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कहानी- वर्जिन लड़की (Short Story- Virgin Ladki)

“रितु, वर्जिनिटी से बड़ा लिंग भेद कुछ भी नहीं आज हमारे समाज में. एक ओर जहां लड़कों से कुछ भी नहीं पूछा जाता, वहीं दूसरी ओर लड़कियों के चरित्र को प्रमाणित करने के लिए न जाने कैसे-कैसे शब्द और तरी़के इजाद कर दिए गए हैं. यह पुरुषों की सत्ता और झूठे अहंकार को बनाए व बचाए रखने की बातें हैं और कुछ भी नहीं. पर सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते.”

Short Story- Virgin Ladki

मेरे तकिये के नीचे अब भी तुम्हारी यादें दुबकी पड़ी हैं… मेरे सिरहाने तुम्हारे वो ढेरों चुंबन अंकित हैं, जो कभी ख़्वाबों में तुमने मुझे दिए, तो कभी रू-ब-रू… मेरे दरीचों से अब भी तुम्हारा अक्स मुस्कुराता नज़र आता है… मेरे आंगन में तुम्हारी धड़कनें अब भी बिखरी रहती हैं… फिर क्यों तुम यहां नहीं हो मेरे पास? ऐसी क्या मजबूरी थी कि बिना कुछ कहे यूं ही चले गए मेरी ज़िंदगी से अचानक… ठीक उसी तरह, जिस तरह अचानक तुम मेरी ज़िंदगी में आए थे.
तुम्हें शायद ये एहसास ही नहीं कि मैं अब भी ज़िंदगी के उसी मोड़ पर खड़ी हूं, जहां तुम मुझे छोड़कर चले गए थे. तुम नहीं लौटकर आओगे अब शायद, यह मैं समझ चुकी हूं, लेकिन मेरा दिल नहीं समझ रहा… इसे कहीं न कहीं अब भी तुमसे उम्मीदें हैं… ये अब भी तुम्हारे ख़्वाब संजोता है, अब भी तुम्हारे ख़्यालों से इसे सिहरन होती है… तुम्हारी वो पहली छुअन अब भी मुझे भीतर तक भिगो देती है. कितना अपनापन था उस छुअन में… बहुत पाक-साफ़ था वो एहसास, ख़ालिस प्रेम था उसमें. क्या तुम्हें याद नहीं आते हमारे प्यार के वो पल? वो घंटों बैठकर बातें करना, वो तुम्हारा मेरे लिए कॉफी बनाना… वो अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड के क़िस्से सुनाना…!
और हर बार मेरा यही सवाल होता था, इतना प्यार करते थे, तो शादी क्यों नहीं की… और तुम कहते थे, “कितनी बार बताया, गांव में जाति-गोत्र सब देखे जाते हैं, सो शादी नहीं हो पाई.”
“मुझसे तो करोगे न…?” और तुम हंस देते बस… उस हंसी की खनक अब भी कानों में गूंजती है… मैं भी कितनी पागल थी, शादी तो तुमको मुझसे भी नहीं करनी थी, सो नहीं की… यूं ही एक दिन अचानक तुमने बिना कुछ कहे, बिना बताए ख़ुद को समेट लिया. कितनी बार फोन किया, कितने मैसेज किए… तुमने पढ़कर भी जवाब नहीं दिया.
पर मेरा दिल था कि मान ही नहीं रहा था… तुम्हारा इंतज़ार करने के सिवा कोई चारा भी तो नहीं था मेरे पास. तुम्हारी होने के बाद किसी और की होने की हिम्मत भी नहीं थी. ख़ैर, किसी तरह ख़ुद को संभाल रही हूं. ज़िंदगी को जितना संभव हो सामान्य बनाए रखने की पुरज़ोर कोशिश में थी मैं.
“रितु, तैयार नहीं होना क्या आज तेरी दिल्ली की फ्लाइट है. छूट न जाए कहीं.” मम्मी की आवाज़ से ख़्यालों का सिलसिला टूटा.
“हां मम्मी, बस तैयार ही हूं.”
संडे था, इसलिए ट्रैफिक नहीं था रोड़ पर. एयरपोर्ट जल्दी ही पहुंच गई थी मैं. सिक्योरिटी चेक से बाहर निकलकर सोचा कुछ शॉपिंग कर लूं… बैग्स की एक शॉप की तरफ़ नज़र गई, तो एक पल को ठिठक गई. अरे! क्या मेरी नज़रें धोखा खा रही हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं. तुम ही तो हो. तुम्हें पहचानने में भला कैसे भूल कर सकती हूं मैं.
“कैसे हो राजवीर?” मैंने गंभीरता से कहा, तो वो थोड़ा असहज हो गया, फिर संभलते हुए बोला, “अरे, रितु तुम. मैं बिल्कुल ठीक हूं. तुम कैसी हो?”
“कमाल है, तुम्हें क्या लगता है कि मैं कैसी होऊंगी?”
“सॉरी रितु, पर मैं यहां कोई सीन क्रिएट नहीं करना चाहता. बेहतर होगा हम आराम से बात करें इस मुद्दे पर.”
“यूं अचानक मुझे ज़िंदगी के मोड़ पर अकेला छोड़कर चले गए तुम, बिना कोई वजह बताए, तो इतना हक़ बनता है मेरा कि जान सकूं आख़िर क्या कारण था, जो इतना बड़ा धोखा दिया तुमने मुझे.”
“धोखे की क्या बात है यार इसमें. हम दोनों एडल्ट हैं, हम एक-दूसरे की तरफ़ आकर्षित थे, जो कुछ भी हमने किया प्यार में किया.”
“और अब क्या प्यार ख़त्म हो गया? तुमने मुझसे शादी का वादा किया था. तुम्हारे उस वादे पर भरोसा था मुझे.”

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“तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो रितु कि मैं तुम जैसी लड़की से शादी करूंगा? ज़रा ख़ुद सोचो, जो लड़की इतनी आसानी से किसी लड़के के साथ… तुम समझ रही हो न. बीवी कैसे बन सकती हो तुम. हां, चाहो तो हम अब भी… क्योंकि तुम बहुत अट्रैक्टिव हो…”
एक ज़ोरदार तमाचा जड़ते-जड़ते रह गई थी मैं तुम्हारी इस घटिया सोच पर, लेकिन रोक लिया ख़ुद को, क्योंकि मैं भी कोई सीन क्रिएट नहीं करना चाहती थी एयरपोर्ट पर.
हां, तुम्हारा असली रंग ज़रूर देख चुकी थी. लड़कियों को स़िर्फ इस्तेमाल करके ज़िंदगी से बाहर निकाल फेंकना तुम्हारी आदत ही नहीं, शौक़ भी था यह भी समझ चुकी थी. ख़ैर, किसी तरह ख़ुद को संभाला मैंने और दिल्ली पहुंची. बाहर निकलते समय तुम्हारे चेहरे की कुटिल मुस्कान को कभी नहीं भूल सकती मैं.
समय बीत रहा था. तुम्हारे दिए ज़ख़्म भर तो रहे थे, लेकिन कहीं न कहीं उनमें दर्द था, वो भी बहुत ज़्यादा. मैंने अपना पूरा ध्यान प्रैक्टिस पर लगा दिया. मम्मी-पापा का सपना था कि मैं एक कामयाब डॉक्टर बनूं. उनका सपना आकार ले रहा था.
आज इतने सालों बाद तुम फिर मेरे सामने हो, बेहद मजबूर, लाचार और ग़मगीन से… कहां गया तुम्हारा वो ग़ुरूर? कहां गई वो कुटिल मुस्कान? शायद ये कायनात का ही एक फैसला था, तुम्हारे पाप की सज़ा तुम्हारी बेटी भुगत रही थी. हालांकि एक स्त्री होने के नाते मैं कभी नहीं चाहूंगी कि किसी भी लड़की के साथ ऐसा हो, लेकिन समय न जाने कब किसको क्या दिखा दे.
“डॉक्टर रितु, कैसी है मेरी बेटी अब?”
“जी, वो अब बेहतर है. पर होश में नहीं आई अब तक. थोड़ा इंतज़ार कीजिए और हौसला रखिए मिसेज़ राजवीर.”
“कैसे रखूं हौसला, न जाने कौन था वो लड़का, जिसने मेरी बेटी का ये हाल बना दिया. कैसे संस्कार रहे होंगे उसके, जो एक लड़की को ज़िंदगी के ऐसे मोड़ पर लाकर धोखा देकर भाग गया. कायर कहीं का, कभी सुखी नहीं रहेगा वो… ”
राजवीर की पत्नी बोले जा रही थी और रजवीर की नज़रें झुकी जा रही थीं.
“राजवीर और मैंने डॉली को इतने लाड़-प्यार से पाला था. मेरी फूल जैसी बच्ची का ये हाल बना दिया कि आज उसने आत्महत्या की कोशिश जैसा क़दम उठा लिया…”
मुझे बुरा इसलिए लग रहा था कि ऊपरवाले ने राजवीर की बेटी को ही ज़रिया क्यों बनाया उसे अपने किए का एहसास दिलाने के लिए… ख़ैर बेटी किसी की भी हो, ऐसा किसी के साथ न हो. इतने में ही डॉली को होश आ गया. हम सब अंदर गए. बच्ची बुरी तरह डरी हुई थी. मैंने उसे प्यार से पूछा, “बेटा, डरो मत. खुलकर अपनी बात कहो. क्यों किया तुमने ऐसा? अगर किसी ने तुम्हारे साथ ज़्यादती की, तो तुम्हें ज़रूर न्याय मिलेगा.”
“मम्मी-पापा, आई एम सॉरी. सब मेरी ही ग़लती है. मुझे नहीं पता था कि मेरे आज़ाद ख़्यालों को, मेरी मॉडर्न लाइफस्टाइल को कोई मेरे चरित्र से जोड़कर देखेगा और मेरा फ़ायदा उठाएगा.”
“बेटा मैं और तेरे पापा इतने आज़ाद ख़्यालों के हैं, कम से कम ऐसा कोई भी क़दम उठाने से पहले एक बार अपनी परेशानी हमसे शेयर तो की होती… तुझे कुछ हो जाता तो, किसके लिए जीते हम.” मिसेज़ राजवीर का दर्द छलक पड़ा.
“सॉरी मॉम, मैं इतनी डिप्रेशन में थी कि पता ही नहीं चला कि मेरे साथ हो क्या रहा है… रोहित ने इस तरह से छला मुझे…”
“डॉली अपने मन से अब सारी निगेटिव बातें निकाल दो और सारा क़िस्सा
साफ़-साफ़ बताओ…” मैंने डॉली को समझाते हुए कहा. राजवीर इस पूरे मसले पर चुप्पी ही साधे हुए था… ख़ैर, डॉली ने अपनी बात आगे बढ़ाई.
“आंटी, रोहित मेरे ही ऑफिस में मेरा सीनियर है. बहुत दिनों से वो मुझे लगातार अपने प्यार का भरोसा दिला रहा था. हम डेट कर रहे थे एक-दूसरे को. इतना समझदार, इतना मैच्योर लगा मुझे वो, बिल्कुल पापा की तरह. मेरा ख़्याल रखता था, मेरी हर ज़रूरत पर साथ खड़ा रहता था. मुझे पूरा भरोसा हो गया था कि इससे बेहतर जीवनसाथी मुझे नहीं मिलेगा.
दो महीने पहले हम आउटिंग पर गए थे. बस वो एक कमज़ोर पल था, जिसमें हमसे ग़लती हो गई थी. रोहित ने कहा था जल्द ही घर आकर शादी की बात करेगा. पर…” यह कहते ही डॉली फूट-फूटकर रोने लगी.
“धैर्य रखो डॉली, ग़लतियां ही हमें ज़िंदगी जीने का सबक और हौसला देती हैं.”
“आप ठीक कह रही हैं आंटी. रोहित पर भरोसा करना एक बहुत बड़ी भूल थी. उसने धीरे-धीरे मुझसे दूरी बनानी शुरू कर दी. मेरे फोन उठाने और मेरे मैसेजेस के जवाब देने भी बंद कर दिए. फिर मुझे पता चला कि उसकी एंगेजमेंट हो रही है और उसने रिक्वेस्ट करके दूसरे शहर में ट्रांसफर ले लिया.
मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था. विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. मैंने किसी तरह रोहित से बात करने की कोशिश की, तो उसने कहा ऑफिस में सीन क्रिएट मत करो, शाम को कॉफी हाउस में बात करते हैं.
हम शाम को गए. मैंने उसकी एंगेजमेंट की बात पूछी, तो उसने कहा कि प्यार और शादी दो अलग-अलग चीज़ होती हैं. तुम जैसी लड़कियों को गर्लफ्रेंड तो बनाया जा सकता है, पर शादी… शादी के लिए संस्कारी और वर्जिन लड़की ही सही होती है. तुम मेरे साथ शादी से पहले ही इतनी कंफर्टेबल हो गई, तो न जाने और किस-किस के साथ… एक चांटा मारकर मैं वहां से चली आई. ऐसे गंदी सोच और बुरी नीयतवाले लड़के से मुझे अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट नहीं चाहिए था.”
“वो सब तो ठीक है डॉली, तुम एक स्ट्रॉन्ग और कॉन्फिडेंट लड़की हो, तुमने भला सुसाइड जैसा ग़लत क़दम क्यों उठाया? अपने मम्मी-पापा से मदद लेनी चाहिए थी.”
“आप ठीक कह रही हैं. पर मेरी हिम्मत नहीं थी, क्योंकि मैं प्रेग्नेंट हो गई थी. रोहित को बताया भी था यह सोचकर कि शायद बच्चे की बात सुनकर वो सही क़दम उठाएगा, पर उसने कहा कि ये उसका बच्चा है ही नहीं… पापा, आप कुछ बोलो न, आप ही तो कहते थे कि लड़की किसी लड़के से कम नहीं होती, तो क्यों उसे हर किसी को अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट देना होता है… कभी अपने कपड़ों के माध्यम से, कभी नज़रें झुकाकर, कभी शर्माकर, तो कभी मर्दों के सामने गिड़गिड़ाकर.
मुझे लगा कौन मुझे और मेरे बच्चे को अपनाएगा. एबॉर्शन करवाकर मैं अपने बच्चे की जान नहीं लेना चाहती थी, तो सोचा ख़ुद ही अपनी जान लेकर अपने बच्चे को भी इस फरेबी दुनिया में आने से बचा लूं. पर देखो डॉक्टर मेरी जान आपने बचा ली, पर मेरा बच्चा…” डॉली रोने लगी.

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राजवीर के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. वो कुछ न बोल सका.
“डॉली, तुम्हारी जान बच गई ये भी कम बात नहीं. पर अफ़सोस कि तुम्हारे बच्चे को हम बचा नहीं सके. रही बात रोहित जैसे लड़कों की, तो तुम्हें किसी को अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट देने की ज़रूरत नहीं है. दरसअल, समस्या हमारे समाज की सोच में ही है. वो बेटों को संस्कार देने की बजाय बेटियों के तन ढांकने में ज़्यादा विश्‍वास रखता है. बेटों को बेलगाम छोड़ देता है और बेटियों को तमाम तरह की बेड़ियों में जकड़ने की नसीहतें देता है. यही वजह है कि तुम जैसी स्ट्रॉन्ग लड़की भी हक़ की लड़ाई लड़ने की बजाय पलायन का रास्ता चुनती है.
हम सभी ऐसे ही हैं. मैं भी भले ही बड़ी-बड़ी बातें कर लूं, लेकिन अगर मेरे साथ ग़लत होता, तो मैं भी लड़ने का हौसला नहीं रख पाती, पर अब मैं तुमसे वादा करती हूं कि तुम्हारी लड़ाई मैं लड़ूंगी.”
डॉली और उसके पैरेंट्स के साथ जाकर पुलिस स्टेशन में रोहित के ख़िलाफ़ कंप्लेन दर्ज करवाई और डॉली को इंसाफ़ भी ज़रूर मिल जाएगा.
“रितु, मैं तुमसे माफ़ी भी मांगने लायक नहीं हूं. तुमने मेरे लिए जो कुछ भी किया…”
“राजवीर, मैंने तुम्हारे लिए नहीं, जो भी किया, डॉली के लिए किया.”
“मैं तुम्हारा अपराधी हूं… मैंने तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद की… ”
“राजवीर, मैं तुम्हें साफ़-साफ़ बता दूं कि न मेरी ज़िंदगी बर्बाद हुई और न मैं अपने बीते हुए कल में जीती हूं. मैं तो तुम्हें ‘थैंक्स’ कहना चाहती हूं कि तुम जैसे इंसान की पत्नी बनने से बच गई… रही बात मेरी, तो हां शादी और प्यार जैसी पवित्र भावनाओं पर आज भी मेरा विश्‍वास है. और मैं चाहती हूं कि डॉली भी मानसिक रूप से ऐसी ही सोच के साथ आगे बढ़े. इसीलिए तुम्हें घर पर बुलाया कि उसकी काउंसलिंग पर थोड़ा ध्यान देना होगा. उसके मन से नकारात्मक विचार निकालने ज़रूरी हैं, तभी वो एक सकारात्मक जीवन जी पाएगी.”
राजवीर चला गया. मेरे मन को आज एक तसल्ली थी, जो मैं अपने लिए न कर सकी, वो डॉली के लिए करने की हिम्मत जुटा पाई. कितनी मासूम और प्यारी बच्ची है डॉली, बिल्कुल मेरी रानी की तरह…
“रितु मैडम, क्या बात है, किन ख़्यालों में खोई हो.”
“अरे, अजय आप आ गए हॉस्पिटल से. मैं बस राजवीर और डॉली के बारे में सोच रही थी.”
“तुमने बहुत अच्छा काम किया. रोहित जैसे लड़कों को यूं ही छोड़ने का मतलब है किसी और लड़की की ज़िंदगी दांव पर लगाना. तुमने भी तो बरसों पहले यही ग़लती की थी, पर कोई बात नहीं, देर आए, दुरुस्त आए.”
“आप जैसा जीवनसाथी पाकर सच में मैं ख़ुद को ख़ुशनसीब समझती हूं, वरना जीवन के एक मुकाम पर तो शादी और प्यार से भरोसा ही उठ गया था मेरा. पर मैं आज तक नहीं समझ पाई, आपके मन में उस व़क्त ये बात नहीं आई कि आपको भी शादी किसी वर्जिन लड़की से ही करनी चाहिए.”
“रितु, वर्जिनिटी से बड़ा लिंग भेद कुछ भी नहीं आज हमारे समाज में. एक ओर जहां लड़कों से कुछ भी नहीं पूछा जाता, वहीं दूसरी ओर लड़कियों के चरित्र को प्रमाणित करने के लिए न जाने कैसे-कैसे शब्द और तरी़के इजाद कर दिए गए हैं. यह पुरुषों की सत्ता और झूठे अहंकार को बनाए व बचाए रखने की बातें हैं और कुछ भी नहीं. पर सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते.”
“जी हां, समझ गई मिस्टर हसबैंड, कुछ लोग आपकी तरह भी होते हैं. चलिए अब खाना खा लेते हैं. मैंने आपके लिए और आपकी लाड़ली बेटी रानी के लिए कुछ स्पेशल बनाया है.”

