीं हुआ जहांपनाह! मैं तो ये सोच रहा था कि किसकी हथेली पर?

अकबर अपनी हथेली दिखाते हुए बोले कि हमारी हथेली पर बीरबल.

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बीरबल समझाते हुए बोले- हुज़ूर! आपकी हथेली पर बाल कैसे उगेंगे? आप दिन भर अपने हाथों से उपहार वितरित करते रहते हैं. लगातार घर्षण की वजह से आपकी हथेली पर बाल उगना मुमकिन नहीं.

ठीक है बीरबल, चलो मान लेते हैं, मगर तुम्हारी हथेली पर भी बाल नहीं है. उसका क्या कारण है? अकबर ने सोचा आज बीरबल को पूरी तरह चकरा ही देंगे और उसके खूब मज़े लेंगे.

अकबर के सवाल सुनकर दरबारियों के भी कान खड़े हो गए और उनको भी लगने लगा कि बीरबल आज बुरे फंसे और वो अब अकबर के सवाल का जवाब नहीं दे पाएंगे.

इतने में ही बीरबल ने कहा कि जहांपनाह मेरी हथेली पर बाल इसलिए नहीं क्योंकि मैं हमेशा आपसे इनाम लेता रहता हूं, तो भला मेरी हथेली पर बाल कैसे रहेंगे?

बादशाह यहीं नहीं रुके, तपाक से तीसरा सवाल कर बैठे- हमारी और तुम्हारी बात को जाने दो. हम इनाम देते हैं और तुम लेते रहते हो इसलिए हमारी हथेलियों पर बाल नहीं, लेकिन इन दरबारियों का क्या? ये तो हमसे हमेशा ईनाम नहीं लेते. ऐसे में इनकी हथेलियों पर बाल क्यों नहीं हैं?

सभी दरबारियों को लगा कि इस सवाल पर अब बीरबल फंस गए, आज उनकी हार निश्चित है, वो मन ही मन खुश हो रहे थे कि बीरबल का जवाब हाज़िर था- हुज़ूर! आप ईनाम देते रहते हैं और मैं ईनाम लेता रहता हूं और इसे देख ये सभी दरबारी ईर्ष्या में हाथ मलते रह जाते हैं, इसलिए इनकी हथेली पर भी बाल नहीं है.

Akbar Aur Birbal Ki Kahani
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बीरबल वैसे भी अपनी तेज़ बुद्धि, हाज़िरजवाबी और वाक्पटुता के लिए प्रसिद्ध थे. हर बार की तरह इस बार भी बीरबल ने यह साबित कर दिखाया और बीरबल के जवाब से अकबर ख़ुशी से ठहाका लगा उठे, वहीं बाक़ी दरबारी फिर हाथ मलते रह गए.

सीख: ऐसा कोई सवाल नहीं और ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका हल नहीं हो. बस अपनी बुद्धि को हमेशा तेज़ और मन को साफ़ रखें. हाज़िरजवाबी के लिए दिमागी रूप से सतर्क होना बेहद ज़रूरी है. कभी भी कठिन से कठिन प्रश्न देख बिना कोशिश किए हथियार न डालें!

बादशाह अकबर एक रोज़ अपने घोड़े पर बैठकर शाही बाग में घूमने गए, उनके साथ बीरबल भी था.
बाग में चारों ओर हरे-भरे वृक्ष और हरी-हरी घास देखकर अकबर को बहुत आनंद आया और उनका मन प्रसन्न हो गया. लेकिन फिर उनके मन में एक ख़याल आया, उन्हें लगा कि ऐसे हरे-भरे बगीचे में सैर करने के लिए तो घोड़ा भी हरे रंग का ही होना चाहिए.