Geeta Sharma

         गीता शर्मा

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कहानी- यही सच है (Short Story- Yahi Sach Hai)

मन का वर्चस्व तो हर काल में रहा है. सही है, हमने हाथों में हाथ डाल कभी डांस नहीं किया, होटल के एकान्त कोने में बैठ कभी कॉफ़ी नहीं पी… पर क्या प्यार इन सबके बिना नहीं हो सकता? और यदि ये सब करके ही एक-दूसरे को समझा जा सकता तो फिर आज के प्रेमविवाह टूटते ही क्यों?

Short Story- Yahi Sach Hai

जनरेशन गैप…? पीढ़ियों का अन्तराल…? और वह भी मेरे घर में…? मैंने तो सदा इसी बात पर फ़ख्र किया है कि मैंने अपने बच्चों के साथ सदैव मित्रवत् व्यवहार ही किया है. वह दोनों कॉलेज से लौटते तो नाश्ते के साथ-साथ वहां के ढेरों क़िस्से सुनाते. मैं उन्हें सलाह-मशविरा देती तो अनेक बातों में उनसे सलाह-मशविरा लेती भी.

पर आज मेरी ही बेटी ने यानी बात-बात पर हंसने वाली अनिता ने ऐलान कर दिया, “ममा, तुम मेरी बात नहीं समझोगी. तुम्हारे समय में तो मां-बाप ने जहां शादी तय कर दी, चुपचाप कर ली. किसी ने पूछी भी न होगी तुम्हारी पसंद. तुम प्यार-मोहब्बत की बात कैसे समझोगी? पर मैं विवाह करूंगी तो स़िर्फ सुमित से. मैं उसे तुमसे मिलवा भी चुकी हूं. तुम्हें वह ठीक नहीं लगता, पर वह मुझे बहुत चाहता है, समझता है. ममा, तुम्हारे और

आज के समय में बहुत अंतर है. पूरी एक जनरेशन का गैप…”

वह आगे भी शायद बहुत कुछ बोली होगी. पर मेरे कानों में वही शब्द अटक गए. रिकॉर्ड की मानिंद बजते रहे जनरेशन गैप… जनरेशन गैप…

वह क्या सोचती है कि हमारी पीढ़ी में प्यार का ज़ज़्बा ही नहीं था. मां-बाप की पसन्द शिरोधार्य कर ली, पर क्या सचमुच निष्प्राण था हमारा मन. प्रीत-प्यार पर किसी एक जनरेशन, किसी एक पीढ़ी का एकाधिकार होता तो राधा-कृष्ण के प्रेम की दास्तान आज भी हमारी संस्कृति का एक हिस्सा नहीं होती. मन का वर्चस्व तो हर काल में रहा है. सही है, हमने हाथों में हाथ डाल कभी डांस नहीं किया, होटल के एकान्त कोने में बैठ कभी कॉफ़ी नहीं पी… पर क्या प्यार इन सब के बिना नहीं हो सकता? और यदि यह सब करके ही एक-दूसरे को समझा जा सकता तो फिर आज के प्रेमविवाह टूटते ही क्यों?

एक तो सुबह से ही मूड ख़राब था, उस पर मेरी छोटी बहन सरोज भी आ गई. मन तो यूं ही जला बैठा था, फिर भी मैंने उसके आगे अनिता की बात रख दी. सोचा, वही मलहम लगाएगी, पर उसने तो ताज़े ज़ख़्म पर चिकोटी काट दी.

“ठीक ही तो कह रही है, मैं नहीं जानती क्या? कॉलेज के दिनों में तुम और श्रीपत एक-दूसरे को कितना चाहते थे. लेकिन हुआ क्या? तुम्हारा विवाह तय हो गया तो उसने रोका क्या? हिम्मत ही नहीं जुटा पाया. मां-बाप की आज्ञा मान कहीं और शादी कर ली होगी. बस, कहानी ख़त्म. चलो यह भी छोड़ो, इतने वर्षों में कभी उसने तुम्हारी सुध ली? कभी आकर पूछा कि कैसी हो सुधा? ख़ुश तो हो ना…?”

पर श्रीपत के नाम पर मेरी डबडबा आई आंखों को देखकर वह रुक गई. पर अब जब चोरी पकड़ी ही गई थी तो मैं भी स्वयं को संयत न कर पाई. फफक कर रो पड़ी. बरसों का बांध टूट गया.

वह कुछ और कहती, इससे पहले ही मैंने उसे रोक दिया.

“कहानी का एक ही दृश्य देखकर अपना फैसला मत दो सरोज. न ही श्रीपत बुज़दिल था और न ही हमारे प्यार में कुछ कमी थी. क़िस्मत ने ही हमारे साथ एक क्रूर मज़ाक किया था, जिसे हमने सिर नवाकर स्वीकार कर लिया.

बाल विवाह के आंकड़े आज भी समाचार-पत्र में पढ़ती हो न? यह भी जानती हो कि राजस्थान में यह सबसे अधिक है, बस, इसी प्रथा का शिकार था श्रीपत. यह बात उसके एक-दो अभिन्न मित्र ही जानते थे या फिर मैं. तुम्हें तो पता है कि हमारे कॉलेज में कुछ न कुछ चलता ही रहता था. कभी वाद-विवाद का रिहर्सल तो कभी नाटक, कभी खेल प्रतियोगिता तो कभी समाज-सेवा का कोई अभियान… और तुम तो जानती ही हो कि उसे इन सब चीज़ों में हिस्सा लेने का कितना शौक़ था. हो सकता है शुरू में मैंने ही उसे एक-दो बार कहा हो कि मुझे घर तक छोड़ दे. पैदल का ही रास्ता था, पर अंधेरे में अकेले जाना भी ख़तरे से खाली नहीं था. हो सकता है, उसका विवाहित होना ही मुझे उसके साथ जाने में सुरक्षा का एहसास देता हो.

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फिर तो यह नियम ही बन गया. मुझे उसको बताने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती कि आज मुझे देर तक रुकना है. जाने कहां बैठा वह मेरा इंतज़ार कर रहा होता और मेरे बाहर निकलते ही मेरे साथ हो लेता. हमारे माता-पिता ने तो हमें उचित मूल्य दिए ही थे, पर वह तो मुझ से भी अधिक आदर्शों का पक्का था. दो वर्ष की इस मैत्री में हाथ छूना तो दूर, कभी ऐसा भी न हुआ होगा कि मेरे दुपट्टे का कोई कोना भी उसके कपड़ों को छू गया हो. उसकी साइकिल हमेशा हम दोनों के बीच रहती. मेरी ख़ातिर वह हमारे घर तक पैदल ही चलता और फिर साइकिल पर सवार होकर अपने घर चला जाता था, उसका और हमारा घर एकदम विपरीत दिशा में थे. उसने मेरे लिए बहुत कुछ किया. उसके बहुत से एहसान हैं मुझ पर. किस-किस चीज़ का शुक्रिया अदा करूं?

हमारे बीच कभी किसी सीमा का उल्लंघन नहीं हुआ. पर इस मन का क्या करे कोई? न यह कोई तर्क समझता है, न धौंस. हठीले शिशु की तरह अपनी राह ही चलता है. बहुत कम बोलता था वह, पर प्यार का कोमल एहसास तो महसूस हो ही जाता है ना एक भीनी सुगन्ध की तरह, शीतल बयार की तरह, एक मुग्ध दृष्टि द्वारा, छोटी-छोटी बातों द्वारा.

तुम उसे निर्मोही कह लो, बुज़दिल समझ लो, पर मैं उसका बहुत सम्मान करती हूं. उसने कभी हमारे साथ होने का फ़ायदा उठाने की कोशिश नहीं की, शब्दों द्वारा भी नहीं. कभी अपने प्यार का इज़हार भी नहीं किया. बस, एक बार चलते-चलते बीच राह रुक कर बोला था, “तुम्हारी और मेरी राह बहुत अलग-अलग है सुधा.” उसके स्वर में निराशा थी, हताशा थी और यही उसके प्यार का इज़हार भी था और यही हमारी विवशता भी. कभी पल भर को भी उसने स्वयं को कमज़ोर नहीं होने दिया. क्या आज के युवा, प्यार का दम भरनेवाली यह पीढ़ी निभा पाएगी इतना पवित्र रिश्ता, अपनी भावनाओं पर इतना संयम?

हमने तो बस परिवारवालों का ़फैसला शिरोधार्य कर लिया था. मन के ऊपर बुद्धि की, जन्मगत संस्कारों की विजय हुई थी. यहां तक कि सम्पर्क बनाए रखने का भी प्रयत्न नहीं किया. बोलो, कुछ ग़लत किया था क्या?

याद होगा तुम्हें विवाह की तैयारियां चल रही थीं. कार्ड बंट चुके थे. बड़ी बुआजी तो आ भी गई थीं रसोई संभालने. उसी रोज़ राजलक्ष्मी आई थी. यह ख़बर लेकर कि श्री की पत्नी की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई है. एक बार फिर विधि का क्रूर मज़ाक ठठा कर हंस रहा था मेरी वेदना पर. जब मैं स्वतंत्र?थी तो वह बंधन में था और अब जब मुझे सामाजिक तौर पर आजीवन कारावास का दण्ड सुना दिया गया था तो वह आज़ाद था. पर इतने कम समय में कुछ नहीं हो सकता था. उसके घर में मातम का माहौल था और मैं उस व़क़्त मुंह खोलती भी तो बखेड़ा होता, जग हंसाई होती. हासिल कुछ होता कि नहीं, पता नहीं. मुंह तो मैं सी गई, पर आंसू न पी सकी. बहुत रोई थी मैं उस रात. तुम हैरान-परेशान थी कि अकस्मात् इसे हो क्या गया है. पर घर में अन्य सभी ने यही मान लिया कि विवाह का तनाव है, घर छोड़ने का दर्द है. असली दर्द तो मैं दफ़ना गई सीने में. सदैव के लिए.”

“पर अब तो इतने वर्ष हो गए सुधि. कहती हो सम्पर्क भी नहीं रखा. अभी भी उसे याद करती हो क्या?”

“भूली तो मैं उसे कभी भी नहीं. जब भी मुझे किसी भावनात्मक सहारे की ज़रूरत पड़ी, मैंने उसे क़रीब ही पाया. जब कभी मन निराश हुआ मैंने उसे याद करके अपना मनोबल बढ़ाया. अपने जीजू को तो जानती हो ना. खैर, अपना-अपना स्वभाव है, पर दु:ख-तकलीफ़ में कोई सम्बल बन जाए तो अच्छा लगता है. फिर भी चलो जाने दो, ठीक से ज़िंदगी जी ली. आज समाज में इ़ज़्ज़त है, सुख-सुविधा है. वैसे भी मुक़म्मल जहां किसे मिला है आज तक? गिला भी तो किसी से नहीं है. न एक-दूसरे से, न मां-बाप से. सहरा में ही चलने की आदी हो गई थी मैं कि श्री से मुलाक़ात हो गई अचानक. याद है, पिछले महीने राजलक्ष्मी के बेटे के विवाह में गई थी. बस, वहीं मिल गया वह. यूं इतना अचानक भी नहीं था. एक ही शहर में रहते हैं और जानती थी कि राजलक्ष्मी से उसकी मुलाक़ात होती रहती है. हां, अभी तुमने पूछा था ना कि उसने कभी मेरी सुधि क्यों नहीं ली? बात यह है कि राजलक्ष्मी द्वारा हमें एक-दूसरे का हाल-चाल मिल जाता था. बस, इसके आगे बढ़ने की कोशिश कभी नहीं की. वह चाहता तो राजलक्ष्मी से मेरा पता पूछ मुझ तक पहुंच सकता था. मैं भी अनेक बार गई हूं उस शहर में. चाहती तो टेलीफ़ोन डायरेक्टरी उठाकर उसका फ़ोन नम्बर भी पा लेती और घर का पता भी. पर हमारे बीच एक अलिखित समझौता था, जिसका हमने मान रखा था. अभी भी विवाह में जाने से डर रही थी, पर एक तो राजलक्ष्मी के घर जाना आवश्यक ही था और शायद आख़िरी बार उसे देख लेने की इच्छा भी बलवती हो आई थी.

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राजलक्ष्मी  के घर के क़रीब ही था उसका घर. विवाह के दूसरे दिन उसने आठ-दस पुराने परिचितों को अपने घर आमन्त्रित किया हुआ था. हम सभी अपने सहपाठी-सहपाठिनों ने मिलकर ख़ूब जम कर पुरानी यादें ताज़ा कीं. मैंने तो ख़ैर इन्हीं यादों के सहारे ज़िंदगी काटी थी. उसकी बातों से भी लगा कि वह अपनी अनेक उपलब्धियों के बावजूद पुराना कुछ भूला नहीं था. हर छोटी-सी बात याद थी उसे. कुछ अलग ही होता है इस उम्र का आकर्षण. बाह्य कुछ नहीं दिखता. एकदम हृदय के भीतर से जुड़ता है- अंतर्मन से.

मज़ेदार बात यह थी कि वह अब भी मेरा ख़्याल उसी तरह रख रहा था जैसा कि वर्षों पूर्व रखा करता था. तुम्हें तो पता है कि छह महीने पूर्व गिरने से मेरे सिर में चोट लगी थी और फलस्वरूप अभी तक मेरा संतुलन कुछ डगमगाया-सा है. सीढ़ी उतरते हुए, ऊंची-नीची जगह पर चलते हुए कोई सहारा खोजती हूं और इसी कारण उसके बरामदे की सीढ़ियां उतरते समय मैंने उसकी पत्नी की ओर हाथ बढ़ा दिया था. मैं उसी से बात करती हुई चल रही थी और श्रीपत अन्य मित्रों के संग था. पर उसकी छठी इन्द्रीय मानों मेरी ही सुख-सुविधा देखती रहती है. छोटे शहरों में लम्बे-चौड़े घर होते हैं और उसके घर से बाहरी गेट तक का रास्ता. वह भी नीम रोशनी में. मैं बहुत संभल कर चल रही थी. यह कहीं उसने देख लिया था शायद, तभी तो जाने कब वह आकर ठीक मेरे पीछे हो लिया. नीचे देख-देख कर क़दम रखते हुए यह मैंने जाना ही नहीं. पर गेट पर पहुंचते ही ज्यों ही मैंने गेट को थामने के लिए हाथ बढ़ाया तो उसका भी हाथ मुझसे थोड़ी ही दूरी पर गेट पर आन रुका. यही ख़ासियत है उसकी. मुझे उसके अपने एकदम पीछे होने का आभास तक नहीं मिला, पर यदि मुझे ज़रूरत पड़े तो मुझे सहारा देने को वहीं मौजूद था वह. जीवन बीमा का चित्र देखती हो न! दीपशिखा को दोनों हाथों से ओट किए हुए, ताकि तेज़ हवा उसे बुझा न पाये. बस, कुछ वैसा ही एहसास. कैसी विडम्बना है ना. जीवन में मुझे ठीक उसका विपरीत ही मिला. मुझे तो उसी जीवन की आदत हो गई थी. तपते रेगिस्तान में चलने की, बिना किसी साए की उम्मीद किए. कभी-कभी लगता है कि मेरा मन भी एक विशाल रेगिस्तान बन गया है. उस पर अब शीतल जल की नन्हीं-सी, अस्थाई-सी फुहार फिर से प्यास जगा गई है. पिछला महीना मैंने कैसे बिताया यह मैं ही जानती हूं. बौरा नहीं गई बस. यही समझ नहीं आता कि रोऊं या हंसूं. खुलकर रो भी तो नहीं सकती. कई बार तो चुपके से रोई हूं और ना जाने कितनी ही बार उसे याद कर मुस्कुराने लगती हूं.

और इस बार तो मैंने स्वयं ही ख़ुद को परीक्षा में झोंका था.”

“तुम्हें यह सोचकर अच्छा नहीं लगता कि इस उम्र में भी कोई तुम्हें इस शिद्दत से अपना समझता है? उसकी मधुर यादें हैं तुम्हारे पास?”

“हां सरोज, जो आत्मविश्‍वास डगमगाने लगा था, वह फिर से पा गई हूं. अपनी भी कुछ अहमियत है किसी की नज़र में, यह सोच कर ही अच्छा लगता है. अपेक्षा तो कुछ भी नहीं थी इस मैत्री में, शुरू से ही मेरी उम्मीदों से कहीं बढ़कर मिला. कुछ अधिक ही मांग लिया था ज़िन्दगी से- और वह मिल गया, झोली भर मिल गया. बहुत रुलाया है उसकी यादों ने, पर विडम्बना तो यह है कि मुझे उसकी उपेक्षा नहीं उसका अपनापन ही रुला देता है बार-बार.

दो प्रश्‍नों के उत्तर ख़ासतौर से खोजती हूं, एक तो यह कि तमाम उम्र एक सही और उसूल भरी ज़िंदगी जीने का प्रयत्न किया. मन को कभी हावी नहीं होने दिया. फिर वह ऐसा विद्रोही, ऐसा बेकाबू कैसे हो गया अचानक? कुछ दबी-बुझी इच्छाएं थीं, वो बेकाबू हो गईं क्या? दूसरा यह कि जानती हूं मैं ग़लत सोच रही हूं. उसे यूं याद करना, हर समय उसी के बारे में सोचना ग़लत है, हर हिसाब से ग़लत. तो फिर मन को इतना सुकून क्यों है? अब मुझे किसी की कड़वी से कड़वी बात भी बुरी नहीं लगती. सब कुछ माफ़ कर सकती हूं. कहां से आया यह तृप्ति का एहसास?

अब मैंने यही फैसला किया है कि उससे फिर कभी नहीं मिलूंगी. दो महीने लग गए मुझे सामान्य होने में. यह मन लगता है अब उतना मज़बूत नहीं रहा. अनेक बार प्रश्‍न कर उठता है ‘तमाम उम्र तो औरों के लिए जी ली, अब इस उम्र में भी क्या अपने लिए नहीं जीओगी?’

पर सवाल केवल अपनी ही ख़ुशी का नहीं है, सच तो यह है कि बरगद के पेड़ों की तरह हो गए हैं हम दोनों. अनेक जड़ों से अपनी-अपनी भूमि से जुड़े.

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आज के माहौल में पली, आज की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती अनिता क्या समझ पायेगी कि पा लेना ही सदैव प्यार की नियति नहीं होती. वर्षों एक-दूसरे की सुधि न पाकर, फिर मिलने की एक छोटी-सी उम्मीद  न रखकर भी याद की लौ जलाए रखना- इसे प्यार नहीं तो और क्या कहोगी अनिता? मेरी दिली तमन्ना है कि तुम्हें इस आग में न जलना पड़े, पर सच तो यह है कि प्यार देह आकर्षण से बहुत परे, बहुत ऊंचा, कुछ आलौकिक तत्व लिए होता है, एक जीवन काल से अधिक विस्तृत, अधिक विशाल.

तुम्हें सुनकर कुछ अजीब लगे शायद, पर यह सच है सरोज कि मैं आज भी उसे उतनी ही शिद्दत से चाहती हूं. पर जिसे हम प्यार करते हैं, उसे तो हम ख़ुश ही देखना चाहते हैं ना! और मैं जानती हूं कि उसकी ख़ुशी वहीं अपने परिवार के संग है. मैं स्वार्थी नहीं हूं. वह अपने परिवार के संग हर मुमकिन ख़ुशी पाये यही मेरी कामना है, मेरे लिए सर्वोच्च है. मैं भी तो अपने परिवार में रमी हूं न!

बड़ी भली लगी श्रीपत की पत्नी. बहुत ख़याल रखती है उसका. मैं ग़ौर कर रही थी वह जब भी श्री की तरफ़ देखती, उसकी नज़रें प्यार से सराबोर होतीं. चेहरे पर मुस्कुराहट होती. संपूर्ण श्रीपत की अधिकारिणी है वह. बंटे हुए की नहीं. उसके एक भी आंसू का मैं कारण नहीं बनना चाहती.

न ही श्रीपत ने उसे नाम से पुकारा और न ही मैंने उसका नाम पूछा, पर आते समय जब मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर विदा ली तो मन ने कहा- कान्हा का असली सच तो यही उसकी रुक्मिणी है. मैं तो उसके अतीत की, एक नासमझ उम्र की राधा मात्र ही हूं. यादों के सहारे जीना ही जिसके हिस्से आया है.

अलग-अलग राह पर ही चले थे कन्हैया और उसकी राधा, पर इस कारण उनके प्यार में कुछ कमी रह गई क्या?

Usha Vadhava

        उषा वधवा

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कहानी- डर अनजाना-सा (Short Story- Darr Anjana-Sa)

”आप विश्‍वास नहीं करेंगी डॉक्टर, पिछले कई महीनों से मेरा लेखन कार्य बिल्कुल ठप्प पड़ा है. मैं चंद पंक्तियां लिखने में भी स्वयं को असमर्थ पा रही हूं. मेरी सृजन क्षमता को मानो लकवा मार गया हो, जबकि अध्ययन और लेखन मेरे लिए संजीवनी बूटी की तरह हैं. ये मुझमें प्राणवायु का संचार करते हैं. इनके बिना तो मैं जीते जी ही मर जाऊंगी. मैं क्या करूं डॉक्टर, मैं क्या करूं??” कहते-कहते मैं फफककर रो पड़ी.

Short Story- Darr Anjana-Sa

”नहीं…” एक घुटी-घुटी चीख मुंह से निकली और मैं झटके से उठ बैठी. जब आंखें अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हुईं तो पता चला पूरा शरीर पसीने से तरबतर था.

‘उफ़, फिर वही भयानक सपना!’

‘सपना नहीं मिताली, यह हक़ीक़त है. यह सपना तुम्हारे भविष्य का आईना है. इसे पहचानो और व़क़्त रहते संभल जाओ.’ अंदर से उठती आवाज़ ने मुझे चेतावनी दी.

हां, मुझे ख़ुद को बदलना ही होगा. मुझे अपने खोल से बाहर निकलना ही होगा, वरना कहीं मेरा भी वही अंजाम? एक अज्ञात भय से मैं पुन: सिहर उठी. अब फिर से नींद आना नामुमकिन था. बेहतर है, मैं अपनी अधूरी पड़ी कहानी पूरी कर लूं. लेकिन लाख प्रयास के बावजूद दिमाग़ काम नहीं कर रहा था. और दिमाग़ के ज़ोर के बगैर क़लम ने चलने से इंकार कर दिया. हारकर मैंने भी हथियार डाल दिए.

‘बह जाने दो दिमाग़ी धारा को, जिस ओर भी वह बहना चाहे.’ सामने ही मौसी की पोती की शादी का कार्ड पड़ा था. ‘चलो, यहीं से शुरुआत करती हूं.’ मैंने फटाफट सूटकेस में दो भारी साड़ियां और शगुन का लिफ़ाफ़ा डाला और अगले ही दिन पहुंच गई शादी में. मुझे देखकर वहां जो कानाफूसी शुरू हुई, तो वह मेरी रवानगी तक चलती रही. खिन्न मन से मैं घर लौटी. दिल ने कहा, ‘रिश्तेदारी निभाना तुम्हारे बस का नहीं मिताली.’ लेकिन मन ने समझाया, ‘यदि एक बार ठान लो तो क्या मुश्किल है? इतने बरसों बाद किसी पारिवारिक समारोह में सम्मिलित हुई हो तो ऐसी प्रतिक्रिया तो स्वाभाविक है. धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा.’

कांताबाई आ चुकी थी. उसे सफ़ाई में जुटा देख मैं भी सहज होकर सूटकेस संभालने लगी. अचानक दिमाग़ में बिजली कौंधी. ‘बाई से घनिष्ठता भी तो ज़रूरी है.’

“अं…तुम्हारे कितने बच्चे हैं?”

“हं…?”  वह चिहुंककर पलटी और मुझे घूरने लगी.

“मैं तुम्हीं से पूछ रही हूं.” मैंने मुस्कुराने का असफल प्रयास करते हुए कहा.

“तीन. हं….., हां तीन ही हैं. आप ठीक तो हैं बीबीजी?”

“हां, मैं बिल्कुल ठीक हूं.  मुझे क्या हुआ है?”

“नहीं, ऐसे ही मुझे लगा…..”

“तुम्हें लगा मानो कोई भूत देख लिया हो.” ग़ुस्सा पीते हुए मैं मन-ही-मन बुदबुदाई. सब लोग मुझे समझते क्या हैं? क्या मैं हाड़-मांस के इंसानों से अलग हूं? मुझमें कोई भावना या संवेदना नहीं है? दिल कर रहा था फूट-फूटकर रोऊं, लेकिन मन-मसोसकर रह जाना पड़ा, क्योंकि बाई अब भी मुझे ही घूर-घूरकर देखे जा रही थी. दिन भर किसी काम में मन नहीं लगा और रात होते ही फिर वहीं भयानक सपना! मुझे लगा यदि जल्दी ही कुछ किया नहीं गया तो मैं पागल हो जाऊंगी.

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विचारों की कड़ी में उलझा मेरा दिमाग़ मेरे क़दमों को कब मनोचिकित्सक तक ले गया, ख़ुद मुझे भी पता न चला. भान तो तब हुआ जब मनोचिकित्सक ने मुझे विश्‍वास में लेकर मेरी अंतर्व्यथा को शब्दों में ढलवाना आरंभ किया और मैं यंत्रचलित-सी सब कुछ बताती चली गई.

“युवावस्था में एक के बाद पहले मां और फिर पिताजी को खो बैठी. मां को मेरी शादी का बड़ा चाव था. भाई-भाभी ने उस ज़िम्मेदारी को निभाना चाहा, पर मैंने ही किनारा कर लिया. शुरू से ही मैं गंभीर और एकाकी प्रवृत्ति की रही हूं. मां-पिताजी की असमय मृत्यु ने मुझे और भी अपने खोल में समेट लिया. मैंने गांव में अध्यापिका की नौकरी कर ली और इस तरह भैया-भाभी से भी धीरे-धीरे हमेशा के लिए दूर होती चली गई. गांव-गांव, शहर-शहर घूमते-घूमते सेवानिवृत्त होकर अंतत: मैं यहां इस महानगर में आकर बस गई. मेरी एक साथी अध्यापिका ने मुझे उचित क़ीमत पर यह छोटा-सा आशियाना दिलवा दिया था. मुझे लिखने का शौक़ रहा है. सेवानिवृत्ति के बाद मैंने स्वयं को पूरी तरह से इसी शौक़ में डुबो दिया. समय-समय पर मेरी रचनाएं छपती रहती हैं. पेंशन की निश्‍चित रकम मेरे लिए पर्याप्त है. मेरी एक बंधी-बंधाई दिनचर्या है. मुझे न अपने पड़ोसियों से मतलब रहा है, न रिश्तेदारों से. यहां तक कि बाई से भी कभी कोई विशेष बात नहीं होती. मैंने न तो कभी किसी से कोई अपेक्षा रखी है और न ही मैं चाहती हूं कि कोई मुझसे कुछ अपेक्षा रखे. मुझे अपनी ज़िंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं रही. कुछ समय पूर्व तक मैं पूर्णत: आत्मसंतुष्ट थी. लेकिन…?”

“लेकिन क्या? बोलिए मितालीजी. आपको अपने संतुष्ट जीवन से एकाएक असंतुष्टि क्यों हो गई? किसने आपकी शांत और स्थिर जीवनधारा में कंकड़ फेंका है?”

“मैं अख़बारों में आए दिन छपनेवाली ख़बरों से असहज हो उठी हूं. मेरे जैसा एकाकी जीवन गुज़ारनेवाले प्रौढ़ और वृद्ध अब इस महानगर में सुरक्षित नहीं हैं. हालांकि इस असुरक्षा का एहसास मुझे पहले से ही था, इसलिए मैंने विशेष सुरक्षा व्यवस्था कर रखी है. सुरक्षागार्ड रात को दो बार विशेष रूप से मेरे घर के चक्कर लगा जाता है. दूधवाला, सब्ज़ीवाला घंटी बजाकर दूध-सब्ज़ी दे जाते हैं. किरानेवाला एक फ़ोन करने पर सारा सामान पहुंचा जाता है. मैं ही कभी-कभी बदलाव के लिए नीचे घूमने आ जाती हूं तो आवश्यक ख़रीददारी कर लेती हूं, अन्यथा मुझे कोई असुविधा नहीं है. लेकिन एकाकी प्रौढ़ों के दर्दनाक अंत संबंधी ख़बरें पढ़-पढ़कर मैं अपने होश खो बैठी हूं. पहले प्रसिद्ध अभिनेत्री ललिता पवार, फिर परवीन बॉबी, फिर ‘बुलेट’ फ़िल्म की वह अभिनेत्री और भी न जाने कितनी महिलाएं! ये सभी अपने घरों में मृत पाई गईं और दो-दो तीन-तीन दिनों तक इनकी लाशें सड़ती रहीं. कोई इनका अंतिम संस्कार करनेवाला भी नहीं था. ये सभी तो अपने ज़माने की मशहूर हस्तियां थीं, मैं तो एक अदना-सी प्रौढ़ा हूं. जब उनका अंत इतना बुरा था तो मेरा अंत कैसा होगा? ये सोच-सोचकर ही मैं सिहर उठती हूं. अक्सर मुझे रात में दु:स्वप्न आ घेरते हैं. मैं मृत्युशैया पर पड़ी हूं और कोई मुझे पानी देनेवाला भी नहीं है. छटपटाते हुए मैं प्राण त्याग देती हूं. मेरी मृतदेह अंतिम संस्कार के इंतज़ार में बंद घर में पड़ी है. बाई, दूधवाला, सब्ज़ीवाला घंटी बजाकर मेरे घर में न होने का कयास लगाते हुए निकल जाते हैं. मैं बेबस-सी आवाज़ें लगाकर उन्हें रोकने का प्रयास कर रही हूं, पर वे तो मानो न तो मुझे देख रहे हैं और न मुझे सुन रहे हैं. तीसरे दिन लाश से उठती दुर्गन्ध पड़ोसियों को पुलिस को फ़ोन करने के लिए तत्पर करती है. पुलिस आकर दरवाज़ा तोड़ती है. बदबू का एक भभका उठता है. लोग नाक पर रुमाल रखकर दूर छिटक जाते हैं… और मैं चिल्लाकर नींद से जाग जाती हूं. लेकिन अफ़सोस, मेरी भयभीत चीख की आवाज़ भी किसी के कानों तक नहीं पहुंचती और कोई मेरे पास आकर यह नहीं पूछता कि मैं क्यों चिल्लाई?” उत्तेजना में मैं हांफने लगी.

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“लीजिए, ठंडा पानी पी लीजिए.” डॉक्टर ने सामने रखा ग्लास मुझे थमा दिया. मैंने एक ही सांस में ग्लास खाली कर दिया.

“थैंक्यू, आपको यह सब कुछ बताकर मैं बहुत हल्का महसूस कर रही हूं.”

“मैं समझ सकती हूं. प्लीज़ गो ऑन.” डॉक्टर ने मेरी हौसलाअफ़ज़ाई की.

“अपने दुर्दान्त की कल्पना से सिहरकर मैंने लोगों से मेल-जोल बढ़ाने का प्रयास किया. लेकिन मुझे लगता है, जितनी तकलीफ़ मुझे अपने खोल से निकलने में होती है, उतनी ही, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा तकलीफ़ लोगों को मुझे आत्मसात करने में होती है. आप विश्‍वास नहीं करेंगी डॉक्टर, पिछले कई महीनों से मेरा लेखन कार्य बिल्कुल ठप्प पड़ा है. मैं चंद पंक्तियां लिखने में भी स्वयं को असमर्थ पा रही हूं. मेरी सृजन क्षमता को मानो लकवा मार गया हो, जबकि अध्ययन और लेखन मेरे लिए संजीवनी बूटी की तरह हैं. ये मुझमें प्राणवायु का संचार करते हैं. इनके बिना तो मैं जीते जी ही मर जाऊंगी. मैं क्या करूं डॉक्टर, मैं क्या करूं??” कहते-कहते मैं फफककर रो पड़ी.

डॉक्टर ने उठकर मेरी पीठ सहलाई. “आप घर जाइए और आराम कीजिए. आपकी समस्या कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है. परसों आप इसी समय आकर मुझसे मिलें. थैंक्स फॉर कॉपरेशन.”

होंठों पर फीकी-सी मुस्कुराहट लिए मैंने डॉक्टर से विदा ली. घर आकर मैं बिस्तर पर औंधी पड़ गई. नींद ने कब मुझे अपनी आगोश में ले लिया, कुछ भान न रहा. ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाने और घंटी बजने की आवाज़ से मुझे कुछ चेतना हुई, लगा फिर वही दु:स्वप्न देख रही हूं. मगर ‘माई! माई!’ की आवाज़ से नींद उड़ गई और मैंने उठकर दरवाज़ा खोल दिया.

“क्या बीबीजी, कितनी देर करती हो दरवाज़ा खोलने में? मैं कब से खड़ी हूं… और घरों का भी तो काम निबटाना है.” मैं बुत-सी उसे निहारती रही. शायद ख़ुद को यह विश्‍वास दिला रही थी कि यह सपना नहीं, हक़ीकत है और मैं ज़िंदा हूं.

मुझे निर्निमेष निहारते देख बाई घबरा गई. “लगता है आपकी तबियत ठीक नहीं है.” कहते हुए बाई ने मेरी कलाई पकड़ ली.

“उई मां, आपको तो बहुत तेज़ बुखार है. पहले क्यूं नहीं बताया? चलो बिस्तर पर जाकर लेटो, मैं तुलसी-अदरक की चाय बनाकर लाती हूं.” वह मुझे घसीटकर बिस्तर तक ले गई और लिटाकर चादर ओढ़ा दी. मैं कुछ समझ या कह पाऊं, इससे पूर्व ही वह गरम चाय का प्याला लेकर हाज़िर थी. मैंने चाय के संग एक क्रोसीन ले ली.

“आपको बुखार में तनिक भी हिलने की ज़रूरत नहीं है, मैं सब संभाल लूंगी. आप मुंह से बात नहीं करतीं तो क्या हुआ, हम जानती हैं कि आप दिल की बहुत अच्छी हैं. और मेमसाब लोग तो इधर-उधर की पचास बातें पूछती हैं, लेकिन आप बस अपने काम से काम रखती हैं.” बाई की बातों से मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानो मरुस्थल में एकाएक हरियाली लहलहा उठी हो. मैं इस हरियाली का भरपूर आनन्द उठा पाऊं, इससे पूर्व ही दरवाज़े की घंटी बज उठी.

“आप बैठी रहिए, मैं देख लूंगी.” बाई ने दरवाज़ा खोल दिया. सामने वाले मकान की मिसेज मल्होत्रा एक महिला के संग खड़ी थीं. मेरा उनसे कोई विशेष परिचय नहीं था, बस एक-दो बार हाय-हैलो हुई थी.

“नमस्ते मितालीजी, यह मेरी सहकर्मी सानिया है. आपकी कहानियां और लेख बड़े चाव से पढ़ती है. कई बार आपसे मिलवाने का आग्रह कर चुकी है. आज ऑफ़िस से ज़रा जल्दी फ्री हो गए तो मैं उसे आपसे मिलवाने ले आई. शायद आपकी तबियत ठीक नहीं है. कोई बात नहीं, आप आराम करें, हम फिर आ जाएंगे.” “अरे नहीं, बैठिए.” मैंने बाई को दो चाय लाने का इशारा किया. “ऐसे ही थोड़ा बुखार हो गया था. अभी क्रोसीन ली है, उतर जाएगा.” हम देर तक साहित्यिक चर्चा करते रहे. मुझे लग रहा था दवा की असली खुराक तो मुझे अब मिल रही है. दो घंटे बाद वे जाने के लिए उठ खड़ी हुईं. “मैं बिट्टू के संग आपके लिए अभी दलिया बनाकर भिजवा दूंगी. आप आराम कीजिए.”

“अरे आप क्यूं तकलीफ़…” मैं कहती ही रह गई, पर वे नहीं मानीं.

“आप इसी तरह लिखती रहिएगा. आप नहीं जानतीं, आपकी रचनाओं से हमें हमारी कितनी ही समस्याओं का समाधान मिल जाता है. और सबसे बड़ी बात, उन्हें पढ़ने से हमें आत्मिक तृप्ति होती है.”

“मैं आपकी भावनाओं का ख़याल रखूंगी. आप भी मुझे ऐसे ही सहयोग करती रहिएगा.” बड़े ही तृप्त मन से मैंने उनसे विदा ली. अब लेटने का मन नहीं कर रहा था. मैं बालकनी में कुर्सी लगाकर बैठ गई. संध्या की सुरमई छटा चारों ओर पसरने लगी थी. सड़क पर कारों का धीरे-धीरे बढ़ता क़ाफिला बहुत भला लग रहा था. कभी यही रेंगता क़ाफिला झुंझलाहट से भर देता था. सच है, जब मन शांत हो तो सब कुछ सुहाना लगता है. मैं भी कितनी बुद्धू हूं! जीवन की सार्थकता किसमें है, यही नहीं समझ पाई. इस नश्‍वर शरीर का क्या होगा, यह बेसिर पैर की बात सोच-सोचकर ज़िंदा शरीर को दुख देती रही. अरे, जिस शरीर में प्राण ही नहीं, उसकी क्या चिंता करना? मौत तो किसी को कभी भी, कहीं भी आ सकती है. यदि सीमा पर लड़ने वाला जवान अपनी मौत को लेकर इतना फ़िक्रमंद हो जाए तो देश का क्या होगा? इंसान यदि मौत से डर-डरकर जीता रहा तो वह तो जीते जी मर जाएगा.

मैं अपने ढंग से ज़िंदगी जीते हुए आत्मसंतुष्ट हूं. दूसरों के लिए मेरा जीवन अनुकरणीय और सराहनीय रहेगा, यह सुखद एहसास यदि दिल में है, तो मौत हमेशा सुखद ही लगेगी. सोचते हुए मैंने काग़ज़- क़लम उठा ली. अधूरी कहानी आज अवश्य ही पूरी हो जाएगी.