उन्होंने बीरबल से कहा- बीरबल क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस हरे-भरे बाग का मज़ा दुगुना हो जाए, तो मुझे लगता है कि इसके लिए मुझे हरे रंग का घोड़ा चाहिए. तुम मुझे सात दिन में हरे रंग का घोड़ा ला दो. अगर तुम हरे रंग का घोड़ा न ला सके तो हमें अपनी शक्ल मत दिखाना.
वैसे बादशाह अकबर और बीरबल दोनों ही यह अच्छी तरह जानते थे कि हरे रंग का घोड़ा तो होता ही नहीं है, लेकिन बादशाह अकबर को तो बीरबल की परीक्षा लेनी थी, इसलिए उन्होंने बीरबल की बुद्धि को परखने के लिए ये शर्त रखी.

बादशाह अकबर ये देखना और परखना चाहते थे कि क्या इस प्रकार के अटपटे सवाल करने पर बीरबल अपनी हार स्वीकार करके यह कहेगा कि जहांपनाह मैं हार गया… लेकिन क्या ऐसा संभव था क्योंकि बीरबल भी अपने जैसे एक ही थे. बीरबल की तेज़ बुद्धि और हाज़िरजवाबी के सामने सभी को मुंह की ही खानी पड़ती थी. तो इस बार भी बीरबल ने चुनौती स्वीकार कर ली.

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बीरबल इस हरे रंग के छोड़ की खोज के बहाने सात दिन तक इधर-उधर घूमते रहे ताकि इस गुथी को सुलझा सकें और फिर आठवें दिन वे दरबार में हाजिर हुए और बादशाह से बोले- ‘जहांपनाह! मुझे हरे रंग का घोड़ा मिल गया है…
बादशाह बड़े हैरान हुए aur उन्होंने उत्सुकता दिखते हुए कहा कि बीरबल ‘जल्दी बताओ, कहां है हरा घोड़ा?

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बीरबल ने कहा, ‘बादशाह अकबर, मैंने बड़ी मुश्किल से हरा घोड़ा खोजा है और वो घोड़ा तो आपको मिल ही जाएगा, लेकिन, उसके मालिक ने दो शर्त रखी हैं, उन्हें पूरा करने के बाद ही वो घोड़ा आपका हो सकेगा.

अकबर ने भी फ़ौरन कहा कि जल्दी बताओ कौन सी शर्तें हैं वो, हम ज़रूर पूरा करेंगे.

बीरबल ने भी फ़ौरन जवाब दिया कि पहली शर्त तो यह है कि घोड़ा लेने के लिए आपको स्वयं जाना होगा जहांपनाह!

बादशाह ने कहा-

इसमें कौन सी बड़ी बात है, यह तो बड़ी आसान शर्त है. हम स्वयं जाएंगे… अब बताओ दूसरी शर्त क्या है?

बीरबल ने मुस्कुराते हुए बताया कि जहांपनाह, ‘घोड़ा खास रंग का है, इसलिए उसे लाने का दिन भी खास ही होगा, इसलिए उसका मालिक कहता है कि सप्ताह के सात दिनों के अलावा किसी भी दिन आकर उसे ले जाओ, घोड़ा तुम्हारा होगा.

बीरबल की ये बात सुन बादशाह अकबर बीरबल का मुंह देखते रह गए… बीरबल ने भी हंसते हुए कहा कि महाराज, अब हरे रंग का घोड़ा लाना हो, तो उसकी शर्तें भी माननी ही पड़ेगी, तभी तो ख़ास रंग का घोड़ा आपका होगा.

बीरबल की चतुराई पर बादशाह अकबर खिलखिला कर हंस पड़े. बीरबल की तेज़ बुद्धि से वह खुश हुए और समझ गए कि बीरबल को मूर्ख बनाना या उससे जीत पाना असंभव है!

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सीख: हर सवाल और हर समस्या का समाधान होता है, बस ज़रूरत है शांत मन से और चतुराई से अपनी बुद्धि का उपयोग कर उपाय खोजने की, जिससे मुश्किल से मुश्किल लग रहे सवाल और समस्या का भी आसानी से हल निकाला जा सकता है!

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एक गांव में एक धोबी अपने गधे के साथ रहता था. वह अपनी रोज़ी-रोटी के लिए रोज सुबह अपने गधे के साथ लोगों के घरों से गंदे कपड़े लाता और उन्हें धोकर वापस दे आता. वो दिनभर इसी काम में लगा रहता और किसी तरह गुज़र-बसर कर रहा था.