 

Sangeeta Mathur

     संगीता माथुर

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पंचतंत्र की कहानी: खरगोश, तीतर और धूर्त बिल्ली (Panchtantra Story: The Hare, Partridge & Cunning Cat)

Panchtantra Story

पंचतंत्र की कहानी: खरगोश, तीतर और धूर्त बिल्ली (Panchtantra Story: The Hare, Partridge & Cunning Cat)

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

एक नगर में बड़े से पेड़ पर एक तीतर का घोंसला था. वो बड़े मज़े से वहां रहता था. एक दिन वह अपना भोजन व दाना पानी ढूंढ़ने के चक्कर में दूसरी जगह किसी अच्छी फसलवाले खेत में पहुंच गया. वहां उसके खाने पीने की मौज हो गई. उस खुशी में वो उस दिन घर लैटना भी भूल गया और उसके बाद तो वो मज़े से वहीं रहने लगा. उसकी ज़िंदगी बहुत अच्छी कटने लगी.

यहां उसका घोसला खाली था, तो एक शाम को एक खरगोश उस पेड़ के पास आया. पेड़ ज़्यादा ऊंचा नहीं था. खरगोश ने उस घोसले में झांककर देखा तो पता चला कि यह घोसला खाली पड़ा है. खरगोश को वो बेहद पसंद आया और वो आराम से वहीं रहने लगा, क्योंकि वो घोसला काफ़ी बड़ा और आरामदायक था.

कुछ दिनों बाद वो तीतर भी नए गांव में खा-खाकर मोटा हो चुका था. अब उसे अपने घोसले की याद सताने लगी, तो उसने फैसला किया कि वो वापस लौट आएगा. आकर उसने देखा कि घोसले में तो खरगोश आराम से बैठा हुआ है. उसने ग़ुस्से से कहा, “चोर कहीं के, मैं नहीं था तो मेरे घर में घुस गए… निकलो मेरे घर से.”

खरगोश शान्ति से जवाब देने लगा, “ये तुम्हारा घर कैसे हुआ? यह तो मेरा घर है. तुम इसे छोड़कर चले गए थे और कुआं, तालाब या पेड़ एक बार छोड़कर कोई जाता है, तो अपना हक भी गवां देता है. अब ये घर मेरा है, मैंने इसे संवारा और आबाद किया.”
यह बात सुनकर तीतर कहने लगा, “हमें बहस करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला, चलो किसी ज्ञानी पंडित के पास चलते हैं. वह जिसके हक में फैसला सुनायेगा उसे घर मिल जाएगा.”

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उस पेड़ के पास से एक नदी बहती थी. वहां एक बड़ी सी बिल्ली बैठी थी. वह कुछ धर्मपाठ करती नज़र आ रही थी. वैसे तो बिल्ली इन दोनों की जन्मजात शत्रु है, लेकिन वहां और कोई भी नहीं था, इसलिए उन दोनों ने उसके पास जाना और उससे न्याय लेना ही उचित समझा. सावधानी बरतते हुए बिल्ली के पास जाकर उन्होंने अपनी समस्या बताई, “हमने अपनी उलझन बता दी, अब आप ही इसका हल निकालो. जो भी सही होगा उसे वह घोसला मिल जाएगा और जो झूठा होगा उसे आप खा लेना.”

“अरे, यह कैसी बातें कर रहे हो, हिंसा जैसा पाप नहीं है कोई इस दुनिया में. दूसरों को मारनेवाला खुद नरक में जाता है. मैं तुम्हें न्याय देने में तो मदद करूंगी लेकिन झूठे को खाने की बात है तो वह मुझसे नहीं हो पाएगा. मैं एक बात तुम लोगों को कानों में कहना चाहती हूं, ज़रा मेरे करीब आओ तो.”

खरगोश और तीतर खुश हो गए कि अब फैसला होकर रहेगा और उसके बिलकुल करीब गए. बस फिर क्या था, करीब आए खरगोश को पंजे में पकड़कर मुंह से तीतर को भी उस चालाक बिल्ली बिल्ली ने नोंच लिया और दोनों का काम तमाम कर दिया.

सीख: अपने शत्रु को पहचानते हुए भी उस पर विश्‍वास करना बहुत बड़ी बेवक़फ़ी है. तीतर और खरगोश इसी विश्‍वास और बेवक़फ़ी के चलते को अपनी जान गवांनी पड़ी.

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कहानी- जीवन ठहरा नहीं (Short Story- Jeevan Thahara Nahi)

Short Story- Jeevan Thahara Nahi

“नहीं सुधा, जीवन अभी ठहरा नहीं, बस एक पड़ाव से गुज़र रहा है. अभी तो बहुत रास्ते तय करने हैं, बहुत दूर जाना है… साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ थामे. सच, मैं तो सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूं. ऐसा लग रहा है कि असुरक्षा और चिंताओं की परछाइयों से निकलकर इतने सालों के बाद अब हमारा समय आया है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, अपने अधूरे सपने पूरे कर सकें…”

 रात के अंधियारे में जब निद्रा रानी पूरे जग को अपनी आगोश में समेटे लोरियां गा रही थी, सुधा की आंखों में न नींद थी, न ही दिल में चैन. वो रसोईघर में भारी मन से बैठी आटे के लड्डू बनाने में व्यस्त थी. बीच-बीच में जब नज़र कुछ धुंधला जाती, तो आंखों से छलक आई वेदना को साड़ी के पल्लू से पोंछ पुनः लड्डू बनाने लगती. दिनभर में कितना कुछ बना लिया था उसने अपने छोटे बेटे अमित के लिए- नमकीन मठरी, मीठे पारे, चकली, गुझिया और भी न जाने क्या-क्या… मगर दिल को अभी भी संतोष नहीं था. जो हाल घर से पहली बार हॉस्टल जा रहे हर बेटे की मां का होता है, वही हाल आज सुधा का भी था.

कैसे रहेगा इतनी दूर? मेरे बिना तो एक काम भी ठीक से नहीं कर पाता… पता नहीं ठीक से खाएगा-पिएगा भी या नहीं?… कौन रखेगा उसका ध्यान?… नन्हीं-सी जान है. देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी में 25वां रैंक पानेवाला 18 वर्षीय मेधावी अमित सुधा के लिए अभी भी ‘नन्हीं-सी जान’ ही था, जो सुबह की ट्रेन से कानपुर आईआईटी जा रहा था.

सुधा दिनभर के जतन से बनाए गए नाश्ते को बैग में व्यवस्थित कर ही रही थी कि पीछे से अमित रसोई में आ धमका, “प्लीज़ मम्मी सोने भी दो ना, कितनी देर से सोने की कोशिश कर रहा हूं, मगर तुम्हारी खटर-पटर रुकने का नाम ही नहीं ले रही… और ये क्या-क्या भर दिया बैग में? उ़फ् मम्मी, कानपुर भारत में ही है चीन में नहीं, वहां ये सब मिलता है…” अमित की झल्लाहट से सुधा की आंखें पुनः नम हो गईं. “ओह मम्मी, प्लीज़ अब रोओ मत… मेरी प्यारी मम्मी… मेरा वो मतलब नहीं था…” अमित अपनी दुखी मां को बांहों में भर दिलासा देने लगा. “मम्मी, आपका और पापा का यही सपना था कि मैं आईआईटी से इंजीनियरिंग करूं और आज जब मैं आपका सपना पूरा करने जा रहा हूं तो आपका ये हाल हो रहा है. जब जतिन भइया एन.डी.ए. में गए थे, तब भी आपका ऐसा ही हाल हुआ था. आपको तो ख़ुश होना चाहिए कि आपके दोनों बच्चे आपकी ही दिखाई हुई राह पर आगे बढ़ रहे हैं, अपना मुक़ाम हासिल कर रहे हैं और आप हैं कि यूं रोनी सूरत बनाए बैठी हैं.”

“मैं ख़ुश हूं बेटा… बहुत ख़ुश… बस तुम्हारे दूर जाने से ज़रा-सा मन भारी हो रहा था, मगर अब मैं ठीक हूं… चलो चलकर सो जाओ, वरना सुबह आंख नहीं खुलेगी.” अमित सोने चला गया और रसोई से निवृत्त हो सुधा भी लेट गई, मगर उसकी आंखों से नींद अभी भी कोसों दूर थी. मन ही मन अमित के लिए पैक किया हुआ एक-एक सामान दोहरा रही थी, सब कुछ रख लिया न… कुछ भूल तो नहीं गया… थोड़ा लापरवाह है… कैसे ख़याल रखेगा अपना? कैसे रहेगा? और एक बार फिर सुधा के मस्तिष्क में उन्हीं प्रश्‍नों की पुनरावृत्ति होने लगी.

सारी रात खुली आंखों से काटकर उठी सुधा ने ठीक चार बजे अमित को जगा दिया. अमित तैयार हो अपनी मंज़िल की ओर रवाना होने लगा. जाने से पहले तक सुधा को समझाता रहा, “अकेली परेशान मत होना, 10-15 दिन में तो पापा आ ही जाएंगे, चाहो तो इस बीच मौसी के यहां चली जाना. मेरी चिंता मत करना. अब मैं अपना ख़याल ख़ुद रख सकता हूं.” मम्मी के लिए ढेरों नसीहतें छोड़ अमित चला गया.

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उसकी नसीहतें सुन सुधा को बेटे के बड़े और समझदार होने का एहसास होने लगा. इतना बड़ा कि वो दुनिया का अकेले मुक़ाबला करने को तैयार है. उसे अब मां के सुरक्षित आंचल की ज़रूरत नहीं. उसे अब मेरी ज़रूरत नहीं. ऐसी ही व्यथाओं में उलझी सुधा अमित के जाने के बाद अपने चार कमरों के आलीशान फ्लैट में इधर-उधर चक्कर लगा रही थी. किसी काम में मन नहीं लग रहा था और सच पूछो तो अब काम ही क्या बचा था उसके पास. जब कुछ न सूझा तो न जाने क्या सोचकर सुधा ने आलमारी से पुराना एलबम निकाला और देखने बैठ गई. पहले ही फ़ोटोग्राफ़ पर नज़र जम गई. आशीष के साथ पहली फ़ोटो थी उसकी. कैसे डर-डरकर, छुपकर, आशीष के ज़बरदस्ती करने पर खिंचवाई थी. कितना छुपाकर रखती थी उसे… कभी तकिये के नीचे, तो कभी आलमारी में बिछे अख़बार के नीचे. फ़ोटो देखकर पुरानी मधुर स्मृतियां सुधा के मन को गुदगुदा गईं.

नया-नया प्यार था सुधा और आशीष का. दोनों कॉलेज में साथ ही पढ़ते थे. दोनों के प्यार का आधार उनकी पारस्परिक समझ और दोस्ती थी. एक ओर जहां आशीष इलेक्ट्रॉनिक्स में पी.एच.डी. करके इलेक्ट्रॉनिक गुड्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाना चाहता था, वहीं सुधा पत्रकार बन अपनी लेखन प्रतिभा को नए आयाम देना चाहती थी. दोनों अपने-अपने सपनों को साकार करने के साथ-साथ एक-दूसरे के सहयोगी होने के लिए भी वचनबद्ध थे. मगर आशीष के पैरेंट्स की एक दुर्घटना में हुई असमय मृत्यु से घर और दो छोटी बहनों की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ पड़ी. फलस्वरूप आशीष को पढ़ाई बीच में ही छोड़ नौकरी करनी पड़ी और घर संभालने के लिए सुधा से शादी भी. दोनों ने सोचा था कि एक बार घर की गाड़ी वापस पटरी पर आ जाए, तो अपने-अपने सपने भी पूरे कर लेंगे. पिता के निधन से श्रीहीन हुए परिवार को वैभव की ऊंचाइयों पर पुनः प्रतिष्ठित करने को प्रतिबद्ध आशीष ने दोनों बहनों के विवाह की ज़िम्मेदारी से निबटकर बैंक से लोन ले छोटी-सी इलेक्ट्रॉनिक्स पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाई और ख़ुद को अनवरत परिश्रम की भट्टी में झोंक डाला. अपनी अथक मेहनत और लगन के चलते वो जल्दी ही अपने क्षेत्र में स्थापित हो गया, मगर इस आयोजन में घर को बिल्कुल भुला बैठा.

आशीष के सपने साकार होने के बाद सुधा भी पत्रकारिता का कोर्स करने की सोच ही रही थी कि गर्भ में एक नवीन सृजन की आकस्मिक उत्पत्ति के बाद घर-संसार की ज़िम्मेदारियों में कुछ ऐसी उलझी कि आज तक नहीं निकल पाई थी. अपनी महत्वाकांक्षा को तो कब का भुला बैठी थी वो. आशीष तो पहले से ही घर को सुधा के भरोसे छोड़े बैठे थे, दो साल पहले बड़ा बेटा जतिन भी आर्मी में चला गया था और आज जब उसकी जीवन परिधि का अंतिम केंद्र अमित भी उसके वात्सल्य की छांव को छोड़ अपने क्षितिज की तलाश में बढ़ चला, तो नितांत अकेली खड़ी रह गई सुधा को स्वयं का अस्तित्व बिखरता-सा महसूस हो रहा था, निराधार… अर्थहीन…

सुधा दो सप्ताह घर में अकेली रही, कहीं आने-जाने का मन नहीं किया. कभी अपने अतीत के पन्ने पलटती, तो कभी अपने 23 साल के लंबे वैवाहिक जीवन की समीक्षा करने लग जाती. आज अचानक ही खाली बैठी सुधा की नज़रों के सामने वो लम्हे तैरने लगे, जब दिन के 24 घंटे भी उसके काम को निपटाने के लिए कम हुआ करते थे, ‘सुधा… सुधा… मम्मी… मम्मी…’ घर में पल-पल गूंजती पुकारें, “ओफ़़्, अभी आई… कुछ काम तो ख़ुद से किया करो.” सुधा झल्लाकर कहती. आशीष तो एक रुमाल भी ख़ुद से नहीं ले सकते थे और बच्चे, जब देखो उसके पल्लू से चिपके रहते. कितना थक जाती थी सुधा उस व़क़्त. सोचा करती थी, न जाने कब मुक्ति मिलेगी मुझे इन ज़िम्मेदारियों से और आज जब सच में उसे मुक्ति मिल चुकी थी तो वो अपनों के बीच उस ‘मोस्ट-वॉन्टेड’ होने के एहसास को मिस कर रही थी. आशीष के साथ तो तसल्ली से बैठ दो बातें करने को तरस गई थी वो. लगता था जैसे उनके ढीले पड़ चुके प्रेम सूत्र मात्र औपचारिकताओं पर ही टिके थे.

कुछ ही दिनों में कितना बड़ा शून्य उभर आया था सुधा के जीवन में. क्या-क्या सोचने लगी थी वो? सभी ने अपनी-अपनी डगर ले ली, किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रही… कैसे ढोऊंगी इस उद्देश्यहीन जीवन का भार? अपनी मनोव्यथा वो स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी. जितना सोचती, उतना ही उलझती जाती स्वयं के बनाए हुए भ्रमजाल में.

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आज सवेरे ही आशीष का मलेशिया से फ़ोन आया था, दो दिन बाद वे घर वापस आ रहे थे. हर बार जब भी आशीष टूर से वापस आने की ख़बर देते, तो घर में जैसे बहार आ जाती, मगर इस बार ऐसा कुछ भी नहीं था.

आशीष आ गए थे. सुधा खाना बना रही थी और बीच-बीच में पास खड़े हुए आशीष को उनकी अनुपस्थिति में हुए क्रियाकलापों की जानकारी दे रही थी. खाना खाकर आशीष बैठक में बैठ गए और सुधा के पास आकर बैठने का इंतज़ार करने लगे, मगर सुधा थी कि कोई न कोई काम निकालकर अपनी व्यस्तता ज़ाहिर कर रही थी. वो आशीष के सान्निध्य से भी कतरा रही थी. उसे डर था कि कहीं उसके भीतर का गुबार बाहर निकल उनके शेष बचे-खुचे सूत्रों को भी अपने साथ बहाकर न ले जाए.

“सुधा, थोड़ी देर यहां आकर बैठो न, मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है.” सुनकर सुधा का मन स्वयं से बोल उठा, उहं… अपना काम छोड़कर कभी बैठे हो मेरे पास जो मैं बैठूं, मगर आशीष के विनम्र आग्रह को ठुकरा न सकी और एक नियत दूरी बनाकर बैठक में बैठ गई.

“कहिए.” उसकी शारीरिक भाषा अभी भी काम की हड़बड़ी जता रही थी.

“सुधा, तुम ख़ुश तो हो न मेरे साथ? कोई शिकायत?” आशीष ने सुधा की आंखों में झांककर पूछा.

“अ…हं… शिकायत?” सुधा को लगा जैसे उसके मन का चोर आंखों के रास्ते निकल आशीष के सामने जा खड़ा हुआ, मन किया फट पड़े और बता दे कि हां शिकायतें तो बहुत हैं. कितनी और कौन-कौन सी, ये तो वो स्वयं भी नहीं जानती, मगर कुछ बोल न सकी.

“नहीं, मुझे क्या शिकायत होने लगी भला.”

“ये भी नहीं कि मैं तुम्हें बिल्कुल समय नहीं देता.”

“तुम अपने काम में व्यस्त रहते हो, अपना क़ीमती समय मेरे साथ बैठकर थोड़े ही गंवाओगे.” आशीष को सुधा का कटाक्ष आहत कर गया, उसने आगे बढ़कर सुधा के हाथों को थाम लिया

“सुधा, तुम्हारे साथ बिताया गया एक-एक लम्हा अनमोल है मेरे लिए. कितना तरसता हूं मैं तुम्हारे लिए… तुम्हारे साथ के लिए… ये तुम नहीं जान सकती. मुझे

इस बात का एहसास है कि मैंने अपने बिज़नेस के पीछे घर को और तुम्हें बिल्कुल अनदेखा कर दिया, मगर क्या करता? मैं ख़ुद मजबूर था.”

“मजबूर…?” सहसा सुधा को अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ.

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“हां सुधा, तुम तो जानती ही हो मम्मी-पापा के अचानक चले जाने के बाद मुझ पर क्या गुज़री? उनके बिज़नेस पार्टनर्स ने हमारा हिस्सा दबाकर हमें सड़क पर खड़ा कर दिया था, ऊपर से बहनों की ज़िम्मेदारियां, हमारा भविष्य… सब कुछ अधर में था. ख़ैर भगवान की कृपा से धीरे-धीरे सब संभल गया, पर इन कटु अनुभवों और अभावों के चलते मन में एक तरह की इनसिक्योरिटी घर कर गई.”

“कैसी इनसिक्योरिटी?” सुधा ने उत्सुकता से पूछा.

“लगता था कि अगर पापा की तरह मुझे भी अचानक से कुछ हो जाए, तो तुम्हारा क्या होगा? बच्चों का भविष्य कैसे बनेगा? रात-दिन बस यही चिंता खाए जाती थी, इसीलिए बिज़नेस बढ़ाता रहा, बैंक बैलेंस बनाता रहा. मगर जब अमित का आई.आई.टी.में सिलेक्शन हुआ तो मैं इन इनसिक्योरिटीज़ से उबर गया. मुझे विश्‍वास हो चला कि अब मेरे बच्चे इस लायक़ हो गए हैं कि उन्हें मेरे सहारे की, मेरी तरफ़ से किसी सिक्योरिटी की ज़रूरत नहीं, तो मैंने अपने बिज़नेस को सीमित करने का निश्‍चय कर लिया. बहुत हो चुका यहां-वहां भागना, रात-दिन काम में पिसना, बस अब बाकी की ज़िंदगी तुम्हारे साथ सुकून से गुज़ारना चाहता हूं और तुम्हारी लेखन प्रतिभा को निखरते हुए, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूं.”

“ये क्या कह रहे हैं? मैं और लेखन प्रतिभा, वो सब तो अतीत की बातें हैं.”

“नहीं सुधा, प्रतिभा कभी नहीं मरती. हां, अनुकूल परिस्थितियां न होने पर कुछ समय के लिए दब अवश्य जाती है, मगर उसका अस्तित्व कभी नहीं मिटता. तुम्हारे सहयोग और कर्त्तव्यनिष्ठा से हम सभी के सपने पूरे हो गए, मगर तुम वहीं की वहीं रह गईं और तुम्हें इसकी कोई शिकायत भी नहीं. मगर मुझे हमेशा यह ग्लानि रही कि मुझसे शादी कर तुम्हारी प्रतिभा का गला घुट गया. पर अब समय आ गया है कि तुम अपने बारे में सोचो और आगे बढ़ो. इस बार पीछे खड़े रहकर सहयोग देने की मेरी बारी है.”

“ये अचानक कैसी बातें कर रहे हैं आप? अब कहां लिख पाऊंगी कुछ…? मेरी तो सोच में भी जंग लग चुका है… इस उम्र में नए सिरे से शुरुआत करना असंभव है… जीवन में एक ठहराव आ चुका है.”

“नहीं सुधा, जीवन अभी ठहरा नहीं, बस एक पड़ाव से गुज़र रहा है. अभी तो बहुत रास्ते तय करने हैं, बहुत दूर जाना है… साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ थामे. सच, मैं तो सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूं. ऐसा लग रहा है कि असुरक्षा और चिंताओं की परछाइयों से निकलकर इतने सालों के बाद अब हमारा समय आया है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, अपने अधूरे सपने पूरे कर सकें…” आशीष बोल रहे थे और उनका एक-एक शब्द सुधा के हिमशिला बने मन-मस्तिष्क को पिघलाता जा रहा था. तेज़ हुए रुधिर प्रवाह ने शिथिल पड़ी धमनियों को पुनः थरथरा दिया था. मन के समस्त पूर्वाग्रह तो न जाने कहां हवा हो चले थे और 23 साल पुराने ‘जीवन में कुछ कर गुज़रने’ के तूफ़ानी उद्वेग उनकी जगह लेते जा रहे थे.

दो दिन बाद अमित का फ़ोन आया, “मम्मी, आप जर्नल़िज़्म का कोर्स कर रही हैं… आपने कभी बताया ही नहीं कि आप लिखती भी हैं. वो तो पापा ने बताया… मम्मी, कीप इट अप, मुझे आप पर गर्व है, आप अपनी हमउम्र औरतों के लिए एक मिसाल हैं. मम्मी, बेस्ट ऑफ़ लक…” सुधा बेटे की शुभकामनाओं से भावविह्वल हो रही थी, वहीं थोड़ी दूर खड़े आशीष सुधा के चेहरे पर लौट आई बरसों पुरानी चमक निहार रहे थे. एक पड़ाव पर कुछ देर ठहर सुधा का जीवन नए कुलांचे भरने को तैयार था.

दीप्ति मित्तल

       दीप्ति मित्तल

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पंचतंत्र की कहानी: दो सांपों की कहानी (Panchtantra Ki Kahani: The Tale Of Two Snakes)

Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

देवशक्ति  नाम का एक राजा था, वो बेहद परेशान था और उसकी परेशानी की वजह थी, उसका बेटा, जो बहुत कमज़ोर था. वह दिन व दिन और कमज़ोर होता जा रहा था.

कई प्रसिद्ध चिकित्सक भी उसे ठीक नहीं कर पा रहे थे. दूर-दराज़ के कई मशहूर चिकित्सकों को भी बुलाया गया, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ, क्योंकि उसके पेट में सांप था.

Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

वह राजकुमार भी अपनी कमज़ोरी और सेहत को लेकर बेहद परेशान था. अपने पिता को दुखी देखकर बहुत निराश भी था. अपनी ज़िंदगी से तंग आकर एक रात वह महल छोड़कर कहीं दूसरे राज्य में चला गया. उसने एक मंदिर में रहना शुरू कर दिया और अन्य लोग जो कुछ भी उसे दान देते थे,  उसी से उसका काम चल रहा था. वो वही खा-पी लेता था.

इस नए राज्य का जो राजा था, उसकी दो जवान बेटियां थीं. वे बेहद अच्छे संस्कारी और ख़ूबसूरत थीं. बेटियों में से एक ने कहा, पिताजी, आपके आशीर्वाद से हमें दुनिया के सभी सुख प्राप्त हैं, वहीं दूसरी बेटी ने कहा इंसान को स़िर्फ अपने कार्यों का ही फल मिलता है. दूसरी बेटी की इस टिप्पणी से राजा क्रोधित हो गया. एक दिन उसने अपने मंत्रियों को बुलाकर कहा कि इसे ले जाओ और इसका महल के बाहर किसी के भी साथ इसका विवाह कर दो. यह अपने कार्यों का फल भोगेगी.

मंत्रियों ने मंदिर में रह रहे युवा राजकुमार से उसका विवाह कर दिया, क्योंकि उन्हें कोई और नहीं मिल रहा था. राजकुमारी अपने पति को भगवान मानती थी. वह ख़ुश थी और अपनी शादी से संतुष्ट थी. उन्होंने देश के एक अलग हिस्से की यात्रा करने का निर्णय लिया, क्योंकि मंदिर में घर बनाना सही नहीं था.

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Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

चलते-चलते राजकुमार थक गया था और एक पेड़ की छाया के नीचे आराम करने लगा. राजकुमारी ने पास के बाज़ार से कुछ भोजन लाने का फैसला किया. जब वह लौटकर आई, तो उसने अपने पति को सोया देखा और पास के एक बिल से उभरते सांप को भी देखा. उसकी नज़र पति के मुख पर गई, तो उसने अपने पति के मुंह से उभरते हुए एक और सांप को देखा. वह छिपकर सब देखने लगी.

पेड़ के पास  के सांप ने दूसरे सांप से कहा,  तुम इस प्यारे राजकुमार को इतना दुःख क्यों दे रहे हो? इस तरह तुम खुद का जीवन खतरे में डाल रहे हो. अगर राजकुमार जीरा और सरसों का गर्म पानी पी लेगा, तो तुम मर जाओगे.

राजकुमार के मुंह के सांप ने कहा, तुम सोने की दो घड़ों की रक्षा अपनी ज़िंदगी को ख़तरे में डालकर भी क्यों करते हैं? इसकी तुमको कोई ज़रूरत नहीं है. अगर किसी ने गर्म पानी और तेल को डाला, तो तुम भी तो मर जाओगे.

बातें करने के बाद, वे अपने-अपने स्थानों के अंदर चले गए, लेकिन राजकुमारी उनके रहस्य जान चुकी थी.

 

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उसने जीरा और सरसों का गर्म पानी तैयार करके अपने पति को भोजन के साथ दिया. कुछ ही घंटों में राजकुमार ठीक होना शुरू हो गया और उसकी ऊर्जा व ताकत वापस आ गई. उसके बाद, उसने सांप के बिल में गर्म पानी और तेल डाला और सोने के दो बर्तन ले लिए. वह राजकुमार अब पूरी तरह से ठीक हो गया था और उनके पास दो बर्तन भर सोना भी था. वे दोनों ही ख़ुशी-ख़ुशी से रहने लगे.

सीख: दुश्मनों की लड़ाई में आपको फ़ायदा हो सकता है, इसलिए सतर्क रहें और अपने दुश्मनों पर नज़र रखें.

 

कहानी- सिस्टिन चैपल का वह चित्र (Short Story- Sistine Chapel Ka Woh Chitr)

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क्या यह प्यार एकतरफ़ा था? शायद नहीं. यक़ीनन नहीं. मैं सोचती थी मैं अपने मन के नहीं दिमाग़ के आधीन हूं, तार्किक रूप से सोच कर सही और ग़लत की तुला पर तौलकर ही अपने निर्णय लेती हूं. मुझे गर्व था अपने संस्कारों पर. फिर क्यों मुझे रणधीर की आंखों के प्यार का निमंत्रण बुरा नहीं लगा- ग़लत नहीं लगा? लगता है, जैसे मेरे संस्कारों की सुदृढ़ दीवार में कहीं एक बहुत कमज़ोर स्थल था, जिसमें से अनजाने ही प्यार मेरे जीवन में प्रवेश कर गया था.

सुबह दरवाज़ा खोला, तो देखा बरसात हो रही है. सोते में पता ही नहीं चला. पहलेवाले आंगन भी तो नहीं रहे कि बाहर पड़ी बाल्टी, टिन की छत पर टप-टप पड़ती बूंदों की आवाज़ से नींद खुल जाए. चार मंज़िल इमारत की दूसरी मंज़िल पर मानो किसी बक्से में बना हो फ्लैट, चाहे तो घुटन महसूस करो, चाहे सुरक्षित. कड़ी ठंड के बावजूद चाय बनाकर बालकनी में आ बैठी. छुट्टी का दिन है. न कहीं जाना है, न किसी के आने की उम्मीद ही है. कामवाली बाई के सिवा आता भी कौन है यहां और आज तो न आने का उसके पास अच्छा बहाना है.
हर रोज़ इस समय सामनेवाले पार्क में लोग टहल रहे होते हैं, व्यायाम और योग हो रहा होता है. सड़क पर भी चहल-पहल प्रारंभ हो जाती है. परंतु आज तो सब वीरान है ठीक मेरे घर की ही मानिंद. मानो मैं अकेली ही बच गई हूं सारी सृष्टि में और मुझे अकेली पा मन के भीतर से ही चेहरे निकल-निकलकर और अपना वास्तविक रूप धारण कर मेरे चारों ओर जुटे हैं.
हू-ब-हू वैसे ही जैसे बरसों से उन्हें जानती थी. सच है हमारे पास स़िफर्र् वही लोग नहीं होते, जिन्हें हम देख और छू सकते हैं. बीते जीवन के अनेक संगी-साथी हमारे जीवन में रचे-बसे रहते हैं- अपनी आवाज़ और भाव-भंगिमाओं समेत- किसी अविभाज्य अंग की तरह ही. कुछ अजब संबंध है बारिश से मेरा, अजब सम्मोहन… बरसात होने पर न कुछ काम कर पाती हूं, न सो ही पाती हूं. घंटों बैठी बारिश को ही देखती रहती हूं. प्रकृति की अनुपम देन- बादलों से चूकर आती ये बूंदें. कभी कोमल और धीमी तन सहलाती-सी. कभी क्रोधित अपना प्रचंड रूप दिखाती, जीवनदायिनी भी, प्रलयकारी भी.
ज़िंदगी बदलती तो है, पर क्या इतना भी बदल सकती है- नहीं जानती थी. वह भी तो एक ऐसी ही बरसती शाम थी जब मैं उस बड़े-से होटल से बाहर आई थी. रणधीर की मांजी ने तो कहा भी था कि टैक्सी बुला देती हूं. मैंने ही मना कर दिया, “मैं स्वयं चली जाऊंगी.” मैंने बहुत आत्मविश्‍वास के साथ कहा था. बसों में सफ़र करने की ही आदी थी मैं. पर पांच सितारा उस होटल के आसपास तो क्या, दूर-दूर तक कोई बस स्टॉप नहीं दिखा. सही है पांच सितारा होटल के पास बस स्टॉप का क्या काम? आकाश एक सार स्लेटी रंग का हो रहा था और जल्द बारिश रुकने की कोई उम्मीद न थी. चलते-चलते थक गई, तो राह में आए एक बगीचे में जा बैठी. धीमी-धीमी बारिश हो रही थी. तन सहलाती-सी. चोट पर मरहम लगाती-सी. परंतु जब कांटा भीतर धंसा हो और ज़ख़्म ताज़ा हो, तो सहलाने से पीड़ा और अधिक होती है. वीरान बगीचे में बहुत देर बैठना भी सही नहीं लगा और घर जाने को भी मन नहीं था.

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रणधीर से मेरा परिचय मेरे छोटे भाई अनीश के कारण था और उन दोनों को एक सूत्र में बांधता था उनका क्रिकेट प्रेम, जुनून कहना अधिक उपयुक्त होगा. हमारे घर के ठीक सामने पड़ता था शिवाजी पार्क, जहां हर शाम क्रिकेट खेला जाता और हमारा घर शाम भर के लिए उसी पार्क का हिस्सा बन जाता. कभी क्रिकेट का सामान रखने-उठाने, कभी पानी पीने लड़के हमारे घर आते-जाते रहते. इसी टीम का कप्तान था रणधीर सिंह. गेहुंआ रंग, लंबा-चौड़ा अपने साथियों से पूरा सिर ऊपर उठता हुआ. गेंद फेंकने के अपने अंदाज़ से जाना जाता था. मेरा भाई था तो दुबला-पतला और ठिगना, परंतु ग़ज़ब की फुर्ती थी उसमें. यूं हमारे घर के सभी लोग नाज़ुक बदन ही थे. मैं जब कॉलेज में पढ़ रही थी, तब भी अनेक लोग मुझे स्कूली छात्रा ही समझते रहे.
मां का नौकरी करना उनका शौक़ या अस्मिता की तलाश जैसी बात नहीं थी अपितु बच्चों को अच्छी शिक्षा एवं कुछ सुविधाओं की मूलभूत ज़रूरतें ही पूरीे हो पातीं. अतः मां के नौकरी करने की आवश्यकता महसूस की गई. उन्होंने बीए कर रखा था और पढ़ाने के लिए बीएड करना अनिवार्य था. मैं तब दो वर्ष की रही होऊंगी, जब मां ने पढ़ाई शुरू की. मुझे व्यस्त रखने के लिए वह मेरे हाथ में चित्रों की कोई क़िताब पकड़ा देतीं. उन्होंने पढ़ाना प्रारंभ किया, तो मेरा दाख़िला भी उसी स्कूल में करवा दिया. आना-जाना संग हो जाता, परंतु लौटकर उन्हें ढेरों काम करने होते. मेरा साथ तो पुस्तकों से ही जुड़ा रहा. फ़र्क़ बस इतना पड़ा कि फोटोवाली क़िताबों की जगह कहानियोंवाली क़िताबों ने ले ली.
अनीश के जन्म के समय पहले मां छुट्टी पर थीं, फिर नानी आकर रहीं. मैं कुछ बड़ी हुई, तो घर की देखभाल की कमान मैंने संभाल ली. मां इधर से निश्‍चिंत स्कूल की अन्य गतिविधियों में व्यस्त हो गईर्ं. कभी वार्षिकोत्सव, कभी कोई प्रोजेक्ट और कभी जांचने के लिए परीक्षा-पत्रों का बड़ा-सा बंडल. अनीश तो स्कूल से आते ही खेलने भाग जाता. उसके लिए पढ़ना एक मजबूरी थी. असली शौक़ तो क्रिकेट ही था.
एक दिन इन लोगों का क्रिकेट शुरू होते ही बारिश शुरू हो गई. आसपासवाले लड़के तो अपने-अपने घरों को भाग गए, दूरवाले भीगे हुए हमारे घर आन पहुंचे. चाय को मैंने पूछा, तो मना कर दिया, परंतु उनके चेहरे कुछ और कह रहे थे. मैंने मसालेदार चाय बनाकर सब को पिलाई. रणधीर को बहुत पसंद आई. डरते-डरते बोला, “और मिलेगी क्या?”
उनका इतना सामान पड़ा रहता स्टोर में कि हमारे घुसने तक की जगह न बचती. दूर रहनेवाले लड़कों के तो लेग पैड्स, ग्लव्ज़ तक रखे होते. अधिकतर तो रणधीर ही आता लेने और फिर संभालकर रखने के लिए. रखते समय उसके चेहरे पर अपराधबोध-सा कुछ रहता. कहता, “छोटा-सा स्टोर है, जिसमें आधा तो हमने ही घेर रखा है.” मैं कुछ पढ़ रही होती, तो उसमें रुचि लेता. देशी-विदेशी साहित्य के अलावा मैं अन्य देशों के बारे में, वहां की संस्कृति और कला के बारे में भी पढ़ा करती थी. रणधीर ने कई देश देख रहे थे, सो वह उनके बारे में मुझे बताता. एक बार बोला, “हमारे घर में तो पढ़ने को कोई महत्व ही नहीं देता. लड़कियों को
गहने-कपड़ों के अलावा और कोई शौक़ नहीं. विदेश घूमने भी जाएंगे, तो पुरुष व्यापार बढ़ाने के लिए और स्त्रियां स़िर्फ बाज़ारों में घूमने की ख़ातिर.” शुरू में तो मैं रणधीर से बात करने में थोड़ा हिचकिचाती थी, फिर मन को समझाया कि छोटे भाई का दोस्त ही तो है, वह भी इतना सुसंस्कृत और शालीन स्वभाव का.

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धीरे-धीरे वह बहुत अपना-सा लगने लगा, घर के सदस्य-सा, बहुत बातूनी नहीं था वह, पर उसमें सादगी भरी एकनिष्ठा थी.
एक दिन जब वह क्रिकेट का सामान उठाने आया, तो उसे तेज़ ज़ुकाम के साथ हल्का बुखार भी था. लेकिन उस दिन खेलना आवश्यक था, क्योंकि उनकी टीम का मैच एक अन्य मैदानवाली टीम के संग था. मैंने उसे दवा दी और तुलसी-अदरकवाली चाय पिलाई, तो उसे कुछ राहत मिली. टीम ने बहुत अच्छा खेला और ये लोग मैच जीत गए. जाते समय वह सामान रखने आया, तो कुछ पल खड़ा रहा, मानो कुछ कहना चाहता हो. उसे चुप देख मैंने ही पूछा कि क्या बात है? झिझकता हुआ बोला, “मुझे यहां आकर बहुत अच्छा लगता है. बहुत अपना-सा लगता है यह घर. पूरी उम्र तो नौकर-नौकरानियों के भरोसे पले. बचपन में भी माता-पिता से मिलने, बात करने का समय फिक्स होता था. यह नहीं कि खेलकर आए और मां की गोद में चढ़ गए. बच्चों के छोटे-छोटे डर होते हैं, यह कोई नहीं समझता था. बस, बहादुर होने का आचरण करना पड़ता सदैव. चोट लगने पर भी रोना मना था. हर समय औपचारिकता निभाई जाती. घरभर में आज कोई नहीं जानता कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. यहां जो अपनापन मिलता है, वह अपने घर में नहीं मिलता.”
सहसा ही उसने हाथ बढ़ाकर कहा, “मुझसे दोस्ती करोगी? सदैव निभाओगी?” तब फेसबुक जैसी चीज़ नहीं होती थी, पर कुछ उसी तरह की दोस्ती का निमंत्रण था वह भी- उतना ही स्पष्ट. मैंने भी उसी रौ में हाथ बढ़ाकर कह दिया, “क्यों नहीं?” अच्छा तो वह मुझे लगता ही था. परंतु यूं दोस्ती का नामकरण किया जाता है, यह नहीं जानती थी.
समय के साथ हमारी मैत्री प्रगाढ़ होती गई. हम अपने मन की बात एक-दूसरे से कहने के लिए, सलाह-मशविरा करने के लिए, अपने डर, अपनी महत्वाकांक्षाएं बांटने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते चले गए. मेरे जीवन में भी तो अकेलापन था. घर और स्कूल की चक्की में पिसती मां को इतना समय ही कहां मिलता था और अनीश तो अपने यार-दोस्तों में ही मस्त रहता.
इस बात के दो-तीन दिन बाद ही उसने कहा, “मैं तुम्हें फ्रेंड के रूप में खोना नहीं चाहता…” मैंने बीच में ही टोकते हुए कहा, “पर मैंने दोस्ती तोड़ने की बात कब कही तुमसे?”