वो गधा भी कई सालों से धोबी के साथ काम कर रहा था और उम्र बढ़ने के साथ व समय के साथ-साथ वह बूढ़ा हो गया था. जिसकी वजह से उसका शरीर भी कमजोर हो चला था, जिस वजह से अब वो ज्यादा कपड़ों का वजन भी नहीं उठा पाता था… उसकी उम्र के चलते उसकी कमजोरी बढ़ती चली जा रही थी.

एक दिन दोपहर के वक्त धोबी अपने गधे के साथ कपड़े धोने घाट जा रहा था. गर्मी बहुत ज़्यादा थी और कड़ी धूप की से दोनों ही बेहाल थे. चलते-चलते धूप और कमजोरी की वजह से अचानक गधे का पैर लड़खड़ाया और वह एक गहरे गड्ढे में गिर गया. इस अचानक हुए घटनाक्रम से धोबी घबरा गया. उसका गधा भी सकते में था और धोबी उसे बाहर निकालने की कोशिश में जुट गया. लेकिन गधा और धोबी दोनों नाकामयाब रहे, हालाँकि बूढ़ा और कमजोर होने पर भी गधे ने भी पूरी ताक़त लगा दी थी पर दोनो असफल हो रहे थे और उनके प्रयास नाकाफ़ी साबित हुए.

धोबी और गधे की ऐसी हालत देख को गांव वाले भी उसकी मदद के लिए पहुंच गए, लेकिन कोई भी उसे गड्ढे से बाहर नहीं निकाल पाया. तब सभी को यही लगा कि अब कुछ माहिर हो सकता और गांववालों ने धोबी से कहा कि ये गधा तो अब बूढ़ा हो गया है, इसलिए इसको बाहर निकलने की बजाय समझदारी इसी में है कि इस गड्ढे में मिट्टी डालकर उसे यहीं दफना दिया जाए, क्योंकि सारी कोशिशें बेकार हि होंगी. धोबी ने भी सोचा कि ये सब सही कह रहे हैं और वो भी इस बात के लिए तैयार हो गया.

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बस फिर क्या था, गांववालों ने अब गड्ढे में मिट्टी डालनी शुरू कर दी. गधा इससे पहले कि कुछ समझ पाता गांववाले अपना निर्णय ले चुके थे और जैसे ही गधे को समझ आया कि उसके साथ क्या हो रहा है, तो वहकुछ देर चिल्लाया, बहुत दुखी हुआ और उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे, लेकिन कुछ देर बाद उसने चुप्पी साध ली और वो एकदम चुप हो गया!

लेकिन इसी बीच धोबी की नज़र गड्ढे में फ़ंसे अपने गधे की हरकत पर पड़ी, उसने देखा कि गधा कुछ अजीब सी हरकत कर रहा है. जैसे ही गांव वाले उस पर मिट्टी डालते, वो अपने शरीर से मिट्टी को नीचे गड्ढे में गिरा देता और खुद उस मिट्टी के ऊपर चढ़ जाता. वो लगातार ऐसा करत रहा, यही क्रम चलता रहा, जिससे गड्ढे में मिट्टी तो भरती रही लेकिन गधा बड़ी चतुराई से उस मिट्टी को नीचे अपने ऊपर से झटककर नीचे गिरा देता और खुद उस पर चढ़ते हुए ऊपर आता गया. गांववाले भी ये देख हैरान हो गए और अपने गधे की इस चतुराई को देखकर धोबी भी हैरान रह गया और उसकी आंखें नम हो गईं.

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सीख: कहानी से यही सीख मिलती है कि परिस्थितियाँ भले ही कितनी मुश्किल और नाज़ुक क्यों न हों, अगर बुद्धि, समझदारी और धैर्य से काम लिया जाए तो मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति को भी पार कर सकते हैं. गड्ढा कितना भी गहरा हो यानी परेशानी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसे समझदारी से मिट्टी की तरह हटाकर उससे पार पाने का जज़्बा बनाए रखें, सफलता ज़रूर मिलेगी!

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