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सहसा ही हम दोनों ने एक-दूसरे को ‘तुम’ कहकर संबोधित किया था, यह बाद में ध्यान आया.
वह कुछ देर मुझे देखता रहा और फिर धीरे से परंतु आत्मविश्‍वासपूर्वक पूछा, “क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?”
प्रश्‍न इतना आकस्मिक था कि मैं थोड़ी देर आश्‍चर्यचकित उसे देखती रही. यूं मैं पिछले कई दिनों से उसके बदलते मनोभावों को देख रही थी, पर वह ऐसा कोई प्रस्ताव रख देगा, यह नहीं सोचा था. लेकिन क्या यह प्यार एकतरफ़ा था? शायद नहीं. यक़ीनन नहीं. मैं सोचती थी मैं अपने मन के नहीं दिमाग़ के आधीन हूं, तार्किक रूप से सोच कर सही और ग़लत की तुला पर तौलकर ही अपने निर्णय लेती हूं. मुझे गर्व था अपने संस्कारों पर. फिर क्यों मुझे रणधीर की आंखों के प्यार का निमंत्रण बुरा नहीं लगा- ग़लत नहीं लगा? लगता है, जैसे मेरे संस्कारों की सुदृढ़ दीवार में कहीं एक बहुत कमज़ोर स्थल था, जिसमें से अनजाने ही प्यार मेरे जीवन में प्रवेश कर गया था. उम्र में मुझसे छह महीने कम, जीवन स्तर में बहुत बड़ा उच्च कुलीन और धनी-नामी परिवार का. और मैं एक अति साधारण परिवार से, पर जब साथ होते, तो ये सब मायने न रखता. न उम्र का हिसाब, न आर्थिक या प्रांतीय भेद. अब मेरा मन पुस्तकों में न लगता. कहानी के नायक में मुझे उसी का चेहरा नज़र आता. प्यार में शायद कुछ तर्कसंगत होता ही नहीं, कोई नियम-क़ानून लागू होता ही नहीं.
मां को प्रमोशन मिला और वे एजुकेशन डायरेक्टर बन गईं. परंतु इसके साथ ही उन्हें दूसरे शहर जाने का आदेश भी मिल गया. पापा तो रिटायर हो ही चुके थे. अतः परिवार को दूसरे शहर जाने में क्या आपत्ति होती, सो उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी. रणधीर ने घर में बात करने का ऐलान किया. मुझे डर लग रहा था, पर वो आश्‍वस्त था, क्योंकि वो माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने को भी तैयार था. उसके माता-पिता ने मना तो नहीं किया, पर ‘सोचते हैं’ कहकर बात को फ़िलहाल टाल दिया. इसी बीच रणधीर को उसके पिता काम के सिलसिले में थोड़े दिनों के लिए अपने संग विदेश ले गए. उन लोगों के जाने के दो दिन के पश्‍चात् उसकी मां का टेलीफोन आया. वह मुझसे मिलना चाहती थीं और एक पांच सितारा होटल में मिलने का समय और जगह बता दी.
ठीक ही तो था. ‘वे मुझसे मिलना चाहती हैं’ यह सोचकर मैं ख़ुश हुई और सलीके से तैयार होकर उनसे मिलने पहुंची. उन्होंने स्नेहपूर्वक मेरा हालचाल पूछा, इधर-उधर की बात की और फिर बोलीं, “तुम एक अच्छी लड़की हो, समझदार लगती हो. मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं, पर हमारे
समाज में रिश्ते लड़के-लड़की के बीच नहीं, परिवारों के बीच तय किए जाते हैं. और प्रायः ही छुटपन में तय कर दिए जाते हैं. उस लड़की की सोचो जिसने इतने वर्ष रणधीर के लिए सपने संजोए हैं. इसकी मंगल कामना के लिए व्रत-उपवास रखे हैं. आसानी से न मानता रणधीर, इसीलिए उसके काका बहाने से उसे विदेश ले गए हैं.
मैं समझती हूं तुम्हारी भावनाओं को, नए युग की सोच को. यह भी जानती हूं कि तुम मेरी मजबूरी समझोगी. तुम लोगों का यहां से जाने का सुन मेरा काम सरल हो गया. रणधीर के लौटने पर मैं उसे संभाल लूंगी. बस, तुम उससे संपर्क करने का प्रयत्न मत करना. इतनी ही गुज़ारिश है मेरी तुमसे. मेरा ढेर सारा आशीर्वाद है तुम्हारे साथ.
पढ़ी-लिखी हो, अपनी ख़ुशी तलाश लोगी. जीवन का ध्येय ढूंढ़ लोगी.”
पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में भी वे बहुत आधुनिक एवं गरिमामयी लग रही थीं. उनके चेहरे से छलकता स्नेह आकर्षित कर रहा था. और वह मुझे आशीर्वचन कह रही थीं. संस्कारवश मैंने झुककर उनके पैर छूने चाहे, परंतु उन्होंने बीच में ही रोककर मुझे गले लगा लिया और कहा, “बेटियां पैर नहीं छूती हैं और तुम भी तो मेरी बेटी समान हो.” उन्हें वहीं किसी का इंतज़ार करना था, अतः मैं अकेली वहां से बाहर निकली. देखा बारिश हो रही थी. आकाश सलेटी रंग का यूं एकसार था. लगता नहीं था कि जल्दी रुकेगी.
मौसम की मनःस्थिति भी हम मानवों जैसी होती है क्या? रंग-बिरंगे फूलों से लदा वसंत कितना प्रसन्न दिखाई देता है.
फूलों की खिलखिलाहट से, मंद बयार की मस्ती से भरपूर और झड़ते पत्तों के दुख से पतझड़-उदास और थका-हारा, झंझावात और तेज़ बरसात में अपने क्रोध को दर्शाता है मॉनसून, पर वहीं हल्की-हल्की बूंदनियां टपकाता ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वर्षभर की संजोई व्यथा आंसू बन पृथ्वी को भिगो रही हो.
शहर छोड़ा, तो बहुत कुछ से नाता टूट गया. ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा पीछे रह गया. पर कुछ लोग हैं, जो यादें बनकर संग चले आए हैं मेरा अकेलापन बांटने. पानी बरसने पर आज भी वही दिन सामने आन खड़ा होता है और जिस प्रकार पेड़ की एक शाख हिलाने से अन्य शाखाएं भी साथ हिलने लगती हैं, उनसे भी फल-फूल टपकने लगते हैं. यादों की एक शाख हिलाने से एक के बाद एक यादें आती चली जाती हैं. वृक्ष की शाखाओं की मानिंद ही एक-दूसरे से गुथी रहती हैं हमारी यादें भी.
मां और पापा ने तो बहुत प्रयत्न किया कि मैं कहीं विवाह करने को मान जाऊं. परंतु जिस प्रकार रणधीर की वाग्दता ने उसे लेकर सपने बुने थे- व्रत-उपवास न रखे हों, सपने तो मैंने भी देखे थे न! मैंने अपना जीवन मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को सौंप दिया, जिन्हें कुछ अतिरिक्त स्नेह व धैर्य की ज़रूरत पड़ती है और मेरे पास तो अब असीम समय था. बस, बरसात के दिनों में ही न मैं सो पाती हूं, न कुछ काम ही कर पाती हूं. बारिश को देखती अतीत में विचरती रहती हूं; रणधीर ने ही मुझमें प्रेम का एहसास जगाया था, किसी स्वप्नलोक का-सा ही सुख भोगा था मैंने. उसे खोकर ही पीड़ा समझ पाई हूं और पीड़ा के दरिया से गुज़रकर ही तो आज दूसरों के दुख को समझने के क़ाबिल हुई हूं. ज़िंदगी से कोई गिला-शिकवा नहीं. और जब इसी जीवन का नहीं बता सकते कि भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है, तो अगले जन्म की बात क्या की जाए?
कल सांझ द्वार पर दस्तक हुई. खोला तो कुरियर था लंबा-चौड़ा-सा एक पार्सल पकड़े. साथ में एक पत्र भी. हस्ताक्षर कर उसे रवाना किया और जल्दी से पत्र खोला. रणधीर का था. लगभग पंद्रह वर्षों के पश्‍चात्. “बहुत मुश्किल से तुम्हारा पता ढूंढ़ पाया हूं. क्रिकेट के साथियों से अनीश का पता मिला और फिर अनीश से तुम्हारा. अभी तक तो यही सोचता रहा कि तुम स्वयं अपनी इच्छा से सारे संबंध तोड़ गई हो, क्योंकि मैं तुम्हारा नया ठिकाना नहीं जानता था, तुम तो जानती ही थी. तुम्हारी नाराज़गी का कारण जानना चाहता था, परंतु पूछता किससे? पिछले हफ़्ते मां की मृत्यु हुई और मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उन्होंने तुमसे हुई मुलाक़ात और तुमसे लिए वादे के बारे में बताया. मन के एक कोने में तुम सदैव रही, पर अब तुम्हारा स्थान कुछ और ऊपर हो गया है. लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी है. तुम्हारी तरह मैंने भी अपनी परिस्थिति से समझौता कर लिया है. छोटा-सा एक तोहफ़ा भेज रहा हूं क़बूल कर लेना- रणधीर.”


माइकल एंजलो की पेंटिंग थी. वैटिकन के सिस्टन चैपल की छत पर बना सृष्टि की रचना का सबसे मशहूर चित्र- सृष्टि के रचयिता का आदम की ओर बढ़ा हाथ. न! शायद आदम का अपने रचयिता को छू लेने की अदम्य इच्छा से बढ़ा हाथ. बस, ज़रा-सा ही फासला बाकी है. सदियां बीत चुकी हैं, यह ज़रा-सा फासला तय नहीं हो पाया. कितनी कसक, कितनी विवशता है एक-दूसरे की ओर बढ़े उन दो हाथों में!
परिवार की मान-मर्यादा का ध्यान, अपने संस्कारों एवं सामाजिक व्यवस्था का सम्मान, जाने कितनी वर्जनाओं से बंधे हम! हमने अपने हाथ आगे बढ़ाने से स्वयं ही रोक रखे हैं.

           उषा वधवा

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विक्रम-बेताल की कहानी- पति कौन? (Vikram-Baital Story- The Groom)

Vikram-Baital Story, The Groom

Vikram-Baital Story, The Groom

विक्रम-बेताल की कहानी- पति कौन? (Vikram-Baital Story- The Groom)

बहुत समय पहले की बात है, धर्मस्थल नाम का एक नगर था, वहां एक विद्वान ब्राह्मण अपने परिवार के साथ रहता था. उसकी एक पुत्री थी, जो बेहद ख़ूबसूरत और रूपवती थी. जब उसकी शादी की उम्र हुई, तो उसके माता, पिता और भाई उसकी शादी के बारे में सोचने लगे.
एक दिन जब ब्राह्मण अपने किसी यजमान की बारात में गया था और भाई पढ़ने गया था, तभी उनके घर में एक ब्राह्मण का लड़का आया. लड़की की मां ने उसके रूप और गुणों को देखकर उससे कहा कि मैं तुमसे अपनी बेटी की शादी करूंगी.

दूसरी तरफ़ उधर ब्राह्मण पिता को भी एक दूसरा लड़का मिल गया और उसने भी उस लड़के को बेटी की शादी का वचन दे दिया. अब ब्राह्मण का लड़का जहां पढ़ने गया था, वहां वह भी एक लड़के से यही वादा कर आया.

कुछ समय बाद बाप-बेटे घर लौटे, तो देखता कि वहां एक तीसरा लड़का और मौजूद है. दो उनके साथ आये थे. अब सब दुविधा में पड़ गए कि क्या किया जाए?

इतने में ही उनकी बेटी को सांप ने काट लिया और वह मर गई. उसके पिता, भाई और तीनों लड़कों ने बड़ी भागदौड़ की, ज़हर झाड़नेवालों को बुलाया, पर सब बेकार साबित हुआ.

अंत में दुखी होकर वे उस लड़की को श्मशान ले गये और क्रिया-कर्म कर आये. तीनों लड़कों में से एक ने तो उसकी हड्डियां चुन लीं और फकीर बनकर जंगल में चला गया. दूसरे ने राख की गठरी बांधी और वहीं झोपड़ी डालकर रहने लगा. तीसरा योगी होकर देश-देश घूमने लगा.

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एक दिन की बात है, वह तीसरा लड़का घूमते-घूमते किसी नगर में पहुंचा और एक तांत्रिक के घर वो रहने लगा. एक दिन वो तांत्रिक अपनी साधना में मग्न था कि उसका बेटा आकर वहां खेलने लगा, जिससे उसे विघ्न महसूस होने लगा. तांत्रिक को बहुत गुस्सा आया. उसने अपने बेटे को झिड़का, मारा-पीटा, फिर भी वह न माना तो ब्राह्मणी ने उसे उठाकर जलते हवन कुंड में पटक दिया.

लड़का जलकर राख हो गया. ब्राह्मण क्रोधित हो उठा, उसने घरवालों से कहा, जिस घर में ऐसे कठोर दिलवाले राक्षसी लोग हों, वहां मैं अब नहीं रह सकता. इतना सुनकर वह तांत्रिक भीतर गया और विद्या की पोथी लाकर एक मंत्र पढ़ा. जलकर राख हो चुका लड़का फिर से जीवित हो गया.

यह देखकर ब्राह्मण ने उससे पूछा कि यह कैसे किया, तो तांत्रिक ने कहा विद्या से. ब्राहम्ण सोचने लगा कि अगर यह पोथी मेरे हाथ पड़ जाए, तो मैं भी उस लड़की को फिर से जीवित कर सकता हूं. इसके बाद उसने भोजन किया और वहीं ठहर गया. जब रात को सब खा-पीकर सो गए, तो वह ब्राह्मण चुपचाप वह पोथी लेकर चल दिया. जिस स्थान पर उस लड़की को जलाया गया था, वहां जाकर उसने देखा कि दूसरे लड़के वहां बैठे बातें कर रहे हैं.

इस ब्राह्मण के यह कहने पर कि उसे संजीवनी विद्या की पोथी मिल गई है और वह मन्त्र पढ़कर लड़की को ज़िंदा सकता है, उन दोनों ने हड्डियां और राख निकाली. ब्राह्मण ने जैसे ही मंत्र पढ़ा, वह लड़की जी उठी. अब तीनों उसके पीछे आपस में झगड़ने लगे कि लड़की से शादी मैं करूंगा.

इतना कहकर बेताल बोला, राजा, बताओ कि वह लड़की किसकी पत्नी बननी चाहिए? अगर तुमने मुंह नहीं खोला, तो तुम्हारी मौत निश्‍चित है.

राजा ने जवाब दिया, जो वहां कुटिया बनाकर रहा, उसकी.

बेताल ने पूछा, क्यों?

राजा बोला, जिसने हड्डियां रखीं, वह तो उसके बेटे के बराबर हुआ, जिसने विद्या सीखकर जीवन-दान दिया, वह बाप के बराबर हुआ. जो राख लेकर रमा रहा, वही उसकी हक़दार है.

राजा का यह जवाब सुनकर बेताल बोला कि राजन तुम बहुत ही चतुर हो, मानना पड़ेगा, लेकिन तुमने अपना मुंह खोला, तो मैं चल पड़ा. बेताल फिर पेड़ पर जा लटका. राजा को फिर लौटना पड़ा.

पंचतंत्र की कहानी: मूर्ख ब्राह्मण और तीन ठग (Panchtantra Ki Kahani: The Brahmin & Three Crooks)

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किसी गांव में एक ब्राह्मण रहता था. एक दिन वो दावत में गया जहां उसे यजमान से एक बकरा मिली. वो ख़ुशी ख़ुशी उसको लेकर अपने घर जा रहा था. रास्ता लंबा और सुनसान था. आगे जाने पर रास्ते में उसको ठगों ने देखा और सोचा कि क्यों न इससे यह बकरा हथिया लिया जाये. तीनों ठगों ने ब्राह्मण के कंधे पर बकरे को देखकर उसे हथियाने की योजना बनाई.

जैसे ही ब्राह्मण आगे गया एक ठग ने ब्राह्मण को रोककर कहा, “अरे पंडित जी यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? आप अपने कंधे पर क्या उठा कर ले जा रहे हैं? आप तो ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण होकर कुत्ते को कंधों पर बैठा कर ले जा रहे हैं.”

ब्राह्मण ने क्रोधित होकर उसे झिड़कते हुए कहा, “पागल है क्या? या अंधा हो गया है? दिखाई नहीं देता यहकुत्ता नहीं बकरा है.”

पहले ठग ने फिर कहा, “खैर मेरा काम आपको बताना था. अगर आपको कुत्ता ही अपने कंधों पर ले जाना है तो मुझे क्या? आप जानें और आपका काम.”

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थोड़ी दूर चलने के बाद ब्राह्मण को दूसरा ठग मिला. उसने ब्राह्मण को रोका और कहा, “पंडित जी क्या हो गया है आपको? ब्राह्मण होकर मरी हुई बछिया को कंधे पर लादकर ले जा रहे हैं? उच्चकुल के लोगों को क्या यह शोभा देता है?”

पंडित उसे भी झिड़क कर आगे बढ़ गया. आगे जाने पर उसे तीसरा ठग मिला. उसने भी ब्राह्मण को टोका और कहा कि इस गधे को कंधे पर क्यों ले जा रहे हो? ब्राह्मण अब घबरा गया. उसको लगा कि ये ज़रूर कोई मायावी जीव है, जो बार बार रूप बदल रहा है, वरना इतने सारे लोग झूठ क्यों बोलेंगे?

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थोड़ी दूर जाकर, उसने बकरे को कंधे से उतार दिया और आगे बढ़ गया. इधर तीनों ठग ने उस बकरे को हथिया लिया और उस ब्राह्मण की मूर्खता पर उनको हंसी भी आई.

सीख: कहते हैं कि किसी झूठ को बार-बार बोलने से वह सच की तरह लगने लगता है, इसलिए अपने दिमाग से काम लें और अपने आप पर विश्वास करें.

कहानी: …बरसता है (Short Story: Barasta Hai)

कहानी, बरसता है, Short Story, Barasta Hai, हिंदी कहानी
– कुंदनिका कापड़िया

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“जब हम सबके बीच होते हैं, तो अकेलेपन के भय से घबरा जाते हैं. पर सचमुच अकेलेपन की स्थिति में प्रवेश करते हैं, तो अच्छा लगता है, आपको कैसा लगता है?” स्त्री हंसी. “ठीक-ठीक पता नहीं. अभी तो नई-नई अकेली पड़ी हूं न.”

दूर से देखने पर लगता था वहां सरू का घना वन है, पर वन के बीचोंबीच आकर खड़े होने पर मालूम हुआ कि वृक्ष एक-दूसरे के उतने पास-पास नहीं हैं, जितने उसने सोचे थे. वे तो खासे दूर-दूर हैं. उनकी डालियां एक-दूसरे से गुंथी हुई नहीं हैं. वे एक-दूसरे से पूरी तरह अपरिचित हों इस तरह खड़े हैं. अपने आप में मगन. उसे थोड़ी हंसी आई. मनुष्य का जीवन भी ऐसा होता है, ख़ासतौर से स्त्री-पुरुष का, पति-पत्नी का जीवन. दूर से देखें, तो लगता है कितने प्रगाढ़ रूप से वे परस्पर आबद्ध हैं. दोनों के स्वप्न, तृप्ति और अनुभूतियां इस तरह एकाकार हो गई हैं कि उनके बीच कोई विभाजक रेखा ही नहीं खींची जा सकती. पर नज़दीक जाकर देखें, तो सरू के इन वृक्षों की ही तरह वे दोनों अलग-अलग और विषाद ओढ़े हों, इस तरह धुंध से घिरे लगते हैं.
शाम अब क्षितिज पर झुक रही थी, अभी कुछ ही देर में सुनहरे रंगों का अंतिम स्पंदन होगा और पूरे आकाश को भर देनेवाला वह बिंब पानी में चू पड़ेगा. पानी के किनारे से सूर्य के टूट पड़ने का यह एक क्षण भव्य विस्मयों से लबालब भरा लगता था. इस नन्हें क्षण में असंख्य विश्वों की असंख्य परिभ्रमणों की गति झलक उठती थी. सूर्यास्त की इस घड़ी की प्रतीक्षा में वह रेत के एक ढूहे पर बैठ गया.
अचानक उसने देखा एक प्रतिबिंब उसके और सूर्य के बीच खड़ा है. उसकी उपस्थिति से अनभिज्ञ एक स्त्री ठीक वहीं, उससे थोड़ा ही आगे समुद्र के पानी के निकट खड़ी थी. उसकी ही तरह वह भी सूर्य की ओर नज़र टिकाए थी. उसके वहां खड़े होने के कारण सूर्य ओट में हो गया था. संतोष ने सोचा उठकर जगह बदल दे, पर उसी समय स्त्री कुछ क़दम आगे गई और सूर्य दिखा, लेकिन फिर पानी में डूब गया. उसके बाद गहरी शांति फैल गई. उस स्त्री ने आगे जाने के पहले अपना मुंह घुमाया. संतोष ने उसका चेहरा देखा. फिर वह उत्तर की ओर पानी के किनारे-किनारे चलने लगा.
वैसे तो आश्चर्य न होता, पर सूर्यास्त के समय लोग आमतौर पर घूम-टहलकर वापस आ जाते हैं, इसके बदले वह घूमने जा रही थी. तिस पर वह अकेली थी. पर उसकी चाल में रंचमात्र भी शिथिलता नहीं थी. इन सारी बातों से संतोष को कौतूहल हुआ. दस वर्ष पहले शायद न होता. अब स्वयं के विस्मित होने, छोटी से छोटी घटना में निहित मधु-बिंदुओं को खोजने का समय था. तिस पर इस स्त्री की तो छटा ही न्यारी थी और वह सूर्य के उस क्षण को देखने के लिए खड़ी थी, जिसे वह स्वयं चिंतन और सौंदर्य का श्रेष्ठ संधिकाल मानता था. इस तरह की सभी, यूं तो छोटी पर आनंददायक बातों के कारण संतोष के मन में एक विचित्र अनुभूति हुई.
रात को वह अपने विश्राम गृह के बरामदे में आराम से कुर्सी डालकर बैठा था और आकाश में बादलों और चांदनी की लीला निहार रहा था. बगीचे में रोशनी कम थी, आकाश में बादलों की ओट में घड़ी में छिपती और घड़ी में बाहर झांकती चांदनी थी, सामने सरू के वृक्ष थे और उसके आगे समुद्र था, जिसके मंद गर्जन से वातावरण मुखरित हो रहा था.
कोई-कोई क्षण अपने आप में पूर्णतः संपूर्ण होते हैं. उनके आगे-पीछे कुछ नहीं होता, स्मरण या आशा या उपेक्षा जैसा कुछ नहीं, मात्र एक अनाम आनंद… ऐसा ही कुछ वह अनुभव कर रहा था कि उसने उस स्त्री को सरू के वन से चढ़ान पर ऊपर जाते हुए देखा और अपनी कुर्सी से उठकर लगभग खड़ा हो गया. प्रकाश की एक रेखा या सुगंध की कोई लहर, आकस्मिक नहीं, बल्कि लंबे समय बाद स्मृति में चढ़ी किसी काव्य-पंक्ति-सी वह स्त्री उसे लगी. क्या वह उसे किसी समय पहचानता रहा होगा? पैंसठ वर्ष के लंबे जीवन में हज़ारों लोगों से मिलना हुआ होगा, उनमें शायद यह स्त्री भी रही होगी. चांदनी के प्रकाश में उसे उस स्त्री का चेहरा अधिक स्पष्ट नहीं दिखाई दिया. फिर भी देखा, नाक सीधी थी, होंठ पतले और थोड़े खुले हुए जैसे कुछ गुनगुना रही हो, बरामदे के क़रीब से गुज़रते समय उसने संतोष की ओर देखा और फिर आगे चली गई. संतोष उसे पीछे से देखता रहा. उसे लगा, सुंदर अलस-भाव से फैली यह नीरवता जैसे अचानक झंकृत हो उठी, मानो कोई प्रिय व्यक्ति अनजाने ही आकर कोई सुंदर भेंट देकर आश्‍चर्य में डाल दे, एक संगीतमय क्षण की भेंट उसे किसने दी?
रात में उसे यही विचार आते रहे कि जीवन को ऐसे महा उपहार देनेवाले हाथ किसके हैं और ये उपहार क्षणिक क्यों होते हैं? और फिर उसे लगा कि क्षणिक तो क्या नहीं होता? शायद यह बात अहम् नहीं थी. उपहार मिलता है, यही सबसे विस्मयकारी, आनंदभरी बात थी.
सुबह वह उठा तो अत्यंत प्रसन्न था. सूरज को निकलने में अभी देर थी. उठकर वह रेत की ढलान से उतरकर सरू के वृक्ष को प्रेम से स्पर्श करता हुआ समुद्र के किनारे खड़ा हुआ कि सुनहरे उजाले का एक बड़ा टुकड़ा समुद्र के जल में तैर उठा. उसने चौंककर ऊपर देखा. ठीक सिर के ऊपर एक बड़ा बादल झिलमिलाता दिखाई पड़ा और फिर नीचे नज़र करने पर उसने उस स्त्री को देखा, घूम-टहलकर वापस लौटती हुई.
‘एक अन्य आश्चर्य उपहार.’ वह मन ही मन गुनगुनाया और बात करने के उद्देश्य से उसकी ओर पलटकर प्रतीक्षा में लगभग खड़ा हो गया. अभी कोई जागा न हो, पवन सोई हो, वृक्ष सोए हों, समुद्र की रेत सोई हो और सूरज अभी मुश्किल से उगनेवाला हो, ऐसे समय घूमना समाप्त करके वापस लौट रही इस स्त्री के विषय में उसे अब सचमुच कौतूहल हो उठा था. क्या और कैसे पूछे, इस पर वह विचार कर ही रहा था कि वह ख़ुद आकर उसके पास खड़ी हो गई. उसके होंठ किंचित् खुले और इसी बीच सिर के ऊपर का वह सुनहरा बादल फट गया और उसमें से प्रकाश का एक प्रपात समुद्र पर ढुलक उठा और वह स्त्री जैसे अपने आपसे कह रही हो, फिर भी संतोष सुन सके इस तरह ज़ोर से बोली, “द लॉर्ड रेइन, लेट द अर्थ रिजॉइस…’
संतोष आनंद से किलकारी मार उठा और उसके आतुर स्वर में साठ वर्ष जाने कहां अदृश्य हो गए. “आप यह पंक्ति जानती हैं?” स्त्री हंसकर बोली, “यह प्रकाश की वर्षा हुई, इसलिए मुझे इस तरह बोलना सूझा… द फ्लड्ज़ लिफ्ट अप देयर वेव्ज़…” संतोष सभी पंक्तियां बोल गया. उसकी आंखों में समुद्र का सुनहरा पानी चमक उठा.
दोनों थोड़ी देर चुपचाप खड़े रहे. सूरज के उजाले की छोटी-छोटी तरंगें बिखरने लगीं और थोड़ी ही देर में आकाश, समुद्र, रेत और सरू के वृक्ष सबके सब सुनहरे हो गए.
“आप विश्राम गृह में ठहरी हैं?”
“हां, तीन नंबर के कॉटेज में. आप पहले कॉटेज में हैं न?”
“हां, कल ही आया. आते ही मुझे यह जगह भा गई. समुद्र के इतने क़रीब मैं इसके पहले कभी नहीं रहा.” वह यूं ही पीछे की ओर घूमा और स्त्री के साथ-साथ चट्टान पर चढ़ने लगा.
“मेरी यहां की यह पहली सुबह है. सब कुछ बहुत ही सुंदर है न?”
“सबसे सुंदर तो है यहां का एकांत. आप विश्वास करेंगे, मैं सुबह जल्दी उठकर तीन मील घूम आई और इतने समय में स़िर्फ एक ही आदमी देखा. वह बैलगाड़ी लेकर किनारे पर खड़ा था और उसमें रेती भर रहा था.”
संतोष का कॉटेज आ गया. कहने न कहने की किसी दुविधा के बिना सरलता से वह बोला, “आ रही हैं? चाय पीकर जाइएगा.”
स्त्री ने उतनी सरलता से इसे स्वीकार कर लिया. “ठीक है, चाय कौन, आप बनाते हैं? आप अकेले आए हैं?”
संतोष ने बरामदे में दो कुर्सियां और एक टेबल लगा दी. “नहीं, मेरे साथ मेरा नौकर है.” और कुर्सी पर बैठते हुए आवाज़ दी, “रंजीत!”
एक छोटा लड़का अंदर से दौड़ता हुआ आया.
“चाय बनाओ, ज़्यादा हां!”
“ठीक है, साहब.” दौड़ते हुए वह अंदर गया.
“दोनों कुर्सी पर बैठ गए. अभी पांच मिनट पहले ही उनकी पहचान हुई थी, फिर भी अपरिचय का भाव उनके बीच से चला गया था. संतोष ने सहज भाव से पूछा, “आप अकेली ही आई हैं?”
“हां, अपने बेटे और बेटी की शादियां एक साथ ही अभी-अभी निबटाई हैं. बेटी लंदन चली गई. बेटा अपनी पत्नी को लेकर कश्मीर गया है. मैं अकेली पड़ गई, इसलिए मैंने सोचा मैं कुछ दिन घूम आऊं.”
‘आपके पति…’ ऐसा कुछ संतोष पूछने जा रहा था, लेकिन इसकी जगह उसने पूछा,
“दोनों बच्चे एक साथ बाहर चले गए, तो घर में आपको बहुत अकेलापन लगा होगा न?”
स्त्री थोड़ी देर चुप रही, फिर से बोली,
“अकेलापन एक तरह से देखें तो वरदान भी माना जा सकता है.”
संतोष उत्तेजित हो गया. “वरदान? आप वरदान में विश्वास करती हैं? कैसी आश्चर्य की बात है. रात में मैं भी वरदान के विषय में ही सोच रहा था…” और फिर वह थोड़ा लज्जित हो गया. उसे लगा, उसने कुछ उतावलापन कर दिया. एक लंबा जीवन जीने के बाद, वह छोटे बच्चे की तरह इतना अधीर, उत्तेजित हो सकता है, इस बात पर उसे आश्चर्य हुआ.
स्त्री मिठास से हंसी. “बेटी के चले जाने पर तो सूनापन बहुत लगा, पर बाद में लगा कि जीवन की एक ऐसी अनुभूति मुझे वरदान स्वरूप मिल गई, जो अब तक अनजानी थी. इसे और संपूर्ण बनाने के लिए मैं यहां आई. नहीं तो आपको मालूम है, अपने सगे-संबंधी ही हमारे एकांत को सबसे अधिक बाधा पहुंचाते हैं. यहां भी किसी सैलानी के साथ बात या परिचय न करना पड़े, इसीलिए मैं भोर में ही घूम आती हूं और रात में देर से घूमने जाती हूं.” संतोष कुछ बोला नहीं.
वही फिर बोली, “मेरे पति सात वर्ष पहले गुज़र गए. उस समय मैं बहुत अकेली पड़ गई थी. पर बच्चे थे, परिवार की ज़िम्मेदारियां थीं. आज सारे काम पूरे हो चुके हैं. अब एक समूचा अकेलापन मिला है. मुझे इसका कौतूहल है कि पथ पर अकेले चलना कितना रमणीय बनाया जा सकता है.” वह हल्के से हंसकर चुप हो गई.
लड़का चाय की ट्रे रख गया. संतोष ने कप में चाय डालकर एक कप उस महिला को दिया और दूसरा ख़ुद लिया. कप के अंदर से निकलती गर्म सुगंधित भाप का वायुमय आकार वह कुछ देर तक निहारता रहा.
फिर बोला, “मैं भी अभी-अभी निवृत्त हुआ हूं. मेरा बिज़नेस था, बच्चों को सौंप दिया. तीन लड़के हैं. तीनों की शादियां हो गई हैं, अब तक बहुत व्यस्त जीवन जिया है, इसलिए मेरे आनंद की बातें प्रायः हाशिये पर रह जाती थीं. अब फुर्सत से कुछ समय अलग-अलग स्थानों पर घूमूंगा, पढ़ूंगा. ख़ूब पढ़ने का मेरा मन है. जब हम सबके बीच होते हैं, तो अकेलेपन के भय से घबरा जाते हैं. पर सचमुच अकेलेपन की स्थिति में प्रवेश करते हैं, तो अच्छा लगता है, आपको कैसा लगता है?”
स्त्री हंसी, “ठीक-ठीक पता नहीं. अभी तो नई-नई अकेली पड़ी हूं न.”
थोड़ी देर तक दोनों चुप रहे, फिर संतोष धीरे-धीरे बोला, “आपने सुबह जो काव्य पंक्तियां बोलीं, उन्हें मैंने बचपन में पढ़ा था. बाद में भूल गया था. कल यहां आते समय ट्रेन में फिर से वो पंक्तियां पढ़ीं, पर वे दूसरी ही तरह हैं.”
“लॉर्ड रेइन- ईश्वर राज्य करता है इस तरह है.”
“पर मुझे लगा ईश्वर बरसता है. लॉर्ड रेइन, प्रकाश के रूप में.”
“भेंट के रूप में?” संतोष हंसा.
स्त्री खड़ी हुई, “मेरा नाम तोषा है. नए ज़माने की छोटी लड़की जैसा नाम है न? पर मेरे पैरेंट्स बहुत नए विचारों के थे. मेरी मां उस ज़माने में एक स्कूल की प्रिंसिपल थीं और विदेश भी घूम आई थीं.” वह सीढ़ियां उतरी. “अच्छा तो…” और विदा में हाथ हिलाती वह अपने कॉटेज में चली गई.
पचपन-साठ की उम्र होगी, पर इतनी लगती नहीं थी. वह उससे पहले कहीं मिला होगा? वह परिचित क्यों लगती थी? या फिर उसकी बातें परिचित थीं? वह मन में ऐसी ही कुछ बातें सोच रहा था. पत्नी की मृत्यु के बाद… पत्नी को बहुत प्यार किया था. बहुत यानी बहुत ही. पत्नी कहती, “दुनिया में कोई पुरुष किसी स्त्री को इतना प्रेम नहीं करता होगा.” उसकी मृत्यु के बाद लंबे समय तक तो ऐसा ही लगा कि उसकी स्वयं की ही मृत्यु हो गई है. कुछ भी ग्रहण करने की संवेदना पूरी तरह नष्ट हो गई थी. यहां तक कि उस अवस्था से बाहर निकलने की इच्छा भी मर गई थी.
बहुत समय के बाद अब कहीं जाकर थोड़ी अकेलेपन में निहित शांति का अनुभव होने लगा था. इस शांति को दूसरी वस्तुओं से भरने की ज़रूरत नहीं थी. उसे अकेला होना अच्छा लगने लगा था. ईश्‍वर ने उसकी प्रिय पत्नी छीन ली थी, पर उसके बीच से वह धीरे-धीरे दूर हटने लगा था. ख़ुद को अच्छी लगनेवाली चीज़ों- पुस्तक, कविता और पानी का समुद्र उनके नज़दीक जाने लगा था. वह मकान समुद्र के इतने नज़दीक था कि उसमें चलते-फिरते, उठते-बैठते समुद्र दिखाई देता. वह दिखाई न देता, तो भी साथ रहता था.
समुद्र तट पर रहनेवालों के लिए समुद्र रोज़ की बात थी. पर उसे तो यह बात बहुत आकर्षक लगती थी. सौंदर्य की अनुभूति मन में हिलोरें लेती रहतीं. समय कोमल क़दमों से बह जाता. और अब यह स्त्री. पत्नी की मृत्यु के बाद पहली बार उसने किसी स्त्री के साथ इतनी निकटता से बात की थी और उसे बहुत अच्छा लगा था.
पैंसठ वर्ष की आयु में आदमी को किस चीज़ की ज़रूरत होती है? वह सोचने लगा. अंतिम घड़ी तक आदमी को किसी न किसी चीज़ की ज़रूरत रहती ही है. अकेले रहना अच्छा लगता था, पर तोषा के साथ बात करना और भी अच्छा लगा था. इसके बाद पूरे दिन उसने तोषा को नहीं देखा. उसे देखने का उसने विशेष प्रयत्न नहीं किया था. सहज ही वह दिख जाएगी, ऐसी उम्मीद भर थी. पर दोपहर-शाम, समुद्र तट या कैंटीन में, कहीं भी वह दिखाई नहीं दी. वह समुद्र तट पर घूमने गया और उसके आस-पास हज़ारों क़दमों के निशान उभर आए. ‘ज्वार आएगा ये सब मिट जाएंगे. कौन कहां चला था, इसकी एक भी निशानी नहीं रहेगी, मृत्यु की तरह वह सब कुछ मिटा डालेगा. मृत्यु ज्वार है या भाटा?’
उसे लगा, तोषा के साथ इस विषय पर बात की जा सकती है. उसने अपने जीवन में कैसे-कैसे अनुभव किए होंगे? इन अनुभवों में हर्ष का अंश अधिक होगा कि शोक का? चेहरे से वह पीड़ित तो नहीं लग रही थी.
दूसरे पूरे दिन भी उसने उसे नहीं देखा, तो वह थोड़ा अधीर हो गया और उसे देखने के लिए हर जगह नज़र दौड़ाता रहा. अंत में शाम को भी जब वह नहीं दिखाई पड़ी, तो वह लगभग व्याकुल हो गया. उस रात हवा ख़ूब खुलकर बह रही थी और हवा ख़ुद समुद्र की तरह जैसे बह रही थी. चांदनी को आर-पार बींधता यह गर्जन बगीचे में, मकानों में, वृक्षों में फैल गया और उसके सामने समुद्र की घनघोर आवाज़ भी मंद पड़ गई. फिर तो संतोष से रहा नहीं गया. वह घर से निकलकर तीसरे नंबर के कॉटेज की ओर चल पड़ा. इस समय सीज़न नहीं था, वेकेशन नहीं था, इसलिए समुद्र तट के इस हॉलीडे होम में सैलानी कम थे. पहले और तीसरे कॉटेज के बीच का निर्जन एकांत पवन के आलिंगन और चांदनी की बरसात में झंकृत हो रहा था.
वह तीन नंबर के कॉटेज पर पहुंचा. दरवाज़ा बंद था. उसने हल्के-से दस्तक दी.
दरवाज़ा खुला. तोषा ही थी. वह कुछ बोली नहीं, केवल दरवाज़े से थोड़ा खिसककर खड़ी हो गई, जिससे संतोष अंदर आ सके. संतोष को देखकर उसे आश्चर्य हुआ हो, ऐसा लगा नहीं. उसके चेहरे पर एक विचित्र भाव था.
कुर्सी पर बैठते हुए संतोष बोला, “आज पूरे दिन आप कहीं दिखाई नहीं दीं, तो मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ. कल भी नहीं दिखाई दी थीं. तबीयत तो ठीक है न?”
तोषा थोड़ी देर चुप रही, फिर उसके होंठों से कुछ इस तरह शब्द बाहर आए, जैसे लंबे अर्से से उसने कुछ बोला न हो, “कल मैं अपने बेटे के कश्मीर पहुंच जाने के तार का इंतज़ार कर रही थी.”
“तार आया?”
तोषा धीरे से उठी. मेज़ पर पड़ा एक काग़ज़ उठाकर संतोष के आगे रख दिया.
संतोष को काटो तो खून नहीं.
वह काग़ज़ दरअसल टेलीग्राम था- बस दुर्घटना में उसके बेटे और बहू के मारे जाने का समाचार.
हृदय एकदम जड़ हो गया.
यह स्त्री. कल यह अकेलेपन की अनुभूति को परिपूर्ण बनाने की बात कर रही थी और आज यह संपूर्ण रूप से अकेली हो गई थी. उसके दाएं-बाएं एक भयानक अकेलापन फैल गया था.
मुझे बहुत अफ़सोस है. बहुत ही अफ़सोस है… संतोष का मन बोलता रहा, पर उसने इन शब्दों को वाणी नहीं दी. वह केवल चुपचाप बैठा रहा.
कल तार आया होगा. तब से लेकर अब तक इस स्त्री ने बिल्कुल अकेले रहकर इस भयंकर आघात को झेला होगा.
खाए-पीए, सोए बिना एक-एक क्षण उसने बिताया होगा. किसी को कुछ बताए बिना, किसी के पास से सहारा पाने की कामना किए बिना.
अचानक उसे कुछ सूझा और वह तेज़ी से उठकर अपने कॉटेज पर गया. वहां जाकर उसने कॉफी बनाई और एक बड़े ग्लास में भरकर, बाहर पागल हवा से उसे बचाता ढांकता तोषा के पास आया. साथ में नींद की गोली भी थी.
“थोड़ी कॉफी पीजिए.” उसने तोषा से
आग्रहपूर्वक कहा और ज़बर्दस्ती ग्लास तोषा के हाथ में रख दिया.
“पीजिए.” उसने फिर आग्रहपूर्वक कहा. “यह गोली ले लीजिए.” उसने लगभग डॉक्टर की तरह आदेश देते हुए कहा.
तोषा ने गोली ली. कॉफी पी. संतोष की ओर उसने पूरी नज़र डालकर देखा. फिर वह एकदम से टूट गई और हिचकी ले-लेकर रोने लगी. काफ़ी देर तक वह रोती रही. संतोष ने उसे रोने दिया. वह बस उसके पास बैठा रहा. बड़ी देर बाद वह थोड़ी शांत हुई.और तब संतोष ने उसके सिर पर हाथ रखा. अचानक उसे लगा वह समझदार परिपक्व स्त्री असल में छोटी, एकदम अकेली पड़ गई एक बच्ची है. इस समय उसे प्रेम और ममता की ज़रूरत है. क्या वह उसे यह दे सकता है? क्या उसके पास किसी व्यक्ति को दी जा सकने लायक उष्मा थी? इतने वर्षों की जीवन-यात्रा के बाद उसने अपने अंदर ऐसा कुछ अर्जित किया था, जो किसी दूसरे व्यक्ति को जीवन जीने में सहायक हो सके.
वह तोषा के सिर पर हाथ फेरता रहा. जैसे किसी बच्चे के बालों को सहला रहा हो. उन उंगलियों में से झरते आश्वासन से धीरे-धीरे तोषा का थरथराता शरीर शांत हो गया.
“आप सो जाइए. मैं कल सुबह फिर आऊंगा.” संतोष उसे उठाकर, हाथ पकड़कर पलंग के पास ले गया. बत्ती बुझाते हुए वह बोला, “दरवाज़ा अंदर से बंद करके सो जाइएगा.”
उस पूरी रात वह सांय-सांय करती हवा को सुनता, सोचता पड़ा रहा. अभी उसे आए मुश्किल से दो-तीन दिन हुए थे. इतने में ही सब कितना विचित्र घटित हो गया था. पूरे समय वह तोषा के बारे में सोचता रहा. अब वह क्या करेगी? कैसे जिएगी? और सहसा उसे लगा- तोषा की जगह उसकी अपनी ऐसी हालत हुई होती तो? एकाकीपन को लेकर उसके बहुत सुरक्षित विचार थे. उसका ऐसा भयावह रूप उसकी कल्पना के बाहर था. तोषा ने भी अकेलेपन को लेकर बहुत रम्य विचार संजोये थे. जैसे वह आनंद का आधार हो. और अब…? कैसे सहन करेगी वह? कहां जाएगी? बार-बार वह सोचता रहा.
व्यवसाय से निवृत्त होने पर उसे लगा था कि वह पूरी तरह मुक्त हो गया है. उम्र उसे कई मामलों में मुक्ति दे रही थी. भविष्य की चिंता से, योजनाएं गढ़ने से, ज़िम्मेदारी उठाने से मुक्ति. पर मनुष्य जब तक मनुष्य रहता है, ज़िम्मेदारियों से कभी मुक्त हो सकता है भला?
उसके बाद तीन दिन तक वह सुबह, दोपहर, शाम तोषा के साथ रहा. उसकी हर छोटी से छोटी बात का ध्यान रखता रहा. तोषा ने चाय पी कि नहीं, खाना खाया कि नहीं. उसे नींद आई कि नहीं. हल्की-फुल्की जाने कितनी बातें की और सुनीं. बचपन के प्रसंगों… स्मरणों के विस्तृत मैदान पर दोनों ने साथ-साथ यात्रा की और बीच-बीच में उसने तोषा को एकांत में भी हो आने दिया, जहां वह अपनी पीड़ा का समाधान स्वयं खोज सके.
संतोष के जाने का दिन नज़दीक आया. यहां छह-सात दिन रहने की उसकी योजना थी. उसके बाद वह डांग के जंगलों के अंदरूनी इलाकों में जाना चाहता था. वहां की वनस्पतियां देखनी थीं, पक्षी देखने थे, जंगल की निःशब्दता सुननी थी और फिर रात में प्राणियों की दिनचर्या का अवलोकन करना था. चारेक दिन वहां रहने के बाद सीधे नैनीताल जाना था.
पर तोषा का क्या कार्यक्रम था? इतने दिनों में वह यह बात पूछ नहीं सका था. इतने देखभाल, धैर्य और आश्वासनभरी बातों से उसे किनारे पर खींच लाने के बाद अपने जाने की बात कहकर उसे शोक के भंवर में धकेल देना क्या उचित होगा? इसमें कोई शक नहीं कि उसकी उपस्थिति से तोषा को अपार सांत्वना मिलती थी.
अगली सुबह वह तोषा के पास गया, तो वह नहा-धोकर बैठी थी. बहुत दिनों के बाद वह आज कुछ स्वस्थ दिखाई दे रही थी. संतोष को देखते ही वह बोली, “चलिए, समुद्र पर चलेंगे?”
समुद्र में उसे पुनः रुचि लेते देख संतोष को अच्छा लगा. किनारे की गीली रेत पर एक-दूसरे से सटकर वे चुपचाप चलते रहे. तोषा के मन में क्या उथल-पुथल चल रही होगी, संतोष उसका अनुमान करने लगा.
सरू के वृक्ष के नीचे कोरी रेत पर वे दोनों बैठ गए. काफ़ी देर तक दोनों में से कोई कुछ न बोला. स्वयं में पर्याप्त होना अच्छा है, अकेले रह पाने में गौरव है. परंतु एक साथ होना, एक-दूसरे को उष्मा का आधार देना- क्या यह अधिक सार्थकता देनेवाली बात नहीं है?
संतोष चौंक गया. ये विचार उसे किस दिशा में ले जा रहे हैं? पैंसठ की उम्र हुई. तोषा भी साठ की तो होगी ही. हो सकता है एक-दो वर्ष कम-ज़्यादा हो. स्त्री-पुरुष की आवश्यकताओं से वे दोनों दूर निकल चुके हैं, पर प्रेम की आवश्यकता से कोई पूरी तरह मुक्त हो सकता है भला?
इस उम्र में लोग क्या कहेंगे? एक-दूसरे का साथ देने में उम्र बाधक हो सकती है? पर इस उम्र के कारण क्या उसे दूसरों की धारणाओं के अनुसार जीने की बाध्यता से मुक्ति नहीं मिल रही थी? पर तोषा क्या कहेगी?
उसने तोषा की ओर देखा. वह समुद्र पर नज़र टिकाए शांत बैठी थी. सहसा पहले दिन की ही तरह, प्रकाश का एक बादल फटा और सुनहरी बरसात समुद्र पर बरस पड़ी.
एक स्वर्णिम क्षण का आविर्भाव हुआ.तोषा के अधरों पर एक मंद मुस्कान खेल गई. ‘द लॉर्ड रेइन….’ उसने कहा.
हर तरह से यह सही था. यहां मनुष्य की कल्पना का राज नहीं चलता. ईश्वर की इच्छा का राज चलता है. और ईश्वर बरसता है…. सदैव.
सहसा संतोष बोल पड़ा, “मैं यहां से नैनीताल जाने की सोच रहा हूं. आज टिकट लेने जा रहा हूं. दो टिकट लाऊं न?” भावावेश में उसका स्वर कांप उठा, “आप भी साथ चलेंगी न?”
तोषा समझ गई. उसे इस तरह आमंत्रित करने के पहले इस अनजान, मृदु, धैर्यवान, प्रेमालु पुरुष ने किन-किन उधेड़बुन को पार किया होगा, इसका उसे ख़्याल आया.
समुद्र पर टिकी अपनी नज़र उठाकर उसने संतोष पर डाली. उन दो निर्दोष आंखों में उसे खालिस सच्चाई दिखाई दी. उसके भीतर एक स्वर्णिम क्षण का उदय हुआ. उसने धीरे से कहा, “ईश्वर की भेंट बरस रही है.”
संतोष उसे देखकर एक मधुर हंसी हंस रहा था.
                                                                                                                                                अनुवादः त्रिवेणी प्रसाद शुक्ल

 

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पंचतंत्र की कहानी: दिन में सपने… (Panchtantra Ki Kahani: Day Dreams)

पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani

पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani

पंचतंत्र की कहानी: दिन में सपने… (Panchtantra Ki Kahani: Day Dreams)

एक गांव में एक लड़की अपनी मां के साथ रहती थी. वो लड़की मन की बहुत चंचल थी. अक्सर सपनों में खो जाया करती थी. एक दिन वो दूध से भरा बर्तन लेकर शहर जाने की सोच रही थी. उसने अपनी मां से पूछा, “मां, मैं शहर जा रही हूं, क्या आपको कुछ मंगवाना है?”

उसकी मां ने कहा, “मुझे कुछ नहीं चाहिए. हां, यह दूध बेचकर जो पैसे मिलें, उनसे तुम अपने लिए चाहो तो कुछ ले लेना.”

पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani
वो लड़की शहर की ओर चल पड़ी. चलते-चलते वो फिर सपनों में खो गई. उसने सोचा कि ये दूध बेचकर भला मुझे क्या फ़ायदा होगा. ज़्यादा पैसे तो मिलेंगे नहीं, तो मैं ऐसा क्या करूं कि ज़्यादा पैसे कम सकूं… इतने में ही उसे ख़्याल आया कि दूध बेचकर जो पैसे मिलेंगे उससे वो मुर्गियां ख़रीद सकती है. वो फिर सपनों में खो गई“दूध बेचकर मुझे पैसे मिलेंगे, तो मैं मुर्गियां ख़रीद लूंगी, वो मुर्गियां रोज़ अंडे देंगी. इन अंडों को मैं बाज़ार में बेचकर काफ़ी पैसे कमा सकती हूं. उन पैसों से मैं और मुर्गियां ख़रीदूंगी, फिर उनके चूज़े निकलेंगे, उनसे और अंडे मिलेंगे… इस तरह तो मैं ख़ूब पैसा कमाऊंगी…

लेकिन फिर इतने पैसों का मैं करूंगी क्या?…हां, मैं उन पैसों से एक नई ड्रेस और टोपी ख़रीदूंगी. जब मैं यह ड्रेस और टोपी पहनकर बाहर निकलूंगी, तो पूरे शहर के लड़के मुझे ही देखेंगे.

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पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani

सब मुझसे दोस्ती करना चाहेंगे. पास आकर हाय-हैलो बोलेंगे. मैं भी इतराकर उनसे बात करूंगी. बड़ा मज़ा आएगा, लेकिन यह देखकर बाकी की सब लड़कियां तो मुझसे जलने लगेंगी. उन्हें जलता देख मुझे मज़ा आएगा. मैं उन्हें घूरकर देखूंगी और अपनी गर्दन इस तरह से स्टाइल में झटककर आगे बढ़ जाऊंगी.”

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पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani

यह कहते ही उस लड़की ने अपनी गर्दन को ज़ोर से झटका और गर्दन झटकते ही उसे सामने रखे एक पत्थर से ठोकर भी लग गई और दूध से भरा बर्तन, तो उसने सिर पर रख रखा था, नीचे गिरकर टूट गया. यह देख वो सदमे में आ गई और उसकी तंद्रा टूटी. मायूस होकर वो गांव लौटी.

उसने अपनी मां से माफी मांगी कि उसने सारा दूध गिरा दिया. यह सुनकर उसकी मां ने कहा, “दूध के गिरने की चिंता छोड़ो, लेकिन एक बात हमेशा याद रखो कि जब तक अंडे न फूट जाएं, तब तक चूज़े गिनने से कोई फ़ायदा नहीं…” मां की हिदायत और इशारा दोनों उसको समझ में आ गया. उसकी मां यही कहना चाहती थी कि जब तक हाथ में कुछ हो नहीं, तब तक उसके बारे में यूं ख़्याली पुलाव नहीं पकाना चाहिए.

सीख: ख़्याली पुलाव पकाने से कोई फ़ायदा नहीं. दिन में सपने देखकर उनमें खोने से कुछ नहीं होगा. अगर सच में कुछ हासिल करना है, तो हक़ीक़त में मेहनत करो.

पंचतंत्र की कहानी: गौरैया और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant)

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant
Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant
पंचतंत्र की कहानी: गौरैया और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant)

एक जंगल में बड़े से पेड़ पर एक गौरैया अपने पति के साथ रहती थी. उसका पति बाहर जाकर खाने-पीने का इंतज़ाम करता और वह घोंसले में रहकर अपने अंडों की रखवाली करती। गोरैया अपने घोंसले में अंडों से चूजों के निकलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी. एक दिन की बात है वो अपने अंडों को से रही थी और उसका पति भी रोज़ की तरह खाने के इंतज़ाम के लिए बाहर गया हुआ था.

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant
उसी जंगल में एक गुस्सैल हाथी में रहता था. वो हाथी वहां आ धमका और आस-पास के पेड़-पौधों को रौंदते हुए तोड़-फोड़ करने लगा. उसी तोड़ फोड़ के दौरान वह उस पेड़ तक भी पहुंच गया, जहां गौरैया रहती थी. उस हाथी ने पेड़ को गिराने के लिए ज़ोर-ज़ोर से हिलाया, लेकिन वह पेड़ बहुत मजबूत था इसलिए हाथी पेड़ को नहीं तोड़ पाया और थककर वहां से चला गया. लेकिन उसके पेड़ को ज़ोर-ज़ोर से हिलाने से गौरैया का घोंसला टूटकर नीचे आ गिरा और उसके सारे अंडे फूट गए.

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant

गौरैया यह देख बेहद आहत हुई और वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी. थोड़ी देर बाद उसका पति भी वापस आ गया. उसे सारा किस्सा पता चला, तो वो भी बहुत दुखी हुआ. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हाथी से बदला लेने व उसे सबक सिखाने की बात सोची.
उनका एक मित्र था, जो कठफोड़वा था. वे उसके पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई. वे हाथी से बदला लेने के लिए कठफोड़वा की मदद चाहते थे. कठफोड़वा के दो अन्य दोस्त भी थे- एक मधुमक्खी और एक मेंढक. वो सब तैयार हो गए और उन्होंने मिलकर हाथी से बदला लेने की योजना बनाई.

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant

तय योजना के तहत सबसे पहले मधुमक्खी ने अपना काम शुरू किया. उसने हाथी के कान में गुनगुनाना शुरू किया. हाथी को उसका संगीत भा गया, उसे उसके संगीत में मज़ा आने लगा और वो पूरी तरह उसके संगीत में तल्लीन हो गया. इसी बीच कठफोड़वा ने अपना काम शुरू कर दिया. उसने हाथी की दोनों आंखों पर वार किया. हाथी दर्द से कराहने लगा.

उसके बाद मेंढक अपनी पलटन के साथ एक दलदल के पास गया और सब मिलकर टर्राने लगे. मेंढकों का टर्राना सुनकर हाथी को लगा कि पास में ही कोई तालाब है. वह उस आवाज़ की दिशा में गया और दलदल में फंस गया. इस तरह से हाथी धीरे-धीरे दलदल में फंसता चला गया.

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Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant

सीख: एकता में बहुत ताक़त है, यदि कमज़ोर से कमज़ोर लोग भी एकजुट होकर काम करें, तो बड़े से बड़े कार्य को अंजाम दे सकते हैं और ताक़तवर शत्रु को भी पराजित कर सकते हैं. दूसरी ओर यह भी सीख मिलती है कि अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, हाथी को अपनी ताक़त पर घमंड था और उसका गुस्सा उसकी कमज़ोरी बन गया, जिसका परिणाम उसे भोगना ही पड़ा.